# शिव मानस पूजा ~ श्रीशङ्कराचार्यस्य

> रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं नानारत्नविभूषितं मृगमदामोदाङ्कितं चन्दनम् । जातीचम्पकबिल्वपत्ररचितं पुष्पं च धूपं तथा दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम्&nbsp;॥1 सौवर्णे नवरत…

- **Canonical URL:** https://batukuvacha.com/posts/shiv-maans-puujaa-shriishngkraa/
- **Published:** 2024-07-22
- **Publisher:** बटुक उवाच (Batuk Uvacha) — https://batukuvacha.com
- **Language:** Hindi (hi), with Sanskrit passages
- **Categories:** स्तोत्र
- **Tags:** आदिशङ्कराचार्यः, शिव, शिव-मानस-स्तोत्र

_Cite as: बटुक उवाच, “शिव मानस पूजा ~ श्रीशङ्कराचार्यस्य”, https://batukuvacha.com/posts/shiv-maans-puujaa-shriishngkraa/_

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रत्नैः कल्पितमासनं हिमजलैः स्नानं च दिव्याम्बरं
> नानारत्नविभूषितं मृगमदामोदाङ्कितं चन्दनम् ।
जातीचम्पकबिल्वपत्ररचितं पुष्पं च धूपं तथा
> दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम्&nbsp;॥1

सौवर्णे नवरत्नखण्डरचिते पात्रे घृतं पायसं
> भक्ष्यं पञ्चविधं पयोदधियुतं रम्भाफलं पानकम् ।
शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूरखण्डोज्ज्वलं
> ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु ॥2

छत्रं चामरयोर्युगं व्यजनकं चादर्शकं निर्मलं
> वीणाभेरिमृदङ्गकाहलकला गीतं च नृत्यं तथा ।
साष्टाङ्गं प्रणतिः स्तुतिर्बहुविधा ह्येतत्समस्तं मया
> सङ्कल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो&nbsp;॥3

आत्मा त्वं गिरिजा मतिः सहचराः प्राणाः शरीरं गृहं
> पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थितिः ।
सञ्चारः पदयोः प्रदक्षिणविधिः [स्तोत्र](/posts/dvaadshlinggstotrm/)ाणि सर्वा गिरो
> यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ॥4 \

> किं वा वानेन धनेन वाजिकरिभी प्राप्तेन राज्येन किम । \
> किं वा पुत्रकलत्र पशुभिर देहन गेहेन किम । \
> ज्ञातवेत तत्क्षण भंगुरं सपदि रे त्याज्यं मनो दुरत: । \
> स्वामार्थम गुरु वाक्यतो भज भज श्री पार्वती बल्भम्&nbsp;॥5 \

> हे दयानिधे ! हे पशुपते ! हे देव! यह रलनिर्मित सिंहासन, शीतल जलसे स्नान, नाना रत्नावलिविभूषित दिव्य वस्त्र, कस्तूरिकागन्धसमन्वित चन्दन, जुही, चम्पा और बिल्वपत्रसे रचित पुष्पांजलि तथा धूप और दीप यह सब मानसिक \[पूजोपहार\] ग्रहण कीजिये ॥ १।। \

> मैंने नवीन रलखण्डोंसे खचित सुवर्णपात्रमें घृतयुक्त खीर, दूध और दधिसहित पाँच प्रकारका व्यञ्जन, कदलीफल, शर्बत, अनेकों शाक, कपूरसे सुवासित और स्वच्छ किया हुआ मीठा जल और ताम्बूल-ये सब मनके द्वारा ही बनाकर प्रस्तुत किये हैं। प्रभो! कृपया इन्हें स्वीकार कीजिये ।। २ ।। \

> छत्र, दो चँवर, पंखा, निर्मल दर्पण, वीणा, भेरी, मृदंग, दुन्दुभीके वाद्य, गान और नृत्य, साष्टांग प्रणाम, नानाविध स्तुति-ये सब मैं संकल्पसे ही आपको समर्पण करता हूँ; प्रभो ! मेरी यह पूजा ग्रहण कीजिये ॥ ३ ॥ \

> हे शम्भो ! मेरी आत्मा तुम हो, बुद्धि पार्वतीजी हैं, प्राण आपके गण हैं, शरीर आपका मन्दिर है, सम्पूर्ण विषय-भोग की रचना आपकी पूजा है, निद्रा समाधि है, मेरा चलना-फिरना आपकी परिक्रमा है तथा सम्पूर्ण शब्द आपके स्तोत्र हैं, इस प्रकार मैं जो-जो भी कर्म करता हूँ, वह सब आपकी आराधना ही है।। ४।। \

> प्रभो ! मैंने हाथ, पैर, वाणी, शरीर, कर्म, कर्ण, नेत्र अथवा मनसे जो भी अपराध किये हों; वे विहित हों अथवा अविहित, उन सबको आप क्षमा कीजिये । हे करुणासागर श्रीमहादेव शंकर! आपकी जय हो ।। ५ ।।

ॐ नमः [शिव](/posts/shivbhujngm/)ाय हर हर महादेव&nbsp;

स्रोत :

पुस्तक : शिवस्तोत्ररत्नाकर रचनाकार : श्रीशङ्कराचार्यस्य : गीता प्रेस

नि[वेद](/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/)न : मूल पुस्तक क्रय कर लेखक तथा प्रकाशक की सहायता करें
