# वेदसारशिवस्तोत्रम्

> ।।श्रीः।। ।।वेदसारशिवस्तोत्रम्।। पशूनां पतिं पापनाशं परेशं गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम्। जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम्।।1।। महेशं सुरेशं सुरारातिनाशं विभुं विश्वनाथं…

- **Canonical URL:** https://batukuvacha.com/posts/vedsaarshivstotrm/
- **Published:** 2022-04-10
- **Publisher:** बटुक उवाच (Batuk Uvacha) — https://batukuvacha.com
- **Language:** Hindi (hi), with Sanskrit passages
- **Categories:** स्तोत्र
- **Tags:** आदिशङ्कराचार्यः, शिव

_Cite as: बटुक उवाच, “वेदसारशिवस्तोत्रम्”, https://batukuvacha.com/posts/vedsaarshivstotrm/_

---
> ।।श्रीः।। \

> ।।[वेद](/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/)सार[शिव](/posts/shivbhujngm/)[स्तोत्र](/posts/dvaadshlinggstotrm/)म्।।
पशूनां पतिं पापनाशं परेशं

> गजेन्द्रस्य कृत्तिं वसानं वरेण्यम्।

जटाजूटमध्ये स्फुरद्गाङ्गवारिं
> महादेवमेकं स्मरामि स्मरारिम्।।1।।

महेशं सुरेशं सुरारातिनाशं

> विभुं विश्वनाथं विभूत्यङ्गभूषम्।

विरूपाक्षमिन्द्वर्कवह्नित्रिनेत्रं
> सदानन्दमीडे प्रभुं पञ्चवक्त्रम्।।2।।

गिरीशं गणेशं गले नीलवर्णं

> गवेन्द्राधिरूढं गुणातीतरूपम्।

भवं भास्वरं भस्मना भूषिताङ्गं
> भवानीकलत्रं भजे पञ्चवक्त्रम्।।3।।

शिवाकान्त शंभो शशाङ्कार्धमौले

> महेशान शूलिञ्जटाजूटधारिन्।

त्वमेको जगद्व्यापको विश्वरूपः
> प्रसीद प्रसीद प्रभो पूर्णरूप।।4।।

परात्मानमेकं जगद्बीजमाद्यं

> निरीहं निराकारमोंकारवेद्यम्।

यतो जायते पाल्यते येन विश्वं
> तमीशं भजे लीयते यत्र विश्वम्।।5।।

न भूमिर्न चापो न वह्निर्न वायु

> र्न चाकाशमास्ते न तन्द्रा न निद्रा।

न चोष्णं न शीतं न देशो न वेषो
> न यस्यास्ति मूर्तिस्त्रिमूर्तिं तमीडे।।6।।

अजं शाश्वतं कारणं कारणानां

> शिवं केवलं भासकं भासकानाम्।

तुरीयं तमःपारमाद्यन्तहीनं
> प्रपद्ये परं पावनं द्वैतहीनम्।।7।।

नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ते

> नमस्ते नमस्ते चिदानन्दमूर्ते।

नमस्ते नमस्ते तपोयोगगम्य
> नमस्ते नमस्ते श्रुतिज्ञानगम्य।।8।।

प्रभो शूलपाणे विभो विश्वनाथ

> महादेव शंभो महेश त्रिनेत्र।

शिवाकान्त शान्त स्मरारे पुरारे
> त्वदन्यो वरेण्यो न मान्यो न गण्यः।।9।।

शंभो महेश करुणामय शूलपाणे

> गौरीपते पशुपते पशुपाशनाशिन्।

काशीपते करुणया जगदेतदेक
> स्त्वं हंसि पासि विदधासि महेश्वरोऽसि।।10।।

त्वत्तो जगद्भवति देव भव स्मरारे

> त्वय्येव तिष्ठति जगन्मृड विश्वनाथ।

त्वय्येव गच्छति लयं जगदेतदीश
> लिङ्गात्मके हर चराचरविश्वरूपिन्।।11।।
