# माधव, हम परिनाम निरासा  ~ विद्यापति

> माधव, हम परिनाम निरासा। तोहे जगतारन दीन दयाराम अतए तोहर बिसबासा॥ आध जनम हम नींद गमाओल जरा सिसु कत दिन गेला। निधुबन रमनि-रभस रंग मातल तोहि भजब कोन बेला॥ कत चतुरानन मरि मरि जाएत न तुअ आदि सवसाना। तोहि ज…

- **Canonical URL:** https://batukuvacha.com/posts/maadhv-hm-prinaam-niraasaa-vi/
- **Published:** 2024-07-02
- **Publisher:** बटुक उवाच (Batuk Uvacha) — https://batukuvacha.com
- **Language:** Hindi (hi), with Sanskrit passages
- **Categories:** साहित्य
- **Tags:** माधव, विद्यापति

_Cite as: बटुक उवाच, “माधव, हम परिनाम निरासा  ~ विद्यापति”, https://batukuvacha.com/posts/maadhv-hm-prinaam-niraasaa-vi/_

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> माधव, हम परिनाम निरासा। \

> तोहे जगतारन दीन दयाराम अतए तोहर बिसबासा॥ \

> आध जनम हम नींद गमाओल जरा सिसु कत दिन गेला। \

> निधुबन रमनि-रभस रंग मातल तोहि भजब कोन बेला॥ \

> कत चतुरानन मरि मरि जाएत न तुअ आदि सवसाना। \

> तोहि जनमि पुनु तोहि समाएत सागर लहरि अमाना॥ \

> भनइ विद्यापति सेष समन भय तुअ बिनु गति नहि आरा। \

> तोहें अनाथक नाथ कहाओसि तारन भार तोहारा॥

व्याख्यान :

माधव,&nbsp;जीवन&nbsp;के&nbsp;अंत&nbsp;में&nbsp;मुझे&nbsp;निराशा-ही-निराशा&nbsp;नज़र&nbsp;आ&nbsp;रही&nbsp;है।&nbsp;तुम&nbsp;दयालु&nbsp;हो।&nbsp;जगतारन&nbsp;हो!&nbsp;इसी&nbsp;से&nbsp;मुझे&nbsp;तुम्हारा&nbsp;विश्वास&nbsp;है।&nbsp;आधी&nbsp;ज़िंदगी&nbsp;मैंने&nbsp;सोकर&nbsp;गँवा&nbsp;दी&nbsp;है।&nbsp;बुढ़ापा&nbsp;और&nbsp;बचपन&nbsp;ने&nbsp;जाने&nbsp;कितने&nbsp;ही&nbsp;दिन&nbsp;छीन&nbsp;लिए&nbsp;होंगे!&nbsp;बची&nbsp;हुई&nbsp;आयु&nbsp;मैंने&nbsp;स्त्रियों&nbsp;के&nbsp;साथ&nbsp;रंगरेलियाँ&nbsp;मनाते&nbsp;हुए&nbsp;खो&nbsp;दी।&nbsp;तुम्हारे&nbsp;भजन-ध्यान&nbsp;के&nbsp;लिए&nbsp;मेरे&nbsp;पास&nbsp;अब&nbsp;कौन-सी&nbsp;बेला&nbsp;रह&nbsp;गई&nbsp;है?&nbsp;कितने&nbsp;विधाता&nbsp;मर-मर&nbsp;जाएँगे!&nbsp;वे&nbsp;तुम्हारा&nbsp;आदि-अंत&nbsp;नहीं&nbsp;पाएँगे।&nbsp;तुम्हारे&nbsp;में&nbsp;पैदा&nbsp;होकर&nbsp;वे&nbsp;फिर&nbsp;तुम्हारे&nbsp;ही&nbsp;अंदर&nbsp;समा&nbsp;जाएँगे,&nbsp;जैसे&nbsp;समुद्र&nbsp;में&nbsp;उठने&nbsp;वाले&nbsp;ज्वार&nbsp;फिर&nbsp;से&nbsp;समुद्र&nbsp;के&nbsp;अंदर&nbsp;विलीन&nbsp;हो&nbsp;जाते&nbsp;हैं।&nbsp;विद्यापति&nbsp;कहते&nbsp;हैं—“मेरे&nbsp;अंतिम&nbsp;भय&nbsp;को&nbsp;तुम्हीं&nbsp;हटाओगे।&nbsp;तुम्हारे,&nbsp;सिवा&nbsp;मेरा&nbsp;कोई&nbsp;और&nbsp;नहीं&nbsp;है।&nbsp;तुम&nbsp;अनाथों&nbsp;के&nbsp;नाथ&nbsp;कहलाते&nbsp;हो,&nbsp;उबारने&nbsp;का&nbsp;भार&nbsp;तुम्हारे&nbsp;ही&nbsp;ऊपर&nbsp;रहा।”

स्रोत :

पुस्तक : विद्यापति के गीत (पृष्ठ 143) रचनाकार : विद्यापति प्रकाशन : वाणी प्रकाशन संस्करण : 2011

नि[वेद](/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/)न : मूल पुस्तक क्रय कर लेखक तथा प्रकाशक की सहायता करें
