# 3.22 बहुलवाद ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज

> 3.22 बहुलवाद इसी प्रकार ब्रिटेनमें ही एक सत्तावादका विरोधी बहुलवाद दर्शन प्रकट हुआ। एक सत्तावाद एकात्मव्यवस्थाका समर्थक था। बहुलवादके अनुसार व्यक्ति उसकी स्वतन्त्रता उसके संघोंका समर्थक है। लॉस्की…

- **Canonical URL:** https://batukuvacha.com/posts/3-22-bhulvaad-maarksvaad-aur-raa/
- **Published:** 2025-03-27
- **Author:** श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज
- **Publisher:** बटुक उवाच (Batuk Uvacha) — https://batukuvacha.com
- **Language:** Hindi (hi), with Sanskrit passages
- **Categories:** दर्शन
- **Tags:** अन्तर्राष्ट्रीयनियम, अर्थशास्त्रआदर्शराज्य, आदर्शनागरिक, धर्मसम्राट, बहुल, बहुलवाद, मार्क्सवाद, रामराज्य, श्रीस्वामी-करपात्रीजी, हरिहरानन्द-सरस्वती

_Cite as: बटुक उवाच, “3.22 बहुलवाद ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज”, https://batukuvacha.com/posts/3-22-bhulvaad-maarksvaad-aur-raa/_

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### 3.22 बहुलवाद

> इसी प्रकार ब्रिटेनमें ही एक सत्तावादका विरोधी बहुलवाद [दर्शन](/posts/1-paashcaaty-drshn-1-1-drshnkii/) प्रकट हुआ। एक सत्तावाद एकात्मव्यवस्थाका समर्थक था। बहुलवादके अनुसार व्यक्ति उसकी स्वतन्त्रता उसके संघोंका समर्थक है। लॉस्की मुख्यरूपसे इस दर्शनका वेत्ता था। व्यक्ति अपने अनेक ध्येयोंकी पूर्तिके लिये अनेक संघ बनाता है। राज्यद्वारा यह काम पूरा नहीं होता। उसके अनुसार कोई भी संस्था ‘मेरे पूरे मैंके लिये’ नियम नहीं बना सकती। मैकाइवरके अनुसार राज्य अर्थैक्यका प्रतिनिधित्व करता है, परंतु सम्पूर्ण अर्थैक्यका नहीं। संघोंकी दृष्टिसे सहयोग एवं संघर्ष विश्वव्यापी है। लॉस्कीके मतानुसार आदर्श नागरिकका सर्वप्रथम कर्तव्य अपनी आत्माकी प्रगति है। वह उसी संघका अनुसरण करेगा, जिससे उसकी आत्मतुष्टि हो। अत: राज्यसत्ताधारी पदके योग्य तभी हो सकता है, जब वह व्यक्ति प्रगतिको पूरी करे। इतिहासके अनुसार संघोंने अनेक बार राज्यकी निरपेक्षताको सीमित किया है। नागरिककी सक्रियता ही सच्चा जनतन्त्र है। यह बहुलवादी संघात्मक समाजमें ही सम्भव है। ऑस्टिनके अनुसार अन्ताराष्ट्रिय निरपेक्षता भी सम्भव नहीं है। विश्वजनमतको कोई राज्य उल्लंघन नहीं कर सकता। लॉस्कीके अनुसार ब्रिटेनका आदर्श दृष्टिकोण यह होना चाहिये कि वह विश्व-कल्याणमें अपना कल्याण समझे। उसके अनुसार नैतिक क्षमताको पूर्ण करनेवाली व्यवस्था या नियम मान्य होना चाहिये। यदि अव्यवस्थाका लक्ष्य मानव-प्रगति है, तो वह अन्यायसे कई गुना अच्छी है। व्यक्ति-स्वातन्त्र्य, व्यक्ति-प्रगति और व्यक्ति-संघोंका अस्तित्व ही उनके दर्शनका सार है।

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श्रोत: [मार्क्सवाद](/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/) और [रामराज्य](/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/), लेखक: श्रीस्वामी [करपात्रीजी](/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/) महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट नि[वेद](/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/)न : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें
