# ए हरि, बंदओं तुअ पद नाए ~ विद्यापति

> जतने जतेक धन पाएँ बटोरल मिलि-मिलि परिजन खाए। मरनक बेरि हरि केओ नहि पूछए एक करम सँग जाए॥ ए हरि, बंदओं तुअ पद नाए। तुअ पद परिहरि पाप-पयोनिधि पारक कओन उपाए॥ जनम अवधि नति तुअ पद सेवल जुबती रति-रंग मेंलि। …

- **Canonical URL:** https://batukuvacha.com/posts/e-hri-bndon-tua-pd-naae-vid/
- **Published:** 2024-07-09
- **Publisher:** बटुक उवाच (Batuk Uvacha) — https://batukuvacha.com
- **Language:** Hindi (hi), with Sanskrit passages
- **Categories:** साहित्य
- **Tags:** विद्यापति, हरि

_Cite as: बटुक उवाच, “ए हरि, बंदओं तुअ पद नाए ~ विद्यापति”, https://batukuvacha.com/posts/e-hri-bndon-tua-pd-naae-vid/_

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> जतने जतेक धन पाएँ बटोरल मिलि-मिलि परिजन खाए। \

> मरनक बेरि हरि केओ नहि पूछए एक करम सँग जाए॥ \

> ए हरि, बंदओं तुअ पद नाए। \

> तुअ पद परिहरि पाप-पयोनिधि पारक कओन उपाए॥ \

> जनम अवधि नति तुअ पद सेवल जुबती रति-रंग मेंलि। \

> अमिअ तेजि हालाहल पिउल सम्पद आपदहि भेलि॥ \

> भनइ विद्यापति लेह मनहि गुनि कहलें कि होएत काज। \

> साँझक बेरि सेवकाई सँगइते हेरते तुअ पद लाज॥

व्याख्यान :

हे&nbsp;हरि,&nbsp;मैं&nbsp;विनम्र&nbsp;होकर&nbsp;तुम्हारे&nbsp;चरणों&nbsp;की&nbsp;वंदना&nbsp;करता&nbsp;हूँ।&nbsp;बड़ी&nbsp;मुश्किलों&nbsp;से&nbsp;मैंने&nbsp;पाप&nbsp;की&nbsp;कमाई&nbsp;बटोरी।&nbsp;घरवाले&nbsp;मिल-जुलकर&nbsp;उस&nbsp;धन&nbsp;का&nbsp;उपभोग&nbsp;करते&nbsp;रहे।&nbsp;मरने&nbsp;के&nbsp;समय&nbsp;कोई&nbsp;नहीं&nbsp;पूछता&nbsp;है।&nbsp;अपना&nbsp;ही&nbsp;कर्म&nbsp;साथ&nbsp;जाएगा।&nbsp;हे&nbsp;हरि,&nbsp;मैं&nbsp;तुम्हें&nbsp;प्रणाम&nbsp;करता&nbsp;हूँ।&nbsp;तुम्हारे&nbsp;चरणों&nbsp;को&nbsp;छोड़कर&nbsp;पाप-सागर&nbsp;से&nbsp;पार&nbsp;होने&nbsp;का&nbsp;और&nbsp;कौन&nbsp;उपाय&nbsp;है?&nbsp;जीवन&nbsp;में&nbsp;मैंने&nbsp;कभी&nbsp;तुम्हारे&nbsp;चरणों&nbsp;की&nbsp;सेवा&nbsp;नहीं&nbsp;की।&nbsp;मैं&nbsp;युवतियों&nbsp;के&nbsp;साथ&nbsp;काम-केलि&nbsp;में&nbsp;दीवाना&nbsp;बना&nbsp;रहा।&nbsp;अमृत&nbsp;छोड़कर&nbsp;मैंने&nbsp;जीवन-भर&nbsp;विष&nbsp;ही&nbsp;पिया&nbsp;है।&nbsp;संपदा&nbsp;मेरे&nbsp;लिए&nbsp;मुसीबत&nbsp;हो&nbsp;गई।&nbsp;विद्यापति&nbsp;ने&nbsp;कहा—“ख़ुद&nbsp;ही&nbsp;मन&nbsp;में&nbsp;सोच&nbsp;लो!&nbsp;कहने&nbsp;से&nbsp;क्या&nbsp;होगा?&nbsp;संध्या&nbsp;की&nbsp;बेला&nbsp;में&nbsp;अब&nbsp;हरि&nbsp;के&nbsp;पास&nbsp;शरण&nbsp;माँगने&nbsp;आए।&nbsp;भगवान&nbsp;के&nbsp;चरणों&nbsp;की&nbsp;और&nbsp;देखते&nbsp;हो,&nbsp;इसमें&nbsp;भी&nbsp;लाज&nbsp;लगती&nbsp;है।”

स्रोत :

पुस्तक : विद्यापति के गीत (पृष्ठ 144) रचनाकार : विद्यापति प्रकाशन : वाणी प्रकाशन संस्करण : 2011

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