# आज नाथ एक बर्त्त माँहि सुख लागत है ~ विद्यापति

> आज नाथ एक बर्त्त माँहि सुख लागत हे। तोहें सिव धरि नट वेष कि डमरू बजाएब हे॥ भल न कहल गउरा रउरा प्राजु सु नाचब हे। सदा सोच मोहि होत कबन विधि बाँचब हे ॥ जे-जे सोच मोहिं होत कहा सुझाएब हे॥ रउरा जगत के नाय…

- **Canonical URL:** https://batukuvacha.com/posts/aaj-naath-ek-brtt-maanhi-sukh/
- **Published:** 2024-06-26
- **Publisher:** बटुक उवाच (Batuk Uvacha) — https://batukuvacha.com
- **Language:** Hindi (hi), with Sanskrit passages
- **Categories:** साहित्य
- **Tags:** कार्तिकेय, गौरी, विद्यापति, शंकर, शिव

_Cite as: बटुक उवाच, “आज नाथ एक बर्त्त माँहि सुख लागत है ~ विद्यापति”, https://batukuvacha.com/posts/aaj-naath-ek-brtt-maanhi-sukh/_

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> आज नाथ एक बर्त्त माँहि सुख लागत हे। \

> तोहें सिव धरि नट वेष कि डमरू बजाएब हे॥ \

> भल न कहल गउरा रउरा प्राजु सु नाचब हे। \

> सदा सोच मोहि होत कबन विधि बाँचब हे ॥ \

> जे-जे सोच मोहिं होत कहा सुझाएब हे॥ \

> रउरा जगत के नाय कबन सोच लागए हे ॥ \

> नाग ससरि भुमि खसत पुहुमि लोटाएत है। \

> गनपति पोसल मजूर से हो धसि खाएत हे। \

> अमिअ चूइ भुमि खसत बघंबर जागत हे । \

> होत बघंबर बाघ बसह धरि खाएत है॥ \

> टूटि खसत रुदराछ मसान जगावत हे। \

> गौरि कहँ दुख होत विद्यापति गावत हे॥

व्याख्यान :

> गौरी&nbsp;[शिव](/posts/shivbhujngm/)&nbsp;से&nbsp;अपने&nbsp;मन&nbsp;की&nbsp;साध&nbsp;बताती&nbsp;हुई&nbsp;कहती&nbsp;हैं&nbsp;कि&nbsp;हे&nbsp;नाथ!&nbsp;आज&nbsp;मुझे&nbsp;केवल&nbsp;एक&nbsp;बात&nbsp;से&nbsp;सुखानुभव&nbsp;होगा;&nbsp;कि&nbsp;आप&nbsp;आज&nbsp;नट-वेश&nbsp;धारण&nbsp;कर&nbsp;डमरू&nbsp;बजाएँ।&nbsp;(गौरी&nbsp;के&nbsp;इस&nbsp;आग्रह&nbsp;से&nbsp;शिव&nbsp;असमंजस&nbsp;में&nbsp;पड़&nbsp;गए&nbsp;और&nbsp;कहा)&nbsp;तुमने&nbsp;ऐसा&nbsp;आग्रह&nbsp;कर&nbsp;अच्छा&nbsp;नहीं&nbsp;किया।&nbsp;मुझे&nbsp;सदैव&nbsp;ही&nbsp;यह&nbsp;चिंता&nbsp;सताती&nbsp;रहती&nbsp;है&nbsp;(कि&nbsp;मेरे&nbsp;नृत्य&nbsp;से&nbsp;उत्पन्न&nbsp;विनाश&nbsp;के&nbsp;कारण)&nbsp;हमारा&nbsp;यह&nbsp;छोटा-सा&nbsp;संसार&nbsp;कैसे&nbsp;बचेगा!&nbsp;तुम्हारे&nbsp;इस&nbsp;आग्रह&nbsp;से&nbsp;मुझे&nbsp;जो&nbsp;चिंताएँ&nbsp;घेर&nbsp;रही&nbsp;हैं,&nbsp;तुम्हें&nbsp;कैसे&nbsp;समझाऊँ!&nbsp;(इस&nbsp;पर&nbsp;गौरी&nbsp;शंकर&nbsp;से&nbsp;कहती&nbsp;हैं)&nbsp;हे&nbsp;प्रभु!&nbsp;आप&nbsp;तो&nbsp;अखिल&nbsp;जगत&nbsp;के&nbsp;स्वामी&nbsp;हैं,&nbsp;आपको&nbsp;किस&nbsp;प्रकार&nbsp;की&nbsp;चिंता&nbsp;व्याप&nbsp;सकती&nbsp;है?&nbsp;(पार्वती&nbsp;की&nbsp;इस&nbsp;शंका&nbsp;का&nbsp;समाधान&nbsp;करते&nbsp;हुए&nbsp;शिव&nbsp;कहते&nbsp;हैं&nbsp;कि&nbsp;मेरे&nbsp;नृत्य&nbsp;(करने&nbsp;से)&nbsp;सर्प&nbsp;जटाओं&nbsp;से&nbsp;खिसक&nbsp;कर&nbsp;नीचे&nbsp;पृथ्वी&nbsp;पर&nbsp;लोटने&nbsp;लगेंगे।&nbsp;इन&nbsp;सर्पों&nbsp;को&nbsp;पृथ्वी&nbsp;पर&nbsp;देखकर&nbsp;कार्तिकेय&nbsp;पोषित&nbsp;मयूर&nbsp;द्वारा&nbsp;वे&nbsp;खा&nbsp;लिए&nbsp;जाएँगे।(इसके&nbsp;अतिरिक्त&nbsp;नृत्य&nbsp;करने&nbsp;के&nbsp;कारण)&nbsp;मस्तक&nbsp;पर&nbsp;आसीन&nbsp;चंद्रमा&nbsp;का&nbsp;अमृत&nbsp;छलक&nbsp;कर&nbsp;पृथ्वी&nbsp;पर&nbsp;गिर&nbsp;जाएगा&nbsp;और&nbsp;फिर&nbsp;व्याघ्र&nbsp;चर्म&nbsp;जीवित&nbsp;सिंह&nbsp;में&nbsp;परिवर्तित&nbsp;होकर&nbsp;मेरे&nbsp;बैल&nbsp;को&nbsp;खा&nbsp;जाएगा।&nbsp;तात्पर्य&nbsp;यह&nbsp;है&nbsp;मेरे&nbsp;नृत्य&nbsp;से&nbsp;मेरे&nbsp;ही&nbsp;परिजनों&nbsp;का&nbsp;विनाश&nbsp;हो&nbsp;जाएगा।&nbsp;रुंडमाला&nbsp;टूट&nbsp;कर&nbsp;बिखर&nbsp;जाएगी,&nbsp;तो&nbsp;फिर&nbsp;श्मशान&nbsp;जग&nbsp;जाएँगे।&nbsp;शिव&nbsp;की&nbsp;भयावह&nbsp;बातों&nbsp;को&nbsp;सुनकर&nbsp;गौरी&nbsp;को&nbsp;दुख&nbsp;हुआ।&nbsp;कवि&nbsp;विद्यापति&nbsp;इस&nbsp;प्रसंग&nbsp;को&nbsp;गाकर&nbsp;वर्णन&nbsp;करते&nbsp;हैं।

स्रोत :

पुस्तक : विद्यापति का अमर काव्य (पृष्ठ 139) रचनाकार : विद्यापति प्रकाशन : स्टूडेंट स्टोर बिहारीपुर बरेली संस्करण : 1965

नि[वेद](/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/)न : मूल पुस्तक क्रय कर लेखक तथा प्रकाशक की सहायता करें
