# जय जय भैरव असुर-भयाउनि ~ विद्यापति

> जय जय भैरव असुर-भयाउनि, पसुपति-भामिनि माया। सहज सुमति बर दिअहे गोसाउनि अनुगति गति तुअ पाया॥ बासर-रैनि सबासन सोभित चरन, चंद्रमनि चूड़ा। कतओक दैत्य मारि मुँह मेलल, कतन उगिलि करु कूड़ा॥ सामर बरन, नयन अनु…

- **Canonical URL:** https://batukuvacha.com/posts/jy-jy-bhairv-asur-bhyaauni-vid/
- **Published:** 2024-06-16
- **Publisher:** बटुक उवाच (Batuk Uvacha) — https://batukuvacha.com
- **Language:** Hindi (hi), with Sanskrit passages
- **Categories:** साहित्य
- **Tags:** भगवती, विद्यापति

_Cite as: बटुक उवाच, “जय जय भैरव असुर-भयाउनि ~ विद्यापति”, https://batukuvacha.com/posts/jy-jy-bhairv-asur-bhyaauni-vid/_

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> जय जय भैरव असुर-भयाउनि, पसुपति-भामिनि माया। \

> सहज सुमति बर दिअहे गोसाउनि अनुगति गति तुअ पाया॥ \

> बासर-रैनि सबासन सोभित चरन, चंद्रमनि चूड़ा। \

> कतओक दैत्य मारि मुँह मेलल, कतन उगिलि करु कूड़ा॥ \

> सामर बरन, नयन अनुरंजित, जलद-जोग फुल कोका। \

> कट-कट बिकट ओठ-पुट पाँड़रि लिधुर-फेन उठ फोका॥ \

> घन-घन-घनन धुधुर कत बाजए, हन-हन कर तुअ काता। \

> विद्यापति कवि तुअ पद सेवक, पुत्र बिसरु जनि माता॥

व्याख्यान :

राक्षसों&nbsp;को&nbsp;आतंकित&nbsp;करने&nbsp;वाली&nbsp;भैरवी&nbsp;[शिव](/posts/shivbhujngm/)ानी&nbsp;तुम्हारी&nbsp;जय&nbsp;हो!&nbsp;तुम्हारे&nbsp;चरण-युगल&nbsp;ही&nbsp;इस&nbsp;दास&nbsp;के&nbsp;लिए&nbsp;एकमात्र&nbsp;सहारा&nbsp;हैं...&nbsp;देवि,&nbsp;मैं&nbsp;तुमसे&nbsp;‘सहज-बुद्धि'&nbsp;की&nbsp;ही&nbsp;वरदान&nbsp;के&nbsp;रूप&nbsp;में&nbsp;याचना&nbsp;कर&nbsp;रहा&nbsp;हूँ।&nbsp;दिन-रात&nbsp;तुम्हारे&nbsp;चरण&nbsp;शव-आसन&nbsp;पर&nbsp;शोभित&nbsp;हैं...&nbsp;तुम्हारा&nbsp;सीमंत&nbsp;चंद्रमणि&nbsp;से&nbsp;अलंकृत&nbsp;है...&nbsp;कितने&nbsp;ही&nbsp;दानवों&nbsp;को&nbsp;मारकर&nbsp;तुमने&nbsp;अपने&nbsp;मुँह&nbsp;के&nbsp;अंदर&nbsp;डाल&nbsp;लिया,&nbsp;कितने&nbsp;ही&nbsp;दानवों&nbsp;को&nbsp;तुम&nbsp;हज़म&nbsp;कर&nbsp;गई&nbsp;हो...&nbsp;उगल&nbsp;दिए&nbsp;जाने&nbsp;पर&nbsp;कितने&nbsp;ही&nbsp;दानव&nbsp;सीठी&nbsp;(निःसत्त्व)&nbsp;बनकर&nbsp;धूल&nbsp;में&nbsp;मिल&nbsp;गए&nbsp;हैं।&nbsp;तुम्हारी&nbsp;सूरत&nbsp;साँवली&nbsp;है।&nbsp;आँखें&nbsp;लाल-लाल&nbsp;हैं।&nbsp;लगता&nbsp;है,&nbsp;बादलों&nbsp;में&nbsp;लाल-लाल&nbsp;कमल&nbsp;खिले&nbsp;हैं।&nbsp;पंखुड़ियों&nbsp;जैसे&nbsp;होंठ&nbsp;हैं&nbsp;तुम्हारे,&nbsp;जिनसे&nbsp;कट-कट&nbsp;की&nbsp;विकट&nbsp;आवाज़&nbsp;निकल&nbsp;रही&nbsp;है।&nbsp;ख़ूनी&nbsp;रंग&nbsp;के&nbsp;झाग&nbsp;बुलबुले&nbsp;पैदा&nbsp;कर&nbsp;रहे&nbsp;हैं।&nbsp;मेखला&nbsp;(करधनी)&nbsp;के&nbsp;घुँघरुओं&nbsp;से&nbsp;झन-झन-झनन&nbsp;घन-घन-घनन&nbsp;की&nbsp;मीठी&nbsp;आवाज़&nbsp;निकल&nbsp;रही&nbsp;है।&nbsp;तुम्हारी&nbsp;कृपाण&nbsp;प्रहार&nbsp;करने&nbsp;के&nbsp;लिए&nbsp;हमेशा&nbsp;तैयार&nbsp;रहती&nbsp;है...&nbsp;।&nbsp;तुम्हारे&nbsp;चरणों&nbsp;का&nbsp;सेवक&nbsp;विद्यापति&nbsp;कवि&nbsp;कहता&nbsp;है—“माता,&nbsp;पुत्र&nbsp;को&nbsp;कभी&nbsp;नहीं&nbsp;भूलो!”

स्रोत :

पुस्तक : विद्यापति के गीत (पृष्ठ 9) रचनाकार : विद्यापति प्रकाशन : वाणी प्रकाशन संस्करण : 2011

नि[वेद](/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/)न : मूल पुस्तक क्रय कर लेखक तथा प्रकाशक की सहायता करें
