9.2 पूँजीका स्वरूप
कहा जाता है कि ‘अर्थशास्त्रके क्षेत्रमें पूँजी स्वयं उदाहरण है। वह धनका एक निम्नतम परिमाण है, जिसके रहनेपर ही उसका स्वामी पूँजीपति कहला सकता है। मार्क्सने उद्योगकी किसी शाखाके एक श्रमिकका उदाहरण लिया है, जो आठ घण्टेतक अपने लिये अर्थात् अपनी मजदूरीका अर्थ उत्पन्न करनेके लिये श्रम करता है और चार घण्टे अतिरिक्त अर्थ पैदा करनेके लिये जो उसके मालिककी जेबमें जाता है। इस विशेष दृष्टान्तमें यदि पूँजीपति अपने अतिरिक्त अर्थके द्वारा मजदूर-श्रेणीका जीवन भी बिताना चाहता है तो उसके पास इतना धन होना चाहिये कि वह दो मजदूरोंके लिये मजदूरी, कच्चा माल तथा उत्पादनके साधनोंका बंदोबस्त कर सके। लेकिन पूँजीपतिका उद्देश्य केवल जीना नहीं है, बल्कि अपनी सम्पत्तिकी वृद्धि करना है। इसलिये इस धनका मालिक अभी पूँजीपति नहीं है। अब यदि पूँजीपतिको मजदूरसे दुगुना अच्छा जीवन व्यतीत करना है और अतिरिक्त अर्थका आधा कारोबारमें फिर डालना है तो उसे आठ मजदूरोंको काममें लगाना चाहिये और पहले अर्थ-संग्रहका चौगुना कारोबारमें लगाना चाहिये। अब यह अर्थसंग्रह पूँजीका आकार ले लेता है। इस प्रकार अर्थ-संग्रहका परिणाम बढ़ते-बढ़ते एक सीमापर वह पूँजीके रूपमें परिणत हो जाता है।’
परंतु यह कहना ठीक नहीं; कारण, मार्क्सका अतिरिक्त श्रम और अतिरिक्त मूल्यकी कल्पना ही निराधार है, इसका विवेचन पीछे हो चुका है। यह भी कहा जा चुका है कि व्यापार या उद्योगद्वारा धनार्जनका तरीका ही इस प्रकारका होता है, जिसमें बुद्धिमानीसे एक मृतमूषिकाद्वारा भी कोटिपति बना जा सकता है। मार्क्सके मतानुसार उत्पादन-साधन ही पूँजी है, उसकी मात्रा अल्प हो या बड़ी। इसीलिये किसानोंके खेत भी उत्पादन-साधन हैं। इस दृष्टिसे किसान भी पूँजीपति रहते हैं।
समाज-विज्ञानके क्षेत्रमें इस गुणात्मक परिवर्तनकी गवाहीके लिये एंजिल्सने नेपोलियनको साक्षी माना है। वह कहता है कि ‘फ्रांसीसी घुड़सवार, जो नियन्त्रित सिपाही थे, लेकिन कोई अच्छे घुड़सवार नहीं थे और मामेलुक जो बहुत अच्छे घुड़सवार थे, लेकिन जिनमें नियन्त्रण नहीं था। उनकी लड़ाईके सिलसिलेमें दो मामेलुक आसानीसे तीन फ्रांसीसियोंका मुकाबला कर सकते थे। सौ मामेलुक सौ फ्रांसीसियोंके बराबर थे। लेकिन ३०० फ्रांसीसी साधारणतया ३०० मामेलुकोंको हरा देते थे और १ हजार फ्रांसीसी १५ सौ मामेलुकोंको हरा देते थे। पहलेके उदाहरणकी तरह इससे यह स्पष्ट है कि नियन्त्रित सिपाहियोंके जत्थेके परिमाणके बढ़नेपर उसका किस प्रकार गुणात्मक परिवर्तन होता है और वह अपनेसे अधिक संख्याकी फौजको हरा देता है।’
परंतु इससे भी यही सिद्ध होता है कि अनियन्त्रण, अनुशासनहीनता अल्पसंख्यकोंमें इतनी हानिकर नहीं होती, जितनी कि बहुसंख्यकोंमें। इसी प्रकार नियन्त्रणका गुण अल्पसंख्यकोंमें भले कुछ प्रकट हो, किंतु बहुसंख्यकोंमें अधिकरूपसे फलदायी होता है। नियन्त्रित संघटित समुदाय शक्तिशाली होता है। तृणादिनिर्मित रज्जु ही इसका दृष्टान्त है। परिणामवादानुसारी सत्कार्यवादमें कोई भी विद्यमान ही गुण किसी अवस्थाविशेषमें प्रकट होता है। सिकतामें तेल नहीं होता, अत: कभी नहीं व्यक्त होता। तिलमें तेल होता है, अत: वह कभी प्रकट होता है। वेदान्त-मतानुसार कारणकी अपेक्षा कार्यमें भिन्नता न होनेपर भी कुछ अनिर्वचनीय गुण भी सिद्ध होते हैं। जैसे मृत्तिकाद्वारा जलानयन नहीं होता, फिर भी मृत्तिकानिर्मित घटादिद्वारा जलानयन आदि कार्य होते हैं। तन्तुद्वारा अंगप्रावरण, शीतापनयन नहीं होता, फिर भी तन्तुनिर्मित पटद्वारा वह कार्य होता है। आकाशमें स्पर्श नहीं होता, फिर भी तन्निर्मित वायुमें स्पर्शगुण है, वायुमें रूप नहीं, तथापि वायुपरिणामभूत तेजमें रूपगुण उपलब्ध होता है। इसी तरह एक-एक व्यक्ति या अल्प व्यक्तिमें जो गुण नहीं व्यक्त होते, अधिक-संख्यक उन्हीं व्यक्तियोंमें वे गुण प्रकट होते हैं। इसी तरह एक या अन्य व्यक्तियोंमें अनियन्त्रणका जो दुष्परिणाम नहीं व्यक्त होता, बहुसंख्यकोंमें वह दुष्परिणाम स्पष्ट हो जाता है।
श्रोत: मार्क्सवाद और रामराज्य, लेखक: श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट
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