# आगे माई एहन उमत बर लाइल ~ विद्यापति

> आगे माई एहन उमत बर लाइल हिमगिरि देखि-देखि लगइछ रंग। एहन बर घोड़बो न चढ़इक जो घोड़ रंग-रंग जंग॥ बाधक छाल जे बसहा पलानल साँपक भीरल तंग। डिमक-डिमक जे डमरू बजाइन खटर-खटर करु अंग॥ भकर-भकर जे भांग भकोसथि छट…

- **Canonical URL:** https://batukuvacha.com/posts/aage-maaii-ehn-umt-br-laail-vid/
- **Published:** 2024-07-05
- **Publisher:** बटुक उवाच (Batuk Uvacha) — https://batukuvacha.com
- **Language:** Hindi (hi), with Sanskrit passages
- **Categories:** साहित्य
- **Tags:** पार्वती, विद्यापति, शिव

_Cite as: बटुक उवाच, “आगे माई एहन उमत बर लाइल ~ विद्यापति”, https://batukuvacha.com/posts/aage-maaii-ehn-umt-br-laail-vid/_

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> आगे माई एहन उमत बर लाइल हिमगिरि देखि-देखि लगइछ रंग। \

> एहन बर घोड़बो न चढ़इक जो घोड़ रंग-रंग जंग॥ \

> बाधक छाल जे बसहा पलानल साँपक भीरल तंग। \

> डिमक-डिमक जे डमरू बजाइन खटर-खटर करु अंग॥ \

> भकर-भकर जे भांग भकोसथि छटर-पटर करू गाल। \

> चानन सों अनुराग न थिकइन भसम चढ़ावथि भाल॥ \

> भूत पिशाच अनेक दल साजल, सिर सों बहि गेल गंग। \

> भनइ विद्यापति सुन ए मनाइन थिकाह दिगंबर अंग॥

व्याख्यान :

> हे&nbsp;प्रिय&nbsp;सखी!&nbsp;हिमालय&nbsp;(पार्वती&nbsp;के&nbsp;लिए)&nbsp;ऐसा&nbsp;अस्त-व्यस्त&nbsp;उन्मत्त&nbsp;वर&nbsp;खोज&nbsp;कर&nbsp;लाए&nbsp;हैं&nbsp;कि&nbsp;जिसे&nbsp;देख-देख&nbsp;कर&nbsp;हँसी&nbsp;आती&nbsp;है।&nbsp;प्रायः&nbsp;दूल्हे&nbsp;सुसज्जित&nbsp;अश्व&nbsp;पर&nbsp;आरूढ़&nbsp;होकर&nbsp;आते&nbsp;हैं&nbsp;लेकिन&nbsp;यह&nbsp;तो&nbsp;ऐसा&nbsp;बावला&nbsp;वर&nbsp;है&nbsp;कि&nbsp;घोड़े&nbsp;पर&nbsp;भी&nbsp;नहीं&nbsp;चढ़&nbsp;सकता।&nbsp;यह&nbsp;दूल्हा&nbsp;तो&nbsp;एक&nbsp;ऐसे&nbsp;बैल&nbsp;पर&nbsp;चढ़ा&nbsp;है,&nbsp;जिस&nbsp;पर&nbsp;जीन&nbsp;न&nbsp;होकर&nbsp;बाघांबर&nbsp;बिछा&nbsp;हुआ&nbsp;है,&nbsp;और&nbsp;जो&nbsp;चमड़े&nbsp;की&nbsp;रस्सी&nbsp;से&nbsp;न&nbsp;कसा&nbsp;होकर&nbsp;सर्पों&nbsp;से&nbsp;कसा&nbsp;हुआ&nbsp;है।&nbsp;वे&nbsp;[शिव](/posts/shivbhujngm/)&nbsp;डिमक-डिमक&nbsp;ध्वनि&nbsp;के&nbsp;साथ&nbsp;अपने&nbsp;डमरू&nbsp;को&nbsp;बजा&nbsp;रहे&nbsp;हैं।&nbsp;यह&nbsp;दूल्हा&nbsp;मुंडमाला&nbsp;धारण&nbsp;किए&nbsp;है,&nbsp;जो&nbsp;बैल&nbsp;चलने&nbsp;से&nbsp;हिलती&nbsp;है&nbsp;और&nbsp;उसके&nbsp;अंगों&nbsp;से&nbsp;लग&nbsp;कर&nbsp;खटर-खटर&nbsp;की&nbsp;कर्ण&nbsp;कटु&nbsp;एवं&nbsp;वीभत्स&nbsp;ध्वनि&nbsp;उत्पन्न&nbsp;करती&nbsp;है।&nbsp;यह&nbsp;बार-बार&nbsp;मुँह&nbsp;भर-भर&nbsp;कर&nbsp;भाँग&nbsp;भकोस&nbsp;रहा&nbsp;है&nbsp;जिसके&nbsp;कारण&nbsp;उसके&nbsp;गाल&nbsp;छटर-पटर&nbsp;की&nbsp;ध्वनि&nbsp;करते&nbsp;हैं।&nbsp;यह&nbsp;दूल्हा&nbsp;है&nbsp;कि&nbsp;अवधूत!&nbsp;चंदन&nbsp;की&nbsp;जगह&nbsp;यह&nbsp;अपने&nbsp;मस्तक&nbsp;को&nbsp;भस्मावृत&nbsp;किए&nbsp;हुए&nbsp;है।&nbsp;इनकी&nbsp;बारात&nbsp;में&nbsp;भूत&nbsp;और&nbsp;पिशाचों&nbsp;के&nbsp;दल&nbsp;सुसज्जित&nbsp;हैं,&nbsp;इनके&nbsp;शीश&nbsp;से&nbsp;गंगा&nbsp;प्रवहमान&nbsp;है।&nbsp;विद्यापति&nbsp;कहते&nbsp;हैं&nbsp;कि&nbsp;सखी&nbsp;कहती&nbsp;है&nbsp;कि&nbsp;हे&nbsp;मैना!&nbsp;सुनो,&nbsp;यह&nbsp;असामान्य&nbsp;वर&nbsp;है,&nbsp;क्योंकि&nbsp;सामान्य&nbsp;वर&nbsp;तो&nbsp;परिधानित&nbsp;होते&nbsp;हैं&nbsp;लेकिन&nbsp;यह&nbsp;वर&nbsp;परिधान-रहित&nbsp;है।&nbsp;इसका&nbsp;व्यंजना&nbsp;के&nbsp;द्वारा&nbsp;यह&nbsp;अर्थ&nbsp;भी&nbsp;हो&nbsp;सकता&nbsp;है&nbsp;कि&nbsp;शिव&nbsp;अलौकिक&nbsp;वर&nbsp;हैं&nbsp;जिनकी&nbsp;व्याप्ति&nbsp;अखिल&nbsp;ब्रह्मांड&nbsp;है&nbsp;और&nbsp;जिनके&nbsp;वस्त्र&nbsp;केवल&nbsp;दिशाएँ&nbsp;ही&nbsp;हैं।

स्रोत :

पुस्तक : विद्यापति का अमर काव्य (पृष्ठ 132) रचनाकार : विद्यापति प्रकाशन : स्टूडेंट स्टोर बिहारीपुर बरेली संस्करण : 1965

नि[वेद](/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/)न : मूल पुस्तक क्रय कर लेखक तथा प्रकाशक की सहायता करें
