<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss version="2.0" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom"><channel><title>बटुक उवाच</title><description>दर्शन, वेद, साहित्य, स्तोत्र, इतिहास और वंशावली — विविध विषयों पर प्रमाणिक शोध, वैचारिक विमर्श और साहित्यिक रचनाओं का संकलन</description><link>https://batukuvacha.com/</link><language>hi</language><atom:link href="https://batukuvacha.com/rss.xml" rel="self" type="application/rss+xml"/><image><url>https://batukuvacha.com/logo.png</url><title>बटुक उवाच</title><link>https://batukuvacha.com/</link></image><copyright>© बटुक उवाच — सर्वाधिकार सुरक्षित</copyright><item><title>2. रामराज्यका स्वरूप ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/</guid><description>&apos;रामराज्य&apos; शासन एवं प्रशासनका परम आदर्शस्वरूप है। धर्म एवं ईश्वरभक्ति — ये रामराज्यके प्राण हैं। शासनकी सुव्यवस्था, प्रजाकी सुखमयता और सम्पन्नता, अनुशासन एवं सदाचार — ये रामराज्यरूपी शरीरके अवयव हैं।</description><pubDate>Thu, 24 Jul 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;‘रामराज्य’ शासन एवं प्रशासनका परम आदर्शस्वरूप है। धर्म एवं ईश्वरभक्ति—ये रामराज्यके प्राण हैं। शासनकी सुव्यवस्था, प्रजाकी सुखमयता और सम्पन्नता, अनुशासन एवं सदाचार—ये रामराज्यरूपी शरीरके अवयव हैं।
रामराज्यके स्वरूपका वर्णन वाल्मीकीय रामायण, अध्यात्मरामायण, आनन्दरामायण, पुराणों एवं श्रीरामचरितमानस आदिमें विस्तृत रूपसे उपलब्ध होता है। उसका कुछ अंश यहाँ साररूपमें प्रस्तुत किया जा रहा है—&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;
&lt;h3&gt;(क) अध्यात्मरामायण&lt;/h3&gt;
&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;राघवे शासति भुवं लोकनाथे रमापतौ। &lt;br&gt;
वसुधा सस्यसम्पन्ना फलवन्तश्च भूरुहा:॥ &lt;br&gt;
जना धर्मपरा: सर्वे पतिभक्तिपरा: स्त्रिय:। &lt;br&gt;
नापश्यत् पुत्रमरणं कश्चिद्राजनि राघवे॥ &lt;br&gt;
त्रिलोकीनाथ लक्ष्मीपति भगवान् रामके शासनकालमें पृथिवी धन-धान्यसे पूर्ण और वृक्ष फलादिसे सम्पन्न थे। श्रीरघुनाथजीके राज्यमें समस्त पुरुष धर्मपरायण थे, स्त्रियाँ पति-सेवामें तत्पर रहती थीं और किसीको भी अपने पुत्रका मरण नहीं देखना पड़ता था।&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;
&lt;h3&gt;(ख) आनन्दरामायण&lt;/h3&gt;
&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;रामराज्ये सदानन्द: सर्वानासीज्जनान् भुवि। &lt;br&gt;
नासीत् कुत्रापि कलहश्चौर्यं निन्दाभयं तदा॥ &lt;br&gt;
राज्यमासीदसापत्नं समृद्धबलवाहनम्। &lt;br&gt;
ऋषिभिर्हृष्टपुष्टैश्च रम्यं हाटकभूषणै:॥ &lt;br&gt;
सञ्जुष्टमिष्टापूर्तानां धर्माणां नित्यकर्तृभि:। &lt;br&gt;
सदा सम्पन्नशस्यं च सुचिरं क्षेत्रसङ्कुलम्॥ &lt;br&gt;
सुदेशं सुप्रजं सुस्थं सुतृणं बहुगोधनम्। &lt;br&gt;
देवतायतनानां च राजिभि: परिराजितम्॥ &lt;br&gt;
रामचन्द्रजीके राज्यमें संसारके सब लोगोंको सदा आनन्द रहता था। उस समय न कहीं चोरी होती, न लड़ाई-झगड़ा होता, न कोई किसीकी निन्दा करता और न कोई किसीसे डरता था। राज्य भी उस समय शत्रुओंसे रहित और विविध प्रकारके वाहन तथा सेनासे परिपूर्ण था। रामराज्यमें प्रजाजन हृष्ट-पुष्ट, ज्ञानी और सोने-चाँदीके गहनोंसे लदे रहते थे। इष्ट-आपूर्त आदि धार्मिक कृत्य होते रहते थे और सारे खेत धान्यसे परिपूर्ण रहा करते थे। भाव यह है कि उस समय समस्त देश सुन्दर था, प्रजा अच्छी थी और रहन-सहन उत्तम था। गौओंके चरनेको सुन्दर घास उपजती थी। गोधनकी अधिकता थी। सारा देश देवालयोंसे भरा पड़ा था। &lt;br&gt;
धर्मेण राजा धर्मज्ञ: सीताराम: प्रतापवान्। &lt;br&gt;
चकार राज्यं निर्द्वन्द्वमयोध्यायां सुनिश्चलम्॥ &lt;br&gt;
स धर्मराजवद् राजा धर्माधर्मविवेचक:। &lt;br&gt;
अदण्डॺेऽदण्डयन् रामो दण्डॺांश्च परिदण्डयन्॥ &lt;br&gt;
तताप सूर्य इव स दुर्हृदां हृदि नेत्रयो:। &lt;br&gt;
सोमवत् सुहृदामासीन्मानसेषु स्वकेष्वपि॥ &lt;br&gt;
हृष्टपुष्टा: प्रजा: सर्वा: फलवन्तोऽभवन्नगा:। &lt;br&gt;
आसन् सदा सुकुसुमैर्विनम्रा: सौख्यदा नृणाम्॥ &lt;br&gt;
एकपत्नीव्रता: सर्वे पुमांसस्तस्य मण्डले। &lt;br&gt;
नारीषु काचिन्नैवासीदपतिव्रतधर्मिणी॥ &lt;br&gt;
एवं तद्रामराज्यं हि महामङ्गलसंयुतम्। &lt;br&gt;
आसीदनुपमेयं च श्रवणान्मङ्गलप्रदम्॥ &lt;br&gt;
धर्मका तत्त्व जाननेवाले प्रतापशाली श्रीसीतासहित रामचन्द्रजीने अविचल एवं निर्द्वन्द्वभावसे धर्मपूर्वक राज्य किया। महाराज रामचन्द्रजी धर्मराजकी तरह भलीभाँति धर्म-अधर्मकी विवेचना करके काम करते थे। जो दण्डके योग्य नहीं होता था, उसे दण्ड नहीं देते थे। वे शत्रुओंके हृदय तथा नेत्रोंमें सदा सूर्यकी भाँति तपते थे और स्वजनों एवं मित्रोंके हृदयमें चन्द्रमाकी तरह ठंडक पहुँचाते थे। रामके शासनकालमें अयोध्याकी प्रजा हृष्ट-पुष्ट रहती थी और वृक्ष फल-फूलसे लदे रहनेके कारण झुके रहते तथा वे मनुष्योंको सुखी रखते थे। उनके राज्यमें सभी पुरुष एकपत्नीव्रती थे और स्त्रियोंमें भी कोई ऐसी नहीं थी, जो अपने पातिव्रतधर्मका पालन न करती रही हो। इस प्रकार वह रामका राज्य महामंगलमय, अनुपमेय और नाममात्र सुननेसे ही महामंगलदायक था।&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;
&lt;h3&gt;(ग) स्कन्दपुराण&lt;/h3&gt;
&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;रामराज्ये तदा लोका हर्षनिर्भरमानसा:। &lt;br&gt;
बभूवुर्धनधान्याढॺा: पुत्रपौत्रयुता नरा:॥ &lt;br&gt;
कामवर्षी च पर्जन्य: सस्यानि गुणवन्ति च। &lt;br&gt;
गावस्तु घटदोहिन्य: पादपाश्च सदाफला:॥ &lt;br&gt;
नाधयो व्याधयश्चैव रामराज्ये नराधिप। &lt;br&gt;
नार्य: पतिव्रताश्चासन् पितृभक्तिपरा नरा:॥ &lt;br&gt;
द्विजा &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;परा नित्यं क्षत्रिया द्विजसेविन:। &lt;br&gt;
कुर्वते वैश्यवर्णाश्च भक्तिं द्विजगवां सदा॥ &lt;br&gt;
न योनिसङ्करश्चासीत् तत्र नाचारसङ्कर:। &lt;br&gt;
न वन्ध्या दुर्भगा नारी काकवन्ध्या मृतप्रजा॥ &lt;br&gt;
विधवा नैव काप्यासील्लप्यते न सभर्तृका। &lt;br&gt;
नावज्ञां कुर्वते केऽपि मातापित्रोर्गुरोस्तथा॥ &lt;br&gt;
उस समय श्रीरामके राज्यमें सब लोगोंका मन हर्षोत्फुल्ल रहता था। धन-धान्यसे सब सम्पन्न थे और सभी लोगोंके पुत्र-पौत्र थे। बादल इच्छानुसार जलवर्षा करते थे। अन्न बहुत गुणवान् होता था। गायें पूरा घड़ाभर दूध देती थीं। वृक्ष सभी ऋतुओंमें फले रहते थे। श्रीरामके राज्यमें न किसीको कोई शारीरिक रोग होता था, न मानसिक चिन्ता। स्त्रियाँ पतिव्रता थीं और पुरुष पितृभक्त थे। ब्राह्मण सदा वेदाध्ययनमें तत्पर रहते थे, क्षत्रिय ब्राह्मणसेवी थे; तथा वैश्य सदा गौ-ब्राह्मणोंकी भक्ति करते थे। उस रामराज्यमें वर्णसंकर संतान नहीं उत्पन्न होती थी और न कर्मोंका ही संकर था। कोई स्त्री वन्ध्या, केवल एक संतान उत्पन्न करनेवाली, अभागिनी या जिसकी संतान होते ही मर जाय, ऐसी नहीं थी। कोई स्त्री विधवा नहीं थी। सधवा स्त्रीको कभी विलाप नहीं करना पड़ता था। कोई भी उस समय माता, पिता एवं गुरुजनोंका अनादर नहीं करता था। &lt;br&gt;
न च वाक्यं हि वृद्धानामुल्लङ्घयति पुण्यकृत्। &lt;br&gt;
न भूमिहरणं तत्र परनारीपराङ्मुखा:॥ &lt;br&gt;
नापवादपरो लोको न दरिद्रो न रोगवान्। &lt;br&gt;
न स्तेयो द्यूतकारी च मैरेयी पापिनो न हि॥ &lt;br&gt;
न हेमहारी ब्रह्मघ्नो न चैव गुरुतल्पग:। &lt;br&gt;
न स्त्रीघ्नो न च बालघ्नो न चैवानृतभाषण:॥ &lt;br&gt;
न वृत्तिलोपकश्चासीत् कूटसाक्षी न चैव हि। &lt;br&gt;
न शठो न कृतघ्नश्च मलिनो नैव दृश्यते॥ &lt;br&gt;
सदा सर्वत्र पूज्यन्ते ब्राह्मणा वेदपारगा:। &lt;br&gt;
नावैष्णवोऽव्रती राजन् रामराज्येऽतिविश्रुते॥ &lt;br&gt;
कोई भी वृद्धों (अपनेसे बड़ों)-की बातका उल्लंघन नहीं करता था। सब पुण्यकर्मा थे। कोई किसीकी भूमि नहीं छीनता था। सभी पर-स्त्रीसे विमुख रहते थे। [रामराज्यमें] लोग किसीकी निन्दा नहीं करते थे। न कोई दरिद्र था, न रोगी। कोई चोर नहीं था, जुआरी कोई नहीं था, कोई शराबी नहीं था। कोई भी पापी नहीं था। [स्वर्णकारों तथा अन्योंमें] कोई स्वर्णचोर नहीं था, ब्रह्महत्यारा कोई नहीं था, गुरुकी पत्नीसे कोई कदाचार नहीं करता था। न कोई स्त्रीहन्ता था, न बाल-हत्यारा और न कोई झूठ बोलनेवाला था। कोई किसीकी जीविकाका नाश नहीं करता था। कोई झूठी गवाही नहीं देता था। कोई दुष्ट, कृतघ्न या मलिन रामराज्यमें दिखता ही नहीं था। उस अत्यन्त प्रसिद्ध रामराज्यमें वेदोंके पारंगत ब्राह्मण सर्वदा सर्वत्र पूजे जाते थे। पूरे राज्यमें कोई ऐसा नहीं था, जो भगवद्भक्त न हो अथवा व्रत (संयम-नियम)-का पालन न करता हो।&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;
&lt;h3&gt;(घ) श्रीरामचरितमानस&lt;/h3&gt;
&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;राम राज बैठें त्रैलोका। &lt;br&gt;
हरषित भए गए सब सोका॥ &lt;br&gt;
बयरु न कर काहू सन कोई। &lt;br&gt;
राम प्रताप बिषमता खोई॥ &lt;br&gt;
श्रीरामचन्द्रजीके राज्यपर प्रतिष्ठित होनेपर तीनों लोक हर्षित हो गये, उनके सारे शोक जाते रहे। कोई किसीसे वैर नहीं करता। श्रीरामचन्द्रजीके प्रतापसे सबकी विषमता (आन्तरिक भेदभाव) मिट गयी। &lt;br&gt;
बरनाश्रम निज निज धरम निरत बेद पथ लोग। &lt;br&gt;
चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग॥ &lt;br&gt;
सब लोग अपने-अपने वर्ण और आश्रमके अनुकूल धर्ममें तत्पर हुए सदा वेद-मार्गपर चलते हैं और सुख पाते हैं। उन्हें न किसी बातका भय है, न शोक है और न कोई रोग ही सताता है। &lt;br&gt;
दैहिक दैविक भौतिक तापा। &lt;br&gt;
राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥ &lt;br&gt;
सब नर करहिं परस्पर प्रीती। &lt;br&gt;
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥ &lt;br&gt;
चारिउ चरन धर्म जग माहीं। &lt;br&gt;
पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं॥ &lt;br&gt;
राम भगति रत नर अरु नारी। &lt;br&gt;
सकल परम गति के अधिकारी॥ &lt;br&gt;
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा। &lt;br&gt;
सब सुंदर सब बिरुज सरीरा॥ &lt;br&gt;
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। &lt;br&gt;
नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना॥ &lt;br&gt;
सब निर्दंभ धर्मरत पुनी। &lt;br&gt;
नर अरु नारि चतुर सब गुनी॥ &lt;br&gt;
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी। &lt;br&gt;
सब कृतग्य नहिं कपट सयानी॥ &lt;br&gt;
‘रामराज्य’ में दैहिक, दैविक और भौतिक ताप किसीको नहीं व्यापते। सब मनुष्य परस्पर प्रेम करते हैं और वेदोंमें बतायी हुई नीति (मर्यादा)-में तत्पर रहकर अपने-अपने धर्मका पालन करते हैं। धर्म अपने चारों चरणों (सत्य, शौच, दया और दान)-से जगत‍्में परिपूर्ण हो रहा है; स्वप्नमें भी कहीं पाप नहीं है। पुरुष और स्त्री सभी रामभक्तिके परायण हैं और सभी परमगति (मोक्ष)-के अधिकारी हैं। छोटी अवस्थामें मृत्यु नहीं होती, न किसीको कोई पीड़ा होती है। सभीके शरीर सुन्दर और नीरोग हैं। न कोई दरिद्र है, न दुखी है और न दीन ही है। न कोई मूर्ख है और न शुभ लक्षणोंसे हीन ही है। सभी दम्भरहित हैं, धर्मपरायण हैं और पुण्यात्मा हैं। पुरुष और स्त्री सभी चतुर और गुणवान् हैं। सभी गुणोंका आदर करनेवाले और पण्डित हैं तथा सभी ज्ञानी हैं। सभी कृतज्ञ (दूसरेके किये हुए उपकारको माननेवाले) हैं, कपट-चतुराई (धूर्तता) किसीमें नहीं है। &lt;br&gt;
सब उदार सब पर उपकारी। &lt;br&gt;
बिप्र चरन सेवक नर नारी॥ &lt;br&gt;
एकनारि ब्रत रत सब झारी। &lt;br&gt;
ते मन बच क्रम पति हितकारी॥ &lt;br&gt;
सभी नर-नारी उदार हैं, सभी परोपकारी हैं और सभी ब्राह्मणोंके चरणोंके सेवक हैं। सभी पुरुषमात्र एकपत्नीव्रती हैं। इसी प्रकार स्त्रियाँ भी मन, वचन और कर्मसे पतिका हित करनेवाली हैं। &lt;br&gt;
हरषित रहहिं नगर के लोगा। &lt;br&gt;
करहिं सकल सुर दुर्लभ भोगा॥ &lt;br&gt;
अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीं। &lt;br&gt;
श्रीरघुबीर चरन रति चहहीं॥ &lt;br&gt;
नगरके लोग हर्षित रहते हैं और सब प्रकारके देवदुर्लभ (देवताओंको भी कठिनतासे प्राप्त होनेयोग्य) भोग भोगते हैं। वे दिन-रात ब्रह्माजीको मनाते रहते हैं और [उनसे] श्रीरघुवीरके चरणोंमें प्रीति चाहते हैं। &lt;br&gt;
सबकें गृह गृह होहिं पुराना। &lt;br&gt;
राम चरित पावन बिधि नाना॥ &lt;br&gt;
नर अरु नारि राम गुन गानहिं। &lt;br&gt;
करहिं दिवस निसि जात न जानहिं॥ &lt;br&gt;
सबके यहाँ घर-घरमें पुराणों और अनेक प्रकारके पवित्र रामचरित्रोंकी कथा होती है। पुरुष और स्त्री सभी श्रीरामचन्द्रजीका गुणगान करते हैं और इस आनन्दमें दिन-रातका बीतना भी नहीं जान पाते। &lt;br&gt;
अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज। &lt;br&gt;
सहस सेष नहिं कहि सकहिं जहँ नृप राम बिराज॥ &lt;br&gt;
जहाँ भगवान् श्रीरामचन्द्रजी स्वयं राजा होकर विराजमान हैं, उस अवधपुरीके निवासियोंके सुख-सम्पत्तिके समुदायका वर्णन हजारों शेषजी भी नहीं कर सकते।&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;
&lt;p&gt;श्रोत: &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt; और रामराज्य, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट
निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अरस्तू</category><category>धर्मसम्राट</category><category>पाश्चात्य-2</category><category>मार्क्सवाद</category><category>यूनान-2</category><category>राजनीति-2</category><category>राज्य-2</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>1. भगवान् श्रीरामके द्वारा उपदिष्ट राजनीति ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/</guid><description>शुक्राचार्यजी अपने &apos;नीतिसार&apos; में लिखते हैं कि श्रीरामके समान नीतिमान् राजा पृथ्वीपर न कोई हुआ और न कभी होना सम्भव ही है — &apos;न रामसदृशो राजा पृथिव्यां नीतिमानभूत्।&apos; (शुक्र० ५।५७), श्रीराम लक्ष्मणजीसे कहते हैं...</description><pubDate>Wed, 23 Jul 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;p&gt;शुक्राचार्यजी अपने ‘नीतिसार’ में लिखते हैं कि श्रीरामके समान नीतिमान् राजा पृथ्वीपर न कोई हुआ और न कभी होना सम्भव ही है—
‘न रामसदृशो राजा पृथिव्यां नीतिमानभूत्।’&lt;/p&gt;
&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;(शुक्र० ५।५७)
\[श्रीराम लक्ष्मणजीसे कहते हैं—\]
न हि स्वसुखमन्विच्छन् पीडयेत् कृपणं जनम्। &lt;br&gt;
कृपण: पीडॺमानो हि मन्युना हन्ति पार्थिवम्॥ &lt;br&gt;
राजाको चाहिये कि वह अपने लिये सुखकी इच्छा रखकर दीन-दु:खी लोगोंको पीड़ा न दे; क्योंकि सताया जानेवाला मनुष्य दु:खजनित क्रोधके द्वारा अत्याचारी राजाका विनाश कर डालता है। &lt;br&gt;
अहिंसा सूनृता वाणी सत्यं शौचं दया क्षमा। &lt;br&gt;
वर्णिनां लिङ्गिनां चैव सामान्यो धर्म उच्यते॥ &lt;br&gt;
प्रजा: समनुगृह्णीयात् कुर्यादाचारसंस्थितिम्। &lt;br&gt;
वाक्सूनृता दया दानं दीनोपगतरक्षणम्॥ &lt;br&gt;
इति सङ्ग: सतां साधु हितं सत्पुरुषव्रतम्। &lt;br&gt;
आधिव्याधिपरीताय अद्य श्वो वा विनाशिने॥ &lt;br&gt;
को हि राजा शरीराय धर्मापेतं समाचरेत्।
किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना—कष्ट न पहुँचाना, मधुर वचन बोलना, सत्यभाषण करना, बाहर और भीतरसे पवित्र रहना एवं शौचाचारका पालन करना, दीनोंके प्रति दयाभाव रखना तथा क्षमा (निन्दा आदिको सह लेना)—ये चारों वर्णों तथा आश्रमोंके सामान्य धर्म कहे गये हैं। राजाको चाहिये कि वह प्रजापर अनुग्रह करे और सदाचारके पालनमें संलग्न रहे। मधुर वाणी, दीनोंपर दया, देश-कालकी अपेक्षासे सत्पात्रको दान, दीनों और शरणागतोंकी रक्षा तथा सत्पुरुषोंका संग—ये सत्पुरुषोंके आचार हैं। यह आचार प्रजा-संग्रहका उपाय है, जो लोकमें प्रशंसित होनेके कारण श्रेष्ठ है तथा भविष्यमें भी अभ्युदयरूप फल देनेवाला होनेके कारण हितकारक है। यह शरीर मानसिक चिन्ताओं तथा रोगोंसे घिरा हुआ है, आज या कल इसका विनाश निश्चित है। ऐसी दशामें इसके लिये कौन राजा धर्मके विपरीत आचरण करेगा?’&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;
&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;शुचिरास्तिक्यपूतात्मा पूजयेद्देवता: सदा। &lt;br&gt;
देवतावद् गुरुजनमात्मवच्च सुहृज्जनम्॥
‘बाहर और भीतरसे शुद्ध रहकर राजा आस्तिकता (ईश्वर तथा परलोकपर विश्वास)-द्वारा अन्त:करणको पवित्र बनाये और सदा देवताओंका पूजन करे। गुरुजनोंका देवताओंके समान ही सम्मान करे तथा सुहृदोंको अपने तुल्य मानकर उनका भलीभाँति सत्कार करे।’&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;
&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;अनिन्दा परकृत्येषु स्वधर्मपरिपालनम्। &lt;br&gt;
कृपणेषु दयालुत्वं सर्वत्र मधुरा गिर:॥ &lt;br&gt;
प्राणैरप्युपकारित्वं मित्रायाव्यभिचारिणे। &lt;br&gt;
गृहागते परिष्वङ्ग: शक्त्या दानं सहिष्णुता॥ &lt;br&gt;
स्वसमृद्धिष्वनुत्सेक: परवृद्धिष्वमत्सर:। &lt;br&gt;
नान्योपतापि वचनं मौनव्रतचरिष्णुता॥ &lt;br&gt;
बन्धुभिर्बद्धसंयोग: सुजने चतुरश्रता। &lt;br&gt;
तच्चित्तानुविधायित्वमिति वृत्तं महात्मनाम्॥
‘दूसरे लोगोंके कृत्योंकी निन्दा या आलोचना न करना, अपने वर्ण तथा आश्रमके अनुरूप धर्मका निरन्तर पालन, दीनोंके प्रति दया, सभी लोकव्यवहारोंमें सबके प्रति मीठे वचन बोलना, प्राण देकर भी अपने अनन्य मित्रका उपकार करनेके लिये उद्यत रहना, घरपर आये हुए मित्र या अन्य सज्जनोंको भी हृदयसे लगाना—उनके प्रति अत्यन्त स्नेह एवं आदर प्रकट करना, आवश्यकता हो तो उनके लिये यथाशक्ति धन देना, लोगोंके कटु व्यवहार एवं कठोर वचनको भी सहन करना, अपनी समृद्धिके अवसरोंपर निर्विकार रहना (हर्ष या दर्पके वशीभूत न होना), दूसरोंके अभ्युदयपर मनमें ईर्ष्या या जलन न होना, दूसरोंको ताप देनेवाली बात न बोलना, मौनव्रतका आचरण (अधिक वाचाल न होना), बन्धुजनोंके साथ अटूट सम्बन्ध बनाये रखना, सज्जनोंके प्रति चतुरश्रता (अवक्र—सरलभावमें उनका समाराधन), उनकी हार्दिक सम्मतिके अनुसार कार्य करना—ये महात्माओंके आचार हैं।’&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;
&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;आजीव्य: सर्वसत्त्वानां राजा पर्जन्यवद्भवेत्। &lt;br&gt;
आयद्वारेषु सर्वेषु कुर्यादाप्तान् परीक्षितान्। &lt;br&gt;
आददीत धनं तैस्तु भास्वानुस्रैरिवोदकम्॥
‘राजा मेघकी भाँति समस्त प्राणियोंको आजीविका प्रदान करनेवाला हो। उसके यहाँ आयके जितने द्वार (साधन) हों, उन सबपर वह विश्वस्त एवं परीक्षित किये गये लोगोंको नियुक्त करे। जैसे सूर्य अपनी किरणोंद्वारा पृथ्वीसे जल लेता है, उसी प्रकार राजा उन आयुक्त पुरुषोंद्वारा धन ग्रहण करे।’&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;
&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;साम दानं च भेदश्च दण्डोपेक्षेन्द्रजालकम्। &lt;br&gt;
मायोपाया: सप्त परे निक्षिपेत् साधनाय तान्॥
‘साम, दान, दण्ड, भेद, उपेक्षा, इन्द्रजाल और माया—ये सात उपाय हैं; इनका शत्रुके प्रति प्रयोग करना चाहिये। इन उपायोंसे शत्रु वशीभूत हो जाता है।’ [अग्निपुराण]&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;
&lt;p&gt;श्रोत: &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt; और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट
नि&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;न : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अर्थशास्त्र</category><category>उपसंहार</category><category>दर्शन-2</category><category>धर्मसम्राट</category><category>पाश्चात्य-2</category><category>मार्क्सवाद</category><category>राजनीति-2</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>14.4 सत्पुरुषोंसे एक निवेदन ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/14-4-stpurussonse-ek-nivedn-m/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/14-4-stpurussonse-ek-nivedn-m/</guid><description>14.4 सत्पुरुषोंसे एक निवेदन कुछ लोग कहते हैं कि उपासना या ज्ञान तो मनकी चीज है। सब कुछ गड़बड़ होनेपर भी महात्मा या विद्वान‍्को इन टंटोंसे दूर रहकर भजन ही करना चाहिये। ठीक है, परंतु शास्त्र एवं धर्…</description><pubDate>Tue, 22 Jul 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;14.4 सत्पुरुषोंसे एक नि&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;न&lt;/h3&gt;
&lt;p&gt;कुछ लोग कहते हैं कि उपासना या ज्ञान तो मनकी चीज है। सब कुछ गड़बड़ होनेपर भी महात्मा या विद्वान‍्को इन टंटोंसे दूर रहकर भजन ही करना चाहिये। ठीक है, परंतु शास्त्र एवं धर्म-स्थान नष्ट हो जानेपर विद्वानों या महात्माओंका शण्डामर्कके तुल्य सरकारीकरण हो जानेपर भजन करनेका, धार्मिक होनेका मन भी कैसे बन सकेगा? आखिर धार्मिक, आध्यात्मिक भावनाओंसे ओतप्रोत मन भी तो शास्त्रों एवं सत्पुरुषोंकी कृपासे ही बनता है, बिना शास्त्रादिके वैसा मन भी नहीं बन सकता है। यदि प्रह्लादने भी यही सोचा होता कि चलो पितासे विवाद कौन करे? मनमें ही रामनाम जपते रहेंगे, ऊपरसे पिताकी ही बात मान लें तो आज कोई राम-नाम लेनेवाला रह सकता था? परंतु जब सच्चाईके साथ प्रह्लादने अपने जीवनको संकटमें डालकर भी सिद्धान्तकी रक्षा की, तभी संसारमें सिद्धान्तकी स्थिरता रह सकी है। इस तरह विद्वान् एवं महात्मा राजतन्त्र शासनमें भी राजनीतिमें हस्तक्षेप करते थे, फिर अब तो जनतन्त्र-शासन है। इस सिद्धान्तके अनुसार तो शासनकी सर्वोच्च सत्ता जनतामें ही निहित होती है। अत: वास्तविक राजा जनता ही होती है, अत: राजनीतिक दक्षता सम्पादन करना प्रत्येक व्यक्तिका परम कर्तव्य है, फिर तो जनताके धन एवं धर्मकी रक्षाका उत्तरदायित्व जनतापर ही होता है। इसलिये जनताके प्रत्येक व्यक्तिका कर्तव्य होता है कि वह उदारता, गम्भीरता और दक्षताके साथ राष्ट्र एवं धर्मका हिताहित देखकर कर्तव्यका निर्धारण एवं पालन करे। जहाँ न राजतन्त्र हो, न जनतन्त्र हो; किंतु अधिनायकतन्त्र डिक्टेटरशिप हो, वहाँपर तो विशिष्ट दक्ष राजनीतिज्ञ विद्वानों एवं महात्माओंके सिवा दूसरा कोई कुछ कर ही नहीं सकता है। जनताका संग्रह, उसे प्रोत्साहन देना एवं क्रान्तिके लिये उसे तैयार करना भी राजनीतिज्ञोंके ही वशकी बात है। ऐसे समयमें धर्म एवं धर्मशास्त्रोंकी रक्षाके लिये विद्वानोंको सामने आना पड़ता है। इसी अभिप्रायसे कहा गया है— स्थापयध्वमिमं मार्गं प्रयत्नेनापि हे द्विजा:। स्थापिते वैदिके मार्गे सकलं सुस्थिरं भवेत्॥ (सूतसंहिता, ज्ञानयोगखं० २०।५४) विद्वानोंको वैदिक-धर्मकी स्थापनाके लिये सुदृढ़ प्रयत्न करना चाहिये। वैदिक-धर्मके स्थिर होनेपर सब कुछ स्थिर हो जायगा। यहीं यह भी कहा गया है कि ‘जो समर्थ होनेपर भी सर्वप्रकारसे धर्मरक्षार्थ प्रयत्नशील नहीं होता, वह पापका भागी होता है। माता-पिताके, गुरुजनोंके या जनसमूहके धन-धर्म एवं प्राणोंका विनाश हो रहा हो, कोई समर्थ पुरुष बैठे-बैठे तमाशा देखे, कुछ प्रयत्न न करे, यह प्रत्यक्ष ही पाप है— यश्च स्थापयितुं शक्तो नैव कुर्याद् विमोहित:। तस्य हन्ता न पापीयानिति वेदान्तनिर्णय:॥ (सूतसंहिता २।२०।५५) किंतु जो समर्थ न होनेपर भी यथाशक्ति धर्मशास्त्र-मर्यादाकी रक्षाके लिये प्रयत्न करता है, वह उसी पुण्यके प्रभावसे सब पापोंसे मुक्त होकर सम्यक् ज्ञानका भागी होता है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि यम कहे जाते हैं। यह निवृत्तिमार्गानुसारियोंके लिये बड़े ही महत्त्वके हैं। शौच, सन्तोष, स्वाध्याय आदिमें कुछ गड़बड़ी क्षम्य भी हो सकती है, परंतु यमके सेवनमें तो पूर्ण तत्परता होनी चाहिये। इसीलिये कहा गया है—‘यमान् सेवेत सततं नियमान् मत्पर: क्वचित्’ (श्रीमद्भा०) यमोंका सेवन सर्वदा ही करना चाहिये। नियमोंमें सातत्य न होनेपर भी काम चल सकता है। अहिंसा आदिका अभिप्राय है—मनसा-वाचा-कर्मणा प्राणिरक्षण करना, प्राणियोंको पीड़ा न पहुँचाना। यही लोकरक्षण, प्राणिरक्षण, धर्मरक्षण राजनीतिका मुख्य लक्ष्य है, यही क्षत-त्राण है। इसी कारण महात्माओंकी इन कार्योंमें प्रवृत्ति होती थी। कालकवृक्षीय-जैसे अरण्यवासी, चाणक्य-जैसे बालब्रह्मचारी, समर्थ स्वामी-जैसे निवृत्तिनिष्ठ लोग भी इस काममें संलग्न हुए। फिर भले ही इस काममें सफलता मिले अथवा न मिले, समुचित प्रयत्न कभी निष्फल नहीं होता। उसका अदृष्ट फल तो अवश्य ही प्राप्त हो जाता है, तभी तो भगवान् कृष्णने कहा था— य: स्थापयितुमुद्युक्त: श्रद्धयैवाक्षमोऽपि सन्। सर्वपापविनिर्मुक्त: सम्यग् ज्ञानमवाप्नुयात्॥ धर्मकार्यं यतञ्छक्त्या नो चेत् प्राप्नोति मानव:। प्राप्तो भवति तत् पुण्यमत्र मे नास्ति संशय:॥ (महा० उद्यो० ९३।६) इन सब बातोंसे स्पष्ट हो जाता है कि वर्तमान दुरवसरपर जबकि जनताके धन-धर्मपर संकट उपस्थित है, विशिष्ट विद्वानों, महात्माओं तथा धार्मिक सद्-गृहस्थोंको भी राजनीतिसे न डरकर आगे आना चाहिये और धर्म-रक्षणके लिये जो भी आवश्यक कार्य हो करना चाहिये। परिणाम निश्चयेन शुभ-मंगलमय ही होगा। &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/shivbhujngm/&quot;&gt;शिव&lt;/a&gt;मिति दिक्। परिशिष्ट&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt; और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>धर्मसम्राट</category><category>निवेदन</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>सत्पुरुष</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>14.3 राजनीतिमें किसका अधिकार? ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/14-3-raajniitimen-kiskaa-adhikaar/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/14-3-raajniitimen-kiskaa-adhikaar/</guid><description>14.3 राजनीतिमें किसका अधिकार? कई लोग कहते हैं कि विद्वानों, महात्माओंको राजनीतिमें नहीं पड़ना चाहिये, परंतु राजनीतिका विद्वान् होना चाहिये। वे समारोहके साथ सिद्ध करनेकी चेष्टा करते हैं कि राजनीतिक…</description><pubDate>Mon, 21 Jul 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;14.3 राजनीतिमें किसका अधिकार?&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;कई लोग कहते हैं कि विद्वानों, महात्माओंको राजनीतिमें नहीं पड़ना चाहिये, परंतु राजनीतिका विद्वान् होना चाहिये। वे समारोहके साथ सिद्ध करनेकी चेष्टा करते हैं कि राजनीतिका विद्वान् होना ही विद्वान‍्का अन्तिम कृत्य है, पर प्रत्यक्ष राजनीतिमें भाग लेना नहीं। वे समर्थ रामदास और चाणक्यकी प्रशंसा करते हुए भी उनके कर्तृत्वको दुर्लक्ष्य करते हैं। वे लोग ‘मज्जेत् त्रयी दण्डनीतौ हतायाम्’ (म० शां० ६३।२८) का भी यही अर्थ करते हैं कि ‘राजनीतिके जाने बिना त्रयी डूब जाती है।’ पर ‘दण्डनीति’ का ‘दण्डनीतिज्ञान’ अर्थ करना असंगत है। वे इस बातपर ध्यान नहीं देते कि ब्रह्मज्ञानसे भिन्न सभी ज्ञान परांग ही होते हैं, स्वतन्त्र नहीं। भट्टपादकुमारिलका स्पष्ट कहना है कि ‘सर्वत्रैव हि विज्ञानं संस्कारत्वेन गम्यते। पराङ्गं चात्मविज्ञानादन्यमित्यवधार्यताम्॥’ (तन्त्रवार्तिक) पीछे कहा गया है कि सक्रिय विद्वानोंसे ही राजाको आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता एवं दण्डनीतिका विचार करना चाहिये— ‘तद्विद्यैस्तत्क्रियोपेतैश्चिन्तयेत्।’ (का० नी० २।१) ब्रह्मात्मविज्ञान तो स्वसत्तामात्रसे अविद्या, तत्कार्यका निवर्तक होनेसे पुरुषार्थरूप है। ऐसे कतिपय स्थलोंको छोड़कर अन्यत्र सर्वत्र ही ज्ञान कर्तृत्वके बिना सफल नहीं होता। ‘जानाति इच्छति अथ करोति’ यह क्रम प्रसिद्ध है। जाननेसे इच्छा होती है, इच्छासे क्रिया होती है। ‘य: क्रियावान् स पण्डित:’ (सुभा० मं०) की कहावत प्रसिद्ध ही है। प्रयोगहीन शिल्पविज्ञान एवं शस्त्रादि-विज्ञानके तुल्य प्रयोगहीन राजनीति-विज्ञान भी व्यर्थ ही रहता है। क्रियाहीन तर्क-वितर्क एवं ज्ञान-विज्ञान, बुद्धि-व्यवसायमात्र ही रह जाता है। रावणके समयमें ज्ञान-विज्ञानवाले ऋषियोंकी कमी न थी। फिर ऋषियोंका वध चालू था। रक्तघटका उपहार देनेपर भी रावणको सन्तोष नहीं हुआ था। ऋषियोंकी अस्थियोंका पहाड़ लग गया था। अस्थि समूह देखि रघुराया। पूछी मुनिन्ह लागि अति दाया॥ निसिचर निकर सकल मुनि खाए। सुनि रघुबीर नयन जल छाए॥ (रा०च०मा० ३।९।६, ८) उस समय विश्वामित्रकी सक्रिय राजनीति ही सफल हुई। उसीके द्वारा राम मैदानमें आये और दुष्टोंका दर्प-दलन करके त्रयी-धर्मकी रक्षा एवं साधु-सत्पुरुषोंका पोषण किया। हाँ, जहाँ राजनीतिके योग्य प्रयोक्ता एवं प्रयोग-साधन ठीक उपलब्ध हों, वहाँ विद्वान् केवल उपदेशमात्र कर सकता है; परंतु जहाँ प्रयोक्ता, प्रयोग-साधन नहीं, वहाँ उनका अन्वेषण एवं निर्माण भी विद्वान‍्का ही काम है। राजाके अभावमें यह सब उत्तरदायित्व विद्वान‍्पर ही आता है। ‘चाणक्य’ ने यही सब किया था, समर्थ रामदासने भी यही किया। शुक्र, बृहस्पति आदि भी अनेक ढंगसे सक्रिय राजनीतिका प्रवर्तन करते थे। हाँ, विद्वान् राज्याधिकारके प्रलोभनमें न पड़े, यह अवश्य ठीक है। अत: ठीक राजनीति बिना त्रयी एवं तत्प्रोक्त धर्म संकटग्रस्त हो जाता है। प्रजापतिर्हि वैश्याय सृष्ट्वा परिददे पशून्। ब्राह्मणाय च राज्ञे च सर्वा: परिददे प्रजा:॥ (मनु० स्मृ० ९।३२७) प्रजापतिने सृष्टि रचकर वैश्योंको पशु दिया, ब्राह्मण एवं राजाको सारी प्रजा दी। अत: राजाके अभावमें विद्वानोंपर सर्वाधिक भार आता है। विद्वान् आस्तिक, सद‍्गृहस्थ एवं साधु-सत्पुरुषोंके बिना राजनीति सर्वथा उच्छृंखल लोगोंके हाथमें चली जाती है, फिर तो गुंडागर्दीका ही शासन होने लगता है। अत: धार्मिक लोगोंके प्रवेशसे ही समस्या हल हो सकती है। यह ठीक है कि ‘सच्छिक्षा एवं सद्विद्याके प्रचारसे सद‍्बुद्धि होती है, सद‍्बुद्धिसे सदिच्छा एवं सदिच्छासे सत्प्रयत्न होता है और सत्प्रयत्न ही सब प्रकारके सत्फलोंका स्रोत होता है। परंतु आज तो शिक्षा भी स्वतन्त्र विद्वानोंके हाथमें नहीं है। जिस विचारके शासक हैं, उसी विचारका समर्थन करनेवाली आजकी शिक्षा बनती जा रही है। स्वतन्त्र विद्वान्, स्वतन्त्र विद्यालय एवं उनके छात्र भी सरकारी-शिक्षाके प्रभावसे स्पष्ट ही प्रभावित हैं। कथावाचक, मण्डलेश्वर आदि भी उसी ढंगकी कथा कहनेमें लाभका अनुभव करते हैं। घोर नास्तिक उच्छृंखल मिनिस्टरों, सरकारी पदाधिकारियोंकी भी विद्वान्, महन्त, मण्डलेश्वर प्रशंसा करते फिरते हैं। इस दृष्टिसे नास्तिकोंके हाथसे राजनीतिका उद्धार करने योग्य, धार्मिक, सुशील लोगोंके हाथमें राजनीति लानेके लिये विद्वान‍्का प्रयत्न अत्यावश्यक है ही। महाभारतका स्पष्ट वचन है— क्षात्रो धर्मो ह्यादिदेवात् प्रवृत्त: पश्चादन्ये शेषभूताश्च धर्मा:॥ (महा० शां० ६४।२१) परमेश्वरसे सर्वप्रथम राजधर्मका ही आविर्भाव हुआ। उसके पीछे राजधर्मके अंगभूत अन्य धर्मोंका प्रादुर्भाव हुआ। अत: राजधर्म—राजनीतिके नष्ट होनेपर त्रयीधर्मके डूब जानेकी बात आती है। अराजकता या उच्छृंखल राजाके धर्महीन अधार्मिक राज्यमें कोई धर्म पनप ही नहीं सकता। व्यक्ति, समाज, राष्ट्र तथा विश्वके लौकिक-पारलौकिक अभ्युदय एवं नि:श्रेयसके सम्पादनमें होनेवाले सब प्रकारके विघ्नोंको रोककर सब प्रकारकी सुविधा उपस्थित करना भारतीय राजधर्म, राजनीति या क्षात्र-धर्मका मूलमन्त्र है। भले ही कभी राजनीति राजाओं, राजमन्त्रियों एवं राजकीय पुरुषोंतक ही सीमित रहे, उसमें सर्वसाधारणका प्रवेश आवश्यक भी न ठहरे, तब भी विशिष्ट विद्वानोंके लिये तो कभी भी राजनीति उपेक्ष्य नहीं रही है। व्यक्ति, समाज, राष्ट्र तथा विश्वको लौकिक-पारलौकिक-विनाशसे बचाना, उनको अभ्युदय, नि:श्रेयस-प्राप्तिसे वंचित होनेसे बचाना क्षात्र या राजाका धर्म है। वही क्षात्रधर्म है, वही राजनीति है। इसीलिये राजाकी प्रशंसा है— ‘नराणां च नराधिपम्’ (गी० १०।२७) ‘नाविष्णु: पृथिवीपति:।’ (दे० भा०) ‘महती देवता ह्येषा नररूपेण तिष्ठति।’ (मनु० ७।८) ‘राजा ईश्वररूप है, नरोंमें नराधिप ईश्वरीय विभूति है, विष्णुसे अतिरिक्त पृथ्वीपति नहीं हो सकता, वह कोई मनुष्यरूपमें विशेष दिव्य शक्ति है इत्यादि।’ इस प्रकारके राजधर्मका पालन श्रुताध्ययनसम्पन्न धर्मज्ञ, सत्यवादी, रागद्वेषविहीन विद्वानोंकी सहायता बिना राजा भी नहीं कर सकता। इसीलिये राजाके लिये आवश्यक है कि वह ऐसे विद्वानोंको अपना सभासद् बनाये— श्रुताध्ययनसम्पन्ना धर्मज्ञा: सत्यवादिन:। राज्ञा सभासद: कार्या रिपौ मित्रे च ये समा:॥ (याज्ञवल्क्यस्मृति २।२) शासनारूढ शासककी भूल प्रमादको रोकनेके लिये परम निरपेक्ष विरक्त विद्वान् भी लोककल्याण-कामनासे राजनीतिमें हस्तक्षेप करते थे। इतना ही नहीं, कभी-कभी तो वेन-जैसे अन्यायी राजाको, जो समझाने-बुझानेसे भी न माने, शासनाधिकारसे च्युत या नष्ट भी कर देते थे एवं उनके स्थानमें पृथु-जैसे योग्य शासकको प्रतिष्ठित करते थे। यह भी लोक-कल्याणार्थ विद्वानोंके राजनीतिमें हस्तक्षेपका उदाहरण है। ‘इतिहास’ बतलाता है कि संसारके प्रमुख राजनीतिज्ञ शासकोंने अपनी राजनीतिकी बागडोर तप:पूत, लोक-हितैषी, राग-द्वेषविहीन ऋषियोंके ही हाथमें दे रखी थी। देवराज इन्द्रकी राजनीति देवगुरु बृहस्पतिके हाथमें थी, दैत्यराज बलिकी राजनीति महर्षि शुक्राचार्यके हाथमें थी तथा रामचन्द्रकी राजनीति वसिष्ठके हाथमें थी। धर्मराज युधिष्ठिरकी राजनीति धौम्य, व्यास, कृष्ण, विदुर आदिके हाथमें थी। चन्द्रगुप्तकी राजनीति महर्षि चाणक्यके हाथमें थी तथा &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/shivbhujngm/&quot;&gt;शिव&lt;/a&gt;ाकी राजनीति भी समर्थ रामदासके हाथमें थी। वस्तुत: जैसे बिना अंकुशके हस्ती, बिना लगामके घोड़ा आदि हानिकारक होते हैं, वैसे ही अंकुश एवं नियन्त्रणके बिना शासन भी हानिकारक होता है। राज्यश्रीसम्पन्न राजापर भी अंकुश होना ही चाहिये। इसी अर्थमें राजापर धर्मका नियन्त्रण होना चाहिये। यही बृहदारण्यक ‘क्षत्रस्य क्षत्रम्’ (१।४।१४) के अनुसार धर्मनियन्त्रित राजतन्त्रका सिद्धान्त है। धर्म-कर्म, संस्कृति, धर्मसंस्थाकी रक्षा तभी हो सकती है, जब धर्म-नियन्त्रित शासक हो। अन्यथा उच्छृंखल शासक सबको ही चौपट कर देता है।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt; और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट नि&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;न : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अरस्तूराजनीति</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>एकसत्तावाद</category><category>धर्मसम्राट</category><category>नैसर्गिक-अधिकार</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>14.2 शास्त्रीय शासनविधान ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/14-2-shaastriiy-shaasnvidhaan-maar/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/14-2-shaastriiy-shaasnvidhaan-maar/</guid><description>14.2 शास्त्रीय शासनविधान सभी प्राणी अमृतस्वरूप परमेश्वरके ही पुत्र हैं—‘अमृतस्य पुत्रा:’ (श्वेता० उ० २।५) अर्थात् सभी देहादिभिन्न चेतन, अमल, सहज, सुखस्वरूप जीवात्मा स्वप्रकाश सच्चिदानन्द परमेश्वरक…</description><pubDate>Sun, 20 Jul 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;14.2 शास्त्रीय शासनविधान&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;सभी प्राणी अमृतस्वरूप परमेश्वरके ही पुत्र हैं—‘अमृतस्य पुत्रा:’ (श्वेता० उ० २।५) अर्थात् सभी देहादिभिन्न चेतन, अमल, सहज, सुखस्वरूप जीवात्मा स्वप्रकाश सच्चिदानन्द परमेश्वरके ही अंश हैं। जैसे महाकाशके अंश घटाकाश, अग्निके विस्फुल्लिंग, गंगाजलके तरंग आदि अंश हैं, वैसे ही अखण्डबोधस्वरूप परमेश्वरका बोधस्वरूप जीवात्मा अंश है। अत: सबकी सहज समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृता ही माननीय है। जैसे मलिन भूमिके सम्पर्कसे निर्मल जल मलिन हो जाता है, कतक, निर्मली आदि औषधके सम्पर्कसे पुन: शुद्ध हो जाता है, वैसे ही अविद्याश्रयकर्मके सम्पर्कसे जीवात्मा मलिन होता है तथा कर्मोपासना, ज्ञान आदिसे पुन: प्रसन्न-निर्मल-निष्कलंक हो जाता है। भ्रातृता, आत्मीयता तथा आत्मैक्यताके कारण सर्वजनहिताय-सर्वजनसुखाय राजनीति आवश्यक है। न वै राज्यं न राजासीन्न च दण्डो न दाण्डिक:। धर्मेणैव प्रजा: सर्वा रक्षन्ति स्म परस्परम्॥ (महा० शांति० ५९।१४) कृतयुगमें सभी तत्त्ववित्, धर्मनिष्ठ, विवेकी तथा सात्त्विक होते हैं। सब एक-दूसरेके पोषक, रक्षक, हितचिन्तक होते हैं। कोई किसीका शोषक नहीं होता। सब धर्मनियन्त्रित होकर परस्पर एक-दूसरेके पूरक बनते हैं। तामस, राजसभावकी वृद्धि, अधर्म-अनाचारके विस्तारसे सत्त्व एवं धर्मका ह्रास होता है। अत: मोहके प्रभावसे ब्रह्मात्मविज्ञान संकुचित होता है, काम-क्रोधका विस्तार होता है, तभी मात्स्यन्याय फैलता है। उस मात्स्यन्यायको रोककर सर्वसामंजस्य सर्वहित सम्पादनार्थ राज्य-व्यवस्था होती है। अहिंसा, सत्यादि धर्मका प्रतिष्ठापन, ब्रह्मविज्ञान-विस्तार और दण्डविधान—ये ही मात्स्यन्याय निरोधके मूल उपाय हैं, यह कहा जा चुका है। चाणक्यके अनुसार ‘सुखस्य मूलं धर्म:, धर्मस्य मूलमर्थ:, अर्थस्य मूलं राज्यम्, राज्यमूलमिन्द्रियजय:, इन्द्रियजयस्य मूलं विनय:, विनयस्य मूलं वृद्धोपसेवा’ (चाणक्य-सूत्र १—६)। सातिशय, निरतिशय—सर्वविधसुखका मूल धर्म है, परंतु धर्मका मूल अर्थ है। अर्थ रहनेपर ही धर्मानुष्ठान सम्भव होता है। अर्थका मूल राज्य है, राज्यका मूल इन्द्रियजय है, इन्द्रियजयका मूल विनय है, विनयका मूल वृद्धसेवा है। वृद्धोंकी सेवाका भी मूल विज्ञान है; इसलिये विज्ञानसम्पन्न होकर, जितात्मा होकर सर्वसुखार्थ प्रवृत्त होना आवश्यक है। मनुके अनुसार— आसीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम्। अप्रतर्क्यमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वत:॥ तत: स्वयम्भूर्भगवानव्यक्तो व्यञ्जयन्निदम्। महाभूतादिवृत्तौजा: प्रादुरासीत् तमोनुद:॥ (मनु० १।५-६) सम्पूर्ण जगत् सृष्टिके प्रथम नाम-रूपरहित, कल्पनातीत, अलक्षण, सर्वत: प्रसुप्त, तमोमय अर्थात् अनिर्वचनीय अज्ञान-विशिष्ट चिन्मात्र था। सर्वकारण परब्रह्म परमेश्वर स्वयम्भू भगवान् ही तमको अभिभूत करके इस अव्यक्त जगत‍्को व्यक्त करते हुए प्रादुर्भूत होते हैं। जैसे वसंत, ग्रीष्म आदि ऋतुओंके बदलनेपर ऋतुलिंग प्रकट होते हैं, उसी तरह प्राणी समयानुसार अपने-अपने कर्मोंको प्राप्त होते हैं। कर्मानुसार ही चराचर विश्वका उत्पादन भगवान् करते हैं—‘यथाकर्म तपोयोगात् सृष्टं स्थावरजङ्गमम्’ (मनु० १।४१)। कर्मानुसार ही विविध योनियोंमें प्राणियोंके जन्म होते हैं। कर्ममूलक सृष्टिका विस्तार वर्णाश्रमव्यवस्थाका प्रतिपादन करके मनु कहते हैं कि संसारमें अराजकता होनेपर सारी प्रजा घबड़ाकर भयसे इधर-उधर भागने लगी, तब उसकी (प्रजाकी) रक्षाके लिये प्रजापतिने इन्द्र, वायु, यम, सूर्य, अग्नि, वरुण, चन्द्र और कुबेर—इन आठ लोकपालोंके अंशसे राजाका निर्माण किया— अराजके हि लोकेऽस्मिन् सर्वतो विद्रुते भयात्। रक्षार्थमस्य सर्वस्य राजानमसृजत् प्रभु:॥ इन्द्रानिलयमार्काणामग्नेश्च वरुणस्य च। चन्द्रवित्तेशयोश्चैव मात्रा निर्हृत्य शाश्वती:॥ (मनु० ७।३-४) देवताओंके अंशसे उत्पन्न होनेके कारण ही राजा अपने तेजसे सब प्राणियोंको दबा लेता है। राजा बालक हो तो भी मनुष्य समझकर उसका अपमान नहीं करना चाहिये। उस राजाके लिये भगवान‍्ने सब प्राणियोंकी रक्षा करनेवाले धर्मस्वरूप ब्रह्मतेजोमय दण्डका निर्माण किया। उस दण्डके भयसे ही स्थावरजंगम सभी प्राणी अपने पदार्थोंका उचित उपभोग कर पाते हैं तथा अपने कर्तव्यसे विचलित भी नहीं होते— तस्य सर्वाणि भूतानि स्थावराणि चराणि च। भयाद् भोगाय कल्पन्ते स्वधर्मान्न चलन्ति च॥ (मनु० ७।१५) दण्ड ही राजा, पुरुष, नेता, शासक और चारों आश्रमोंके धर्मका साक्षी है— स राजा पुरुषो दण्ड: स नेता शासिता च स:। चतुर्णामाश्रमाणां च धर्मस्य प्रतिभू: स्मृत:॥ (मनु० ७।१७) दण्ड ही सब प्रजाका शासक एवं रक्षक है। सबके सोनेपर दण्ड ही जागता है। विद्वानोंने दण्डको ही धर्म कहा है। विचारपूर्वक प्रयुक्त हुआ दण्ड प्रजाका अनुरंजन करनेवाला और अविचारित दण्ड प्रजाका विनाशक होता है। यदि राजा आलस्य छोड़कर दण्डका विधान न करे तो बलवान् प्राणी दुर्बलोंको वैसे ही पकाकर खा जायँ, जैसे लोग मछलियोंको भूनकर खा जाते हैं। कौवा पुरोडाश खाने लग जाय, कुत्ता हवि चाटने लग जाय—किसी पदार्थपर किसीका स्वत्व न रहे और छोटे बड़े तथा बड़े छोटे हो जायँ। सभी वर्ण दूषित हो जायँ, मर्यादाएँ भंग हो जायँ और सारे संसारमें उथल-पुथल मच जाय— दण्ड: शास्ति प्रजा: सर्वा दण्ड एवाभिरक्षति। दण्ड: सुप्तेषु जागर्ति दण्डं धर्मं विदुर्बुधा:॥ समीक्ष्य स धृत: सम्यक् सर्वा रञ्जयति प्रजा:। असमीक्ष्य प्रणीतस्तु विनाशयति सर्वत:॥ यदि न प्रणयेद् राजा दण्डं दण्ड्येष्वतन्द्रित:। शूले मत्स्यानिवापक्ष्यन् दुर्बलान् बलवत्तरा:॥ अद्यात्काक: पुरोडाशं श्वावलिह्याद् हविस्तथा। स्वाम्यं च न स्यात् कस्मिंश्चित् प्रवर्तेताधरोत्तरम्॥ दुष्येयु: सर्ववर्णाश्च भिद्येरन् सर्वसेतव:। सर्वलोकप्रकोपश्च भ&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;् दण्डस्य विभ्रमात्॥ (मनु० ७।१८—२१; २४) राजा दण्डका ठीक-ठीक विधान करनेवाला, सत्यवादी, विचारपूर्वक काम करनेवाला, बुद्धिमान्, धर्म, अर्थ और कामका ज्ञाता होना चाहिये, ऐसा मनु आदि धर्मशास्त्रकारोंका मत है— तस्याहु: सम्प्रणेतारं राजानं सत्यवादिनम्। समीक्ष्यकारिणं प्राज्ञं धर्मकामार्थकोविदम्॥ (मनु० ७।२६) दण्ड बड़ा तेजस्वी है। अजितेन्द्रिय लोग ठीक-ठीक उसका विधान नहीं कर सकते। वह धर्मविचलित राजाको बन्धु-बान्धवोंसहित नष्ट कर देता है तथा दुर्ग, राज्य, स्थावर-जंगम जगत्, आकाशचारी देवगण और ऋषिगणको भी पीड़ित करता है। राजा या शासकको न्यायपूर्वक अपने राज्यकी प्रजाका पालन करना चाहिये। शत्रुओंको उग्र दण्ड देना चाहिये। मित्रोंके साथ छल-कपटका व्यवहार नहीं करना चाहिये। प्रेमीजनों और सज्जनोंके साथ सहिष्णुता रखनी चाहिये। ऐसा व्यवहार करनेवाला राजा भले ही कोषरहित हो, उसका यश ऐसा फैलता है, जैसे जलपर तैल-बिन्दु। राजाको चाहिये कि वह पवित्र विद्वान्, ब्राह्मण एवं वृद्धोंकी नित्य सेवा करे। ऐसा करनेसे राक्षस भी राजाका सम्मान करते हैं तथा विनय (जितेन्द्रियता, नम्रता) भी प्राप्त होती है। अविनय (उद्दण्डता)-से सुसमृद्ध राजा भी सपरिवार नष्ट हो जाते हैं और विनयसे जंगलमें रहनेवाले कोषविहीन राजा भी राज्य पा लेते हैं। शिकार, द्यूत, दिवास्वप्न, निन्दा, स्त्री, मद (नशा), नृत्य, गीत, वादित्र और व्यर्थ घूमना (हवाखोरी), इन दश कामज व्यसनों तथा चुगली, साहस, द्रोह, ईर्ष्या, असूया (गुणोंमें भी दोषदृष्टि), दूसरेका धन छीन लेना, गाली-गलौज और मारपीट—इन आठ क्रोधज व्यसनोंसे तथा इन दोनोंके मूल लोभसे राजाको अत्यन्त बचना चाहिये। कामज व्यसनमें मदिरापान, द्यूत, स्त्री और मृगया—ये चार तथा क्रोधज व्यसनमें गाली-गलौज, मारपीट और दूसरेका धन छीन लेना ये तीन बहुत ही भयंकर हैं। इनसे तो सर्वथा बचना चाहिये। अत्यन्त सुकर कर्म भी एक असहाय पुरुषद्वारा दुष्कर होता है। अत: राजाको शास्त्रज्ञानी, शूर, लब्धप्रतिष्ठ, कुलीन, सुपरीक्षित सात या आठ मन्त्री रखने चाहिये। सन्धि, विग्रह, सेना, खजाना, खेती, खान, रक्षा (बन्दोबस्त) आदिके विषयमें पृथक्-पृथक् प्रत्येककी राय जानकर विद्वान् ब्राह्मणके साथ विचारकर निर्णय करना चाहिये। राज्यका काम जितने लोगोंसे अच्छी तरहसे चल सके, उतने लोगोंको परीक्षा करके उपमन्त्री बनाना चाहिये। खान, चुँगी और कर वसूल करनेके लिये शूर, पवित्र, निर्लोभ लोगोंको और पापभीरु लोगोंको घर आदिके प्रबन्धसम्बन्धी काममें लगाना चाहिये। इसी तरह सर्वशास्त्र-विशारद इंगित आकार और चेष्टा जाननेवाले पवित्र कुशल कुलीनको दूत बनाना चाहिये। दूत अनुरक्त, पवित्र, चतुर, स्मृतिशाली, प्रतिभासम्पन्न, देश-काल-परिस्थितिका ज्ञाता, सुन्दर, निर्भीक और वाग्मी होना चाहिये। सेनापतिके अधीन चतुरंगिणी सेना, सेनाके अधीन युद्ध तथा विनय सिखाना, राजाके अधीन खजाना और राज्य तथा दूतके अधीन सन्धि-विग्रह होते हैं। दो राजाओंमें मेल कराना या मिले हुए राजाओंको परस्पर लड़ा देना, यह दूतका काम है। कृषक जैसे खेतमेंसे घासको निकालकर धान्यकी रक्षा करता है, उसी तरह राजा दुष्टोंका निग्रहकर प्रजाकी रक्षा करे। जैसे शरीरको कष्ट देनेसे प्राणोंका क्षय होता है, उसी तरह राष्ट्रको पीड़ा पहुँचानेसे राजाके प्राणोंका क्षय होता है। जो राजा अज्ञानवश राष्ट्रको पीड़ा पहुँचाता है, वह अपने बन्धु-बान्धवोंसमेत जीवनसे भ्रष्ट हो जाता है। राजाको लगानवसूली, नौकरोंका मासिक वेतन, मन्त्री आदिको बाहर भेजना, किसीको हानिकर काम करनेसे रोकना, किसी कामको कराना, मुकदमोंका निर्णय, अपराधियोंको दण्ड, पापियोंका प्रायश्चित्त, पाँच प्रकारके गुप्तचर, प्रजाका प्रेम या असंतोष और अन्य राजाओंके व्यवहार, इन बातोंपर भलीभाँति विचार करना चाहिये। मध्यम (अपने और शत्रुदेशके बीचका राजा)-का व्यवहार, विजिगीषु (अपनेको जीतनेके लिये आनेवाले राजा)-का कर्म तथा उदासीन और शत्रुकी कार्यवाहियोंपर पूरी दृष्टि रखनी चाहिये। द्वादश राजन्य-मण्डलकी चार मूल-प्रकृतियाँ हैं—(१) मध्यस्थ, (२) विजिगीषु, (३) उदासीन और (४) शत्रु। अर्थात् इनके वशमें रहनेसे सभी राष्ट्र वशमें रहते हैं। आठ और प्रकृतियाँ हैं—मित्र, शत्रु-मित्र, मित्र-मित्र, अरि-मित्रमित्र, आक्रन्द, पार्ष्णिग्राह, आक्रन्दासार और पार्ष्णिग्राहासार। इन प्रत्येककी मन्त्री, राष्ट्र (प्रजा), दुर्ग, खजाना और शासन-विभाग—ये पाँच-पाँच प्रकृतियाँ होती हैं, इस तरह ६० प्रकृतियाँ हुईं और मूल १२ मिलकर सब ७२ हो गयीं। अपनी चारों ओरकी सीमाके राजा तथा उनके मित्रोंको शत्रु समझना चाहिये। उनसे आगेके राजाओंका अपना मित्र और उनसे भी आगेके राजाओंको उदासीन समझना चाहिये। इन सबको साम, दान, भेद और दण्ड—इन प्रत्येक उपायोंसे अथवा सभी उपायोंसे सबको अथवा अधिक-से-अधिक जितने बने रह सकें, उनको मित्र बनाये रखना चाहिये। यद्यपि आज परिस्थिति बदली हुई है तथापि रूपान्तरसे यह शत्रु-मित्रकी व्यवस्था आज भी अक्षुण्ण ही है। सन्धि, विग्रह (लड़ाई), यान (चढ़ाई), आसन (किलेके अन्दर ही बन्द रहना), द्वैधीभाव (भेद) और संश्रय (किसी बलवान‍्का आश्रय)—इन छ: गुणोंका बराबर विचार करना चाहिये। एक साथ काम करनेसे भूतमें हुए या भविष्यमें होनेवाले हानि-लाभको बाँट लेनेकी प्रतिज्ञा करना तथा पृथक्-पृथक् काम करनेसे भूतमें हुए या भविष्यमें होनेवाले हानि-लाभको बाँट लेनेकी प्रतिज्ञा करना—ये सन्धिके भेद हैं। शुद्ध सन्धिमूलक ही शान्ति होती है। आस्तिकता तथा धर्म-प्रधानताके बिना सन्धियाँ अनेक हेतुओंसे अव्यवस्थित रहती हैं, इसीलिये शान्ति भी अव्यवस्थित रहती है। अत: धर्मनिष्ठा तथा आस्तिकता ही शुद्ध सन्धि एवं स्थिर शान्तिका मूल मन्त्र है। अपनी विजयके लिये लड़ना और मित्रकी हानिके निमित्त मित्रके शत्रुसे लड़ना—ये विग्रहके दो भेद हैं। आपद‍्ग्रस्त शत्रुको देखकर उसपर अकेले चढ़ाई करना अथवा मित्रकी सहायतासे चढ़ाई करना—ये यानके दो भेद हैं। सैन्य-बल कमजोर देखकर किलेमें रह जाना अथवा मित्रके अनुरोधसे किलेमें रह जाना—ये आसनके दो भेद हैं। सेनामें फूट डाल देना अथवा दो मित्र राजाओंमें फूट डाल देना—ये भेदनीतिके दो प्रभेद हैं। शत्रुसे पीड़ित होकर किसी बलवान‍्का आश्रय लेना अथवा शत्रु पीड़ा न पहुँचाये, इसलिये किसी बलवान‍्का आश्रय लेना—यह दो प्रकारका संश्रय है। सन्धि करनेसे भले ही थोड़ी तात्कालिक पीड़ा हो, किंतु भविष्यमें लाभ हो तो सन्धि अवश्य कर लेनी चाहिये। जब सारी प्रकृति सन्तुष्ट हो और कोष तथा युद्धके साधन पर्याप्त हों, तब युद्ध करना चाहिये। जब अपनी सेना हृष्ट-पुष्ट-सन्तुष्ट हो और शत्रुसेना दुर्बल तथा असन्तुष्ट हो, तब भी युद्ध करना चाहिये। जब सेना, वाहन और कोष क्षीण हों तो शत्रुसे समझौताकी बातचीत करते हुए अपने दुर्गमें ही रहना चाहिये। जब राजा देखे कि शत्रु बलवान् है, तब अपनी सेनाका दो विभागकर एक विभाग लड़ाईपर भेजे और एक विभागको शत्रुकी सेनामें भेजकर शत्रु-सेनाके लोगोंको अपनी ओर मिला लेना चाहिये। यदि राजा देखे कि शत्रु अब हमें जीत लेगा, तो झट किसी ऐसे बलवान् धर्मात्मा राजाका आश्रय ले ले, जो अपनी दुष्ट प्रजा और शत्रुको भी दण्ड दे सकता हो तथा गुरुके समान प्रत्येक प्रकारसे उसकी सेवा करनी चाहिये। यदि उसका आश्रय लेनेपर भी कोई लाभ न हो, अपितु हानि होनेकी ही सम्भावना हो, तो बेखटके युद्ध ही करना चाहिये। गुण-दोष विचारकर भविष्यका निर्णय करनेवाले, वर्तमान-निर्णयमें विलम्ब न करनेवाले तथा भूतकालिक शेष कार्यको शीघ्र पूर्ण करनेवाले राजाको शत्रु-मित्र या उदासीन अभिभूत नहीं कर सकते। मनुने राजाका यद्यपि बहुत महत्त्व माना है, फिर भी उसे निरंकुश नहीं बतलाया। सर्वप्रथम राजापर ही धर्मका नियन्त्रण आवश्यक है। राजाके हाथमें जो दण्ड होता है, वह दूसरोंपर ही नियन्त्रण नहीं करता, वरन् धर्मविरुद्ध राजाको भी नष्ट कर डालता है, यह पीछे कहा जा चुका है। शुक्रके अनुसार भी राजाके लिये अमात्योंकी अत्यन्त आवश्यकता कही गयी है। जो राजा मन्त्रियोंके मुखसे हिताहितकी बात नहीं सुनता, वह राजाके रूपमें प्रजाका धन हरण करनेवाला डाकू होता है— हिताहितं न शृणुते राजा मन्त्रिमुखाच्च य:। स दस्यु: राजरूपेण प्रजानां धनहारक:॥ (शुक्रनीति २।२४८) शुक्रके अनुसार राजाको राज्यका कार्य चलानेके लिये पुरोधा, युवराज, प्रधान, सचिव, मन्त्री, प्रतिनिधि, पण्डित, सुमन्त्र, अमात्यदूत—इन दस प्रकृतियोंका संग्रह आवश्यक है। इनकी योग्यता एवं कार्योंका विस्तृत वर्णन शुक्रनीतिमें है। किसी भी शासन-लेखपर मन्त्री आदिकी स्वीकृति होनी चाहिये। उसपर मन्त्री, प्राड‍्विवाक, पण्डित और दूतको यह लिखना चाहिये कि यह हमारी सम्मतिसे लिखा गया है, अमात्यको लिखना चाहिये कि यह ठीक लिखा गया है, सुमन्त्रको लिखना चाहिये कि इसपर पूर्ण विचार कर लिया गया है, प्रधानको लिखना चाहिये कि यह यथार्थ सत्य है, प्रतिनिधिको लिखना चाहिये कि यह अंगीकार करने योग्य है, युवराज लिखे कि यह स्वीकृत किया जाय, तब पुरोहित अपना मत लिखे कि यह मुझे सम्मत है। सबके अन्तमें राजा लिखे कि यह स्वीकृत हुआ। अपने लेखके अन्तमें सबकी मुहर लगनी चाहिये— मन्त्री च प्राड‍्विवाकश्च पण्डितो दूतसंज्ञक:। स्वाविरुद्धं लेख्यमिदं लिखेयु: प्रथमं त्विमे॥ अमात्य: साधु लिखितमस्त्येतद् प्राग् लिखेदयम्। सम्यग् विचारितमिति सुमन्त्रो विलिखेत्तत:॥ सत्यं यथार्थमिति च प्रधानश्च लिखेत् स्वयम्। अङ्गीकर्तुं योग्यमिति तत: प्रतिनिधिर्लिखेत्॥ अङ्गीकर्तव्यमिति च युवराजो लिखेत् स्वयम्। लेख्यं स्वाभिमतं चैतद् विलिखेच्च पुरोहित:। स्वस्वमुद्राचिह्नितं च लेख्यान्ते कुर्युरेव हि॥ (शुक्रनीति २।३५५—३५९) मन्त्रिमण्डलके लेखबद्ध युक्तिसहित पृथक् मतोंको लेकर विचार करना चाहिये। फिर जो बहुमत हो, उसे स्वीकार करना चाहिये— पृथक‍्पृथङ् मतं तेषां लेखयित्वा ससाधनम्। विमृशेत् स्वमतैनैव कुर्याद् यद् बहुसम्मतम्॥ जो राजा प्रकृतिकी बात नहीं सुनता, वह अन्यायी है। जो प्रजाका रक्षक बनकर भी रक्षा नहीं करता, उस राजाको पागल कुत्तेके समान मार देना चाहिये— अहं वो रक्षितेत्युक्त्वा यो न रक्षति भूमिप:। स संहत्या निहन्तव्य: श्वेव सोन्माद आतुर:॥ (शुक्रनीति) इस तरह भारतीय राजनीतिशास्त्रानुसारी शासक उच्छृंखल नहीं होता था। आजके लोकतन्त्र-शासनका आधार मुण्ड-गणना है। इसके अनुसार योग्य शासकोंका संग्रह कठिन ही नहीं, अपितु असम्भव भी हो जाता है। बहुमत जिसे प्राप्त हो, उसीके हाथमें शासनसूत्र आ जाता है। विधान-सभा एवं लोकसभाका काम है विधान या कानूनका निर्माण करना। पर स्थिति यह है कि भारतमें सैकड़ों नहीं हजारों विधानसभायी मेम्बर इस प्रकारके हैं, जो कानूनसे सर्वथा अनभिज्ञ होते हैं। उनका अपना मुकदमा होता है तो वे रुपया खर्चकर अन्य वकीलोंका सहारा लेते हैं, परंतु वे ही राष्ट्रके लिये कानून बनाते हैं। साधारण तौरपर भारतीय राजनीतिशास्त्र वेदों एवं मन्वादि धर्मशास्त्रोंको ही राष्ट्रका संविधान एवं कानून मानते हैं। उनकी दृष्टिमें शास्त्रज्ञों एवं सदाचारी धर्मनिष्ठ विद्वानोंकी परिषद् विधान-निर्णेत्री है, विधान-निर्मात्री नहीं। शासन-परिषद्की सहायतासे राजा शास्त्रानुसारी विधानद्वारा शासन करता है। राजा या शासक, वह चाहे जन-प्रतिनिधि हो या कुल-परम्परागत राजा, उसका परम कर्तव्य है कि वह पहले अपने-आपको शास्त्र एवं आचार्योंकी शुश्रूषाद्वारा विनयसे युक्त बनाये। पुन: अपने पुत्रों, मन्त्रियोंको विनययुक्त बनाये, पश्चात् भृत्यों एवं प्रजाको विनययुक्त बनाये— आत्मानं प्रथमं राजा विनयेनोपपादयेत्। तत: पुत्रांस्ततोऽमात्यान् ततो भृत्यान् तत: प्रजा:॥ (शुक्रनी० १।९२) राजाको व्यसनमुक्त होना चाहिये। कठोर भाषण, उग्र दण्ड, अर्थदूषण, पान, स्त्री, मृगया और द्यूत—ये राजाके लिये भीषण व्यसन हैं। पीछे अष्टादश व्यसनोंकी चर्चा आयी ही है— वाग्दण्डयोश्च पारुष्यमर्थदूषणमेव च। पानं स्त्री मृगया द्यूतं व्यसनानि महीपते:॥ (कामन्दकीयनीतिसार १४।६) मन्त्रीके लिये भी ये सब दूषण हैं। आलस्य, स्तब्धता, घमण्ड, प्रमाद, वैरकारिता आदि ये और भी मन्त्रीके व्यसन हैं। दक्षता, शीघ्रता, अमर्ष, शौर्य एवं उत्साह आदि गुणोंसे युक्त ही राजा होना चाहिये— दाक्ष्यं शैघ्य्रं तथामर्ष: शौर्यं चोत्साहलक्षणम्। गुणैरेतैरुपेत: सन् राजा भवितुमर्हति॥ (कामन्दकीयनीति० ४।२३) मन्त्रियोंके उपयोगी और भी बहुत-से गुण कहे गये हैं। जिनके बिना शासन करनेकी योग्यता ही नहीं हो सकती है। स्वावग्रहो जानपद: कुलशीलबलान्वित:। वाग्मी प्रगल्भश्चक्षुष्मानुत्साही प्रतिपत्तिमान्॥ स्तम्भचापलहीनश्च मैत्र: क्लेशसह: शुचि:। सत्यसत्त्वधृतिस्थैर्यप्रभावारोग्यसंयुत:॥ कृतशिल्पश्च दक्षश्च प्रज्ञावान् धारणान्वित:। दृढभक्तिरकर्ता च वैराणां सचिवो भवेत्॥ स्मृतिस्तत्परतार्थेषु वितर्को ज्ञाननिश्चय:। दृढता मन्त्रगुप्तिश्च मन्त्रिसम्पत्प्रकीर्तिता॥ (कामन्दकीयनीति० ४।२८—३१) आत्मनियन्त्रित, स्वदेशस्थ, कुलीन, शीलवान्, बलवान्, वाग्मी, निर्भीक, शास्त्रज्ञ, उत्साही, प्रत्युत्पन्नमति, निरभिमान, अचंचल, मैत्रीवर्धक, सहिष्णु, पवित्र, धैर्य-स्थैर्य-सत्य एवं सत्त्वसे युक्त, प्रतापी, नीरोग, शिल्पज्ञ, दक्ष, बुद्धिमान्, धारणावान्, स्वामिभक्त तथा उससे कभी वैर-विद्वेष न करनेवाला सचिव होता है। स्मृतिमान्, पुरुषार्थ-तत्पर, विचारशील, निश्चित ज्ञानवाला, दृढ़ता, मन्त्रगुप्ति, क्षमता आदि गुणोंसे युक्त मन्त्री हो। मन्त्रियोंकी योग्यता राजाको स्वयं प्रत्यक्ष देखकर, परोक्ष (परोपदेश)-से तथा अनुमानसे (कार्य देखकर यह जान लेना कि कितना कार्य नहीं किया) जाननी चाहिये— ‘प्रत्यक्षपरोक्षानुमेया हि राजवृत्ति:। स्वयं दृष्टं प्रत्यक्षम्। परोपदिष्टं परोक्षम्। कर्मसु कृतेनाकृतावेक्षणमनुमेयम्।’ (कौ० अर्थ० १।९।११—१३) वाद, जल्प, वितण्डारूप कथाके प्रसंगसे मन्त्रीकी प्रगल्भता, निर्भीकता, प्रतिभा एवं वाक‍्कुशलताको जाना जाता है। उसी प्रसंगसे सत्यवादिताका भी पता लग जाता है। अवैरकारिता, भद्रता, क्षुद्रताका ज्ञान भी प्रसंगवशात् प्रत्यक्षसे ही जाना जा सकता है। आपत्तिके समय उत्साह, प्रभाव तथा क्लेश, सहिष्णुता, धैर्य, अनुराग, स्थिरताका परिज्ञान होता है। भक्ति, मैत्री तथा स्थिरताका परिज्ञान व्यवहारसे करना चाहिये— उत्साहं च प्रभावं च तथा क्लेशसहिष्णुताम्। धृतिं चैवानुरागं च स्थैर्यं चापदि लक्षयेत्॥ भक्तिं मैत्रीं च शौचं च जानीयाद् व्यवहारत:। (कामं० नीतिसार ४।३७-३८) मन्त्रीकी शास्त्रज्ञता एवं शिल्पज्ञता तत्-तद् विद्याओंके विद्वानोंसे जानना चाहिये। उसके स्वजनोंसे कुल, स्थान एवं संयमका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये। कर्ममें प्रयुक्तकर दक्षता, विज्ञान एवं धारयिष्णुताकी परीक्षा होती है। सहवासियों, पड़ोसियोंसे उसके बल, सत्त्व (शक्ति), आरोग्य, शील, अस्तब्धता एवं अचापलका ज्ञान हो सकता है। दारुण कृच्छ्र उत्पन्न होनेपर उसकी कुलीनताका ज्ञान हो सकता है; क्योंकि दारुण अवसरपर ही स्वच्छहृदय कुलीन अपनी विशेषताको दिखलाता है— साधुतैषाममात्यानां तद्विद्येभ्यस्तु बुद्धिमान्। चक्षुष्मतां च शिल्पं च परीक्षेत गुणद्वयम्॥ स्वजनेभ्यो विजानीयात् कुलं स्थानमवग्रहम्। परिकर्मसु दाक्ष्यं च विज्ञानं धारयिष्णुताम्॥ गुणत्रयं परीक्षेत प्रागल्भ्यं प्रतिभां तथा। संवासिभ्यो बलं सत्त्वमारोग्यं शीलमेव च। अस्तब्धतामचापल्यं वैरिणां चापि कर्तृताम्। समुत्पन्नेषु कृच्छ्रेषु दारुणेष्वप्यसंशयम्। दर्शयत्यच्छहृदय: कुलीनश्चतुरस्रताम्॥ (कामं० ना० ४।३४—३६; ३९; ६९) आचार्य, सन्त, महात्मा और विद्वान् ही विद्याओंके प्रकाशक, प्रवर्तक तथा संचालक होते हैं। राजा भी विद्वानोंसे ही राजनीतिका विज्ञान प्राप्त करता है। इसीलिये स्वराज्यकी स्थापनामें मित्र-लाभादिसे भी प्रथम विद्या-चिन्तनका ही निर्देश किया गया है; क्योंकि सम्पूर्ण लोकस्थिति ही विद्यापर निर्भर होती है। तत्रायं प्रथमोपाय: यद् विद्यावृद्धै: सार्धं विद्याचिन्ता। विद्याप्रतिबद्धत्वाल्लोकस्थिते:॥ (नीतिवाक्यामृत) राजाको सक्रिय विद्वानोंके साथ बैठकर विनययुक्त होकर आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता एवं दण्डनीतिका विचार करना चाहिये— आन्वीक्षिकीं त्रयीं वार्तां दण्डनीतिं च पार्थिव:। तद्विद्यैस्तत्क्रियोपेतैश्चिन्तयेद् विनयान्वित:॥ (का० नी० २।१) वात्स्यायनने भी भूमि, हिरण्य, पशु, धान्य, भाण्डोपस्कर, मित्रादिके पहले विद्याके ही उपार्जन एवं वर्धनको अर्थ माना है—‘विद्याभूमिहिरण्यपशुधान्यभाण्डोपस्करमित्रादीनामर्जितस्य विवर्धनमर्थ:।’ (वात्स्या० कामसूत्र १।२।९) मधुकरकी वृत्तिसे राजाका संगृहीत कोष भी अपने उपभोगार्थ न होकर प्रजाहितार्थ ही होना चाहिये। शास्त्रधर्मनियन्त्रित शासन ही &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt; है। इसमें प्रजाकी रुचि तथा सम्मतिका पूरा ध्यान रखा जाता है तथापि शास्त्र एवं धर्म-विरुद्ध बहुमतके आधारपर कोई अनर्थ नहीं किया जाता। फिर भी जहाँ अनेक जाति-उपजाति तथा सम्प्रदायके लोग बसते हों, वहाँ सबके धर्म, संस्कृतिकी रक्षा होनी चाहिये। किसीके देवस्थान, धर्मग्रन्थ, आचार्य एवं आचार-व्यवहारकी अवहेलना कदापि न होनी चाहिये। सभीके धर्मका निर्णय उन-उन सम्प्रदायोंके धर्मग्रन्थों तथा धर्माचार्योंपर ही छोड़ा जाना चाहिये। शासनका उसमें हस्तक्षेप न होना चाहिये। राष्ट्रके परमोपकारक गोवंशका सभी दृष्टिसे पालन होना चाहिये। उसका वध सर्वदा अवरुद्ध होना रामराज्यकी विशेषता है। देशको सर्वथा अखण्ड रखना चाहिये। प्रान्तों या राज्योंको अपने घरेलू मामलोंमें स्वतन्त्रता मिलनी चाहिये। पर राष्ट्रहितके व्यापक कार्यमें सम्पूर्ण देशकी एक नीति रहनी चाहिये। राजा या राष्ट्रपति किंवा शासनपरिषद्के नीचे आठ विद्वानोंकी एक परिषद् होनी चाहिये। ये विद्वान् वेद, धर्मशास्त्र, राजनीति, समाजनीति, अर्थशास्त्र, आयुर्वेद आदि विद्याओं तथा विविध भाषाओं एवं देश-विदेशकी नीतिके वेत्ता हों। यदि सभी सब विषयोंके ज्ञाता न भी हों तथापि पूरी परिषद् मिलकर उपर्युक्त विषयोंकी पूरी जानकारी अवश्य रखे। परिषद्के सदस्य अपनी सहायताके लिये पृथक्-पृथक् परामर्शसमिति भी रख सकते हैं। प्रजाकी सम्मति, रुचि तथा आन्तरिक स्थिति एवं शासनप्रणालीके सुपरिणाम, दुष्परिणाम जाननेके लिये एक लोकसभा होनी चाहिये। उनके सदस्य प्रजाप्रिय हों। उन्हें प्रजाकी सम्मतिसे उपर्युक्त अमात्य-परिषद् ही नियुक्त करेगी। मुण्डगणनाके आधारपर यह कार्य न होना चाहिये। राजा, प्रजा, अमात्यमण्डल सभीमें ईश्वरपरायणता और धर्मनिष्ठा होनेसे शासनव्यवस्था ठीक चल सकेगी। वैसा न होनेसे छल, कपट तथा मिथ्या आचरणका ही बोलबाला रहेगा। धर्मनिष्ठाके बिना कानूनकी वंचना की जाती है, परंतु यदि धर्मनिष्ठा है तो अपराधी स्वयं अपराध व्यक्त करके शुद्धिके लिये दण्ड माँगता है। भारतमें आज भी गोहत्या आदि होनेपर अपराधी ‘मिताक्षरासे’ व्यवस्था माँगने स्वयं जाता है। वैसे तो सभीको धर्मात्मा तथा ईश्वरविश्वासी होना चाहिये। विशेषकर अमात्यमण्डल और उससे भी अधिक राजाको वैसा अवश्य होना चाहिये। गुणवान् पुरुष थोड़े होनेसे दुर्लभ होते हैं। अत: जहाँतक हो सके, अधिकार थोड़े ही लोगोंके हाथमें होने चाहिये। इसीलिये राजा और अमात्योंका हर समय बदलते रहना ठीक नहीं, यही राजतन्त्रका अभिप्राय है। युद्ध आदिके समय लोकतन्त्रमें भी एकके ही हाथमें अधिकार देने पड़ते हैं। अधिक लोगोंकी अपेक्षा थोड़े लोगोंको साधु-सज्जन बनानेमें सरलता होती है। यदि वंशपरम्पराका राजा हो, तो वह अपने ऊपर अधिक जिम्मेदारीका अनुभव करता है। अत: यथासम्भव वैसा ही राजा होना चाहिये। यदि वैसा न मिले, तो किसी योग्य व्यक्तिको राष्ट्रपति बनाना चाहिये। शीघ्र बदलते रहनेसे किसी योग्य व्यक्तिको भी अपनी नीति कार्यान्वित करनेका पूरा समय नहीं मिल पाता। इसके अतिरिक्त सामान्य व्यक्तिको थोड़े ही दिनोंमें स्वार्थसिद्धिकी चिन्ता लग जाती है, जिससे प्रजाके कल्याणमें बाधा पड़ती है। अत: यह आवश्यक है कि राजा या राष्ट्रपतिको जीवनपर्यन्त या दीर्घकालके लिये नियुक्त किया जाय। किंतु कर्तव्यच्युत होनेपर उसको हटाना आवश्यक है। राजाके स्थानकी पूर्ति उसका योग्य उत्तराधिकारी न होनेपर मन्त्रियोंद्वारा होनी चाहिये। मन्त्रिमण्डलमें किसीकी मृत्यु होने अथवा किसीके हटनेपर शेष मन्त्रियोंके परामर्शसे राजाको नयी नियुक्ति करनी चाहिये। राजा, अमात्य, कोष, सेना और न्याय—राज्यके पाँच मुख्य विषय हैं। ग्राम, मण्डल, प्रान्तके भेदसे उत्तरोत्तर अधिक शक्तिशाली अधिकारियोंकी नियुक्ति होनी चाहिये। कोषके लिये सर्वत्र कर-संग्रह-विभाग रहने चाहिये। रक्षाविभाग तथा न्यायविभागकी भी उचित व्यवस्था होनी चाहिये। रक्षाके लिये सेना दो प्रकारकी होनी चाहिये—एक वह जो प्रतिदिनकी शान्ति स्थापित रखे अर्थात् पुलिस और दूसरी वह, जो विशेष अवसरपर शत्रुके साथ युद्ध करे। न्यायालय प्रत्येक विभागके लिये पृथक्-पृथक् होना चाहिये। मण्डल और प्रान्तमें बड़े-बड़े न्यायालय और सम्पूर्ण राष्ट्रका एक सर्वोच्च न्यायालय होना चाहिये। अन्तिम न्यायालयमें अमात्यमण्डल तथा राजाको न्याय करनेका अधिकार होना चाहिये। न्यायाध्यक्षके पदपर धर्मात्मा, विद्वान् तथा सदाचारी व्यक्तियोंकी ही नियुक्ति होनी चाहिये। सम्पूर्ण स्थितिका पूर्ण परिचय रखनेके लिये गुप्तचरविभाग होना चाहिये। उसका कार्य केवल अपराधी या राजाके विरोधियोंका पता लगाना ही नहीं, किंतु लोकसेवी, परोपकारी, सदाचारी विद्वानों तथा दुखी आर्तोंके सम्बन्धमें भी सरकारको सूचित करते रहना चाहिये, जिससे निग्रहानुग्रह आदिमें पूरी सहायता मिल सके। कोषका उपयोग उपर्युक्त विभागोंके संचालन, शस्त्रास्त्र-निर्माण तथा संग्रह, यातायातसाधनोंका निर्माण तथा व्यवस्था और राष्ट्रके स्वास्थ्य तथा शिक्षा आदिमें होना चाहिये। प्रचार, यातायात, परराष्ट्रसम्बन्ध एक विभागसे, डाक, तार, शिक्षा, स्वास्थ्य दूसरेसे और उद्योग, खाद्य आदि तीसरे विभागसे सम्बद्ध हों तो अच्छा है। इसी तरह कोष, न्याय एवं सेनाकी व्यवस्था होनी चाहिये। आजकल एक सबसे बड़ा विभाग व्यवस्थापनका अर्थात् कानून बनानेका है, जिसके लिये धारासभाओंका निर्वाचन होता है, परंतु अपने यहाँ तो इसकी आवश्यकता ही नहीं। केवल विशिष्ट विद्वानोंकी एक निर्णेत्री-परिषद् होनी चाहिये, जो मनु, याज्ञवल्क्य, बृहस्पति, नारद, अंगिरा, पराशर आदिके मतानुसार ठीक-ठीक व्यवस्था दे सके। अहिन्दुओंके लिये उनके धर्मशास्त्रानुसार उनके आचार्योंकी व्यवस्था होनी चाहिये। भारतीय धर्मशास्त्र और राजनीतिके सम्यक् विद्वान् ही व्यवहारमें शास्त्रार्थके अधिकारी होंगे। व्यवहारनिर्णायक न्यायाध्यक्ष स्वधर्मनिष्ठ एवं ईश्वर-विश्वासी होना चाहिये। अमात्यमण्डलको राजाके आज्ञानुसार सभी कर्मचारियोंके नियोजन, पृथक्‍करण, संशोधन आदिका अधिकार होना चाहिये। गुप्तचरोंके अतिरिक्त विशिष्ट व्यक्तियोंकी एक अन्वेषणसमितिद्वारा जटिल विषयोंकी जानकारी प्राप्त करनेका प्रयत्न होना चाहिये। अमात्यमण्डलके सदस्य और राजा सर्वसाधारणके लिये दुर्दर्श, दुर्लभ न होकर सुदर्श और सुलभ रहें, जिसमें प्रजा उनसे अपनी स्थिति निवेदन कर सके। ऐसे अनेक स्थान होने चाहिये, जहाँ नियत समयपर अर्थी आकर अमात्यों या राजासे मिल सकें। मन्त्री तथा राजाओंको भी गुप्त वेषसे प्रजाकी स्थिति तथा राजकर्मचारियोंका व्यवहार जानना चाहिये। इस मार्गसे गुप्त तथा जटिल रहस्योंका भी पता लग सकता है। हिंसा, मद्यपान, व्यभिचार, द्यूत आदिपर कड़ा नियन्त्रण होना चाहिये। प्रत्येक पदपर सच्चे और शुद्ध अधिकारियोंकी नियुक्ति होनी चाहिये। पुलिस प्रजाकी सेवक बनकर नम्रतापूर्वक काम करे, पर साथ ही दुष्टदमनार्थ आवश्यक उग्रताका निषेध न होना चाहिये। प्राचीन ढंगपर ग्रामपंचायतें विधिवत् स्थापित होनी चाहिये। आपसी झगड़े वहीं तय हुआ करें, जिसमें न्यायालय जानेकी आवश्यकता ही न पड़े। पंचायतोंका काम ठीक होता है या नहीं, इसकी देख-रेखके लिये एक निरीक्षक-विभाग होना चाहिये। क्रय-विक्रयके सम्बन्धमें यथासम्भव ऐसा प्रबन्ध होना चाहिये कि अन्नवाले अन्न, तेलवाले तेल, गुड़वाले गुड़ दें। नाई, धोबी आदि अपना काम करें, जिसके बदलेमें उन्हें अन्न मिले। यथासम्भव नकद क्रय-विक्रयके स्थानपर वस्तु-विनिमय होना चाहिये और जिसका जो परम्पराप्राप्त व्यवसाय है, उसे वही करना चाहिये। इस तरह परस्पर सम्बन्ध स्थापित रखनेमें सुविधा होगी। जहाँतक हो प्रजाको विशुद्ध क्षत्रियवंशका राजा, विद्वान् ब्राह्मण पुरोहित तथा महामात्य बनाना चाहिये। न्यायाध्यक्ष तथा अध्यापकके पदपर भी ब्राह्मणोंकी ही नियुक्ति होनी चाहिये। सेनापतिके पदपर पवित्र वीर क्षत्रिय तथा सैनिक भी अधिकतर कुलीन क्षत्रिय ही होने चाहिये। कोषाध्यक्ष वैश्य तथा सेवाध्यक्ष शूद्र होने चाहिये। चर्मके व्यापारों तथा यन्त्रोंके अध्यक्ष चर्मकार होने चाहिये। शुचिता (सफाई) विभागका अध्यक्ष अन्त्यज होना चाहिये। इसी तरह प्राय: सभी यन्त्र, शिल्प, कल-कारखाने आदिपर शूद्रोंका ही प्राधान्य रहना चाहिये। सर्वसाधारणके व्यवहारमें आनेवाली राष्ट्रकी भाषा हिन्दी होनी चाहिये। पर विशिष्ट विवरणोंमें संस्कृतका प्रयोग आवश्यक है। राजाको उदार, सौम्य, धार्मिक, निर्व्यसन, विद्वान्, शुद्ध तथा रहस्यज्ञ होना चाहिये। उसे वेदान्त, न्याय तथा दण्डनीतिका विद्वान् और अपने दोषोंका ज्ञाता होना चाहिये। कोई काम करनेके पहले उसपर उसे स्वयं तथा मन्त्रियोंके साथ एकान्तमें अच्छी तरह विचार करना चाहिये। किसी भी महत्त्वपूर्ण कार्यमें शुभ मुहूर्त, नीति और आथर्वणिक प्रयोगोंका उपयोग किया जा सकता है। अच्छा तो यह है कि राजा योग्य व्यक्तियोंद्वारा श्रौत-स्मार्तकर्मोंका अनुष्ठान करता रहे। राजाका कर्तव्य है कि वह अप्राप्त धन, भूमि आदि वस्तु धर्ममार्गसे प्राप्त करे, प्राप्तकी रक्षा करे तथा उन्हें बढ़ाये और फिर उन्हें पात्रोंमें प्रदान भी करे। दत्त वस्तुओंका आगामी राजाओंद्वारा भी पालन होता रहे, इसलिये दान-पत्र आदिका उचित उल्लेख होना चाहिये। राजधानी ऐसे प्रदेशमें भी होनी चाहिये, जो रम्य हो और जहाँ मनुष्योंके लिये अन्न तथा पशुओंके लिये चारा पर्याप्त मिल सके। वहाँ विस्तृत दुर्ग (किला) बनवाना चाहिये, जिसमें जन, धनकी पूर्ण रक्षा हो सके। राजाको चाहिये कि वह विद्वान् ब्राह्मणोंके प्रति क्षमाशील, शत्रुओंके प्रति क्रोधयुक्त और भृत्यवर्ग तथा प्रजाओंके प्रति पिताके समान हो। प्रजाके पुण्यका छठा भाग राजाको मिलता है, अत: न्यायसे प्रजाका पालन ही राजाके लिये सबसे बड़ा धर्म और दान है। अन्यायियोंसे ठीक रक्षा न कर सकनेके कारण प्रजाके पापोंका आधा भाग राजाको मिलता है, अत: उसे सदा सावधान रहना चाहिये। राजनीतिके अयोग्यों, नास्तिकोंके हाथमें जाते ही विद्वानोंके ही मुँह बन्द हो जाते हैं। शुक्राचार्यके पुत्र शण्डामर्क-जैसे योग्य विद्वान् भी हिरण्यकशिपु-जैसोंको ही ईश्वर बतलाने लगते हैं। वे किसी अयोग्य शासकको भी ‘त्वमर्कस्त्वं सोम:’ (&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/shivbhujngm/&quot;&gt;शिव&lt;/a&gt;महिम्न०) कहने लगते हैं। शासकोंसे भयभीत विद्वान् स्पष्ट सत्य कहनेमें हिचकने लगते हैं। आचार्य, साधु-सन्त भी या तो चुप साध लेते हैं या सरकारी साधु-समाजमें प्रविष्ट होकर ईश्वर-गुणगानके बदले सरकारका गुणगान करने लगते हैं। गोहत्या, धर्म-हत्या, शास्त्रहत्या-जैसे जघन्य कृत्योंको होते देखकर भी वे मौन रह जाते हैं और इन सबके प्रवर्तक, प्रेरक सरकारका गुणगान करते हैं। रावणकी मायासे बने अनेकों हनुमान् देखकर जैसे बन्दर भ्रममें पड़ गये कि इनमेंसे कौन रामके हनुमान् हैं, कौन रावणके हनुमान्, उसी तरह जनता भी भ्रममें पड़ जाती है कि कौन रामके साधु-सन्त हैं और कौन सरकारी साधु-सन्त? शास्त्र एवं धर्मके नियन्त्रणशून्य उच्छृंखल शासक जनताके धर्मके साथ धनका भी अपहरण कर लेते हैं। राष्ट्रियकरण, समाजीकरण आदि नामोंसे जनताकी व्यक्तिगत भूमि-सम्पत्ति आदि छीन लेते हैं। जनताके व्यक्ति शासनयन्त्रके नगण्य पुर्जे बन जाते हैं। शासन-यन्त्र तानाशाह शासकोंके हाथका खिलौना बन जाता है। उच्छृंखल शासकोंकी इच्छा ही कानून-कायदा बन जाती है। सनातन सत्य, न्याय, विवेक, शास्त्र-सब लुप्त हो जाते हैं। धनहीन होनेके कारण जनतामें ऐसे शासनके विरोधकी भी शक्ति नहीं रह जाती। आजके सरकारी साधुसमाजका यह प्रस्ताव कि ‘साधु-समाज गोहत्याबन्दी आन्दोलनका समर्थन नहीं कर सकता; क्योंकि वह ऐसे अपराधी साधुओंद्वारा चलाया गया है, जिनसे साधु-समाजकी सत्ताको बहुत ठेस पहुँची है’ आँख खोल देनेवाला है। विश्वनाथमन्दिर-हरिजनप्रवेश, हिन्दू-विवाह, तलाक आदि प्रश्नोंपर सरकारी साधुओं एवं सरकारी पण्डितोंका चुप रहना भी एक विचित्र बात है। आचार्य कहे जानेवाले लोगोंकी भीषण निद्रा या जान-बूझकर आँख मीचनेकी बात भी इसी ओर संकेत करती है कि राजनीतिक विप्लुत होनेके बाद सब विद्याएँ व्यर्थ हो जाती हैं।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt; और रामराज्य, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>शासनविधान</category><category>शास्त्रीय</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>14. उपसंहार - 14.1 भारतीय राजनीतिक दर्शन ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/14-upsnhaar-14-1-bhaartiiy-raajniiti/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/14-upsnhaar-14-1-bhaartiiy-raajniiti/</guid><description>पाश्चात्य देशोंमें दर्शन एवं शास्त्र शब्द बड़ा ही सस्ता बन गया है। किसी भी विचारको, जैसे गर्भशास्त्र, प्राणिशास्त्र, मार्क्सदर्शन आदिकी वे शास्त्र संज्ञा देते हैं। किंतु विश्वविख्यात भारतीय विद्वानोंन…</description><pubDate>Sat, 19 Jul 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;पाश्चात्य देशोंमें &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-paashcaaty-drshn-1-1-drshnkii/&quot;&gt;दर्शन&lt;/a&gt; एवं शास्त्र शब्द बड़ा ही सस्ता बन गया है। किसी भी विचारको, जैसे गर्भशास्त्र, प्राणिशास्त्र, मार्क्सदर्शन आदिकी वे शास्त्र संज्ञा देते हैं। किंतु विश्वविख्यात भारतीय विद्वानोंने तो शास्त्र शब्दका प्रयोग मुख्य रूपसे अनादि अपौरुषेय &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;में ही किया है। उन्हींमें प्रत्यक्षानुमानसे अनधिगत धर्म, ब्रह्मादि तत्त्वबोधन क्षमता है—‘प्रत्यक्षेणानुमित्या वा यस्तूपायो न बुध्यते। एनं विदन्ति वेदेन तस्माद् वेदस्य वेदता॥’‘शास्त्रयोनित्वात्’ (ब्र० सू० १।१।३)-में शास्त्र शब्दका ऋग्वेदादि अर्थ ही उक्त है। जैसे रूप आदिके सम्बन्धमें चक्षु आदि स्वतन्त्र प्रमाण हैं, वैसे ही धर्म, ब्रह्म आदि अतीन्द्रिय-अचिन्त्य विषयोंमें स्वतन्त्ररूपसे अषौरुषेय वेद ही प्रमाण हैं। अन्य तदाश्रित तदुपबृंहित आर्ष धर्मग्रन्थोंमें तो प्रत्यक्षानुमानागमादि मूलकत्वेनैव प्रामाण्य है। अतएव शास्त्रत्व भी वेदमूलक होनेसे ही उनमें सिद्ध होता है। प्रमाण, प्रमेय, साधन फलका प्रामाणिक निर्देश दर्शनका स्वरूप होता है। औत्सुक्यनिवृत्ति-जिज्ञासोपशान्तिमात्र पाश्चात्य दर्शनोंका उद्देश्य है। तद्भिन्नपरस्पराविरोधेन धर्म, अर्थ, काम, मोक्षकी प्राप्ति एवं अव्यभिचरित तत्साधनोंका सम्यक् ज्ञान भारतीय दर्शनोंका उद्देश्य है। आजकलके कुछ समालोचकोंका कहना है कि ‘पाश्चात्य देशोंके राजनीतिक दर्शन हैं, किंतु भारतमें कोई राजनीतिक दर्शन नहीं है। कारण, पाश्चात्य देशोंके विद्वान् राजनीतिक एवं दार्शनिक दोनों ही थे; किंतु भारतके राजनीतिज्ञ दार्शनिक नहीं थे।’ परंतु उनका यह कहना सर्वथा निराधार है। सबसे पहली बात तो यह है कि सर्वदर्शनोंका शिरोमणि वेदान्त है। वेदोंमें वेदान्त भी है, राजनीति भी है। मनु, याज्ञवल्क्यादि धर्मशास्त्रोंमें दर्शन भी है, राजनीति भी है। व्यास सबसे बड़े दार्शनिक और सबसे बड़े राजनीतिज्ञ हैं। वेदान्तदर्शनके रचयिता व्यास ही महाभारतके रचयिता हैं। महाभारतका मोक्षधर्म, गीताका दर्शन और शान्तिपर्वका राजधर्म पढ़ें तो उक्त मत सर्वथा निर्मूल सिद्ध हो जायगा। बृहस्पति, कणिक, कौटल्य, कामन्दक आदि सभी राजनीतिक दार्शनिक थे। योगवासिष्ठके वसिष्ठ महादार्शनिक एवं महाराजनीतिज्ञ थे। सूर्यवंशकी राजनीतिके वे ही कर्णधार थे। वस्तुस्थिति यह है कि पदवाक्यप्रमाणपारावारीण विद्वान् शब्द-शुद्धि आदिका कार्य पाणिन्यादि व्याकरणसे चलाते हैं, वाक्यार्थ-निर्णयके लिये पूर्वोत्तर-मीमांसाका उपयोग करते हैं, अनुमान आदिके सम्बन्धमें न्याय-वैशेषिकका उपयोग करते हैं तथा वे ही तत्त्व-संख्यान, चित्त-निरोध आदिमें सांख्य एवं योगका उपयोग कर लेते हैं। वे अगतार्थ अपूर्व वस्तुका ही प्रतिपादन करते हैं। पाश्चात्य लोग गतार्थ वस्तुओंका भी निरूपण करके स्वतन्त्र दार्शनिक बननेकी चेष्टा करते हैं। राजनीतिक शास्त्र या दर्शनका कार्य राजाओं, शासकों एवं तत्पालित भूखण्ड या अखण्ड भूमण्डल या प्रपंचमण्डलके प्राणियोंके लिये ऐहिक आमुष्मिक अभ्युदय एवं परम नि:श्रेयस-प्राप्तिका प्रशस्त मार्ग और अनुष्ठान-सुविधा-प्रत्युपस्थापन करना है। तत्प्रबोधक अपौरुषेय वेद एवं तन्मूलक आर्षग्रन्थ—मनु, नारद, शुक्र, बृहस्पति, अग्नि-मत्स्य-विष्णुधर्मादि पुराण, रामायण, महाभारत आदि राजनीतिक शास्त्र या दर्शन हैं। इस शास्त्रके अभिमत प्रत्यक्ष, अनुमान, आगम, उपमान, अर्थापत्ति, अनुपलब्धि—ये छ: प्रमाण हैं। मूलरूपमें सत्य-अनृत, चेतन-अचेतन दो ही तत्त्व हैं। चेतनमें भी ब्रह्म, ईश्वर, जीव—तीन भेद हैं। अचेतनमें प्रकृति, महान्, अहंकार, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी, श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना, घ्राण—पंच ज्ञानेन्द्रियाँ; वाक्, पाणि, पाद, पायु, उपस्थ—पंच कर्मेन्द्रियाँ; प्राण, अपान, उदान, व्यान, समान—पंचप्राण; मनोबुद्धिचित्ताद्यात्मक अन्त:करण—ये २४ भेद हैं। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—चतुर्वर्ग-प्राप्ति फल है। आचार्यपरम्परासे पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र तथा षडंग वेदों एवं अन्य आर्षग्रन्थोंके आधारसे कर्तव्याकर्तव्य-ज्ञानपूर्वक कर्तव्यपालन, अकर्तव्य-परिवर्जनसे धर्मकी प्राप्ति होती है। धर्माविरुद्ध अर्थशास्त्रोक्त उद्योगपरायण होनेसे अर्थकी प्राप्ति होती है, धर्मार्थाविरुद्ध कामशास्त्रोक्त मार्गसे शब्दादि साधनसामग्रीद्वारा काम-प्राप्ति होती है। औपनिषद परब्रह्मके तत्त्वविज्ञानसे मोक्षकी प्राप्ति होती है। आन्वीक्षिकी, न्यायोपबृंहित वेदान्तविद्या—ब्रह्मविद्या, त्रयी वेदोक्त धर्मविद्या, वार्त्ता, अर्थविद्या आदि सर्वपुुरुषार्थोपयोगिनी विद्याओंका रक्षण एकमात्र राजनीतिसे ही सम्भव होता है। उसके बिना सभी विद्याएँ नष्ट हो जाती हैं। राजनीतिकी स्वरूपभूता दण्डनीतिके विप्लुत होनेसे सभी विद्याएँ विप्लुत हो जाती हैं। ‘आन्वीक्षिकी त्रयी वार्ता सतीर्विद्या: प्रचक्षते। सत्योऽपि हि न सत्यस्ता दण्डनीतेस्तु विभ्रमे।’ (कामं० नी० २।८) ‘मज्जेत् त्रयी दण्डनीतौ हतायाम्।’ (महा० शा० ६३।२८)। आर्यमर्यादाकी रक्षा, वर्णाश्रम-व्यवस्था तथा त्रयीके प्रोत्साहनसे लोकप्रसाद होता है; अन्यथा लोकावसाद होता है। ‘व्यवस्थितार्यमर्याद: कृतवर्णाश्रमस्थिति:। त्रय्या हि रक्षितो लोक: प्रसीदति न सीदति॥’ (कौटलीय अर्थशास्त्र) देहेन्द्रिय मनबुद्धि आदिसे भिन्न परलोकगामी कर्त्ता भोक्ता, आत्मा तथा परलोकमें विश्वासके अनन्तर ही धर्ममें प्रवृत्ति होती है। कर्तृत्व-भोक्तृत्वशून्य, अच्छेद्य, अभेद्य, अदाह्य, अक्लेद्य, अशोष्य, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, ब्रह्मात्मविज्ञानसे परम कैवल्य-मोक्ष तथा जीवन्मुक्ति प्राप्त होती है तथा निस्सन्देह एवं निर्भय होकर समष्टि विश्वहितसाधनार्थ राजनीतिक सन्धि-विग्रहादिमें सफल प्रवृत्ति हो सकती है। इसीलिये गीतामें ‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि’ आदिसे नित्य, शुद्ध, बुद्ध, आत्मस्वरूपका वर्णन है और राजर्षियोंको इस ब्रह्मविद्याका वेत्ता-वेदयिता बतलाया गया है। विश्व, विराट्, तैजस, हिरण्यगर्भ, प्राज्ञ, ईश्वर, कूटस्थ, ब्रह्मरूप व्यष्टिसमष्टिके अभेद-बोधसे ही आत्महित एवं विश्वहितमें एकता होती है। व्यष्टि-अभिमानरूप संकीर्णताको बाधित करने तथा समष्टि-अभिमान उपोद्वलित होनेसे ही ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ का भाव उदित होता है। आत्मीयताके अभिमानके परिपाकसे आत्मत्वाभिमान या समष्टिमें अहंग्रहोपासना सम्पन्न होती है। व्यष्टि-समष्टि, स्थूल-सूक्ष्म कारणकी अभेदभावना उपासना-कोटिमें परिगणित है। कूटस्थ ब्रह्मकी अभेदभावना तत्त्वसाक्षात्कार-पर्यवसायिनी ही होती है। व्यवहारदशामें भी इन भावनाओंके फलस्वरूप कुल, गोत्र, जाति, ग्राम, नगर, राष्ट्र, विश्व आदि समष्टि जगत‍्के सम्बन्धमें आत्मीय हित तथा आत्महितके समान ही हिताचरण एवं अहितनिवारणार्थ निरासंग प्रवृत्ति होती है।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt; और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अरस्तूराजनीति</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>धर्मसम्राट</category><category>भारतीयदर्शन</category><category>मार्क्सवाद</category><category>राजनीतिक-विचारधारा</category><category>शासनशक्ति</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>13. मार्क्स और ईश्वर - 13.1 ईश्वरके सम्बन्धमें भारतीय दर्शनोंके आधारपर मार्क्सवादियोंके विचार ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/13-maarks-aur-iishvr-13-1-iishvrk/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/13-maarks-aur-iishvr-13-1-iishvrk/</guid><description>13. मार्क्स और ईश्वर मार्क्सवादी विद्वान् धर्मके समान ही ईश्वरको भी अनावश्यक समझते हैं। उनकी दृष्टिमें ‘भीरुता या भ्रान्तिके कारण कल्पनाप्रसूत भूत-प्रेत ही सभ्यताके साबुनसे धुलते-धुलते देवता बन गय…</description><pubDate>Fri, 18 Jul 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h2&gt;13. मार्क्स और ईश्वर&lt;/h2&gt;
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&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt;ी विद्वान् धर्मके समान ही ईश्वरको भी अनावश्यक समझते हैं। उनकी दृष्टिमें ‘भीरुता या भ्रान्तिके कारण कल्पनाप्रसूत भूत-प्रेत ही सभ्यताके साबुनसे धुलते-धुलते देवता बन गया और फिर वह कल्पित देवता ही विज्ञानकी चमत्कृतिसे चमत्कृत होकर ईश्वर या निर्गुण ब्रह्म बन गया। ईश्वर या ब्रह्म न तो कोई वास्तविक वस्तु है, न उसकी आवश्यकता ही है। ईश्वरकी कल्पनासे लाभके बदले हानि अधिक हो सकती है। कारण, ईश्वरीय शास्त्र या ईश्वरीय नियमका नाम लेकर अन्धविश्वासी लोग प्रगतिके मार्गमें बार-बार रोड़ा अटकाते रहते हैं।’ एक कम्युनिस्टका कहना है कि ‘जो ईश्वर या धर्मको मानते हुए भी मार्क्सकी अर्थनीति कार्यान्वित करनेकी बात करता है या तो वह धूर्त मक्‍कार है अथवा महामूर्ख। ईश्वर दिखावटी हुंडी नहीं है। ईश्वर माना जायगा तो उसके नियम भी मानने पड़ेंगे। फिर व्यक्तिगत भूमि-सम्पत्ति आदिका राष्ट्रीकरण भी ईश्वरीय नियमके विरुद्ध ठहरेगा।’ परंतु ईश्वर यदि वस्तु है तो किसीके चाहने या न चाहनेसे उसका कुछ भी बिगड़ नहीं सकता। भले ही चमगादड़ोंको सूर्यका प्रखर प्रकाश असत्, अनावश्यक एवं हानिकारक प्रतीत होता हो, परंतु एतावता सूर्य असत्, अनावश्यक एवं हानिकारक नहीं सिद्ध होते। वैसे किसीको ईश्वर भी भले ही असत् अनावश्यक एवं हानिकारक प्रतीत हो, फिर भी उसकी प्रचण्ड सत्ताका अपलाप होना असम्भव है। वस्तुत: सूर्यनारायणसे भी अधिक सूर्य एवं चन्द्रका भी भासक ईश्वर एक स्वत:सिद्ध सर्वमान्य वस्तु है। यह बात आधुनिक अन्वेषण, न्याय-सांख्य-&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;ान्त-&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-paashcaaty-drshn-1-1-drshnkii/&quot;&gt;दर्शन&lt;/a&gt;, आस्तिक सिद्धान्तों तथा आस्तिक वादोंसे स्पष्ट सिद्ध है। धर्म एवं ईश्वर परम सत्य वस्तु है, इसीलिये सर्वकाल एवं सर्वदेशमें इसकी मान्यता रही है। कहा जाता है कि द्वितीय युद्धके प्रसंगमें अमेरिका एवं अफ्रीकाके कई ऐसे प्रदेशोंमें वैज्ञानिकोंने अनुसंधान किया तो वहाँ यही पता चला कि वहाँके जंगली लोगोंमें धर्म एवं ईश्वरके सम्बन्धमें किसी प्रकारकी धारणा नहीं है, परंतु ठीक इसके विपरीत यह भी कहा जाता है कि जब उन प्रदेशोंमें जाकर कई आस्तिकोंने वहाँके लोगोंसे बात की तो पता चला कि वे लोग आसमानी पिता एवं स्वर्गीय लोकपर विश्वास रखते हैं; परंतु विदेशी सभ्य कहे जानेवाले लोगोंकी पहले तो वे बात ही नहीं समझते और समझनेपर भी डरकर अपना भाव नहीं व्यक्त कर सकते। प्रोफेसर मैक्समूलरके अनुसार पादरी डॉक्टर कौल, जुलूजातिके मध्यमें बहुत दिनोंतक रहे। जब वे उनकी भाषा भली प्रकार बोलने और समझने लगे तो उन्हें मालूम पड़ा कि जुलूजातिमें भी धर्म है। उनके विश्वासानुसार प्रत्येक घरानेका एक पूर्वज था और फिर समस्त मानवजातिका भी एक पूर्वज था, जिसका नाम उन्होंने ‘उनकुलंकुलू’ (प्रपितामह) रखा है। जब उनसे पूछा गया कि उनकुलंकुलूका पिता कौन है? तो उन्होंने उत्तर दिया कि वह बाँससे निकला था। जुलूभाषामें बाँसको उथलंग कहते हैं। बाप संतानका उथलंग कहलाता है। जैसे बाँससे कुल्ले फूटते हैं, उसी प्रकार बापसे संतानकी उत्पत्ति होती है। डॉक्टर कौलसे एक जुलूने कहा कि यह ठीक नहीं कि स्वर्गीय राजाको हमने गोरे आदमियोंसे सुना है। गर्मियोंमें जब बादल गरजते हैं, तो हम कहते हैं—राजा (ईश्वर) खेल रहा है। एक बुड्ढेने कहा कि ‘हम बचपनमें यही सुना करते थे कि राजा ऊपर है, हम उसका नाम नहीं जानते। संसारको पैदा करनेवाला उम्दबूको (राजा) है, जो कि ऊपर है।’ एक बुड्ढीने कहा कि जिसने सब संसार बनाया, उसीने अन्न भी बनाया। ‘ईश्वर कहाँ है?’ यह पूछनेपर वृद्धलोग कहते हैं कि वह स्वर्गमें है, राजाओंका भी राजा है। मैडम ब्लेवैट्स्कीका कहना है कि ‘जिस प्रकार मछली पानीके बाहर नहीं रह सकती, उसी प्रकार साधारण मनुष्य भी किसी प्रकारके धर्मके बाहर नहीं रह सकता।’ संसारमें चेतन-अचेतन दो प्रकारके पदार्थ मिलते हैं, उनमें अचेतनसे चेतन प्रबल होता है। एक चींटी बड़े-बड़े मिट्टीके चट्टानोंको काट देती है। छोटे-छोटे कीड़े पहाड़ोंको तोड़ देते हैं। छोटा पक्षी बड़े-से-बड़े वृक्षोंको हिला देता है। वस्तुत: जहाँ चेतनता है, वहीं बल होता है। जड वस्तुएँ निर्बल होती हैं। घोड़ा गाड़ी खींचता है, गाड़ीकी अपेक्षा घोड़ा बलवान् है। जडशरीर भी चेतनके सहारे चलता है। मरे हुए हाथीसे जीवित चींटी भी बलवान् है। चेतनोंमें भी मनुष्यकी शक्ति बहुत ही प्रबल है। एक शिशु भी हाथीका नियन्त्रण करता है। सिंह-जैसा क्रूर जन्तु भी मनुष्यकी इच्छाका अनुसरण करता है। जल, वायु, बिजली आदि भूतोंपर मनुष्यका अधिकार है। रेल, तार, वायुयान आदि मनुष्यशक्तिके ही परिचायक हैं। मनुष्य सृष्टिमें भी रद्दोबदल करता रहता है। वह समुद्रको पारकर, पहाड़-जंगलको काटकर शहर बसा देता है, नदियोंपर बड़े-बड़े पुल बाँध देता है, उनके प्रवाहको बदल देता है, स्थलोंमें जल एवं जलमें स्थल बना देता है। फिर भी विचित्र सृष्टिमें कितने ही प्राणी मनुष्यसे भी कहीं अधिक बलवान् होते हैं। गृध्रकी दृष्टि और हिरणोंके दौड़के सामने मनुष्यकी शक्ति कमजोर है। बड़े-बड़े वैज्ञानिक, बलवान्, बुद्धिमान् भी महाशक्तिमान् सर्वज्ञके सामने कुछ नहीं हैं। बड़े-बड़े बलवान् अन्तमें अपने-आपको प्राकृतिक शक्तियोंके सामने नगण्य पाते हैं। वस्तुत: निश्चयके आधारपर आशा होती है और आशाके आधारपर ही प्राणीकी प्रवृत्ति होती है। कहा जाता है, ‘जियोलॉजी (भूगर्भशास्त्र)-ने पता लगाया है कि अमुक चट्टानें किस प्रकार और कब बनीं? हिमालय-जैसा महान् पर्वत भी कभी-न-कभी उत्पन्न हुआ है। एक-एक वस्तु दूसरेकी अपेक्षा नयी है। वृक्षका फूल पत्तेसे नया है। पत्ता भी जड़से नया और जड़ भी उस मिट्टीकी अपेक्षा नयी है, जिसपर जड़ उत्पन्न हुई। कहा जाता है ‘पृथ्वी’ एक आगका गोला थी। जैसे अंगारोंपर ठण्डा होनेके समय सिकुड़न पड़ जाती है, उसी प्रकार पृथ्वीका गोला जब ठण्डा होने लगा तो उसमें सिकुड़न पड़ गयी। ऊँचे स्थान पहाड़ हो गये, नीचे समुद्र बन गये। बहुत पदार्थोंकी उत्पत्ति हम देखते हैं। बहुतोंका हम विश्लेषण कर सकते हैं। वे इन्द्रियाँ जिनसे ज्ञान प्राप्त किया जाता है और वे पदार्थ जिनका ज्ञान प्राप्त किया जाता है, दोनों ही कार्य हैं। जिन-जिन वस्तुओंका विश्लेषण हो सकता है; वह कार्य समझा जाता है। जिनका विश्लेषण या विभाजन नहीं हो सकता, वे ही परमाणु हैं। आजकल यद्यपि कहा जाता है कि परमाणुका विभाजन वैज्ञानिक कर लेते हैं। परंतु जब परमाणुकी यही परिभाषा है, तब तो जिसका विश्लेषण हो सकता है, वह परमाणु है ही नहीं। जो लोग परमाणु न मानकर केवल शक्ति ही मानते हैं, उन्हें भी तो मानना ही पड़ेगा कि शक्ति कभी वर्तमान जगत‍्के रूपमें परिणत हुई है। चाहे परमाणुओंसे, चाहे शक्तिसे, चाहे प्रकृतिसे, चाहे ब्रह्मसे जगत‍्की सृष्टि हुई और उस सृष्टिमें क्रम भी मान्य होने चाहिये। यह नहीं कि पहले फल हुआ फिर फूल हुआ। मालीको यह नियम मालूम होता है कि पहले अंकुर, फिर नाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पल्लव, पुष्प, फलका आविर्भाव होता है। इसी तरह निम्बके बीज एवं आमकी गुठलीसे तथा अन्यान्य विभिन्न बीजोंसे विभिन्न ढंगके अंकुरादि उत्पन्न होते हैं। निम्बका बीज बोनेसे आमका फल नहीं लगता, यह नियम भी लोगोंको ज्ञात है। इसी तरह गेहूँ बोनेसे चनेकी उत्पत्ति नहीं होती। मनुष्य तथा प्राणियोंकी भी वृद्धिका नियम है शैशव, यौवन, वार्धक्य अवस्थाएँ क्रमेण आती हैं। चिकित्सक चिकित्सालयोंमें शारीरिक नियमोंके आधारपर ही चिकित्सा करते हैं। पहाड़ एवं पहाड़ी नदियोंका निर्माण कैसे होता है, इनका किस ओर क्यों प्रवाह है, आदिके सम्बन्धमें भूगर्भके विद्वानोंका भी भूगर्भ-सम्बन्धी नियम प्रसिद्ध है। मनोविज्ञानकी जटिलता और भी विलक्षण है। यद्यपि मनकी गति बड़ी विलक्षण होती है, फिर भी मनोविज्ञानके नियम हैं ही। इसी तरह सभी शास्त्रोंके नियम हैं। इस तरह सृष्टिकी नियमबद्धता दिखायी देती है। इन नियमोंका विधायक और पालक कोई मान्य होना चाहिये। नियमकी दृष्टिसे सृष्टिमें एकता है।’ हर एक नियमका प्रयोजन भी होता है। लड़कोंका प्रतिदिन एक साथ विद्यालयमें जानेका नियम व्यर्थ नहीं होता। प्रयोजन ही कार्यको सार्थक बनाता है। संसारकी सभी वस्तुओं एवं घटनाओंसे किसी विशेष प्रयोजनकी सूचना मिलती है। भले ही प्रयोजन समझमें न आये, परंतु है अवश्य। एक मशीनमें हजारों पुर्जे होते हैं, कोई छोटा, कोई बड़ा, कोई गोला, कोई टेढ़ा—इनमें परस्पर पर्याप्त भिन्नता है, परंतु बनानेवालेका उद्देश्य कार्यसिद्धि ही है। कपड़ा बुनना, आटा पीसना, पुस्तक छापना आदि इसी प्रयोजनसे प्रेरित होकर वैज्ञानिकोंने भिन्न-भिन्न पुर्जोंको बनाकर फिर सबको इस प्रकार मिलाया कि जिससे कार्यकी सिद्धि हो। पुर्जे न तो सब बराबर हैं, न एक-से हैं, न सबके साथ एक-से जुड़े हुए हैं। सब असमान होते हुए भी एक उद्देश्यपूर्तिके लिये जुड़े हुए हैं। उनमें बहुत-से कल-पुर्जे छोटे एवं भद्दे हैं। उनके स्थानपर अच्छे एवं सुन्दर पुर्जे हो सकते हैं, परंतु कल चलानेमें जिसका उपयोग नहीं, वह कितना भी सुन्दर हो, व्यर्थ ही है। इसी तरह जगत् एक महाप्रयोजनके लिये निर्मित है। इसकी छोटी-से-छोटी वस्तुएँ एवं घटनाएँ भी निष्प्रयोजन नहीं हैं। राबर्ट फ्लिप्सके अनुसार जिस मण्डलका हमारी पृथ्वी एक अवयवमात्र है, वह अति विशाल, विचित्र तथा नियमित है। जिन ग्रहों, उपग्रहोंसे इसका निर्माण है, उनका भी परिमाण बहुत विस्तृत है। हमारी पृथ्वी ही सूर्य-चन्द्र आदिसे इस प्रकार सम्बन्धित है कि बीज बोने, खेत काटनेके समयोंमें बाधा नहीं पड़ती। समुद्रके ज्वारभाटे कभी हमें धोखा नहीं देते। करोड़ों मण्डलोंमेंसे सूर्यमण्डल एक है। बहुत-से तो इससे असंख्यगुने बड़े हैं। फिर ये करोड़ों, अरबों सूर्य एवं तारागण जो आकाशमें बिखरे हैं, परस्पर एक-दूसरेसे ऐसे सम्बद्ध तथा गणितके गूढ़तम नियमोंके इतने अनुकूल हैं कि उनसे प्रत्येककी रक्षा होती है और प्रत्येक स्थानमें साम्य तथा सौन्दर्य दिखायी देता है। प्रत्येक ग्रह दूसरेके मार्गपर प्रभाव डालता है। प्रत्येक कोई-न-कोई ऐसा कार्य कर रहा है, जिसके बिना न केवल वही, किंतु समस्त मण्डल नष्ट हो सकता था। यह समस्त मण्डल बड़ी विलक्षणतासे बना हुआ है। जो घटनाएँ देखनेमें भयानक और विघ्नरूप प्रतीत होती हैं, वे वस्तुत: उसे नष्ट होनेसे रोकती एवं विश्वकी दृढ़ताका साधक होती हैं; क्योंकि वे परस्पर अपनी शक्तियोंका इस प्रकार व्यय करती हैं कि एक नियत समयमें उनमें सहयोग हो जाता है। यह सहयोग ही विशाल जगत‍्के विशाल प्रयोजनका परिचायक है। एक छोटा-सा पुष्प जहाँ मनुष्योंकी आँखोंको तृप्त करता है, उसकी सुगन्ध घ्राणोंको आनन्द देती है, वैद्य लोग उसका औषधमें भी प्रयोग करते हैं, चित्रकार उससे चित्रकारी सीखते हैं, रँगरेज रंग निकालते हैं, कवि काव्यमें उससे सहायता लेते हैं। भ्रमर उसका रसास्वादन करता है, शहदकी मक्खियाँ उससे शहद निकालती हैं, तितलियाँ उन फूलोंपर बैठकर अलग आनन्द लेती हैं। उसके बहुत-से ऐसे भी प्रयोजन हैं, जिन्हें मनुष्य नहीं जानता। इतना प्रयोजन सिद्ध करके भी वृक्षकी संततिरक्षाके लिये वह बीज उगाता है। यह एक छोटे-से फूलका कार्य है। इसी प्रकार संसारकी सभी वस्तुओंके अनेक विशाल प्रयोजन हैं। संसार कितना विशाल है? समुद्र, पहाड़, पृथ्वी तथा पृथ्वीसे बहुत बड़ा सूर्य और फिर करोड़ों सूर्य, अरबों तारे वेदान्तमतानुसार पृथ्वी, जल, तेज, वायु आकाशादि—सब उत्तरोत्तर एक-दूसरेसे दस-दस गुने बड़े हैं। फिर ऐसे अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड मायाके एक अंशमें हैं। वह माया भगवान‍्के एक अंशमें ऐसी प्रतीत होती है, जैसे महाकाशके एक प्रदेशमें बादलका छोटा-सा टुकड़ा। स्थूलताके साथ ही संसारमें सूक्ष्मताका भी अत्यन्त महत्त्व है। जो जल आज बर्फ या नीलमणिके रूपमें स्थूलरूपसे उपलब्ध हो रहा है, वही कभी बादल और उससे भी पहले सूर्यकी रश्मियोंमें था। सूर्य-रश्मिका वह नगण्य कण जिसे परमाणु कहा जा सकता है, उसका एक पाँचवाँ हिस्सा स्पर्शतन्मात्रा था। उसके अल्पांशमें वायु और वायुके अल्पांशमें प्राण, प्राणके अल्पांशमें मन और मनमें ब्रह्माण्ड था। फिर ब्रह्माण्डके भीतर अनन्तकोटि प्राणी और मन थे, उन मनोंमें फिर भी उसी तरह ब्रह्माण्डकी सत्ता थी। इस तरह एक सूक्ष्म वटबीज-कणिकामें महान् वटवृक्षका अस्तित्व और उस वटवृक्षमें अपरिगणित बीज-कणिका और उन कणिकाओंमें अनन्त वटवृक्षका अस्तित्व एक साधारण-सी बात जँचने लगती है। इसी तरह विश्वके छोटे-छोटे नियमोंको देखते हैं, तो नियमोंका समूह उसी ढंगसे एक विशाल नियम बन जाते हैं, जैसे छोटे-छोटे कणोंका समूह एक पहाड़। समुद्र भी जलकणोंका समुदाय ही है। यद्यपि मनुष्यकृत वस्तुओंमें भी बड़ी-बड़ी विलक्षणता दिखायी देती है। बड़े-बड़े विशालकाय पुल, दुर्ग, बाँध चकित कर देते हैं। विद्युत‍्के विचित्र चाकचिक्य चन्द्र-सूर्यसे होड़ करते हैं। वायुयानका चमत्कार भी कुछ ऐसा ही है। फिर भी यह सब स्वाभाविक ईश्वरीय वस्तुओंका एक छोटा-सा अनुकरणमात्र है। कितना भी बड़ा विशाल एवं नियमबद्ध संसार कार्य ही है, इसकी कभी-न-कभी सृष्टि हुई है, यह मानना पड़ता है। किसी भी कार्यके लिये उपादान, निमित्त एवं साधारण कारण अवश्य होते हैं। जैसे एक घटका मिट्टी उपादान, कुलाल निमित्त एवं देशकाल आदि साधारण कारण होते हैं। साधारण क्रिया भी छोटी-छोटी अनेक क्रियाओंका समुदाय ही होती है। एक घट-निर्माणरूप क्रियामें कितनी ही चेष्टाओंका समुदाय है। संसारके अनन्त क्रियाजालोंमें बहुत-सी क्रियाएँ मनुष्यकृत होती हैं, जैसे घट, पट, मठ आदिका बनाना, रोना, हँसना, चलना आदि। जब घटका निर्माण मनुष्यद्वारा प्रत्यक्ष देखते हैं, तो किसी भी घटको देखकर उसका निर्माता कोई मनुष्य होगा, यह अनुमान कर लिया जाता है। इसी तरह किसी भी कार्यको देखकर उसके कर्ताका अनुमान होना स्वाभाविक है। बहुत-से कार्य हैं, जिनका मनुष्यद्वारा निर्माण सम्भव नहीं, जैसे वृक्षका उगना, सूर्यका निकलना, भूकम्पका आना आदि। यह सभी क्रियाएँ हैं, इनका भी कोई कर्ता होना आवश्यक है। नास्तिक मेजका बनानेवाला बढ़ई तो अवश्य मानता है, परंतु वृक्षों, पहाड़ोंको बनानेवाला कर्ता आवश्यक नहीं मानता। लोटेका बनानेवाला ठठेरा जरूरी है, परंतु नदी, समुद्रके लिये कर्ता आवश्यक नहीं। संसारकी सभी क्रियाएँ दो ही प्रकारकी हैं। एक प्राणिकृत, दूसरी अप्राणिकृत। सिद्धकोटिकी वस्तुएँ दृष्टान्तकोटिमें आती हैं, साध्यकोटिकी नहीं। दृष्टान्त वही होता है, जो दोनों पक्षोंको मान्य होता है। सूर्य, चन्द्र, पर्वत, समुद्र, पृथ्वी आदि सावयव होनेसे कार्य हैं। आस्तिक कह सकता है कि जैसे मेज आदि कर्तासे निर्मित होते हैं, वैसे ही कार्य होनेसे सूर्य आदि भी किसी (ईश्वर) कर्तासे निर्मित हैं। यहाँ मेजका दृष्टान्त आस्तिक-नास्तिक दोनोंको ही मान्य है। नास्तिक कहता है कि चन्द्र, सूर्य, पृथ्वी आदिके कर्ता आवश्यक नहीं है, जैसे नदी बहनेके लिये कोई कर्ता आवश्यक नहीं होता, परंतु नास्तिकका दृष्टान्त सिद्धकोटिमें नहीं है, किंतु साध्यकोटिमें है। आस्तिकके लिये नदीका बहना, सूर्यका निकलना—दोनों ही एक कोटिमें हैं। जैसे सूर्य, चन्द्र आदिका उगना ईश्वरप्रेरणापूर्वक होता है, उसी तरह नदीका बहना भी ईश्वरकृत ही है। चार्वाकमतानुयायी कहते हैं कि ‘अविनाभावसम्बन्ध दुर्ज्ञेय होता है’ अत: अनुमानादि प्रमाण मान्य नहीं हैं। धूमादि ज्ञानके अनन्तर जो अग्न्यादिमें प्रवृत्ति होती है, वह प्रत्यक्षमूलक है अथवा भ्रान्तिसे ही समझनी चाहिये; क्योंकि जहाँ-जहाँ धूम होता है, वहाँ-वहाँ अग्नि होती है—यह जानना दुष्कर है; क्योंकि सर्वदेश, सर्वकालके धूम-वह्निका जिसे ज्ञान हो, वही ऐसी बात कह सकता है, परंतु किसी भी मनुष्यको सर्वदेशकालके धूम और वह्निका ज्ञान होता ही नहीं। फिर वह कैसे कह सकता है कि जहाँ-जहाँ धूम होता है, वहाँ-वहाँ वह्नि होता है। कतिपय स्थलमें तो यह देखा गया है कि जहाँ-जहाँ वह्नि है, वहाँ-वहाँ धूम होता है, पर अग्नितप्त लौहपिण्डमें व्यभिचार दिखनेसे व्यभिचार निश्चित हो जाता है। परंतु चार्वाकका यह कहना भी तभी सम्भव होता है, जबकि अनुमानादि प्रमाण मान्य हों; क्योंकि प्रत्यक्षसे भिन्न अनुमानादि प्रमाण नहीं हैं, यह कहना भी अज्ञ, संदिग्ध, विपर्यस्त तथा जिज्ञासुके प्रति ही उचित है। जिस किसीके प्रति वचनप्रयोगको पागलपनका ही परिणाम समझा जाता है। दूसरोंका अज्ञान, संशय, भ्रान्ति या जिज्ञासा दूसरेको प्रत्यक्ष प्रमाणसे कभी भी विदित नहीं हो सकती। अत: उनके वचनों, मुखाकृति या व्यवहारसे अन्यके संशय-अज्ञान आदिका अनुमानादिसे बोध होता है तथा अज्ञान-संशयादि मिटानेके लिये वचनप्रयोग सार्थक होता है। चार्वाक अंगनालिंगनजन्य सुखको पुरुषार्थ कहता है। इससे यह स्वीकार करना पड़ेगा कि सुख और स्त्रीगमनका अविनाभाव सम्बन्ध है। यदि स्त्रीगमन और सुखका अविनाभाव सम्बन्ध न हो तो उस सुखको पुरुषार्थ कैसे कहा जा सकता है? इसी प्रकार क्षुधा-निवृत्तिके लिये नियमत: भोजनमें प्रवृत्ति भी सिद्ध करती है कि प्राणी अनुमान-प्रमाण मानकर ही क्षुधा-निवृत्तिके लिये भोजन-निर्माणमें संलग्न होता है। उसी प्रकार कृषि, व्यापार आदि सभी कार्योंमें आनुमानिक कार्यकारणभावका निश्चय करके ही प्राणियोंकी प्रवृत्ति होती है। बिना अनुमान-प्रमाण अंगीकार किये आस्तिक, नास्तिक, चार्वाक ही क्या—पशुतककी भी कोई प्रवृत्ति नहीं हो सकती। पूर्वकी प्रवृत्तियोंसे लाभ देखकर, तादृश प्रवृत्तियोंसे लाभका अनुमान करके ही प्राणी प्रवृत्त होता है। अनुमान बिना माने प्रत्यक्ष भी व्यर्थ हो जाता है। अनुमानके आधारपर अप्राणिकृत कार्योंका भी कोई कर्ता अवश्य सिद्ध होता है। कारण, सिद्धकोटिके जितने भी दृष्टान्त हैं, सभी कर्तापूर्वक ही हैं। अत: जैसे प्राणिकृत क्रिया कर्तासे होती है, वैसे ही अप्राणिकृत क्रिया भी कर्तासे ही सिद्ध होती है। प्राणिकृत, अप्राणिकृत क्रियासे भिन्न कोई क्रिया है ही नहीं। यदि बिना घड़ीसाजके घड़ी नहीं बन सकती, बिना बढ़ईके मेज नहीं बन सकती तो यह भी मानना ही चाहिये कि बिना चेतनसत्ताके चन्द्र, सूर्य, पहाड़, नदियाँ आदि भी नहीं बन सकतीं। कई लोग ‘क्षित्यङ्कुरादिकं सकर्तृकं कार्यत्वाद् घटवत्’—पृथ्वी, वृक्ष आदि सकर्तृक हैं, कार्य होनेसे, घटादिके तुल्य—इस अनुमानमें शरीरजन्यत्वरूप उपाधि दोष बतलाते हैं। अर्थात् जहाँ-जहाँ शरीरजन्यता होती है, वहाँ-वहाँ सकर्तृकता होती है। घटादि शरीरजन्य हैं, अत: सकर्तृक हैं; परंतु कार्यत्व तो पृथ्वी-अंकुरादिमें भी होता है, पर वहाँ शरीरजन्यता नहीं है। साध्य-व्यापक, साधनाव्यापक धर्मको ही उपाधि कहा जाता है। इस तरह उनके मतानुसार कार्यत्वहेतु सोपाधिक होनेसे साध्यसिद्धिमें समर्थ नहीं होगा, परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि उपाधिके द्वारा या तो व्याप्ति-व्यभिचारका अनुमान होता है या पक्षमें उपाध्यभावसे साध्याभावका अनुमान होता है। तभी प्रकृत अनुमान दूषित समझा जाता है। इस तरह यहाँपर शरीराजन्यत्वरूप उपाध्यभावसे सकर्तृकत्वाभावका अनुमान करना पड़ेगा, परंतु उसमें शरीर विशेषण व्यर्थ होगा। जब अजन्यत्वमात्रसे सकर्तृकत्वाभाव सिद्ध होता है तो शरीर विशेषण व्यर्थ ही है। पृथ्वी, वृक्ष आदिमें शरीराजन्यता होनेपर भी अजन्यता नहीं है। अत: अजन्यता न होनेसे सकर्तृकत्वाभाव नहीं सिद्ध हो सकता। सुतरां कार्यत्वरूप हेतुसे पृथ्वी-वृक्षादिमें सकर्तृकत्वसिद्धि निर्बाध है। कई लोग पौर्वापर्यको ही कार्य-कारणभावके स्थानपर बिठलाते हैं। उनके अनुसार सदा पूर्वमें रहनेवाला कारण और सदा पश्चात् होनेवाला कार्य है; परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि अन्धकार सदा सूर्योदयके पूर्व होता है, तो भी अन्धकार सूर्योदयका कारण नहीं माना जाता, रविवारसे पूर्व सदा शनिवार रहता है, फिर भी वह रविवारका कारण नहीं होता। कार्य कारणसे पीछे होता है, इतना ही नहीं, किंतु कारणके द्वारा होता है। तर्कसंग्रहकारकी दृष्टिसे उपादानगोचरापरोक्ष ज्ञान, चिकीर्षा एवं कृतिवाला चेतन ही कर्ता होता है, जैसे घटका निमित्तकारण कुलाल है; वही घटका कर्ता है। उसे घटके उपादानकारण मृत्तिकाका अपरोक्षनिकटतम ज्ञान है, उसकी चिकीर्षा है, घटनिर्माणकी इच्छा है और उसमें घट बनानेका प्रयत्न है। बिना ज्ञानके इच्छा और बिना इच्छाके कृति नहीं हो सकती। इस तरह ‘जानाति इच्छति अथ करोति’ किसी चीजको प्राणी पहले जानता है, फिर इच्छा करता है और फिर तद्विषयक प्रयत्न करता है। इस तरह ज्ञान, इच्छा और कृति जहाँ होती है, वहीं कर्ता होता है। अत: भले ही घटसे मिट्टी गिरती हो, फिर भी वह मिट्टी गिरनेका कारण नहीं समझा जाता। प्रत्येक कार्यको कर्ताकी अपेक्षा होती है, ये नियम सभीके मस्तिष्कपर शासन करते हैं। अत: जहाँ किसी कार्यमें प्रत्यक्ष ज्ञान एवं इच्छाका सम्बन्ध नहीं दिखायी पड़ता, वहाँ प्राणी अदृष्ट इच्छाशक्तिकी कल्पना करता है। किसी पुल या किलाको देखकर प्राणी यह अवश्य सोचता है कि किसीने अपनी ज्ञानेच्छा तथा कृतिसे इसे बनाया है। इसी तरह एक प्रफुल्लित कमलको भी देखकर बुद्धिमान् अवश्य सोचता है कि यह इतनी सुन्दर वस्तु बिना किसीकी इच्छा-कृतिके कैसे सम्पन्न हो सकती है? बिना कारणके कोई कार्य नहीं होता, इस दृष्टिसे सृष्टिका भी कारण होना अनिवार्य है। अत: सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमेश्वरकी ज्ञानेच्छा-कृतिसे ही सृष्टिकी रचना उचित है। कई लोग सृष्टिको आकस्मिक कहते हैं, परंतु वस्तुत: बिना हेतुके कोई भी घटना कभी हो ही नहीं सकती। यदि विभिन्न शक्तियोंद्वारा होनेवाले कार्योंके आकस्मिक सम्बन्धमात्रको आकस्मिक कहा जाय, जैसा कि काकतालीय-न्याय कहलाता है (काकका वृक्षपर बैठना—काकके प्रयत्नका फल है, तालफलका पतन अपने कारणोंसे सम्पन्न हुआ, परंतु दोनोंका मेल आकस्मिक हो गया) तो इस पक्षमें निर्हेतुक कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होता, भले सृष्टिकी विभिन्न घटनाओंका मेल कभी आकस्मिक भी हो तो भी सृष्टिका कोई कार्य निर्हेतुक नहीं सिद्ध होता। वस्तुतस्तु मनसे भी अचिन्त्य रचनारूप संसारका निर्माण सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् चेतन कर्ताके बिना उपपन्न नहीं हो सकता और उस सर्वज्ञका कोई भी कार्य असम्बद्ध नहीं कहा जा सकता। कुछ लोग स्वयम्भू प्रकृति या उसके परमाणुओंसे ही विश्वका निर्माण मानते हैं, किंतु सर्वज्ञ ईश्वरकी ज्ञप्ति, इच्छा एवं कृतिके बिना प्रकृति या परमाणुसे संसारका निर्माण कैसे हो सकता है? बिना बुद्धिप्रबन्धके परमाणु अपने-आप इतने विलक्षण संसारको बना सकते हैं, इससे बढ़कर युक्तिशून्य कोई बात हो नहीं सकती। किसी नास्तिक पितासे जब आस्तिक पुत्रने कहा कि जो संसारको बनानेवाला है, वही परमेश्वर है। तो पिताने कहा कि परमाणुओंके अपने-आप ही एकत्रित हो जानेसे संसार बन जाता है। इसके लिये कोई सर्वज्ञ ईश्वर क्यों माना जाय? दूसरे दिन पुत्रने बहुत सुन्दर हस्ती, अश्व, शुक, पिक, मयूरोंके चित्र बनाकर उसके सामने कुछ विभिन्न रंगकी पेन्सिलें रख दीं। जब पिताने चित्रोंका निर्माता पूछा तो पुत्रने कहा कि इन्हीं पेन्सिलोंके परमाणु उड़-उड़कर कागजपर एकत्रित हो गये, उन्हींसे ये चित्र बन गये। पर पिताने इसे स्वीकार नहीं किया। तब पितासे पुत्रने कहा कि यदि परमाणुओंके उड़-उड़कर एकत्रित हो जानेपर ऐसे चित्र भी नहीं बन सकते तो चन्द्रमण्डल और सूर्यमण्डल, भूधर, सागर, मनुष्य, पशु आदि विलक्षण वस्तुएँ बुद्धिके सहयोगके बिना केवल परमाणुओंसे कैसे बन सकती हैं? अतएव ऐसे-ऐसे अनुमान ईश्वरसिद्धिमें उपस्थित किये जा सकते हैं। (१) संसारका व्यवस्थित रूप देखकर अनुमान किया जा सकता है कि जगत‍्की व्यवस्था प्रशास्तृपूर्विका है, व्यवस्था होनेके कारण, राज्य-व्यवस्थाके समान। (२) लोकोपकारी सूर्य-चन्द्रादिका निर्माण किसी विशिष्ट विज्ञानवान‍्के द्वारा ही हो सकता है। यद्यपि आजकल लोग सूर्य-चन्द्रादिको ईश्वरनिर्मित न मानकर स्वत:सिद्ध या प्रकृतिनिर्मित मानते हैं; परंतु यह असंगत है; क्योंकि दीपकादि बुद्धिमान् चेतनद्वारा ही बनाये जाते हैं। यह दृष्टान्त वादी-प्रतिवादी उभय-सम्मत है, परंतु कोई वस्तु स्वत:सिद्ध है—इसमें उभय-सम्मत कोई दृष्टान्त नहीं है; क्योंकि ईश्वरवादी सभी पदार्थोंको ईश्वरकर्तृक मानता है। प्रकृति भी जड होनेसे स्वतन्त्रकर्त्री नहीं हो सकती। अत: सूर्य, चन्द्र किसी विशिष्ट विज्ञानवान‍्के द्वारा निर्मित हैं, प्रकाश होनेके कारण, प्रदीपके समान। जैसे व्यवहारके लिये दीपक होता है, वैसे ही सूर्य-चन्द्रादि भी व्यवहारोपयोगी हैं। (३) सूर्य-चन्द्रकी विशिष्ट चेष्टा देखकर भी इसी तरह उनके नियन्ताका अनुमान होता है—‘सूर्य-चन्द्र नियन्तृपूर्वक हैं, विशिष्ट चेष्टावाले होनेके कारण, भृत्यादिके समान। जैसे भृत्यकी नियमित प्रवृत्ति होती है, वैसे सूर्य-चन्द्रादिकी भी नियमित प्रवृत्ति होती है।’ उपर्युक्त अनुमानसे यह स्पष्ट हो जाता है कि ईश्वरसे नियन्त्रित होनेके कारण ही सूर्य-चन्द्र स्वयं ईश्वर और स्वतन्त्र होते हुए भी उदयास्तमय एवं वृद्धि-क्षयसे युक्त होकर प्रकाशादि कार्यमें संलग्न रहते हैं। (४) पृथिवीके विधारकके रूपमें भी प्रयत्नवान् ईश्वरकी सिद्धि होती है। विवादास्पद पृथिवी प्रयत्नवान‍्के द्वारा विधृत है, सावयव, गुरु, संयुक्त होनेपर भी अस्फुटित, अपतित, अवियुक्त होनेके कारण, हस्तन्यस्त पाषाणादिके समान। यदि किसी चेतनसे धारण न हो तो उसमें पतन, स्फुटन होना अनिवार्य होता, बिना किसी धारकके कोई भी गुरु पदार्थ टिक नहीं सकता। परस्पराकर्षणसे भी स्थिति असम्भव है; क्योंकि स्थिति और ज्ञप्ति अन्योन्याश्रित नहीं होती। कहा जाता है, मानवी मस्तिष्ककी सहायताके बिना भी यदि कोई अंग्रेजी भाषाके अक्षरोंको उछालता रहे तो कभी शेक्सपीयरका नाटक निर्मित हो सकता है। यदि थोड़ी देरके लिये यह मान भी लिया जाय तो भी संसारके विलक्षण प्रबन्धका विधान बिना सर्वज्ञ बुद्धिके नहीं हो सकता। भले ही किन्हीं अक्षरोंको अनन्त बार उछालो, परंतु उनके द्वारा विचार व्यक्त हो सकना असम्भव ही है। विचार व्यक्त करनेकी बात तो दूर रही, सही-सही एक पंक्तिका भी निर्माण असम्भव है। फिर अक्षरोंको उछालनेवाला भी कोई चेतन ही होता है। फिर बिना चेतनके जड-परमाणुओंसे विश्वका निर्माण कहाँतक सम्भव है? फिर क्या आजकल कोई अक्षरोंको उछाल-उछालकर किसी छोटे-से ग्रन्थका भी निर्माण कर सका? संसारमें रोटी बनानेसे लेकर मकान, पुल, दुर्ग आदिका निर्माण बिना बुद्धिके अपने-आप ही ईंट, चूना, पत्थर, लोहा-लक्‍कड़ आदि कर लेते हों, यह नहीं देखा जाता। फिर अकस्मात् ही परमाणुओंके द्वारा संसारका निर्माण और अकस्मात् ही परमाणुओंका निष्क्रिय हो जाना या संसारका नष्ट हो जाना आदि कैसे संगत होगा? फिर यदि परमाणुके बिना सर्वज्ञ चेतनके प्रयत्नसे अपने-आप ही सूर्य, समुद्र, नदी, पर्वत बन सकते हैं, तब अन्य उपयोगके दुर्ग, पुल, गृहादिका निर्माण भी उसी तरह क्यों नहीं होता? तदर्थ मनुष्योंको प्रयत्न क्यों करना पड़ता है? यदि पहाड़ अकस्मात् बन सकता है, तब कोई पुल या किला अपने-आप क्यों नहीं बन सकता? स्वभाववादी स्वभावसे ही सृष्टिका निर्माण मानता है, परंतु स्वभाव यदि शक्तिशाली कोई चेतन है, तब तो नाममात्रका ही भेद हुआ। यदि सृष्टि-नियमसे ही संसारका निर्माण माना जाय तो वह भी ठीक नहीं; क्योंकि नियमके निर्माता प्रयोक्ता बिना नियम अकिंचित्कर ही होता है। भूगर्भतत्त्ववेत्ता पुरानी वस्तुओंको देखकर बुद्धिमानोंकी कारीगरीका अनुमान करते हैं। मोहन्जोदड़ो, हड़प्पाकी खुदाईमें मिलनेवाली वस्तुओंके आधारपर सभ्यताकी कल्पना की जाती है। यदि सब वस्तुएँ स्वभावसे ही बनती हैं, तब उन कल्पनाओंका कोई स्थान ही नहीं रह जाता। वस्तुत: किसी प्रकारके नियम ही सिद्ध करते हैं कि कोई समझदार पूर्वापरदर्शी बुद्धिमान् ही नियम बनाता है और वही नियामक भी है। नियामक बिना नियमोंका कुछ मूल्य भी नहीं होता। अत: नियमोंके रहते हुए भी ज्ञानयुक्त, उपयुक्त चुनावसे ही सुप्रबन्ध होता है। मिट्टी-जलादिसे घट बननेका नियम है सही, पर जबतक कोई कुम्भकार नियमोंके अनुसार कार्य नहीं करेगा, तबतक घट-निर्माण असम्भव ही है। धरणि, अनिल, जलके संयोगसे बीजोंके अंकुरित होनेका नियम है तथापि जबतक किसान उन नियमोंका प्रयोग करके काम नहीं करेगा, तबतक गेहूँ-यवादिकी उत्पत्ति नहीं हो सकती। पृथ्वीकी आकर्षणशक्ति भले ही प्रत्येक परमाणुपर शासन करती रहे तथापि सहयोग एवं सुदृढ़ताके साथ प्रबन्ध बिना उसका कोई भी सदुपयोग नहीं हो सकता। आस्तिकोंका कहना है कि जिसने हंसके अंगमें शुक्लरंगका निर्माण किया, शुकके अंगका हरा रंग बनाया, मयूरोंको चित्रित किया और फूलोंपर बैठनेवाली तितलियोंको चमकीली साड़ी बनाकर पहनाया—वही ईश्वर है। वही सबको वृत्ति देता है— येन शुक्लीकृता हंसा: शुकाश्च हरितीकृता:। मयूराश्चित्रिता येन स ते वृत्तिं विधास्यति॥ (हितोपदेश १।१७९) परंतु स्वभाववादियोंका कहना है कि— शिखिनश्चित्रयेत्को वा कोकिलान् क: प्रकूजयेत्। स्वभावव्यतिरेकेण विद्यते नात्र कारणम्॥ ‘मयूरोंको कौन चित्रित करता है? कोकिलोंको कौन मधुरालाप सिखाता है? जैसे अग्निमें उष्णता, जलमें शीतलता, वायुमें वहनशीलता स्वभावसे ही होती है, उसी तरह स्वभावसे ही शुक, हंसादिके रंग तथा मयूरादिका चित्रण होता है।’ परंतु यह कहना ठीक नहीं कि यदि परमाणुओंका स्वभाव सृष्टिरचना है, तब कभी सृष्टि-विघटन नहीं होना चाहिये। यदि कहा जाय कि किन्हींका स्वभाव मिलनेका है, किन्हींका विघटनका है, तो भी जैसे परमाणुओंका बाहुल्य होगा, तदनुकूल ही काम भी होगा, परंतु जगत‍्की उत्पत्ति, स्थिति एवं प्रलय भी यथासमय होता है। यह सब बिना सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमेश्वरके नहीं हो सकता। स्वभाव यदि असत् है, तो उसमें कार्यकरणक्षमता नहीं हो सकती। यदि सत् है तो भी चेतन है या अचेतन। यदि चेतन है तो नामान्तरसे ईश्वर ही हुआ। यदि अचेतन है तो उसमें भी विलक्षण कार्यकारिता नहीं हो सकती। अचेतन वस्तु स्वत: कोई कार्य नहीं कर सकती। यदि चेतनके सहारे कोई कार्य कर सके तो भी एक ही प्रकारका कार्य कर सकेगी। चेतनमें ही यह स्वतन्त्रता होती है कि वह कार्य करे, न करे, अन्यथा करे। कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं जो समर्थ होता है, वही कर्ता होता है। घड़ीकी सूई स्वयं नहीं चल सकती। जब चेतन घड़ीसाजके प्रयत्नसे सूई चलती है तो वैसे ही चलती रहती है। सूइयोंको यदि पीछे चलाना होता है तो फिर किसी मनुष्यकी अपेक्षा पड़ती है। घड़ी या सूई स्वयं आगे-पीछे चलने, न चलने, बन्द होने और फिर चल पड़नेमें स्वतन्त्र नहीं। संसारमें भिन्न-भिन्न स्वभावकी भिन्न-भिन्न वस्तुएँ हैं, परंतु वे सब अपने-आप स्वभावत: भिन्न पदार्थोंका निर्माण नहीं करते। अग्नि, लकड़ी, पानी, चीनी, आटा, घी, मिर्च आदि भिन्न-भिन्न पदार्थ भिन्न स्वभावके हैं। सब मिलकर स्वयं पक्वान्न नहीं बना सकते। वहाँ किसी चेतनकी अपेक्षा होती है। इसी तरह बिना किसी सर्वज्ञ चेतनके नारंगी, सन्तरे तथा आम्रका फल, गुलाबका मनोरम पुष्प अवश्य पंचभूतोंका ही परिणाम है। फिर भी अपने-आप पृथ्वी, जल, तेज मिलकर कई पुष्प या फलके रूपमें स्वयं परिणत हो जाते हों, यह न देखा ही जाता है, न सम्भव ही है। किंतु कोई कार्य प्राणियोंद्वारा सम्पन्न होते हैं तो कोई सर्वज्ञ चेतन ईश्वरके द्वारा। विज्ञानके अनुसार ‘स्वाभाविक शक्तियोंके द्वारा प्रपंच-निर्माणका आरम्भ या द्रव द्रव्यका गाढ़ा होकर पृथ्वी बनना आदि बिना किसी चेतनकी इच्छा और कृतिके सम्भव नहीं हो सकता।’ मान लिया, अग्नि और जल इंजिनमें पहुँचकर अद‍्भुत काम करने लगते हैं, परंतु इंजिन बनाकर उनमें डालकर भापद्वारा विभिन्न कार्य करनेका प्रबन्ध बिना चेतनके सम्पन्न नहीं होता। डार्विन, हक्सले, हैकल, लेमार्क आदिके विकाससम्बन्धी विचारपर इसके पहले पर्याप्त समालोचना हो चुकी है। आल्फ्रेड रसेलवालेस वैज्ञानिक डार्विनका एक मुख्य सहयोगी था। डार्विनके पश्चात् भी वह विकासवादका ही पोषक रहा। उसने अपने अर्ध शताब्दीके अन्वेषणके पश्चात् ‘दि वर्ल्ड ऑफ लाइफ’ पुस्तककी भूमिकामें लिखा है कि मैंने उन मौलिक नियमोंकी सरल तथा गम्भीर परीक्षा की है, जिनको डार्विनने अपने अधिकारके बाहर समझकर जान-बूझकर अपने ग्रन्थोंमें नहीं लिखा। जीवन क्या है, उसके कौन-कौन कारण हैं और विशेषकर जीवनमें वृद्धि और संतानोत्पत्तिकी जो विचित्र शक्तियाँ हैं, उनका क्या कारण है? मैं यह परिणाम निकालता हूँ कि इन पक्षियों, कीड़ोंके रंग आदिसे पहले तो एक उत्पादक शक्तिका परिचय होता है, जिसने प्रकृतिको इस प्रकार बनाया कि जिससे आश्चर्यजनक घटनाएँ सम्भव होती हैं। दूसरे एक संचालक बुद्धि भी मालूम पड़ती है, जो वृद्धिकी प्रत्येक अवस्थामें आवश्यक होती है। विकासवादी ग्रन्थोंसे भिन्न-भिन्न पौधों और कीट-पतंग आदिके शरीरोंकी बनावट, उनके स्वभाव, उनकी रीतियोंकी जानकारी होती है। डार्विनके पुत्र प्रोफेसर जार्ज डार्विनने १६ अगस्त सन् १९०५ में कहा था कि जीवनका रहस्य अब भी उतना ही निगूढ़ है, जितना कि पहले था। प्रो० पैट्रिक गेडीसने कहा है कि हम नहीं जानते कि मनुष्य कहाँसे आया, कैसे आया? यह मान लेना चाहिये कि मनुष्य-विकासके प्रमाण संदिग्ध हैं, साइंसमें उनके लिये कोई स्थान नहीं है। ९ जून १९०५ में विकासवादियोंके वाद-विवादके सम्बन्धमें ‘टाइम्स’ ने लिखा था कि ‘ऐसी गड़बड़ पहले कभी नहीं देखी गयी।’ तमाशा यह कि लोग अपनेको विज्ञानका प्रतिनिधि बताते हैं। यद्यपि कुछ लोग दो-एक बातमें सहमत थे; पर कोई एक बात भी ऐसी नहीं, जिसमें सब सहमत हों। विकासवादके सम्बन्धमें युद्ध करते हुए उन्होंने इसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। कुछ भी शेष नहीं रहा। केवल युद्धक्षेत्रमें कुछ टुकड़े इधर-उधर बिखरे पड़े हैं। मनुष्यकी बन्दरसे उत्पत्तिके सम्बन्धमें सर जे० डब्ल्यू० डौसन कहते हैं—‘बन्दर और मनुष्यके बीचकी आकृतिका विज्ञानको कुछ पता नहीं है। मनुष्यकी प्राचीनतम अस्थियाँ भी मनुष्यकी-सी हैं। इनसे उस विकासका कुछ भी पता नहीं लगता, जो मनुष्यशरीरके पहले हुआ है। प्रोफेसर औवेनका कहना है कि मनुष्य अपने प्रकारकी एकमात्र जाति है और अपनी जातिका एकमात्र प्रतिनिधि है। सिडनी कौलेटने अपनी पुस्तकमें लिखा है कि मनुष्य उन्नतिके बदले अवनतिकी ओर जा रहा है। सर जे० डब्ल्यू० डौसनने लिखा है कि ‘मनुष्यकी आदिम अवस्था सबसे उच्च थी।’ कुछ भी हो, साइंसके आधारपर एक सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् ईश्वरकी सत्ताका अपलाप नहीं हो सकता। संसारमें अनेक प्रकारके नियम उपलब्ध होते हैं। उन्हींका अनुसरण करके प्राणी अपना-अपना काम चलाते हैं। नियमोंका निर्माता एवं पालक ईश्वर है। अन्य प्राणी नियमोंके अनुचर हैं। जो वस्तुएँ बिना विज्ञानके ही नियमपराधीन हैं, परंतु चेतन उन नियमोंको चुनकर उनके अनुसार काम करता है। जैसे खेतीका नियम पालन करनेसे गेहूँ, जौ पैदा किया जा सकता है। वायुयान बनानेका नियम पालन करनेसे वायुयान बनाया जा सकता है; परंतु काष्ठादि नियमोंका चुनाव नहीं कर सकते। नियमोंका संचालन करनेवाली शक्ति ईश्वर ही है, उसका प्रभाव सृष्टिमें व्यापक है।’ नैयायिक, वैशेषिक आदि ईश्वरको निमित्तकारण मानते हैं, परंतु नैयायिक आदि तो जीवात्माओंको भी व्यापक ही मानते हैं। आधुनिक कुछ लोग शंका करते हैं कि निमित्तकारण या कर्ता किसी कार्यमें व्यापक नहीं रहता। घड़ीसाज घड़ीमें व्यापक नहीं होता, मकान बनानेवाला मकानमें और कोट-पतलून बनानेवाला दर्जी कोट-पतलूनमें भी व्यापक नहीं होता; फिर यदि परमात्मा संसारका निमित्तकारण है तो वह सम्पूर्ण कार्यमें कैसे व्यापक हो सकता है? उसका आधुनिक ढंगके लोग समाधान करते हैं कि लौकिक क्रियाओंका कुलाल आदि निमित्तकारण अवश्य हैं, परंतु वह एक हदतक ही हैं; जैसे घड़ीसाजने घड़ी अवश्य बनायी, परंतु लोहेके परमाणुओंको जोड़कर रखना घड़ीसाजके हाथकी बात नहीं है। उसका निमित्तकारण ईश्वर ही होता है। संसारमें व्यापक अणु-अणु, परमाणु-परमाणुकी जो क्रियाएँ हैं, वे बहुत सूक्ष्म हैं। वे व्यापक ईश्वरके बिना उत्पन्न नहीं हो सकतीं। अत: ईश्वरको व्यापक मानना उचित ही है, परंतु वेदान्ती तो ईश्वरको ही अभिन्ननिमित्तोपादानकारण मानते हैं। सचमुच निमित्तकारणका कार्यमें व्यापक होना तर्कसंगत नहीं है। यदि निमित्तत्व व्यापकताका प्रयोजक हो तो कुलालादिमें भी व्यापकता होनी ही चाहिये, परंतु यह दृष्टविरुद्ध है। भले ही परमाणु-संयोग आदिमें कुलाल, घड़ीसाज आदि निमित्तकारण न हों, फिर भी जिस कार्यमें जितने अंशमें जो निमित्तकारण हो, उतने अंशमें तो उसे उस कार्यमें व्यापक होना ही चाहिये। इसके अतिरिक्त निरवयव एवं व्यापकमें क्या हलचलरूप क्रिया सम्भव हो सकती है? यदि नहीं तो व्यापक ईश्वर किस तरह क्रियावान् हो सकेगा? इस दृष्टिसे वेदान्तीका ही मत श्रेष्ठ है। मायाशक्तिद्वारा ही सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमेश्वर माया, परिणाम-संकल्पके द्वारा ही विश्वका निर्माता होता है। वही तम:प्रधाना प्रकृतिसे विशिष्ट होकर उपादान कारण भी है, अत: व्यापक है। यह भी कहा जाता है कि यदि ईश्वर व्यापक न होता तो उसे सम्राट् आदिके समान अन्य सत्ताओंसे काम लेना पड़ता और जैसे सम्राट्का कर्मचारियोंके मस्तिष्कपर जब नियन्त्रण नहीं होता तो वे कभी गड़बड़ भी करते हैं, इसी तरह ईश्वरके कर्मचारी भी ईश्वरकी इच्छाके विरुद्ध कार्य कर सकते हैं; किंतु ऐसा होता नहीं, अत: ईश्वर व्यापक है। सबपर उसका नियन्त्रण है। सब कार्य उसकी इच्छाके अनुसार ही होते हैं। परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि ईश्वरकी सत्तासे भिन्न जीवोंद्वारा अनेक कार्य होते हैं। भले ही ईश्वर सर्वान्तर्यामी हैं; फिर भी जीवोंको अपने इच्छानुसार शुभाशुभ कर्म करनेकी स्वतन्त्रता है। तभी उन्हें अपने किये कर्मोंका फल भोगना पड़ता है। यदि जीव किसी अन्यके परवश होकर ही कर्म करते होते तो उन्हें उन कर्मोंका फल भोगनेके लिये बाध्य नहीं होना पड़ता। व्यापकताका मूल उपादानत्व ही है निमित्तत्व नहीं। जैसे मकड़ी जालाका उपादान और निमित्त दोनों ही कारण है, उसी तरह ईश्वर ही प्रपंच-सृष्टिका उपादान और निमित्त दोनों ही कारण है। कुछ लोग कहते हैं कि ‘वह ईश्वर निराकार ही हो सकता है, साकार नहीं। उनके अनुसार ‘जिसे आँखसे देख सकते हैं, हाथसे छू सकते हैं, वह साकार है, जो ऐसा नहीं, वह निराकार है।’ वे कहते हैं कि ‘सृष्टिमें दोनों प्रकारकी वस्तुएँ होती हैं, ‘द्वे वाव ब्रह्मणो रूपे मूर्तञ्चैवामूर्तञ्च’—सृष्टिके दो रूप हैं—एक साकार, दूसरा निराकार।’ परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि उपर्युक्त श्रुति यही कहती है कि ब्रह्मके दो रूप हैं। एक मूर्त अर्थात् साकार और दूसरा अमूर्त अर्थात् निराकार। कहा जाता है कि ‘यदि ईश्वर आकाशकी तरह निराकार है, तब तो वह व्यापक हो सकता है; किंतु यदि वह साकार (स्थूल) है तो सूक्ष्ममें कैसे व्यापक होगा? सर्वव्यापक न होनेसे सर्वकारण भी नहीं हो सकेगा। फिर ईश्वर ही नहीं सिद्ध हो सकेगा। ईश्वर साकार होता तो अवश्य दीखता। ईश्वरकी अति सूक्ष्म सत्ता हो, तभी उसका नियन्त्रण सूक्ष्म नियमोंपर हो सकता है।’ परंतु यह कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि जैसे जीव सूक्ष्म होते हुए भी आकार ग्रहणकर साकार हो जाता है, इसी तरह ईश्वर सूक्ष्म निराकार होते हुए भी मायासे दिव्य गुणसम्पन्न ज्योतिर्मय आकार बनाकर साकार हो सकता है। सूक्ष्मरूपसे सर्वकारण सर्वव्यापक होनेपर भी माया शक्तिसे ईश्वर साकार भी होता है। उसीका हिरण्मय, ज्योतिर्मय आदि रूप उपनिषदोंमें वर्णित है। ईश्वरका ज्योतिर्मय आकार होनेपर भी वह आकार दिव्य है। अत: सामान्य चर्मचक्षुको उसका दर्शन भले ही न हो, परंतु उपासना और तपस्याके द्वारा दिव्य दृष्टिसम्पन्न लोगोंको उसका दर्शन आज भी होता है और हो सकता है। विष्णु, &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/shivbhujngm/&quot;&gt;शिव&lt;/a&gt; आदि उसीके रूप हैं। जो ईश्वर अनन्त ब्रह्माण्डका निर्माण कर सकता है, अनन्त निराकार एवं सूक्ष्मजीवोंको अनन्त देह देकर साकार बना देता है, वह क्या अपने लिये दिव्य देहका निर्माण नहीं कर सकता? और साकार नहीं बन सकता? वस्तुत: जैसे निराकार अग्नि भी साकार हो सकती है, जैसे स्पर्शादिविहीन आकाश ही स्पर्शादियुक्त तेज-जलादिरूपमें प्रकट हो सकता है, वैसे ही निराकार परमेश्वर आकार ग्रहणकर साकार हो सकता है। सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् परमेश्वरकी मायाकृत साकारता होनेपर भी उसकी निराकारता, सूक्ष्मता, व्यापकता एवं सर्वकारणतामें कोई अन्तर नहीं आता।’ कहा जाता है, संसारमें जितनी साकार वस्तुएँ हैं, वे सब परमाणुओंके संयोगसे ही बनती हैं; किंतु यह बात केवल आरम्भवादमें ही है, परिणामवादके लिये यह आवश्यक नहीं। परिणामवादमें जैसे दुग्धका ही दधिभाव होता है, मृत्तिकाका घटभाव होता है, वैसे ही प्रकृतिका ही अन्यथाभाव परिणाम होता है। वहाँ तो यही कहा जा सकता है कि सूक्ष्म एवं व्यापक वस्तु ही स्थूल एवं व्याप्य भिन्न-भिन्न पदार्थोंके रूपमें परिणत होती है। विवर्तवादमें सूक्ष्मतम ब्रह्मका ही अतात्त्विक अन्यथाभावरूप विवर्त सम्पूर्ण प्रपंच है। किंतु किसी भी पक्षमें ईश्वरके साकार होनेमें कोई आपत्ति नहीं होती। सर्वसम्मतिसे जीवात्मा व्यापक हो या अणु, पर है निराकार ही। साकार रूप धारण करनेसे वह साकार होता है। यही बात ज्यों-की-त्यों ईश्वरके सम्बन्धमें भी कही जा सकती है। भेद इतना ही है कि जीव इन सब बातोंमें कर्मपरतन्त्र है, ईश्वर स्वतन्त्र है। साकार होनेका यह कदापि अर्थ नहीं कि कूटस्थ ईश्वर विकृत होकर अपनी निराकारता, सूक्ष्मता, व्यापकताको खोकर साकाररूपमें परिणत हो जाता है। इसीलिये भापका परमाणु बादल बन जाय या बादलका परमाणु जल बन जाय इत्यादि दृष्टान्तोंके लिये यहाँ कोई स्थान नहीं है। संसारमें विभिन्न वस्तुएँ विभिन्न शक्तिवाली होती हैं। चींटी, सिंह, हाथी, विभिन्न प्राणी भिन्न-भिन्न शक्ति रखते हैं। जो सबपर नियन्त्रण रखता है तथा सर्वशक्तिवाला है, वही ईश्वर है। भिन्न कारणोंमें अपने-अपने कार्योंके उत्पादनानुकूल शक्तियाँ होती हैं। ईश्वर सर्वकारण है, अत: उसमें सर्वकार्योत्पादनानुकूल शक्तियाँ हैं; इसीलिये वह सर्वशक्तिमान् है। बहुत लोग कुतर्क करते हैं कि यदि परमेश्वर सर्वशक्तिमान् है, तो क्या वह अपने आपको नष्ट कर सकता है? दूसरा ईश्वर बना सकता है? वेश्याको कुमारी बना सकता है? परंतु यह सर्वशक्तिमत्ताका अभिप्राय कदापि नहीं है। शक्ति शक्यमें ही होती है। स्वरूपके अविरुद्ध ही शक्तियाँ होती हैं। वह्निमें दाहिका शक्ति होती है; परंतु वह शक्ति काष्ठादि दाह्यका ही दहन करती है। अदाह्य आकाशादिका दहन नहीं कर सकती। इतनेपर भी अग्निके सर्वदाहकत्वमें कोई बाधा नहीं आती। इसी तरह यदि नित्यस्वरूपको नष्ट न कर सके तो इतनेसे ही ईश्वरके सर्वशक्तिमत्त्वमें बाधा नहीं पड़ सकती। इसी तरह नित्य अनाद्यनन्त सर्वशक्तिमान् अन्य ईश्वरका निर्माण भी अशक्य है। वेश्याको उस जन्ममें नहीं तो जन्मान्तरमें कुमारी बना ही सकता है। अद्वैत वेदान्तकी दृष्टिसे परमेश्वर सर्वप्रपंचका उपादानकारण है, अतएव वह सर्वशक्तिमान् है। उपादानकारणोंमें कार्यानुकूल शक्तियाँ होती हैं। मृत्तिकामें घटोत्पादनानुकूल शक्ति, तन्तुमें पटोत्पादनानुकूल शक्ति, दुग्धमें नवनीतोत्पादनानुकूल शक्ति होती है—इस दृष्टिसे सर्वकारणमें सर्वोत्पादनानुकूल शक्ति होती है। जो वस्तु प्रमाणसिद्ध है, उसीके उत्पादनानुकूल शक्ति कारणमें हो सकती है। खपुष्प, शशशृंग आदि असत्पदार्थ प्रमाणसिद्ध ही नहीं हैं, अत: तदुत्पादनानुकूल शक्तिकी कल्पना ईश्वरमें नहीं की जा सकती। सर्वकारण एवं सर्वाधिष्ठान होनेके कारण चेतन ब्रह्म ईश्वर ही निरावरण होकर अपनेमें अध्यस्त सब प्रपंचका भासक होता है; इसीलिये वह सर्वज्ञ है। सर्वका चेतनके साथ आध्यासिक ही सम्बन्ध है। इसी सम्बन्धसे चेतनद्वारा सर्वप्रपंचका भान हो सकता है। इसीलिये सामान्य रूपसे, विशेषरूपसे सर्वप्रपंचको जाननेवाला ईश्वर सर्वज्ञ एवं सर्ववित् है, अनन्त ब्रह्माण्ड एवं एक-एक ब्रह्माण्डके अनन्त जीव तथा एक-एक जीवके अनन्त जन्म, एक-एक जन्मके अनन्तानन्त कर्म एवं अपरिगणित कर्मफलोंको जाननेवाला और विभिन्न ब्रह्माण्डोंके जीवोंके कर्मफलोंको दे सकनेकी क्षमता रखनेवाला ही ईश्वर है। इसीलिये ईश्वर सर्वज्ञ एवं सर्वशक्तिमान् है। अनादि जीवोंके कल्याणके लिये ही उसकी सृष्टिनिर्माणमें प्रवृत्ति होती है। इसीलिये वह हितकारी भी कहा जाता है। समस्त प्राणियोंके लौकिक-पारलौकिक कल्याणके लिये उसके नि:श्वासभूत वेदोंके द्वारा सबको उपदेश मिलता है— सहृदयं सांमनस्यमविद्वेषं कृणोमि व:। अन्यो अन्यमभिहर्यत वत्सं जातमिवाघ्न्या॥ (अथर्ववेद ३।३०।१) जैसे गौ उत्पन्न बछड़ोंमें प्रेम करती तथा उनका हित चाहती है, वैसे ही ईश्वर भी सबको समान हृदय एवं शोभन हृदय तथा विद्वेषरहित अन्योन्य उपकारक बनाना चाहता है। मार्क्सवादी हिन्दू-दर्शन एवं भौतिकवादकी तुलना करते हुए कहते हैं कि ‘हिन्दू-दर्शन ग्रन्थादि किसी एक ही मतके परिपोषक नहीं हैं। भौतिकवादके उल्लेखमात्रसे चार्वाकका नाम याद आता है। लेकिन चार्वाकसे बहुत पहले इसका वर्णन उपनिषदोंमें मिलता है कि सृष्टिका मूल क्या है? आकाश। सब सृष्ट पदार्थ आकाशसे ही उत्पन्न होते हैं तथा इसीमें विलीन होते हैं—‘सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्त आकाशं प्रत्यस्तं यन्ति आकाशो ह्येवैभ्यो ज्यायानाकाश: परायणम्।’ (छान्दो० उप० १।९।१) ‘जिसको आकाश कहते हैं, वह सब नाम-रूपोंका द्योतक है।’— ‘आकाशो वै नाम नामरूपयोर्निर्वहिता।’ (छान्दोग्य उपनिषद् ८।१४।१) इसी उपनिषद् में ब्रह्मका भी उल्लेख है। इससे स्पष्ट है कि आकाश ब्रह्म नहीं है और यही सृष्टिका भौतिक कारण है। श्वेताश्वतर उपनिषद्की अग्नि वह स्वयम्भू है, जिससे भूतमात्रकी उत्पत्ति है। वह अग्नि भी ब्रह्म नहीं है। एको हंसो भुवनस्यास्य मध्ये स एवाग्नि: सलिले सन्निविष्ट:। …स विश्वकृद् विश्वविदात्मयोनि- र्ज्ञ: कालकालो गुणी सर्वविद्य:। (६।१५-१६) कहना न होगा कि कई मार्क्सवादियोंने भारतीय दर्शनोंका भौतिकवादसे मेल मिलाया है; किंतु अधूरे ज्ञानके कारण वे सदा ही अर्थका अनर्थ ही करते हैं। वस्तुत: उपनिषदोंमें जहाँ सृष्टिका मूल आकाश कहा गया है, वहाँ ‘आकाश’ शब्दका अर्थ है ‘ब्रह्म’। ‘आ समन्तात् काशते—प्रकाशते इत्याकाश:’ प्रकाशमान अखण्ड बोधरूप परब्रह्म ही आकाश शब्दार्थ है। अतएव ब्रह्मसूत्रमें कहा गया है—‘आकाशस्तल्लिङ्गात्’ (वेदान्तद० १।१।२२)—आकाश पदार्थ परमात्मा है; क्योंकि जगदुत्पत्ति, स्थिति, प्रलय-कारणतारूप लक्षण उस ब्रह्ममें ही घटता है, भूताकाशमें नहीं; क्योंकि उन्हीं उपनिषदोंमें आकाशादि भूतोंकी उत्पत्ति ब्रह्मसे कही गयी है, ‘तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाश: सम्भूत:’ (तै० उ० २।१) उस अपरोक्ष आत्मासे आकाशकी उत्पत्ति होती है। ‘यतो वा इमानि जायन्ते…तद् ब्रह्म।’ (तै० उ० ३।१) जिस परमात्मासे सब भूत उत्पन्न होते हैं, वह ब्रह्म है। जो आकाश नाम-रूपका निर्वाहक है, वह आकाश भी वही ब्रह्म है। (छा० उ० ८।१४।१ शांकरभाष्य) श्वेताश्वतरका अग्नि हिरण्यगर्भ है, साधारण जड अग्नि नहीं—‘एतमेके वदन्त्यग्निं मनुमन्ये प्रजापतिम्। इन्द्रमेके परे प्राणमपरे ब्रह्म शाश्वतम्॥’ (मनु० १२।१२३) इसी हिरण्यगर्भको कोई अग्नि कहते हैं, कोई मनु कहते हैं, कोई इन्द्र, कोई प्राण, कोई सनातन ब्रह्म और कोई प्रजापति कहते हैं। इन्द्रं मित्रं वरुणमग्निमाहु- रथो दिव्य: स सुपर्णो गरुत्मान्। एकं सद्विप्रा बहुधा वद- न्त्यग्निं यमं मातरिश्वानमाहु:॥ (ऋ० सं० २।३।२२।६; अथर्व० ९।१०।२८; निरुक्त ७।४।५।१८) —आदिस्थलोंमें एक परमात्माको ही भिन्न-भिन्न नामोंमें पुकारा गया है। मार्क्सवादी कहते हैं—‘वर्तमानकालमें वेदान्त-दर्शनका मायावाद ही जनप्रिय है। यह एक आदर्शवादी दर्शन है, जिसके अनुसार निर्विकार, निराकार ब्रह्म ही एकमात्र सत्य है। यह ब्रह्म हीगेलके निर्विशेष मानस (absolute idea) से मिलता-जुलता है। निर्विशेष मानस जैसे विशेषके भीतर ही विकसित होता है। वेदान्तके ब्रह्मकी कल्पना भी वैसी ही है। ब्रह्म अपनेको विभक्तकर मायाके रूपमें प्रदर्शित करता है। ब्रह्म शब्दकी उत्पत्ति है ‘बृह’ धातुसे, जिसका अर्थ है वर्द्धित होना। इस वर्द्धित होने और हीगेलके स्वयंगतिविवर्तन (Becoming) का सादृश्य स्पष्ट है। मायावादी दर्शनकी असंगतिको दूर करनेके लिये गौडपाद आदि दार्शनिकोंने ब्रह्म या आत्माको मूलमें रखकर भूत-जगत‍्को उसका फलस्वरूप बतलाया और इस प्रकार सत्यकी मर्यादाको अक्षुण्ण रखा। वेदान्त-दर्शनका बहुल प्रचार होनेपर भी हिन्दू-दर्शन केवल मात्र वेदान्त ही नहीं है। न्याय और मीमांसा-दर्शन भी चार्वाकदर्शनकी तरह प्रमाण एवं सापेक्ष ज्ञानमें विश्वास रखते हैं। बौद्ध सौत्रान्तिक और वैभाषिक दर्शन भी इसीके अनुरूप हैं।’ ‘बौद्धमत स्वयं भारतीय भौतिकवादियोंका वैदिकधर्मके विरुद्ध एक विद्रोह है। यह कणाद तथा कपिलकी धाराओंको कायम रखता है। कणादका परमाणुवाद डिमोक्रिट्सके परमाणुवादसे बहुत मिलता-जुलता है। कपिलकी युक्ति है—‘केवल विचारका ही अस्तित्व नहीं है; क्योंकि बहिर्जगत‍्का भी हमको सहज प्रत्यय है।’ इसलिये यदि एकका अस्तित्व नहीं है तो दूसरेका भी अस्तित्व नहीं। फिर केवल शून्य ही रह जाता है।’ (सांख्यदर्शन प्रथम खण्ड, सूत्र ४२-४३) इसके ऊपर विज्ञानभिक्षुकी टीका और भी स्पष्ट है। विचार ही केवलमात्र वास्तविकता नहीं है; क्योंकि भूत और विचार दोनोंका प्रमाण सहज प्रत्यय है। यदि इस प्रमाणसे भूत सिद्ध नहीं है, तो विचार भी सिद्ध नहीं होता; क्योंकि दोनोंका प्रमाण सहज प्रत्यय है। इस प्रकार केवल शून्य ही रह जाता है। ‘बौद्धदर्शनमें सर्वास्तित्ववादी तथा शून्यवादी—दोनों ही भौतिकवादी मतकी पुष्टि करते हैं। लेकिन निर्वाणको मान लेनेके कारण उनका भौतिकवाद अपरिणत रह जाता है। तत्कालीन समाजका अन्तर्विरोध ही इस दार्शनिक अन्तर्विरोधके रूपमें प्रकाश पाता है।’ ‘योगबल और अलौकिक शक्ति—यहाँ योगादिके विषयमें एक बात कहना असंगत न होगा। क्या तपस्या, योग, क्रिया आदिसे मनुष्य अलौकिक कार्य सम्पन्न कर सकता है? जो कुछ पहले कहा जा चुका है, उससे उत्तर स्पष्ट है—कदापि नहीं; योगकी शास्त्रीय परिभाषाओंसे भी उसके ऊपर प्रकाश पड़ता है। पातंजलसूत्रकी परिभाषा है—‘योगश्चित्तवृत्तिनिरोध:’ (१।२) पर चित्तकी वृत्तियोंका निरोध—यह स्वयं ही एक असम्भव क्रिया है; इसलिये एक असम्भव क्रियासे असम्भव फल प्राप्त होता है या नहीं, यह प्रश्न स्वयं ही अपना उत्तर है। गीताकी परिभाषा है—‘योग: कर्मसु कौशलम्’ (२।५०)। तिलकने इसी परिभाषापर जोर दिया है। स्पष्ट ही यह परिभाषा योगको अलौकिक क्षेत्रसे उतारकर व्यवहार-क्षेत्रमें लानेका प्रयत्न है। व्यावहारिक अर्थमें ही एक मार्क्सवादी गीताके उस श्लोककी प्रशंसा कर सकता है—जिसमें मनुष्यको समदर्शी होनेका उपदेश दिया गया है। लाभ और हानि, जय और पराजय, दोनोंमें ही उसको अविचलित रहनेको कहा गया है, लेकिन मार्क्सवाद और गीताकी प्रेरणाएँ भिन्न हैं। गीताकी प्रेरणा है—‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।’ (२।४७) लेकिन मार्क्सके दर्शनमें ईश्वरको फल सौंपनेकी बात नहीं आती; क्योंकि यह एक निरीश्वरवादी दर्शन है। ईश्वरमें विश्वाससे ही अलौकिक शक्तिकी कल्पना आती है। जन्मान्तर-रहस्य इसीका एक अंग है। ऐसे प्रश्नोंका उत्तर Dialectics of nature नामक पुस्तकके एक अध्यायमें एंजिल्सने दिया है। प्रेतात्मा बुलानेवालोंकी कारस्तानियाँ अदालतोंमें कैसे खुलीं, उन घटनाओंका उल्लेख करते हुए एंजिल्सने अलौकिकशक्तिकी असम्भावनाओंको प्रमाणित किया है।’ मार्क्सवादी आदर्शवादके रूपमें अद्वैतवादको ही क्यों देखना चाहता है? अनेक अध्यात्मवादी चेतनके समान ही अचेतनको भी वास्तव ही मानते हैं। अद्वैतवादी वृत्तिविशिष्ट चैतन्यरूप दृष्टिको व्यावहारिक सत्य मानते हैं और विषयको भी उसी कोटिका मानते हैं। बिना चेतन-सत्ता स्वीकार किये क्रियाशीलता ही नहीं बन सकती, फिर क्रान्तिकारी क्रियाशीलताकी बात तो दूरकी है। क्रियात्मक सत्यता अवश्य प्रयोगसापेक्ष है; परंतु वस्तुसत्ता प्रयोगकी अपेक्षा नहीं रखती। जैसे अगर कूटस्थ सत्, परमार्थ आत्मा सत्य है, तो उसके लिये प्रयोग अपेक्षित नहीं, वहाँ तो अज्ञान-निवृत्त्यर्थ ज्ञानमात्र अपेक्षित है। क्रिया पुरुषतन्त्र हो सकती है, परंतु ज्ञान तो पुरुषतन्त्र न होकर वस्तुतन्त्र ही होता है। जो विभाज्य एवं विपरीत होता है, वह परमार्थ सत्य होता ही नहीं। सत्यताकी मुख्य परीक्षा प्रमाणसे होती है। प्रयोग भी प्रमाणका अंग होकर ही परीक्षामें उपयुक्त हो सकता है। विचार, क्रिया—दोनों ही एक कर्ता-प्रयोक्ताद्वारा सम्पन्न होते हैं—यह तो ठीक है, परंतु ‘एक ही सत्यकी विपरीत दिशाएँ हैं’, यह निरर्थक वागाडम्बर-मात्र है। ‘परिस्थितियोंकी उपज मनुष्य है या मनुष्यकी उपज परिस्थितियाँ?’ यह विषय सदासे ही विचारणीय रहा है, फिर भी सिद्धान्तत: मनुष्य चेतन है। परिस्थितियाँ जड हैं। मनुष्य ही परिस्थितियोंका निर्माता है और भीष्मजीने कहा है काल या परिस्थितियाँ राजाका कारण हैं या राजा कालका कारण है—यह संशय न होना चाहिये; क्योंकि राजा ही कालका कारण होता है— कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम्। इति ते संशयो मा भूद् राजा कालस्य कारणम्॥ (महा० उद्योगपर्व १३२।१६) अस्तु, हीगेलके निर्विशेष मानस और वेदान्तके ब्रह्ममें महान् अन्तर है। मन एक भौतिक वस्तु है; किंतु ब्रह्म नित्य कूटस्थ अनुभवस्वरूप है। बृहि धातुसे ब्रह्मकी निष्पत्ति अवश्य होती है; परंतु वर्धित होना ‘ब्रह्म’ शब्दका अर्थ नहीं है। निरतिशय बृहत् तत्त्व ही ब्रह्म है। वह देश-काल-वस्तुसे अपरिच्छिन्न है। निरतिशय पदार्थ ही बृहत् कहा जा सकता है। भौतिक जड अनृत मर्त्यको निरतिशय बृहत् नहीं कहा जा सकता, अतएव सत्य चैतन्य त्रिकालाबाध्य अमृत कूटस्थ अपरिच्छिन्न अनन्त अखण्ड ज्ञान ही ब्रह्म-शब्दार्थ ठहरता है। वर्धन-हेतु होनेसे प्राणमें भी ब्रह्म शब्दका प्रयोग होता है; क्योंकि प्राण रहनेपर ही शरीरकी वृद्धि आदि होती है। औपनिषद परब्रह्ममें तो ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ इत्यादि श्रुतियोंके अनुरोधसे निरतिशय बृहत्तत्त्वके अर्थमें ही ब्रह्म शब्दका प्रयोग होता है। यह भी कहा जा चुका है कि जिसमें वास्तविक विभाजन होता है, वह ब्रह्म नहीं होता। अनिर्वचनीय मायाके अध्याससे ही उसमें अनेक प्रकारके विभागोंका अध्यारोप होता है। इसी तरह यह भी कहना गलत है कि मायावादी दर्शनकी असंगतियोंको दूर करनेके लिये गौडपादने ब्रह्म या आत्माको मूलमें रखकर भूतजगत‍्को उसका फलस्वरूप बतलाकर सत्यकी मर्यादा रखी है; क्योंकि अनादि-अपौरुषेय वेद, उपनिषद् आदिके द्वारा ही ब्रह्मवादका प्रतिपादन किया जाता है। अद्वैतवादी शंकरने तो गौडपादके ही मतका अनुसरण करके प्रस्थानत्रयीपर भाष्य किया है। गौडपादका सिद्धान्त तो ‘अजातवाद’ है। उनके यहाँ तो भूतजगत् कभी हुआ ही नहीं। ‘आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा। वितथै: सदृशा: सन्तोऽवितथा इव लक्षिता:॥’ (माण्डूक्यकारिका ४।३१) जो आदिमें नहीं और अन्तमें नहीं होता, वह वर्तमानमें भी वैसा ही होता है। भूत, जगत्, वितथ, स्वप्न, माया आदि वितथ पदार्थोंके सदृश अवितथ-से प्रतीत होते हैं, इस दृष्टिसे ब्रह्म-तत्त्व ही त्रिकालाबाधित सत्य है। न्याय-मीमांसा आदि दर्शनोंने भूत-सत्ता अवश्य स्वीकार की है, परंतु चेतन आत्मा एवं अनादि-अपौरुषेय वेदादि शास्त्रोंका प्रामाण्य तथा शास्त्रोक्त धर्म-अधर्म आदिका अस्तित्व भी उन्हें स्वीकृत है। फिर उन आस्तिक दर्शनोंसे जडवादी भौतिक दर्शनोंकी सिद्धि कैसे हो सकेगी? वृत्तिरूप ज्ञान प्रमाणसापेक्ष होता है—यह वेदान्तदर्शनको भी मान्य है। सौत्रान्तिक, योगाचार, वैभाषिक, माध्यमिक—चारों प्रकारके बौद्ध कम-से-कम प्रत्यक्षप्रमाणके अतिरिक्त अनुमानप्रमाण भी मानते हैं; किंतु भौतिकवादी चार्वाक आदि तो अनुमानप्रमाण भी नहीं मानते। बौद्ध भी देहभिन्न क्षणिक विज्ञानकी आलयधाराको आत्मा मानते हैं; किंतु चार्वाक एवं मार्क्स आदि तो जीवित देहको ही आत्मा मानते हैं। बौद्ध भले ही वैदिक-धर्मके विरोधी हों, फिर भी उनके यहाँ आत्मा तथा पुण्य, पाप, सत्य, तपस्या तथा प्रमाण आदि मान्य हैं। जडवादी तो सबसे गये-बीते हैं। कणाद एवं गौतम परमाणु, ईश्वर तथा जीवात्माओंके पुण्यापुण्यरूप अदृष्टोंको जगत्-कारण मानते हैं, अत: इनका भी भौतिकवादियोंसे कोई मेल नहीं है। कपिल, पतंजलि भी प्रत्यक्ष, अनुमान एवं आगमको प्रमाण मानते हैं, तदनुसार असंग अनन्त नित्य चेतन आत्मा तथा महदादि प्रपंचका कारण प्रकृति एवं धर्माधर्म उन्हें मान्य हैं। ये लोग ईश्वरको भी स्वीकार करते हैं। अवश्य कपिल आदि बाह्यार्थवादी हैं; परंतु उनके असंग चेतन आत्माकी सिद्धि बाह्यार्थपर अवलम्बित नहीं है; क्योंकि कपिल, पतंजलि, गौतम, कणाद आदि सभीका आत्मा नित्य है। जो नित्य होता है, उसकी सिद्धि अन्यसापेक्ष नहीं होती। यहाँतक कि चारों प्रकारके बौद्ध एवं जैन आत्माको बाह्यार्थ-सापेक्ष नहीं मानते, बल्कि बौद्धोंकी दृष्टिसे तो बाह्यार्थ विज्ञानका परिणाम है। उनका स्पष्ट कहना है कि जैसे मृत्तिकाके रहनेपर ही घटादि उपलम्भ होता है, अन्यथा नहीं—‘सहोपलम्भनियमादभेदो नीलतद्धियो:’ अत: विज्ञान एवं बाह्यार्थका अभेद ही होता है। सौत्रान्तिक, वैभाषिककी दृष्टिमें बाह्यार्थ भी मान्य है। वैसे वेदान्ती भी व्यावहारिक, प्रातिभासिक—दो प्रकारका बाह्यार्थ मानते ही हैं। जिस कोटिका प्रमाण एवं प्रमाता है, उसी कोटिका बाह्यार्थ भी है, परंतु भौतिकवाद-मतकी पुष्टि इन किन्हीं दर्शनोंसे नहीं होती। इन मतोंमें मन, ज्ञान, भूत अथवा देहके परिणाम नहीं मान्य हैं। इसी तरह योग आदिके सम्बन्धमें मार्क्सवादियोंका टाँग अड़ाना भी अनधिकारपूर्ण चेष्टा है। जैसे बन्दरको अदरकका स्वाद अज्ञेय होता है, शाकवणिक्-लोगोंको बहुमूल्य रत्नोंका माहात्म्यज्ञान दु:शक है, वही स्थिति योगके सम्बन्धमें मार्क्सवादियोंकी है। जो सत्य, अहिंसा, संयम, न्यायको भी स्वीकार करनेमें समर्थ नहीं होता है, जो वर्ग-संघर्ष, वर्ग-विध्वंसके मार्गपर चलकर केवल धनको ही सर्वस्व मानकर उसे ही अपना ध्येय मानता है, उसके यहाँ त्याग, संयम, अपरिग्रह, तपस्यादिमूलक योगकी बातोंका क्या महत्त्व हो सकता है? चित्तकी वृत्तियोंके निरोधको मार्क्सवादी एक असम्भव चीज मानते हैं। अतएव असम्भव चीजसे होनेवाले फलोंको भी असम्भव मानते हैं, परंतु यदि योग या वेदान्तानुसार पांचभौतिक मन या चित्त एक परिणामी वस्तु है और उसका परिणाम सहेतुक है तो परिणाम-निरोध भी क्यों नहीं हो सकता? सुषुप्तिमें चित्तका शब्दाद्याकार परिणाम-निरोध मान्य है, तब फिर समाधिमें भी चित्तके वृत्ति-परिणामराहित्य होनेमें क्या आपत्ति है? वृत्तिद्वयकी सन्धिमें चित्तका निर्वृत्तिक होना तर्कसंगत भी है। चित्तके एक व्यापारसे एक वृत्ति होती है। एक व्यापारके अनन्तर अन्य व्यापार-प्रारम्भसे पूर्व क्षणमें चित्तके निर्व्यापार एवं निर्वृत्तिक माननेमें कोई भी अड़चन नहीं हो सकती, जैसे अलातचक्रकी तीव्र गति होती है, वैसे ही मन्द गति भी होती है। साथ ही गति-राहित्यका भी कोई समय हो ही सकता है, उसी तरह चित्तकी शीघ्र, मन्द गति एवं गति-राहित्य भी सम्भव है। इस तरह जब योग असम्भव वस्तु नहीं है तो उसका फल भी असम्भव वस्तु नहीं है। ‘योग: कर्मसु कौशलम्’ (गीता २।५०)-का तिलकद्वारा वर्णित अर्थ गलत है। वस्तुत: कर्म-कौशलको योग नहीं कहा जाता है; किंतु योग ही कर्मोंमें दक्षता है। योगकी परिभाषा स्पष्ट की गयी है—‘समत्वं योग उच्यते’ (गीता २।४८) सिद्धि-असिद्धिमें समता योग है। इस तरह समत्वबुद्धिसे युक्त कर्म भी गीतामें योग कहा गया है। तिलकने भी भले ही कर्मोंमें कौशलको योग कहा हो, तो भी उन्होंने पातंजलयोग एवं उसके फलका अपलाप नहीं किया है। मार्क्सवादीके लिये गीताकी प्रशंसाका कोई अर्थ ही नहीं; क्योंकि गीतामें तो स्वयं ही निर्वातस्थित निश्चल दीपके तुल्य योगीके यतचित्तका निश्चल होना बतलाया है— यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता। योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मन:॥ (गीता ६।१९) मार्क्स स्पष्ट ही निरीश्वरवादी है, फिर उसकी दृष्टिसे कर्मोंका ईश्वरमें समर्पण करना, फलकी आकांक्षा बिना ईश्वराराधन बुद्धिसे शास्त्रोक्त कर्मोंका अनुष्ठान करना आदि सब बातें व्यर्थ हैं। धनको ही सर्वस्व माननेवाले भौतिकवादीके लिये हानि-लाभ, जय-पराजयको समान समझना कहाँतक सम्भव है। किसी दाम्भिकके दम्भका भण्डाफोड़ होनेसे किसी युक्ति-शास्त्रसम्मत सिद्धान्तका अपलाप नहीं किया जा सकता। एंजिल्सकी ‘डायलेक्टस ऑफ नेचर’ पुस्तककी बातें भी पुरानी पड़ गयी हैं। वस्तुत: वैज्ञानिकोंने ही प्रचलित जडवाद एवं विकासवादकी युक्तियोंका खण्डन करके एक अलौकिक शक्तिका महत्त्व सिद्ध किया है, जिसे हम विकासवादके खण्डनके प्रसंगमें विस्तारसे दिखला चुके हैं।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>ईश्वर</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सदर्शन</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>12.3 अहमर्थ और आत्मा ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/12-3-ahmrth-aur-aatmaa-maarksv/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/12-3-ahmrth-aur-aatmaa-maarksv/</guid><description>12.3 अहमर्थ और आत्मा देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदिसे आत्मा पृथक् है, प्रायेण यह बात अधिक दार्शनिकोंको मान्य है, परंतु अहमर्थ (मैं) आत्मा है या नहीं, इस विषयमें प्राय: विप्रतिपत्ति है। अधिकाधिक दार…</description><pubDate>Thu, 17 Jul 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;12.3 अहमर्थ और आत्मा&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदिसे आत्मा पृथक् है, प्रायेण यह बात अधिक दार्शनिकोंको मान्य है, परंतु अहमर्थ (मैं) आत्मा है या नहीं, इस विषयमें प्राय: विप्रतिपत्ति है। अधिकाधिक दार्शनिकोंका कहना है कि ‘अहमर्थ (मैं) ही आत्मा है, उसमें ही मैं कर्ता, मैं भोक्ता, मैं दुखी, मैं सुखी, मैं शोक-मोहसे व्याकुल, मैं शान्त, मैं धीर, मैं मूढ़ इत्यादि रूपसे जिसका अनुभव होता है, वही आत्मा है। अहमर्थ ही अनन्त उपद्रवोंसे उपद्रुत बद्ध अज्ञानी होता है। वह कर्म, धर्म, उपासना, ज्ञान आदिद्वारा ज्ञानी होकर मुक्त होता है। जागर, स्वप्न, सुषुप्ति—तीनों अवस्थाओंसे बन्ध और मोक्षकालमें एकरस अन्वयी अहमर्थ ही आत्मा है। यदि अहं-अहं इत्याकारेण अनुभूयमान अहमर्थका मोक्षमें उच्छेद हो जाय, तब तो कोई भी मोक्षके लिये प्रयत्नशील न होगा, प्रत्युत मोक्षकी कथासे ही भागेगा।’ परंतु अद्वैतवादी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;ान्तीका इसके विपरीत यह कहना है कि अहमर्थ मुख्य आत्मा नहीं है, किंतु चिज्जडकी ग्रन्थि ही ‘मैं’ या अहंरूपसे भासमान होती है। दूसरे शब्दोंमें कहा जाय तो अधिष्ठान, बुद्धि और चिदाभास—ये ही तीनों मिलकर औपाधिक जीव या ‘मैं’ आदि पदोंसे व्यपदिष्ट होते हैं। बुद्धि-आत्मा, जड-चेतन, अनात्मा-आत्माका अन्योन्याध्यास ही ‘मैं’ पदार्थ है। जैसे किसी साधारण पुरुषको शरीर, इन्द्रिय, बुद्धि आदिमें ही आत्मबुद्धि हो जाती है और वह देहादिके नाशमें ही आत्मनाश मानने लगता है, वैसे ही अनात्मरूप अहमर्थमें भी भ्रान्तिसे ही आत्मबुद्धि होती है। मैं जो कभी कर्ता, कभी भोक्ता, कभी सुखी, कभी दुखी, कभी शान्त, कभी धीर एवं कभी मूढ़ है, कभी हृष्ट-पुष्ट, प्रसन्न, कभी शोक-मोह-परिप्लुत होकर प्रतीत होता है, उसे एकरस शुद्ध स्वप्रकाश आत्मा कैसे कहा जाय? वस्तुत: इस अनेकरूप अहमर्थका जो एकरसभासक अखण्ड भानरूप नित्य बोध है, वही आत्मा है। जैसे स्वर्गादि सुख-प्राप्तिके लिये देहद्वारा प्रयत्नशील ही अग्निकुण्डमें देहकी आहुति कर सकता है, वैसे ही अहमर्थद्वारा प्रयत्नशील सोपाधिक आत्मा निरुपाधिक पदप्राप्तिके लिये सोपाधिक स्वरूपके उच्छेदमें प्रयत्नशील होता है। इसके सिवा यदि अहमर्थ ही आत्मा होता, तो उसका तीनों ही अवस्थाओंमें प्रकाश होना उचित था; क्योंकि आत्मा स्वप्रकाश है। अहंकार, अहंबुद्धिका विषय है। आत्मा अहंबुद्धिका भी भासक साक्षीरूप है। कुछ लोगोंका कहना है कि ‘सुखमहमस्वाप्सम्, न किञ्चिदहमवेदिषम्’—‘सुखपूर्वक मैं सो रहा था, मैं कुछ भी नहीं जानता था’ इस तरह सुषुप्तिसे (सोकर) जागनेपर सौषुप्त सुखके अज्ञानकी स्मृति होती है, उसीके साथ अहमर्थ ‘मैं’ की भी स्मृति होती है। स्मृति बिना अनुभवके नहीं हो सकती, अत: ‘मैं’ का भी सुषुप्तिमें अनुभव होता ही है, परंतु उनका यह कहना उचित नहीं जान पड़ता; क्योंकि अहमर्थ सदा ही इच्छादि गुणोंसे विशिष्ट ही उपलब्ध होता है, परंतु जब कि सुषुप्तिमें इच्छादिका उपलम्भ होता ही नहीं, तब केवल अहमर्थका उपलम्भ कैसे माना जाय? गुणरहित केवल गुणीका उपलम्भ असम्भव है। जैसे रूपादिरहित घटका ज्ञान नहीं हो सकता, वैसे ही इच्छा-द्वेषादि गुणरहित अहमर्थका ज्ञान नहीं हो सकता। गुणीका ग्रहण गुण-ग्रहण बिना नहीं हो सकता। यदि कहा जाय कि एकत्व संख्यारूप गुणसे युक्त ही अहमर्थका सुषुप्तिमें अनुभव होता है तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि सुषुप्तिमें विशिष्ट बुद्धि अंगीकार करनेपर उसके सुषुप्तित्वका ही भंग हो जायगा। इसके सिवा गुणि-ग्रहणमें विशेषगुणग्रहण हेतु होता है। अत: रूपादि विशेष गुणग्रहण बिना घटादिका ग्रहण नहीं होता। यदि कहा जाय कि रूपादिरहित घटादि होते ही नहीं, इसलिये रूपादिके बिना घटादिका ग्रहण नहीं होता, तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि जिस समय पाकद्वारा पूर्वरूपका नाश हो चुका और अग्रिम रूपकी उत्पत्ति नहीं हुई, उस क्षणमें और घटाद्युत्पत्तिके अनन्तर क्षणमें रूपादिके बिना भी घटादि रहते ही हैं। ऐसी स्थितिमें गुणग्रहण बिना गुणीका ग्रहण कहाँतक हो सकता है? अत: सुषुप्तिमें निर्गुण सर्वसाक्षिरूप आत्माका ही उपलम्भ होता है, अहमर्थका नहीं। अतएव जाग्रदवस्थामें अहमर्थकी स्मृति भी अमान्य ही है। सुषुप्तिमें अज्ञानका आश्रय और प्रकाशरूपमें अनुभूयमान आत्मासे अहंकार सर्वथा भिन्न ही है। आत्मासे अहंकारकी भिन्नता होते ही उसकी जडता सिद्ध हो जाती है। जो यह कहा जाता है कि ‘अहमस्वाप्सम्’ अर्थात् मैं सोया, इस रूपसे अहमर्थका सोकर जागनेपर स्मरण होता है, वह भी ठीक नहीं; क्योंकि अहमर्थांशमें स्मरण अमान्य है। किंतु वहीं उसी एक चेतनमें अज्ञान और अहंकारके कल्पित होनेके कारण अहंकारमें अज्ञानाश्रयताकी प्रतीति होती है। अतएव ‘अहमस्वाप्सम्’ यहीं जब सुषुप्तिमें अहंकारका अनुभव बनता नहीं, तब अर्थात् अज्ञानके आश्रयरूपसे अनुभूत आत्मामें ‘अहमस्वाप्सम्’ इस परामर्शका पर्यवसान होता है। अतएव जब यह कहा जाता है कि यदि अहमर्थ स्वापका आश्रय न हो, तो केवल चित् ही हो, तब ‘चिदस्वपत् स्वयमस्वपत्’ (चित् सोया, स्वयं सोया) इस तरह सुषुप्तिका परामर्श होना चाहिये। यद्यपि अहमर्थाधिष्ठानरूप अविद्योपहित चैतन्य ही सुषुप्तिका आधार है, तथापि परामर्शकालमें अनुभूत अन्त:करण-संसर्गसे अहमाकार परामर्श बन सकता है। जो यह कहा जाता है कि ‘सोऽहम्’ इत्याकारक प्रत्यभिज्ञान नहीं बन सकेगा; क्योंकि आत्मा स्वप्रकाश चिद्‍रूप है, अत: उसका ज्ञान कभी नष्ट न होगा। उसके बिना संस्कार न होगा और संस्कारोंके बिना प्रत्यभिज्ञा न बनेगी। अतएव विवरणाचार्यने कहा है कि अन्त:करणविशिष्ट आत्मामें ही प्रत्यभिज्ञा होती है, निष्कलंक चैतन्यमें प्रत्यभिज्ञा नहीं होती; क्योंकि मोक्षावस्थायी निष्कलंक चैतन्य तो केवल शास्त्रगम्य है। यह सब कथन पूर्वोक्त पक्षके विरुद्ध नहीं है; क्योंकि मोक्षावस्थायी आत्मा केवल शास्त्रसे ही अवगत होता है। इसलिये वचनसे ही यह कहा गया कि उपाधिमात्रविरही निष्कलंक चेतनमें प्रत्यभिज्ञाका निषेध किया गया है। अन्त:करण पद उपाधिमात्रमें तात्पर्य रखता है। तथा च सुषुप्तिमें अज्ञानोपहित आत्मा भी प्रत्यभिज्ञानार्ह (पहचाननेयोग्य) है। इसके सिवा अन्त:करणराहित्य दशामें विवरणवाक्यद्वारा प्रत्यभिज्ञाका ही निषेध है, अभिज्ञाका नहीं। देखी हुई वस्तुके फिर देखनेपर ‘यह वही है’ ऐसा पहचाननेको ‘प्रत्यभिज्ञा’ कहा जाता है और केवल ज्ञानको ‘अभिज्ञा’ कहा जाता है। सुषुप्ति दशामें अन्त:करण न होनेसे प्रत्यभिज्ञाके न होनेपर भी यहीं अविद्योपहित चेतनकी ज्ञानरूप अभिज्ञामें कोई बाधा नहीं है। अत: सुषुप्तिमें अहंकाररहित आत्माके अनुभवमें कोई भी आपत्ति नहीं उठायी जा सकती। जो यह कहा जाता है कि यदि सुषुप्तिमें अहमर्थका ग्रहण न होता, तब तो इतने समयतक मैं सोता था या अन्य कोई—‘एतावन्तं कालं सुप्तोऽहमन्यो वा’ ऐसा संशय होना चाहिये, ‘मैं ही सोया था’ ऐसा निश्चय न होना चाहिये। पर वह भी ठीक नहीं; क्योंकि सुषुप्तिकालमें अनुभूत आत्मामें ही अहंकारका ऐक्याध्यास होनेसे ‘मैं ही सोता था’ ऐसा निश्चित प्रत्यय होता है। वास्तवमें ‘अहमज्ञ:’ इत्यादि स्थलोंमें भी अज्ञान अहमर्थके आश्रित नहीं, किंतु अहंकारके अधिष्ठानभूत चैतन्यमें ही रहता है। इस तरह अज्ञान और अहंकार एक अधिकरणमें रहते हैं, अत: सामानाधिकरण्य या एकाश्रयाश्रितत्व होनेके कारण अज्ञानमें अहमर्थाश्रयत्वकी प्रतीति होती है, जैसे सामान्य, समवाय आदि और सत्ता—दोनोंका ही समान द्रव्यादि आश्रय होनेके कारण ही ‘सामान्यं सत्, समवाय: सन्’ इत्यादि व्यवहार होता है, वैसे ही ‘अहमज्ञ:’ इत्यादि व्यवहार होते हैं। ऐसी स्थितिमें जैसे कोई पहले दिन चैत्रभिन्न देवदत्तको भ्रान्तिसे चैत्र मानकर, दूसरे दिन ‘सोऽयं चैत्र:’ ऐसा प्रत्यभिज्ञान (पहचान) करता है, वैसे ही भ्रान्तिसे अज्ञानाश्रय चित‍्को भ्रान्तिसे अहमर्थ मानकर दूसरे दिन अज्ञानाश्रयत्वेन अहमर्थका प्रत्यभिज्ञान करता है। इसके सिवा निश्चय होनेपर संशय न होनेका नियम तो है, किंतु निश्चय न होनेपर संशय होनेका नियम नहीं है। अतएव कहा गया है कि ‘सत्यारोपे निमित्तानुसरणं न तु निमित्तमस्तीत्यारोप:’ अर्थात् आरोप होनेपर उसके निमित्तका अन्वेषण होता है, यह नहीं कि निमित्तवशात् आरोप हो। जैसे कहीं जल-दर्पणादि प्रतिबिम्ब-निमित्तके रहनेपर भी प्रतिबिम्ब नहीं होता, वैसे ही निश्चयाभाव रहनेपर भी संशय नहीं होता। इसीलिये ‘अहमन्यो वा’ ऐसा सन्देह नहीं होता। फिर भी यह सन्देह होता है कि ‘जब इतने समयतक मैं स्वप्न देखता था, इतने समयतक मैं जागता था—‘एतावन्तं कालमहं स्वप्नं पश्यन्नासमहं जाग्रदासम्’ इत्यादि प्रतीतियोंके समान ही ‘अहमस्वाप्सम्’ मैं सोता था, ऐसी प्रतीति भी होती है, तब फिर क्या कारण है कि पहली दो प्रतीतियोंमें अहमर्थकी स्मृति मानी जाय और ‘अहमस्वाप्सम्’ इस प्रतीतिमें उसकी स्मृति न मानी जाय?’ पर यह भी ठीक नहीं; क्योंकि सर्वत्र स्मर्यमाण आत्माके साथ अभेदारोप होनेके कारण ही अहमर्थांशमें स्मृतित्वका अभिज्ञान होता है। अत: सुषुप्तिमें अहमर्थका अनुभव माननेका कोई भी स्थिर आधार नहीं। यदि कहा जाय कि अपरामर्श—परामर्शभिन्नमें परामर्शत्वका आरोप कहीं नहीं देखा जाता अर्थात् स्मृतिसे भिन्नमें स्मृतित्वका आरोप नहीं देखा जाता तो वह भी ठीक नहीं; क्योंकि स्मर्यमाणरूपसे अनुभूयमान स्मर्यमाणभिन्नमें परामर्शत्वका आरोप होता ही है। अतएव इस कथनका भी कोई महत्त्व नहीं रह जाता कि यदि अहमर्थ आत्मासे भिन्न हो, तब तो ‘जो पहले दुखी था, वही अब सुखी हुआ’ इस प्रतीतिके समान ‘जो पहले मेरेसे भिन्न सोता था, वही अब मैं उत्पन्न हुआ हूँ’ ऐसा अनुभव होना चाहिये; क्योंकि जैसे दुखीरूपसे आत्माका पहले ज्ञान होता है, वैसे ‘मुझसे अन्य पहले सोया था’, ऐसा प्रथम विज्ञान ही नहीं होता। सुषुप्तिमें जैसे अहमर्थका प्रकाश नहीं होता, वैसे ही मदन्यता (मेरेसे भिन्नता)-का भी प्रकाश नहीं होता। सुषुप्तिमें अहमर्थके असत्त्वका ज्ञान नहीं होता। जागनेपर अनुभूयमान अहंकारमें सोनेके पहले कालमें गृहीत अहंकारसे अभिन्नता ही गृह्यमाण होती है। अत: अहंकारकी उत्पत्तिका बोध नहीं होता। यदि विवेकियोंको ऐसी बुद्धि होती हो, तो इष्ट ही है। उन्हें तो यह ज्ञान होना ही चाहिये कि सुषुप्तिमें अहमर्थ नहीं था। प्रबोध होनेपर सुषुप्तिके अधिष्ठान चैतन्यमें ही अहमर्थका अध्यास होता है। उसीमें सोनेसे पहलेके अहमर्थका अभेद प्रतीत होता है। इसपर कुछ लोगोंका कहना है कि ‘जब अहमर्थ आत्मासे भिन्न सिद्ध हो जाय, तभी स्मर्यमाण आत्मामें अहमर्थके ऐक्यका आरोप होगा और जब वैसा आरोप सिद्ध हो जायगा, तब सुषुप्ति अहमर्थके अप्रकाश होनेसे उसकी आत्मासे भिन्नता सिद्ध होगी। इस तरह अन्योन्याश्रय-दोष अनिवार्य होगा।’ पर यह ठीक नहीं; क्योंकि आत्मासे भिन्नता-सिद्धिके पहले ही सुषुप्तिमें अहमर्थका अप्रकाश सिद्ध हो जाता है। ‘अहमस्वाप्सम्’ इसीको आत्मपरामर्श मान लेनेसे दृष्टहान और अदृष्टकी कल्पना भी नहीं करनी पड़ेगी। अहं शब्दका गौणार्थ देहादि है। मुख्यार्थ अन्त:करण और आत्माका अन्योन्याध्यासरूप चिज्जडग्रन्थि है और लक्ष्यार्थ आत्मा है। यदि सुषुप्तिमें अहमर्थका ग्रहण होता, तब तो उसका भी उसी तरह स्मरण होता, जैसे गतदिनके अहमर्थका स्मरण होता है। इसे इष्टापत्ति नहीं कहा जा सकता; क्योंकि पूर्व दिनमें जैसे इच्छादिविशिष्ट आत्मा गृहीत हुआ है, वैसे ही सौषुप्त आत्माका भी परामर्श होना चाहिये था। यदि सुषुप्तिमें अहमर्थका प्रकाश होता तो ‘इतने समयतक मैं अभिमन्यमान था’ इस तरह परामर्श अवश्य होता। कहा जाता है कि अहमर्थके प्रकाशमें अभिमानका आपादन तो कर्णस्पर्शमें कटि-चालनके समान है; परंतु वह ठीक नहीं; क्योंकि अहमर्थकी अपेक्षासे ही प्रकाश और अभिमान—दोनों ही होते हैं, अत: एक के प्रकाशसे दूसरेका आपादन युक्त ही है। यदि कहा जाय कि सुषुप्तिमें आत्माके प्रकाशमान होनेपर भी ‘आत्मेत्यभिमन्यमान आसम्’ इतने कालतक आत्मा ऐसा अभिमन्यमान था—ऐसा अभिमान होना चाहिये, वह भी अनुचित है; क्योंकि अभिमानमें अहमर्थ ही कारण है, आत्मा नहीं। मनकी स्थूलावस्थासे उपहित चिद्‍रूप अहमर्थकी अपेक्षासे ही अहमाकारवृत्तिरूप अभिमान व्यक्त हो जाता है। वृत्तिरूप होनेपर भी उसके लिये प्रमाण-व्यापारकी आवश्यकता नहीं होती। अहमर्थका प्रकाश भी अहमर्थावच्छिन्न साक्षीरूप ही है, अत: उसे भी अहमर्थसे भिन्न किसीकी अपेक्षा नहीं है। यदि अभिमान साक्षिमात्रसे ही प्रकाशित होता है। यदि सुषुप्तिमें अहमर्थ हो, तब तो अवश्य ही उसका प्रकाश और अभिमान होना चाहिये। कुछ लोग कहते हैं कि ‘सुषुप्तिमें अहमर्थका प्रकाश होता ही है। ‘न किञ्चिदहमवेदिषम्’—‘मैंने कुछ भी नहीं जाना’ इस अज्ञानपरामर्शका विषय अहमर्थके अज्ञानसे भिन्न ही विषय है। जैसे वेदान्तीके मतमें चिद्‍रूपांशमें अज्ञान अमान्य है; क्योंकि वह भासमान है, अत: पूर्णानन्दांशमें ही अज्ञान मान्य है, वैसे ही अहमर्थांशमें भी अज्ञान अमान्य है, अन्यथा अहमर्थके भानका विरोध स्पष्ट ही होगा।’ परंतु यह कथन असंगत ही है; क्योंकि साक्षिरूप ज्ञान-अज्ञानका विरोधी नहीं हुआ करता। अतएव अज्ञानका भी साक्षीसे प्रकाश होता है। जैसे मेघसे आच्छादित सूर्यद्वारा ही मेघका प्रकाश होता है, वैसे ही अज्ञानोपहित चैतन्यरूप साक्षीसे ही अज्ञानका प्रकाश होता है। विरोध होनेपर प्रकाश्यप्रकाशकभाव कथमपि उपपन्न नहीं हो सकता था। इसके सिवा यह कहा ही जा चुका कि सुषुप्तिमें अहमर्थ (मैं)-का प्रकाश नहीं होता। अतएव सुषुप्तिका वर्णन करनेवाली श्रुति भी सुषुप्तिमें अहमर्थके अज्ञानको सिद्ध करती है। ‘न विजानात्ययमहमस्मि’ अर्थात् सुषुप्तिमें ‘मैं यह हूँ’ इस तरह जीवको ज्ञान नहीं होता। कुछ लोग कहते हैं कि ‘नात्मानं न परांश्चैव न सत्यं नापि चानृतम्। प्राज्ञ: किञ्चन संवेत्ति तुरीयं सर्वदृक् सदा॥’ सुषुप्ति-अवस्थाभिमानी प्राज्ञ न अपनेको, न दूसरेको, न सत्यको, न अनृतको—किसी भी तत्त्वको नहीं जानता; इत्यादि श्रुतिवचनके समान आत्मादिके विशेषज्ञान-प्रतिपादनमें ही उक्त श्रुति भी तात्पर्य रखती है, परंतु यह कथन ठीक नहीं है। ‘अहरहर्ब्रह्म गच्छन्ति सम्पद्य न विदुरमृतेन प्रत्यूढा:’, इस आत्मबोधक श्रुतिविरोधके कारण उपर्युक्त श्रुतिका विशेषाज्ञान-प्रतिपादनमें तात्पर्य माना जाता है, परंतु ‘न विजानात्ययमहमस्मि’ इस श्रुतिके साथ किसी श्रुतिका विरोध नहीं है, अत: यह श्रुति तो अहमर्थके अज्ञानमें भी पर्यवसित होती है। जो कहा जाता है कि ‘अहमर्थ स्मर्ता (स्मरण करनेवाला) है, यह तो अवश्य ही मान्य है’, इसपर अब विचारना यह है कि वह अविद्यावच्छिन्न चैतन्य है अथवा अन्त:करणावच्छिन्न चैतन्य। यदि प्रथम पक्ष मान्य हो, तब तो ‘योऽहमकार्षं सोऽहं सौषुप्तिकाज्ञानादि स्मरामि’ अर्थात् जो मैं कर्मोंका कर्ता था, वही मैं सुषुप्तिके अज्ञानका स्मरण करता हूँ, इस अनुभवसे विरोध होगा; क्योंकि कर्तृत्व अविद्यावच्छिन्न चैतन्यमें कथमपि नहीं बन सकता। यदि अन्त:करणावच्छिन्न चैतन्यको ही स्मर्ता माना जाय, तब तो अहमर्थको ही अनुभव करनेवाला भी मानना होगा; क्योंकि एकाश्रयमें रहनेसे ही स्मृति, संस्कार एवं अनुभवमें कार्यकारणभाव बनता है। इसीसे जो मैं अनुभव करनेवाला था, वही मैं स्मरण कर रहा हूँ, इस तरह प्रत्यभिज्ञा (पहचान) होती है। परंतु यह सब कथन निरर्थक हैं; क्योंकि यह कहा जा चुका कि अविद्यावच्छिन्न चैतन्य अज्ञानका अनुभव करनेवाला है और वही जाग्रत्-कालमें अन्त:करणावच्छिन्न होकर स्मर्ता होता है। इसलिये चैतन्यके अभेदसे अनुभव और स्मरणकी एकाश्रयतामें कोई भी अनुपपत्ति नहीं है। कहा जाता है कि अन्त:करणरूप उपाधिके भेदसे अविद्यावच्छिन्न चैतन्यके साथ ऐक्य नहीं हो सकता, यह भी ठीक नहीं है। अविद्यावच्छिन्न चैतन्य ही अन्त:करणावच्छिन्न होता है, अत: भेदकल्पना असंगत है। फिर भी कहा जाता है कि अविद्या और अन्त:करणरूप उपाधिका भेद होनेसे मठाकाश और मठाकाशान्तर्गत घटाकाशके समान दोनों उपहितोंका अर्थात् अविद्योपहित और अन्त:करणोपहितका भेद अवश्य होना चाहिये, परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि यहाँ दृष्टान्त ही असम्प्रतिपन्न है। वही उपाधियाँ परस्पर उपहितकी भेदक होती हैं, जो एक दूसरीसे अनुपहितकी उपधायक होती हैं, अन्यथा कम्बु-अवच्छिन्न आकाश, ग्रीवावच्छिन्न आकाशसे पृथक् ही समझा जाना चाहिये। इस दृष्टिसे यद्यपि मठबहिर्भूत घटसे अवच्छिन्न आकाश मठावच्छिन्न आकाशसे भिन्न कहा जा सकता है; क्योंकि वे दोनों उपाधियाँ एक-दूसरेसे अनुपहित आकाशको ही उपहित बनाती हैं, तथापि मठान्तर्गत घट तो मठोपहित मठाकाशको ही घटोपहित घटाकाश बनाता है, अत: इन दोनोंका परस्पर भेद नहीं कहा जा सकता। इस तरह अविद्यान्तर्गत अन्त:करण, अन्त:करणावच्छिन्न चैतन्य अविद्यावच्छिन्न चैतन्यसे भिन्न नहीं बन सकता। कहा जाता है कि यदि सुषुप्तिमें अहमर्थ न होता तो ‘मैं निर्दु:ख होऊँ’ इस इच्छासे प्राणियोंकी सुषुप्तिके लिये प्रवृत्ति न होनी चाहिये, परंतु यह भी ठीक नहीं। जैसे ‘मैं दुबला हूँ, मोटा हो जाऊँ’ इस बुद्धिसे इच्छासे स्थौल्यसम्पादनमें प्रवृत्ति होती है, यहाँ स्थौल्य दशामें कार्श्यके न रहनेपर भी कृशकी स्थौल्य-सम्पादनार्थ प्रवृत्ति होती है। वैसे ही निर्दु:ख सुषुप्ति-दशामें अहमर्थके न होनेपर भी अहमर्थकी निर्दु:ख होनेको इच्छासे सुषुप्तिमें प्रवृत्ति हो सकती है। यदि कहा जाय कि कार्श्यादिसे विविक्त (पृथक्) शरीरमें ही स्थूलताकी इच्छा होती है, तब प्रकृतमें भी यही कहा जा सकता है कि अन्त:करणसे निष्कृष्ट केवल साक्षीमात्रकी निर्दु:खताके लिये ही सुषुप्तिमें प्रवृत्ति होती है। ‘मैं निर्दु:ख होऊँ’ इस अनुभवमें अहमंश तो अवर्जनीयतया उपस्थित होता है, जैसे ‘दूसरेका ग्राम मेरा हो जाय’ यहाँपर सम्बन्धांशको इच्छाविषयता होती है। यदि कहा जाय कि चिन्मात्र निर्दु:ख हो ऐसी इच्छा होनी चाहिये, तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि चिन्मात्ररूपसे विज्ञान न होनेसे ही ऐसा अनुभव नहीं होता। निर्दु:खका अनुभव है, ऐसी इच्छा होती ही है। कहा जाता है कि जो ‘मैं’ सोया था, वही ‘मैं’ जागता हूँ, जो ‘मैं’ पूर्व दिवसमें करता था, वही ‘मैं’ आज कर रहा हूँ, इस तरहके प्रत्यभिज्ञान अहमर्थके भेदमें नहीं हो सकते। इसके सिवा कृतहानि (किये हुए कर्मोंका बिना फल दिये ही नाश) और अकृताभ्यागम (बिना कर्म किये ही फलका आगम) मानना पड़ेगा। जब प्रतिदिन सुषुप्तिमें अहमर्थका नाश और जागरमें फिर उसकी उत्पत्ति मानी जायगी, तब पूर्वोक्त दूषण अनिवार्य हो जायँगे। कर्ता अहमर्थ और भोक्ता अहमर्थमें भेद होनेसे कर्म और फलभोगमें भी वैयधिकरण्यापत्ति होगी। चैतन्य यद्यपि एक है तथापि उसमें कर्तृत्व-भोक्तृत्व नहीं है। जिस अहमर्थमें कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि होते हैं, वह एक नहीं है। ‘अहं करोमि’ ऐसी प्रतीतिके अनुसार अहंकारमें ही कर्तृत्वका आरोप मान्य है। अतएव चैतन्यमें कर्तृत्वादिका आरोप भी निरवकाश है। यदि आरोपसे ही कर्तृत्व मान्य हो, तब तो देहादिमें ही कर्तृत्व, भोक्तृत्व मान लिया जाय, परंतु विचार करनेसे विदित होता है कि उपर्युक्त शंकाएँ निराधार हैं; क्योंकि सुषुप्तिमें नष्ट होकर भी अहंकार कारणरूपसे स्थित ही रहता है। उसीकी जाग्रदवस्थामें फिर उत्पत्ति होती है। इस तरह अहमर्थ एक ही रहता है। अत: अकृताभ्यागम, कृतविप्रणाश आदि कोई दोष न होंगे। यहाँ कुछ लोग यह शंका करते हैं कि ‘अथैतत्पुरुष: स्वपिति’ यहाँसे लेकर ‘गृहीतं चक्षुर्गृहीतं श्रोत्रं गृहीतं मन:’ इत्यादि श्रुतिमें मन आदिका ही उपराम—लय कहा गया है, अहंकारका लय नहीं बतलाया गया। परंतु इसका समाधान यह है कि मनके उपरममें ही अहंकारका भी उपरम समझ लेना चाहिये; क्योंकि मनमें ही बुद्धि, चित्त, अहंकारका भी अन्तर्भाव होता है। यद्यपि अहमर्थ—चित्, चैतन्यसे अघटित—अयुक्त ही है। फिर भी जैसे ‘घट: स्फुरति’ इस व्यवहारमें जड घटमें भी स्फुरणकी आश्रयता भासित होती है। वैसे ही जड अहमर्थमें भी अनुभवकी आश्रयता भासित होती है, तथापि ‘अहम्’ इत्याकारक प्रत्ययमें अवच्छिन्न अनुभवरूपसे अहमर्थका भान होता है। जैसे घटावच्छिन्न आकाश अनवच्छिन्न आकाशमें अन्तर्भूत होता है, वैसे ही अवच्छिन्न अनुभव अनवच्छिन्न आत्मामें ही अनुगत है। इस तरह आत्मासे अभिन्न अनुभवका अवच्छेदक मन अनुभवका आश्रय कहा जाता है। सारांश यह है कि चित् (चैतन्य), अचित् (जड)-का सम्मिश्रणरूप अहंकार अध्यस्त होता है। जड-चेतनकी अन्योन्याध्यासरूप ग्रन्थि ही अहंकार है। वही ‘अनुभवामि’ (मैं अनुभव करता हूँ) इस तरह आत्माभिन्न आत्मस्वरूप अनुभवका आश्रय होनेसे चिदात्मक कहलाता है। ‘अहं कर्ता’ (मैं करता हूँ) इस तरह जडरूप कर्तृत्वका आश्रय होनेसे अचिदात्मक है। ऐसी स्थितिमें अचित् अन्त:करणके उपरम होनेपर चिदचित्संवलित (चिज्जडग्रन्थिरूप) अन्त:करणका भी उपरम हो जाता है। अन्त:करण, उसका अधिष्ठान और अन्त:करणगत चिदाभास—यह तीनों मिलकर अहमर्थ कहलाते हैं। अन्त:करणका आत्मामें स्वरूपसे ही अध्यास होता है, परंतु अन्त:करणमें आत्माका स्वरूप नहीं अध्यस्त होता; किंतु उसका संसर्ग ही अध्यस्त होता है। इसीलिये अन्योन्याध्यास होनेपर भी उभयके साक्षात्कारसे उभयकी निवृत्ति नहीं होती। अतएव शून्यवादापत्ति नहीं होती; क्योंकि आत्मस्वरूप अधिष्ठानके साक्षात्कार होनेपर स्वरूपसे अध्यस्त अन्त:करणकी निवृत्ति होती है, परंतु आत्माका तो संसर्ग ही अन्त:करणमें अध्यस्त है, अत: उसीकी निवृत्ति होती है। स्वरूप अध्यस्त नहीं है, अत: उसकी निवृत्ति नहीं होती। इस अन्योन्याध्यास—चिज्जडग्रन्थिको ही अहमर्थ कहा जाता है, फिर अन्त:करणकी उपरतिसे उसकी उपरति होना युक्त ही है। यह उपरति या निवृत्ति भी निरन्वय नाश नहीं है, किंतु कारणरूपसे अवस्थान ही है। अतएव पूर्वापरके अहमर्थमें भेद नहीं है। जैसे एक ही घृतमें कोई भेद नहीं होता, ठीक वैसे ही वही अन्त:करण सुषुप्तिकालमें अविद्यात्मना परिणत होता है और जाग्रत‍्में फिर वही अन्त:करणरूपमें व्यक्त होता है। इस तरह प्रत्यभिज्ञा और अनुभव-स्मरणका सामानाधिकरण्य, कर्मफलभोग-वैयधिकरण्याभाव, अकृताभ्यागम, कृतिविप्रणाशादि दोष भी नहीं होंगे, ‘अथातोऽहङ्कारादेश:, अथात आत्मादेश:’ यह श्रुति भी अहंकारसे पृथक् आत्माके होनेसे प्रमाण है। पूर्वपक्षीकी ओरसे कहा जाता है कि वेदान्तोंके मतसे तो जैसे ‘स एवाधस्तात् स एवोपरिष्टात्’ इत्यादि वचनोंसे भूमा ब्रह्मके साथ आत्माका अभेद बतलाया गया है, वैसे ही आत्माका अहमर्थके साथ भी अभेद बतलाया जा सकता है। अत: जैसे आत्मस्वरूप होनेपर भी भूमाका पृथक् उपदेश है, वैसे ही ‘अहमेवाधस्तादहमेवोपरिष्टात्’ इत्यादि वचनोंसे अहमर्थका पृथक् उपदेश होना सम्भव हो सकता है। तब फिर भेदबोधन कैसा? यदि कहा जाय कि ‘भूमा और आत्मा तो भिन्नत्वेन प्रत्यक्षसे प्रसिद्ध हैं, अत: उनका पृथक् उपदेश एकता-प्रतिपादनके लिये ही उपयुक्त है। जब कि दो सर्वात्मा नहीं हो सकते और भूमा तथा आत्मा—दोनोंकी सर्वात्मता कही गयी है, तब दोनोंकी एकता अर्थात् अभिन्नता सिद्ध हो जाती है। अहंकारकी तो आत्माके साथ एकता प्रत्यक्ष सिद्ध है। अत: आत्मासे पृथक् अहंकारका उपदेश आत्मासे भेद ही सिद्ध करनेके लिये है।’ पर यह असंगत है; क्योंकि यदि अहमर्थसे अन्य आत्माकी भूमा ब्रह्मसे भिन्नता प्रत्यक्षद्वारा असिद्ध है तो भेदार्थ ही दोनोंका उपदेश क्यों न माना जाय? इसके सिवा, जब अहमर्थ तो ब्रह्मभिन्नत्वेन रूपेण सिद्ध है, तब उसका उपदेश अभेद-सिद्धिके लिये ही क्यों न मान लिया जाय? इसी तरह ‘अज्ञातज्ञापकत्वेन श्रुतिका प्रामाण्य सिद्ध होगा।’ आदि पूर्वपक्ष भी असंगत है; क्योंकि अहंकारसे भिन्न आत्माकी भूमारूप ब्रह्मसे भिन्नता प्रत्यक्षद्वारा असिद्ध होनेपर भी अभिन्नता भी उसी तरह असिद्ध ही है, परंतु फिर भी दोकी सर्वात्मता बन नहीं सकती, अत: सार्वात्म्योपदेशान्यथानुपपत्तिकी सहायतासे अभेदमें ही श्रुतिका तात्पर्य मानना युक्त है। परंतु अहमर्थ और आत्माका अभेद असम्भव है; क्योंकि जड, चेतनकी एकता नहीं हो सकती, अत: अहमर्थका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिका आत्मासे अभेद-प्रतिपादनमें तात्पर्य नहीं हो सकता। सारांश यह है कि भूमा ब्रह्म ही ऊपर-नीचे, पूर्व-पश्चिम—सर्वत्र है, वही सब कुछ है, यह कथन अधिष्ठान बुद्धिसे ही सम्भव है। सर्वाधिष्ठान जो है, वही सब कुछ है। अत: यदि भूमा ब्रह्म ही सर्वदेश, काल, वस्तुका अधिष्ठान है, तब तो वही सब कुछ है, ऐसा कहना सम्भव है, अन्यथा असम्भव है; परंतु, जब कि उसी तरह आत्माके लिये भी कहा जा रहा है कि आत्मा ही नीचे-ऊपर, पूर्व-पश्चिम, वही सर्वत्र और वही सब कुछ है, तभी अधिष्ठान होनेसे ही आत्माकी भी सर्वात्मकता बन सकती है। परंतु सर्वप्रपंचका दो अधिष्ठान होना असंगत है, अत: जबतक आत्मा और भूमा ब्रह्मका अत्यन्त अभेद न ज्ञात हो, तबतक दोनोंकी ही सर्वात्मकता उपदेश नहीं संगत हो सकता। इसलिये आत्मा और भूमा ब्रह्मकी एकता स्वीकार्य है। यद्यपि इसी तरह ‘अहमेव अधस्तात्’ मैं ही सब कुछ हूँ। इस तरह अहंकारकी भी सर्वरूपता सुनकर पूर्वन्यायसे आत्मा और भूमाके समान ही अहंकार और आत्माका भी अत्यन्त अभेद मानना चाहिये, तथापि अहंकारकी जडता, दृश्यता, प्रत्यक्षता स्पष्ट ही सिद्ध है। अत: चेतन आत्माका उसके साथ अभेद नहीं हो सकता। इसीलिये अहंकारादेशके पश्चात् आत्मादेशका प्रसंग आता है, जिसका आशय यह होता है कि चिदात्मसंवलित (व्यापक अधिष्ठान चैतन्यमिश्रित) होनेसे ही अहंकारकी सर्वात्मता कही गयी है। वास्तवमें परिच्छिन्न अहंकार सर्वस्वरूप नहीं है, किंतु आत्मा ही सर्वस्वरूप है। कहा जाता है कि ऐसी ही स्थिति है तो अहंकारकी सर्वात्मता न कहकर आत्माकी ही सर्वात्मता कहनी थी, इतनेसे भी आत्मा और ब्रह्मकी एकता सिद्ध हो ही सकती थी, परंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि लोकमें आत्मशब्दका प्रयोग अहमर्थमें ही होता है, अत: ‘आत्मा’ पदसे शुद्ध आत्माकी सर्वात्मता नहीं बतलायी जा सकती थी। परंतु यदि अहंकारकी सर्वात्मताके अनन्तर आत्माकी सर्वात्मता कही जायगी, तब तो इसपर अवश्य ही ध्यान जायगा कि अहंकार और आत्मा इन समानार्थक दो शब्दोंका प्रयोग क्यों किया गया? इस तरह ध्यानसे विवेचन करनेपर निश्चय होगा कि आत्मशब्दसे शुद्ध आत्मा विवक्षित है। अत: उसीकी मुख्य सर्वात्मता है। अहंकारकी तो आत्मयुक्त होनेसे ही सर्वात्मता है। इस तरह आत्मशब्दका अहंकारसे अतिरिक्त शुद्ध आत्मामें पार्थक्य निर्णय करानेके लिये ही अहंकारका पृथक् उपदेश आवश्यक है। अर्थात् अहंकारका पृथक् उपदेश आत्मासे भेद ही सिद्ध करनेके लिये है। कुछ महानुभावोंका तो ऐसा कहना है कि यहाँ संचारिभावका वर्णन है। प्रेमके उद्रेकमें भावुक सभी विश्वको भूमा ब्रह्मरूपसे देखता है, उसीमें स्व-पर-विस्मृतिसे वह अपने-आपको ही भगवान् समझने लगता है। ‘असावहं त्वित्यबलास्तदात्मिका न्यवेदिषु: कृष्णविहारविभ्रमा:।’ (श्रीमद्भा० १०।३०।३) अर्थात् जैसे गोपांगनाएँ कृष्ण-प्रेमोन्मादमें विह्वल होकर अपने-आपको कृष्ण समझने लगी थीं, वैसे ही साधक अपने-आपको ही भूमा मानकर ‘मैं ही सब कुछ हूँ’ ऐसा कहता है, परंतु यह वस्तुस्थिति नहीं, संचारिभाव है; स्थायी नहीं है। अतएव फिर इस भावके मिटनेपर भूमारूप आत्माकी ही सर्वात्मताका अनुभव होता है। इस मतमें भी अहमर्थसे आत्मशब्दार्थ भिन्न ही माना जाता है। यह दूसरी बात है कि इस मतमें आत्मा और भूमा—इन दोनों शब्दोंको परमेश्वर ही अर्थ है और अहंका अर्थ जीवात्मा है, परंतु यहाँ वस्तुके याथात्म्यका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति संचारिभावका वर्णन कर रही है या तत्त्वके भेद-अभेद आदिका, यह चिन्त्य है। कुछ लोगोंका यह भी कहना है कि ‘वेदान्तीके मतमें भूमा, अहंकार और आत्मा—यह तीनों बिम्ब, प्रतिबिम्ब और मुखके समान हैं, अत: औपाधिक ब्रह्म भूमा है, जीव अहमर्थ है और निरुपाधिक चिन्मात्र ब्रह्म आत्मा है। इस दृष्टिसे तो जब वेदान्तीके मतमें भी जीवात्मासे अहंकारकी भिन्नता नहीं सिद्ध होती, तब अहमर्थकी अनात्मता कैसे सिद्ध हो सकती है?’ परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि उसका तात्पर्य यह है कि पहले भूमाका स्वरूप इस तरह बतलाया गया कि ‘यत्र नान्यत्पश्यति, नान्यच्छृणोति, नान्यद्विजानाति’ (छां० उ०) जहाँ न दूसरेको देखता है, न सुनता है, न जानता है, वही भूमा है। ‘स एवाधस्तात्’ वही ऊपर-नीचे, वही सब कुछ है। इस उक्तिमें ‘यत्र’ शब्दसे आधार-आधेयभावकी प्रतीति और ‘स:’ इस शब्दसे उसकी परोक्षता, अप्रत्यक्षता प्रतीत होती थी और इसीसे भूमामें आत्मासे भिन्नता भी प्रसक्त थी। ऐसी स्थितिमें सर्वभेदशून्य, अपरोक्ष, स्वप्रकाश, ब्रह्मके ज्ञानमें बाधा उपस्थित हो जाती, इसीलिये ‘अहमेवाधस्तात्’ ‘मैं ही ऊपर-नीचे सब कुछ हूँ’ इस उक्तिकी आवश्यकता हुई। इससे सिद्ध किया गया कि पूर्वोक्त भूमा, जिसकी सर्वात्मता बतलायी गयी, वह अहमर्थरूप है, जीवसे अभिन्न ही है। एतावता ‘स:’ शब्दसे प्रतीत भूमाकी परोक्षताका वारण हुआ और जीवात्मा-परमात्माका भेद एवं आधाराधेयभाव आदि भी वारित हुआ। जैसे भूमा सर्वात्मा है, वैसे ही अहमर्थ या जीवात्मा भी सर्वात्मा है। जब दो सर्वात्मा नहीं हो सकते, अर्थात् तब ही दोनोंकी एकता समझी जाती है, जिससे अपरोक्ष जीवात्मासे अभिन्न भूमाकी अपरोक्षता एवं आधाराधेय भावादिसे विवर्जितता सिद्ध हो जाती है। परंतु इतनेपर भी यह गड़बड़ी पड़ती थी कि अविवेकी लोग ‘मैं’ या ‘अहं’ का प्रयोग व्यापक शुद्ध चिदात्मामें न करके चिज्जडग्रन्थि या कार्यकारण-संघातमें ही करते हैं। इससे कहीं यह न समझ लिया जाय कि परिच्छिन्न, जड कार्यकरणसंघात ही भूमा ब्रह्म है, अत: अहंकाररहित शुद्ध आत्माकी सर्वात्मता बतलाकर सर्वोपद्रव-सर्वभेदशून्य, स्वप्रकाश भूमा ब्रह्मकी सर्वात्मताका समर्थन किया गया और अहंशब्द-वाच्यार्थ जड अहमर्थसे भिन्न अहंशब्दके लक्ष्यभूत अहमर्थ-साक्षीको मुख्य आत्मा कहा गया है। इसी अर्थको सिद्ध करनेमें भूमादेश, अहंकारादेश, आत्मादेश करनेवाली श्रुतियोंका तात्पर्य है। अत: यहाँ बिम्ब-प्रतिबिम्ब आदि कल्पनाका अवकाश नहीं था। यदि अविद्यामें प्रतिबिम्बित जीवको अहंकारशब्दसे कहनेपर भी प्रसक्त-भेदका वारण और आत्मादेशद्वारा शुद्ध-आत्मासे अहंकारका भेद कहना संगत हो, तो भी अविद्योपाधिक जीवको अहंकार-शब्दसे ‘स्थूलारुन्धतीन्याय’ से कहा जाता। जैसे अरुन्धतीके निकट रहनेवाले स्थूल ताराको ही पहले दिखलाकर बादमें तन्निकटस्थ अरुन्धतीको दिखलाकर पूर्ववाक्यका भी तात्पर्य अरुन्धतीके प्र&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-paashcaaty-drshn-1-1-drshnkii/&quot;&gt;दर्शन&lt;/a&gt;में ही माना जाता है, साथ ही स्थूल, सूक्ष्म, दोनों ही ताराओंमें भेद स्वत: सिद्ध हो जाता है, वैसे ही ‘अहंकार’ शब्दसे पहले अविद्याप्रतिबिम्ब अहंकाराश्रय चैतन्य कहा जा सकता है। लोकमें अपरोक्ष चैतन्यका ‘मैं’ या ‘अहं’ शब्दसे ही व्यवहार होता है, ‘अविद्याप्रतिबिम्ब’ आदि शब्द अलौकिक है, अत: उनसे व्यवहार नहीं होता। पश्चात् ‘आत्मादेशवाक्य’ से ‘अहंकारादेशवाक्य’ का भी शुद्ध आत्माके ही सार्वात्म्य-निश्चयमें तात्पर्य विदित होता है। फिर अहं शब्दवाच्यका और शुद्ध-आत्माका भेद सुतरां सिद्ध हो जाता है। अहमर्थको आत्मा माननेवाले बहुत-से महानुभाव आत्माको अणु मानते हैं, फिर अणु आत्माकी ‘सर्वात्मता’ कैसे हो सकती है? जब अणु आत्मा ही अनन्त है और जगत्, ईश्वर आदि सब सत्य ही है, तब एक अणुरूप जीव ही सब कुछ है, यह कथन संगत ही कैसे हो सकता है? कुछ लोगोंका कहना है कि ‘स एवाधस्तादहमेवाधस्तादात्मैवाधस्तात्’ इत्यादि उपक्रम वाक्यों और ‘सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्व:’ इत्यादि स्मृतियोंसे ‘स एवेदं सर्वम्, अहमेवेदं सर्वम्, आत्मैवेदं सर्वम्’ इत्यादि उपसंहार वाक्योंका तात्पर्य सर्वात्मता (सर्वस्वरूपता)-के प्रतिपादनमें नहीं, किंतु सर्वगतत्व या व्यापकत्वके प्रतिपादनमें ही है। अतएव ‘सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्व:’ यह स्मृति स्पष्ट कहती है कि आप सर्वव्यापक हैं, अत: सर्वस्वरूप हैं। इसी तरह भूमा, अहमर्थ और आत्मा सभी सर्वगत, सर्वव्यापक हैं, अत: उनकी सर्वस्वरूपताका उपचार कहा जाता है। यदि अधिष्ठान या उपादान होनेसे वास्तविक सर्वस्वरूपता होती, तब तो कथंचित् अहंकाररहित केवल चैतन्यमें अहंशब्दका भी तात्पर्य समझा जाता। वाच्यत्व, ज्ञेयत्व आदिके समान सर्वगतत्व भी अनेकोंमें हो सकता है। यदि जीव और ब्रह्मकी एकता ही श्रुतियोंका तात्पर्य हो, तब तो भूमा और आत्माके उपदेशसे ही अभीष्ट सिद्ध हो जाता, फिर अहंकारादेशकी व्यर्थता स्पष्ट ही है। परंतु, यह सब कथन अयुक्त है; क्योंकि उपर्युक्त युक्तियोंके अनुसार ‘स एवाधस्तात्’ इत्यादि वाक्योंका तात्पर्य ब्रह्मात्मैक्यमें ही है, सर्वगतत्व-प्रतिपादनमें नहीं। वस्तुत: जो उपादान या अधिष्ठान होता है, उसीकी सर्वगतता भी सम्पन्न होती है। पृथिव्यादि सर्वप्रपंचका कारण होनेसे ही आकाश आदिकी भी व्यापकता है। अतएव ‘सर्वकारणरूपसे आप सर्वत्र व्यापक हैं, इसलिये आप सर्वरूप हैं,’ इस तरह ‘सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्व:’ इस स्मृतिका भी तात्पर्य सर्वात्मतामें ही है। परिभू:, स्वयम्भू:—इस दो पदोंसे व्यापकता और सर्वरूपता सिद्ध की जाती है। ‘परि-उपरि-सर्वतो वा भवतीति परिभू:’ ऊपर या चारों ओर होनेवालेको ‘परिभू:’ कहा जाता है। ‘यस्योपरि भवति यश्चोपरि भवति स सर्व: स्वयमेव भवतीति स्वयम्भू:’ जिसके ऊपर और जो ऊपर होता है, उस सब कुछ अपने-आप होनेवालेको ‘स्वयम्भू:’ कहा जाता है। ठीक उसी तरह ‘स एवाधस्तात्’ इत्यादि वचनोंसे सर्वव्यापकता कहकर ‘स एवेदं सर्वं’ इत्यादि वचनोंसे उसीकी सर्वरूपता प्रतिपादित की गयी है। अत: उपक्रम-उपसंहारमें ऐक्यरूप्य ही है। इसके सिवा यह भी विचार करना चाहिये कि ‘स भगव: कस्मिन् प्रतिष्ठित:’—भगवन्! वह भूमा किसमें प्रतिष्ठित है? इस प्रश्नमें क्या भूमाका कहीं अवस्थानमात्र पूछा गया है अथवा भूमा परमार्थत: किसमें प्रतिष्ठित है, यह पूछा गया है? यदि पहला पक्ष है, तब तो उसका यह उत्तर है कि ‘स्वे महिम्नि’ अर्थात् अपने प्रपंचरूप महिमामें ही स्थित है। यद्यपि कहा जा सकता है कि ‘यदि भूमा अपनी महिमामें स्थित है, तब तो जैसे राजा अपनी महिमासे गज, अश्व आदिमें स्थित होता है, यहाँ ‘भोग-साधन’ में ‘महिम’ शब्दका प्रयोग हुआ है और वह भी राजाकी समान सत्तावाला है, अर्थात् जैसे राजा सत्य है, वैसे ही उसके भोग-साधन गजादि भी सत्य हैं, वैसे ही प्रपंचको भी ब्रह्मके समान ही सत्य होना चाहिये। ऐसी स्थितिमें वस्तुपरिच्छेद होनेसे भूमामें परिच्छिन्नता अनिवार्य होगी, तथापि यहाँ महिमा-शब्दका अर्थ अपनी समान सत्तावाला भोगसाधन नहीं विवक्षित है, किंतु ‘स्व’ शब्द अपनेमें अध्यस्तरूप ‘स्वीय’ या ‘आत्मीय’ का बोधक है। कोई संकोचक प्रमाण न होनेसे सभी अध्यस्त दृश्य-प्रपंच ‘स्वे महिम्नि’ के ‘स्व’ शब्दका अर्थ और महिमा शब्द उत्कर्षका बोधक है। राजसम्बन्धी होनेसे राजकीय गो, गजादिमें जैसे उत्कर्ष है, वैसे ही प्रकाशक ब्रह्म-सम्बन्धसे अध्यस्त दृश्यमात्रमें उत्कर्ष है। अत: उसके परमार्थ सत्य होनेकी कोई अपेक्षा नहीं है। अतएव ब्रह्ममें परिच्छिन्नता आदि न आ सकेगी।’ यदि दूसरे अभिप्रायसे प्रश्न हो कि भूमा परमार्थत: किसमें प्रतिष्ठित है, तब तो ‘यदि वा नो महिम्नि’—वह महिमा प्रतिष्ठित नहीं है, यही उत्तर है; क्योंकि ‘अन्यो ह्यन्यस्मिन् प्रतिष्ठित:’—दूसरा ही दूसरेमें प्रतिष्ठित होता है। जब भूमासे भिन्न परमार्थ सत्य कोई पदार्थ ही नहीं है, तब भूमाकी किसमें प्रतिष्ठा कही जाय? ‘यत्र नान्यत्पश्यति’ इत्यादि वाक्यसे अद्वैत ब्रह्म ही भूमा कहा गया है। इस तरह जब पूर्व वाक्यसे ही अद्वितीय ब्रह्मका निश्चय हो गया, तब तो फिर उसके अनुसार ही ‘स एवाधस्तात्’ इत्यादि वाक्योंका भी सर्वात्मता-प्रतिपादनमें ही तात्पर्य होगा। दो वाक्योंका पृथक् अर्थ कल्पना करना निरर्थक है। अत: ‘स एवाधस्तात्’ इत्यादि वाक्योंका यही तात्पर्य है कि अध:-ऊर्ध्व, देशकाल आदि सब कुछ भूमा ही है। ‘जाति सर्वगता होती है’ इस सिद्धान्तके अनुसार व्यापक जातिके समान भूमा अन्यमें अधिष्ठित भी हो सकता है। जैसे घटत्वादि जाति घटादिमें तादात्म्यसम्बन्धसे एवं अन्यत्र स्वरूप-सम्बन्धसे रहती है, वैसे ही भूमा अपने कार्योंमें तादात्म्यसम्बन्धसे और अनादि पदार्थोंमें स्वज्ञान-विषयत्वादिसम्बन्धसे प्रतिष्ठित होता है। ‘अहमेवाधस्तात्’ इत्यादिके मध्यमें अहंकारोपदेश भी व्यर्थ नहीं कहा जा सकता; क्योंकि ब्रह्ममें अपरोक्षता, प्रत्यक्चैतन्याभिन्नता आदिके प्रतिपादनके लिये उसकी सार्थकता पहले ही कह चुके हैं। कहा जाता है कि ‘वेदान्त-मतानुसार प्रत्यक्चैतन्य आत्मा ही मुख्यरूपसे अपरोक्ष है। उसके साथ ब्रह्मकी एकता कहनेसे भूमा ब्रह्मकी अपरोक्षता (प्रत्यक्षता) सिद्ध हो ही जाती, फिर अहंकारकी, जो वस्तुत: सर्वरूप नहीं है, सर्वात्मता क्यों कही गयी?’ परंतु इसका उत्तर यही है कि यद्यपि आत्माके सम्बन्धसे ही अहंकारकी भी अपरोक्षता है, अत: आत्माकी एकतासे ही भूमाकी अपरोक्षता सिद्ध हो सकती थी तथापि अहंकार (मैं)-में अपरोक्षता लोकमें बहुत प्रसिद्ध है, इसलिये उसकी उक्ति सार्थक है। इसके सिवा यदि ‘अहं’ का अर्थ अणुपरिमाण आत्मा ही मान लिया जाय, तब तो उसमें व्यापकता, सर्वरूपता आदि कुछ भी नहीं बन सकती। कुछ लोग कहते हैं कि ‘भूमा नारायणाख्य: स्यात् स एवाहङ्कृति: स्मृत:। जीवस्थस्त्वनिरुद्धो य: सोऽहङ्कार इतीरित:। अणुरूपोऽपि भगवान् वासुदेव: परो विभु:। आत्मेत्युक्त: स च व्यापी’ इस स्मृतिमें भूमारूप नारायणको ही अहंकृति कहा गया है एवं जीवमें रहनेवाले अनिरुद्धको ही अहंकार कहा गया है और ‘अनिरुद्धो हि लोकेषु महानात्मा परात्पर:। योऽसौ व्यक्तत्वमापन्नो निर्ममे च पितामहम्॥ सोऽहङ्कार इति प्रोक्त: सर्वतेजोमयो हि स:’ इत्यादि स्मृतियोंसे व्यक्त-भावको प्राप्त होकर पितामहको रचनेवाला ही अहंकार कहा गया है। अत: इन स्मृतियोंके अनुसार ही श्रुतिका अर्थ होना चाहिये। परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि सर्वात्मता-प्रतिपादक श्रुति-वचनोंके अनुसार ही स्मृतियोंका अर्थ करना युक्त है। इस दृष्टिसे इन स्मृतियोंका यही अर्थ होता है कि ‘नारायण ही भूमा है और वही अहंकृति है’ अर्थात् अहंकारोपलक्षित चित्तसे अभिन्न होनेके कारण वही अहंकृति भी कहलाता है। अविद्याप्रतिबिम्बरूप जीवके आश्रित अविद्या, काम, कर्मके अनुसार इहलोक-परलोकमें—कहींपर रुकनेवाला अहंकार ही ‘अनिरुद्ध’ है। इसमें और शुद्ध आत्मामें अवश्य ही भेद है। मोक्षधर्मके विवेचनसे यह स्पष्ट हो जाता है ‘परमात्मेति यं प्राहु: सांख्ययोगविशारदा:। तस्मात्प्रसूतमव्यक्तं प्रधानं तद्विदुर्जना:॥’ अर्थात् सांख्ययोगविशारद जिसे परमात्मा कहते हैं, उसीसे प्रधान या अव्यक्त उत्पन्न होता है। अव्यक्ताद् व्यक्तमुत्पन्नं लोकसृष्टॺर्थमीश्वरात्। अनिरुद्धो हि लोकेषु महानात्मा परात्पर:॥ योऽसौ व्यक्तत्वमापन्नो निर्ममे च पितामहम्। सोऽहङ्कार इति प्रोक्त: सर्वतेजोमयो हि स:॥ पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम्। अहङ्कारप्रसूतानि महाभूतानि पञ्च च॥ (सर्वदर्शन सं०) लोकसृष्टॺर्थ अव्यक्त (अव्यक्तभावापन्न ईश्वर)-से अनिरुद्ध या महान् आत्मा (महत्तत्त्व, समष्टिबुद्धि, सूत्रात्मा या हिरण्यगर्भ)-का प्रादुर्भाव हुआ। जिस महान‍्ने व्यक्तभावापन्न होकर पितामह (विराट्)-को रचा है, वही महान् आत्मा (हिरण्यगर्भ) आगे चलकर अहंकार कहलाता है। वह बुद्धिस्वरूप या तेज—(सत्त्व) प्रधान सूक्ष्म शरीरका अभिमानी होनेसे ही तेजोमय है। उसी अहंकारसे फिर पंचभूतोंकी रचना हुई। मोक्षधर्मके इन वाक्योंमें सांख्यमतानुसार महत्तत्त्व और अहंकारमें ही ‘महान्’ और ‘अहंकार’ शब्दका प्रयोग हुआ है। वेदान्तमतानुसार वीक्षण और विचिकीर्षा (प्रपंचरूपसे आविर्भावकी इच्छा) ही उनके अर्थ हैं। ‘तदैक्षत’ इस श्रुतिसे जो ईक्षण कहा गया है, उसे ही महान् कहा जा सकता है। ‘एकोऽहं बहु स्याम्’ इत्यादि श्रुतिके अनुसार अनेक होनेकी इच्छा ही अहंकार है, अतएव ईक्षणके पश्चात् ही ‘अहं’ पदका उल्लेख हुआ है। ‘अहङ्कारश्चाहं कर्तव्यश्च’ ‘महाभूतान्यहङ्कार:’ इत्यादि श्रुति-स्मृतिमें अहंकारकी उत्पत्ति और लय बतलाया गया है। अत: उसमें व्यापकता कभी नहीं बन सकती। जहाँ भी कहीं अहमर्थकी व्यापकता कही गयी है, सर्वत्र ही अहंकारसे रहित, अहंकारके अधिष्ठानभूत व्यापक चैतन्यमें ही लक्षणासे अहंपदका प्रयोग हुआ है। जैसे ‘अहं मनुरभवं सूर्यश्च’ इस वामदेवकी उक्तिमें यद्यपि आपातत: प्रतीत होता है कि परिच्छिन्न जीवकी ही सर्वरूपता कही जा रही है, तथापि सिद्धान्तत: वहाँ लक्षणासे अहंकाररहित व्यापक शुद्ध चैतन्यमें ‘अहं’ का प्रयोग निर्णय किया गया है। वैसे ही जहाँ भी अहमर्थकी व्यापकता सुनायी दे, वहाँ व्यापक चैतन्य ही ‘अहं’ का अर्थ समझना चाहिये। कुछ लोग कहते हैं कि ‘अहङ्कारश्चाहं कर्तव्यश्च’ इत्यादि स्थलोंमें महत्तत्त्वका कार्य और मन आदिका कारण अहंत्तत्त्व लिया गया है। ‘महत्तत्त्वाद्विकुर्वाणाद्भगवद्वीर्यसम्भवात्। क्रियाशक्तिरहङ्कारस्त्रिविध: समपद्यत’ (श्रीमद्भा० ३।२६।२३) इत्यादि वचनोंके अनुसार यह सात्त्विक, राजस, तामस—त्रिविध अहंकार आत्मस्वरूप अहमर्थसे सर्वथा भिन्न है। यदि अहमर्थ और अहंकारमें भेद न माना जायगा, तब तो इसी तरह ‘बुद्धिरव्यक्तमेव च’ (गीता १३।५) इस वचनमें भी विवाद खड़ा हो सकेगा। यहाँ ‘बुद्धि’ पद क्षेत्रान्तर्गत दृश्यविशेषके लिये आया है। परंतु यदि ‘बुद्धि’ शब्दसे संवित् (स्वप्रकाश ज्ञानरूप आत्मा)-का बोध हो, तब तो संवित‍्का भी क्षेत्रकोटिमें ही परिगणन होगा। अत: कहना होगा कि भले ही कहीं ‘बुद्धि’ और ‘ज्ञान’ पदसे संवित् या आत्मा कहा जाय, पर ‘बुद्धिरव्यक्तमेव च’ इस क्षेत्रस्वरूपके निरूपण-प्रसंगका ‘बुद्धि’ शब्द संवित‍्का बोधक नहीं है। ठीक इसी तरह क्षेत्रमें प्रयुक्त अहंकार शब्दका अर्थ आत्मा नहीं है; किंतु ‘अहमात्मा गुडाकेश’ (गीता १०।२०) इत्यादि स्थलोंका ही ‘अहं’ पद आत्माका बोधक है। ‘दम्भाहङ्कारसंयुक्ता:’ (गीता १७।५) इत्यादि स्थलोंमें ‘अहं’ पदका प्रयोग देहमें, अहंबुद्धि और गर्वमें होता है। ‘गर्वोऽभिमानोऽहङ्कार:’ (अमर० १।७।२१) इस कोषसे भी मालूम होता है कि अहंकार शब्द केवल अहमर्थ (आत्मा)-का ही वाचक नहीं है। आत्माका बोधक ‘अहं’ शब्द ‘अस्मद्’ शब्दसे बना है और अहंकार शब्द अनात्माका बोधक है। उसका पर्यायभूत ‘अहं’ शब्द मान्त (मकारान्त) अव्यय है। परंतु यह सब कथन असंगत है। मान्त एवं दान्तभेदसे अर्थभेद कल्पनामें कोई भी प्रमाण नहीं है। अहंरूपसे प्रतीयमान अहंकारके ही बोधक सभी ‘अहं’ शब्द हैं। ‘अहं ब्रह्मास्मि’ इत्यादि स्थलोंमें लक्षणाद्वारा ही अहंकारसे अतिरिक्त आत्माका बोध होता है। कौन ‘मान्त’ है, कौन ‘दान्त’ इस तरह जिसका निर्धारण नहीं है, ऐसे ‘अहं’ शब्दका अधिक प्रयोग अहंकारमें ही होता है। जब अहंकार शब्दको आप भी अनात्माका वाची मानते हैं; तब ‘सोऽहङ्कार इति प्रोक्त:’ (सर्वद० सं०) इत्यादि पूर्व वचनोंमें, आत्मामें अहंकार पदका प्रयोग लाक्षणिक ही होगा। बस, फिर तो ‘मान्त’ ‘दान्त’ साधारण अहंशब्द भी मुख्य वृत्तिसे अहंकारका वाची होकर लक्षणासे आत्माका वाचक होगा। जैसे ‘अनिरुद्धो हि लोकेषु महानात्मा परात्पर:॥ योऽसौ व्यक्तत्वमापन्नो निर्ममे च पितामहम्। सोऽहङ्कार इति प्रोक्त:०’ (सर्वदर्शनसं० ४) यहाँ लक्षणासे ही आत्मामें प्रयोग मानना उचित है। कुछ लोग अहमर्थमें आत्मा-अनात्मा—दोनोंका मिश्रण नहीं मानते और कर्तृत्व आदिको मुख्य आत्माका ही धर्म मानते हैं, परंतु यह असंगत है; क्योंकि असंग, अनन्त आत्मामें कर्तृत्व माननेमें मुक्तिका होना अत्यन्त असम्भव हो जायगा। कहा जाता है कि ‘यदि अहंकार या अहंशब्द चिज्जड-ग्रन्थिका वाचक हो, तब तो दूसरोंकी ग्रन्थिमें भी ‘अहं’ का प्रयोग होना चाहिये।’ परंतु उन्हें यह भी देखना चाहिये कि उनके ही मतमें अहंकार और मान्त अहम‍्का प्रयोग दूसरोंके अन्त:करण या क्षेत्रमें क्यों नहीं होता? यदि उन्हें ऐसा इष्ट हो तो हमें भी इष्ट ही है। भेद यही है कि हमारे यहाँ इन पदोंकी अपने उच्चारयितामें शक्ति है। शुद्ध आत्मा उच्चारयिता है नहीं, अत: जैसे वहाँ लक्षणासे प्रयोग होता है, वैसे ही दूसरी ग्रन्थिमें भी होगा। कहा जाता है कि कर्तृत्व आदिके अनात्म-धर्म होनेपर भी उसे अपने आश्रय-प्रतीतिके बिना भी आत्मामें वैसे ही प्रतीति होनी चाहिये, जैसे ‘गौरोऽहम्’ यहाँ गौरत्वके आश्रय देहकी प्रतीति न होनेपर भी गौरत्वकी आत्मामें प्रतीति होती है, परंतु ध्यान देनेपर स्पष्ट प्रतीत होता है कि दृष्टान्तमें भी देहत्वरूपसे देहका भान होनेपर भी गौरत्व मनुष्यत्वरूपसे देहका भान अवश्य रहता है। फिर दार्ष्टान्तिक कर्तृत्व आदि आश्रयभूत अहमर्थकी प्रतीतिके बिना कैसे प्रतीत होंगे? सार यह है कि जहाँ आरोप अनुभूयमान होता है, वहाँ या तो प्रतिबिम्बरूपता होती है अथवा धर्मीका अध्यास अवश्य होता है। जब कर्तृत्वादि प्रतिबिम्बरूप नहीं है, तब अवश्य ही धर्मीका अध्यास मानना चाहिये। अहं प्रत्ययका विषय होनेसे शरीरके समान अहमर्थ अनात्मा है इत्यादि अनुमानसे भी अहमर्थकी अनात्मता सिद्ध होती है। कहा जाता है कि इस तरह तो अहमर्थके भीतर अधिष्ठानभूत चैतन्य भी अहं प्रत्ययका विषय है, फिर उसे भी अनात्मा कहना पड़ेगा। परंतु इसका उत्तर स्पष्ट है। जिस रूपसे उसे अहंप्रत्यय-विषयता है, उस रूपसे उसकी अनात्मता इष्ट ही है और स्वरूपसे वह सर्वथा अविषय है, अत: उससे अनात्मताकी प्रसक्ति नहीं है। अहमर्थ आत्मासे अन्य है। ‘अहं’ शब्दका अभिधेय (वाच्य) होनेसे अहंकारशब्द-वाच्यके समान पर्यायता दिखलायी जा चुकी, अत: असिद्धिकी कल्पना नहीं की जा सकती। कहा जाता है कि वेदान्ती भी तो ‘गौरोऽहम्’ इस तरह आत्माको गौरत्वकी कल्पनाका अधिष्ठान मानता है और ‘मा न भूवम्, भूयासम्’ इत्यादि रूपसे आत्माको ही परप्रेमास्पद मानता है। साथ ही अहमर्थ अपनी सत्तामें प्रकाश (बोध)-से रहित नहीं होता, अत: आत्माकी स्वप्रकाशता भी कही जाती है। यदि अहमर्थ अनात्मा ही हो, तब तो यह सब उपर्युक्त कथन कथमपि संगत न हो सकेगा; क्योंकि ‘गौरोऽहम्’, ‘मा न भूवम्’ अहमर्थकी प्रकाशाव्यभिचारिता यह सभी अहमर्थसे ही सम्बन्धित है। अत: यदि वह अनात्मा है, तब तो यह अहमर्थसे सम्बन्धित स्वप्रकाशत्वादि अनात्मामें ही पर्यवसित होंगे, परंतु यह कथन ठीक नहीं है। गौरत्वादि अनात्माके आरोपका अधिष्ठान अहमर्थ नहीं है, अपितु आत्मा ही है। किंतु जैसे ‘इदम्’ (पुरोवर्ती शुक्तिकादि) अधिष्ठानका अवच्छेदक होनेसे अधिष्ठान कहलाता है, वैसे ही अहमर्थ भी अधिष्ठानका अवच्छेदक होनेसे अधिष्ठान कहलाता है। वास्तवमें अहमर्थ अनात्माके आरोपका अधिष्ठान नहीं है। आत्मामें अहंकारका ऐक्यारोप (भ्रम) होनेसे ही अहमर्थमें प्रेमास्पदत्वकी प्रतीति होती है। जो कहा जाता है कि ‘ऐसा माननेसे अन्योन्याश्रय-दोष होगा’, वह भी ठीक नहीं। सुषुप्तिकालमें आत्माका प्रकाश होता है, अहमर्थका प्रकाश नहीं होता। इसीसे उन दोनोंका भेद सिद्ध हो जाता है। कहा जाता है कि ‘अहमर्थके प्रेमसे भिन्न अन्य प्रेमका अनुभव ही नहीं होता, अत: अहमर्थको ही प्रेमास्पद मानना चाहिये, परंतु यह ठीक नहीं। परामर्शसे सिद्ध सुषुप्तिमें अहमर्थशून्य आत्माके प्रेमका अनुभव स्पष्ट है, अत: अहमर्थ-प्रेमसे भिन्न भी आत्मप्रेम है ही। यहाँ सन्देह होता है कि यद्यपि अहितमें हितबुद्धिसे प्रेम उत्पन्न होता है तथापि जो प्रेमका आस्पद नहीं है, उसमें प्रेमास्पदताका आरोप कहीं भी नहीं देखा गया। अत: यदि अहमर्थ-प्रेमास्पद आत्मा नहीं है, तब इसमें प्रेमास्पदताका आरोप कैसे हो सकता है?’ परंतु इसका समाधान यह है कि अहमर्थमें प्रेमास्पदत्वका आरोप होता है, ऐसा नहीं; किंतु यह कहा जा रहा है कि अहमर्थमें आत्माके ऐक्यका आरोप होनेसे प्रेमास्पदता है; स्वाभाविक नहीं। स्वाभाविक प्रेमका आस्पद आत्मा ही है। इच्छा और प्रेममें भेद है, अतएव सिद्ध वस्तुमें भी स्नेहात्मक-वृत्तिरूप प्रेम होता है। रहा यह कि ‘अहमर्थका प्रकाशके साथ व्यभिचार न होनेसे उसे ही आत्मा माना जाय’ यह भी ठीक नहीं; क्योंकि वह तो अहमर्थ और आत्माके भेदमें भी बन सकता है, परंतु स्वप्रकाश आत्मसम्बन्धके बिना जड अहमर्थका प्रकाशाव्यभिचार नहीं हो सकता। अतएव वह भी अहमर्थ भिन्न आत्मामें प्रमाण है; अर्थात् अहमर्थके प्रकाशाव्यभिचारसे उसकी स्वप्रकाशता नहीं मानी जा सकती, अपितु इससे स्वप्रकाश आत्माका सम्बन्ध ही निश्चित होता है। कहा जाता है कि ‘समारोप्यस्य रूपेण विषयो रूपवान् भवेत्। विषयस्य तु रूपेण समारोप्यं न रूपवत्॥’ अर्थात् आरोपितके रूपसे विषय रूपवान् होता है, विषय (अधिष्ठान)-के रूपसे समारोपित पदार्थ रूपवान् नहीं होता। इस युक्तिसे आरोपित अहमर्थके अप्रेमास्पदत्वसे ही आत्मामें अप्रेमास्पदत्वकी प्रतीति होनी चाहिये, परंतु यहाँ विचार करना चाहिये कि क्या अधिष्ठानका धर्म आरोपितमें प्रतीत होना चाहिये अथवा आरोप्यगत धर्मका अधिष्ठानमें भान होना चाहिये? पहला पक्ष तो इसलिये ठीक नहीं है कि अधिष्ठानके जिस धर्मसे विशिष्ट स्वरूपज्ञानसे आरोपितकी निवृत्ति हो जाती है, वह धर्म आरोप्यमें कदापि नहीं प्रतीत होता—ऐसा नियम है। जैसे शुक्तिरजतमें शुक्तिगत इदन्ताकी प्रतीति होनेपर भी शुक्तिगत नीलपृष्ठत्व, त्रिकोणत्व, शुक्तित्वादि धर्मका भान नहीं होता; क्योंकि शुक्तित्वादिविशिष्ट शुक्तिकाके ज्ञान होनेसे आरोपित रजतकी निवृत्ति हो ही जाती है। अत: अधिष्ठानके उसी रूपसे समारोप्य रूपवान् नहीं होता, जिसके ज्ञानसे आरोपित मिट जाय। प्रेमास्पदत्व वैसा धर्म नहीं है। अत: जैसे शुक्तिरजतमें शुक्तिकी इदन्ता भासित होती है, वैसे ही आत्मगत प्रेमास्पदताके अहमर्थमें अभानका नियम नहीं कहा जा सकता। दूसरा पक्ष भी संगत नहीं है; क्योंकि आरोप्यगत वे ही धर्म अधिष्ठानमें प्रतीत हो सकते हैं, जो अधिष्ठानगत धर्म-प्रतीतिके विरोधी न हों। अतएव सर्पगत भीषणता, अधिष्ठानगत इदन्ता-प्रतीतिके अविरुद्ध होनेके कारण अधिष्ठानमें भासित होती है, परंतु अधिष्ठानगत धर्म इदन्ताकी प्रतीतिके विरुद्ध देशान्तरस्थत्वादि अन्य धर्मकी प्रतीति नहीं होती। ठीक उसी तरह आत्मामें भी आरोप्य अहमर्थके वे ही धर्म प्रतीत हो सकेंगे, जो आत्मधर्म-प्रतीतिके बाधक न हों। परंतु यहाँ तो अप्रेमास्पदत्वरूप आरोप्यधर्म प्रेमास्पदत्वरूप अधिष्ठानभूत आत्मधर्म-प्रतीतिसे विरुद्ध है, अत: आत्मामें उसका आरोप नहीं हो सकेगा। जिस समय ही अहमर्थसे आत्मैक्यका अभ्यास होगा, उसी समय आरोप्यमें भी प्रेमास्पदत्व प्रतीत होगा। फिर तो आरोप्यमें अप्रेमास्पदत्व नहीं प्रतीत होगा। ऐसी स्थितिमें अधिष्ठानभूत आत्मामें उसके अप्रेमास्पदत्वकी प्रतीति कैसे हो सकती है? कुछ लोग परिहार करते हैं कि आत्मा सुख एवं अनुभवरूप है, इसीलिये ‘अहं सुखमनुभवामि’—मैं सुखका अनुभव करता हूँ, इस तरह अहमर्थसे भिन्न सुख और अनुभवकी प्रतीति होती है। परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि वैषयिक सुख और अनुभव आत्मासे पृथक् वस्तु है और वही विषयोपप्लवविवर्जित स्वप्रकाश अनन्त आनन्दरूप ही है। कहा जाता है कि मोक्षमें यदि अहमर्थ न रहेगा, तब तो ‘आत्मनाश ही मोक्ष है’ यह बाह्य (शून्यवादी) मत आ जायगा; क्योंकि उस मतके समान ही तुम्हारे मतमें भी प्रेमास्पद अहमर्थका नाश स्वीकार्य है। अहमर्थसे भिन्न अन्य किसीकी तरह तो शून्यवादीके यहाँ भी शून्य बना ही रहता है, परंतु यह सब निरर्थक है। औपाधिक प्रेमास्पद अहमर्थके नाशसे यदि आत्मनाशापत्ति हो तो औपाधिक प्रेमास्पद देहनाशमें भी आत्मनाशकी प्रसक्ति होगी। अतएव जो यह कहा जाता है कि ‘मामृतं कृधि ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासम्’ इत्यादि श्रुतियोंसे अहमर्थके ही अमृतत्व, विरजस्त्व विपाप्मत्वादिकी आकांक्षा होती है, अत: मुक्तिमें अहमर्थका होना अनिवार्य है। यह भी ठीक नहीं क्योंकि वहाँ सर्वत्र ‘अहम्’ के लक्ष्यार्थ चैतन्यके ही अमृतत्वादिकी आकांक्षा है। जैसे ‘अहं पुष्ट: स्याम्’—मैं पुष्ट होऊँ, यहाँ स्वसमयविद्यमान शरीरकी ही पुष्टता अभीष्ट है, वैसे ही उपर्युक्त विषयमें भी समझना चाहिये। यद्यपि ‘शरीरं पुष्टं स्यात्’—शरीर पुष्ट हो, इस इच्छाके समान ‘आत्ममात्रं मुक्तं स्यात्’—आत्ममात्र मुक्त हो ऐसी इच्छा नहीं दिखायी देती, अत: मुक्तिकी अनिष्टतापत्ति कही जा सकती है तथापि विचार करनेसे विदित होगा कि इच्छाके समय अन्त:करणका अध्यास होता है। अतएव यद्यपि आत्ममात्रकी मुक्तिकी इच्छा नहीं अनुभूत होती तथापि विशिष्टगत मुक्तिकी इच्छाका ही शुद्धात्मगतत्वेन पर्यवसान होता है। आशय यह है कि इच्छाके भासक साक्षीसे ही अहमर्थका भान होता है, अत: इच्छाके उल्लेखकालमें अहमर्थका उल्लेख होनेपर भी विवेकियोंको अहमर्थके विविक्त आत्मगतरूपसे ही मुक्तिकी इच्छा होती है। अविवेकीको भी, जो दु:खमूलवाला हो, उसमें दु:खमूलका उच्छेद हो, ऐसी इच्छा होती है। इस तरह शुद्धात्मामें दु:खमूलोच्छेदरूप मुक्तिकी इच्छा पर्यवसित होती है; क्योंकि दु:खमूल अज्ञानवाला नहीं है। कहा जाता है कि यदि अहमर्थ अन्त:करण ग्रन्थिरूप ही है, तब तो ‘मम मन:’—मेरा मन, मेरा अन्त:करण—ऐसी बुद्धि नहीं होनी चाहिये; क्योंकि अन्त:करण और मन दोनों एक ही वस्तु हैं, परंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि अन्त:करण जडमात्र है। परंतु चेतन आत्मा और अन्त:करण—इन दोनोंकी ग्रन्थि अहमर्थ है। इस भेदसे ‘मेरा मन’ इस रूपमें षष्ठी अर्थात् सम्बन्ध बन सकता है। फिर भी कहा जाता है कि ‘मन: स्फुरति, मनोऽस्ति’ इस ज्ञानमें भी मनकी सत्ता और स्फूर्तिरूप आत्मासे सम्बन्ध है, अत: इसे भी चिदचिद् ग्रन्थि कहा जा सकता है। फिर अहं इस ज्ञान और ‘मन: स्फुरति’ इस ज्ञानमें समता क्यों नहीं प्रतीत होती? यह ठीक नहीं है; क्योंकि सम्बन्धमात्र ही ग्रन्थि या संवलन नहीं कहा जाता, किंतु तादात्म्येन प्रतिभास (अभेदरूपसे प्रतीति) ही संवलन या ग्रन्थि है। ‘मन: स्फुरति, मनोऽस्ति’ इत्यादि स्थलोंमें आख्यातसे मनमें स्फुरण एवं सत्ताकी आश्रयता ही प्रतीत होती है, मनमें स्फुरणादिका तादात्म्य नहीं प्रतीत होता। अहं इस स्थानमें तो अन्त:करणका चेतनमें तादात्म्याध्यास है। कहा जाता है कि सभी भ्रान्तियोंमें अधिष्ठानांश और आरोप्य—इन दो अंगोंकी अवश्य प्रतीति होती है। यदि ‘इदं रजतम्’ इत्यादि भ्रान्तियोंमें अधिष्ठानांश इदन्ताकी प्रतीति न अपेक्षित हो, तब तो बिना अधिष्ठानका भ्रम मानना पड़ेगा, जिससे शून्यवादकी प्रसक्ति अवश्य होगी। परंतु ‘अहं’ इस भ्रान्तिमें तो दो अंशकी प्रतीति ही नहीं होती। यदि कहा जाय कि वहाँ भी दो अंशकी कल्पना कर लेनी चाहिये, तब तो फिर ‘आत्मा’ इस बुद्धिमें भी दो अंशकी कल्पनासे भ्रान्तिता-सिद्धि माननी होगी। यदि दो अंशकी प्रतीति न होनेसे ‘आत्मा’ इस प्रतीतिकी भ्रान्ति न मानें, तब तो ‘अहं’ इस प्रतीतिको भी भ्रान्ति मानना व्यर्थ है। इन सन्देहोंका समाधान यह है कि यदि भ्रान्तिमें अधिष्ठान और आरोप्य—इन दो अंशकी प्रतीतिका आपादन करना है तो वह तो मान्य ही है। अहमर्थका मिथ्यात्व ही उसके द्वितीय अंशके होनेमें प्रमाण है। परंतु ‘आत्मा’ इस बुद्धिके विषयमें भी दो अंश है, इसमें तो कुछ भी प्रमाण नहीं है। अत: ‘आत्मा’ इस बुद्धिमें भी दो अंशकी कल्पनाका अवकाश नहीं है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि भिन्न-भिन्न दो प्रकारोंसे अवच्छिन्न, अधिष्ठान और आरोप्यका विषय करना ही भ्रान्तिके दो अंश हैं; क्योंकि जहाँ रजतत्वसंसर्गके आरोपसे ही ‘इदं रजतम्’ ऐसी प्रतीति होती है, वहाँ दो प्रकारका भान नहीं होता है। रजतत्वमें कोई भी दूसरा प्रकार (विशेषण) नहीं है। रजतादिको रजतत्वका प्रकार माननेमें भी कोई प्रमाण नहीं है। कुछ महानुभाव यह भी कहते हैं कि अहमर्थाध्यासमें भी ‘अज्ञोऽहं स्फुराम्यहम्’ इस तरह स्फुरण और अहं—इन दो अंशोंकी प्रतीति होती ही है। जैसे कभी ‘रजतम्’ इतनेका ही उल्लेख होता है, वैसे ही ‘अहं’ इतनेका भी उल्लेख बन सकता है। अत: ‘रूप्यं स्फुरति’ की तरह ‘अहमस्मि, अहं स्फुरामि’ यहाँपर स्पष्ट दोनों ही अंशोंकी प्रतीति होती है। इतना भेद अवश्य है कि जहाँ इदन्त्वावच्छिन्न स्फुरण अधिष्ठान है, वहाँ ‘इदं रूप्यम्’ इत्यादि प्रकारसे बुद्धि होती है, जहाँ केवल स्फुरणभाव ही अधिष्ठान है, वहाँ ‘स्फुरामि’ ऐसी ही बुद्धि होती है। फिर भी ‘मन: स्फुरति, अहं स्फुरामि’ इन दोनों प्रतीतियोंमें विलक्षणता इसलिये है कि ‘मन’ शब्दसे मनस्त्वमात्र विवक्षित है और ‘अहं’ शब्दसे मन और देहसे अवच्छिन्न चित्स्वरूप उच्चारयितृत्वका उल्लेख होता है। यहाँ सन्देह होता है कि ‘अहं स्फुरामि’ यह भ्रम तो अध्यस्त है, अत: वह अधिष्ठान कैसे होगा? परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि वहाँ स्फुरणरूप चैतन्यको ही अधिष्ठान कहा जाता है, अविद्यावृत्तिको नहीं। इस तरह ‘अहमर्थ आत्मा है’ इसमें प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है। मोक्षसाधन कृतिका आश्रय होनेसे अहमर्थ मोक्षमें अन्वयी है, यह अनुमान भी प्रमाण नहीं है; क्योंकि कृत्याश्रयमें मोक्षान्वयित्वकी व्याप्तिका कहीं दृष्टान्त ही नहीं है। सामान्य व्याप्तिमें भी व्यभिचार है। ऋत्विज लोग स्वर्गसाधन कृतिके आश्रय तो होते हैं, परंतु स्वर्गान्वयी नहीं होते। अहमर्थ अनर्थका आश्रय होनेसे सम्प्रतिपन्नकी तरह अनर्थ-निवृत्तिका आश्रय है, इस अनुमानसे भी अहमर्थकी आत्मता नहीं सिद्ध होती; क्योंकि यह अनुमान शरीरमें व्यभिचारी है। ‘अहमज्ञ:’ इस प्रतीतिसे जैसे अहमर्थमें अनर्थाश्रयताकी प्रतीति होती है, वैसे ही ‘स्थूलोऽहमज्ञ:’ इस प्रतीतिसे शरीरमें भी अनर्थाश्रयता सिद्ध होती है। कहा जाता है कि ‘कस्मिन् न्वहमुत्क्रान्ते उत्क्रान्तो भविष्यामि, कस्मिन् वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामि’, ‘स प्राणमसृजत’, ‘हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता:’ इत्यादि श्रुतियोंमें प्राण और मनके पहले ही अहंका श्रवण है। ‘तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मि’ इस श्रुतिमें भी शुद्धात्मामें ‘अहं’ पदका प्रयोग है। ‘अहमित्येव यो वेद्य: स जीव इति कीर्तित:। स दु:खी स सुखी चैव स पात्रं बन्धमोक्षयो:’ इत्यादि श्रुतियोंमें भी अहमर्थसे ही बन्ध-मोक्षका होना सिद्ध होता है। ‘तद्योऽहं सोऽसौ’, ‘मामेव ये प्रपद्यन्ते’ (गीता ७।१४) इनसे भी मालूम होता है कि अहमर्थ ही आत्मा है, परंतु यह सब विचार असंगत है। उपर्युक्त सभी स्थानोंमें लक्षणासे ही विशिष्ट वाचक अहं शब्दका शुद्ध आत्मामें प्रयोग मानना चाहिये, यह बात पहले ही कही जा चुकी है। जैसे ‘युष्मद्’ शब्द सम्बोध्य चेतनका बोधक होता हुआ भी लक्षणया अचेतनमात्रका बोधक होता है; वैसे ही ‘अस्मद्’ शब्द अहंकारविशिष्ट चेतनका बोधक होता हुआ भी लक्षणासे केवल शुद्ध चेतनमें ही प्रयुक्त होता है। आन्तर-बाह्य सभी प्रपंचका अधिष्ठान (आधार) सत् ही है, इसलिये घट, पट, मठ, पृथ्वी, जल, तेज, आकाश सबके साथ ‘सत्’ (है) लगता है; जैसे आकाश सत् (है), वायु सत् (है), घट सत् (है) आदि। जैसे मिट्टीके घट-उदंचन आदि हर एक कार्यमें मिट्टी है, जलके तरंग, बुलबुले आदि हर एक कार्यमें जल है, वैसे ही एक कार्यमें सत्, सत्ता या हस्ती है, अत: वही सत् कारण है। आकाशका कारण ‘अहं तत्त्व’ है और उसका कारण ‘महत्तत्त्व’ और उसका भी ‘अव्यक्त तत्त्व’ है। जैसे सुषुप्तिमें अज्ञान या निद्रासे आवृत स्वप्रकाश सत‍्द्वारा ही मेघसे ढँके हुए सूर्यमें बादलकी तरह अज्ञान या निद्राका प्रकाश होता है, वैसे ही समष्टि अज्ञान या निद्रासे आवृत व्यापक स्वप्रकाश सत् ही उसका प्रकाशक होता है। आवृत सत‍्से भासित समष्टि अज्ञानको ही ‘अव्यक्त’ कहा जाता है। उस अव्यक्तसे उत्पन्न होनेवाली समष्टि बुद्धि या ज्ञानको ही ‘महत्तत्त्व’ कहा जाता है। जैसे घोर नींदसे अकस्मात् जगाये जानेपर पहले अहंकार-ममकारसे शून्य केवल कुछ ज्ञान होता है, वैसे ही समष्टि सुषुप्तिके पश्चात् अज्ञानावृत सत‍्को अहंकार-ममकार-शून्य समष्टि ज्ञान उत्पन्न होता है। यह ज्ञान अज्ञानरूप अव्यक्तका परिणाम है। जैसे अप्रकाशरूप पर्वतकी खानसे प्रकाशमय मणिका प्रादुर्भाव होता है, किंवा जैसे सूर्यके प्रकाशको न व्यक्त करनेवाली मिट्टीसे ही उत्पन्न होकर काँच सूर्यप्रतिबिम्बका ग्राहक होता है, वैसे ही निखिल शक्तियोंके आश्रय केन्द्र अज्ञान (अचित्तत्त्वसे) चैतन्य-प्रतिबिम्बग्राहकज्ञान उत्पन्न होता है (यहाँ चित्स्वरूप परमात्मासे विलक्षण अचित् या जड-शक्ति ही अज्ञान पदसे विवक्षित है, इसीका परिणाम वृतिरूप ज्ञान है)। यह स्वप्रकाश परमात्मरूप नित्यबोध या ज्ञानसे भिन्न है, अत: उसीके प्रतिबिम्ब या आभाससे युक्त होनेके कारण अचित्परिणाममें औपचारिक ‘ज्ञान’ पदका प्रयोग होता है। जाग्रत् एवं स्वप्नके ज्ञानोंका सुषुप्ति में लय हो जाता है और सुषुप्तिके पश्चात् ही इनका पुन: प्रादुर्भाव होता है। अत: जैसे मिट्टीसे उत्पन्न और उसमें लीन होनेवाले विकारोंका मिट्टी कारण समझी जाती है, वैसे ही जाग्रदादि ज्ञानोंका सौषुप्त अज्ञान कारण समझा जाता है। सोकर जागनेवालेके अहंकार-ममकारसे शून्य प्राथमिक ईक्षण (ज्ञान)-के समान ही अज्ञानोपहित सत‍्का अहंकार-शून्य केवल ईक्षण (ज्ञान) ही महत्तत्त्व है। पुनश्च जैसे सामान्य ईक्षणके अनन्तर ‘मैं अमुक हूँ’ इत्यादि रूपसे अहंकारका उल्लेख होता है। वैसे ही सत‍्के ईक्षणके बाद उसमें ‘एकोऽहं बहु स्याम्’—मैं एक हूँ, अनेक होऊँ, इस रूपसे अहंकारका उल्लेख होता है, वही ‘अहंतत्त्व’ है। सुषुप्तिकी ओर जाते हुए भी ‘मैं कहाँ और कौन हूँ’ इत्यादि अहंकारका पहले लय होता है। केवल कुछ चेत (ज्ञानसामान्य) रह जाता है। अन्तमें वह भी अज्ञान या सुषुप्तिमें लीन हो जाता है, परंतु आत्मा या परमात्मस्वयंरूप नित्यबोध या ज्ञान तो इन तीनोंका भासक है, स्वप्रकाश सत‍्रूप है। जैसे बादलकी टुकड़ी देखकर आकाशव्यापी मेघमण्डल बुद्धिमें आरूढ हो सकता है, वैसे ही व्यष्टि (जीवगत) अहंकार, बुद्धि (ज्ञान), अज्ञान (सुषुप्ति)-से ईश्वरगत समष्टि अहंतत्त्व, महत्तत्त्व और अव्यक्ततत्त्वका बोध हो जाता है। जैसे अहंकारपूर्वक ही जीवका कार्य होता है, वैसे ही अहंकारपूर्वक ही परमात्मासे आकाशादि समस्त प्रपंच उत्पन्न होते हैं। तभी अहंतत्त्वसे शब्दतन्मात्रा या अपंचीकृत सूक्ष्म आकाशकी उत्पत्ति मानी गयी है। सर्वप्रथम अज्ञान या अचित् भी स्वप्रकाश सत‍्की ही शक्ति है। अत: वह भी सत‍्से स्वतन्त्र होकर स्वत: सत् नहीं है। जैसे सिता (शर्करा)-के सम्बन्धसे अमधुर वस्तु भी मधुर प्रतीत होती है, वैसे ही स्वप्रकाश सत‍्के सम्बन्धसे ही अव्यक्तादि सभी प्रपंचमें सत्ता और स्फूर्ति प्रतीत होती है। अतएव जैसे लहरोंमें भीतर-बाहर जल ही रहता है, वैसे ही अव्यक्तसे लेकर सभी प्रपंचके भीतर-बाहर सत् ही है, स्फूर्ति ही है। जैसे जलके बिना लहर कोई वस्तु ही नहीं, वैसे ही सत‍्के बिना—स्फूर्तिके बिना अव्यक्त, अचित्, महत्तत्त्व, अहंतत्त्व, आकाशादि सब असत् हो जाते हैं। जबतक उनमें सत‍्का योग है, तबतक उनका होना, उनकी सत्ता या स्फूर्ति है। सत‍्के बिना सब-के-सब असत् हो जाते हैं। इसीलिये कहा है—‘जासु सत्यता तें जड़ माया। भास सत्य इव मोह सहाया॥’ अत: अचित् आदि सभी मिथ्या हैं। अधिष्ठानका साक्षात् बोध होते ही सब मिट जाते हैं। आकाशसे वायु, तेज, जल, पृथ्वी, घटादि सब उत्पन्न होते हैं और क्रमेण सब उसीमें लीन हो जाते हैं तथापि घटाकाश, शरावाकाश, महाकाश आदि अनेक कल्पनाएँ हो जाती हैं। आकाशसे ही सूर्य, उससे ही घट और जल, उसका ही आकाश और सूर्यरूपसे बिम्ब-प्रतिबिम्ब होना संगत है और पार्थिव प्रपंच पृथ्वीमें, पृथ्वी जलमें, जल तेजमें, तेज वायुमें और वायुके आकाशमें मिलते ही सब कुछ केवल आकाश ही रह जाता है। उसी तरह स्वप्रकाश सत‍्से ही उत्पन्न अनेक उपाधियोंसे बिम्ब-प्रतिबिम्ब जीव, जगत् आदि अनेक भेद बनते हैं, परंतु उत्पत्तिके विपरीत क्रमसे जब सब कुछ परमात्मामें लीन हो जाता है, तब एक ही परमात्मा रह जाता है। जैसे आकाशसे ही क्रमेण घट, उसीसे जल, उसीसे प्रतिबिम्ब और वही बिम्ब होता है, अन्तमें आकाश कार्य होनेसे सबका उसीमें लय हो जाता है, वैसे ही सर्व प्रपंच अनन्त, अखण्ड, स्वप्रकाश चित‍्से ही उत्पन्न होता है, उसीमें लीन हो जाता है। ‘अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम्। पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्॥’ (श्रीमद्भा० २।१०।३२) भगवान‍्की उक्ति है कि सृष्टिके पहले एक मैं ही था, मुझसे भिन्न कार्यकारण कुछ भी नहीं था, सृष्टि होनेपर भी जो प्रपंच उपलब्ध होता है, वह भी मैं ही हूँ और अन्तमें जो अवशिष्ट रहता है, वह भी मैं हूँ। ‘आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा। वितथै: सदृशा: सन्तोऽवितथा इव लक्षिता:।’ (माण्डूक्यकारिका ४।३१) अर्थात् जो आदिमें नहीं, अन्तमें नहीं, वह मध्यमें भी नहीं ही है। यद्यपि मध्यमें सत्-सा प्रतीत होता है तथापि है असत् ही। घटादि कार्य अपनी उत्पत्तिके पहले नहीं थे, अन्तमें नष्ट होनेके बाद भी नहीं रहते हैं। अत: मध्यमें सत्-से प्रतीत होनेवालोंको भी असत् ही समझना चाहिये। जलकी लहरें, पानीके बुलबुले और स्वप्नके पदार्थ, उत्पत्ति या प्रतीतिके पहले भी नहीं रहते, अन्तमें भी नहीं रहते, केवल मध्यमें प्रतीत होते हैं, तो भी उन्हें असत् ही समझना उचित है। ‘अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत। अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥’ (गीता २।२८) सभी प्रपंच उत्पत्तिके पहले अव्यक्त ही था, अन्तमें भी सब अव्यक्त हो जाता है, केवल मध्यमें व्यक्त है, फिर उसके लिये क्या रोना? कोई अत्यन्त प्रिय वस्तु या व्यक्ति अदर्शन—अज्ञानसे ही आया, अन्तमें पुन: अदर्शनमें ही चला गया। फिर जो न अपना है, न जिसके हम हैं, उसके लिये क्या रोना? ‘अदर्शनादापतिता: पुनश्चादर्शनं गता:। नैते तव न तेषां त्वं तत्र का परिदेवना॥’ (महा० स्त्रीपर्व २।१३) जैसे मिट्टी या जलके भीतर ही तरह-तरहके पात्र और तरंग आ जाते हैं, वैसे ही मनके भीतर ही सब दृश्य आ जाते हैं। मनकी हलचलमें ही दृश्य दिखलायी पड़ता है और उसके मिटनेमें मिट जाता है, अत: सब कुछ मन ही है। वह मन स्वप्रकाश सत् या भानके भीतर आ जाता है, अत: स्वप्रकाश सत् या अबाध्य अनन्त भान ही सब कुछ है। जैसे दर्पणके भीतर भूधर-सागर, गगनमेघमाला, सूर्य-चन्द्र-नक्षत्र, वन-उपवन, नगर आदि प्रतिबिम्बरूपमें दिखायी देते हैं, वैसे ही अव्यक्तादि स्थावरान्त सदसत् सकल प्रपंच कूटस्थ स्वप्रकाश सत् या भानमें दिखायी देता है। जाग्रत्-स्वप्नके द्रष्टा, दर्शन, दृश्य, सुषुप्तिकी निद्रा या अज्ञान जिससे प्रकाशित होते हैं, वही शुद्ध भानरूप आत्मा है। ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय, जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति, प्रकाश-प्रवृत्ति-मोह (रज-तम-सत्त्व) इन सबका प्रकाशक, सबका अधिष्ठान, सबका कारण, सबसे अतीत सत् ही आत्मा है। वह प्रतिबिम्बके समान है, प्रतिबिम्ब नहीं। अत: उससे पृथक् बिम्बकी सत्ता नहीं अपेक्षित है। जैसे शुद्ध दर्पण देखनेसे प्रतिबिम्ब दृष्टि मिट जाती है, वैसे शुद्ध सत् देखनेसे प्रपंच-बुद्धि मिटती है। बोध होनेके उपरान्त यद्यपि प्रपंचका मूल अज्ञान मिट जाता है तथापि प्रारब्धदोषसे प्रारब्ध-स्थितितक प्रपंचकी प्रतीति होती है। भोगसे प्रारब्ध मिटनेपर अवश्य ही प्रपंचप्रतीति भी मिट जाती है—‘तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्ये अथ सम्पत्स्ये’, (छां० उ० ६।१४।२) ‘भोगेन त्वितरे क्षपयित्वाथ सम्पद्यते।’ फिर भी मनको निर्गुण, निराकार, निर्विकार परब्रह्ममें प्रतिष्ठित करनेके लिये प्रथम वाक्, चक्षु आदि कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियोंको रोक लेना चाहिये अर्थात् भाषण, दर्शन आदि इन्द्रियोंके व्यापारोंको रोककर केवल मनसे जप या ध्यान करते रहना चाहिये। जब कुछ कालके अभ्याससे दर्शनादि व्यापाररहित होकर मानस ध्यान, जपादि स्थिर हो जाय, तब मनको बुद्धिमें लय कर देना चाहिये। अर्थात् संकल्प-विकल्पात्मक मनके व्यापारको निश्चयात्मिका बुद्धिमें लीन कर देना चाहिये। केवल ध्येय लक्ष्यके दृढ़ निश्चयमें संकल्प समाप्त कर देना चाहिये। पश्चात् व्यष्टि-बुद्धिको समष्टि-बुद्धि अर्थात् महत्तत्त्वमें लीन करना चाहिये और उसे फिर समष्टिबुद्धिके भी भासक शान्त आत्मामें लय करना चाहिये अथवा वागादिव्यापारोंका मनमें लय करके मनको निश्चयात्मिका बुद्धिमें, फिर उसे समष्टिबुद्धिमें और उसे शान्त आत्मामें नियन्त्रित या लीन करना चाहिये। बुद्धिके भासक शुद्ध भानका ही चिन्तन करना तदभिन्न वस्तुका चिन्तन न करना ही उसका लय है। ‘यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि। ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि॥’ (कठोप० १।३।१३) कुछ महानुभावोंने और तरहसे भी इस मन्त्रका आशय कहा है। वागादि व्यापारोंका चिन्तन न करके केवल मनोव्यापारको देखना चाहिये। पश्चात् मनका चिन्तन करके ज्ञान आत्मा अर्थात् अहमर्थ (मैं)-का ध्यान करना चाहिये। अर्थात् पहले वागादि व्यापारोंकी उपेक्षा करके मनोव्यापारको देखे, फिर मनोव्यापारका उसके प्रेरक ‘मैं’ में लय करना चाहिये। यहाँ ‘जानातीति ज्ञानम्’ इस व्युत्पत्तिसे ज्ञानका जाननेवाला ‘अहं’ (मैं) अर्थ होता है और फिर उस अहंका भी सूक्ष्म अहं (अस्मिता)-में लय करना चाहिये। अर्थात् स्थूल अहं (मैं)-को छोड़कर अस्मिताका ध्यान करना चाहिये। ‘अहं’ का मैं कर्ता-भोक्ता, सुखी-दुखी यह स्थूल रूप है। अस्मि (केवल हूँ) यह उसका सूक्ष्मरूप है। यही महान् आत्मा है, उसे भी उसके भासक शुद्ध भानरूप आत्मामें लय करना चाहिये। अर्थात् ‘अस्मि’ (हूँ) ऐसा भी चिन्तन छोड़कर, उसके भासक अनन्त सत् और भानरूप आत्माका ध्यान करना चाहिये। महाविक्षेपकालमें भी सब कुछ भगवान् ही है, इस बुद्धिसे शान्ति मिलती है। ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत।’ (छां० उ० ३।१४।१) अर्थात् जैसे तरंग, लहर, बुद‍्बुद आदि जलराशिसे उत्पन्न, उसीमें स्थित और उसीमें लीन होते हैं, अत: जलस्वरूप ही है, वैसे ही सर्व दृश्यादृश्य जगत् तज्ज, तल्ल, तदन है अर्थात् स्वप्रकाश सत्स्वरूप ब्रह्म भगवान‍्से ही उत्पन्न, उन्हींमें स्थित और उन्हींमें लीन होता है, अत: सब कुछ भगवान् ही है—ऐसी भावना आते ही राग-द्वेष, वैर-वैमनस्य, उद्वेग मिटकर ध्रुव शान्ति मिलती है।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt; और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>अहमार्थ</category><category>आत्मा</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>12.2 स्मृति और प्रमामें पार्थक्य ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/12-2-smrti-aur-prmaamen-paarth/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/12-2-smrti-aur-prmaamen-paarth/</guid><description>12.2 स्मृति और प्रमामें पार्थक्य स्मृति और प्रमाका यह महान् अन्तर व्यवहारमें भी अनुभूत होता है। लोग कहते हैं कि ‘हम पुत्रका स्मरण कर रहे हैं, उसका प्रत्यक्ष अनुभव नहीं कर रहे हैं, प्रत्यक्ष अनुभव …</description><pubDate>Wed, 16 Jul 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;12.2 स्मृति और प्रमामें पार्थक्य&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;स्मृति और प्रमाका यह महान् अन्तर व्यवहारमें भी अनुभूत होता है। लोग कहते हैं कि ‘हम पुत्रका स्मरण कर रहे हैं, उसका प्रत्यक्ष अनुभव नहीं कर रहे हैं, प्रत्यक्ष अनुभव करना चाहते हैं।’ इस तरह अनुभवसिद्ध भेदके रहते यह नहीं कहा जा सकता कि स्वप्न-प्रत्ययके तुल्य जाग्रत्प्रत्यय निरालम्बन है। स्वानुभवका अपलाप नहीं किया जा सकता। बौद्ध भी स्वानुभवविरोध-प्रसंग उपस्थित होनेके कारण ही जागरित-प्रत्ययको निरालम्बन कहनेमें असमर्थ होकर ही उसे स्वप्न-प्रत्ययके दृष्टान्तसे निरालम्बन कहनेका प्रयत्न करता है, परंतु जो जिसका स्वत: धर्म नहीं होता, वह अन्यके दृष्टान्तसे नहीं सिद्ध होता। जब अग्नि उष्णरूपसे अनुभूयमान रहता है तो जलके दृष्टान्तसे उसे शीत नहीं कहा जा सकता है। जल एवं अग्निके वैधर्म्यके समान ही स्वप्न एवं जागरितका बाध-अबाध आदि वैधर्म्य कहा ही जा चुका है। वस्तुतस्तु स्वप्नादि प्रत्यय भी निरालम्बन नहीं है, अनिर्वचनीय प्रातीतिक पदार्थ स्वप्नादि प्रत्ययोंका भी आलम्बन है ही। उसी तरह व्यावहारिक सत्य पदार्थ जाग्रत् प्रत्ययके आलम्बन होते हैं। &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;ान्ती जैसे पारमार्थिक ब्रह्मके अज्ञानसे व्यावहारिक सत्य प्रपंचकी सृष्टि मानते हैं, वैसे ही व्यावहारिक रज्ज्वादिके अज्ञानसे प्रातिभासिक सत्य सर्पादिकी उत्पत्ति मानते हैं। अतएव जब व्यवहारमें बाधित होनेवाले स्वप्नादि प्रत्यय भी निरालम्बन नहीं हैं, तब व्यवहारमें कभी बाधित न होनेवाले जाग्रत् प्रपंच प्रत्ययको निरालम्बन कैसे कहा जा सकता है? परंतु बौद्ध संसारको न तो अज्ञानका कार्य ही मानता है और न अधिष्ठान ज्ञानसे उसका बाध ही मानता है। बौद्धके यहाँ सम्यग्दृष्टि या प्रज्ञापारमितासे अविद्याकी निवृत्ति होती है, परंतु वह अविद्या विश्वका उपादान आदि नहीं है। किंतु असत्, क्षणिक आदिमें सत्, क्षणिक बुद्धि आदि ही अविद्या उन्हें मान्य है। अतएव वासना-वैचित्र्यसे वे विज्ञान-वैचित्र्यका उपपादन करते हैं। जैसे उनके यहाँ ज्ञान सत्य है, वैसे ही वासना भी सत्य ही है। वासनाका अधिष्ठान ज्ञानसे बाध नहीं होता है। किंतु सम्यग्दृष्टि, सम्यक् प्रयत्नसे वासना निरोधसाध्य होता है, जब कि वेदान्त मतसे ब्रह्मके सम्यक् ज्ञानमात्रसे निवर्त्य अज्ञान होता है। इस तरह वेदान्त-सिद्धान्तसे बौद्धमतका अत्यन्त भेद है। जो बौद्धोंने कहा है कि अर्थके बिना ही वासना-वैचित्र्यसे ज्ञान-वैचित्र्य उपपन्न हो जायगा, वह भी ठीक नहीं; क्योंकि जब विज्ञानवादी बौद्धके मतमें बाह्यार्थकी उपलब्धि ही नहीं होती, तब वासना भी कैसे बनेगी? विविध अर्थोपलब्धिके अनुसार ही तो नाना प्रकारकी वासनाएँ होती हैं? जब बाह्यार्थका ज्ञान होता ही नहीं, तब किस आधारपर वासनाएँ बनेंगी? विज्ञानों और वासनाओंको अनादि माननेपर भी अन्ध परम्परा-न्यायसे वासनाओं और विज्ञानोंकी परम्परा अप्रतिष्ठित और अनवस्थित ही रहेगी। यहाँ विज्ञानवादीका कहना है कि अर्थोपलब्धिके अभावसे वासनाओंका अभाव नहीं कहा जा सकता है; क्योंकि विज्ञानवादमें अर्थ नहीं मान्य है। अत: बाह्यार्थ एवं अर्थोपलब्धिकी व्याप्ति निश्चित नहीं हो सकती, किंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि विज्ञानवादीको भी लोकसिद्ध अन्वय-व्यतिरेकके आधारपर ही स्वप्नकी अर्थोपलब्धिको वासनाजन्य मानना पड़ेगा। उसीके दृष्टान्तसे जाग्रत‍्के घटादि ज्ञानोंके भी वासनाजन्य होनेका अनुमान किया जाता है। तथा च बाह्यार्थरूप कारणके रहनेपर ही अर्थोपलब्धिरूप कार्य होता है, बाह्यार्थ न होनेपर अर्थोपलब्धि भी नहीं होती। इस अन्वय-व्यतिरेकके अनुसार अर्थोपलब्धि और बाह्यार्थका ही कार्यकारणभाव मालूम पड़ता है। अर्थानपेक्ष वासना और अर्थोपलब्धिका लोकसिद्ध अन्वय-व्यतिरेक नहीं है। स्वप्न प्रत्ययकी हेतुभूत वासना भी जाग्रत्कालकी अर्थोपलब्धिके ही पराधीन होती है। इस तरह कारणका कारण होनेसे स्वप्न प्रत्ययमें भी अर्थोपलब्धि मूल है। अतएव अर्थका उपलब्धिके साथ लोक&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-paashcaaty-drshn-1-1-drshnkii/&quot;&gt;दर्शन&lt;/a&gt;ानुसारी अन्वय-व्यतिरेक गृहीत होता है। अर्थानपेक्ष वासनाके साथ उपलब्धिका अन्वय-व्यतिरेक गृहीत नहीं होता। स्वप्नोपलब्धिकी कारणभूत वासनाका भी कारण जागरित अर्थोपलब्धि ही है। अत: अर्थ स्वप्नोपलब्धिका भी मूल है ही। बाह्यार्थापलापी विज्ञानवादी अन्वय-व्यतिरेकसे ज्ञानको वासनानिमित्तक मानता है, अर्थनिमित्त ज्ञान नहीं मानता है, परंतु पूर्वोक्त युक्तिसे उसका खण्डन हो जाता है। अर्थोपलब्धि बिना वासनाकी उत्पत्ति होती ही नहीं, कई ऐसी नवीन वस्तुओंकी भी उपलब्धि हो सकती है, जिनकी वासना है ही नहीं। इस तरह वासना बिना भी अर्थोपलब्धि होती है, किंतु बिना अर्थोपलब्धिके वासना कभी नहीं होती देखी जाती है। इस तरह अन्वय-व्यतिरेकके द्वारा अर्थका सद्भाव ही सिद्ध होता है, बाह्यार्थका अपलाप नहीं सिद्ध होता है। वासना एक संस्कार ही है, वह संस्कार आश्रयके बिना नहीं रह सकता है। वासनाका आश्रय बौद्ध विज्ञानवादीके मतमें प्रमाणसिद्ध नहीं है। क्षणिक आलयविज्ञान भी वासनाका आश्रय नहीं बन सकता; क्योंकि विज्ञान और वासना यदि दोनों साथ ही उत्पन्न होते हैं तो जैसे साथ उत्पन्न दायें-बायें शृंगका आधाराधेय भाव नहीं बन सकता है, वैसे विज्ञान और वासनाका भी आधाराधेय भाव नहीं बन सकेगा। यदि ज्ञान पहले उत्पन्न हो और वासना पीछे उत्पन्न हो तो भी आधाराधेय भाव नहीं बन सकता; क्योंकि आधेयकी उत्पत्तिके समयतक तो क्षणिक विज्ञान नष्ट हो चुका होता है। यदि विज्ञान वासना-उत्पत्तिके समयमें भी रहेगा तो क्षणिकत्वकी हानि होगी। आश्रयके बिना ही एक सन्तति पतित समानाकार विज्ञान ही वासना है, यह विज्ञानवादियोंका स्वगोष्ठीनिष्ठ सिद्धान्त है, प्रामाणिक नहीं। वस्तुत: वासना एक गुण है, उसका स्वसमवायी कारण ही आश्रय होता है। विज्ञानवादी जिस आलयविज्ञानको वासनाओंका आधार मानते हैं, आखिर वह भी तो क्षणिक ही होगा? अत: जैसे प्रवृत्ति विज्ञान वासनाओंका अधिकरण नहीं हो सकता, वैसे आलयविज्ञान भी वासनाओंका अधिकरण नहीं हो सकता। अतीत, अनागत, वर्तमानमें अन्वयी एक कूटस्थ सर्वार्थदर्शी साक्षी आत्माको स्वीकार किये बिना देश-काल-निमित्तापेक्ष वासना एवं तदधीन स्मृति, प्रत्यभिज्ञा आदि कुछ भी नहीं बन सकते। यदि आलयविज्ञानको स्थिर माना जायगा तो विज्ञानवादीके सिद्धान्तकी हानि होगी। बाह्यार्थवादीकी तरह विज्ञानवादी भी क्षणिकवादी है, अत: बाह्यार्थवादके सम्बन्धमें कहे गये दूषण भी उसमें लागू होंगे ही। शून्यवादीका कहना है ‘यदि साकारज्ञान सम्भव नहीं है और बाह्यार्थ भी न सूक्ष्म हो सकता है, न स्थूल, तब तो क्या अर्थ, क्या ज्ञान सभी वस्तु विचारासह ठहरते हैं। ज्ञान और अर्थ दोनों ही बाधित हो जाते हैं। अत: वे सत् नहीं कहे जा सकते। असत् भी नहीं हो सकते; क्योंकि असत् होनेपर उनका भान नहीं होना चाहिये। सत्-असत् उभयरूप भी नहीं कहे जा सकते; क्योंकि उनका परस्पर विरोध होता है। अनुभवरूप भी नहीं कहे जा सकते; क्योंकि सत्-असत् इस प्रकारके होते हैं कि एकका निषेध करेंगे तो दूसरेका विधान अनिवार्य हो जायगा। अत: विचारासहत्व ही वस्तुओंका रूप है। अत: शून्यवादियोंने कहा है— इदं वस्तुबलायातं यद्वदन्ति विपश्चित:। यथा यथार्थाश्चिन्त्यन्ते विविच्यन्ते तथा तथा॥ अर्थात् ‘वस्तुओंके स्वभावसे ही यह बात आ जाती है कि पदार्थोंका जैसे-जैसे विचार किया जाता है, वैसे-वैसे वे पृथक्-पृथक् विशीर्ण होते जाते हैं, सत्-असत् आदि किसी पक्षमें व्यवस्थित नहीं हो पाते। अत: शून्यता ही तत्त्व है।’ शून्यवादियोंका यह पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि यह सर्वप्रमाण विरुद्ध है। प्रमाणप्रसिद्ध लोक-व्यवहार अधिष्ठानभूत ब्रह्मतत्त्व साक्षात्कार बिना बाधित नहीं हो सकता। अपवादके बिना उत्सर्गकी स्थिति स्वाभाविक होती है। लौकिक-प्रमाण अपने-अपने विषय-सत्-असत‍्का बोधन करते हैं। उन्हीं प्रमाणोंके आधारपर सत‍्रूपसे यथाभूत अविपरीततत्त्वकी व्यवस्थापना होती है। इसी तरह असत्-असत् इस रूपसे यथाभूत अविपरीत तत्त्वकी व्यवस्थापना होती है। सत्-असत‍्को विचारासह कहनेवाले शून्यवादीका पक्ष सर्वप्रमाण विरुद्ध है। कहा जाता है कि ‘इस विचारसे प्रमाणोंके तात्त्विक प्रामाण्यका ही खण्डन किया जाता है, सांव्यावहारिक प्रामाण्यका खण्डन नहीं किया जाता। तथा च भिन्नविषयक होनेसे प्रमाण विप्रतिषेध नहीं होगा, किंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि प्रमाण स्वविषयमें प्रवर्तमान होते हुए ‘यह तत्त्व है’ इस रूपसे ही प्रवृत्त होते हैं। बाधकज्ञानसे ही उनके विषयकी विपरीतता दिखाकर अतात्त्विकता सिद्ध की जाती है। जैसे यह शुक्ति है रजत नहीं, सूर्यकिरण है जल नहीं, एक चन्द्र है, दो नहीं, इत्यादि स्थलोंमें बाधका अधिष्ठान ज्ञानोंसे यह रजत है, यह जल है इत्यादि ज्ञानोंके विषयोंकी विपरीतता दिखलाकर अतात्त्विकता सिद्ध की जाती है। वैसे बाधकज्ञानके द्वारा समस्त प्रमाण-गोचर पदार्थोंके विपरीत तत्त्वान्तरकी व्यवस्थापना करके ही प्रमाणोंकी अतात्त्विकता सिद्ध की जा सकती है।’ निष्कर्ष यह है कि प्रपंचको अतात्त्विक सिद्ध करनेके लिये अधिष्ठानभूत वस्तुतत्त्व आवश्यक है, परंतु शून्यवादी तो भ्रमको निरधिष्ठान ही कहता है; क्योंकि उसके अनुसार तो प्रमाणोंके द्वारा तत्त्वकी उपलब्धि होती ही नहीं। इसी अभिप्रायसे भगवान् व्यासने कहा है—‘नाभावोऽनुपलब्धे:’ अर्थात् अधिष्ठानभूततत्त्व शून्यवादमें सम्भव नहीं है; क्योंकि उसके अनुसार किसी प्रमाणसे तत्त्वका उपलम्भ होता ही नहीं। जो अप्रामाणिक होगा, उसे तत्त्व कैसे कहा जा सकता है? आजकलके बौद्ध बुद्धके मौनके आधारपर कहते हैं कि ‘बुद्धको मनोवचनातीत एक अधिष्ठानतत्त्व अभिमत था। जैसे वैदिकोंके यहाँ कहा जाता है ‘अवचनेनैव प्रोवाच ह’ अर्थात् आचार्यने अवचनसे ही तत्त्वका उपदेश कर दिया।’ चित्रं वटतरोर्मूले वृद्धा: शिष्या: गुरुर्युवा। गुरोस्तु मौनं व्याख्यानं शिष्यास्तु छिन्नसंशया:॥ अर्थात् ‘वटवृक्षके नीचे एक आश्चर्य देखा गया है, वहाँ एक युवा गुरु तथा बहुत-से वृद्ध शिष्य बैठे हैं। गुरुके मौन व्याख्यानसे ही शिष्योंके सब संशय दूर हो गये।’ वस्तुत: वैदिकोंके इस मौनव्याख्यानको ही बुद्धके मौनके साथ जोड़नेका यत्न किया गया है। किंतु वैदिकोंने स्थल-स्थलपर असद्वाद, शून्यवादका निषेध किया है। विश्वकारणरूपसे एवं सर्वाधिष्ठानरूपसे तत्त्वका प्रतिपादन किया है। उसके सविषयत्व एवं मनोवचनगोचरत्वकी शंका दूर करनेके लिये ही कहीं भागत्यागलक्षणा, कहीं नेति-नेति, अस्थूल, अनणु आदि अतद्वॺावृत्ति तथा कहीं मौनका अवलम्बन किया गया है। शून्यवादियों एवं बुद्धके उपदेशोंमें तो सबके मूल अधिष्ठान या किसी स्थायी वस्तुका सर्वथा खण्डन ही है। सर्वसाक्षी कोई स्थायी आत्मा भी शून्यवादियोंको मान्य नहीं है। फिर भी अगर बुद्धके मौनसे निर्विशेष ब्रह्मका बोध हो तो किसी प्रतिवचन दानासमर्थ पराजितवादीके भी मौनसे अथवा अज्ञमूकके भी मौनसे अधिष्ठानब्रह्मका बोध समझा जा सकेगा। लोकमें भी प्रसंगानुसार मौनसे तत्त्वबोध कराया जाता है। जैसे किसी नवोढासे उसके सभामें स्थित पतिको उसकी सखियाँ पूछती हैं। तो विभिन्न व्यक्तियोंपर अंगुलीसे निर्देशकर पूछती हैं कि इनमेंसे तेरे पति कौन हैं? सखियोंके विभिन्न अंगुलिनिर्देशपर नवोढा ‘नेति-नेति’ बोलती जाती है। जब ठीक उसके पतिपर ही अंगुलिनिर्देश होता है, तब वह लज्जित होकर मौन हो जाती है। बस, इस मौनसे ही सखियाँ समझ लेती हैं कि इसका पति यही है। इसी तरह विश्वकारण विश्वके अधिष्ठानका प्रत्यगभिन्न परमात्माका अनेक श्रुति, युक्ति आदि प्रमाणोंसे प्रतिबोधित कर देनेके बाद भागत्याग इतर निषेधके अनन्तर मौनद्वारा सर्वनिषेधावधि, सर्वनिषेधाधिष्ठान तथा सर्वनिषेधसाक्षीका बोध कराया जाता है। ये सब बातें शून्यवादमें सम्भव नहीं; बुद्धने किसी मूलकारण या मूलतत्त्वका प्रतिपादन नहीं किया, प्रत्युत उन्होंने सभी स्थायी पदार्थोंका सर्वथा निषेध किया है। आत्मातकका निषेध किया है, कारणभूत ईश्वरका ही खण्डन किया है। उन्होंने सभी सत‍्को क्षणिक माना है। उन्होंने तो अपने मौनका स्पष्ट अर्थ बतलाया भी है कि ‘ऐसे विषयोंपर विचार करना व्यर्थ है। इनका विचार लाभदायक न होकर हानिकारक ही है। पुनर्जन्म होता है या नहीं, लोक शाश्वत है या नहीं, आत्मा देहसे भिन्न है या नहीं इत्यादि विचार व्यर्थ हैं।’ फिर भी बुद्धके मौनसे उनके स्पष्ट कथनके विरुद्ध कूटस्थ अधिष्ठान आत्माको स्वीकार करना शुद्धरूपसे बुद्धके नामपर उनके साथ बेईमानी करनी है। इसके अतिरिक्त प्रमाण बिना भी यदि कोई पदार्थ स्वीकार्य हो तो फिर प्रमा-प्रमेय-व्यवस्था ही व्यर्थ होगी। तब तो स्वानुभवके नामपर, समाधिके नामपर कोई कुछ भी मनमानी पदार्थ सिद्ध करता फिरेगा! यों तो कपिल, वसिष्ठ, व्यास, गौतम, कणाद सभी समाधिसम्पन्न थे। सभी स्वानुभवकी बात कर सकते थे, परंतु प्रमाणविरुद्ध अर्थ कोई माननेको तैयार नहीं हो सकता है। वेदान्ती तो अनादि, अपौरुषेय पुरुषाश्रित भ्रमादि दोषशून्य वेद तथा वेदमूर्धन्य उपनिषद्‍रूप परम प्रमाणके आधारपर अधिष्ठान ब्रह्म सिद्ध करते हैं। विधिमुख भागत्याग एवं अतन्निषेधके द्वारा वेदान्तोंका ही नहीं; अपितु सभी वेदोंका पर्यवसान ब्रह्ममें ही कहा गया है। ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति’ ‘वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्य:।’ अर्थात् सभी वेदोंका महातात्पर्य ब्रह्ममें ही है। प्रत्यक्ष-अनुमान आदिके द्वारा भी वेदान्ती अधिष्ठानभूत ब्रह्मकी सिद्धि करते हैं। निषेध आदिके द्वारा तो केवल अधिष्ठानकी निर्विशेषता आदि ही सिद्ध की जाती है। अस्तु! शून्यवादीसे यदि प्रश्न हो कि ‘प्रपंचकी अतात्त्विकता धर्मिभूत प्रपंचग्राहक प्रमाणोंसे ही सिद्ध होती है अथवा प्रमाणान्तरसे? पहला पक्ष संगत नहीं है; क्योंकि धर्मिग्राहक प्रमाण तो अपने विषयकी तात्त्विकताका ही प्रतिपादन करते हैं। दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि बाधक प्रमाणज्ञान अधिष्ठानका ही ज्ञान हो सकता है, परंतु तात्त्विक अधिष्ठानगोचर कोई प्रमाण शून्यवादीको मान्य नहीं। उसके मतमें तो जो भी पदार्थ हैं, सभी निस्तत्त्व नि:स्वभाव हैं।’ शून्यवादी कहता, भले ही अधिष्ठानतत्त्वका बोध न हो, परंतु प्रत्यक्षादिप्रमित वस्तुगत विचारासहत्व ही बाधक प्रमाण है। इसीके द्वारा प्रपंचकी निस्तत्त्वता बोधित हो जायगी, किंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि विचारासहत्व क्या है, यह भी विचार आवश्यक है। क्या विचारासहत्वका यह अभिप्राय है कि ‘यद्यपि सत्-असत् आदि पक्षोंमें अन्यतमस्वरूप वस्तु धर्म है, तथापि वह विचारसह अथवा विचारासहत्वरूपसे निस्तत्त्व शून्यरूप है? पहला पक्ष ठीक नहीं है; क्योंकि सत्-असत् आदिरूप तत्त्व शून्यवादीको मान्य ही नहीं है। फिर जो वस्तु परमार्थत: सत्-असत् आदि पक्षोंमें ही किसी पक्षकी है तो वह सत्-असत् आदि किसी पक्षमें ही निर्दिष्ट होगी, तब वह विचारासह कैसे? जो सत् या असत् है, वह प्रमाण-गोचर होने विचारासह तो है ही? यदि वह विचार सहन नहीं कर सकती तो सत्-असत् आदि पक्षोंमें किसी पक्षकी नहीं हो सकती। यदि किसी पक्षकी है तो विचारासह कैसे? यदि यह कहा जाय कि निस्तत्त्व ही विचारासहत्व है तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि बिना किसी तत्त्वका व्यवस्थापन किये किसी वस्तुको निस्तत्त्व नहीं कहा जा सकता है। जैसे शुक्तितत्त्वके व्यवस्थापनसे ही रजतकी निस्तत्त्वता कही जाती है, वैसे किसी ब्रह्म आदि तत्त्वकी व्यवस्थापनाद्वारा ही प्रपंचकी निस्तत्त्वता कही जा सकती है, अन्यथा नहीं।’ यदि कहा जाय कि निस्तत्त्वता ही भावोंका तत्त्व है तो यह भी ठीक नहीं। तब तो तत्त्वाभाव ही निस्तत्त्वता हुई और शून्यवादीके अनुसार तत्त्वाभाव भी तो विचारासह ही होगा? साथ ही आरोपित पदार्थका ही निषेध होता है और आरोपका अधिष्ठान ही तत्त्व हुआ करता है, यह शुक्ति रजतादिमें दृष्ट है। जब कोई तत्त्व है ही नहीं, तब किसमें किसका आरोप होगा? इस तरह निष्प्रपंच-परमार्थ सद‍्ब्रह्म ही अनिवार्य प्रपंचरूपमें आरोपित होता है, यही मानना उचित है। बाधक प्रमाणद्वारा तत्त्व-व्यवस्थापन करके प्रमाणोंका अतात्त्विकत्वरूप व्यावहारिक प्रामाण्य व्यवस्थापित हो सकता है। अतएव भगवान् भाष्यकारका कहना है कि वैनाशिकमत उपपत्तिकी दृष्टिसे जितना देखा जाता है, उतना ही बालूके कूपकी तरह ढहता चला जाता है। बाह्यार्थवाद, विज्ञानवाद, शून्यवाद आदि परस्पर विरुद्ध वादोंका उपदेश करते हुए बुद्धने असम्बद्ध प्रलापिता ही ख्यापित की है अथवा प्रजामें व्यामोह फैलानेकी दृष्टिसे ही बुद्धने इस प्रकारका तत्त्वोपदेश किया है, ऐसा ही पुराणोंमें प्रसिद्ध है। इसी तरह नैरात्मवाद स्वीकार करना साथ ही समस्त वासनाओंके आधारभूत आलयविज्ञानको अक्षर आत्मा मानना भी परस्पर विरुद्ध है। जैनियोंके मतानुसार संसारी और मुक्त—ये दो प्रकारके जीव हैं। संसारी भी समनस्क और अमनस्क-भेदसे दो प्रकारके हैं। कोई लोग जीव, अजीव, आसव, बन्ध, संवर, निर्जर और मोक्षरूप तत्त्व मानते हैं। इस तरह पंचास्तिकाय भी इन्हींका विस्तार है। उनमें और भी बहुत प्रकारके भेद हैं। वे लोग प्रत्यक्ष और अनुमान—यही दो प्रमाण मानते हैं। ‘सर्वत्र स्यादस्ति, स्यान्नास्ति, स्यादस्ति च नास्ति च, स्यादवक्तव्य:, स्यादस्ति चावक्तव्य:, स्यान्नास्ति चावक्तव्य:, स्यादस्ति च नास्ति चावक्तव्य:’ (सर्वदर्शनसं० आर्हत-दर्शन ४७) इस सप्तभंगि-न्यायको मानते हैं। इसी प्रकार नित्यत्वादिमें भी इसी न्यायको प्रयुक्त करते हैं। वे शरीरपरिमाण ही आत्मा मानते हैं। कर्माष्टक जीवको बद्ध करता है। समस्त क्लेश और तद्विषयिणी वासनाएँ जिसकी विगलित हो चुकी हैं, जिसका ज्ञान आवरणरहित हो गया है और जिसे एकतान सुख प्राप्त हो गया है, ऐसे आत्माके ऊपरके देशमें अवस्थानको कोई मोक्ष कहते हैं। किन्हींके मतानुसार जीव गमनशील है और धर्माधर्मास्तिकायसे वह बद्ध है। उससे छूटनेपर उसका ऊपर जाना ही मोक्ष है। ‘क्षित्यंकुरादिकर्तृत्वेन एक ईश्वर सिद्ध नहीं होता’ ऐसा किन्हींका कथन है; क्योंकि प्रपंचमें कार्यत्व सिद्ध नहीं है। यदि सावयवत्वेन कार्यत्वकी सिद्धि कही जाय, तो विकल्पासह होनेसे वैसा नहीं कहा जा सकता। जैसे कि वह सावयवत्व क्या है, अवयव-संयोगित्व, अवयव-समवायित्व, अवयवजन्यत्व, समवेतद्रव्यत्व या सावयवबुद्धिविषयत्व? आकाशमें अनैकान्तिक होनेके कारण अवयवसंयोगित्व नहीं कहा जा सकता। सामान्य (जाति) आदिमें अनैकान्तिक होनेसे अवयव-समवायित्व भी नहीं कहा जा सकता। साध्यसम होनेसे अवयवजन्यत्व भी सावयवत्व नहीं हो सकता। विकल्पासह होनेसे समवेतद्रव्यत्वरूप चतुर्थ पक्ष भी ठीक नहीं। जैसे कि समवायसम्बन्धमात्रवत् द्रव्यत्व समवेतद्रव्यत्व है अथवा अन्यत्र समवेत द्रव्यत्व? आकाशादिमें व्यभिचार होनेसे प्रथम पक्ष नहीं कहा जा सकता; क्योंकि आकाशमें गुणादिसमवायत्व और द्रव्यत्व दोनों सम्भव हैं। साध्यसे अविशिष्ट होनेके कारण दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है। संघीभूत तन्तु ही पट है, अत: तन्तुओंमें पटसे अन्यत्व सिद्ध नहीं है, साथ ही समवाय भी असिद्ध है। आत्मा आदिमें अनैकान्तिक होनेके कारण सावयवबुद्धिविषयत्वरूप पाँचवाँ पक्ष भी ग्राह्य नहीं हो सकता; क्योंकि सावयवत्वबुद्धिके विषय होनेपर भी आत्मामें कार्यत्व नहीं है। फिर, एक कर्ताकी सिद्धि की जा रही है या अनेक कर्ताओंकी? यदि एककी, तो प्रासादादिमें व्यभिचार आता है; क्योंकि प्रासादादिका निर्माण एक कर्ताद्वारा निष्पन्न नहीं होता। अनेक कर्ता भी नहीं कहे जा सकते; क्योंकि बहुतोंमें कर्तृत्व माननेपर परस्पर मतभेदकी सम्भावना अनिवार्य होनेसे सामंजस्य नहीं बन सकता। सभीका सामर्थ्य यदि समान मानें, तो एकसे ही कार्यसिद्धि भी हो जायगी, फिर अन्योंका वैयर्थ्य सुतरां सिद्ध है, अत: अनेक कर्ता माननेसे भी लाभ क्या? तथा च आगम-सर्वज्ञपरम्परा अनादि होनेके कारण सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्रसे आवरणक्षय होनेसे सर्वज्ञता होती है। यह सब कथन आपातरमणीय है। सत्त्व और असत्त्वके परस्परविरुद्ध होनेसे उनका समुच्चय न हो सकनेके कारण विकल्प होता है, किंतु वस्तुमें विकल्प सम्भव नहीं है। समस्त वस्तुओंमें निरंकुश अनेकान्तत्वकी प्रतिज्ञा करनेवालेके मतमें निर्द्धारण भी एक वस्तु ही तो मानना पड़ेगा। स्यादस्ति और स्यान्नास्ति—इन विकल्पोंका उपनिपात होनेसे अनिर्धारणात्मकता ही होगी। जीवको शरीर-परिणाम माननेपर उसे परिच्छिन्न मानना पड़ेगा, अत: आत्माकी अनित्यता भी स्वीकृत करनी पड़ेगी। शरीरोंका परिमाण भी अनवस्थित होनेसे एक मनुष्यजीव मनुष्यपरिमाणका होकर फिर कर्मवशात् जब उसे हाथीका जन्म प्राप्त होगा, तब वह समूचे हाथीके शरीरमें व्याप्त न हो सकेगा। यदि उसे चींटीका शरीर प्राप्त हुआ, तो वह उस चींटीके शरीरमें सम्पूर्णतया समाविष्ट न हो सकेगा। एक जन्ममें भी कौमार, यौवन, वृद्धावस्थामें भी उक्त दोष अनिवार्य होंगे। जीवको वे अनन्त अवयवयुक्त भी मानते हैं। ऐसी दशामें छोटा शरीर प्राप्त होनेपर उन अवयवोंका संकुचित होना और बड़ा देह मिलनेपर विकसित होना भी मानना पड़ेगा। यह भी विचार करनेपर संगत प्रतीत नहीं होता। अनन्त अवयवोंकी समानदेशता प्रतिहत होगी या नहीं? यदि प्रतिहत होगी, तो वे अनन्त अवयव परिच्छिन्नमें समाविष्ट न हो सकेंगे। यदि न होगी तो सबको एक देशमें ही अवस्थित मानना पड़ेगा। ऐसी दशामें उनमें स्थूलताका अभाव होनेसे जीव अणुपरिमाणपरिमित हो जायगा। शरीरमात्रमें परिच्छिन्नकी अनन्तता भी नहीं बन सकती। अवयवोंके आगम-अपगमसे उनकी छोटे-बड़े शरीरकी परिमाणताकी कल्पना भी असंगत है; क्योंकि अवयवके उपचय-अपचयवाला होनेपर उसे विकारवान् मानना पड़ेगा। अवयवोंमें भी प्रत्येक चेतयिता है या उनका समुदाय? इसपर लोकायतिकमतके निराकरणप्रसंगमें कही हुई आपत्तियाँ अनिवार्य हैं। बन्ध-मोक्षव्यवस्था भी उनसे सम्मत प्रत्यक्ष-अनुमानसे अवगत नहीं हो सकती। वैशेषिक तथा नैयायिक परमेश्वरकी भी सिद्धि करते ही हैं। प्रपंचके सावयव होनेसे उसकी कार्यता सिद्ध करके उस प्रपंचके कर्ता ईश्वरको सिद्ध करते हैं। ‘पूर्वोक्त विकल्पासह होनेके कारण सावयवत्व असिद्ध है’ यह नहीं कहा जा सकता; क्योंकि ‘समवेतद्रव्यत्व सावयवत्व है’ ऐसा लक्षण करनेपर उक्त दोष प्रसक्त नहीं होते। आकाशके निरवयव होनेसे उसमें व्यभिचार सम्भव नहीं है। अवान्तर महत्त्वरूप हेतुसे भी कार्यत्वका अनुमान सुकर है। शरीरसे जन्य न होनेसे आकाशकी तरह क्षित्यंकुरादि अकर्तृक हैं—ऐसा सत्प्रतिपक्ष अनुमान नहीं हो सकता; क्योंकि शरीर विशेषण व्यर्थ है। केवल अजन्यत्वकी भी हेतुता नहीं कही जा सकती; क्योंकि वह असिद्ध है। यदि कहा जाय कि शरीराजन्यत्व रहनेपर भी कर्त्रजन्यता न रहे, तो क्या हानि है, तो इसका कोई उत्तर नहीं हो सकता। सोपाधिकत्वकी शंका भी नहीं की जा सकती; क्योंकि यदि अकर्तृक होगा, तो कार्य भी न होगा, ऐसा अनुकूल तर्क हो सकता है। यदि इतरकारकोंसे अप्रयोज्य होते हुए सकल कारकोंका जो प्रयोक्ता है, वह कर्ता होता है अथवा ज्ञानचिकीर्षा प्रयत्नोंका जो आधार है, वह कर्ता है—ऐसा कर्तृलक्षण कहा जाय, तो कर्ताकी व्यावृत्ति होनेपर तदुपहित समस्त कारकोंकी व्यावृत्ति होनेसे कारणके बिना कार्योत्पत्तिका प्रसंग उपस्थित होगा। यदि ईश्वर कर्ता हो, तो वह शरीरी होगा, ऐसा प्रतिकूल तर्क भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि सिद्धि-असिद्धि दोनों अवस्थाओंमें व्याघात होगा। यदि ईश्वर असिद्ध होगा, तो आश्रयासिद्धि होगी और यदि आगमसिद्ध होगा, तो उसीसे उसकी कर्तृत्वसिद्धि भी हो जायगी। अवाप्तसमस्तकाम उस परमेश्वरकी करुणावशात् विश्वसृष्टिमें प्रवृत्ति माननेमें कोई आपत्ति नहीं हो सकती। वैसी दशामें ‘सुखमय हो सृष्टिकी प्रसक्ति होगी’ यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि सृज्यप्राणिकृत सुकृत-दुष्कृतके परिपाकविशेषसे सृष्टिवैषम्य उपपन्न है। कार्य होते हुए विलक्षण होनेके कारण शय्या, प्रासाद आदिके समान भूत, भौतिक पदार्थ स्वोपादानगोचर अपरोक्षज्ञानवान‍्से जन्य हैं, इस अनुमानसे तथा प्रपंचके निमित्तोपादान होनेके कारण प्रपंचाधारत्व, शासकत्व, प्रकाशकत्व आदिसे परमेश्वर सिद्ध होता है। वैशेषिक लोग द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय और अभाव—ये सात पदार्थ मानते हैं। नैयायिक लोग प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान—ये सोलह पदार्थ मानते हैं। वे आत्माको ज्ञानादिगुणवान्, नित्य और व्यापक मानते हैं। जीवात्मा और परमात्मा भेदसे आत्मा दो प्रकारका मानते हैं। जीवात्माओंको अनन्त और परमात्माको एक मानते हैं। नित्यज्ञानादिगुणवान् परमेश्वर सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् है, यह तर्क तथा आगमसे सिद्ध होता है, यह बतलाया जा चुका है। इनके मतानुसार अन्धकार तेजोऽभावरूप है। दु:ख, जन्म, प्रवृत्ति, दोष और मिथ्याज्ञानमें उत्तर-उत्तरका तत्त्वज्ञानसे नाश होनेपर पूर्व-पूर्वका नाश होनेसे अपवर्ग होता है। प्रमाणके विषयमें—चार्वाक लोग जैसे इन्द्रियजन्य ही ज्ञानको प्रमाण मानते हैं, वैसे ही उनके मतसे श्रोत्रेन्द्रिय शब्दका ही बोधन करता है, शब्दार्थको भी नहीं। शब्दार्थ सत्य है या असत्य—इसका निर्णय नहीं किया जा सकता। अनुमान व्याप्तिज्ञानसापेक्ष होता है और व्याप्ति ‘जहाँ-जहाँ धूम है, वहाँ-वहाँ अग्नि होता है’ इस प्रकार समस्त जगत‍्में अतीत, अनागत धूम-अग्नियोंको उपस्थापित करती है। कादाचित्क द्रष्टाको प्रत्यक्षद्वारा समस्त धूम एवं अग्नियोंका ज्ञान सम्भव नहीं है। अनुमानसे भी इनका ज्ञान सम्भव नहीं; क्योंकि अनुमान व्याप्ति-ज्ञानसापेक्ष हुआ करता है। बारम्बार सहचारदर्शनसे भी व्याप्तिज्ञान नहीं हो सकता; क्योंकि ‘अग्निके अभावमें भी कदाचित् धूम हो सकता है’ ऐसी व्यभिचार-शंकाका समस्त धूम तथा अग्नियोंका ज्ञान हुए बिना निराकरण नहीं हो सकता। बौद्ध, जैन, वैशेषिक अनुमानको भी मानते हैं। उनका आशय यह है कि अन्वय-व्यतिरेकद्वारा धूम तथा अग्निके कार्य-कारणभावका निश्चय होनेपर व्यभिचार-शंकाकी निवृत्ति हो जानेसे व्याप्तिज्ञान हो जायगा। उनके मतमें यद्यपि शब्द समादरणीय है, तथापि प्रत्यक्ष, अनुमानसे सिद्ध पदार्थका बोधक होनेसे उसका प्रामाण्य माना जाता है, उसका स्वतन्त्र प्रामाण्य नहीं माना जाता। वैशेषिकके मतानुसार भी शब्द सर्वत्र प्रमाण नहीं है; क्योंकि उन्मत्तप्रलपितादिमें उसका अप्रामाण्य स्पष्ट है। वैशेषिक प्रमाणभूत ईश्वर या अन्य आप्तपुरुषद्वारा उच्चरित शब्दको ही प्रमाण मानते हैं। तथा च वक्ताके प्रामाण्यसे शब्दके प्रामाण्यका अनुमान होता है, अत: शब्दप्रामाण्य अनुमानप्रमाण्यके अधीन होनेसे अनुमानसे पृथक् उसका प्रामाण्य नहीं है। अनुमान और शब्द—दोनों परोक्षसामान्यविषयक हैं, अत: उनकी प्रवृत्ति सम्बन्धग्रहाधीन है। साथ ही विशेष अनन्त होनेके कारण उसका सम्बन्ध दुरवगम है। अत: धूमको देखकर जैसे अग्निका अनुमान किया जाता है, वैसे ही शब्द सुनकर उसका अर्थ अवगत होता है। यहाँ भी लिंगकी ही तरह अन्वयव्यतिरेक होते हैं। जो शब्द जिस अर्थमें प्रयुक्त देखा जाता है, वह उस अर्थका वाचक होता है। धूमके वह्निमत्त्वके समान शब्दका अर्थवत्त्व है, अत: शब्दको अनुमानके अन्तर्गत ही मानना चाहिये। यथेष्ट विनियोज्यता हस्तादि, संज्ञादि लिंगमें भी दिखायी पड़ती है। दृष्टान्त-निरपेक्षता भी समभ्यस्त अनुमानमें स्पष्ट है। अनभ्यस्त होनेपर तो अनुमान और शब्द दोनोंमें सम्बन्धस्मृतिकी सापेक्षता होती है। कोई प्रत्यक्ष और शब्द—इन्हीं दोको प्रमाण मानते हैं। उनके मतमें अनुमान यद्यपि प्रमाण माना जाता है, तथापि वह यदि प्रमाणभूत शब्दसे प्रतिपादित अर्थका अवबोधक हो, तभी प्रमाण होता है, अन्यथा नहीं। अन्य लोग प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द—ये तीन प्रमाण मानते हैं। उनके मतमें न तो शब्द अनुमानकी अपेक्षा करता है और न अनुमान शब्दकी। वाक्यात्मक शब्द अनवगत सम्बन्धका ही बोधक होता है। नवीन विरचित श्लोकादिका श्रवण होनेपर अधिगत पद तथा उनके अर्थोंका वाक्यार्थ अवगत होता देखा जाता है। तथा च सम्बन्धाधिगममूलक प्रवृत्तिवाले अनुमानसे शब्दका साम्य नहीं है। पदात्मक शब्द यद्यपि सम्बन्धाधिगमसापेक्ष होता है, तथापि सामग्रीभेद और विषय-भेदसे उसकी अनुमानसे भिन्नता है। पद और लिंगका विषय भी भिन्न है। पदार्थमात्र पदका अर्थ होता है और अनुमान ‘अग्निमान् पर्वत:’ इत्यादि रीतिसे वाक्यार्थविषयक होता है। धर्मविशिष्ट धर्मी साध्य होता है, अत: पर्वतादिविशेष्यक प्रतिपत्तिपूर्विका पावकादिविशेषणावगति लिंगसे उत्पन्न होती है, जबकि पदसे विशेषणावगतिपूर्वक विशेष्यावगति होती है, इस तरह दोनोंका विषय-भेद स्पष्ट है। कहा गया था कि ‘अनुमानमें जैसे धर्मविशिष्ट धर्मी साध्य है, वैसे ही अर्थविशिष्ट शब्द साध्य हो’ तो यह ठीक नहीं; क्योंकि हेतु होनेके कारण शब्दकी हेतुता अनुपपन्न है। साथ ही अर्थधर्म होनेसे यदि शब्दकी पक्षधर्मता हो, तो अनवगत धूमाग्निसम्बन्ध भी जैसे अर्थधर्मताको ग्रहण करता ही है, वैसे ही अनवगत शब्दार्थ सम्बन्धको भी शब्दकी अर्थधर्मताको ग्रहण करना चाहिये, परंतु ग्रहण नहीं करता, अत: शब्दकी पक्षधर्मता नहीं कही जा सकती। शब्द और अर्थका देश तथा कालसे सामानाधिकरण्यका व्यभिचार भी है, अत: अन्वय-व्यतिरेकका उपपादन दुष्कर है। नैयायिक लोग शब्दको स्वतन्त्र प्रमाण मानते हुए ईश्वररचितत्वेन वेदका प्रामाण्य अंगीकार करते हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको पुरुषार्थ मानते हैं। शब्दप्रमाणके बिना मूक व्यक्तिसे वाग्मी पुरुषकी विशेषता निर्णीत नहीं की जा सकती। शब्दके बिना माता-पिताका ज्ञान भी होना कठिन है। प्रत्यक्ष या अनुमानसे न तो माता-पिताका निर्णय हो सकता है और न उनके धनका पुत्रको अधिकार ही प्राप्त हो सकता है एवं च शब्दप्रमाण माने बिना लोकव्यवहार समुच्छिन्न हो जायगा। इसीलिये कहा गया है— मतयो यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति वानरा:। शास्त्राणि यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति ते नरा:॥ सांख्य, योगी और कुछ नैयायिक प्रत्यक्ष, अनुमान तथा शब्द—ये तीन प्रमाण मानते हैं। नैयायिक इनके अतिरिक्त उपमान प्रमाण भी मानते हैं। अर्थापत्तिको मिलाकर पाँच प्रमाण प्राभाकर मानते हैं। अनुपलब्धिसहित छ: प्रमाण भाट्टों एवं अद्वैतियोंको सम्मत हैं। सम्भव और ऐतिह्य मिलाकर आठ प्रमाण पौराणिक मानते हैं। इनमें वैशेषिक लोग शब्दप्रमाणसे साधित अर्थको तो सत्य ही मानते हैं, पर उसे शब्दमूलक नहीं, अपितु अनुमानमूलक ही बतलाते हैं। मीमांसक लोग जैसे अर्थापत्तिसे साधित अर्थको अनुमानसे साधित करके उसमें अन्तर्भूत करते हैं, वैसे ही नैयायिक लोग भी मानते हैं, उनका कथन है कि परमेश्वरनिर्मित होनेके कारण वेद अपौरुषेय हैं और आप्तोक्त होनेसे उनका प्रामाण्य है। पौरुषेयत्ववादियोंका कहना है कि ‘तस्य ह वा एतस्य महतो भूतस्य नि:श्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेद:’ इस श्रुतिसे ही वेदकी उत्पत्ति परमेश्वरसे नि:श्वासवत् बतलायी गयी है। जिस प्रकार बिना आयासके नि:श्वास उत्पन्न होता है, वैसे ही आयास एवं बुद्धिसे निरपेक्ष ही वेदोंकी उत्पत्ति उक्त श्रुतिमें बतलायी गयी है। वेद यद्यपि स्थूल-सूक्ष्म, सन्निकृष्ट-विप्रकृष्ट, मूर्त-अमूर्त, चेतन-अचेतन—सर्वविध अर्थोंका अवभासक है, तथापि अचिन्त्यशक्तिसम्पन्न होनेसे परमेश्वरका अनायास वेदकर्तृत्व तो सम्भव है, किंतु बुद्धिनिरपेक्षता उपपन्न नहीं हो सकती। कुछ लोग बुद्धिनिरपेक्षताकी उपपत्तिके लिये कहते हैं कि वेद परमेश्वरसे केवल प्रकाशित हुए हैं। कोई नि:श्वसितन्यायका अनायासमात्रसे तात्पर्य मानते हैं। ‘बुद्धिसापेक्ष वाक्य-रचनामें लेशमात्र भी आयास नहीं है,’ यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि नि:श्वासमें भी प्रयत्नलेशकी आवश्यकता तो रहती ही है। अपौरुषेयत्ववादियोंका इसपर यह कथन है कि सुप्त, प्रमत्त, अनवहित एवं अन्यमनस्क व्यक्तियोंका भी नि:श्वास देखा जाता है, अत: नि:श्वासको अवश्य ही बुद्धिप्रयत्नसे निरपेक्ष मानना चाहिये एवं च सहज होनेसे नि:श्वास जैसे अकृत्रिम होता है, वैसे ही नि:श्वासवत् आविर्भूत वेदोंकी भी सहज होनेके कारण अकृत्रिमता माननी चाहिये और उस दशामें अपौरुषेय होनेके कारण पुरुषाश्रित भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटवादि दूषणोंसे असंस्पृष्ट होनेके कारण समस्त-पुंदोषशंकाकलंकके अपास्त होनेसे वेदका स्वत:प्रामाण्य है। यहाँ अनुमानका स्वरूप इस प्रकार समझना चाहिये—सम्प्रदायाविच्छेद होते हुए कर्ता अस्मर्यमाण होनेसे आत्माके समान वेद अपौरुषेय हैं। व्यतिरेकमें—जो सम्प्रदायाविच्छेदे सति अस्मर्यमाणकर्तृक नहीं होता, वह अपौरुषेय भी नहीं होता, जैसे ‘महाभारत’ यह अनुमान है। पौरुषेयवादियोंका कथन है कि प्रलयमें सम्प्रदायका विच्छेद हो जाता है, अत: लक्षणमें विशेषण असिद्ध है। साथ ही अस्मर्यमाणकर्तृकत्वका अर्थ क्या अप्रमीयमाणकर्तृकत्व समझा जाय या स्मरणागोचरकर्तृत्व? अप्रमीयमाणकर्तृकत्व नहीं कहा जा सकता; क्योंकि परमेश्वररूप कर्ता प्रमीयमाण है ‘तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋच: सामानि जज्ञिरे। छन्दाॸसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत॥’ (शु० यजु० ३१।७) यह श्रुति परमेश्वरसे वेदोंकी उत्पत्ति स्पष्ट बतला रही है। विकल्पासह होनेसे स्मरणागोचरकर्तृकत्व भी नहीं कहा जा सकता। जैसा कि प्रश्न उठता है कि क्या एकसे स्मरण अथवा सबसे? निश्चितपुरुषकर्तृकमें भी कर्ताका स्मरण न होनेमात्रसे किसी वस्तुकी अपौरुषेयत्वप्रसक्ति होगी, अत: प्रथम पक्ष संगत नहीं। सबसे अस्मरणको बिना सर्वज्ञके अन्य कोई जान नहीं सकता, अत: दूसरा पक्ष भी उपपन्न नहीं है। साथ ही—वाक्य होनेके कारण ‘रघुवंश’ वाक्यकी तरह वेदवाक्य पौरुष हैं और प्रमाणभूत होते हुए वाक्यस्वरूप होनेके कारण मन्वादिवाक्यके समान वेदवाक्य आप्तप्रणीत हैं, इत्यादि अनुमानोंसे वेदोंके कर्ताका निश्चय भी प्रमाणित हो रहा है। यह नहीं कहा जा सकता कि ‘वेदस्याध्ययनं सर्वं गुर्वध्ययनपूर्वकम्। वेदाध्ययनसामान्यादधुनाध्ययनं यथा॥’ (सर्वदर्शनसंग्रह, जैमिनीय दर्शन १९) इससे उक्त अनुमान सत्प्रतिपक्षित है; क्योंकि ‘भारताध्ययनं सर्वं गुर्वध्ययनपूर्वकम्। भारताध्ययनत्वेन साम्प्रताध्ययनं यथा॥’ (सर्वदर्शन सं० १२।१९) इस प्रकार दोनों ओर समान योग-क्षेम है। ‘को ह्यन्य: पुण्डरीकाक्षान्महाभारतकृद् भवेत्’ (सर्व० जैमि० २०) इस वचनसे भारतका तो व्यासकर्तृकत्व समर्थित हो रहा है, यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि ‘ऋच: सामानि जज्ञिरे’ (शु० य० ३१।७) इत्यादिसे वेदकी भी परमेश्वरकर्तृकता श्रुत है। सामान्यवत्त्वे सति बाह्येन्द्रियग्राह्य होनेसे घटादिकी तरह शब्द भी अनित्य है। ‘वही यह गकार है’ इस प्रत्यभिज्ञाबलसे शब्दकी नित्यता नहीं कही जा सकती; क्योंकि ‘वही ये केश हैं’ इत्यादिके समान वह प्रत्यभिज्ञा नित्यतानिबन्धन नहीं, किंतु सादृश्यनिबन्धन है। अशरीरी होते हुए भी परमेश्वरकी भक्तानुग्रहार्थ लीलाविग्रह-धारणकी उपपत्तिसे कण्ठताल्वादिसापेक्ष वर्णोच्चारण भी सम्भव है, अत: वेदोंको पौरुषेय माननेमें कोई भी अनुपपत्ति नहीं है। किंतु तात्पर्य न समझ सकनेके कारण उक्त सब बातें कही जाती हैं, अत: वे सब अविचारित-रमणीय हैं। उक्त पौरुषेयत्व क्या है? क्या पुरुषोच्चरितत्वमात्र अथवा प्रमाणान्तरसे अर्थको जानकर विरचितत्व? पुरुषोच्चरितत्वमात्र ही यदि पौरुषेयत्व है, तो हमें इष्टापत्ति है। नित्य एवं व्यापक वर्णोंकी देश-काल-पौर्वापर्यरूप आनुपूर्वी असम्भव होनेसे वर्णव्यक्तियोंकी ही कालपौर्वापर्यलक्षण आनुपूर्वी कहनी चाहिये। वर्णव्यक्तियाँ कण्ठ-ताल्वादि अभिघातजन्य ध्वन्यभिव्यक्ति-वाली हैं। तथा च नियत वर्णोंकी नियत आनुपूर्वीरूप वेदका पुरुषोच्चरितत्व सुतरां इष्ट ही है। प्रतिदिन अध्येताओंद्वारा उच्चार्यमाण वेदका पुरुषोच्चरितत्वमात्ररूप पौरुषेयत्व तो सिद्ध ही है, अत: उसकी सिद्धिका आयास व्यर्थ है। यदि प्रमाणान्तरेण अर्थज्ञानपूर्वक रचितत्वरूप पौरुषेयत्व कहें, तो विकल्पासह होनेसे वह ठीक नहीं; क्योंकि उसकी सिद्धि अनुमानसे की जायगी या आगमसे? आगमबलसे नहीं कहा जा सकता; क्योंकि प्रमाणान्तरसे जिसका अर्थ अनुपलब्ध है, ऐसे कविकल्पित वाक्यमें वाक्यत्वरूप हेतु व्यभिचरित हो जायगा। यदि ‘प्रमाणत्वे सति’ इस पदका निवेश करके अप्रमाण कविकल्पित वाक्यमें हेतुव्यभिचारका वरण किया जाय, तो भी प्रमाणान्तरके अविषयीभूत अर्थवाले वेदवाक्यमें प्रमाणान्तरेण अर्थका उपलम्भ करके विरचितत्वकी सिद्धि करना ‘मेरे मुँहमें जिह्वा नहीं है’ इस कथनके समान व्याहत है। प्रमाणान्तरसे उपलब्ध अर्थवाला होनेपर तो अनुवादक हो जायगा, जिससे अनधिगतका बोधक न होनेसे वेदका अप्रामाण्य ही सिद्ध होगा। चक्षुरादि इन्द्रियोंसे अनुपलब्ध शब्दकी अवगतिके लिये ही श्रोत्रप्रमाणकी जैसे सार्थकता है, वैसे ही प्रत्यक्ष, अनुमानसे अनधिगत धर्म आदिके अधिगमक होनेसे ही आगमप्रमाणकी सार्थकता है, अन्यथा व्यर्थ ही है—‘प्रत्यक्षेणानुमित्या वा यस्तूपायो न बुद्धॺते। एनं विदन्ति वेदेन तस्माद्वेदस्य वेदता॥’ से यह स्पष्ट है। लीलाविग्रहधारी परमेश्वरकी भी चक्षुरादि इन्द्रियाँ अतीन्द्रिय देश, काल, स्वभाव, विप्रकृष्ट-अर्थका ग्रहण नहीं कर सकतीं; क्योंकि दृष्टानुसार ही कल्पनाका आश्रयण किया जा सकता है, जैसा कि कहा गया है—‘यत्राप्यतिशयो दृष्ट: स स्वार्थानतिलङ्घनात्। दूरसूक्ष्मादिदृष्टौ स्यान्न रूपे श्रोत्रवृत्तिता॥’ (सर्वदर्शनसं० १२।२३) सर्वज्ञको भी घ्राणशक्तिसे ही गन्धग्रहणका जैसे नियम है, वैसे ही वेदशक्तिसे ही वेदार्थग्रहणका नियम होनेपर सर्वज्ञत्वकी हानि नहीं होती। इसलिये दूसरा पक्ष भी संगत नहीं है। काठक, कालाप, तैत्तिरीय इत्यादि समाख्याएँ अध्ययनसम्प्रदायप्रवर्तकविषयक हैं। ‘तेन प्रोक्तम्’ में ‘प्रोक्तम्’ का ‘कृतम्’ यह अर्थ नहीं होता; क्योंकि वह तो ‘कृते ग्रन्थे’ से ही गतार्थ है, किंतु स्वयं या अन्यद्वारा कृत अध्यापन या अर्थान्वाख्यानसे प्रकाशित करना ही ‘प्रोक्त’ का अर्थ है। नि:श्वासवत् वेदाविर्भावका श्रवण परमेशितृकारणकत्वका ही बोधन करता है, प्रमाणान्तरसे अर्थोपलम्भनका भी बोधन नहीं करता। जिनका यह कहना है कि प्रत्यक्षद्वारा अर्थको उपलब्ध करके अखिल वेदका ईश्वरने निर्माण किया है, उन्हें भी कहना पड़ेगा कि ईश्वरको सभी पदार्थ प्रत्यक्ष हैं, प्रत्यक्षगम्य ही नहीं, अपितु अनुमानगम्य भी। तथा च लाघवात् यही सिद्ध होगा कि अनुमानसिद्ध अर्थमूलक वेदरचना है। अपि च ईश्वरनिर्मित होनेसे वेदके प्रामाण्यकी सिद्धि और उसके सिद्ध हो जानेपर वेदप्रतिपाद्यत्वेन ईश्वरसिद्धि माननेपर अन्योन्याश्रयदोष अनिवार्य है। ‘क्षित्यङ्कुरादिकं सकर्तृकं कार्यत्वाद् घटादिवत्’ इस अनुमानसे यदि ईश्वरसिद्धि इष्ट हो, तो भी धूमसे जिस प्रकार वह्निसामान्यका अनुमान होता है, वैसे कार्यत्वहेतुसे ईश्वरसामान्यकी ही सिद्धि होगी, ईश्वरविशेषकी नहीं। वेदकर्ता तो ईश्वरविशेष है, अत: अनुमानसे उसकी सिद्धि किस तरह होगी? जिन-जिन युक्तियोंसे नैयायिक लोग वेदरचयिताका ईश्वरत्व सिद्ध करना चाहेंगे, उन्हीं-उन्हीं युक्तियोंसे बाइबिल, कुरान आदि ग्रन्थोंके निर्माताका भी परमेश्वरत्व—उन-उन ग्रन्थोंके अनुयायी—सिद्ध कर सकते हैं। तथा च इतरग्रन्थ साधारण होनेसे वेदमें पुरुषाश्रित पुंदोषसंस्पर्शकी शंका प्राप्त होनेसे उसका प्रामाण्य सिद्ध न हो सकेगा, अत: पूर्वोक्त रीतिसे वेदका अपौरुषेयत्व ही मानना चाहिये। यदि कहा जाय कि वेदमें इन्द्र आदि व्यक्तियोंका श्रवण है, अत: उनकी उत्पत्तिके अनन्तर वेदका निर्माण होना युक्त है, तो यह ठीक नहीं; क्योंकि सृष्टि शब्दपूर्वक ही होती है, जैसा कि ‘वेदशब्देभ्य एवादौ निर्मिमिते स ईश्वर:’ (महा० शां० २३२।२६) इत्यादि स्मृतियोंमें बतलाया गया है। ‘शब्द इत चेन्नात: प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्’ (वेदान्तदर्शन १।३।२८) इत्यादि न्यायमें भी यह सिद्ध किया गया है। वाक्यत्व हेतुसे महाभारतादिवत् वेदके पौरुषेयत्वका जो अनुमान किया गया था, वह भी ठीक नहीं; क्योंकि स्मर्यमाणकर्तृकत्वरूप उपाधि विद्यमान है। वेदमें वाक्यत्वरूप हेतुके रहनेपर भी स्मर्यमाणकर्तृकत्व नहीं है, अत: साधनाव्यापकता है। ‘वाचा विरूपनित्यया’, (तैत्ति० सं० २।६।११) अनादिनिधिना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा (महा०शां० २३२।२५) ‘अत एव च नित्यत्वम्’ (वेदान्तदर्शन० १।३।२९) इत्यादि श्रुतिस्मृति-वचनोंसे वेदका नित्यत्व अवगत हो रहा है, अत: वेदकी स्मर्यमाणकर्तृकता या प्रमीयमाणकर्तृकता नहीं कही जा सकती। इसीलिये ‘न कदाचिदनीदृशं जगत्’ इत्यादि जरन्मीमांसकमतानुसार ‘सम्प्रदायाविच्छेदे सति’ इस विशेषणकी असिद्धि भी नहीं कही जा सकती। ब्रह्ममीमांसकमतानुसार भी नित्यसिद्ध वेदका सम्प्रदायप्रवर्तकत्वेन नि:श्वासवत् परमेश्वरसे प्रादुर्भाव होनेपर भी ‘प्रमाणान्तरेण अर्थमुपलभ्य विरचितत्व’ न होनेसे पूर्वकल्पीय ही वेदका आविर्भाव हुआ करता है। एतावता अद्वैतकी व्याहृति नहीं कही जा सकती; क्योंकि जीवोंकी तरह वेदका नित्यत्व आपेक्षिक अभिमत होनेसे अद्वैतका बाध नहीं होता। ब्रह्मातिरिक्त समस्त पदार्थोंका अद्वैतसिद्धान्तानुसार मिथ्यात्व मान्य है, अत: वेदमें भी मिथ्यात्व प्रसक्त हो गया, यह नहीं कहा जा सकता; क्योंकि ‘अत्र वेदा अवेदा भवन्ति’ (बृहदा० उप०) इत्यादि प्रमाणोंसे कारणभावकी अवगति होनेपर पृथक् नामरूपका बाध इष्ट ही है। अतएव वेदप्रामाण्य मानना ही आस्तिकता कहा गया है, वेदकी सत्यता स्वीकार करना आस्तिकता नहीं बतलाया गया। इसीलिये वर्णात्मक वेदकी सत्यता माननेवाले भी चार्वाक आदिको नास्तिक कहा गया है। पूर्वोक्त नित्यत्वबोधक वचनोंका विरोध होनेके कारण ‘ऋग्वेदोऽग्निरजायत’ इत्यादिसे भी वेदकी उत्पत्ति बोधित नहीं होती, अपितु अधीत पूर्वकल्पीय एवं सुप्तप्रतिबुद्धन्यायसे संस्मृत वेदका सम्प्रदायप्रवर्तकत्व ही माना जाता है और उसीके अनुसार मन्त्रद्रष्टृत्वात् ऋषित्व भी मान्य है। प्रत्यक्ष तथा अनुमानसे उपपन्नार्थत्वात् जो लोग वेदका प्रामाण्य अंगीकार करते हैं, उनके मतमें प्रमाणान्तरसे गतार्थ हो जाने और अनुवादक हो जानेके कारण वेदकी अनावश्यकता और अप्रमाणता स्पष्ट है। जिन प्रमाणोंसे वेदार्थकी उपपन्नार्थता विज्ञात होती है, उन्हींसे वेदार्थका भी ज्ञान हो सकता है, अत: आगमरूप प्रमाणान्तर मानना व्यर्थ ही है। अभिप्राय यह कि प्रथमोच्चरितत्व या पूर्वानुपूर्वीनिरपेक्ष उच्चरितत्व पौरुषेयत्व है। पुरुषोच्चरित होनेपर भी वेद प्रथमोच्चरित या पूर्वानुपूर्वीनिरपेक्ष उच्चरित न होनेसे पौरुषेय नहीं है। गुरूच्चारणानूच्चारण वेदका होता है, अत: पूर्वानुपूर्वीनिरपेक्ष उच्चरित नहीं होते एवं च प्रथमोच्चरितत्व भी वेदोंमें न होनेसे प्रमाणान्तरेण अर्थमुपलभ्य विरचितत्व भी उनमें नहीं है, अत: उनका अपौरुषेयत्व सिद्ध है। ‘वाचा विरूपनित्यया’ इत्यादि पूर्वोद‍्धृत श्रुति-स्मृतिवचनोंसे विरोध होनेके कारण ‘तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋच: सामानि जज्ञिरे’ (शु० यजु० ३१।७) इत्यादि श्रुतियोंसे वेदोंकी पौरुषेयताका साधन नहीं किया जा सकता। ‘अस्य महतो भूतस्य नि:श्वसितम्’ (छां० उप०) इस तरह नि:श्वासवत् वेदोंका आविर्भाव श्रुत होनेसे उनकी बुद्धि प्रयत्ननिरपेक्षतया अकृत्रिमता भी कही जाती है। ‘यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै’ (श्वेता० उप० ६।१८) इस श्रुतिमें ब्रह्माका निर्माण बतलाया गया है, पर वेदोंका तो प्रेषणमात्र ही बतलाया गया है, निर्माण नहीं; क्योंकि ‘विदधाति’ और ‘प्रहिणोति’ का अर्थ वैसा ही है। ब्रह्माका विधाता भी वेदका विधाता नहीं है, अपितु ब्रह्माके हृदयमें वह केवल नित्यसिद्ध वेदोंकी प्रेरणा करता है। अत: वेदकी अपौरुषेयता सिद्ध है। ‘मैंने कुछ नहीं जाना’ ऐसा जागनेपर लोगोंको स्मरण होता है, अत: आत्माकी चिदात्मता और अनुभूतिके बिना स्मृति बन नहीं सकती, अत: आत्माकी चिदात्मता भी ज्ञात होती है। इसलिये प्रकाशाप्रकाशात्मक खद्योत (जुगनू) के समान आत्मा चिज्जडरूप है। नित्य, निरतिशय सुखकी अभिव्यक्ति मुक्ति है। और भी अन्य नैयायिकादिसम्मत तथा स्वमतसे अविरुद्ध पदार्थ भाट्टलोगोंको स्वीकृत ही हैं। प्राभाकार और नैयायिक द्रव्यरूप होनेके कारण आकाशवत् आत्माको भी अचित् एवं चैतन्यगुणवाला मानते हैं। चैतन्यकी ही तरह इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, सुख, दु:ख और संस्कारको भी आत्माके गुण ही मानते हैं। अदृष्टवशात् आत्मा और मनका संयोग होनेपर उक्त गुण आत्मामें उत्पन्न होते और उनका वियोग होनेपर नष्ट हो जाते हैं। चैतन्ययुक्त होनेसे ही आत्माको चेतन भी कह दिया जाता है। वही कर्ता-भोक्ता है। कर्मवशात् ही इस लोकके देहके समान लोकान्तरमें भी सुख-दु:खादि होते हैं। इसी प्रकार सर्वगत होनेपर भी आत्माके गमनागमनादिकी व्यवस्था भी बन जाती है। सांख्योंका कहना है कि निरंशकी उभयरूपता नहीं बन सकती, अत: आत्मा चिद्‍रूप ही है। जाडॺांश प्रकृतिका है। चित‍्के भोग तथा अपवर्गके लिये प्रकृतिकी प्रवृत्ति होती है। मूल प्रकृति, सात प्रकृतिके विकार (महत्, अहंकार और पंचतन्मात्राएँ) और सोलह विकार मानते हैं। आत्माको कूटस्थ, असंग, चेतनस्वरूप, व्यापक और अनन्त मानते हैं। सत्त्व और पुरुषकी अन्यताख्यातिसे द्रष्टा आत्माका स्वरूपमें अवस्थान मुक्ति है। बछड़ेकी विवृद्धिके लिये पय:प्रवृत्तिके समान अचेतन भी प्रकृतिकी भोगापवर्गरूप पुरुषार्थके सम्पादनार्थ प्रवृत्ति होती है। ‘क्लेश, कर्म, विपाक और आशयसे अपरामृष्ट पुरुषरूप ईश्वरसे प्रेरित हुई प्रकृति प्रवृत्त होती है’, ऐसा पातंजलों (योगियों)-का मत है। ‘अनादिनिधन, शब्दरूप अक्षर ब्रह्म ही प्रपंचरूपसे विवर्तित होता है’, ऐसा वैयाकरणोंका सिद्धान्त है। किन्हींके मतानुसार द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, विशिष्ट, अंशी, शक्ति, सादृश्य और अभाव—ये दस पदार्थ हैं। इनमें परमात्मा, लक्ष्मी, जीव, अव्याकृताकाश, प्रकृति, गुणत्रय, महत्तत्त्व, अहंतत्त्व, बुद्धि, मन, इन्द्रिय, मात्रा, भूत, ब्रह्माण्ड, अविद्या, अर्णव, अन्धकार, वासना, काल और प्रतिबिम्बभेदसे बीस द्रव्य, रूप-रसादि अनेक गुण, विहित-निषिद्ध-उदासीनभेदसे तीन प्रकारके कर्म आदि हैं। इस मतमें जीव-ईश्वरका अत्यन्त भेद मान्य है। अभेदवादिनी श्रुतियोंको वे सर्वथा औपचारिक मानते हैं। कुछ लोग प्रमाण और प्रमेयरूप दो ही तत्त्व मानते हैं। प्रत्यक्ष, अनुमान और आगमभेदसे वे तीन प्रमाण तथा द्रव्य, गुण और सामान्यभेदसे तीन प्रमेय मानते हैं। ईश्वर, जीव, नित्यविभूति, ज्ञान, प्रकृति और काल—ये छ: द्रव्य हैं। सत्त्व, रज, तम, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, संयोग और शक्ति—ये दस गुण हैं। द्रव्य और गुण उभयरूप सामान्य है। प्रकृतिका परिणाम प्रपंच है। पर, व्यूह, विभव, अन्तर्यामी और अर्चावतारभेदसे परमेश्वरके पाँच प्रकार हैं। उसके परतन्त्र, बद्ध, मुक्त और नित्यभेदसे तीन प्रकारका जीव है। संसारी बद्ध है। श्रीमन्नारायणकी उपासनासे वैकुण्ठलोकको प्राप्त जीव मुक्त हैं। कभी भी जिन्हें संसारका स्पर्श नहीं हुआ, ऐसे अनन्त, गरुड आदि नित्यसंज्ञक हैं। शुद्ध और मिश्रभेदसे सत्त्व दो प्रकारका है। नित्यविभूतिमें शुद्ध और प्रकृतिमें मिश्र सत्त्व है। ‘अन्तर्यामिब्राह्मण’ द्वारा चिदचिच्छरीरक परब्रह्म ही चिदचिद्विशिष्ट है, जो दूसरा है। आत्मा ज्ञानगुणक होते हुए ज्ञानस्वरूप है। परमेश्वर विभु है, परंतु चित् कणरूप जीव अणुपरिमाणपरिमित हैं। प्राकृत और अप्राकृतभेदसे दो प्रकारका अचेतन काल है। चित्-अचिद्‍रूपसे परमेश्वरका भेदव्यपदेश होनेके कारण भेद है और अभेदव्यपदेशके कारण अभेद भी है। इस तरह भेदाभेदवादी सभी प्रकारके श्रुतिवचन स्वार्थमें अनुपचरितार्थक ही समझते हैं। इन्हींमें कोई सोपाधिक भेदाभेदवादी हैं। कोई अचिन्त्यभेदाभेदवादी हैं। कोई शुद्धाद्वैत ही तत्त्व बतलाते हैं। यहाँ ‘शुद्धाद्वैत’ का समास इस प्रकार है—‘शुद्धं च तद् अद्वैतं शुद्धाद्वैतम्’ और ‘शुद्धयो: मायासम्बन्धरहितयो: अद्वैतं शुद्धाद्वैतम्।’ इयत्तासे अनवच्छिन्न ब्रह्म ही अनवगाह्य महामहिमशाली होने और सकल विरुद्ध धर्मोंका आश्रय होनेके कारण कामधेनु, कल्पवृक्ष एवं चिन्तामणि आदिके समान स्वयं अविकृत रहकर ही अघटितघटनापटीयान्, स्वाभाविक स्वात्मयोगसे क्रीडार्थ पूर्णानन्दको तिरोभूत करके जीवरूपको ग्रहण करता है, चिदानन्दांशोंको तिरोहित करके सर्वभवनसमर्थ सदंशाश्रित मायाशक्तिसे जगद्‍रूप धारण करता है, आनन्दांशको किंचित्तिरोहित करके अक्षरब्रह्मरूप ग्रहण करता है और पूर्णानन्दांशका तिरोधान बिना किये ही पुरुषोत्तमरूपसे प्रादुर्भूत होता है। इसी प्रकार कोई कार्य, कारण, योग, विधि और दु:ख—ये पाँच पदार्थ मानते हैं। कोई पति, पशु और पाश—ये तीन पदार्थ ही मानते हैं। इनके मतानुसार &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/shivbhujngm/&quot;&gt;शिव&lt;/a&gt; पति, जीव पशु और मल, कर्म, माया तथा रोधशक्ति पाश हैं। प्रत्यभिज्ञावादीके अनुसार जीव तथा परमात्माका ऐक्य है। जड पूर्ववत् है, किंतु आत्मासे वह भिन्न भी है और अभिन्न भी और सब पूर्ववत् है।&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt; और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>धर्मसम्राट</category><category>पार्थक्य</category><category>मनुस्मृति</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>12. मार्क्स और आत्मा - 12.1 आत्मतत्त्व-विमर्श ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/12-maarks-aur-aatmaa-12-1-aatmtt/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/12-maarks-aur-aatmaa-12-1-aatmtt/</guid><description>12. मार्क्स और आत्मा शास्त्र-संस्कारवर्जित जनसाधारण तथा भूतसंघातवादी चार्वाक और आधुनिक मार्क्सवादी जीवित देहको ही आत्मा कहते हैं; क्योंकि ‘मनुष्योऽहं जानामि’ मैं मनुष्य हूँ, जानता हूँ, इस रूपसे ही…</description><pubDate>Tue, 15 Jul 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h2&gt;12. मार्क्स और आत्मा&lt;/h2&gt;
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&lt;p&gt;शास्त्र-संस्कारवर्जित जनसाधारण तथा भूतसंघातवादी चार्वाक और आधुनिक &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt;ी जीवित देहको ही आत्मा कहते हैं; क्योंकि ‘मनुष्योऽहं जानामि’ मैं मनुष्य हूँ, जानता हूँ, इस रूपसे ही शरीर ही ‘अहं’ प्रत्ययका आलम्बन और ज्ञानके आश्रयरूपसे आत्मा प्रतीत होता है। दूसरे लोग इन्द्रियोंको ही आत्मा कहते हैं। उनके मतसे ‘चक्षु, श्रोत्रादि इन्द्रियोंके बिना रूपादि-ज्ञान नहीं होता, अत: वे ही आत्मा हैं।’ अन्य लोग ‘स्वप्नमें चक्षुरादि न होनेपर भी ज्ञान होता है, अत: ‘अहं’ प्रत्यय और विज्ञानका आश्रय होनेसे मनको ही आत्मा मानते हैं।’ विज्ञानवादी क्षणिक विज्ञानको और माध्यमिक शून्यको ही आत्मा कहता है। यहाँ जीवित देहको ही आत्मा माननेवाले मार्क्सवादियोंसे प्रश्न हो सकता है कि क्या भोक्तृत्व और चैतन्य व्यस्त (अर्थात् प्रत्येक) भूतोंका धर्म है अथवा समस्त (सम्मिलित) भूतोंका? पहले पक्षमें भी क्या सभी भूत समानकालमें ही भोक्ता हैं? यदि हाँ, तो स्वार्थके लिये प्रवृत्त सभी चैतन्य गुणयुक्त भूतोंका परस्पर अंगांगिभाव नहीं हो सकेगा, अंगांगिभाव बिना बने संघात नहीं बन सकता। लोकमें देखते ही हैं कि मुंज आदि तृणोंका अंगांगीभाव होनेसे रज्जुरूप संघात निष्पन्न होता है। यदि संघातके बिना ही पृथक्-पृथक् भूतोंका स्वतन्त्र भोक्तृत्व मान लिया जाय तो देहसे बाहर भी एक-एक भूतमें भी भोक्तृताकी उपलब्धि होनी चाहिये, जो कि अदृष्ट ही है। यदि व्यस्त भूतोंका समानकालमें ही भोक्तृत्व न होकर क्रमेण भोक्तृत्व हो तो भी संघातकी अनिष्पत्ति बनी ही रहेगी। यदि वर-विवाहादि न्यायसे जैसे प्रतिविवाहमें एक-एक पुरुष प्रधान और अन्य वरयात्रिक अप्रधान होते हैं, उसी तरह एक-एक भोगमें एक-एक भूत प्रधान होगा। दूसरे उसके गुणभूत होंगे, परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि जैसे एक-एक वरके लिये असाधारणरूपसे एक-एक कन्या भोग्य वस्तु है, वैसे ही भोग करनेवाले पृथिवी, जल, तेज, वायुके लिये एक-एक गन्ध, रस, रूप, स्पर्शादि भोग्यवस्तु व्यवस्थित नहीं हैं, अतएव पृथिवीमें रूप-रसादिकी भी उपलब्धि होती है। यदि किसी तरह व्यवस्था मान भी ली जाय कि तेजका रूप ही, वायुका स्पर्श ही, जलका रस ही भोग्य है तो भी एक कालमें शब्द-स्पर्शादि सभी विषयोंका सन्निधान होनेपर भोगमें क्रम अर्थात् अयौगपद्य उपपन्न नहीं हो सकेगा। जैसे एक ही मुहूर्तमें प्रत्येक भोग्य-कन्याके उपस्थित होनेपर वरोंका क्रम विवाह और गुण-प्रधानभावेन संघात नहीं बन सकता, अर्थात् भोग्यकी उपस्थितिमें भोक्ता क्रमकी अपेक्षा न करके ही भोगमें प्रवृत्त होगा। उसी तरह प्रत्येक भोक्ता भूत, भोग्य शब्दादिके उपस्थित होनेपर क्रमकी अपेक्षा न करके ही भोगमें संलग्न होगा। अत: इनका भी अंगांगी-भावरूपसे संघात नहीं बन सकेगा। इसी तरह समस्त (सम्मिलित) भूतोंका भी भोक्तृत्व नहीं बन सकता; क्योंकि यदि प्रत्येक भूतोंमें चैतन्य नहीं है तो वह संघातमें भी नहीं हो सकता। अतएव संघातमें भी भोक्तृत्व नहीं बन सकता। यदि कहा जाय कि अग्निमें डाले हुए एक-एक तिल ज्वालाके जनक न होनेपर भी तिलसमूह ज्वालाका जनक होता है, उसी तरह भूतोंका समूह भी चैतन्यका जनक होगा, परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि संघातकी उत्पत्तिमें कोई स्पष्ट हेतु नहीं दिखायी देता। कारण, मार्क्सवादीके मतमें संघातात्मक शरीरसे भिन्न कोई चेतन पदार्थ है ही नहीं, जो कि प्रत्येक अचेतन भूतका चेतनात्मक संघात उत्पन्न कर सके। यदि भावी भोगको ही संघातका कारण कहा जाय तो वह भी ठीक नहीं, कारण यदि भोगको अप्रधान माना जाय तो परस्पर गुणप्रधानभावशून्य भूतोंका संघात कैसे बनेगा? अर्थात् गुणभूत भोगके द्वारा प्रधानभूत भूतोंका संघात सम्पादन असंगत है। यदि भोगको ही प्रधान माना जाय तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि भोग सर्वथा ही भोक्ताका शेष (अंग) हुआ करता है। कहा जा सकता है कि शेषी (अंगी) अर्थात् प्रधानभूत भोगके प्रति शेषभूत (अर्थात् अंगभूत) स्त्री-पुरुष शरीर भोक्ताओंका संहत (सम्मिलित) होना देखा गया है। पर यह भी ठीक नहीं; क्योंकि सिद्धान्तमें वहाँ भी स्त्री-पुरुष शरीरमें भोक्तृत्व सम्प्रतिपन्न नहीं, किंतु वहाँ शरीर-भिन्न दोनोंके भोक्ता आत्मा ही भोगके लिये दोनों शरीरोंको सम्मिलित करते हैं और ज्वालाके प्रति तिलोंकी संघातापत्तिका दृष्टान्त भी जडवादीके मतमें असिद्ध है; क्योंकि उसके मतमें संघात नामकी कोई चीज सिद्ध नहीं होती। वादी-प्रतिवादी उभयसम्मत होनेसे ही कोई दृष्टान्त किसी सिद्धान्तका साधक हो सकता है। संघात क्या है? यह भी विचारणीय है। ‘जैसे अनेक वृक्षोंका एक देशमें आना ही उनका संघातभूत ‘वन’ कहा जाता है, वैसे ही भोग और भोक्ताका समानाधिकरणत्व अर्थात् एक देशस्थता संघात हैं’, यह नहीं कहा जा सकता; क्योंकि इस तरह तो सर्वव्यापी सभी भूत सर्वत्र हैं। अतएव चैतन्य और भोग भी सार्वत्रिक ठहरेगा तथा शरीरमें ही भोगका निमय बाधित होगा। ‘उन भूतोंसे आरब्ध अवयवी संघात है’, यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि यदि वह अवयवी चार भूतोंसे भिन्न है, तो उसे पाँचवाँ तत्त्व मानना होगा, जो भौतिकवादियोंको अस्वीकृत ही है। यदि अवयवी अवयवोंसे अभिन्न है, तब तो भूतमात्र ही होगा। भेद एवं अभेद दोनोंका होना असंगत ही है। यदि कहा जाय कि अवयवी अवयवोंके परतन्त्र है; अत: पंचमतत्त्वापत्ति नहीं होगी, तो यह भी ठीक नहीं; कारण, इस तरह जल आदि भी पृथ्वी आदिके परतन्त्र होनेसे जलादिमें भी स्वतन्त्र तत्त्वका व्यवहार होता है। फिर तो पृथिव्यादि भूतचतुष्टय तत्त्व हैं, यह सिद्धान्त बाधित हो गया। कुछ लोग कहते हैं कि ‘एकद्रव्य-बुद्धिका अवलम्बन योग्य होना ही संघात है। देहमें एकबुद्धि-अवलम्बन-योग्यता है ही’, परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि वस्तुत: अनेकोंमें एकत्वबुद्धि विभ्रम ही है। ‘एकार्थक्रियामें युगपत् (एक कालमें) अन्वय ही संघात है जैसे प्रमातृत्व आदि व्यवहाररूप एक कार्यके लिये पृथिव्यादि चारों भूतोंका अन्वय होता है।’ पर यह भी ठीक नहीं, कारण, ऐसा माननेपर वायुजन्य वेणुसंघर्षजनित काष्ठाश्रित वह्निसे संतप्त जलमें चारों भूतोंका समन्वय है ही, फिर उस जलमें भोक्तृत्व होना चाहिये, परंतु यह है नहीं। जो कहा जाता है कि ‘जैसे अग्निका लोह-पिण्डके साथ सम्बन्ध होता है, वैसे सम्बन्धको ही संघात कहा जाता है’, वह भी ठीक नहीं। कारण, शरीरमें वायुका सम्बन्ध उस प्रकारका न होनेसे शरीरमें भोक्तृत्व नहीं बन सकेगा। इसके अतिरिक्त वह्निव्याप्त लोहपिण्डमें उसके ही द्वारा उसमें जल शुष्क होता है और वायुका भी उसमें सम्पर्क रहता है। अत: उस लोहपिण्डमें ही भोक्तृत्व एवं चैतन्यका उपलम्भ होना चाहिये। यदि इन सब दोषोंके परिहारके लिये एक-एक भूतको भोक्ता माना जाय तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि सब भूतोंका शब्दादि विषय-सन्निधान होनेपर फिर किसका भोग या चैतन्य है? इसका निश्चय असम्भव होगा। अत: चारोंको भोक्ता मानना पड़ेगा और उनका संघात बन नहीं सकता, अत: संघातभावापन्न भूतोंको भोक्ता या चेतन माननेका पक्ष युक्तिहीन है। कहा जाता है कि ‘शक्तिमद्‍द्रव्यान्तरकी कल्पनाकी अपेक्षा उन गोलकोंमें शक्तिमात्रकी कल्पनामें लाघव है’, परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि फिर तो आत्मामें ही क्रमयुक्त सर्वविज्ञानसामर्थ्य माननेमें अत्यन्त लाघव है। कुछ लोग ‘रूपादिकी उपलब्धि करणपूर्वक होनी चाहिये, कर्ताका व्यापार होनेसे छिदि क्रियाके तुल्य, अर्थात् जैसे कर्ता कुठारादि करणके द्वारा काष्ठछेदन करता है, उसी तरह आत्मा चक्षुरादि करणोंके द्वारा रूपादिकी उपलब्धि करता है’, इस अनुमानसे देहभिन्न इन्द्रियाँ सिद्ध करते हैं और यह भी कहा जाता है कि ‘वे इन्द्रियाँ भौतिक हैं। चक्षु तैजस है; क्योंकि तैजसरूपका ही ग्राहक है। श्रोत्र आकाशीय है; क्योंकि आकाशीय शब्दका ग्राहक है। मन शब्द-स्पर्शादि सभीका व्यंजक है, अत: वह पंचभूतोंका ही कार्य है। इस तरह इन्द्रियाँ भी भोक्ता नहीं हो सकतीं।’ बौद्धोंके अनुसार ‘दिखायी देनेवाले आँख, नाक, कान आदि गोलक ही इन्द्रियाँ हैं।’ ‘उन गोलकोंमें देखने-सुनने आदिकी शक्ति ही इन्द्रियाँ हैं’ यह मीमांसकोंका मत है। ‘गोलक-भिन्न द्रव्य ही इन्द्रियाँ हैं’ यह अन्य लोग मानते हैं। उनमें बौद्धमत इसलिये ठीक नहीं है कि कानरूपी गोलक न रहनेपर भी सर्पको शब्दका बोध होता है। वृक्षोंमें कोई गोलक नहीं होता, तो भी उन्हें शब्दादिका बोध होता है। यह आगम&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;्य है। आधुनिक वैज्ञानिकोंने भी उनका चेतन होना स्वीकार किया है। शास्त्रोंने भी उनकी हिंसा मना की है। उपर्युक्त दोषोंके कारण ही ‘गोलकोंकी शक्ति इन्द्रियाँ हैं’ यह पक्ष भी ठीक नहीं। कुछ लोग इन्द्रियोंको आहंकारिक एवं सर्वगत मानते हैं, अन्य मध्यम परिमाण ही मानते हैं। बौद्ध अप्राप्यकारी कहते हैं, अर्थात् विषय-देशपर बिना गये ही इन्द्रियाँ विषयोंका प्रकाशन करती हैं, परंतु दूरसे स्पर्श, रस, गन्धका उपलम्भ नहीं होता। अत: त्वक्, रसना, घ्राणको अप्राप्यकारी नहीं कहा जा सकता। चक्षु भी दूरदेश जाकर ही दूरस्थ वस्तुका ग्रहण करता है। तेज शीघ्र ही दूरगामी देखा जाता है। शब्द भी वीचि-तरंगन्यायसे श्रोत्र-देशपर आता है, तभी उसका ग्रहण होता है। रेडियो आदिद्वारा शब्दका विस्तार और अधिक हो जाता है। अत: श्रोत्र भी अप्राप्यकारी नहीं। मनको भी नैयायिक नित्य कहते हैं, परंतु वेदान्तमतमें उसकी उत्पत्ति मान्य है—‘तन्मनोऽसृजत्’ (ऐतरेय०) नैयायिक मनको अणु-परिमाण और वेदान्ती मध्यम-परिमाण कहते हैं। ‘मन, अन्त:करण, बुद्धि, अहंकार एक ही वस्तुकी अवस्थाएँ हैं, आत्मा इन सभी साधनोंके द्वारा भोगके लिये प्रवृत्त होता है। वह सर्वगत एवं कर्ता है, यह नैयायिकोंका मत है। वेदान्त-मतमें ‘आत्मा स्वप्रकाश है।’ निद्राकालमें सुखपूर्वक सोया, इस प्रकार सौषुप्त प्रत्यक्षानुभवके कारण ही प्रबुद्धको स्मरण होता है।’ आत्मा स्वप्रकाश है, क्योंकि स्वसत्तामें प्रकाशविहीन नहीं रहता, जैसे प्रदीप और ज्ञान। ये अपनी सत्तामें प्रकाशरहित नहीं होते, अतएव स्वप्रकाश हैं। इसी तरह आत्मा भी स्वसत्तामें प्रकाशशून्य नहीं होता, अत: स्वप्रकाश है। इसी तरह आत्मा प्रदीपके समान विषयका प्रकाशक एवं आलोकके तुल्य विषय प्रकाशका आश्रय है। इसलिये भी स्वप्रकाश है, इसी तरह ज्ञानके समान इन्द्रिय-गोचर न होकर अपरोक्ष होनेसे भी आत्मा स्वप्रकाश है। जैसे ज्ञान चक्षुरादिका विषय न होकर भी अपरोक्ष है, वैसे ही आत्मा भी। इसी तरह आत्मा धर्मी होते हुए भी अजन्य प्रकाश-गुणवाला है; क्योंकि वह प्रकाश-गुणवाला है जैसे आदित्य। अर्थात् जैसे आदित्य प्रकाश-गुणवाला होनेसे अजन्य प्रकाश-गुणवाला है, वैसे ही आत्मा भी प्रकाश-गुणवाला होनेसे अजन्य प्रकाश-गुणवाला है। यह बात दूसरी है कि आदित्यका प्रकाशरूपी प्रकाश है, आत्माका ज्ञानरूप नीरूप प्रकाश है। ‘अत्रायं पुरुष: स्वयं ज्योति:’ इत्यादि आगम भी आत्माको स्वप्रकाश कहते हैं। नैयायिक एवं पूर्वमीमांसक आत्माको कर्ता मानते हैं; किंतु सांख्य निरवयवमें परिस्पन्द एवं परिणामलक्षण क्रियाको असम्भव समझकर उसे असंग एवं अकर्ता ही कहते हैं। वैशेषिक, योगी, नैयायिक आदि भोक्ता जीवसे भिन्न सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् विश्वकर्ता ईश्वर मानते हैं। जाग्रत‍्कालमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धादि विषयवेद्य हैं। उनमें गो-अश्वादिवत् परस्पर विचित्रताके कारण उनकी भिन्नता भी माननी चाहिये। उन शब्दादिका बोध या संवित् उनसे भिन्न है। वेद्य और वेदिताका भेद प्रसिद्ध ही है। प्रकाश्य, प्रकाशकका भेद भी लोकमें प्रसिद्ध है। रूप और उसके प्रकाशक सौरालोकमें भेद स्पष्ट ही है। इसी तरह वेद्य शब्दादि एवं आकाशादिसे उनका भासक बोध और अनुभव भिन्न है। जैसे शब्दादिकी परस्पर विचित्रता होनेसे भिन्नता है, उसी तरह उनके बोधोंमें विचित्रता नहीं है। अत: उनका भेद भी नहीं है। अतएव बोध-बोध सब एक ही है। अनुमान भी किया जा सकता है। विवादास्पद शब्दादि-बोध स्वाभाविकभेदशून्य हैं; क्योंकि उपाधिको बिना ग्रहण किये हुए उनका भेद गृहीत नहीं होता, जैसे आकाशमें घटादि उपाधिके बिना भेद नहीं गृहीत होता, अत: वह भी स्वाभाविक भेदशून्य है, तद्वत् प्रकृतमें भी समझना चाहिये। संवित् होनेसे शब्दसंवित् स्पर्शसंवित‍्से भिन्न नहीं है, जैसे स्पर्शसंवित् अपनेसे भिन्न नहीं है। जैसे एक ही आकाशमें घटादि उपाधिके भेदसे भेद-व्यवहार हो जाता है, उसी तरह आकाशवत् व्यापक एक ही संवित‍्में शब्दादि विषयरूप उपाधिके भेदसे भेद-व्यवहार बन ही जायगा। उसी प्रकार स्वप्नमें भी विषयोंमें भेद और संवित‍्में अभेद है। स्वप्न और जागरमें भेद इतना ही है कि जागरमें विषय स्थिर है और स्वप्नमें अस्थिर। स्वप्न-जागर-अवस्थाएँ और उनके विषय भी विचित्रताके कारण पृथक्-पृथक् हो सकते हैं; परंतु दोनों अवस्थाओंके बोध एकरूप होनेसे अभिन्न ही हैं। इसी तरह सुषुप्ति-अवस्थाकी संवित् भी सुषुप्ति-अवस्थासे भिन्न हैं। सुषुप्ति और जाग्रदादि परस्पर विलक्षण होनेसे भिन्न हैं, परंतु उनकी संवित् एकरूप होनेसे परस्पर अभिन्न ही है। सोकर जगनेके पश्चात् सुप्तोत्थित प्राणीको सुषुप्ति-अवस्थाके अज्ञान या तमका स्मरण होता है, ‘मैं सुखपूर्वक सोता था और कुछ भी नहीं जानता था।’ प्रत्यक्ष-साधन विषयेन्द्रिय-सन्निकर्ष एवं अनुमान-साधन व्याप्ति-लिंगादि न होनेसे ऐसे ज्ञानको स्मृति ही मानना उचित है। स्मृति अनुभवपूर्वक ही होती है, अत: सुषुप्तिकालमें सुख एवं तमोरूप अज्ञानका अनुभव मानना उचित है। यह अज्ञान अन्धकारके तुल्य वस्तुतत्त्वको ढकनेवाला भावरूप है। इसीलिये इसके द्वारा ज्ञानरूप ब्रह्मका आवरण होता है। ‘अज्ञानेनावृतं ज्ञानम्’ (गीता ५।१५) यह ज्ञानाभाव नहीं है; क्योंकि ज्ञानाभाव जाननेके लिये उसके अनुयोगी (आधार) प्रतियोगी (ज्ञान)-का ज्ञान होना चाहिये। जैसे घटाभाव जाननेके लिये अनुयोगी (भूतलादि) और प्रतियोगी (घट)-का ज्ञान आवश्यक होता है, परंतु यहाँ यदि इसी तरह अनुयोगी-प्रतियोगीका ज्ञान हो, तब ज्ञानाभाव कैसा? और यदि उनका ज्ञान नहीं तो ज्ञानाभावका ज्ञान ही नहीं हो सकता। अत: भावरूप अज्ञान ही साक्षीके द्वारा प्रकाशित होता है। अज्ञानका उपलम्भ होनेसे ही तद्विरुद्ध ज्ञानका अभाव विदित हो जाता है। इसलिये इस अज्ञानको तम भी कहा जाता है। इसी तरह दिनों, पक्षों, मासों, वर्षों, युगों, कल्पों, अतीतों, अनागतोंमें भेद है, परंतु उनके बोधोंमें कोई भी भेद नहीं। एक अनन्त आकाशके तुल्य ही यह बोध भी अनन्त एवं एक ही है। अत: इसका न उदय होता है न अन्त; क्योंकि उस बोधका प्रागभाव या उत्पत्ति अथवा विनाश भी बोधके बिना सिद्ध नहीं होता। यदि प्रागभाव-साधक बोध है, तो बोधका प्रागभाव हो कैसे कहा जा सकता है? यदि बोध नहीं तो प्रागभाव सिद्ध ही कैसे होगा? बोधोंमें भेद नहीं होता, अत: अन्य बोधका प्रागभाव अन्य बोधसे सिद्ध होगा, यह भी नहीं कहा जा सकता। इस तरह अत्यन्ताबाध्य होनेके कारण वही बोधस्वरूप भी है। यही संवित् आत्मस्वरूप भी है; क्योंकि नित्य होकर स्वप्रकाश है। जो नित्य स्वप्रकाश नहीं, वह आत्मा नहीं, जैसे घटादि। बोध नित्य एवं स्वप्रकाश है, अत: वही बोध, संवित्, अनुभव या ज्ञान आत्मा है। आत्मा परप्रेमास्पद है, अत: आनन्दस्वरूप भी है। संसारमें सर्वत्र ही प्रेम आत्माके लिये होता है, आत्मामें प्रेम अन्यके लिये नहीं होता। जैसे शर्कराके सम्बन्धसे अन्यत्र मिठास होती है, किंतु शर्करामें मिठास स्वत: होती है। उसी तरह आत्मामें प्रेम स्वत: होता है। अन्यत्र प्रेम आत्मसम्बन्धसे होता है। निद्रादि सब जिससे अनुभूत होते हैं, उस अनुभवका अपलाप नहीं किया जा सकता। अनुभूतिको अनुभाव्य माननेसे अनवस्था-दोष होता है, अत: अनुभूति-अनुभाव्य हुए बिना ही स्वप्रकाश है। ज्ञाता और ज्ञानका दूसरा ज्ञान न होनेसे वे ज्ञेय नहीं होते। असत् होनेसे उन्हें अज्ञेय नहीं कहा जा सकता। निद्रा आनन्दादि साक्षी होनेसे उसे असत् नहीं कहा जा सकता। गुडादि अपने सम्पर्कसे अन्यत्र चणक-चूर्णादिमें मधुरतादि समर्पण करते हैं, परंतु स्वयं गुड़ादिमें मधुरता अर्पण करनेवाले गुड़ादिकी अपेक्षा नहीं होती। इसी तरह आत्मामें वेद्यता, अनुभाव्यता न होनेपर भी बोधस्वरूप होनेमें कोई सन्देह नहीं। जैसे प्रकाश और तमके बिना यद्यपि आकाश उपलब्ध नहीं होता, तथापि निर्जगत् आकाश मान्य होता है। उसी तरह यद्यपि घटादिके बिना सत् या बोध उपलब्ध नहीं होता, फिर भी घटादि प्रपंचशून्य बोध या स्वप्रकाश सत् रहता ही है। तूष्णींभाव समाधिकालमें दृश्य विशेषणादिरहित शुद्ध सद्वस्तु उपलब्ध होती है, शून्य बुद्धि नहीं होती। इसलिये तूष्णींस्थितिमें शून्य नहीं कहा जा सकता। ‘उस समय सद‍्बुद्धि भी न होनेसे सत् भी नहीं रहता’, यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि सद‍्बुद्धि होनेपर भी स्वप्रकाश होनेसे सत् सिद्ध होता है। निर्मनस्कताका साक्षी स्वप्रकाश होता ही है, जैसे मनकी चंचलता मिटनेपर साक्षी स्वच्छ होता है, उसी प्रकार मायाका विजृम्भण या विकास रुकनेपर स्वप्रकाश सत् भी स्फुट हो जाता है। कुछ लोग आकाशादिसे भिन्न सत् नहीं मानते, परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि ‘आकाश: सद् घट: सत्’ इत्यादि व्यवहारोंमें जैसे घटादि शब्द एवं घटादि बुद्धि होती है, उसी तरह सत् शब्द एवं सद‍्बुद्धि होनेसे आकाश और सत्—दोनों ही पृथक् पदार्थ हैं। जैसे ‘मृद् घट:’ इस व्यवहारमें शब्द एवं बुद्धिके कारण ही मृत्तिका और घट दो पदार्थ सिद्ध होते हैं। उनमें मृद‍्बुद्धिके अनुवृत्त होनेसे और घट-शरावादि बुद्धिके व्यावृत्त होनेसे मृत्तिका कारण और घटादि कार्य समझे जाते हैं। उसी तरह सत् अनुवृत्त होनेसे कारण तथा आकाश घटादि व्यावृत्त होनेसे कार्य सिद्ध होते हैं। अधिक वृत्ति होनेसे सत् धर्मी है, अल्पवृत्ति होनेसे आकाशादि धर्म हैं। बुद्धिसे यदि आकाशसे सत‍्को पृथक् कर दें, तब तो आकाश असत् ही हो जाता है। जैसे जाति-व्यक्ति और देह-देहीका भेद होता है, वैसे ही आकाशादि प्रपंच एवं सत‍्का भी भेद सिद्ध होता है। सावधानी एवं एकाग्रतासे विचार करनेपर भेद-ज्ञान स्थिर हो जाता है। विवेचन करनेपर सत् शून्य अवकाशात्मक आकाश रह जाता है एवं निरवकाशात्मक सत् रह जाता है— येनेक्षते शृणोतीदं जिघ्रति व्याकरोति च। स्वाद्वस्वादू विजानाति तत्प्रज्ञानमुदीरितम्॥ (पंचदशी, महावाक्यविवेकप्र० १) जिस नेत्रजन्यवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यसे पुरुष रूपको देखता है, श्रोत्रजन्य शब्दाकारवृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यसे शब्द ग्रहण करता है, गन्धाकारवृत्तिव्यक्त चैतन्यसे गन्ध ग्रहण होता है, वही बोधस्वरूप चैतन्य प्रज्ञान है—‘न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते।’ (बृहदा० उप० ४।३।२३) द्रष्टाकी स्वरूपभूत दृष्टिका कभी भी विलोप नहीं होता। जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्तिकी सभी वस्तुएँ अपने-अपने स्थानपर ही रहती हैं; किंतु द्रष्टा तीनों ही अवस्थामें रहता है। जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्तिके प्रपंचका जो प्रकाशक भान है, वही ब्रह्म है। तीनों अवस्थाओंका भासक साक्षी भोग्य, भोक्ता और भोग—तीनोंसे ही विलक्षण होता है। वह चिन्मात्र ही है। चिदाभास एवं अहंका भी सुषुप्तिमें विलय होता है, उसका भी साक्षीसे ही प्रकाश होता है। जैसे आकाशीय सूर्यद्वारा प्रकाशित घट-कुडॺादि दर्पणादित्यदीप्तिसे प्रकाशित होता है अर्थात् दर्पणप्रतिबिम्बित आदित्यद्वारा प्रकाशित होता है। यदि कुडॺपर अनेक दर्पणप्रतिबिम्बित आदित्यकी दीप्तियाँ प्रकट हों, तो उनके बीच-बीचमें स्वाभाविक निरुपाधिक आकाशीय आदित्यकी दीप्तियाँ परिलक्षित होती हैं और दर्पणजन्य विशेष प्रभावोंके न होनेपर भी वह सामान्य आदित्यप्रकाश रहता ही है। ठीक इसी तरह स्वप्रकाश बोध सामान्य चेतनद्वारा प्रकाशित देह भी बुद्धि-प्रतिबिम्बित चिदाभासके द्वारा प्रकाशित होता है। चिदाभासविशिष्ट बुद्धि-वृत्तियोंके बीच-बीचमें सामान्य-चेतन या शुद्ध नित्यबोध परिलक्षित होता है। बुद्धिवृत्तिप्रतिबिम्बित चिदाभासोंके बिना भी वह स्वप्रकाश बोध रहता ही है। घट-ज्ञानादि शब्दवाच्य चिदाभासविशिष्ट बुद्धिवृत्तियोंकी सन्धियों एवं सुषुप्तिमें उन बुद्धिवृत्तियोंके अभावका प्रकाशक नित्य-बोध रहता है। घटाकार-बुद्धिस्थ चित् घटमात्रका प्रकाश करती है, परंतु घटगत ज्ञातताका प्रबोध नित्य-चैतन्यसे ही होता है। घटाकार-बुद्धिके प्रथम ‘घटो मया न ज्ञात:’ इस प्रकार घटकी अज्ञातता भी व्यापक अखण्ड बोधसे ही गृहीत होती है। जैसे अज्ञातत्वेन घट ब्रह्मबोधित था, उसी तरह बुद्धि उत्पन्न होनेपर घट ज्ञातत्वेन भी ब्रह्म-चैतन्यसे ही प्रकाशित होता है। कोई भी घटादि विषय चित्प्रतिबिम्बयुक्त बुद्धिवृत्ति एवं अज्ञान दोनोंसे ही व्याप्त होते हैं। जब वह चिदाभासयुक्त वृत्तिसे व्याप्त होता है, तब ज्ञात कहलाता है, जब अज्ञानसे व्याप्त होता है, तब अज्ञात कहलाता है। अज्ञातरूपसे घटादि ब्रह्म अर्थात् व्यापक नित्य बोधसे प्रकाशित होता है। यह शंका हो सकती है कि ‘चिदाभासयुक्त वृत्तिसे ही घटका प्रकाश हो सकता है, फिर ब्रह्म-प्रकाशकी क्या आवश्यकता?’ परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि जैसे अज्ञानने घटमें अज्ञातता पैदा की है, उसी तरह चिदाभासके द्वारा घटमें ज्ञातता उत्पन्न होती है। कहा जा सकता है कि ‘ज्ञातता तो घटमें वृत्तिमात्रसे उत्पन्न हो सकती है,’ परंतु यह ठीक नहीं। चिदाभासहीन बुद्धिसे घटादिमें ज्ञातता उत्पन्न नहीं हो सकती; क्योंकि मृत्तिकादिके तुल्य चिदाभासरहित बुद्धि या वृत्ति जड ही है। अत: जैसे काली-पीली मिट्टीसे लिप्त घट ज्ञात नहीं कहा जा सकता, उसी तरह बुद्धिवृत्तिव्याप्त घट भी ज्ञात नहीं कहा जा सकता। अत: वृत्ति-व्याप्त घटमें चित्प्रतिबिम्बका उदय होनेसे ही घटमें ज्ञातताका व्यवहार बनता है। कहा जा सकता है कि आकाशीय सौरालोक-तुल्य सामान्य नित्य-बोधरूप ब्रह्मसे ही घटादिकी ज्ञातता बन सकती है, फिर दर्पणादित्यदीप्तिके तुल्य वृत्तिपर चित्प्रतिबिम्ब या चिदाभास क्यों माना जाय? परंतु यह कहना ठीक नहीं। कारण, नित्य बोधरूप ब्रह्म तो प्रमाण-प्रवृत्तिके पहले भी था ही। यहाँ तो प्रमाण-प्रवृत्तिके पश्चात् घटादिमें ज्ञातताका व्यवहार होता है, यह चिदाभासमूलक ही है। अत: वृत्तिपर व्यक्त चित्प्रतिबिम्ब घटमें ज्ञातता उत्पन्न करता है। वह ज्ञातता, अज्ञातताके तुल्य ही ब्रह्मसे भास्य होती है। बुद्धिवृत्ति, चिदाभास एवं घटादि सभी सामान्य सौरालोक-तुल्य नित्यबोधसे भासित होते हैं, फिर भी घटव्याप्त वृत्तिपर चिदाभासरूप फल होता है। अत: एक घटका ही स्फुरण होता है। घटादि विषयपर द्विगुणित चैतन्य व्यक्त होता है। जैसे कुडॺपर एक सामान्य सौरालोक फैला होता है, दूसरे दर्पणादित्यदीप्तिके फैलनेसे द्विगुणित प्रकाश हो जाता है, उसी तरह सामान्य नित्यबोधसे व्याप्त घटादिपर चित्प्रतिबिम्बयुक्त वृत्तिकी व्याप्ति होनेसे द्विगुणित चैतन्य हो जाता है। इसीलिये घटादिकी ज्ञातताका भासक ब्रह्म-चैतन्य माना जाता है। नैयायिक आदि उसे ही अनुव्यवसाय (ज्ञानविषय ज्ञान) कहते हैं। ‘घटोऽयम्’ यह घट है—नैयायिकोंके शब्दोंमें यह व्यवसायात्मक ज्ञान है, यह बुद्धिवृत्तिसे होता है। ‘मया घटो ज्ञात:’ मैंने घट जान लिया, यह अनुव्यवसायात्मक ज्ञान नित्य बोधरूप ब्रह्मसे होता है। इसी तरह अहंवृत्ति एवं काम-क्रोधादि वृत्तियोंमें चिदाभास, उसी तरह व्याप्त होकर रहता है, जैसे लोहपर अग्नि व्याप्त होती है। जैसे अग्नि-व्याप्त लोह केवल अपने-आपको ही प्रकाशता है, अन्यको नहीं, उसी तरह आभाससहित वृत्तियाँ अपनेको ही भासित करती हैं। क्रमसे विच्छिन्नावच्छिन्न होकर वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। सुषुप्ति, मूर्च्छा और समाधिमें सभी वृत्तियाँ लीन हो जाती हैं। सभी वृत्तियोंकी सन्धियाँ और अभाव जिस निर्विकार नित्य-बोधसे प्रकाशित होते हैं, उसे ही वेदान्तमतसे कूटस्थ शब्दसे कहा जाता है। जैसे बाहर वृत्ति-व्याप्त घटमें भासक चिदाभास और घटकी ज्ञातताका भासक ब्रह्मचैतन्य द्विगुण चैतन्य होता है, उसी तरह भीतर भी वृत्तियोंपर सन्धिकी अपेक्षा द्विगुण चैतन्य व्यक्त होता है। इसीलिये सन्धियोंकी अपेक्षा वृत्तियोंकी स्पष्टता अधिक होती है। भेद इतना अवश्य है कि बाहर घटादिमें ज्ञातता, अज्ञातता—दोनों ही रहती हैं, वैसे वृत्तियोंमें ज्ञातता, अज्ञातता—दोनों नहीं रहतीं। वृत्तियाँ स्वयं अपने-आपको ग्रहण नहीं करतीं, इसलिये ज्ञातता नहीं होती और वृत्तिके उत्पन्न होते ही वृत्तिगोचर अज्ञान नहीं रहता, अत: वृत्तियोंकी अज्ञातता भी नहीं होती। वृत्तिगोचर वृत्ति माननेसे अनवस्थादि दोष आते हैं। अत: वृत्तियाँ साक्षिभास्य कही जाती हैं। चित्प्रतिबिम्बरूप ज्ञानकी उत्पत्ति और विनाश प्रतीत होते हैं, अत: उसे विनश्वर कहा जाता है। अन्त:करण एवं तद‍्वृत्तियोंका साक्षी अखण्ड नित्यबोध निर्विकार होनेसे कूटस्थ कहलाता है। बुद्धिसे परिच्छिन्न कूटस्थ एवं चिदाभासयुक्त बुद्धिके मिश्रणसे ही जीव-व्यवहार होता है। बुद्धि स्वच्छ है, इसलिये उसपर चित्प्रतिबिम्ब होता है। प्रतिबिम्ब एवं बिम्बमें कुछ तुल्यता और कुछ विलक्षणता होती है, इसी तरह स्फूर्तिरूपतामें तुल्यता होनेपर भी संगिता विकारितारूप विलक्षणता भी बिम्बकी अपेक्षा प्रतिबिम्बमें रहती है। कहा जा सकता है कि जैसे मृत्तिका रहनेपर ही घट रहता है, वैसे ही बुद्धिके रहनेपर ही चिदाभास रहता है, बुद्धिके न रहनेपर नहीं रहता। फिर उसे बुद्धिसे भिन्न क्यों माना जाय? यदि शास्त्र-प्रमाणसे देहके मरनेपर भी बुद्धिका अस्तित्व माना जा सकता है तो बुद्धिसे भिन्न चिदाभास भी शास्त्रोंसे सिद्ध होता ही है। बुद्धिकी विभिन्न वृत्तियों एवं अज्ञानके साक्षीरूपसे सर्वावभासक सर्वाधिष्ठान अखण्ड बोधरूप ब्रह्म सिद्ध होता है। अखण्ड बोध-स्वरूप ब्रह्म ही अहंवृत्तिसे युक्त होकर कर्ता कहलाता है, इदंवृत्तियुक्त हो प्रपंचाकार प्रतीत होता है, वही आन्तर-बाह्य सभी विषयोंको साक्षीरूपसे प्रकाशित करता है। नृत्यशालास्थित दीप जैसे प्रभु, सभ्य एवं नर्तकी सभीको प्रकाशित करता है, उसी तरह साक्षी आत्मा ही अहंकार, बुद्धि एवं सभी विषयोंको प्रकाशित करता है। जैसे प्रभु, सभ्य आदिके न रहनेपर दीप सबके अभावका भी भासक होता है, उसी तरह अहंकार बुद्धिके सुषुप्ति दशामें रहनेपर भी साक्षी ही सबके अभावका भी प्रकाशन करता है। अखण्ड बोधरूप आत्मा नित्य ही स्वप्रकाशरूपसे विराजमान रहता है। उसीके प्रकाशसे प्रकाशित होकर बुद्धि आदि व्यावृत होती हैं। जैसे दीप स्वस्थानस्थित रहकर ही आन्तर-बाह्य सभी वस्तुओंको प्रकाशित करता है, उसी तरह कूटस्थसाक्षी आन्तर-बाह्य सभी विषयोंको प्रकाशित करता है। देहकी अपेक्षासे ही उसमें आन्तरत्व एवं बाह्यत्व प्रतीत होता है। अन्त:स्थ बुद्धि ही इन्द्रियोंके द्वारा बार-बार बाह्य विषयोंकी ओर जाती है। उसीकी चंचलतासे तद्भासक साक्षीमें भी चंचलता प्रतीत होती है। सर्वदेश, काल, वस्तु बुद्धिकृत ही हैं। सर्वभासक अखण्ड बोधकी दृष्टिसे कुछ भी नहीं है। जैसे अग्निमें उष्णता एवं प्रकाश रहता है, वैसे ही आत्माका चैतन्य स्वभाव है। शब्दादि अचेतन होनेसे स्वत: सिद्ध नहीं हो सकते, किंतु शब्दाद्याकारवृत्तियोंसे ही उनकी सिद्धि होती है। वे वृत्तियाँ परस्पर भिन्न शब्दादि विषय विशेषणवाली होती हैं, अत: नीलपीताद्याकारवाली वृत्तियों या ज्ञानोंकी भी स्वत:सिद्धि नहीं हो सकती। जबतक नीलपीतादि बाह्याकार न होंगे, तबतक बाह्याकार-प्रत्यय उत्पन्न ही नहीं हो सकते। इस तरह प्रत्यय भी संहत होनेसे अचेतन ही ठहरते हैं। इस दृष्टिसे स्वरूपभिन्न ग्राहकसे ही प्रत्यय भी ग्राह्य होंगे। जो असंहत होकर चैतन्यात्मक है, वही स्वार्थ हो सकता है। अन्य संहत अचेतन वस्तु परार्थ ही होते हैं। नील-पीताद्याकार ज्ञानोंका उपलब्धा आत्मा विक्रियावान् है, ऐसा संशय होता है, परंतु इसका समाधान यह है कि परिणामी चित्तादि क्रमसे ही स्वविषयोंके ग्राहक होते हैं, परंतु कूटस्थ आत्मा अक्रमेण सभी प्रत्ययोंका उपलम्भ करता है। अतएव अपरिणामिता सिद्ध होती है। अशेषचित्त प्रकारकी उपलब्धि कूटस्थताका निश्चायक है। यदि कूटस्थ आत्मा परिणामी होता तो अशेष स्वविषयचित्त प्रचारका साक्षी न होता, जैसे चित्त किंवा इन्द्रियाँ अपने विषयोंके एक देशका ही उपलम्भ करते हैं, इस तरह आत्मा अपने विषयोंके एक देशका उपलम्भ नहीं करता; किंतु अशेष प्रत्ययोंकी उपलब्धि आत्मासे होती है, अत: वह अपरिणामी ही है। कहा जा सकता है कि उपलब्धि धात्वर्थ क्रिया ही है, फिर उपलब्धिक्रियाका कर्ता विक्रियावान् ही है। उपपूर्वक लभ धातुसे कर्तामें तृच् प्रत्यय करनेपर उपलब्धा शब्द बनता है। धात्वर्थ सर्वत्र क्रिया ही होता है। क्रिया स्वयं उत्पत्ति-विनाशशील होती है, अत: उपलब्धि भी क्रिया ही है, अत: उत्पत्तिविनाश उसका भी मानना ही चाहिये, फिर वह नित्य कैसे कहा जा सकता है। इसका समाधान यह है कि ‘धात्वर्थ सर्वत्र क्रिया ही होता है और कर्ता ही प्रत्ययार्थ होता है, यह नियम सार्वत्रिक नहीं; क्योंकि ‘गडि वदनैकदेशे’ इस गडि धातुसे गण्ड बनता है, जो कि मुखैकदेश कपोलका ही बोधक है। इसी तरह ‘सविता प्रकाशते’ ‘सविता प्रकाशयति’ ‘सविता प्रकाशमान है या घटादिका प्रकाशक है,’ यहाँपर सविता किसी प्रकाश-क्रियाका कर्ता नहीं है; क्योंकि प्रकाश उसका स्वरूप ही है। उसके निर्विकार रहते हुए ही उसके सन्निधानमात्रसे अन्य वस्तुओंका प्रकाश होता है। बुद्धिजन्य वृत्तिरूप बौद्ध प्रत्यय ही क्रिया या विक्रिया है। वही धात्वर्थ है। आत्माकी स्वरूपभूत नित्य उपलब्धिमें विक्रियाका उपचार होता है। जैसा कि सूर्यके स्वरूपभूत प्रकाशमें भी विक्रियात्वका उपचार होता है।’ कहा जा सकता है कि ‘बुद्धि द्रव्य है, उसका परिणाम वृत्ति भी मृत्तिका-परिणाम घटादिके तुल्य द्रव्य ही है। उसे भी क्रिया नहीं कहा जा सकता, परंतु मृत्तिकादि अपने पूर्वरूपको तिरोहित करके घटादिके रूपमें परिणत होते हैं।’ पर यहाँ तो तृणजलूका (जोंक) एवं प्रकाशके तुल्य संकोच-विकासरूप ही क्रिया है। ऐसा परिणाम तो पारिणामिकी चेष्टारूप ही है। इसी तरह बुद्धिका पारिणाम ही वृत्ति है, वही क्रिया है। उस वृत्तिपर अभिव्यक्त बोध-प्रतिबिम्ब नित्य बोधरूप बिम्बके तुल्य ही होता है। इसीलिये चिच्छायापन्न वृत्तिके क्रिया होनेसे नित्यबोधमें भी क्रियात्वका आरोप होता है। लोकमें अर्थ-प्रकाश ही उपलब्धि-शब्दार्थ प्रसिद्ध है। वह अर्थ-प्रकाश अर्थका धर्म नहीं हो सकता; क्योंकि वह तो जड है, स्वत: स्फूर्तिरहित होना ही जडताका लक्षण है। अन्त:करणका भी धर्म प्रकाश नहीं कहा जा सकता; क्योंकि वह तो प्रकाशकरण (असाधारण कारण) है, अत: वह भी चैतन्यरूप प्रकाशका आश्रय नहीं हो सकता। फिर भी स्वयं प्रकाशमान चैतन्य आत्मामें अहंरूपसे अन्त:करणका अध्यास होता है। वह कभी भी अप्रकाशित होकर नहीं रहता। वही आत्मचैतन्य व्याप्त अन्त:करण विषयवृत्तिको उत्पन्न करता हुआ उपलब्धा कहलाता है, वही कर्ता और प्रमाता भी कहलाता है। जैसे लोह-पिण्डमें दाहकत्व-प्रकाशकत्वका व्यवहार होता है, वैसे ही प्रकृतमें भी समझना चाहिये। अखण्ड बोधस्वरूप आत्माका आकाशवत् अविक्रिय होनेपर भी तादृक् अन्त:करणगत चिदाभासके अविवेकसे अन्त:करणके धर्मों एवं उसकी अवस्थाओंसे युक्त होकर प्रतीत होने लगता है। जैसे अग्नि निराकार होनेपर भी काष्ठोंपर प्रकट होती है, वैसे ही त्रिकोण-चतुष्कोण मोटा-पतला-सा प्रतीत होता है और अग्निका उत्पन्न होना, नष्ट होना भी उसी काष्ठादि उपाधिसे प्रतीत होता है। इसी तरह विकासी अन्त:करणमें कर्तृत्व होनेपर भी उपलब्धिमें उत्पद्यमानता नहीं होती। अत: उपलब्धिस्वरूप आत्मा निर्विकार कूटस्थ ही है। कहा जा सकता है कि ‘जैसे छिदिक्रियासाध्य द्वैधीभावरूप फल विक्रिया है, उसी तरह उपलब्धिरूप फल भी साध्य ही है, अत: वह भी विक्रिया ही है।’ परंतु वस्तुत: स्वरूपसे उपलब्धि फल ही नहीं है, वृत्तिव्याप्त घटादि विषयोंपर व्यक्त चित्प्रतिबिम्ब ही फल है। नित्योपलब्धिस्वरूप आत्मामें उसीके अविवेकसे फलत्वका व्यपदेश होता है, अतएव यहाँ उपलब्धि एवं उपलब्धामें भेद नहीं है। उपलब्धि-स्वरूप ही आत्मा है। यह उपलब्धि नित्य है, विक्रिया नहीं है। विक्रियारूप उपलब्धि चैतन्यव्याप्त बुद्धिवृत्ति है। उससे अविवेकके कारण ही नित्योपलब्धिमें फलत्वका व्यवहार होता है। इसीलिये उपलब्धाभासावसान ही उपलब्धिका धात्वर्थ है। उसी नित्योपलब्धिस्वरूप आत्मामें जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति—तीनों ही अवस्थावाला अन्त:करण भासित होता है। तीनों ही अवस्थाएँ आगन्तुक हैं। उपलब्धिस्वरूप आत्मा सर्वत्र अव्यभिचरितरूपसे विद्यमान रहता है। सुषुप्तिमें भी कुछ नहीं देखा, इस प्रकार सर्वाभावकी उपलब्धि होती ही है। जागरादिमें भी प्रमाता स्वत:सिद्ध होता है। वही स्वयं प्रमाणद्वारा प्रमेयोंको जानता है। प्रमाताका भी भासक अखण्डबोध आत्मा स्वत:सिद्ध है। लोह-जल आदिमें दाहकत्व-प्रकाशकत्व लानेके लिये अग्निकी अपेक्षा होती है, किंतु अग्निमें दाहकत्व-प्रकाशकत्व लानेके लिये अन्य अग्नि आदिकी अपेक्षा नहीं होती। वही स्वत:सिद्ध संवित् आत्मा है। वृत्तिप्रतिबिम्बित चैतन्य प्रमाण है, वृत्तिमदन्त:करण प्रतिबिम्बित चैतन्य प्रमाता है। प्रमेयप्रकाशकालमें वे दोनों ही प्रकाशित रहते हैं। उनका प्रकाशक कोई अन्य प्रमाता या प्रमाणान्तर माननेमें अनवस्था आदि दोष आते हैं, अत: स्वयंज्योति: आत्माको ही तीनोंका भासक मानना ठीक है। कहा जा सकता है कि ‘संवित् या बोध प्रमाणके फलरूपसे ही प्रसिद्ध है, फिर वह नित्य कैसे हो सकता है?’ परंतु यह ठीक नहीं; कारण, वृत्तिप्रतिबिम्बित अवगति ही अनित्या है, वही प्रमा है, वही प्रमाणफल है, बिम्बभूत अवगति नित्य ही है। यदि अवगति नित्य है, तब तो प्रमाण-व्यापार व्यर्थ होगा और अनित्य है तो प्रमाण-व्यापार आवश्यक होगा, परंतु प्रमाताकी अवगति तो प्रमाण-निरपेक्ष स्वत:सिद्ध है ही। यदि प्रमाताको आत्मसिद्धिमें प्रमाणकी अपेक्षा हो तो किसे प्रमित्सा होगी, यह भी विचारणीय है। जिसे प्रमित्सा होती है, वही प्रमाता होता है। प्रमित्सा प्रमेयविषयक ही होती है, प्रमातृविषया नहीं। प्रमातृविषयक प्रमित्सा होनेसे अनवस्था-दोष भी होता है। प्रमाताकी प्रमित्सा अव्यवहित होनेसे प्रमातृविषया नहीं हो सकती। लोकमें प्रमाताकी इच्छा, स्मृति, प्रयत्न एवं प्रमाणजन्यके अनन्तर प्रमेय सिद्ध होता है। प्रमेय-विषया-अवगति अभीष्ट होती है। स्वयं प्रमाता अपनेसे या अन्य इच्छादिसे व्यवहित नहीं हो सकता। स्मृति भी स्मर्तव्यविषया होती है, स्मर्तृविषया स्मृति नहीं होती। इसी तरह इच्छा भी इष्टविषया होती है, इच्छावद्विषया इच्छा नहीं होती। यदि स्मृति एवं इच्छा स्मर्ता एवं इच्छावान‍्को विषय करें, तब इसमें भी अनवस्था दोष आयेगा। स्मृति, इच्छा, प्रयत्न एवं प्रमाण जन्मके अनन्तर ही स्मर्तव्य, इष्यमाण, प्रयतितव्य एवं प्रमेयका व्यवहार हो सकता है। कहा जा सकता है कि ‘प्रमातृविषयक अवगति-उपपत्ति उपपन्न न होनेसे आत्मा अनवगत ही रहेगा’, परंतु यह कहना ठीक नहीं। अवगन्ताकी अवगति अवगन्तव्यविषयक होती है, अवगन्तृविषयक अवगति नहीं होती। यदि ऐसा होगा तो अनवस्था-प्रसंग होगा। आत्माकी अवगति स्वरूपभूत ही है अर्थात् अवगन्ताकी अवगति उत्पन्न नहीं होती। अग्निकी उष्णता और प्रकाशके तुल्य ही आत्माका स्वभाव ही अवगति है। ‘अत्रायं पुरुष: स्वयंज्योति:’ ‘आत्मैवास्य ज्योति:’ ‘एषोऽस्य परमो लोक:’ ‘न हि विज्ञातुर्विज्ञातेर्विपरिलोपो विद्यते’ (बृहदा० उप० ४।३।३०) इत्यादि श्रुतियोंके अनुसार आत्माकी स्वरूपभूत ज्योति है। चैतन्यात्मज्योतिकी अवगति अनित्य है ही नहीं। असंहत, स्वप्रकाश एवं अपरार्थ ही आत्मा है। यदि आत्माकी अवगति अनित्य होगी तो उत्पत्तिसे प्रथम एवं प्रध्वंससे ऊर्ध्व उसका अभाव कहना पड़ेगा। फिर आत्माकी अपरार्थता आदि सभी बाधित होंगे। अवगति प्रमा है, वह स्मृति-इच्छादिपूर्विका अनित्या है, आत्मा स्वरूपभूत नित्य है। जैसे तिष्ठति शब्द अचलत्व-अर्थमें प्रयुक्त होता है, जंगम पदार्थ गतिपूर्वक अचल होते हैं; आकाश-पर्वतादि स्थावर पदार्थ सदा ही अचल रहते हैं, दोनोंमें ही तिष्ठति शब्दका प्रयोग होता है। ‘तिष्ठन्ति मनुष्या:, तिष्ठन्ति पर्वता:, तिष्ठत्याकाश:’ उसी तरह अनित्य अवगति एवं नित्य आत्मस्वरूप-अवगतिमें भी प्रमात्व-व्यवहार बन जाता है। फलस्वरूप प्रमामें कोई अन्तर नहीं। प्रमाण फल ही प्रमा है। वह प्रमातृगतचित्स्वरूप प्रकाश ही है। यद्यपि वृत्तिव्याप्त विषयस्थ चित्प्रतिबिम्ब ही फल है, तथापि ‘मयेदं विदितम्’ मैंने यह जाना, इस तरह प्रमाण-प्रमेयसम्बन्ध आत्मामें प्रतीत होता है, अत: प्रमातृगतचित्प्रकाशसे सम्बन्ध मानना ही पड़ता है। जड अन्त:करण यद्यपि व्यापारका आश्रय हो सकता है तथापि वह चित‍्का आश्रय नहीं हो सकता। चिदात्मा कूटस्थ होता है, अत: वह व्यापारका आश्रय नहीं हो सकता। इसीलिये वह प्रमाके प्रति कर्ता भी नहीं हो सकता और मुख्यवृत्तिसे जड-अजड कोई भी प्रमाता नहीं बन सकता। अत: परस्पराध्याससे ही आत्मा ही बाह्य-विषयका भी प्रमाता बनता है। फिर स्वात्मामें स्वयंप्रकाश होनेसे प्रमातामें कोई शंका ही नहीं। अतएव अनवगत होने या प्रमाणकी अपेक्षा रखनेकी कोई कल्पना ही नहीं हो सकती। अर्थात् कूटस्थ नित्य आत्मज्योतिमें ही अन्त:करणादि-उपाधिद्वारा औपाधिक ही प्रमातृत्व होते हैं। प्रमाणसापेक्ष शब्दादि सभी अचेतन, संहत एवं अनात्मा हैं। अवगति स्वयं अन्यानपेक्ष स्वत:सिद्ध है, वही आत्मा है। उसमें भी सोपाधिक अवगति अनित्य है, निरुपाधिक नित्य है। यद्यपि कहा जा सकता है कि ‘मैं मनुष्य हूँ, जानता हूँ’ इस व्यवहारमें प्रत्यक्षादि प्रमाणकी अपेक्षा नहीं रहती है, तथापि मृति, सुषुप्ति आदिमें देहसिद्धिके लिये भी प्रमाणकी अपेक्षा होती ही है। उसकी भी अवगति कूटस्थ, स्वयंसिद्ध आत्मज्योति ही है। अवगतिसे भिन्न देहादि, ग्राह्य, ग्राहक, करणादिरूपसे भूत ही परिणत होते हैं। अवगति यद्यपि स्वयं नित्यसिद्ध है, तथापि प्रमाणजन्य प्रत्यक्षादि वृत्तिरूप प्रत्ययकी अनित्यतासे ही तदभिव्यक्त अवगतिमें भी अनित्यता एवं प्रमाणफलताका व्यवहार होता है। सभी वृत्तियाँ परस्पर व्यभिचरित होती हैं। बोध, स्फुरण उनमें एक रूपसे ही समान होता है, अत: वही स्फुरण, बोध या अवगति नित्य एकरस हैं। जैसे स्वप्नके नील-पीतादि प्रत्यय-भेद व्यभिचरित होनेसे असत्य हैं, अवगति ही सत्य है, वैसे ही सर्वत्र प्रत्ययोंमें भिन्नता होनेसे मिथ्यात्व है। बोधमात्र ही अभिन्न एवं एक है। उस अवगतिका अवगन्ता अन्य कोई नहीं है। वह स्वयं नित्य है। उसका हान या उपादान नहीं हो सकता। जैसे शब्दादि, लोष्ठादि ज्ञेय हैं, ज्ञाता नहीं, उसी तरह भूतपरिणाम देहादि भी ज्ञेय ही हैं, ज्ञाता नहीं। जो वस्तु स्वत: सत्तास्फूर्तिवाली नहीं है, वह जड है, उसे सत्तास्फूर्ति देनेवाला ही चेतन है। वही ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ ‘विज्ञानमानन्दं ब्रह्म’ है। ज्ञाता आत्मा, ज्ञेय अनात्मा, इदमंश अनात्मा है, द्रष्टा अनिदमंश ही आत्मा है। अहमर्थमें भी दृश्य अहं इदमंश ही है, दृक् आत्मा ब्रह्म है। जैसे सौरालोकमें स्फटिकादि मणियोंपर जपाकुसुमादिकी रक्ताद्याकारता प्रतीत होती है, उसी तरह स्वप्रकाशबोधरूप आत्मप्रकाशमें ही बुद्धॺादिमें विषयाकारताकी प्रतीति होती है। जैसे सौरालोकसे ही स्फटिक एवं रक्ताद्याकारता दोनों ही भासित होती हैं, वैसे ही नित्य-बोधसे ही बुद्धॺादि एवं विषयाकारता दोनों ही भासित होती हैं। बुद्धि होनेपर बुद्धॺारूढ़ पदार्थ दृश्य होते हैं। निद्राकालमें बुद्धि विलीन होनेपर दृश्य उपलब्ध नहीं होता, परंतु द्रष्टा तो सदा एक-सा ही रहता है। अविवेकसे बुद्धि सर्वसाक्षीका अभाव समझती है। विवेकसे स्वप्रकाश सर्वसाक्षीसे भिन्न बुद्धि अपने-आपको भी नहीं समझती। ब्रह्मादिस्थावरान्त प्राणी अखण्ड-बोधस्वरूप आत्माके पुर ही हैं, फिर भी वह आत्मा सर्वभासक भान सर्वभूतोंसे असंस्पृष्ट ही रहता है। जैसे निर्विकार आकाशको बालकलोग नील समझते हैं, वैसे ही सर्वभासक भान निष्प्रपंच होते हुए भी सप्रपंच-सा प्रतीत होता है। सर्वप्राणि-बुद्धियाँ भी उस अखण्डभानके पुर ही हैं। जो भी पदार्थ उत्पत्तिमान हैं और ज्ञान विक्षेप हैं, वह स्वप्नवत् ही हैं। नित्यनिर्विषय ज्ञान सर्वविनाशसाक्षी स्वतन्त्र ही है। ज्ञाताकी स्वरूपभूता ज्ञप्ति नित्य है, सुषुप्तिमें जो आत्मा शब्दादिको नहीं जानता, वह जानता हुआ ही नहीं जानता। अन्य ज्ञेय नहीं है, इसलिये नहीं जानता है, स्वरूपभूत ज्ञप्ति तो रहती है। विज्ञाताकी विज्ञातिका कभी भी विलोप नहीं होता— ‘यद्वै तन्न पश्यति पश्यन् वै तन्न पश्यति न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते।’ (बृहदा० उप० ४।३।२३) जाग्रदादिकालकी जो घटादि-ज्ञप्ति होती है, वह तो भ्रान्ति ही है। फिर भी सभी बुद्धिवृत्तियाँ स्फुरणसे व्याप्त ही होती हैं, अत: सर्ववृत्तियोंकी उत्पत्ति, स्थिति, विनाशका साक्षीस्फुरण सर्वत्र एकरस ही रहता है। जागर, स्वप्नमें विषय, समकालमें सुप्ति, समाधि आदिमें विषयाभाव सभी कालमें स्फुरण रहता है, अत: वह शुद्ध है। शुद्ध दृशि ही अमर आत्मा है, जैसे दर्पणादिमें मुखका प्रतिबिम्ब होता है, तब दर्पणादिगत दोषोंका मुखमें आरोप किया जाता है, उसी तरह दृशिका अहंकारमें प्रतिबिम्ब होनेसे अहंकारगत दोषोंका दृशिमें आरोप किया जाता है। श्रुत्यादिसे विज्ञाति अर्थात् अनित्य विज्ञातिका विज्ञाता नित्यबोध नित्यदृशिस्वरूप आत्मा विदित होता है। उस दृशिस्वरूपमें ज्ञान-अज्ञान—दोनों ही कल्पित होते हैं। विज्ञातिका विज्ञाता शुद्ध विज्ञाता ही है, वह विज्ञेय नहीं होता। आत्मा अलुप्तदृक् है। अनित्य बुद्धिवृत्तिरूप दृष्टिके कारण इसमें जन्यताकी प्रतीति होती है। जैसे व्यंजक आलोक व्यंग्यकी आकारताको प्राप्त होता है, उसी तरह शुद्ध नित्य ज्ञानस्वरूप ज्ञाता स्वभास्य प्रत्ययोंके आकारका प्रतीत होता है। जैसे दीप बिना यत्नके ही उपस्थित विषयोंको एवं विषयाकारवृत्तियोंको भी प्रकाशित करता है, जैसे ज्योति अन्यका द्योतक होनेपर भी अपना प्रकाशक नहीं होता, वैसे ही ज्ञानस्वरूप आत्मा अन्यका भासक होनेपर भी आत्मभासक नहीं होता। जैसे अग्नि अपना दहन-प्रकाशन नहीं करता, वैसे ही आत्मा अपना प्रकाशन नहीं करता। फिर भी जैसे रविके स्वात्म-प्रकाशके लिये अन्य ज्योतिकी अपेक्षा नहीं होती, उसी तरह बोधस्वरूप आत्माको स्वात्मप्रकाशके लिये अन्यबोधकी अपेक्षा नहीं होती। जो जिसका स्वरूप होता है, उसे उसकी अपेक्षा नहीं होती। जैसे प्रकाश प्रकाशान्तरसे दृश्य नहीं होता, प्रकाशके समागमसे अप्रकाश स्वरूपकी व्यक्ति होती है, परंतु प्रकाशस्वरूप सूर्यकी व्यक्ति प्रकाश-समागमकी अपेक्षा नहीं रखती। जैसे प्राणी प्रकाशस्थ देहको सप्रकाश मानता है, उसी तरह चेतन द्रष्टासे प्रकाशित चित्तको सप्रकाश मानकर ‘अहं द्रष्टा’ ऐसा व्यवहार करने लगता है। प्राणी इसी तरह सभी दृश्य पदार्थोंके साथ अपना अभेद समझकर आत्माको तत्तद्दृश्यविशिष्ट मानने लगता है। जैसे स्वप्न और स्मृतिमें घटादिका आकार भासित होता है, अत: अनुभवावस्थामें घटाद्याकारका आभास माना जाता है। अत: स्वप्न, स्मृतिमें बाह्यार्थके बिना ही विषयाकारवृत्तिमदन्त:करण ही प्रतीत होता है। इसी तरह स्वप्नमें सिंहासनारूढ़ देह दृश्य होता है, द्रष्टा स्वयं वह नहीं है। उसी प्रकार जाग्रत‍्कालमें भी दृश्य देहसे द्रष्टा भिन्न ही है। जैसे मूर्ति आदिके साँचेमें डाला हुआ द्रवीभूत ताम्रादि साँचेके आकारका ही हो जाता है, जैसे व्यंजक-आलोक व्यंग्यके आकारका बन जाता है, उसी तरह सर्वार्थव्यंजक बुद्धि सर्वार्थाकार हो जाती है। अर्थाकार बुद्धि ही द्रष्टा अखण्डबोधरूप आत्मासे दृष्ट होती है। वही स्वप्नके दृशिस्वरूप आत्मासे दृश्य होती है। अखण्ड दृशिस्वरूप बोधसे ही सर्वदेहोंकी बुद्धियाँ भासित होती हैं। जैसे घटादि प्रकाश सम्पर्कसे ‘घट: प्रकाशते’ इस रूपसे प्रकाशके कर्ता होते हैं, वैसे ही सूर्यादि प्रकाश प्रकाशान्तर-सम्पर्कके बिना ही ‘सूर्य: प्रकाशते’ इस तरह सूर्य प्रकाशका कर्ता कहा जाता है। इसी तरह बुद्धॺादि अखण्डबोधके सम्पर्कसे प्रकाशित होते हैं, परंतु अखण्डबोध स्वत: ही प्रकाशित होता है। जैसे सूर्यमें सत्तामात्रसे प्रकाशकर्तृत्वका व्यवहार होता है, उसी तरह दृशिस्वरूप आत्मामें सन्निधानमात्रसे प्रकाशत्वका व्यवहार होता है। जैसे बिलसे निकलनेपर सूर्यकी सत्तामात्रसे सर्पादि भासित होते हैं, सूर्यमें किसी कर्तृत्वादि विकारकी आवश्यकता नहीं पड़ती, इसी तरह दृश्यके उपस्थित होनेपर दृशिस्वरूप आत्मासे दृश्यका प्रकाश होता है, एतदर्थ उसमें कर्तृत्वादि विकारकी अपेक्षा नहीं होती। इसी प्रकार दाह्यका सन्निधान होनेपर उष्णस्वरूप अग्निमें दाहकत्वका व्यवहार होता है। इसी तरह प्रयत्न बिना भी बोधस्वरूप आत्मा ज्ञाता, बोद्धा आदि कहा जाता है। वस्तुत: आत्मा विदित-अविदित—दोनोंसे ही अन्य है। जैसे प्रकाशस्वरूप सूर्यमें दिन-रात नहीं होते, वैसे ही बोधस्वरूप आत्मामें बोध, अबोध नहीं होते। अतएव बौद्धों-जैसी इस अखण्डबोधमें स्वसंवेद्यता भी नहीं है। साथ ही बोधको शून्य भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि जैसे घटादि दृश्य हैं, वैसे ही बुद्धि भी साक्षिभास्यरूपसे स्पष्ट प्रतीत होती है। जैसे घटादि विकल्प कार्य निर्विकल्प-कारणपूर्वक होते हैं, उसी तरह बुद्धि आदि सविकल्प सप्रकाश निर्विकल्प-प्रकाशपूर्वक होने ही चाहिये। बौद्ध क्षणिक ज्ञानको ही आत्मा कहते हैं। जैसे दीपमें ‘स एवायं दीप:’, यह वही दीपक है, इस प्रकार प्रत्यभिज्ञा (पहचान)-से सादृश्यमूलक एकत्वकी भ्रान्ति होती है। उसी तरह क्षणिक ज्ञानोंकी धारामें ही सादृश्यके कारण ‘स एवाहम्’ मैं वही हूँ, इस प्रकार एकत्वकी भ्रान्ति होती है। बाह्याकार भी क्षणिक ज्ञान ही है, परंतु यह सब कहना ठीक नहीं। कारण कि ज्ञेयकी उत्पत्तिके पहले उसका ज्ञान-सम्बन्ध कैसे होगा। ज्ञान उत्पन्न होते ही नष्ट होता है, तब उसका ज्ञेयके साथ सम्बन्ध कैसे होगा? ज्ञेयको प्रत्यक्षताका अनुभव होता है, फिर उसे अनुमेय माननेवाला पक्ष भी असंगत ही है। अनुभविता भी यदि क्षणिक ज्ञान ही है, तब स्मृति भी कैसे सम्पन्न होगी? अन्य अनुभूतका अन्य स्मरण कर नहीं सकता। यदि कोई स्थायी आत्मा हो, तभी ज्ञानसे संस्कार उत्पन्न हो, तभी स्मृति हो सकेगी। संस्कारका स्थायी आधार न होनेसे ही पूर्वापरकी तुल्यताका ग्रहण सम्भव नहीं होता। अत: सादृश्यमूलक एकत्वकी भ्रान्ति भी नहीं कही जा सकती। क्षणिक विज्ञान व्यक्तियोंसे अतिरिक्त विज्ञानसंतान कुछ भी नहीं होता। अत: संतानको लेकर भी एकत्व-व्यवहार उपपन्न नहीं हो सकता। यदि अत्यन्त भिन्नमें भी कार्य-कारणभाव सम्पन्न हो सके, तब तो जैसे दुग्धसे दधिकी अपेक्षा की जाती है, उसी तरह सिकतासे भी दधिकी अपेक्षा की जानी चाहिये; क्योंकि भिन्नता समान ही है। सर्वसम्मतिसे एक स्वयं नामका पदार्थ है। जिसके सम्बन्धमें सभी कहते हैं—‘मैं स्वयं जा रहा हूँ, तुम स्वयं जाओ, वह स्वयं आ रहा है’ भले उसकी चेतनता, जडता, शून्यता आदिमें विवाद हो। उसी सम्पूर्ण भाव-अभावके अभिज्ञ सर्वसाक्षीको स्वयं पदार्थ मानना चाहिये। जिसके द्वारा सबका अभाव विदित होता है, उसे सत् ही कहना चाहिये। वही स्वयं निराकर्ताका भी स्वरूप है। सत्, असत् आदि सभी वादोंसे प्रथम ही साक्षी सिद्ध है। जैसे ज्योति:-स्वभाव आदित्यमें अप्रकाश नहीं कहा जा सकता। उसी प्रकार नित्य-बोधस्वरूप आत्मामें अज्ञान नहीं कहा जा सकता। जो समझते हैं कि आत्मगत ज्ञानसे ही आत्मगत इच्छादि विदित होते हैं, वह ठीक नहीं। जैसे अग्निगत उष्णता अग्निप्रकाशसे नहीं प्रकाशित होती। अत: साक्षीके द्वारा ही सुख-दु:खादि-वृत्तिका भान होता है। नैयायिकोंके मतानुसार सुख एवं ज्ञान दोनोंका एक कालमें आत्म-समवेत होना सम्भव न होगा; क्योंकि आत्ममन:संयोग दोनोंका ही हेतु है। एक असमवायीकारण एक ही आत्मगुणके प्रति हेतु होता है। सुखके असमवायीकारण आत्ममन:संयोगके नाशसे सुखका नाश होगा। संयोगान्तरसे जन्य ज्ञानद्वारा उसका ग्रहण कथमपि नहीं बन सकेगा। एक आत्ममन:संयोगसे युगपत् अनेक कार्योंकी उत्पत्ति मान्य नहीं होती, अत: ज्ञान और सुख दोनों युगपत् नहीं हो सकते। एक आश्रयवालोंका विषय-विषयिभाव नहीं बन सकता, इसलिये भी सुख ज्ञानग्राह्य नहीं हो सकता। यदि कहा जाय कि सुख-दु:खादि ज्ञानग्राह्य मत हों, तो यह भी ठीक नहीं; कारण, ‘सुखं मया ज्ञातम्’ ‘दु:खं मया ज्ञातम्’ इस रूपसे सुख-दु:खकी स्मृति सुख-दु:खके अनुभवको बोधित करती है। जो कहा जाता है कि ‘ज्ञान-विशिष्ट आत्मामें समवेत होनेसे सुखादिका भान होगा’, यह भी ठीक नहीं। कारण, एक कालमें आत्मा अनेक विशेष गुणोंका समवायी नहीं हो सकता। एक असमवायीकारण आत्ममन:संयोगसे एक ही कार्य उत्पन्न होनेका नियम मान्य है। यदि ज्ञान-विशिष्ट आत्म-समवेत होनेसे सुखादिका ग्रहण हो तब तो आत्मगत संख्या परिमाणादिका भी ग्रहण होना ही चाहिये। यदि कहा जाय कि ‘सुख, दु:ख, ज्ञानादिका आत्माके गुण या धर्म होनेसे आत्माद्वारा ही प्रकाशित होना ठीक है’, वह भी ठीक नहीं; कारण, नैयायिकोंका आत्मा प्रकाशस्वरूप नहीं है। फिर उससे सुखादिका प्रकाश कैसे होगा? नैयायिक आत्माको व्यापक और नित्य भी मानते हैं, अत: ज्ञान, सुखादि उसके विकार नहीं हो सकते। व्यापक, नित्यको विकारी कहना भी असंगत ही है। अत: आत्मा न तो ज्ञानादि गुणवाला ही सिद्ध होता है और न गुण-गुणीमें ग्राह्य-ग्राहकभाव ही बन सकता है। फिर सभी अनेक व्यापक आत्मामें आत्ममन:संयोग समान ही है। अत: एक आत्माके सुखादिसे सभी आत्माओंको सुखादिमान् कहना पड़ेगा। अदृष्टादि भी किस आत्मामें हैं, किसमें नहीं, इसका निर्णय अशक्य होगा। अत: सुख-दु:ख एवं वृत्तिरूप ज्ञानादि स्वप्रकाश व्यापक आत्मासे भास्य मानना ही युक्त है। वही आत्मा नित्य-बोध है। ज्ञानको ज्ञेय माननेसे अनवस्थित ज्ञानमाला अनिवार्य होगी। यह भी विचारणीय है कि विषय-प्रकाश-कालमें विषय-प्रकाशक ज्ञान भासमान होता है या नहीं, यदि नहीं तो विषय स्वयं भासित होता है या ज्ञानाधीन होकर भासित होता है, यह निर्णय नहीं हो सकेगा। अत: विषय-प्रकाश-कालमें ही प्रकाशक ज्ञानका भानस्वरूप ज्ञानान्तर मानना चाहिये। यदि वह ज्ञान भी भासमान नहीं है तो उसके द्वारा पूर्व ज्ञानका भान नहीं बनेगा। फिर उस ज्ञानके भानके लिये भी ज्ञानान्तर मानना पड़ेगा। ‘पूर्व-पूर्व ज्ञान उत्तरोत्तर ज्ञानसे भासित होंगे’, यह पक्ष भी सम्भव नहीं है; क्योंकि प्रथम ज्ञान उत्पन्न होनेके अनन्तर मनमें क्रिया उत्पन्न होगी, उससे विभाग होगा, तब पूर्व संयोग नाश होगा, पुन: दूसरा संयोग उत्पन्न होगा, तब ज्ञानान्तर उत्पन्न होगा। इस तरह बहुक्षणविलम्बसे जब उत्तर ज्ञान उत्पन्न होगा, तब पूर्वज्ञान रहेगा ही नहीं, फिर भी उसका भान कैसे होगा। यदि इन सब दोषोंसे बचनेके लिये एक ही आत्म-मन:-संयोगसे दो ज्ञान या अनेक ज्ञानकी उत्पत्ति मानी जाय, तब तो एक ही आत्ममन:संयोगसे युगपत् सन्निकृष्ट रूप, रस, गन्धादिका भी समकालमें ही ज्ञान होना चाहिये। संस्कार-उद‍्बोध होनेपर उसी समय स्मृतियाँ भी उत्पन्न होनी चाहिये, परंतु यह सब सिद्धान्तविरुद्ध होगा। नैयायिकोंके सिद्धान्तमें न तो अनुभव एवं स्मृतियोंकी समकालता मान्य है और न तो विशेष गुणोंकी समकालता ही मान्य है ‘युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्’ (न्याय&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-paashcaaty-drshn-1-1-drshnkii/&quot;&gt;दर्शन&lt;/a&gt; १।१।१६) एक कालमें अनेक ज्ञानोंका न उत्पन्न होना अणुपरिमाण मनके होनेमें लिंग है। इसलिये दीर्घशष्कुली (पापड़) खाते समय समकालमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धकी अनुभूतिको भी नैयायिक क्रमिक ही मानते हैं। यदि ज्ञान या चैतन्य आत्माका स्वरूप-लक्षण माना जाय तो जैसे गन्धादि पृथ्वीका लक्षण है, वैसे ही ज्ञान आत्माका लक्षण हुआ, फिर तो जैसे गन्धादि पृथ्वी आदिका स्वरूप ही है, वैसे ही ज्ञान भी आत्माका स्वरूप ही ठहरता है। फिर ‘अनित्य ज्ञानवाला आत्मा है’, यह कथन व्यर्थ ही है। यदि ज्ञान आत्माका तटस्थ लक्षण है तो आत्माका स्वरूप लक्षण भी बतलाना चाहिये। पर वह चेतनातिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं हो सकता। अत: देहादि-जड-विलक्षण ही आत्मा है, यह कहना पड़ेगा तथा च निर्विशेष चिद्‍रूप ही आत्मा हुआ। बोधस्वरूप आत्म-ज्योतिसे दीप्त होकर बुद्धि भ्रान्तिसे अपनेमें ही बोध मानती है। ‘अन्य साक्षी बोद्धा नहीं है, मैं ही बोद्धा हूँ’, यह बुद्धिका भ्रम ही है। बुद्धि आगन्तुक है; किंतु बोध तो सुषुप्तिमें बुद्धिके न रहनेपर भी रहता है। अत: अविवेकसे ही बुद्धिमें बोधरूपताकी भ्रान्ति होती है। स्वप्नके सभी वेद्य-प्रपंचको इसी बोधसे जाना जाता है; क्योंकि स्वप्नमें आदित्य, चन्द्र, चक्षु, वाक् आदि सभी ज्योतियाँ लुप्त होती हैं, मन स्वयं वेद्यरूपसे ही परिणत है। भासक ज्योति आत्मासे भिन्न होकर कुछ भी नहीं है। अतएव स्वप्नमें जिससे रूपदर्शन, शब्दश्रवण, वाग्व्यवहार होता है, वह चक्षु, श्रोत्र, मन एवं वाक् आदि आत्मज्योति ही है—‘सा श्रोतु: श्रुतिर्यया स्वप्ने शृणोति। सा वक्तुर्वक्तिर्यया स्वप्ने वदति।’ जैसे एक ही स्फटिक मणिमें नील, पीत, हरित उपाधिके भेदसे अनेक रूप परिलक्षित होते हैं, उसी तरह एक ही नित्य ज्ञान स्वप्नकल्पित शब्दादि अनेक उपाधिभेदसे श्रुति, मति, विज्ञाति आदि रूपमें प्रतीत होता है। इसी चिद्‍रूप ज्ञानका ही विकल्प जाग्रत् भी है। अज्ञानोपाधिक ज्ञानस्वरूप आत्मा बुद्धिकी कल्पना करता है। बुद्धिसे उपहित होकर बुद्धिस्थ अर्थका ही व्याकरण करता हुआ उनका प्रकाशक वही ज्ञानस्वरूप आत्मा सर्वव्यवहारभागी होता है। जैसे स्वप्नका व्यवहार, ठीक वैसा ही जाग्रत‍्का भी व्यवहार होता है। फिर भी शुद्धचित्तमें निर्विकल्प नित्यज्ञानका साक्षात्कार होता है। बाह्येन्द्रियोंसे विषयोपलम्भ जागर है। संस्कारवशात् निद्राकालमें प्रतीत प्रपंच-स्वप्न एक प्रकारकी स्मृति है। दोनोंहीका अभाव सुषुप्ति है। तीनोंका ही साक्षी नित्य ज्ञान है। सुषुप्तिका तम ही जागर, स्वप्नका बीज है। स्वात्म-प्रबोधसे बीज दग्ध होनेपर अनन्तज्ञान निष्प्रपंचरूपसे भासित होता है। जैसे अदृश्य भी राहु चन्द्रबिम्बपर उपरक्त होकर दृश्य होता है, जैसे जलमें चन्द्रादिका प्रतिबिम्ब लक्षित होता है, वैसे ही शुद्ध बुद्धिपर ही निर्विकल्प-बोध लक्षित होता है। जैसे जलमें भानुका बिम्ब एवं उष्णता प्रतीत होनेपर भी वह जलका धर्म नहीं, किंतु भानुका ही धर्म है, उसी प्रकार बुद्धिमें बोध लक्षित होनेपर भी बोध बुद्धिका धर्म नहीं है। जैसे जलका शैत्य एवं अप्रकाश धर्म निश्चित है, वैसे ही बुद्धिका भी जडत्व धर्म निश्चित है। अत: जैसे जलमें प्रतीत होते हुए भी उष्णता और प्रकाश भानुका ही धर्म है, वैसे ही बुद्धिमें स्फुरण या बोध प्रतीत होनेपर भी आत्माका ही स्वरूप है। चक्षुके द्वारा रूपाकारवृत्तिका अवभासन करता हुआ साक्षी अलुप्तदृक् रहता है। वही दृष्टिका द्रष्टा, श्रुतिका श्रोता है। केवल मानसी वृत्तिका भासन करता हुआ वही मतिका मन्ता कहा जाता है। वह विज्ञातिका विज्ञाता है। उसीके सम्बन्धमें श्रुतिने कहा है— न दृष्टेर्द्रष्टारं पश्ये:, न श्रुते: श्रोतारं शृणुया:, न मतेर्मन्तारं मन्वीथा:॥ ‘मतिका मन्ता है’ यह कहनेपर भी उसमें मन्तृत्वादि विकार नहीं होते। बुद्धि आदिके ही व्यापारसे केवल तद्भासकमें मन्तृत्वादिकी प्रतीति होती है। सुषुप्तिमें भी ज्ञस्वरूप बना ही रहता है। केवल दृश्य न होनेसे विशेष दर्शनादिका अभाव रहता है। घटादि बाह्य वस्तु दृष्टिसे व्यवहित होता है, अत: परोक्ष है। आत्मा तो दृष्टिका भी आत्मा है, अत: आत्मा अपरोक्ष है। श्रुतिमें भी ब्रह्मात्माको साक्षात् अपरोक्ष कहा गया है—‘यत्साक्षादपरोक्षाद‍्ब्रह्म’ (बृहदा० उप० ३।४।१) जैसे दीपको स्वात्मप्रकाशमें दीपान्तरकी अपेक्षा नहीं होती, वैसे ही बोधस्वरूप आत्माको भी स्वात्म-प्रकाशमें बोधान्तरकी अपेक्षा नहीं है। उसी स्वयंज्योति उपलब्धिस्वरूप आत्माके सन्निधानसे साभास अन्त:करण ही आत्मा मालूम पड़ता है। स्वत:सिद्ध आत्मामें जाति, गुण, क्रिया आदि न होनेसे कोई भी शब्द उपाधिद्वारा ही उसमें पर्यवसित होते हैं। अहंकारादिमें आत्मचैतन्याभासका उदय होता है, अत: अहंकार आत्मशब्द वाच्य होता है। जैसे ‘उल्मुकं दहति’ ‘अयो दहति’ इत्यादि प्रयोगोंमें उल्मुक या लोहादिमें दाहकत्वका व्यवहार होता है, परंतु केवल उल्मुक या लोहादिमें दाहकत्वका व्यवहार नहीं बन सकता, अत: वह्निमें ही दाहकत्वका पर्यवसान होता है। उसी तरह ‘अहं जानामि’ इत्यादिरूपसे साभास अन्त:करण या अहंकारमें ज्ञातृत्व-आत्मत्वका व्यवहार होता है, परंतु अहंकार जड एवं प्रकाशके अधीन है। अत: ज्ञातृत्व-आत्मत्वका पर्यवसान नित्यबोधमें ही होता है। जैसे दर्पणादि उपाधिवशात् मुखसे अन्य मुखाभास दर्पणस्थ प्रतिबिम्ब होता है, फिर भी स्वरूपसे पृथक् नहीं होता; क्योंकि बिम्बकी चेष्टा बिना प्रतिबिम्बमें चेष्टा नहीं होती। आभाससे मुख भी अन्य होता है; क्योंकि वह आदर्शानुविधायी नहीं होता। ग्रीवास्थ मुख दर्पणादिकी अपेक्षा करके ही स्फुटित होता है। मुखाभासके तुल्य अहंकार आत्माभास है। वैसे ही आत्मा और आत्माभास-बुद्धिमें चैतन्याभास होता है। आत्मामें चैतन्यरूपता होती है। तभी वेदादिशास्त्र ब्रह्मतत्त्वका ज्ञानशब्दसे प्रतिपादन करते हैं। चैतन्याभासयुक्त बुद्धि ज्ञानशब्दका वाच्य है। शुद्ध चैतन्य ज्ञानशब्दका तात्पर्यार्थ है। प्रकाशस्वभाव वस्तु जिसमें प्रतिबिम्बित होती है, उसके प्रकाशोदयका हेतु होती है। जैसे जलमें प्रतिबिम्बित सूर्य जल-प्रकाशका हेतु होता है, वैसे बुद्धिमें प्रतिबिम्बित चैतन्य बुद्धिमें चित्प्रकाशके उदयका हेतु होता है। उसी चिदाभासयुक्त बुद्धिमें ज्ञानादि शब्दोंका प्रयोग होता है। लक्षणोंसे शुद्ध चैतन्यका बोध होता है। कहा जा सकता है कि ‘करोति, गच्छति’ इत्यादि स्थानोंमें प्रकृत्यर्थ क्रिया एवं प्रत्ययार्थ कर्तृत्व—दोनोंका ही आश्रय एक ही है। कहीं भी क्रिया और कर्तृत्वकी भिन्नाश्रयता नहीं होती, परंतु ‘जानाति’ में भिन्नाश्रयता क्यों? इसपर वेदान्तियोंका कहना है कि बुद्धिगत आत्माभास (चिदाभास) ‘तिङ्’ प्रत्ययका अर्थ है और ‘ज्ञा’ धातुरूप प्रकृतिका अर्थ वृत्तिरूपा क्रिया बुद्धिमें रहती है। बुद्धि एवं चिदाभासके अन्योन्य अविवेकसे ‘जानाति’ का प्रयोग होता है। इस दृष्टिसे चिदाभासव्याप्त सक्रिय बुद्धिके साथ आत्माका ऐक्याध्यास होनेसे ही ‘आत्मा जानाति’ यह व्यवहार होता है। इस तरह साभास साधिष्ठान बुद्धिमें ही प्रत्ययार्थ कर्तृत्व एवं प्रकृत्यर्थ वृत्ति—दोनों ही बन जाते हैं। बुद्धिमें चित्प्रकाशरूप बोध नहीं होता। बोधस्वरूप आत्मामें क्रिया नहीं बनती है। इसीलिये दोनोंमेंसे किसी एकमें ‘जानाति’ व्यवहार नहीं बन सकता। अत: बुद्धि एवं बोधस्वरूप आत्माके आरोपित ऐक्यमें ही ‘जानाति’ व्यवहार होता है। वही प्रकृत्यर्थ क्रिया और प्रत्ययार्थ दोनोंका ही आश्रय है। ‘ज्ञप्तिर्ज्ञानम्’ इस प्रकार भाव-व्युत्पत्तिसे भी ज्ञानशब्द आत्मामें नहीं प्रयुक्त हो सकता; क्योंकि नित्य आत्मा भाव अर्थात् धात्वर्थ सामान्य भी नहीं हो सकता; नित्य निर्विकार आत्मामें किसी प्रकारकी विक्रिया नहीं हो सकती। इस तरह ‘ज्ञायतेऽनेन’ इस कारण व्युत्पत्तिसे ज्ञानशब्द आत्मामें संगत नहीं है। इस व्युत्पत्तिसे तो बुद्धि ही ज्ञान-शब्दार्थ ठहरती है। यदि आत्मा ज्ञानका करण होगा, तब कर्ता उससे कोई अन्य ढूँढ़ना पड़ेगा; जो कि असम्भव है। अतएव चिदाभास और चिदात्माके अन्योन्याध्याससे ही ज्ञातृत्व-व्यवहार आत्मामें सम्भव होता है। बुद्धिके कर्तृत्वका आत्मामें अध्यास करके आत्मामें ज्ञातृत्व होता है। आत्माका अचैतन्यबुद्धिमें अध्यास करनेसे बुद्धिमें ज्ञत्वका व्यवहार होता है। आत्मा ज्ञानस्वरूप है और वही ज्योतियोंका भी ज्योति कहा जाता है। अत: बुद्धि एवं चक्षुरादिसे भी ज्ञान उत्पन्न नहीं होता— ‘तद्देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम्।’ (बृहदा० ४।४।१६) ‘अन्त: पुरुषे ज्योति:।’ (छान्दो० ३।१३।७) जैसे तत्त्वज्ञान बिना अविवेकी देहको ही आत्मा मानता है, वैसे ही अविवेकी बुद्धिको ही ज्ञानकर्ता कहता है। चिदाभासयुक्त बुद्धिवृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं, यही देखकर ज्ञानकी उत्पत्तिका व्यवहार होता है। जैसे प्रतिबिम्ब दर्पणानुविधायी होता है, वैसे ही चिदाभास भी बुद्धिधर्मका अनुविधायी होता है। चिदाभाससे दीपित बुद्धिवृत्तियाँ विषयग्राहिका उसी तरह होती हैं, जैसे उल्मुकका दाहकत्व-व्यवहार। वे ग्राहिका वृत्तियाँ स्वयं भासित होती हैं, इसीलिये बौद्धोंने प्रत्ययोंके भासक साक्षीका अपलाप किया है, तथापि उनका आत्मा भासयुक्तबुद्धि प्रत्ययोंके भाव एवं अभाव जिस साक्षीसे विदित होते हैं, वह साक्षी ही उनकी उत्पत्ति-विनाशको जानता है। साक्षीके रहनेपर भी चिदाभास आवश्यक है; क्योंकि वस्तु-स्फुरणके लिये वृत्तिव्याप्त वस्तुपर चिदाभास आवश्यक है। केवल साक्षीद्वारा यदि वस्तुका प्रकाश होता हो, तब तो वृत्तिके समान ही काष्ठ-पाषाणादिका भी स्फुरण होना चाहिये। प्रकाशस्वरूप आत्माके सम्बन्धसे ही अचेतनबुद्धि चेतन-सी प्रतीत होती है। फिर तो उसकी वृत्तियाँ भी चेतन-सी ही प्रतीत होती हैं। जैसे तप्त लौहपिण्डसे निकलनेवाले विस्फुलिंग भी अग्निवत् प्रतीत होते हैं। वृत्ति-तदभाव, आभास तथा आभासाभावका ग्राहक तादृक् प्रत्यय नहीं हो सकता। अत: अत्यन्त विविक्त साक्षीसे ही वे भासित होते हैं। फिर भी जैसे लौहपिण्डमें अग्निकी संक्रान्ति होती है, वैसे बुद्धिमें चित‍्की विकाररूप संक्रान्ति नहीं होती। दर्पणमें प्रतिबिम्बके तुल्य ही बुद्धिमें चित‍्की संक्रान्ति होती है। जैसे लौहपिण्ड अग्न्याभास होता है, उसी तरह बुद्धि चेतनाभास प्रतीत होती है। चित्त ही चेतन है, यह वैसे ही असंगत है, जैसे देहको चेतन कहना। इसी तरह चक्षुरादिमें चेतनत्व कहना भ्रममूलक है। अहंकारसहित बुध्यारूढ़ सभी वस्तु साक्षीसे ही भासित होते हैं। इसलिये अखण्डबोधरूप साक्षी सर्वावभासक कहलाता है। सुषुप्तिमें ‘नाद्राक्षम्’ इस रूपसे प्रत्ययका ही निषेध है, फिर भी भावरूप अज्ञान एवं प्रत्ययाभावका बोध तो रहता ही है। प्रमातृ-प्रमाण-प्रमेयादिरूप विशेष ग्राह्य नहीं अनुभूत होता। किंतु भाव-अभावका साक्षी चिद्‍रूप आत्मा एकरस है। शास्त्रोंके अनुसार प्रत्यय स्पष्ट ही उत्पत्ति-विनाशशील एवं कूटस्थ चैतन्यस्वरूप अलुप्तदृक् है। प्रत्यगात्मा-नित्यज्योतिमें ही अहंका पर्यवसान है। अनुभवके आधारपर ही सब कुछ सिद्ध होता है। आत्मा अनुभवस्वरूप है। प्रत्यय और प्रत्ययी अन्त:करण—दोनों ही जड हैं। नित्य चैतन्यसे ही इन सबका भान होता है। जैसे सेनाका जय राजामें आरोपित होता है, उसी तरह प्रमाणफल कूटस्थ साक्षीमें आरोपित होता है। अविकृत चिदात्माका अन्त:करणमें प्रतिबिम्ब होता है। वह प्रतिबिम्ब ही स्वोपाधिबुद्धिके व्यापारद्वारा प्रमाता बनता है। आभास भी परिणाम नहीं है, किंतु जैसे रज्जुके अज्ञानसे सर्पभ्रम होता है, जैसे दर्पणमें मुखाभासत्वकी प्रतीति होती है, उसी तरह बुद्धिमें आत्माभासत्वकी प्रतीति होती है। प्रत्यय और दृष्टिका भेद स्वप्नमें प्रसिद्ध ही है। वहाँ विषयाकाराकारित प्रत्ययका साक्षी आत्मा ही है। जिस चिद्‍रूप आत्माके आभाससे विषयाकार-प्रत्यय विदित होता है, वही आत्मा है। प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय—तीनोंका भासक साक्षी ही ब्रह्म है—‘त्रितयं तत्र यो वेद स आत्मा स्वाश्रयाश्रय:।’ (श्रीमद्भा० २।१०।१) सम्यग्ज्ञान, संशयज्ञान, भ्रान्तिज्ञानमें अवगति और बोध-आत्मा एक ही ढंगका है। इन ज्ञानोंमें भेद केवल प्रत्ययोंका ही है। पुष्पादि उपाधिके वशसे स्फटिकादिमें भेद प्रतीत होता है, उसी तरह प्रत्ययरूप उपाधिके भेदसे अखण्डबोधमें भेद प्रतीत होता है। जाग्रत‍्काल, स्वप्नकालके प्रत्ययोंका स्फुरण नित्य-अपरोक्षभाव साक्षी आत्मासे ही होता है। जैसे प्रदीपसे घटादिका प्रकाश होता है, परंतु प्रदीपका भी प्रकाश द्रष्टासे ही होता है— तस्य भासा सर्वमिदं विभाति, (कठोप० २।२।१५) अत्रायं पुरुष: स्वयंज्योतिर्भवति। (छान्दोग्योप०) अन्य निषेधसे भी सर्वनिषेध साक्षी चेतन आत्मा प्रसिद्ध होता है। ‘अज्ञासिषमिदं मां च’ मैंने इसे और अपने आपको जाना, इस प्रकारकी स्मृति प्रमाता, प्रमाण, प्रमेयके स्मरणके तीनोंका ही प्रकाश निश्चित होता है। एक प्रमाणज्ञानमें ग्राहक और ग्राह्य दोनोंका स्फुरण नहीं हो सकता। अत: बोधस्वरूप साक्षीसे ही स्फुरण होना उपपन्न होता है। बौद्ध कर्ता कर्म-विहीन प्रत्ययका स्वमहिमासे प्रकाश है ऐसा मानते हैं, परंतु फिर तो अनुभविताकी अपेक्षा ही न रहेगी। वैसी अनुभवितामें ही अनुभव इष्ट होता है। इसके अतिरिक्त अनुभविता भी तो अनुभव ही है। बुद्धि ही भ्रान्तिसे पुरुषोंको ग्राह्य-ग्राहक-भेदवान् होकर प्रतीत होती है। जिसके मतमें अनुभूति क्रिया है, वही कारक भी है। यदि इसका सत्त्व एवं क्षणिकत्व मान्य है तो दृष्टबलात् सकर्तृक भी मानना ठीक है। वस्तुतस्तु ग्राह्य नीलपीतादि वस्तु और वस्तु-प्रत्यय भासक साक्षी मान्य है, जैसे रूपादि ग्राह्य हैं, उनके ग्राहक दीपादि हैं, उसी तरह प्रत्यय भी ग्राह्य है, अत: उसका ग्राहक साक्षी मान्य होना चाहिये। व्यंजक होनेसे अवभासक अवभास्यसे अन्य होता है। जैसे घटादिका प्रकाशक दीपक होता है, उसी तरह प्रत्यय ग्राह्य है, उसका भी ग्राहक साक्षी पृथक् है। द्रष्टा और दृश्यका आध्यासिक ही सम्बन्ध होता है। जैसे घटादिपर आलोककी व्याप्ति होती है, वैसे ही घटादिपर बुद्धि-व्याप्त होती है। जैसे आलोकस्थ घट आलोकारूढ़ कहा जाता है, वैसे ही बुद्धिस्थ घट बुद्धॺारूढ़ कहा जाता है। बुद्धिव्याप्त घटादिपर चित‍्प्रतिबिम्ब होता है, उसीसे घटादि प्रकाश होता है। कार्यकारणसंघातरूप प्राणीका जाग्रत‍्कालमें बैठना, चलना, काम करना आदि व्यवहार, आदित्य, चन्द्रमा, अग्निरूप ज्योति या प्रकाशके द्वारा सम्पन्न होता है। यहाँ सर्वत्र कार्यकारणावयवसंघातव्यतिरिक्त आदित्यादि ज्योतिसे ही व्यवहार चलता है। इसी तरह मेघाच्छन्न अमावस्याकी रात्रिमें जहाँ कोई भी ज्योति नहीं होती, अपना हाथ भी नहीं भासित होता, वहाँ भी दूरस्थ श्वान तथा गर्दभ आदिके शब्दको सुनकर मनसे निश्चित करके उसी शब्दके सहारे प्राणी वहाँतक पहुँच जाता है। ऐसे ही गन्धके सहारे भी जिधरसे गन्ध आती है, उधर प्राणी पहुँच जाता है। यहाँ सर्वत्र देहादि-संघातभिन्न ज्योतिसे ही व्यवहार होता है। ठीक इसी तरह स्वप्न एवं सुषुप्तिकालमें स्वाप्निक वस्तुओं तथा निद्रामें सौषुप्त अज्ञान एवं सुखका प्रकाश भी किसी संघातव्यतिरिक्त संघातप्रकाशक ज्योतिसे ही मानना उचित है। स्वप्नके बन्धु-संगम, देशान्तरगमनादि व्यवहार देहादि-संघातव्यतिरिक्त देहादिभासक आत्मज्योतिसे मानना उचित है। स्वप्नादि व्यवहार भी संघातव्यतिरिक्त ज्योति:पूर्वक है। व्यवहार होनेसे जाग्रत्-व्यवहारके तुल्य जैसे जाग्रत् का व्यवहार देहातिरिक्त आदित्यादि ज्योतिर्मूलक हैं, वैसे ही स्वाप्निक व्यवहारको भी देहादिभिन्न ज्योतिर्मूलक मानना चाहिये। स्वप्नव्यवहारमें आदित्यादि ज्योतियोंका सम्बन्ध सम्भव ही नहीं। अत: कोई अन्त:स्थ आदित्यादि ज्योतिसे विलक्षण अभौतिक आत्मज्योति मानना उचित है। उसीसे स्वप्नका व्यवहार सम्भव हो सकता है। आदित्यादि ज्योति चक्षुरादिसे उपलब्ध होती है, परंतु स्वप्न-व्यवहारका हेतुभूत कोई बाह्यज्योति चक्षुरादिसे उपलब्ध नहीं होती, परंतु ज्योतिका कार्य-व्यवहार स्पष्ट उपलब्ध होता है। अत: संघातभिन्न अदृश्य अन्त:स्थ आदित्यादि विलक्षण अभौतिक ज्योति मानना आवश्यक है। इस सम्बन्धमें यह अनुमान है कि ‘विमतं अन्त:स्थमतीन्द्रियत्वाद् व्यतिरेकेणादित्यादिवत्।’ विवादास्पद स्वप्नादिव्यवहार-हेतु ज्योति अन्त:स्थ है। अतीन्द्रिय या अदृश्य होनेसे जो अदृश्य नहीं, वह अन्त:स्थ नहीं, जैसे आदित्यादि। इस सम्बन्धमें भौतिकवादीका कहना है कि ‘उपकार्योपकारकभाव सजातीयमें ही देखा जाता है। जाग्रत्-व्यवहार कारक-हेतुभूत आदित्यादि ज्योति देहादिके समान भौतिक ही है। उसी तरह स्वाप्निकव्यवहारके हेतुभूत संघात-व्यतिरिक्त ज्योतिको भी संघातके समान भौतिक ही होना चाहिये। जैसे आदित्यादि उपकारक उपक्रियमाण देहादि-संघातके सजातीय होते हैं, वैसे ही स्वाप्निक-व्यवहार हेतुभूत उपकारक ज्योतिको भी उपक्रियमाणका सजातीय ही होना चाहिये। अत: जैसे आदित्यादि उपकारक ज्योति भौतिक हैं, वैसे ही स्वाप्निक व्यवहारका उपकारक ज्योति भी भौतिक ही होना चाहिये।’ ‘जो कहा जाता है कि ‘अतीन्द्रिय एवं अदृश्य होनेसे वह ज्योति अभौतिक है’, यह भी ठीक नहीं; क्योंकि चक्षुरादि इन्द्रिय-ज्योति भी अतीन्द्रिय तथा अदृश्य है। तो भी वे जैसे अभौतिक नहीं, भौतिक ही हैं; उसी तरह उस ज्योतिको भी भौतिक ही होना चाहिये। इसके अतिरिक्त देहादिसंघातके रहनेपर ही चैतन्यरूप अन्त:स्थज्योति रहती है। देहादिके न रहनेपर नहीं रहती। अत: उसे देहादिका ही धर्म मानना उचित है। जैसे रूपादि संघातके रहनेपर ही उपलब्ध होते हैं, अत: वे देहादिके ही धर्म हैं, वैसे ही यहाँ भी समझना चाहिये—‘विमतं चैतन्यं शरीरधर्मस्तद्भावभावित्वाद् रूपादिवत्। विमतं ज्योति: सङ्घाताद्भिन्नं तद्भासकत्वादादित्यादिवत्।’ विवादास्पद-चैतन्य संघातसे भिन्न है, संघातके भासक होनेसे आदित्यादिके तुल्य यह सामान्यत: दृष्ट-अनुमान व्यभिचारी होनेसे स्वयं अप्रमाण है; क्योंकि भौतिकवादीके मतानुसार देहका भासक होनेपर भी चक्षु देहसे भिन्न नहीं है, उसी तरह चैतन्य भी देहका भासक होनेपर भी देहसे भिन्न न होकर उससे अभिन्न उसका धर्म ही है। अनुमानके द्वारा प्रत्यक्षका बाध भी नहीं होता। मैं मनुष्य हूँ, मैं देखता, सुनता और जानता हूँ, इस प्रकार प्रत्यक्ष ही देहादि-संघातमें द्रष्टृत्व, ज्ञातृत्वादि विदित होता है। फिर प्रत्यक्षके विरुद्ध अनुमान कैसे आदरणीय हो सकता है?’ ‘कहा जा सकता है कि ‘यदि देह ही आत्मा है और वही द्रष्टा, ज्ञाता आदि है तो अविकल रहनेपर भी वह क्यों कभी द्रष्टा, ज्ञाता होता है, कभी नहीं होता?’ किंतु यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि जो वस्तु जिस तरह प्रमाण-सिद्ध हो, उसको वैसी मानना उचित है। खद्योतमें प्रकाश, अप्रकाश दोनों ही देखा जाता है, अत: दोनों ही मान्य हैं। उसमें किसी कारणान्तरकी कल्पना नहीं की जाती। अग्निकी उष्णता, जलकी शीतलता जैसे स्वाभाविक है, वैसे ही देहमें कभी ज्ञातृत्व, द्रष्टृत्वादि होना, कभी न होना स्वाभाविक ही है। यदि प्राणियोंके धर्माधर्मके कारण औष्ण्य, शैत्यादि माना जायगा, तब तो अनवस्था-दोष होगा।’ भौतिकवादीका उपर्युक्त कथन ठीक नहीं है, कारण कि स्वप्न एवं स्मृतिके आधारपर यही सिद्ध होता है कि देहादि-संघातसे भिन्न अभौतिक आत्मा ही द्रष्टा होता है, देहादि नहीं। यह नियम है कि जाग्रत्-कालमें दृष्टका ही स्वप्नमें दर्शन होता है, इस तरह जाग्रत् और स्वप्नका द्रष्टा एक ही होता है। किंतु स्वप्नमें अनेक वस्तुओंका दर्शन होता, वहाँ देह या नेत्रादि नहीं होते। देहादि निर्व्यापार तथा नेत्र निमीलित ही रहते हैं। अत: स्वप्नके प्रपंचका द्रष्टा देह नहीं है। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि अन्य दृष्टका स्वप्न-द्रष्टा अन्य नहीं होता, अत: जो स्वप्नका द्रष्टा है, वही जाग्रत‍्का भी द्रष्टा है। यदि स्वप्नका द्रष्टा देहसे भिन्न सिद्ध हो गया तो जाग्रत‍्का द्रष्टा भी देहसे भिन्न ही मानना उचित है। जब कभी किसी प्राणीके नेत्र नष्ट हो जाते हैं तो वह अन्धावस्थामें भी पूर्वदृष्ट पदार्थोंको स्वप्नमें देखता है। स्पष्ट है कि स्वप्नोंके पदार्थोंका द्रष्टा देह नहीं है; क्योंकि देहमें नेत्र हैं ही नहीं। तात्कालिक नवीन देह यह नवीन नेत्र उत्पन्न होते हैं, उनसे स्वाप्निक पदार्थ दीखते हैं, यह कल्पना या संस्कारकी कल्पना भी भौतिकवादमें असंगत ही है। जिसने चक्षुके बिना भी स्वप्नमें पूर्वदृष्टका दर्शन किया, चक्षु रहनेपर भी उसीको प्रबोधकालमें द्रष्टा मानना उचित है। कहा जाता है कि स्वप्नमें पूर्वदृष्टके दर्शनका ही नियम नहीं; क्योंकि जन्मान्धोंको भी कभी-कभी स्वप्नमें विविधरूपोंके दर्शन होते हैं, परंतु यह ठीक नहीं, कारण कि जन्मान्धोंको भी जन्मान्तरानुभूतका कभी स्वप्नमें दर्शन मानना उचित है, यही जन्मान्तरमें प्रमाण भी है। अत: स्वप्नमें पूर्वदृष्टका ही दर्शन होता है, यह नियम स्थिर है। इसी तरह स्मर्ता और द्रष्टाके भी एकत्वका नियम है। जो द्रष्टा होता है, वही स्मर्ता होता है। यह देखा जाता है कि आँख मींचकर मनुष्य पूर्वदृष्टको स्मरण करता हुआ पूर्वदृष्टके समान ही देखता है। यहाँ भी जो नेत्र मींचनेपर पूर्वदृष्टको देख सकता है, खुले नेत्र रहनेपर भी उसीको द्रष्टा मानना उचित है। साथ ही यह भी देखा जाता है कि मृत देहमें किसी प्रकारकी विकलता दृष्टिगोचर न होनेपर भी दर्शनादि क्रियाएँ नहीं होतीं। अत: मानना पड़ेगा कि जिसके न रहनेपर देहमें दर्शन आदि क्रियाएँ नहीं हो सकतीं, जिसके रहनेपर दर्शन आदि क्रियाएँ होती हैं, वही द्रष्टा है, देह नहीं। कुछ लोग कहते हैं कि ‘चक्षुरादि इन्द्रियाँ ही दर्शनादि क्रियाओंकी कर्ता हैं’, किंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि जो मैंने देखा है, वही मैं स्पर्श कर रहा हूँ, इस प्रत्यभिज्ञाके अनुसार मालूम पड़ता है कि दर्शन तथा स्पर्शन क्रियाका कर्ता एक ही है। पर चक्षु स्पर्श नहीं कर सकता, त्वक् दर्शन नहीं कर सकता, अत: यही मानना ठीक है कि इन्द्रियोंसे भिन्न आत्मा ही चक्षुरादि विभिन्न इन्द्रियोंसे देखने-सुननेवाला है। कुछ लोग कहते हैं कि मन ही द्रष्टा, श्रोता, मन्ता आदि है, किंतु यह भी ठीक नहीं। मन भी रूपादिके तुल्य विषय ही है, फिर वह द्रष्टा नहीं हो सकता। अत: आदित्यादिके समान अन्त:स्थ ज्योति-संघातसे अतिरिक्त है। कहा जाता है कि ‘वह ज्योति कार्य-करण-संघातका सजातीय ही होना चाहिये; क्योंकि जैसे आदित्यादिज्योति सजातीयके ही उपकारक होते हैं, उसी तरह अन्तर-ज्योति भी सजातीयके ही उपकारक होनेसे उपकार्य भौतिक प्रपंचके समान भौतिक ही होना चाहिये’, परंतु यह ठीक नहीं है। कारण कि उपकार्योपकारकभाव सजातीयमें होनेका कोई नियम नहीं है। पार्थिव ईंधनसे—तृण-काष्ठादिसे, अग्निका प्रज्वलनरूप उपकार होता है, यहाँ अग्निका काष्ठादिसे कोई साजात्य नहीं है और यह भी नहीं कहा जा सकता कि पार्थिव तृणादिसे प्रज्वलनोपकार देखा गया है, अत: पार्थिवत्वादि जातीयसे ही अग्निका उपकार हो; क्योंकि वैद्युत अग्नि एवं जाठर अग्निका उपकार जलसे ही होता है। इस दृष्टिसे उपकार्योपकारकभावमें सजातीयता-असजातीयताका कोई नियम नहीं है। अनेक बार देखा जाता है कि स्थावरों तथा पशु आदिकोंसे मनुष्योंका उपकार होता है। जो कहा जाता है कि ‘अदृश्यत्व अतीन्द्रियत्वके कारण कार्य-करण-संघातका भासक तथा उपकारक ज्योतिको अभौतिक नहीं कहा जा सकता; क्योंकि चक्षुरादि अतीन्द्रिय एवं अदृश्य होनेपर अभौतिक नहीं, किंतु भौतिक ही हैं। इसी तरह कार्य-करण-संघातकी भासक ज्योतिको संघातका ही धर्म मानना उचित है।’ किंतु वह ठीक नहीं है; क्योंकि चक्षुरादिकरणभिन्नत्वे सति अतीन्द्रियत्वहेतुसे ही संघातभासक ज्योतिकी अभौतिकता सिद्ध होती है। अर्थात् जो चक्षुरादि करणसे भिन्न होकर अतीन्द्रिय है, वह भासक होनेसे संघातसे विलक्षण तथा अभौतिक ज्योति है। अतीन्द्रियत्व-हेतुके चक्षुरादिमें अनैकान्तिक होनेके कारण अनुमान दूषित नहीं कहा जा सकता; क्योंकि चक्षुरादि करणभिन्नता चक्षुरादिमें नहीं हो सकती। अत: चक्षुरादिभिन्नताविशिष्ट अतीन्द्रियतारूप हेतु चक्षुरादि इन्द्रियोंमें नहीं जायगा। अत: अनुमान निर्दोष ही है। कार्य-करण-संघातका भासक तथा व्यवहारका हेतुभूत ज्योति ही चक्षुरादिसे भिन्न तथा अतीन्द्रिय होनेसे अभौतिक एवं संघातव्यतिरिक्त सिद्ध होती है। चक्षुरादि इस प्रकारके नहीं हैं। इसी तरह तद्भावभावित्व भी असिद्ध ही है; क्योंकि मृत देहके रहनेपर भी चैतन्यका उपलम्भ नहीं होता। इसपर भी कुछ लोगोंका कहना है कि ‘भले ही मृतदेहमें चैतन्यका उपलम्भ न हो, फिर भी जब कभी चैतन्यका उपलम्भ होता है, देहमें ही उपलम्भ होता है। भले ही कभी मृत्तिका रहनेपर भी घट न रहे, तथापि जब कभी घट होता है, मृत्तिकाके रहनेपर ही होता है।’ परंतु यह कहना ठीक नहीं। इससे देह और चैतन्यका धर्म-धर्मीभाव या अभेद नहीं सिद्ध होता। ज्यादा-से-ज्यादा इससे इतना ही सिद्ध होता है कि धूमव्यापक वह्निकी तरह भूत चैतन्यका व्यापक है। जैसे जहाँ-जहाँ धूम है, वहाँ-वहाँ अग्नि होती है, उसी तरह जहाँ-जहाँ चैतन्य होता है, वहाँ-वहाँ भूत होता है, परंतु यहाँ भी जहाँ-जहाँ वह्नॺभाव है वहाँ-वहाँ धूमाभाव है, यहाँके समान व्यतिरेक व्याप्ति नहीं निश्चित होती है; क्योंकि चैतन्य आकाशकी तरह व्यापक होनेसे वह केवलान्वयी है, अत: उसका व्यतिरेक नहीं कहा जा सकता। देहसे अतिरिक्त स्थलमें चैतन्य उपलब्ध न होनेपर भी यह नहीं कहा जा सकता कि ‘वह नहीं है।’ अभिव्यंजक न होनेसे भी अनुपलब्धि कही जा सकती है। जैसे गो व्यक्तिरूप अभिव्यंजक होनेसे व्यापक गोत्वजातिकी अभिव्यक्ति न होनेपर भी अनुपलब्धि उत्पन्न हो जाती है। वस्तुत: गोपाल-कुटीरमें, हुक्‍कामें अग्नि बुझ जानेपर भी धूम रहता है। अत: अग्नि एवं धूमकी अभिन्नता या धर्म-धर्मीभाव भी असंगत ही है। वस्तुत: ‘तद्भावे तद्भाव:, तदुपलब्धौ उपलब्धि:।’ तद्भावमें तद्भाव एवं तदुपलब्धिमें तदुपलब्धि होनेसे ही तदभिन्नता होती है। मृत्तिकाके भावमें ही घटादिका भाव होता है। मृत्तिकाके उपलम्भमें ही घटादिका उपलम्भ होता है। इसलिये मृत्तिकासे घटादिकी अभिन्नता सिद्ध होती है। अग्निके न रहनेपर भी गोपाल-कुटीर या हुक्‍कामें धूम रहता है, अग्निके उपलम्भ बिना भी धूमका उपलम्भ होता है। अत: अग्निसे धूमकी भिन्नता ही है। ठीक इस नियमकी कसौटीपर भूत तथा चैतन्यकी अभिन्नता ठीक नहीं उतरती। भूत रहनेपर भी चैतन्य नहीं रहता और भूतके उपलम्भमें चैतन्यका उपलम्भ नहीं होता है। अग्निकी जल तथा पार्थिव काष्ठादिसे अन्यत्र उपलब्धि न होनेपर भी यह नहीं कहा जा सकता कि अग्नि, जल या काष्ठादिका ही धर्म है, किंतु सर्वसम्मतिसे अग्नि स्वतन्त्र वस्तु है, जल-काष्ठादिका धर्म नहीं। उसी तरह देह, दिल, दिमाग आदि नित्य-सिद्ध व्यापक चैतन्यके अभिव्यंजक हैं, अत: उनके बिना चैतन्यका उपलम्भ नहीं। फिर चैतन्य देहादिका धर्म नहीं, किंतु वह उनसे भिन्न स्वतन्त्र ही है। सामान्यत: दृष्टानुमानसे ही प्राणियोंकी भोजन-पानादि प्रवृत्ति होती है। यदि उसकी मान्यता न होगी, तब तो अभुक्त अपीत भोजनादिमें प्रवृत्ति ही नहीं होगी। खद्योत आदिमें पक्षके संकोच-विकाससे प्रकाश-अप्रकाश उपपन्न है। किंतु यदि देहका द्रष्टृत्व धर्म है, तो कभी उसके उपलम्भ, कभी उसके अनुपलम्भकी व्यवस्था नहीं उपपन्न हो सकेगी। भूत रहनेपर भी चैतन्य नहीं रहता और भूतके उपलम्भमें भी चैतन्यका उपलम्भ नहीं होता। अत: भूत एवं चैतन्यका न अभेद ही सिद्ध होता है, न धर्म-धर्मी-भाव ही सिद्ध होता है। ‘तमेव भान्तमनुभाति सर्वम्’ (कठ० २।२।१५), ‘विज्ञातारमरे केन विजानीयात्’, (बृहदा० २।४।१४) ‘यत्साक्षादपरोक्षाद्’ (बृहदा० ३।४।१) इत्यादि श्रुतियोंसे ज्ञात होता है कि व्यष्टि-समष्टि, स्थूल-सूक्ष्म कार्य-कारणात्मक, अनन्तकोटि ब्रह्माण्डावलि-स्वरूप अखिलप्रपंचके भानके पहले ही भासित होनेवाले अखिल निगमागमादि सच्छास्त्रोंके महातात्पर्यविषय अवेद्य होते हुए भी अपरोक्ष होनेके कारण स्वप्रकाशरूप होनेसे भगवान् साक्षात् अपरोक्ष ही हैं। प्रमाता भी प्रमेयकी अवगतिके लिये ही प्रमाणकी अपेक्षा करता है, अपनी अवगतिके लिये नहीं। यदि कहा जाय कि ‘एकहीको कर्म और कर्ता मानना विरुद्ध है, अत: प्रमाताकी अवगतिके लिये भी अन्य प्रमाताकी अपेक्षा है’ तो यह ठीक नहीं। ऐसा माननेपर उस प्रमाताकी अवगतिके लिये किसी अन्य प्रमाताकी तथा उसकी अवगतिके लिये किसी दूसरे प्रमाताकी अपेक्षा होगी और इस तरह अनवस्था-दोष प्रसक्त होगा। साथ ही उसमें भ्रान्ति, संशय और अज्ञान भी नहीं दिखायी पड़ते हैं। जिसके अनुग्रहसे मातृ, मान और मेयका यथार्थ अवभास होता है, वह मातृ-मनकी अपेक्षा किये बिना संशय आदिका अविषय होकर साक्षात् अपरोक्ष हो तो क्या आश्चर्य? फिर भी अनादि, अनिर्वाच्य, अचिन्त्य, महामहिमशालिनी भगवच्छक्तिभूत मायासे प्रत्यक्चैतन्याभिन्न, सजातीय-विजातीय-स्वगतभेदशून्य, अद्वय आनन्दका अस्तित्व भी जब तिरोहित हो गया है, तब स्वप्रकाशता आदिका तो कहना ही क्या? क्योंकि प्रत्यक्ष आदिसे स्फुरद्‍रूपप्रपंच ही सर्वत्र दिखायी पड़ रहा है। मायाके सम्बन्धमें श्रीमद्भागवतमें बतलाया गया कि अर्थके बिना प्रतीत होती हुई भी जो आत्मामें प्रतीत नहीं होती, उसे ही आत्माकी माया समझना चाहिये—‘ऋतेऽर्थं यत्प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि। तद् विद्यादात्मनो मायाम्’ (श्रीमद्भा० २।९।३३)। अनधिगत अबाधित अर्थकी ज्ञप्तिस्वरूप प्रमाकी उत्पत्तिके लिये उसके कारणभूत प्रमाणोंकी अपेक्षा हुआ करती है; क्योंकि प्रमाणोंके अधीन ही प्रमेयकी सिद्धि हुआ करती है। प्रत्यक्षमात्र प्रमाण माननेवाले चार्वाक और तदनुयायी अनात्माभिमुख साम्यवादी, समाजवादी आदि आधुनिक लोग आम्रसम्बन्धी बीजसे अंकुर, नाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पल्लव, पुष्प, फल और रसरूप परिणामकी तरह मस्तिष्क, मन, बुद्धि आदिकी तरह आत्माका भी परिणाम मानते हुए पृथिव्यादि चार भूतोंके अतिरिक्त तत्त्व तथा अर्थ, कामके अतिरिक्त पुरुषार्थ और प्रत्यक्षातिरिक्त प्रमाण नहीं मानते। इनमें कोई देहको, कोई चक्षुरादि इन्द्रियों और कोई प्राणको ही आत्मा मानते हैं। प्रतिपत्ति (बोध)-का फल संशय, विपर्यय तथा अज्ञानकी निवृत्ति है। प्रतिपादयिता (वक्ता) प्रतिपित्सित (ज्ञातव्य) पदार्थकी प्रतिपिपादयिषा (प्रतिपादनेच्छा)-से वाणीका प्रयोग किया करता है। अनुमान एवं वाक्यको प्रमाण न माननेवाले लोग परस्परके संशय, भ्रान्ति, अज्ञानको किस तरह जान सकेंगे, किस तरह उन्हें दूर करनेका प्रयत्न कर सकेंगे और किस तरह परप्रतिपित्सितको जाने बिना प्रेक्षावान् व्यक्ति अप्रतिपित्सित अर्थका उपदेश कर सकेंगे? अत: अनुमान प्रमाण माने बिना ‘अनुमान प्रमाण नहीं है’ यह वचन-प्रयोग भी अनुपपन्न है। साथ ही परप्रत्यक्षमें अनधिगत अबाधित तथा अनुमानमें उसका अभाव भी बिना अनुमान-प्रमाण माने कैसे जाना जा सकता है? पशु-पक्षी भी मोदकादिका ग्रास हाथमें लिये हुए पुरुषोंको देखकर उधर प्रवृत्त होते तथा दण्डादि देखकर अनिष्टकारणताका अनुमानकर उस ओरसे निवृत्त होते देखे जाते हैं। आत्मा इदंकारके आस्पद देह-इन्द्रिय, मन और विषयोंसे पृथक् ‘मैं’ इस तरह असंदिग्ध अविपर्यस्तरूपसे अपरोक्ष अनुभवसिद्ध ही है; क्योंकि ‘मैं हूँ या नहीं हूँ’ अथवा ‘नहीं हूँ’ ऐसे संशयका अनुभव नहीं होता। ‘मैं स्थूल हूँ, कृश हूँ, बोलता हूँ, जाता हूँ’, इत्यादि देहधर्मका सामानाधिकरण्य देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि अहंप्रत्यय देहविषयक होता है। यदि ऐसा ही मान लें तो बाल्य, यौवनादिका भेद होनेपर भी अहंप्रत्यालम्बनकी ‘मैं वही हूँ, जो बाल्य-यौवन आदिमें था’ ऐसी प्रत्यभिज्ञा न हो सकेगी, किंतु वैसी प्रत्यभिज्ञा होती है। अत: व्यावृत्त अनेक पुष्पोंमें अनुवृत्त एक सूत्रके समान बाल-युवा आदि अनेक व्यावृत्त शरीरोंमें अनुवृत्त एक अहंकारास्पद उन शरीरादिसे भिन्न आत्मवस्तु मानना अनिवार्य है। समस्त-व्यस्त बाह्य पृथ्वी आदि भूतोंमें चैतन्यका उपलम्भ न होनेके कारण चैतन्यको भूतोंका धर्म भी नहीं कहा जा सकता। यदि कहा जाय कि ‘मद्याकारसे परिणत यवादिकणोंके अनुभूयमान मादक शक्तिके समान देहाकारसे परिणत भूतोंका ही धर्म चैतन्य शक्ति है’ तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि देहके रहनेपर भी मृतावस्थामें चैतन्यका उपलम्भ नहीं होता। संयोगादिके समान जबतक देह रहता है, तबतक चैतन्य रहता है—यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि चैतन्यको तब रूपादिके समान विशेष गुण मानना पड़ेगा और ऐसा माननेपर यावद्देहभावित्वेन चैतन्यकी उपपत्ति संगत नहीं हो सकती; क्योंकि भूत जैसे रूपरहित नहीं होता; वैसे ही देहको कभी चैतन्यरहित होकर नहीं रहना चाहिये, यही बात इच्छादिके सम्बन्धमें समझ लेनी चाहिये। मृतावस्थामें प्राणचेष्टादि नहीं दिखायी पड़ते, अत: यह भी मान लेना चाहिये कि उक्त देहधर्म आत्माके अधिष्ठानसे ही व्यक्त होते हैं। रूप आदि देहसम्बन्धी धर्मोंके अन्य व्यक्तिद्वारा प्रत्यक्ष होनेपर भी ज्ञान, इच्छा आदि आत्मधर्म अन्यसे प्रत्यक्ष नहीं किये जाते, अपितु वे स्वप्रत्यक्ष ही हुआ करते हैं। यदि समुदायभूत अवयवीको चेतयिता कहें तो एक भी अवयवके कट जानेपर अवयवी-समुदाय ही कट जायगा और इस तरह प्रेतत्वापत्ति होगी। इसे इष्टापत्ति भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि अवयव कट जानेपर भी अवयवीमें चैतन्य उपलब्ध होता है। यदि प्रत्येक अवयवको चेतयिता मानें तो बहुतोंका अन्योन्याभिमुख होकर रहना सदा सम्भव नहीं है। उन परस्पराभिमुखोंका स्वातन्त्र्य मानने या परस्पर प्रतिबद्ध सामर्थ्यवालोंका स्वातन्त्र्य अथवा विरुद्धदिशाकी ओर क्रिया करनेमें अभिमुखका स्वातन्त्र्य मानने किंवा परस्परका स्वातन्त्र्य परस्परसे प्रतिबद्ध माननेपर या तो शरीर नष्ट हो जायगा या निष्क्रिय हो जायगा। देहके रहनेपर जीवित दशामें ज्ञान, इच्छा आदिके रहनेपर भी देहाभावदशामें उनकी सत्ता नहीं रहती, ऐसा नहीं कहा जा सकता। उनकी अनुपलब्धि होनेसे उनके असत्त्वका निर्णय नहीं किया जा सकता; क्योंकि विद्यमान रहनेपर भी व्यंजकके अभावमें उपलब्धि न होना सम्भव है। विभु (व्यापक) होनेके कारण जाति सर्वत्र विद्यमान रहनेपर भी व्यंजक व्यक्तिके अभावमें जैसे उसका उपलम्भ नहीं हुआ करता, वैसे ही व्यंजक देहके न रहनेपर चैतन्यका अनुपलम्भ उपपन्न हो सकता है अथवा जैसे काष्ठ आदि अग्निके व्यंजक हैं, अत: उनके रहनेपर ही अग्निकी अभिव्यक्ति होती है, तथापि यह नहीं कहा जा सकता है कि काष्ठके अभावमें अग्निका अभाव होता है अथवा काष्ठ तथा अग्निका धर्म-धर्मिभाव है। धर्म-धर्मिभावका निर्णय अन्वय-व्यतिरेक—दोनोंसे होता है, केवल अन्वयसे नहीं। यदि केवल अन्वयसे धर्म-धर्मिभावकी कल्पना करें, तो सबको आकाशका धर्म मानना पड़ेगा। यहाँ व्यतिरेक संदिग्ध है। देहान्तरसंचारसे आत्मामें उसके धर्मका अनुवर्तन सम्भव है, अत: उसके असत्त्वका निर्णय नहीं किया जा सकता। फिर दूसरी बात यह है कि भूतचतुष्टयके अतिरिक्त ईश्वर यदि न माना जाय तो विलक्षण देह, इन्द्रिय आदिरूपसे भूतोंकी संहति कैसे संगत हो सकती है? अचेतन प्रकृति परमाणु या विद्युत्कणोंमेंसे किसीको विविधविचित्रतायुक्त विश्वका रचयिता नहीं कहा जा सकता। यदि उन्हें विश्वनिर्माता मानें तो आज भी वायुयान, बम आदि विविध वस्तुओंको भी अचेतननिर्मित मान लेना पड़ेगा। अदृष्ट या स्वभावको भी विश्वरचयिता नहीं कहा जा सकता; क्योंकि केवल प्रत्यक्षप्रमाणसे उनकी सिद्धि ही नहीं की जा सकती। यदि कार्यवैचित्र्यकी अन्यथा-अनुपपत्तिसे कारणवैचित्र्यकी कल्पना की जाय, तब तो कर्मवैचित्र्य और अकृताभ्यागम-कृतविप्रणाश आदिसे नित्य, सर्वनियामक आत्मा भी मान ही लेना होगा। चार्वाकलोग भूतचतुष्टयकी अपेक्षा और किसी तत्त्वका अस्तित्व नहीं मानते, अतएव रूपादि या चैतन्यादिको अन्यका परिणाम-भेद नहीं कहा जा सकता, अपितु उन्हें भूतपरिणामभेद ही कहना पड़ेगा। तथा च भूतधर्म रूपादि जड होनेके कारण जैसे विषय हैं, विषयी नहीं, वैसे ही भूतधर्म जड होनेके कारण चैतन्यको भी विषय मानना पड़ेगा, विषयी नहीं। यदि कहा जाय कि भूतधर्म होनेपर भी किन्हींका विषयित्व भी मान्य है, तो यह उचित नहीं; क्योंकि अपने-आपमें वृत्तिरूप विरोध होगा, जैसा कि अभी कहा गया। लोकायतिक पृथिव्यादि चार भूतोंके अतिरिक्त अन्य किसी तत्त्वका अस्तित्व अंगीकार नहीं करते। भूत-भौतिक पदार्थोंके अनुभवको यदि चैतन्य वस्तु कहा जाय, तो वे विषय हैं, अत: अपने-आपमें क्रियाविरोधके कारण चैतन्यको उनका धर्म कहना उचित नहीं है। अग्नि दाहक होनेपर भी अपने-आपको नहीं जला सकता, सुशिक्षित भी नट अपने स्कन्धपर नहीं चढ़ सकता। इसी प्रकार चैतन्य यदि भूत-भौतिकधर्म हो, तो वह भूत-भौतिकोंको विषय नहीं कर सकता। रूप आदि अपने और दूसरेके रूपको विषय नहीं कर सकते, किंतु बाह्य, आध्यात्मिक भूत-भौतिकोंको चैतन्य विषय करता है। यदि भूतादिविषयक चैतन्यरूप उपलब्धिका अस्तित्व मान लिया जाता है, तो भूतव्यतिरिक्त पदार्थका अस्तित्व भी मान लेना पड़ेगा। तथा च उपलब्धिस्वरूप आत्मा देहादिसे अतिरिक्त सिद्ध हो जाता है। ‘मैंने उसे देखा था’ जिस प्रकार अवस्थान्तरमें भी उपलब्धारूपसे प्रत्यभिज्ञान होने और स्मृति आदि उत्पन्न होनेके कारण उस स्वरूपात्माकी एकरूपता स्पष्ट है, अत: उसको नित्य माननेमें कोई आपत्ति नहीं। इस प्रकार दीपक आदिके रहनेपर यद्यपि उपलब्धि होती है, उसके अभावमें नहीं, तथापि उपलब्धिको जैसे दीपकका धर्म नहीं कहा जाता, वैसे ही देहके रहनेपर उपलब्धि होती है, उसके न रहनेपर नहीं, फिर भी उपलब्धिको देहका धर्म नहीं कहा जा सकता। दीपककी तरह केवल उपकरणमात्र मान लेनेसे भी देहका उपयोग उपपन्न हो जाता है। स्वप्नावस्थामें इस देहके निश्चेष्ट पड़े रहनेपर भी अनेक प्रकारकी उपलब्धियोंका होना अनुभव सिद्ध है, अत: यह स्पष्ट है कि चैतन्य भूत-भौतिकोंका धर्म नहीं है। ‘एतेभ्यो भूतेभ्य: समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति’ इत्यादिके अनुसार यह नहीं कहा जा सकता कि देहादिसे व्यतिरिक्त होता हुआ भी आत्मा उन देहादिकोंके साथ ही उत्पन्न होता है और उनके साथ ही विनष्ट हो जाता है। जन्मान्तरीय अदृष्टको माने बिना न तो देहादिका वैलक्षण्य उपपन्न हो सकता है और न प्राक्तन संस्कारोंके अभावमें शिशुकी स्तन्यपानमें प्रवृत्ति ही बन सकती है। अत: देहादिसे अतिरिक्त नित्य आत्मा मानना अनिवार्य है। इन्द्रियोंको आत्मा माननेवालोंके पक्षमें भी बहुत चेतन माननेवालोंके पक्षमें बतलाये दोष उपस्थित होते हैं। ‘मैं देखता हूँ, सुनता हूँ, स्वाद लेता हूँ, सूँघता हूँ, स्पर्श करता हूँ, इच्छा करता हूँ’ इत्यादि रूपसे एक आत्मविषयक अनुभव होनेके कारण देखने, सुनने, सूँघने, स्पर्श आदि करनेवालोंको परस्पर भिन्न नहीं कहा जा सकता। यदि भिन्न कहें, तो उनका विरोध ध्रुव है। अत: मन तथा इन्द्रियोंकी अन्तर्बाह्यकरणता ही है, कर्तृत्व नहीं; क्योंकि ‘कुठारसे छेदन करता हूँ, घोड़ेसे लाँघता हूँ’ इत्यादिके समान ‘आँखसे देखता हूँ, कानसे सुनता हूँ’ इत्यादि व्यवहार दृष्टिगोचर होते हैं। चक्षु, श्रोत्र आदि इन्द्रिय और मन, बुद्धि, अतीन्द्रिय होनेके कारण प्रत्यक्ष नहीं है। उपलभ्यमान नेत्र आदिको इन्द्रिय नहीं कहा जा सकता; क्योंकि वे स्वयं इन्द्रिय नहीं, अपितु उनके गोलक हैं। इसलिये गोलकका उपघात न होनेपर भी इन्द्रियका उपघात होनेसे विषयका ग्रहण नहीं होता। दहनकर्ता होता हुआ भी अग्नि जैसे अपना दहन नहीं करता, अपितु काष्ठ आदिका ही दहन करता है, वैसे ही इन्द्रियाँ भी स्ववृत्तिविरोधके कारण अपने अवगममें अक्षम होती हैं। देखना, सुनना, सूँघना, चलना, सोचना, जानना आदि क्रिया होनेसे करणपूर्वक होते हैं, इत्यादि अनुमानसे इन इन्द्रियोंका ज्ञान होता है। युगपद् ज्ञानानुत्पत्तिरूप लिंगसे मन आदि भी उसी प्रकार अनुमानगम्य हैं, अत: बिना अनुमान-प्रमाण माने कैसे इन्द्रियादिकी सिद्धि हो सकती है और इन्द्रियादिकी सिद्धि हुए बिना इन्द्रियात्मवाद कैसे सिद्ध हो सकता है? बल्कि अचेतनोंकी प्रवृत्ति चेतनाधिष्ठित हुआ करती है, जैसे रथ आदिकी प्रवृत्ति अश्व, सारथी आदि चेतनोंसे अधिष्ठित होती है। इस वैज्ञानिकयुगमें भी स्वयंचालित विभिन्न यन्त्रोंमें संयोजक और प्रथमप्रवर्तक चेतन ही अपेक्षित हुआ करता है। इसे चाहे स्वभाव कहा जाय, किंतु इससे कुछ अन्तर नहीं पड़ता; क्योंकि स्वभावको यदि असत् कहें तो वह कार्यकरणक्षम नहीं हो सकता। यदि सत् हो तो भी यदि वह अचेतन है तो उसकी भी वही स्थिति रहेगी। यदि स्वभाव चेतन है, तब तो नाममात्रका ही भेद हुआ। देहादिसंघात संघात होनेके कारण शय्या, प्रासाद आदिके समान परार्थ होता है। शय्या आदि पदार्थ जैसे अपनेसे विलक्षण किसी देवदत्त आदिके लिये होते हैं, वैसे ही देहादिसंघात भी अपनेसे विलक्षण आत्माके लिये ही हैं। देहादिसंघात जबकि अचेतन अनेकात्मक, अनित्य, दु:खरूप और अपूर्ण होते हैं, तब उनसे विलक्षण चेतन एक, असंहत, नित्य, पूर्ण, आनन्दरूप आत्मा सिद्ध होता है। साथ ही अचेतनोंकी प्रवृत्ति अचेतनके लिये नहीं, अपितु इष्टप्राप्ति तथा अनिष्टपरिहारके इच्छुक किसी चेतनके लिये ही होती है, यह मानना पड़ेगा। किसी भी अचेतन पदार्थमें न तो इष्टप्राप्ति तथा अनिष्ट-परिहारकी इच्छा दिखायी पड़ती है, न इष्ट-अनिष्ट, सुख-दु:खकी प्राप्ति और परिहार ही। वैनाशिक बौद्ध (शून्यवादी) तीन प्रकारके होते हैं—(१) सर्वसत्तावादी, (२) विज्ञानमात्र सत्तावादी (३) और सर्वशून्यवादी। इनमें सर्वसत्तावादियोंके सिद्धान्तमें खरस्वभाव पार्थिव परमाणुओंका संघात पृथिवी, स्नेहस्वभाव जलीय परमाणुओंका संघात जल, उष्णस्वभाव परमाणुओंका संघात तेज (अग्नि) और गतिस्वभाव वायवीय परमाणुओंका संघात वायु ये चार बाह्य पदार्थ हैं। इन्हें भूत भौतिकशब्दसे कहा जाता है। इसी प्रकार रूप, विज्ञान, वेदना, संज्ञा और संस्कार ये पंचस्कन्ध अन्तर पदार्थ हैं। विषयसहित इन्द्रियाँ रूपस्कन्ध, विषयोंका ज्ञान विज्ञानस्कन्ध, सुख-दु:खानुभव वेदनास्कन्ध, सविकल्पज्ञान संज्ञास्कन्ध और राग-द्वेषादि क्लेश संस्कारस्कन्ध हैं। इन्हें चित्त-चैत्तिक कहा जाता है। इन्हीं पाँच स्कन्धोंका संघात ही आत्मा है। यद्यपि बौद्धोंका परम तात्पर्य शून्यवादमें ही है, तथापि हीन, मध्यम और उच्च आदि बुद्धिभेदसे इनके तीन भेद हो जाते हैं। यह बात बोधिचित्तविवरणमें स्पष्ट की गयी है— देशना लोकनाथानां सत्त्वाशयवशानुगा। भिद्यते बहुधा लोके उपायैर्विविधै: पुन:॥ १॥ गम्भीरोत्तानभेदेन क्वचिच्चोभयलक्षणा। भिन्नापि देशनाभिन्ना शून्यताद्वयलक्षणा॥ २॥ बुद्धोंके उपदेश शिष्योंके अभिप्रायके ही अनुसार होते हैं। जैसे-जैसे शिष्य बढ़ते हैं, व्याख्या भी बढ़ती जाती है। कहीं अत्यन्त गम्भीर, कहीं उत्तान इस तरहका उपदेश होता है, परंतु सबका तात्पर्य सर्वशून्यमें ही होता है। इस तरह बाह्यभूत भौतिक और आध्यात्मिक चित्तचैत्तिक समुदाय ही वैभाषिक और सौत्रान्तिक बौद्धोंके मतमें आत्मा है। बाह्यार्थको केवल अनुमेय मानकर प्रत्यक्ष न माननेवाले बौद्ध—‘सौत्रान्तिक’ कहे जाते हैं। किंतु आन्तर विज्ञानके समान ही बाह्यार्थको भी प्रत्यक्ष सिद्ध माननेवाले बौद्धको वैभाषिक कहते हैं। इससे अतिरिक्त नित्यचेतन आत्मा नहीं है। विचार करनेपर इन भूतभौतिकों चित्तचैत्तिकोंका समुदाय नहीं बन सकता। कारण इनमें समुदाय अचेतन है। चेतन (ज्ञानवान्) कुलालादि ही मृत्तिका, चक्र, चीवर आदि कारण कलाप एकत्रित कर समुदायी घटका निर्माता देखा गया है। मृत्तिका, चक्र, चीवर आदिके संचालक चेतन कुलालादिके न रहनेपर अचेतन मृत्तिका-दण्डादि स्वयं व्यापारवान् होकर घटकी रचना नहीं कर सकते। चेतनके न रहनेपर अचेतन तुरी-वेमा आदि कपड़ा स्वयं नहीं बुन लेते। इसलिये कार्योत्पादन क्षमतावाली सामग्री एकत्रित होनेपर ही कार्यकी उत्पत्ति होती है। कार्योत्पादनक्षम सामग्रीका एकत्रीकरण चेतन विचाराधीन है। यदि कहा जाय कि चित्त ही चेतन है और इन्द्रियादि विषय सम्पर्क होनेपर स्वयं प्रदीप्त होकर यथायोग्य आवश्यकतानुसार कारण-चक्रको प्रकाशित करता हुआ अचेतन करणोंद्वारा कार्य सम्पादन करता है तो यह भी ठीक नहीं, कारण-समुदाय सिद्धिके बाद ही चित्तका अभिज्वलन सिद्ध होगा और चित्त अभिज्वलनके बाद समुदाय-सिद्धि होगी। इस प्रकार यहाँ इतरेतराश्रय दोष दुष्परिहर हो जायगा। पहले जन्मकी चिन्ताभिदीप्ति उत्तरकालिक समुदायका संघटन करती है—यह भी कहना ठीक नहीं; क्योंकि संघटनके समयसे चित्तकी दीप्ति बहुत पहले ही बीत चुकी, अत: वह उत्तरकालिक संघटनकी क्षमता नहीं रख सकती। कारण विन्यास-विशेषका जानकार ही कर्ता होता है। अन्वय-व्यतिरेकके बिना विन्यास-विशेष जाना नहीं जा सकता। अनवस्थायी क्षणिक चेतन अन्वय-व्यतिरेकका विज्ञाता हो नहीं सकता। भूतभौतिक-चित्त-चैत्तिक समुदायसे अतिरिक्त स्थिर संहन्ता चेतन इस सिद्धान्तमें मान्य नहीं है। यदि माना जाय कि परस्परानपेक्ष असंनिहित कारण चेतन संनिधापयिताके बिना ही कार्योत्पादन करेंगे, तो फिर सदा ही कार्यप्रसक्ति बनी रहेगी, परंतु ऐसा है नहीं। यदि कहा जाय कि अलंकारास्पद आलयविज्ञान ही पूर्वापरका अनुसन्धान करनेवाला है, वही प्रतिष्ठाता (संनिहित करनेवाला) हो जायगा, तो यह भी ठीक नहीं। कारण यदि आलय-विज्ञान एक और नित्य माना जाय तो वह नामान्तरसे आत्मा ही सिद्ध होगा और यदि वह क्षणिक विज्ञान रहा तो पूर्वोक्त दोष तदवस्थ रहेंगे। यदि कहें कि आलय-विज्ञान नहीं, किंतु उसका संतान (परम्परा) कारणोंका सन्निधापयिता होगा, तो वह भी उपेक्षणीय है; क्योंकि संतान यदि विज्ञानसे अभिन्न है तो क्षणिक होनेके कारण पूर्वोक्त दोष दुरुद्धर ही है, यदि भिन्न है तो नित्य-विज्ञान आत्मा ही सिद्ध हो गया तथा सभी पदार्थोंकी क्षणिकता माननेके कारण समुदायियोंकी प्रवृत्ति बन नहीं सकती। प्रवृत्तिके प्रथम क्षणमें तथा प्रवृत्तिक्षणमें समुदायी रहें, तभी उनकी प्रवृत्ति हो सकती है। क्षणिक होनेके कारण वे दो क्षण टिक नहीं सकते। भिन्नकालमें उनकी स्थिति मानी जाय तो आधाराधेयभाव नहीं बन सकता। इस तरह समुदायकी सिद्धि नहीं हो सकती और समुदायसिद्धि न होनेपर तदाश्रित लोकयात्रा भी न बन सकेगी। इन्हीं दुरुद्धर दोषोंके कारण आजकल बौद्धलोग एक नित्य कूटस्थ आत्मा माननेकी बात करने लगे हैं तथा क्षणिकता अनित्यताको ही मान लेते हैं। फिर भी बौद्धोंका कहना है कि यद्यपि बौद्धमतमें कोई स्थिरभोक्ता या प्रशासिता चेतन सामग्री संघटन करनेवाला मान्य नहीं है, फिर भी अविद्यादि ही आपसमें एक-दूसरेके कारण होते हैं, अत: लोकयात्रा बन जाती है। लोकयात्रा उपपन्न हो जानेपर फिर और कुछ भी अपेक्षित नहीं है। यहाँ संक्षेपमें बौद्धप्रक्रिया समझ लेनी आवश्यक है, बुद्धने प्रतीत्य-समुत्पादका वर्णन किया है। प्रतीत्य-समुत्पादके सूचक बुद्धसूत्र हैं—‘उप्पादावा तथागतानम्, अनुप्पादावा तथागतानं ठिताव सा धातु धम्मद्वितता धम्मनियामकता इदप्पच्चयता इति रेवो भिक्खवे परिच्च समुप्पादोति संयुत’ (कल्पतरु २।१।२६)। भामतीकार, कल्पतरुकार आदिकोंने इन सूत्रोंकी स्पष्ट व्याख्या की है। सूत्रोंका संस्कृतरूप यह है— ‘उत्पादाद्वा तथागतानामनुत्पादाद्वा स्थितैवैषा धर्माणां धर्मता। धर्मस्थितिता धर्मनियामकता प्रतीत्य समुत्पादानुलोमता॥’ सार यह है कि प्रत्येक कार्यमें दो प्रकारसे कारण-सम्बन्ध होता है, हेतूपनिबन्ध एवं प्रत्ययोपनिबन्ध। प्रथम एकैककारण सम्बन्ध होता है, दूसरा कारणसमुदाय सम्बन्ध होता है। एक बीजरूपी हेतुका अंकुररूपी कार्यसे सम्बन्ध हेतूपनिबन्ध है। पृथिवी, जल, तेज, वायु आदि अनेक कारणोंका अंकुरसे सम्बन्ध प्रत्ययोपनिबन्ध है। ‘हेतुं हेतुं प्रत्यन्ते इति प्रत्यया हेत्वन्तराणि’ मुख्य हेतुके प्रति सम्मिलित होनेवाले सहकारि कारण समूह प्रत्यय है ‘प्रत्यया: सन्त्यस्मिन्निति प्रत्यय:’ अनेक प्रत्यय (कारण) जिस समवायमें हों, वह प्रत्यय हेतुसमुदायका बोधक होता है। ‘इदं प्रत्ययफलम्—इदं कार्यं प्रत्ययस्य कारणसमुदायमात्रस्य फलं न चेतनस्य कस्यचिदित्यर्थ:।’ अर्थात् कार्य इतरसहकारियोंसे सम्मिलित मुख्य हेतुरूप प्रत्ययका फल है। सारांश यह है कि अनेक सहकारी कारणोंसे युक्त मुख्य हेतु ही कार्यमात्रका कारण है। कोई चेतन या ईश्वर कारण नहीं है। हेतूपनिबन्धका सूचक है—‘उत्पादाद्वा तथागतानामित्यादि।’ ‘तथागतानां बुद्धानां मते धर्माणां कार्याणां कारणानाञ्च या धर्मता कार्यकारणभावरूपा एषा उत्पादाद्वा अनुत्पादाद्वा स्थिता धत्ते इति धर्म: कारणम्, ध्रियते धर्म: कार्यं यस्मिन्सति यदुत्पद्यते असति च नोत्पद्यते तत्तस्य कारणं कार्यञ्च न क्वचित्कार्यसिद्धये चेतनोऽपेक्ष्यते।’ अर्थात् बुद्धोंके मतमें कार्य एवं कारणोंकी कार्यकारणभावरूप धर्मता उत्पाद एवं अनुत्पादके अन्वय-व्यतिरेकसे सिद्ध है। जिसके न रहनेपर जो नहीं उत्पन्न होता है, वही कारण और कार्य है। जो उत्पन्न होता है, वह कार्य है, जिसके रहनेपर ही उत्पन्न होता है, वही कारण है। धारण करनेवाला धर्म कारण है, ध्रियमाण धर्म कार्य है। इस प्रकार यहाँ उत्पादाद्वा अनुत्पादाद्वा इन पदोंका अन्वय-व्यतिरेक अर्थ हुआ। धर्मस्थितिता कार्यता है; क्योंकि कार्यरूप धर्मकी ही कारणको अतिक्रमण किये बिना काल विशेषमें स्थिति होती है। स्थिति शब्दसे स्वार्थमें ही तल प्रत्यय होनेसे स्थिति अर्थमें स्थितिताका प्रयोग है। धर्मनियामकता कारणता है। धर्म अर्थात् कारण कार्यके प्रति नियामक है। यदि कहा जाय कि इस प्रकारका कार्यकारणभाव बिना चेतनके नहीं हो सकता है, तो इसका समाधान है कि ‘प्रतीत्य समुत्पादानुलोकता कारणे सति तत्प्रतीत्य प्राप्य समुत्पादानुलोमता प्रतीत्य समुत्पादानुसारिता या सैव धर्मता सा चोत्पादा सा नु व्यादात्मा धर्माणां स्थिता। न चेतन: कश्चिदुपलभ्यते।’ अर्थात् कारणके रहनेपर कारणको प्राप्त करके कार्य समुत्पादका अनुसरण करनेवाली धर्मता होती है। अन्वय-व्यतिरेकानुसारिणी कारण एवं कार्यमें स्थित है। यह प्रतीत्य समुत्पाद दो कारणोंसे सिद्ध होता है। हेतूपनिबन्धसे तथा प्रत्ययोपनिबन्धसे। एक मुख्य कारणसे सम्बन्धित हेतूपनिबन्ध होता है, अनेक सहकारी कारणोंसे सम्बन्धित प्रत्ययसमवाय सम्बन्धित प्रत्ययोपनिबन्ध है। उनके भी दो भेद हैं। (१) बाह्य और (२) आध्यात्मिक। (१) बाह्य—बीजसे अंकुर, अंकुरसे पत्र, पत्रसे काण्ड, काण्डसे नाल, नालसे गर्भ, गर्भसे शूक, शूकसे पुष्प और पुष्पसे फल होता है। इसमें बीजको ज्ञान नहीं होता कि मैं अंकुरको उत्पन्न कर रहा हूँ। इसी तरह अंकुर पत्र और पुष्प आदिको भी ज्ञान नहीं होता कि मैं अपनेसे पश्चात् उत्पन्न होनेवालोंको उत्पन्न कर रहा हूँ। इसी प्रकार अंकुर-पुष्प-फलादिको भी यह ज्ञान नहीं होता कि मुझे बीजने उत्पन्न किया है। यह बाह्य हेतूपनिबन्धका उदाहरण है। छ: धातुओंके समवायसे ही बीजसे अंकुर हो सकता है, अन्यथा नहीं। इसमें पृथिवी धातु बीजका संग्रह करती है। जिससे अंकुर कठिन हो जाता है, जलधातु स्नेह एवं तेजधातु परिपाक करता है। वायुधातु बीजसे अंकुरको ऊपर फेंकता है और आकाश धातु बीजका अवयव अलग करता है। ऋतु भी बीजका परिपाक करता है। अविकल छ: धातुओंके समुदायसे ही बीज अंकुररूपमें परिणत होता है। इनमें न तो पृथिवी धातुको यह ज्ञान रहता है कि हमने बीजका संग्रह-कृत्य किया है और न तो ऋतुको ही ज्ञान होता है कि हमने बीजका परिणाम किया है। साथ ही अंकुरको भी यह ज्ञान नहीं होता कि मुझे इन धातुओंने बनाया है। यह बाह्य प्रत्ययोपनिबन्धका उदाहरण है। (२) आध्यात्मिक—इसी तरह अविद्यासे संस्कार, संस्कारसे जन्म तथा जन्मसे जरा और मृत्यु होती है। अविद्याको ज्ञान नहीं होता कि मैंने संस्कारको बनाया है और न संस्कारको ही ज्ञान होता है कि मुझे अविद्याने बनाया है। यह आध्यात्मिक हेतूपनिबन्धका उदाहरण है। इसी तरह पृथिवीसे तेज, वायु, आकाश और विज्ञानधातुओंके समवायसे शरीर बनता है। पृथिवी धातुसे शरीरकी कठिनता और जलसे शरीरका स्नेह होता है। तेजधातु भुक्त-पीतका परिपाक करता है, वायुधातु श्वास-प्रश्वासादि करता है, आकाश शरीरके भीतर अवकाश प्रदान करता है। विज्ञानधातु पंचज्ञानेन्द्रिययुक्त मनोविज्ञानको उत्पन्न करता है। यह आध्यात्मिक प्रत्ययोपनिबन्धका उदाहरण है। इन छ: धातुओंकी जो पिण्ड-संज्ञा, पुद‍्गल-संज्ञा (परमाणुसंज्ञा) मनुष्य-संज्ञा, अहंकार-संज्ञा, ममकार-संज्ञा यह अविद्या है। यही अविद्या संसारका (अनर्थ सामग्रीका) मूल कारण है। अविद्याजन्य राग-द्वेष-मोहात्मक संस्कार विषयोंमें प्रवृत्ति कराते हैं। वस्तु-विषयज्ञान ही विज्ञान है। इन सबको एक प्रकारसे नामरूप कह सकते हैं। शरीरकी कलल बुद‍्बुद आदि अवस्था और नामरूप मिश्रित इन्द्रियाँ षडायतन कही जाती हैं। नामरूप इन्द्रियोंका सम्बन्ध ही स्पर्श है। स्पर्शसे सुख-दु:खादि वेदना होती है। वेदनाके अनन्तर मुझे सुखप्राप्तिके लिये यह कार्य फिर करना चाहिये, ऐसा निश्चय तृष्णा है। उसमें वाणी शरीरकी चेष्टा है, उसका नाम उपादान है। उसमें धर्माधर्म होते हैं। उसका नाम भव है, उसीसे जन्म होता है। जन्मसे ही जरा-मृत्यु होती है, उससे अन्तर्दाह शोक होता है, शोकसे विलाप, दु:ख और दौर्मनस्य होता है। यह परस्परहेतुक अविद्यादि सार्वजनिक अनुभवसिद्ध हैं। इनका अपलाप नहीं किया जा सकता। ये जन्मादिहेतुक अविद्यादि और अविद्यादिहेतुक जन्मादि चक्र घटीयन्त्रके समान निरन्तर चलता रहता है तथा यह सार्वजनिक अनुभवसिद्ध है। अत: इनका अपलाप भी नहीं हो सकता; क्योंकि इनसे संघातका अर्थत: आक्षेप हो जायगा। इस तरह बौद्धमतके अनुसार कोई अनुपपत्ति नहीं, परंतु बौद्धोंका यह कथन भी ठीक नहीं, कारण प्रत्ययोपनिबन्धमें नाना कारणोंका समवधान आवश्यक है। बिना किसी चेतनके अनेक कारणोंका एकत्र होना नहीं बन सकता। यदि कहा जाय अन्त्यक्षणप्राप्त क्षित्यादि अंकुरका उत्पादन करते हैं, उनका उपसर्पण स्वभाव है, इसलिये समवधान भी हो जायगा तो फिर किसानको कृषि करनेकी क्या आवश्यकता है? भण्डारमें रखे बीज अंकुरित हो जायँगे और सारा कार्य बिना चेतनका ही हो जायगा, किंतु ऐसा होता नहीं। इसलिये बिना कर्ताके संघातका बनना असम्भव है। जो कहते हैं कि अविद्यासे संघातका अर्थात् आक्षेप हो जायगा, इसका क्या तात्पर्य है? यदि यह तात्पर्य है कि अविद्यादि बिना संघात टिक नहीं सकते—इसलिये उन्हें संघातकी अपेक्षा है; फिर तो संघातका निमित्त बतलाना चाहिये। यदि यह अभिप्राय हो कि अविद्यादि ही संघातके निमित्त हो जायँगे तो संघातके ही सहारे टिकनेवाले संघातके निमित कैसे होंगे। यदि ऐसा माना जाय कि संसारमें प्रवाहरूपसे संघात चले आ रहे हैं और उनके सहारे ही अविद्यादि रहते हैं, तो फिर यह प्रश्न होगा कि एक संघातसे जो दूसरा संघात उत्पन्न होता है, वह नियमत: उसके सदृश ही होता है अथवा अनियमित विसदृश? यदि नियमत: सदृश होता है और मनुष्यपुद‍्गल (मनुष्यपरमाणु) कभी देवयोनि या तिर्यग्योनि नहीं बन सकती, यदि नियम नहीं है तो मनुष्यपुद‍्गल कभी क्षणमें हाथी बनकर क्षणमें सिंह और क्षणमें पुन: देवता एवं क्षणमें फिर मनुष्य बन सकता है, परंतु ऐसा नहीं होता—यह दोनों ही प्रकार लोकसिद्ध न्याय-विरुद्ध है। दूसरी बात यह है कि सुगत सिद्धान्तमें संघातका भोक्ता स्थिरजीव तो कोई होता नहीं, फिर तो भोग भोगके लिये, मोक्ष मोक्षके लिये होगा। किसी दूसरे पुरुषसे प्रार्थनीय पुरुषार्थ नहीं होगा। यदि भोग और मोक्ष दूसरेसे प्रार्थनीय माने जायँ तो भोग-मोक्षकालमें उनकी स्थिति रहनी चाहिये। फिर तो क्षण-भंगुवादका सिद्धान्त ही भंग हो जायगा। अत: अविद्यामें भले ही परस्पर कार्य-कारणभाव हों, परंतु उनसे संघातसिद्धि नहीं हो सकती। सार यह है कि भले ही हेतूपनिबद्ध कार्य अन्यान्यपेक्ष केवल मुख्य हेतुके अधीन उत्पन्न होनेवाला होनेसे कथंचित् उत्पन्न हो जाय (यद्यपि चेतनाधिष्ठित ही बीजसे अंकुर उत्पन्न होता है, जैसे कुलालाधिष्ठित मृत्तिकासे घट) फिर भी पंचस्कन्धसमुदाय तो प्रत्ययोपनिबद्ध है, वह एक हेतुमात्रके अधीन उत्पन्न नहीं होता है, किंतु उसमें नाना हेतुओंका समवधान अपेक्षित होता है। चेतनके बिना नाना हेतुओंका एकत्रीकरण नहीं हो सकता। बीजसे अंकुरोत्पत्ति भी धरणी-अनिल-जलादि सहकारी सापेक्ष होनेसे प्रत्ययोपनिबद्ध ही है, अत: वह पक्ष कुक्षिमें निक्षिप्त है। इसलिये यह नहीं कहा जा सकता कि चेतनानधिष्ठित बीजसे अंकुरोत्पत्तिके समान चेतनानधिष्ठित अचेतन अविद्या आदिसे उत्तरोत्तर कार्य उत्पन्न होंगे; क्योंकि बीजसे अंकुरोत्पत्ति भी पक्षकोटिमें ही है। वहाँ भी चेतनानधिष्ठितत्व सिषाधयिषित है, वह दृष्टान्त नहीं हो सकता। कुम्भकाराधिष्ठित मृत्तिकासे घटोत्पत्ति होती है, यह दृष्टान्त निर्विवाद तथा वादि-प्रतिवादि उभयसम्मत है, परंतु चेतनानधिष्ठित बीजसे अंकुरकी उत्पत्ति तो विवादास्पद एवं संदिग्ध है। इसीलिये वह संदिग्ध साध्यवान् होनेसे पक्ष है, दृष्टान्त नहीं हो सकता। यदि पक्षको लेकर व्यभिचारका उद्भावन किया जाय तो अनुमानका उच्छेद हो जायगा। ऐसी स्थितिमें पर्वत पक्षमें ही धूमका वह्नि व्यभिचार दिखाया जा सकता है। इस तरह अधिष्ठातारूप अर्थात् अनेक कारणोंके संनिधायक रूपसे एक सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् चेतन कारणका मानना बौद्धोंके लिये अनिवार्य होगा। यद्यपि बौद्ध कहते हैं कि अनपेक्षित बीज एवं क्षित्यादि अन्त्यक्षणको प्राप्त होकर अंकुरका आरम्भ करते हैं। उपसर्पण प्रत्ययवशसे परस्पर समवधान होता है। यह नहीं कहा जा सकता कि एक ही कारणसे कार्यसिद्धि हो सकती है। यदि एक कारणसे कार्यसिद्धि हो जाय तो अन्य कारणोंकी अपेक्षा ही क्या रह जायगी। अत: करणचक्रके अनन्तर ही कार्यकी उत्पत्ति होती है। अत: एक कारण कार्योत्पत्तिका साधक नहीं। जडकारण स्वयं प्रेक्षावान् नहीं होते, अत: वे यह नहीं सोच सकते कि हममेंसे एक भी कार्य सम्पन्न कर सकता है, फिर हम सबके सन्निधानसे क्या लाभ, किंतु उपसर्पण प्रत्ययवशात् उनमें परस्पर सन्निधान उत्पन्न होता है। वे न तो असन्निहित रह सकते, न अनुत्पादक रह सकते हैं। उन अनपेक्ष कारणोंको प्राप्त करके कार्य भी न उत्पन्न होनेमें असमर्थ ही रहता है। स्वमहिमासे सब कारण कार्योंका उत्पादन करते हुए भी नाना कार्योंका उत्पादन नहीं कर सकते। एक ही कार्यकी उत्पत्तिमें उनका सामर्थ्य होता है। बीजके द्वारा अंकुरजननमें ही मृत्तिका जलादिकी सहकारिता होती है। अत: उनके द्वारा भी उस अंकुरकी ही उत्पत्ति होती है। कारणभेदसे कार्यभेद आवश्यक नहीं; क्योंकि सामग्री एक होनेसे ही कार्य एक होता है। परंतु बौद्धोंका यह कथन असंगत है; क्योंकि यदि अन्त्यक्षणप्राप्त कारण स्वयं कार्यजननमें अनपेक्ष ही रहते हैं, अर्थात् किसीकी अपेक्षा नहीं रखते हैं तो इसी क्रमसे पूर्व-पूर्वके कारण भी स्वकर्मजननमें अनपेक्ष ही रहेंगे। कुसूलमें अंकुरजननोपयोगी बीजसंताननिर्वर्तक बीजक्षण और भक्षणादि उपयोगी बीजक्षण भी है। यद्यपि इस सम्बन्धमें यह विरोधी अनुमान नहीं किया जा सकता है कि कुसूलगत विगतबीजक्षण (अर्थात् अंकुरोपजननोपयोगी बीज-संताननिर्वर्तकबीजक्षण) अनपेक्ष होकर बीजक्षणका जनन नहीं करता। कुसूलस्थ होनेके कारण ‘जैसे तत्कालोद‍्धृतभक्षित बीजक्षण अनपेक्ष होकर बीजक्षण नहीं जनन करता है,’ परंतु इस अनुमानमें अंकुरोपयोगि संतानानन्त:पातित्व उपाधि है। अनपेक्ष बीजक्षणाजनकत्वरूप साध्य तत्काल भक्षित बीजक्षणमें है। उसमें अंकुरोपयोगि सन्तानानन्त:पातित्व है, कुसूलस्थत्वरूप साधन अंकुरोपयोगि संताननिर्वर्तक बीजक्षणमें है, परंतु वहाँ उपाधि नहीं है, अपितु अंकुरोत्पादनोपयोगि संतानानन्त:पातित्व ही है। अत: कुसूलस्थताकी समानता होनेपर भी जिस कुसूलस्थ बीजको स्वकार्यक्षण परम्परासे अंकुरोत्पत्ति समर्थ बीजक्षण जनन करता है, वह बीजक्षण स्वकार्यजननमें अनपेक्ष ही रहेगा। फिर इसी तरह तदनन्तरानन्तरवर्ती सभी बीजक्षण अनपेक्ष ही रहेंगे, फिर तो कुसूलनिहित बीजोंसे ही किसान कृतकार्य हो जायगा, पुन: दु:खबहुल कृषिकार्य करनेकी उसे क्या आवश्यकता? क्योंकि जिस बीजक्षणको स्वक्षण परम्परासे अंकुर उत्पन्न करता है, उसकी क्षण-परम्परा अनपेक्ष कुसूलमें ही अंकुरादि सम्पादन कर देगी, जब यह सर्वथा निरपेक्ष है तो उसे देशकालकी अपेक्षा ही क्यों होगी? इसीलिये यह मानना आवश्यक है कि—अन्त्य मध्य या पूर्व क्षण स्वकार्यजननमें परस्पर सापेक्ष ही रहते हैं। तदर्थ कारणोंका समवधान (एकत्रीकरण) आवश्यक है। वह प्रेक्षावान् चेतन ही हो सकता है। बौद्ध कहता है कि अविद्यादिके द्वारा ही संघातका आक्षेप होगा। यहाँपर उससे प्रश्न होता है कि आक्षेपका क्या अर्थ है? उत्पादन या ज्ञापन! पहला पक्ष ठीक नहीं, क्योंकि कारण स्वयं अनुपपन्न होकर कार्यका उत्पादन नहीं कर सकता, किंतु वह स्वसामर्थ्यसे ही कार्यका जनन करता है, अत: दूसरा ही पक्ष कहना पड़ेगा कि कारण संघातका आक्षेप करते हैं अर्थात् ज्ञापन करते हैं। तथा च ज्ञापित संघातका उत्पादक तो अन्य ही होना चाहिये। ज्ञापक ही उत्पादक नहीं होता। यदि वैशेषिकोंके स्थिर पक्षमें स्थिर भोक्ता आत्माके रहनेपर भी अधिष्ठाता चेतनके बिना संघातोत्पादन नहीं हो सकता तो फिर क्षणिकवादमें संघात कैसे बन सकेगा? भोक्ताका भोग भी कभी संघातका कल्पक हो सकता है, परंतु क्षणिक विज्ञान आदि तो भोक्ता भी नहीं हो सकते। प्रत्ययोपनिबन्ध-पक्षमें अनेक कारण-उपकार्योपकारक भावसे अवस्थित होकर ही कार्यजनन करेंगे, यह बौद्धोंको मानना पड़ेगा, परंतु क्षणिक पक्षमें उपकार्योपकारकभाव हो ही नहीं सकता। कारण इस पक्षमें कोई स्थिर भाव मान्य नहीं है, जो उपकारका आस्पद बने। क्षण इतना सूक्ष्म एवं अभेद्य होता है कि क्षणिक-पदार्थमें उपकारकता या उपकार्यता कुछ बन ही नहीं सकती। यदि कालभेद मानकर उपकार्योपकारकभावका उपपादन किया जाय तो अनेक कालावस्थायी होनेसे फिर वही क्षणभंगु-भंग होगा। बौद्ध कहते हैं कि यदि प्रत्ययोपनिबन्धन प्रतीत्य समुत्पाद माना जाय तो भले ही अधिष्ठाता चेतनकी अपेक्षा हो; परंतु हेतूपनिबन्धन प्रतीत्य समुत्पादमें तो अधिष्ठाताकी कोई आवश्यकता नहीं है। तथा च अविद्यादि ही संघातके निमित्त होंगे। हेतुस्वभावसे ही कार्य-सम्पादन कर देंगे। परंतु उनका यह भी कथन विचारसह नहीं है; क्योंकि संघातके ही आधारपर सिद्ध होनेवाले अविद्यादि उसी संघातके निमित्त कैसे बन सकेंगे? इसके अतिरिक्त हेतूपनिबन्ध कार्यमें भी चेतनाधिष्ठित ही अचेतन कारण कार्योत्पादक होता है। यह घटोत्पत्तिके उदाहरणसे कहा जा चुका है। बौद्ध कहता है कि प्रत्ययोपनिबन्ध पक्षमें अस्थिरके भाव सदा संहत ही उत्पन्न होते हैं, संहत ही नष्ट होते हैं, यह नहीं कि वे इतस्तत: बिखरे रहते हैं और किसीके द्वारा संहत किये जाते हैं। इस प्रकार समवघाटकचेतन अधिष्ठाताकी कोई आवश्यकता नहीं है, परंतु उसका यह भी कथन युक्तिसह नहीं है, अत: यहाँ भी प्रश्न होता है कि—संघात संतानमें रहनेवाले धर्माधर्मरूपी संस्कार संतान सुख-दु:खको पैदा करते हुए किसी आगन्तुक हेतुकी अपेक्षा करके सुख-दु:ख पैदा करेंगे या निरपेक्ष ही। यदि आगन्तुक हेतुकी अपेक्षा बिना किये ही सुख-दु:ख पैदा करें तो सदा ही उन्हें सुख-दु:ख जनन करना चाहिये; क्योंकि जो समर्थ एवं निरपेक्ष है, उसके कार्यजननमें विलम्ब क्यों होगा। यदि किसी आगन्तुक हेतुकी अपेक्षा करेगा, तब तो आगन्तुक हेतुका उपस्थापक कोई प्रज्ञावान् चेतन मानना आवश्यक हो जायगा। साथ ही यदि संघातके सदृश ही संघातान्तर उत्पन्न होंगे तो सदा ही मनुष्य-संघात मनुष्य-संघात ही होगा। फिर कर्मानुसार अनेक योनियोंमें जन्म लेनेकी बात खण्डित होगी। यदि विसदृश संघातकी उत्पत्ति मान्य होगी तो क्षणमें हस्ती, क्षणमें अश्व होना चाहिये। इत्यादि दोष अनिवार्य होंगे। अविद्यादि उत्पत्तिके निमित्त भी नहीं बन सकते हैं; क्योंकि क्षणभंगुवादमें उत्तर क्षणके उत्पद्यमान होनेपर पूर्व-क्षण नष्ट हो जाता है। वैशेषिक तो विनाश कारणके सन्निधानसे विनाश मानता है। इसके विपरीत बौद्ध अकारण ही विनाश मानता है। इस स्थितिमें—पूर्वोत्तर क्षणका कार्यभाव कारण कथमपि नहीं बन सकता; क्योंकि विरुध्यमान या विरुद्ध पूर्वक्षण स्वयं अभावग्रस्त होगा। अत: वह उत्तर क्षणका हेतु नहीं हो सकता। कार्योत्पादके प्राक‍्कालमें कारणकी सत्ता सार्थक होती है। कार्यकालमें कारणकी सत्ताका कोई उपयोग नहीं होता; क्योंकि कार्यकालमें तो कार्य निष्पन्न ही होता है। भावभूत पूर्वक्षण उत्तर क्षणका हेतु हो तब तो क्षणद्वयसम्बन्ध होनेसे क्षणिकता ही न रहेगी। लोकमें कोई भी भाव सत्तावान् होकर पुन: व्यापृत होकर कार्य-सम्पादन करता है। इससे अनेक क्षण सम्बन्ध होनेसे स्थिरता ही सिद्ध होती है। बौद्ध कहता है कि—भाव ही उसका व्यापार है, जैसा कि कहा है कि—भूतिर्येषां क्रिया सैव कारकं सैष चोच्यते। ‘अर्थात् पदार्थोंकी जो उत्पत्ति होती है, वही उनकी क्रिया, कारक तथा कारण है, परंतु पदार्थोंमें इस प्रकारकी व्यापारवत्ता भले ही बन जाय तथापि वह कारण नहीं हो सकता; क्योंकि लोकमें देखा जाता है कि मृत्तिकाकार्य घटादि मृत्तिकासे एवं सुवर्णका कार्य कटक-कुण्डलादि सुवर्णसे समन्वित होते हैं। यदि कार्यके समय कारण न रहे तो कार्यमें मृत्तिका सुवर्णादिकी प्रतीति कैसे बन सकती है? यदि कार्य-क्षणमें कारणकी सत्ता मानी जाती है तो भी क्षणिकत्वकी हानि होगी।’ बौद्ध कहते हैं कि कार्यमें कारणका तादात्म्य नहीं होता, किंतु सादृश्य होता है, परंतु कार्यमें जब कारणके किसी रूपका अनुगम हो, तभी सादृश्य भी हो सकता है। यदि किसी अनुगमका रूप मान लिया जाय, तब तो वही अनुगत रूप ही कारण है, फिर तो उसके साथ कार्यका तादात्म्य (अभेद) मानना ही ठीक है। ऐसी स्थितिमें भी क्षणिकत्वकी हानि अपरिहार्य ही है। यदि हेतुस्वभावका कार्यमें अनुगमन होनेपर भी कार्यकारणभाव स्वीकार किया जायगा, तब सर्वत्र कार्यकारणभाव ही प्रसक्त रहेगा, फिर तन्तु-घटका भी कार्यक्षणभाव मानना पड़ेगा। बौद्धोंके सिद्धान्तमें ‘तद्भावे तद्भाव:’ आदि अन्वय-व्यतिरेकद्वारा कार्यकारण भावका नियम माना जाता है। तथा च तन्तु-घटका कार्य-कारणभाव नहीं होगा; क्योंकि उनका अन्वय-व्यतिरेक नहीं है। किंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि अन्वय-व्यतिरेक ग्रह एक क्षणमें नहीं हो सकता, उसके लिये वस्तुको अनेक क्षणस्थायी मानना पड़ेगा। यदि कार्य-कारण संतानों या सामान्योंका कार्यकारणभाव मानें और उन संतानोंको स्थायी मानें तो यह भी ठीक नहीं। कारण-व्यक्तियोंमें ही कार्य-कारणभाव होता है, संतानों या सामान्योंमें नहीं। यदि उनमें भी कार्य-कारणभाव माना जाय और उन कारणभूत संतानों या सामान्योंको स्थायी माना जाय तो भी क्षणिकत्वकी हानि हुई ही। बौद्धोंसे यह भी प्रश्न होता है कि उत्पाद और विनाश वस्तुस्वरूप ही हैं या वस्तुके अस्वान्तर अथवा वस्तुसे भिन्न वस्त्वन्तर हैं? यदि वस्तुके स्वरूप ही हैं तो वस्तु और उत्पाद-विनाश परस्पर पर्याय हो जायँगे। यह लोकविरुद्ध है। उत्पाद-विनाश और वस्तुको कोई पर्यायवाचक नहीं मानता। यदि कोई विशेषता वस्तुकी अपेक्षा उत्पादनिरोधमें है, तब तो कहना पड़ेगा कि मध्यवर्त्ति वस्तुकी उत्पाद और निरोध आदिम एवं अन्तिम अवस्था है। तब फिर आद्य, मध्य तथा अन्त्यक्षण सम्बन्धी होनेके कारण वस्तुमें स्थिरता हो जायगी, फिर क्षणिकत्व समाप्त हो जायगा। यदि उत्पाद-निरोध—अश्वमहिषके तुल्य वस्तुसे अत्यन्त भिन्न माने जायँ तो वस्तुके उत्पाद-विनाशसे रहित होनेके कारण उसकी शाश्वतता सिद्ध हो जायगी। यदि वस्तुका दर्शन उत्पाद एवं वस्तुका अदर्शन विरोध माना जाय तो भी दर्शनादर्शन तो पुरुषके धर्म होंगे, वस्तुधर्म नहीं, इस प्रकार भी वस्तु तो शाश्वत ही ठहरेगी, इस प्रकार विवेचन करनेपर क्षणिकत्ववादमें अविद्यादि हेतूपनिबन्धदृष्टिसे भी उत्पत्ति-निमित्त नहीं हो सकते। यदि बिना हेतुके ही कार्योत्पत्ति मानी जाय तो बौद्धकी प्रतिज्ञा-हानि होगी; क्योंकि— ‘चतुर्विधान् हेतून् प्रतीत्य चित्तचैत्ता उत्पद्यन्ते’ अर्थात् चतुर्विध हेतुओंको प्राप्त करके चित्त-चैत्त उत्पन्न होते हैं। नीलाभास चित्तमें नीलालम्बन-प्रत्ययसे नीलाकारता समनन्तर-प्रत्ययरूप पूर्व विज्ञानसे बोधरूपता, चक्षुरूप अधिपतिप्रत्ययसे रूपग्रहणका नियम और आलोकरूप सहकारी प्रत्ययसे स्पष्टार्थता होती है। चित्त-चैत्तोंकी उत्पत्तिमें इस प्रकार चतुर्विध हेतुओंकी प्राप्ति मानी जाती है। सुखादि चैत्तोंमें भी इसी प्रकारका कार्यकारणभाव माना जाना चाहिये, परंतु वहाँ विज्ञानसे अतिरिक्त दूसरे अन्य तीन कारणोंकी सिद्धि नहीं होती। यदि निर्हेतुक उत्पत्ति मानी जायगी, तब तो कोई प्रतिबन्ध न होनेके कारण सभी वस्तु सर्वत्र उत्पन्न होती रहेगी। बौद्ध यह भी कहते हैं कि उत्तरक्षणकी उत्पत्तितक पूर्वक्षण अवस्थित रहता है। पर ऐसा माननेसे हेतुफल दोनोंका यौगपद्य (समकालत्व) होगा। उत्पत्ति उत्पद्यमानसे अभिन्न होती है तथा च एक क्षण दूसरे क्षणतक रह गया, फिर तो क्षणिक कैसे? ऐसी स्थितिमें सभी पदार्थ संस्कृत एवं क्षणिक हैं यह बौद्धोंकी प्रतिज्ञा भंग हो जायगी। बौद्ध यह भी कहते हैं कि प्रतिसंख्यानिरोध, अप्रतिसंख्यानिरोध और आकाश—इन तीनोंसे अन्य जो कुछ भी है, वह सब बुद्धि बौद्ध है, संस्कृत है, क्षणिक है। यह तीनों अवस्तु स्वभाव (निरुपाख्य) है। बुद्धिपूर्वक भावोंका विनाश प्रतिसंख्या-निरोध तद्विपरीत अप्रतिसंख्यानिरोध होता है एवं आवरणभावमात्र आकाश है। आकाशपर विचार आगे किया जायगा। ये दोनों निरोध सर्वथा असम्भव हैं। यहाँ प्रश्न उठता है कि ये दोनों निरोध संतानके होंगे या भावरूप संतानोंके? पहला पक्ष ठीक नहीं। कारण, सभी संतानोंमें संतानियोंका अविच्छिन्न कार्यकारणभाव विद्यमान ही है, फिर संतानविच्छेद कैसे होगा? दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं; क्योंकि किसी भी भावका निरन्वय नाश नहीं होता, सभी अवस्थाओंमें प्रत्यभिज्ञाबलसे अन्वयीकारणका अविच्छेद ही रहता है। घट, कपाल, कपालिका, चूर्ण, रज आदि सर्वत्र मूल कारण मृत्तिका अन्वित ही रहती है। जहाँ अन्वयीकी पहचान नहीं होती, वहाँ भी अन्यत्रकी तरह अनुमान किया जा सकता है। अत: दोनों ही निरोध असम्भव है। अभिप्राय यह है कि भावप्रतीपा ‘वाधिका’ बुद्धि प्रतिसंख्या कहलाती है, उसके द्वारा निरोध ही प्रतिसंख्यानिरोध है। सत‍्को असत् बनानेकी बुद्धि ही भावप्रतीप बुद्धि है। तत्कृतनिरोध प्रतिसंख्यानिरोध है। उससे भिन्न निरोधको अप्रतिसंख्यानिरोध कहते हैं, परंतु यहाँ विचार यह करना है कि यह निरोध संतानका होगा या संतानीक्षणका। संताननिरोध तो हो नहीं सकता; क्योंकि हेतुफलभावसे व्यवस्थित संतानी ही उपकव्यय धर्मवाले होते हैं, संतान नहीं। अत: उसका निरोध असम्भव है। अन्तिम संतानीके निरोधसे ही संताननिरोध हो सकता है। पर क्या वह अन्तिम संतानी किसी कार्यका आरम्भ करता है या नहीं। यदि आरम्भ करता है तो उसमें अन्तिमत्व ही कहाँ रहा? तथा च संतान-विच्छेद भी नहीं हुआ, यदि वह कार्यका आरम्भक नहीं होता, तब वह अन्त्य तो हो सकता है, परंतु वह तो अर्थ-क्रियाकारितारहित होनेसे असत् ही ठहरेगा। अर्थ-क्रियाकारिता ही बौद्धोंकी सत्ता है। इस तरह जब कार्यानारम्भक अन्त्यक्षण अर्थक्रियाशून्य होनेसे असत् है, तब उसका जनक भी असत‍्का जनक होनेसे असत् ही होगा। इसी क्रमसे सभी संतानी और संतान असत् ही ठहरेंगे, ऐसी स्थितिमें प्रति संख्यासे किसका विनाश होगा? बौद्ध कहते हैं कि सजातीय संतानियोंका कार्यकारण-भाव ही संतान है, केवल कार्यकारण-भाव ही संतान नहीं, तथा च विशुद्ध जातीयक्षण (यहाँ क्षय शब्दका क्षणवर्ती पदार्थरूप अर्थ विवक्षित है)-की उत्पत्ति होनेपर सजातीय हेतुक्षणभावकी निवृत्ति हो जाती है। इस तरह सजातीय कार्यानारम्भक होनेसे संतानका अन्तिम क्षण अन्त्य भी है। विशुद्ध विजातीय क्षणका आरम्भक होने तथा अर्थक्रियाशून्य न होनेसे असत् भी नहीं हुआ, परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि इस तरह तो रूपविज्ञानके प्रवाहमें रसादिविज्ञानकी उत्पत्तिसे भी संतानोच्छेद समझा जायगा। कारण कि यहाँ भी विजातीय क्षणका आरम्भ हुआ है। यदि कहा जाय कि रूपविज्ञान रसविज्ञानका सजातीय ही है तो विजातीयोंमें भी कुछ-कुछ सारूप्य रहता ही है। अन्तत: सत्तारूपसे तो साजात्य रहेगा ही, जिससे कहीं भी संतानोच्छेद सम्भव नहीं। संतानी ज्ञानोंका सादृश्यतुल्य जातीय विषयत्व ही है। विषयोंकी तुल्यजातीयता क्या रूपत्व आदि अपरजातिसे माना जाय? या सत्ता सामान्यरूप परजातिसे माना जाय? पहली बात ठीक नहीं; क्योंकि संतानके अनुवर्तमान रहनेपर भी रूपज्ञान संतानके विरत होनेके पश्चात् रसज्ञान उदित होगा, इसके बाद संतानोच्छेदका प्रसंग होगा। यदि परजातिसे विषयोंकी तुल्यजातीयता मानें तो सोपप्लव संतानके उपरम होने तथा विशुद्ध संतानोदयमें भी संतानोच्छेद नहीं होगा; क्योंकि परजातीयसत्तामात्रको लेकर सोपप्लव ज्ञान संतान और विशुद्ध ज्ञान संतानमें सादृश्य है ही। यदि कहा जाय कि विषय विशेषोपरागकृतसादृश्य नहीं विवक्षित है, अत: रूपज्ञानप्रवाहमें रसज्ञान उत्पत्ति मात्रसे संतानोच्छेदप्रसंग न होगा, सत्तासामान्यकृतसादृश्य भी नहीं विवक्षित है, अत: सोपप्लव चित्तसंतान उपरम होनेपर मुक्तिदशामें निरुपप्लव चित्तसंतानके उदय होनेपर पूर्वसंतानोच्छेदका भी प्रसंग न होगा। किंतु यहाँ विषयोपप्लवकृतसादृश्य ही विवक्षित है। तथा च निरुपप्लवज्ञान संतानोदय होनेपर सजातीय कार्य-कारणभावरूप संतानावच्छिन्न हो जाता है। फिर भी निरन्वय नाश कहीं भी सम्भव नहीं है, यह दोष यहाँ भी है ही। क्षणिकवादमें पदार्थ उत्पन्न होते ही नष्ट हो जाता है, फिर उसका प्रतिसंख्या निरोध क्या होगा? उसमें पुरुष-प्रयत्नकी तो अपेक्षा ही नहीं है। पहले तो उत्पन्न होते ही सर्वपदार्थ ज्ञात नहीं हो जाते हैं। कितने ही पदार्थ तो जीवनभर अज्ञात ही रहते हैं। कितने ही अबतक भी जाने नहीं जा सके हैं। अस्तु, उत्पन्न पदार्थका ज्ञान, फिर उसको नष्ट करनेकी बुद्धि, फिर इच्छा, फिर कृत्तिद्वारा विनाश आदि करनेमें अनेक क्षण आवश्यक होते हैं। तबतक क्षणिक पदार्थ नष्ट ही हो जायगा, पुन: प्रतिसंख्या प्रतिरोध कैसे होगा? साथ ही निरन्वय नाश नहीं होता है। अवश्य ही उसमें कारणांश अन्वित रहता है। अत: निरुपाख्य निरोध नहीं हो सकता। नष्ट पदार्थ भी अन्वयीरूपसे उपाख्येय ही होता है। जो अन्वयीरूप होता है, उसका ही परमार्थ सद्भाव होता है। अवस्थाविशेष ही उत्पन्न-विनष्ट होनेवाली होती है। अवस्थाएँ सभी अनिर्वचनीय हैं; उनका स्वत: परमार्थसत्त्व ही नहीं होता। अन्वयीरूप ही उनका तत्त्व है; क्योंकि वही सर्वत्र प्रत्यभिज्ञात होता है और उसका विनाश नहीं होता। इस तरह अवस्थाओंके भी तत्त्वका अविनाश होनेसे अवस्थाओंका निरन्वय नाश नहीं होता; क्योंकि उनके तत्त्व अन्वयीका सर्वत्र ही अविच्छेद है। घट, कपाल, चूर्ण, रज, सबमें मृत्तिका ही अन्वयी है। कहा जा सकता है कि ‘मृत्पिण्ड:, मृद्घट:, मृत्कपाल:’ आदिरूप पिण्डघटादि मृत्तिकाका अन्वय दृष्ट होता है, अत: घटादिमें मृत्तिकाका अन्वय भले ही माना जाय; किंतु तत्पाषाणतलपर निपतित होकर नष्ट होनेवाले जलबिन्दुका तो कोई भी अन्वयीरूप उपलब्ध नहीं होता है, फिर उसका निरन्वय नाश माननेमें क्या आपत्ति है, परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि अस्पष्ट प्रत्यभिज्ञा वहाँ भी सम्भव है। अर्थात् वहाँ भी जलबिन्दु तेजके द्वारा बादल बनानेके लिये मार्तण्डमण्डलमें पहुँचा दिया जाता है। मृत्तिकादि अन्वयीका अविच्छेद देखकर ऐसा अनुमान किया जा सकता है कि इसी तरह तप्त लौहपिण्ड या अग्निनिक्षिप्त जलबिन्दु भी तेजोभावापन्न होकर मेघादिभावको प्राप्त हो जाता है, इसके अतिरिक्त तोयत्व-जलत्व सामान्य तो बिन्दुके नष्ट होनेपर भी सिन्धुमें अन्वित रहता ही है, फिर निरन्वय नाश कैसे कहा जा सकता है? अतएव वाचस्पतिमिश्रका भामतीमें कहना है कि— उदबिन्दौ च सिन्धौ च तोयभावो न भिद्यते। विनष्टेऽपि ततो बिन्दावस्ति तस्यान्वयोऽम्बुधौ॥ बौद्ध अविद्यादिनिरोधको प्रतिसंख्यानिरोध मानते हैं, इस सम्बन्धमें प्रश्न होता है कि यह निरोध साधनसहित सम्यग्ज्ञानसे होता है या स्वत:। यदि प्रथम पक्ष मान्य है तो निर्हेतुक विनाश स्वीकारका सिद्धान्त खण्डित हो जाता है। यदि निरोध स्वत: मानें तो क्षणिक नैरात्म्यादि भावनादिरूप मार्गोपदेश, धर्मदर्शनादि प्रवर्तन, साधनाभ्यासादि व्यर्थ ही होंगे। इसी तरह आकाशको भी निरुपाख्य नहीं कहा जा सकता। वेदादिशास्त्रोंसे आकाशकी उत्पत्ति और वस्तुत्व ज्ञात होता है। शब्दगुणके द्वारा उसका अनुमान भी हो सकता है। जैसे गन्धादिगुण पृथिवी आदिके आश्रित रहते हैं, वैसे ही शब्द आकाशके। ‘शब्द गुण है, जातिमान् होकर स्पर्शरहित होकर बाह्य एक इन्द्रियसे ग्राह्य होनेके कारण गन्धके समान’ इस अनुमानके आधारपर सिद्ध होता है कि शब्द गुण है। सामान्यविशेषतया समवायमें शब्दका अन्तर्भाव नहीं है; क्योंकि वे जातिहीन होते हैं। किंतु शब्दके शब्दत्व जाति होनेसे वह जातिमान् है। हेतुका वायुमें व्यभिचार नहीं है। वायु स्पर्शवान् है और यह स्पर्शरहित है। हेतुका दिक‍्काल आदिसे व्यभिचार नहीं है; क्योंकि वह इन्द्रियग्राह्य नहीं है। इन्द्रियग्राह्य द्रव्यमें व्यभिचार नहीं है; क्योंकि हेतुमें एकेन्द्रियग्राह्यत्व विशेषण है, ऐसा हेतु शब्दमें ही है। इन्द्रियग्राह्य द्रव्यमें नहीं, गन्धत्वजातिमें भी व्यभिचार नहीं है, यत: यह जातिमान् है और गन्धत्वादि जातिहीन है। गुणत्वसिद्धिके बाद यह भी विचार ठीक है कि शब्द किस द्रव्यका गुण है। वह आत्माका गुण नहीं हो सकता। कारण बाह्येन्द्रिय ग्राह्य है। आत्मगुण इच्छादि बाह्येन्द्रिय ग्राह्य नहीं होते। वह मनका भी गुण नहीं है; क्योंकि मनके भी गुण प्रत्यक्ष नहीं होते। यद्यपि वेदान्तमतमें सुखादि मनके ही गुण होते हैं, तथापि वे साक्षिग्राह्य हैं इन्द्रियग्राह्य नहीं। शब्द पृथिव्यादिका भी गुण नहीं है; क्योंकि गन्धादिके साथ शब्द नियत साहचर्य उपलब्ध नहीं होता। गन्धादिके समान असाधारण इन्द्रियग्राह्य शब्दगुण जिस द्रव्यके आश्रित है, वह पंचभूत आकाश ही मान्य होना चाहिये। बौद्ध कहते हैं कि आवरणाभाव आकाश है, परंतु उनका यह कथन ठीक नहीं। एक पक्षीके भी उड़ते समय आवरण हो ही जायगा, फिर उड़नेकी इच्छा रखनेवाले दूसरे पक्षीको अवकाश नहीं होना चाहिये। यदि कहा जाय कि जहाँ आवरण नहीं होगा, वहाँ दूसरा पक्षी उड़ेगा? तो यह भी ठीक नहीं, यत: आवरणाभावको जिससे विशेषित किया जायगा, वह वस्तुभूत ही रहेगा। अत: आवरणाभावमात्र आवश्यक नहीं। सार यह है कि निषेध्यके निषेधाधिकरणका निरूपण किये बिना निषेधका निरूपण हो ही नहीं सकता। इसलिये आवरणाभावाधिकरण वस्तु ही आकाश है। साथ ही आकाश वस्तु नहीं है, यह सिद्धान्त बौद्धके स्वसिद्धान्तके विरुद्ध है। ‘पृथिवी भगव: किं सन्नि:श्रया’ वे इस प्रकारके प्रश्न प्रतिवचन-प्रवाहमें ‘वायु: किं सन्नि:श्रय:’ इस प्रश्नके उत्तरमें कहा गया है ‘वायुराकाशसन्निश्रय:।’ अर्थात् वायुका क्या आश्रय है, इस प्रश्नके उत्तरमें कहा गया है कि वायुका आकाश आश्रय है। इस प्रकार आकाशको अवस्तु मानना अभ्युपगमविरुद्ध होगा। इसके साथ ही बौद्ध कहते हैं अपि च निरोधद्वयमाकाशं च त्रयमप्येतन्निरुपाख्यमवस्तु नित्यं च अर्थात् दोनों निरोध और आकाश— ये तीनों निरुपाख्य अवस्तु एवं नित्य हैं। यह बात परस्परविरुद्ध है। जो अवस्तु है, उसमें नित्यता या अनित्यता कुछ भी नहीं हो सकती। नित्यत्वादि धर्म वस्तुके आश्रित होते हैं। जहाँ धर्म-धर्मिभाव होता है, वहाँ निरुपाख्यता हो ही नहीं सकती। बौद्ध सब वस्तुको क्षणिक मानता हुआ उपलब्धाको भी क्षणिक ही मानता है, परंतु यदि उपलब्धा भी क्षणिक हो तो अनुभवसे उत्पन्न होनेवाली स्मृति कैसे बन सकेगी; क्योंकि वह तो तभी बन सकती है, जब कि उपलब्धि और स्मृतिका कर्ता एक ही हो। अतएव पुरुषान्तरसे अनुभूत विषयमें पुरुषान्तरको स्मृति नहीं होती है। अनुभव करनेवालेको ही अनुभूतकी स्मृति होती है। जबतक पूर्वोत्तरदर्शी एक आधार न हो, तबतक ‘मैंने उसको देखा, अब इसे देख रहा हूँ’ यह व्यवहार नहीं बन सकता। कथंचित् समान-संततिमें कार्यकारणभावसे स्मृति बन भी जाय तो भी यह प्रत्यभिज्ञा तो उपलब्धाके अस्थिर होनेपर बन ही नहीं सकती। दर्शन-स्मरणके एक कर्ता होनेपर ही प्रत्यभिज्ञा-प्रत्यय होता है ‘उसे देखा, इसे देख रहा हूँ’ यदि यहाँ दर्शन-स्मरणका कर्ता भिन्न-भिन्न हों तो ‘देखा अन्यने और स्मरण मैं कर रहा हूँ’ ऐसा प्रत्यय होना चाहिये, परंतु ऐसा अनुभव किसीको भी नहीं होता। जहाँ ऐसा प्रत्यय होता है, वहाँ कर्ता अवश्य ही भिन्न-भिन्न होते हैं। ‘मैं स्मरण कर रहा हूँ, अमुकने देखा है।’ ‘अहं स्मरामि, असावद्राक्षीत्।’ बौद्ध भी दर्शन-स्मरणका एक ही कर्ता समझता है, परंतु जैसे अग्निको अनुष्ण और अप्रकाश नहीं कहा जा सकता, उसी प्रकार दर्शन-स्मरण-कर्ता आत्माको भिन्न नहीं कहा जा सकता। जब उपलब्धामें भिन्नकारणके दर्शन-स्मरणका सम्बन्ध हुआ तो सुतरां क्षणिकत्वकी हानि अपरिहार्य हो जाती है। जन्ममें मरणतककी उत्तरोत्तर प्रतिपत्तियोंकी एककर्तृकता देखता हुआ भी वैनाशिक आत्माको किस प्रकार क्षणिक कह सकता है? यदि कहा जाय कि सादृश्यके कारण उपलब्धामें एकताकी प्रतीति होती है, तो यह भी ठीक नहीं, कारण ‘तेनेदं सदृशम्’ ‘उसके यह तुल्य है’ इस प्रकारकी सादृश्यबुद्धि तभी हो सकती है, जब भिन्नकालवर्ती दो वस्तुका ग्राहक एक हो, यदि पूर्वोत्तर क्षण और सादृश्यका ग्राहक एक स्थिर आत्मा है तो एककी अनेक-क्षणवर्तिता सिद्ध हो गयी, फिर क्षणिकत्व-प्रतिज्ञा भंग ही हो गयी। बौद्ध कहता है कि ‘तेनेदं सदृशम्’ यह स्वतन्त्र ही एक विकल्प-प्रत्यय है। विकल्प स्वाकारको ही बाह्यरूपसे निश्चित करता है, वह तत्त्वत: पूर्वापरक्षण तथा उसके सादृश्यका ग्रहण नहीं करता। अत: पूर्वोत्तरक्षणग्रहण निमित्तक ‘तेनेदं सदृशम्’ यह प्रत्यय नहीं है। इस प्रत्ययसे स्थिर आत्मा नहीं सिद्ध होता, परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि ‘तेन, इदं’ इन दोनों पदोंका उपादान होनेके कारण इसे पूर्वोत्तर क्षणग्रहणनिरपेक्ष प्रत्यय नहीं कहा जा सकता। सादृश्य-ज्ञान स्वतन्त्र-ज्ञान होता तो ‘सदृशम्’ इस ढंगसे उल्लेख होना चाहिये था। ‘तेन इदं सदृशम्’ इस प्रकारका उल्लेख तथा वाक्यका प्रयोग नहीं होना चाहिये। यदि बौद्ध नानापदार्थ सम्पृक्त वाक्यार्थबोधक ‘तेनेदं सदृशम्’ इस विकल्पकी प्रथा या प्रतीति मानता है, तो फिर कैसे कह सकता है कि उसमें ‘तेनेदं सदृशम्’ ये नाना पदार्थ नहीं भासित होते हैं। ऐसा कहना तो अपने संवेदनके ही विरुद्ध है. इसके सिवा यदि उसके यह सदृश है, यह एक विकल्प ज्ञान हो तो इसमें ‘तेन इदम्’ इत्यादि नाना आकार नहीं हो सकते थे; क्योंकि एकका नानात्व व्याहत होता है। जब ज्ञानसे अतिरिक्त आकार नहीं है तो आकार नानात्व-ज्ञान नानात्व ही ठहरेगा। यह भी नहीं कहा जा सकता कि जितने आकार हैं, उतने ही ज्ञान हैं; क्योंकि तब तो प्रत्येक आकारमें ज्ञानकी समाप्ति होगी और वे सभी परस्पर वार्तानभिज्ञ होंगे, फिर नाना, यह व्यवहार भी न होगा; क्योंकि जब एक ज्ञानसे नाना पदार्थोंकी प्रतीति होती है, तभी नाना यह उल्लेख होता है। इसीलिये ज्ञानसे भिन्न अर्थ मानना चाहिये। तथा च ‘तेन इदं’ इत्यादि नाना आकारवाले ज्ञानकी उपपत्ति स्थायी एक आत्मा माननेसे ही सम्भव है। बौद्ध कहता है कि ज्ञानमें अर्थाकार कल्पित है, अर्थ बाह्य नहीं है और प्रतीतिमात्र भी नहीं है। तथा च उसी कल्पित आकारभेदसे व्यवहार भी उपपन्न होगा। पर यहाँ यह प्रश्न होगा कि वह कल्पित अर्थ ज्ञानसे अभिन्न है या भिन्न। तीसरा पक्ष अनिर्वाच्यताका है वह बौद्धको मान्य ही नहीं। यदि भिन्न है तो जैसे ज्ञानसे भिन्न दूसरा ज्ञान अकल्पित होता है, वैसे ही ज्ञानसे भिन्न अर्थाकार भी अकल्पित ही होगा। यदि आकारोंका ज्ञानसे अभेद माना जाय तो उसके समान ही ‘तेन इदम्’ इत्यादि पदार्थोंका भी परस्पर अभेद ही हो जायगा; क्योंकि ज्ञानसे अभिन्न आकारोंका परस्पर भी अभेद ही होता है, तथा च इतरेतररूपसे प्रसिद्ध पदार्थोंका और ज्ञानसे ज्ञेयके प्रसिद्ध भेदका भी अपलाप हो जायगा। यदि लोकप्रसिद्ध पदार्थोंको परीक्षक स्वीकार न करेंगे तो स्वपक्ष-साधन परपक्षदूषणके निरूपण करनेपर भी वे किसीकी बुद्धिमें आरूढ़ न होंगे। अत: जो लोकसिद्ध हो, वही कहना चाहिये, अन्यथा कथन अनर्गल प्रलाप ही समझा जायगा। एक ही अधिकरणमें परस्पर विरुद्ध दो प्रकारके धर्मोंका अभ्युपगम करनेसे ही विवाद होता है। तभी कोई स्वपक्षका साधन तथा अन्य पक्षको दूषित करता है। यदि विकल्पोंके विषय लोकप्रसिद्ध बाह्य पदार्थ न हों तो यह सब नहीं बन सकता। यदि विकल्पमें भासित होनेवाले नित्यत्व-अनित्यत्वादि ज्ञानाकार ही हैं और ज्ञान भी ‘इदं नित्यम्, इदमनित्यम्’ इस प्रकारसे दो हैं तो एक आश्रय न होनेसे विवाद ही न उठेगा। आत्मा नित्य है और बुद्धि अनित्य, इस तरह कहनेवालोंमें कभी कोई विवाद ही नहीं होता। यदि कोई अनित्य शब्दका लोकप्रसिद्ध अर्थ छोड़कर विभु अर्थ माने, विभुत्व अर्थमें ही अनित्य शब्दका प्रयोग आत्मामें करे और अन्य कोई लौकिकार्थ नित्यशब्दका आत्मामें प्रयोग करे तो उनका आपसमें विवाद नहीं हो सकता है। अत: जिसे परपक्षखण्डन एवं स्वपक्षकी स्थापना करनी है, उसे विकल्पोंका लोकप्रसिद्ध अर्थ एवं बाह्य आलम्बन मानना चाहिये। यह प्रासंगिक विज्ञानवाद खण्डन आ गया है, परंतु वैभाषिक तथा सौत्रान्तिक बाह्यार्थ मानते हैं। उनके अनुसार यद्यपि बाह्यार्थ क्षणिक एवं निर्विकल्पज्ञानमें भासित होता है, सविकल्पक प्रत्यय तो विकल्परूप है। वही सादृश्यादिरूपसे भासित होता है, अत: बाह्यार्थवादमें विप्रतिपत्ति आदि व्यवहार बन जायगा। तथा च विकल्पोंके विषय ग्राह्य एवं अवसेयरूपसे दो प्रकारके होते हैं। ज्ञानका स्वाकार तो ग्राह्य होता है और बाह्यविषय अवसेय होते हैं। उसी अवसेयरूप विषयको लेकर पक्ष-प्रतिपक्ष-परिग्रह आदि सम्पन्न हो जायँगे, तथापि यह पक्ष भी ठीक नहीं है? क्योंकि यहाँ भी विचारणीय यह है कि विकल्प विषयकी अवसेयता क्या है। यदि ग्राह्यता ही है तो विषयकी द्विविधता नहीं हुई। यदि वह अन्य है तो क्या है? यदि कहा जाय कि ज्ञानमें उसका स्वाकार ही प्रतिभासित होता है, तथापि उसी बाह्यार्थरहित भासमान ज्ञानमें बाह्यार्थ अध्यवसायसे बाह्यार्थ घटादिमें प्रवृत्ति होती है, अत: भासमान ज्ञानमें बाह्यार्थका आरोप ही विषयकी अवसेयता है, तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि यहाँ भी विचारणीय है कि विकल्पाकारका अर्थाध्यवसाय क्या है अर्थात् आन्तर अनभिधेय ज्ञानाकारका तद्विपरीत बाह्याकाररूपसे अध्यवसाय क्या है? तद्‍रूपसे निष्पादन है या सम्बन्ध या उसके आकारसे आरोपण। पहला पक्ष ठीक नहीं; क्योंकि अन्यका अन्यरूपसे निष्पादन असम्भव है। हजारों शिल्पी भी मिलकर घटको पट नहीं बना सकते, फिर आन्तर ज्ञानाकारका बाह्यरूपमें सम्पादन कैसे होगा। निष्पादनके समान ही आन्तरका बाह्यसे सम्बन्ध या संयोजन भी नहीं हो सकता। यदि ऐसा हो भी तो बाह्य अर्थ है, इस व्यवहारके विपरीत बाह्य आन्तरसे जुड़ा है, यह व्यवहार होना चाहिये। आरोपपक्षमें भी यह विचारणीय है कि गृह्यमाण बाह्यमें आन्तर ज्ञानाकारका आरोप है या अगृह्यमाणमें। यदि गृह्यमाणमें तो भी क्या विकल्पात्मक ज्ञानसे गृह्यमाणमें या उसी समय उत्पन्न अविकल्पक ज्ञानसे गृह्यमाणमें? यहाँ भी यह प्रश्न उठता है कि उसमें भी गृह्यमाण बाह्य क्या है स्वलक्षण है या सामान्यरूप है? विकल्प-प्रत्ययसे स्वलक्षण (जात्यादिरहित स्वरूपमात्र) ग्राह्य होता है, यह इसलिये ठीक नहीं कि विकल्प-प्रत्यय तो अभिलापसंसर्ग योग्यको ही विषय करता है, जिसके साथ शब्दका शक्तिग्रह हो ही नहीं सकता, ऐसे देशकालाननुगत स्वलक्षणको वह विषय नहीं कर सकता। इसीलिये कहा गया है कि— अशक्यसमयो ह्यात्मा सुखादीनामनन्यभाक्। तेषामत: स्वसंवित्तिर्नाभिजल्पानुषङ्गिणी॥ अर्थात् विकल्प-प्रत्यय शब्द संसर्ग ग्रह योग्य जाति विशिष्ट वस्तुको ही विषय करता है; क्योंकि शब्दका शक्तिग्रह सामान्यके ही साथ सम्भव है; स्वलक्षणके साथ नहीं; क्योंकि देशकालाननुगत होनेसे स्वलक्षण अनन्त होता है। अत: उसमें संगतिग्रह सम्भव नहीं। सुखादि क्षणिक भावोंका स्वरूप अननुगत होनेके कारण संगतिग्रहके अयोग्य है। अर्थात् उसमें शब्दका शक्तिग्रह नहीं हो सकता। अत: उनकी असाधारणाकार विषया स्वसंवित्ति अभिजल्पानुषंगिणी नहीं होती, किंतु निर्विकल्पक ही होती है। पहले कही हुई रीतिसे जैसे सविकल्प प्रत्ययसे स्वलक्षण-बाह्य नहीं गृहीत हो सकता, वैसे ही सामान्यात्मक बाह्य भी नहीं गृहीत हो सकता; क्योंकि व्यक्तिग्रह बिना जातिरूप-सामान्यका ग्रहण सम्भव है। यदि विकल्पसे अगृहीत तत्समय समुद‍्भूत निर्विकल्प प्रत्ययसे गृह्यमाण बाह्य पदार्थमें विकल्प-प्रत्यय स्वाकार आरोपित करेगा, ऐसा कहें तो यह भी ठीक नहीं, क्योंकि जैसे रजतज्ञानमें भासित होनेवाले पुरोवर्तीमें रजतज्ञान रजतका आरोप नहीं कर सकता, किंतु ‘इदं रजतम्’ इस रूपसे रजतज्ञानमें भासित पुरोवर्तीमें ही रजतका आरोप करता है, उसी तरह निर्विकल्प प्रत्यय भासित होनेपर भी बाह्य पदार्थ यदि विकल्प-प्रत्ययमें भासित नहीं होता तो उसमें वह स्वाकारका आरोप नहीं कर सकता। अर्थात् विकल्पसे अगृहीत एवं विकल्प समयोद‍्भूत अविकल्पसे गृहीत बाह्यमें विकल्प साकारका आरोप नहीं कर सकता। यदि बाह्य गृह्यमाण नहीं है तो अधिष्ठानके ग्रहण बिना आरोप्यमात्र प्रतीत हो सकता है, किंतु आरोप नहीं हो सकता। इस तरह अधिष्ठानका प्रतिभास असम्भव होनेसे बाह्यमें ज्ञानस्वरूपका आरोप नहीं हो सकता है। इसी तरह आरोप्यका स्फुरण भी असम्भव होनेसे आरोप नहीं बन सकेगा। यहाँ यह भी विचारणीय है कि क्या यह विकल्प जब स्वसंवेदन सत्-विकल्पको बाह्यरूपसे आरोपण करता है, तब पहले वस्तु सत्-स्वाकारको ग्रहण करके पश्चात् आरोप करता है अथवा जिस समय स्वाकार ग्रहण करता है, उसी समय आरोपण भी करता है? बौद्धमतमें ज्ञान क्षणिक है, क्रमरहित है, फिर उसमें क्रमवर्ती ग्रहण और आरोपण कैसे सम्भव हो सकता है। इसलिये दूसरा पक्ष ही सम्भव है कि जिस समय ही अर्थशून्य आकारका ग्रहण करता है, उसी समय स्वसंवेदन-स्वाकारको बाह्य अर्थरूपमें आरोपण करता है, परंतु यह भी असंगत है; क्योंकि विकल्पका अपना स्वाकार स्वसंवेदन प्रत्यक्ष होनेसे अत्यन्त विशद है, बाह्य अर्थ आरोप्यमाण होनेसे अविशद है। अत: आरोप्य बाह्यको विशद स्वाकारसे भिन्न ही होना चाहिये। अत: विकल्पका स्वाकार ही बाह्यरूपमें आरोपित है, यह पक्ष नहीं बन सकता, अर्थात् जब समकालमें ही स्वाकारग्रहण एवं बाह्यत्वेन आरोपण माना जाय तो सोचना होगा कि यहाँ आरोप क्या है। स्वाकार और बाह्यका ऐक्य-स्फुरण ही आरोप है अथवा—अख्यातिमतके समान विवेकाग्रहमात्र आरोप है। पहला पक्ष ठीक नहीं; क्योंकि स्वाकार-स्वप्रकाश बाह्य परप्रकाश है। अत: उनका भेदावभास स्फुट है, फिर ऐक्यस्फुरण किस तरह सम्भव है। अत: बाह्यको ज्ञानाकारसे भिन्न ही होना चाहिये। दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं; भेदाग्रहमात्रको भी समारोप नहीं कहा जा सकता; क्योंकि वैशद्य अवैशद्यरूपसे उनका भेद स्पष्ट ही है। यदि कहा जाय कि बाह्य अगृह्यमाण है तो भी गृह्यमाण आन्तर स्वलक्षणसे उसका भेद अगृहीत है, इसीलिये बाह्यमें प्रवृत्ति होती है। फिर तो यह भी कहा जा सकता है कि त्रैलोक्यसे ही ज्ञानके स्वाकारका भेदाग्रहण होनेसे जहाँ कहीं भी प्रवृत्ति हो जायगी। इस तरह परमार्थ ज्ञानाकारका बाह्य वस्तुरूपसे आरोप असम्भव ही है। इसी तरह वासनापरिप्रापित-कल्पित ज्ञानाकारका बाह्यरूपमें आरोप होता है, यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि वह भी स्वप्रकाशज्ञानरूप है। अत: उसका भी बाह्यसे भेद प्रसिद्ध ही है। इस तरह आन्तर एवं बाह्य स्थिर पदार्थोंको बिना स्वीकार किये कोई भी व्यवहार नहीं बन सकता। फलत: सादृश्यमूलक भी प्रत्यभिज्ञा आदि व्यवहार नहीं बन सकते; क्योंकि उनमें ‘तेनेदं सदृशम्’ सादृश्यका ऐसा आकार होता है और ‘तदेवेदम्’ यह वही है, ऐसा प्रत्यभिज्ञाका व्यवहार होता है। यद्यपि यहाँ कहा जाता है कि जैसे दीपज्वाला या नदीप्रवाह आदिमें सादृश्यबुद्धि न होनेपर भी सादृश्यके कारण ही ‘सैवेयं धारा, सैवेयं ज्वाला’ यह वही धारा है, यह वही ज्वाला है इत्यादिरूपसे प्रत्यभिज्ञा (पहचान) होती है। वैसे ही विज्ञानधारामें भी सादृश्यके कारण ही ‘सोऽहम्’ इत्यादिरूपसे प्रत्यभिज्ञा बन जायगी, परंतु यह ठीक नहीं, कारण, कदाचित् बाह्य वस्तुमें विनम्रके कारण यह उसके सदृश अन्य है या वही है, इस प्रकार सन्देह हो भी जाय, परंतु स्वप्रकाश-संवेदनरूप आत्मामें ‘मैं वही हूँ या तत्सदृश अन्य हूँ’ इस प्रकारका संशय सर्वथा असम्भव है। जिसे मैंने कल देखा था, वही मैं आज स्मरण कर रहा हूँ, यहाँ निश्चित ही आत्माकी एकता प्रत्यभिज्ञात होती है। जो अपनेको पहचाननेके लिये अपने आपको विशिष्ट प्रकारके चिह्नसे अंकित करता है, जनसाधारण भी उसकी बुद्धिपर तरस खाते हैं। बौद्ध स्थिर-अन्वित कारण नहीं मानते, सुतरां उनके यहाँ अभावसे ही भावोत्पत्तिका प्रसंग आ जाता है। क्षणिक कारणवादी बौद्धसे यह प्रश्न होता है कि वह कारण सापेक्ष है या निरपेक्ष? पहले पक्षकी असंगति पीछे कही जा चुकी, दूसरा पक्ष भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि निरपेक्ष क्षणिक बीजादिसे यदि अंकुरादि उत्पन्न हो, तब तो किसान आदिका प्रयत्न व्यर्थ ही होगा। क्षणिक कारणोंमें उपकार भी सम्भव नहीं होता। निरपेक्षताका निषेध होनेसे सापेक्षता ही आयगी; क्योंकि कोई प्रकारान्तर सम्भव नहीं। अस्थिर भावसे भावकी उत्पत्ति हो नहीं सकती, इसलिये क्षणवादमें अर्थत:—अभावसे ही भावकी उत्पत्तिका प्रसंग होता है। बौद्ध स्पष्टरूपसे अभावसे भावकी उत्पत्ति सिद्ध करनेका प्रयत्न करते हैं। ‘नानुपमृद्य प्रादुर्भावात्’ बीजका उपमर्द (विनाश) हुए बिना अंकुरकी उत्पत्ति नहीं देखी जाती। किंतु विनष्ट बीजसे ही अंकुरकी उत्पत्ति होती है। विनष्ट क्षीरसे दधि एवं विनष्ट मृत्पिण्डसे घटादिकी उत्पत्ति होती है। यदि कूटस्थ स्थिर कारणसे कार्यकी उत्पत्ति हो तो अविशेषात् सभीसे सबकी उत्पत्ति होनी चाहिये। अत: अभावसे ही भावकी उत्पत्ति होती है, इस पक्षका खण्डन करते हुए भगवान् व्यासने कहा है ‘नासतोऽदृष्टत्वात्’ अर्थात् अभावसे भावकी उत्पत्ति नहीं होती। यदि अभावसे भावकी उत्पत्ति हो तो अभावत्वाविशेषात् कारणविशेषसे कार्यविशेषकी उत्पत्तिका सिद्धान्त व्यर्थ होगा। उपमृदित बीजोंके अभावमें और शशविषाणादिमें यदि नि:स्वभावता समान ही है तो भेद क्या है? फिर क्या कारण है कि बीजसे ही अंकुर उत्पन्न हो, क्षीरसे ही दधि हो। यदि निर्विशेष अभावसे कार्य उत्पन्न होता तो शशविषाण आदिसे भी अंकुरादिकी उत्पत्ति होनी चाहिये। पर ऐसा देखा नहीं जाता। यदि कमलादिमें नीलत्वादिके तुल्य अभावमें कोई विशेष माना जाय तो कमलादिके ही तुल्य अभाव भी भाव ही ठहरेगा। इस प्रकार अभाव किसी भावकी उत्पत्तिका कारण नहीं सिद्ध होता। बौद्धोंके अभावकारणवादका सार यह है कि यदि कूटस्थ कारणका कार्योत्पादन स्वभाव है, तब तो जितना कार्य करता है, उसे सहसा एक क्षणमें ही सब कार्य उत्पन्न कर देना चाहिये; क्योंकि समर्थ कालक्षेप नहीं कर सकता है। यदि कहा जाय कि समर्थ भी क्रमयुक्त सहकारियोंकी अपेक्षासे ही क्रमेण कार्य उत्पन्न करता है तो वह भी ठीक नहीं; क्योंकि यहाँ प्रश्न होगा कि क्या सहकारीमूलकारणमें किसी उपकारका आधान करते हैं या नहीं। यदि नहीं तो अनुपकारक सहकारियोंकी अपेक्षा ही क्यों होगी। यदि आधान करते हैं तो वह उपकार मूल कारणोंसे भिन्न होता है या अभिन्न? यदि अभिन्न तो यह सिद्ध हुआ कि सहकारियोंद्वारा अहित उपकार मूलकारणसे अभिन्न है, अर्थात् मूलकारणरूप ही है। इस तरह सहकारियोंद्वारा उत्पन्न उपकारस्वरूप मूलकारण तटस्थ कैसे रह सकता है। उच्छूनता या उपमर्द आदि ही सहकारियोंद्वारा किया उपकार है। यदि सहकारिकृत उपकार कारणसे भिन्न है तो यह भी मानना पड़ेगा कि उपकारके होनेपर कार्य होता है, उसके न होनेपर कार्य नहीं होता। भले ही कूटस्थ विद्यमान रहे, तब तो उपकार ही कार्यकारी सिद्ध होता है। कूटस्थ कारण कार्यकारी सिद्ध नहीं होता। इसीलिये कहा गया है कि— वर्षातपाभ्यां किं व्योम्नश्चर्मण्येव तयो: फलम्। चर्मोपमश्चेत्सोऽनित्य: खतुल्यश्चेदसत्फलम्॥ अर्थात् वर्षा एवं आतपका प्रभाव चर्ममें होता है, आकाशमें नहीं। यदि कारण चर्मके तुल्य है तो उसे विकारी और अनित्य मानना ही पड़ेगा। यदि आकाशके तुल्य है, तब कार्यकारी ही नहीं होगा। यदि अकिंचत्कर कूटस्थ कारणसे कार्य उत्पन्न हो, तब तो सभीसे सबकी उत्पत्ति होनी चाहिये, परंतु बौद्धोंका यह कथन बिना विचारे ही अच्छा जँचता है, विचार करनेपर सर्वथा नि:सार है। अभावसे भावोत्पत्तिके सम्बन्धमें दूषण कहे जा चुके हैं। वस्तुत: स्थिर कारण ही सहकारीके समवधानसे क्रमेण कार्यकारी होता है। स्थिरमें ही उपकार हो सकता है। क्षणिकमें न उपकार ही होता, न उसका ज्ञान ही हो सकता है। यदि क्षणिक पदार्थोंमें उपकार्योपकार्य भाव माना जाय तो प्रश्न होगा कि वह क्षणिक पदार्थ अन्यकृत उपकारका आश्रय होता है या नहीं? पहला पक्ष असम्भव है; क्योंकि जो वस्तु पहले अनुपकृत होकर पीछे उपकारसे सम्बन्धित हो, वही उपकृतरूपसे जानी जा सकती है। उपकृत पदार्थ एवं उसका ज्ञाता दोनों ही स्थायी हो, तभी वस्तुमें उपकृतत्व एवं ज्ञाताको उसका ज्ञान हो सकता है। यदि प्रथम अनुपकृतत्वका ज्ञान न हो तो उपकार वस्तुका स्वाभाविक धर्म समझा जा सकता है। सहकारियोंद्वारा कारणमें उपकार होता है, किंतु वह उपकार मूल-कारणसे न भिन्न होता है, न अभिन्न, किंतु अनिर्वाच्य होता है। इसीलिये उससे उत्पन्न कार्य भी अनिर्वाच्य ही होता है। इसीलिये अनिर्वाच्य मायोपहित कूटस्थ ब्रह्म विश्वका कारण माना जाता है। घट मृत्तिकासे भिन्न नहीं है; क्योंकि अन्वयव्यतिरेकसे मृत्तिकासे भिन्न घटका उपलम्भ नहीं होता। अभिन्न भी नहीं है; क्योंकि मृत्तिकासे जलानयनादि कार्य नहीं होता, घटसे ही होता है, अत: वह अनिर्वाच्य ही है। फिर भी स्थिरको अकारण नहीं कहा जा सकता; क्योंकि अनिर्वचनीय शक्तिविशिष्ट मृत्तिकादि उपादानरूपसे स्थिर ही कारण होता है। उसीसे अनिर्वचनीय कार्य उत्पन्न होता है। इसीलिये श्रुति भी कारणको ही सत्य और कार्यको मिथ्या कहती है (वाचारम्भणं विकारो नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्) जैसे रज्जु-सर्पभ्रममें स्थिर रज्जु उपादान है, वैसे ही स्थिर कारण ही कार्यका उपादान होता है। जो लोग सर्वतो विलक्षण स्वलक्षणको ही सत् मानते हैं, उनके यहाँ यह विचारणीय है कि क्यों बीज जातियोंसे अंकुर जातियोंकी ही उत्पत्ति होती है। क्रमेलक (उष्ट्र) जातियोंकी उत्पत्ति क्यों नहीं होती? जैसे बीजसे बीजान्तर विलक्षण है, वैसे ही क्रमेलक (उष्ट्र) भी विलक्षण है, विलक्षणतामें कोई भेद नहीं है। बीजत्व, अंकुरत्व, सामान्य जाति भी परमार्थ सत् नहीं है। इसीलिये इनका कार्य-कारण-भाव भी परमार्थ नहीं है। अतएव काल्पनिक स्वलक्षण बीजजातीय उपादानसे काल्पनिक ही अंकुरजातीय कार्यकी उत्पत्तिका नियम है यह मानना पड़ेगा। बौद्धसे यहाँ प्रश्न हो सकता है कि व्यक्तियोंका ही कार्य-कारणभाव होता है या सामान्य (जाति)-का भी अथवा सामान्योपहित व्यक्तियोंका? यदि व्यक्तियोंका कार्य-कारणभाव हो तो व्यक्ति अनन्त होते हैं, सबका ज्ञान असम्भव है। उनमें कार्य-कारणभावकी व्याप्ति गृहीत नहीं हो सकती। फिर कार्यहेतुक अनुमान ही लुप्त हो जायगा; क्योंकि अनुमान सदा ही सामान्योपाधिमें प्रवृत्त होता है। यदि सामान्योंका ही कार्य-कारणभाव मानें तो भी प्रश्न होगा कि बीजत्व, अंकुरत्व आदि सामान्य वस्तु सत् हैं कि असत्? पहला पक्ष बौद्धको मान्य नहीं है, साथ ही वस्तुओंका कार्य-कारणभाव भी विरुद्ध है; क्योंकि बौद्ध अर्थक्रियाकारिताको ही सत्य मानता है, फिर जो कारण है, वह असत् कैसा? यदि अवस्तुभूत सामान्यसे उपहित सत् स्वलक्षण वस्तुका कार्य-कारणभाव माना जाय तो जैसे काल्पनिक बीजत्व सामान्योपहित स्वलक्षण बीजसे अकुंरत्व जातीयकी उत्पत्ति मानी जा सकती है, उसी तरह अनिर्वचनीय शक्ति उपहित कूटस्थ कारणसे अनिर्वचनीय कार्यकी उत्पत्ति होनेमें कोई भी आपत्ति नहीं हो सकती। इसी तरह काल्पनिक उपकारसे काल्पनिक कार्यकी उत्पत्ति वेदान्त सिद्धान्तमें उपपन्न होती है। यदि अभावसे भावकी उत्पत्ति मानी जाय तो सभी कार्योंको अभावान्वित होना चाहिये, परंतु ऐसा देखा नहीं जाता। सभी कार्य अपने भावरूपसे अन्वित ही देखे जाते हैं। मृत्तिकासे अन्वित घटादिभाव मृत्तिकाके ही विकार माने जाते हैं, तन्तुविकार नहीं। उसी प्रकार भावान्वित विकारोंको भी अभावका विकार नहीं माना जा सकता। यह कहना संगत नहीं है कि स्वरूपोपमर्द बिना किसी कार्यकी उत्पत्ति ही नहीं होती। अत: कूटस्थ किसी कार्यका कारण नहीं हो सकता। इसलिये अभावसे भावकी उत्पत्तिका सिद्धान्त ही ठीक है; क्योंकि स्थिर स्वभाववाले एकरूपसे प्रत्यभिज्ञात सुवर्णादि ही कटकादिके कारण देखे जाते हैं। उपमर्द तो पूर्व अवस्थाका होता है। उपमृदित पूर्वावस्था उत्तरावस्थाका कारण नहीं है। किंतु अनुपमृदित अन्वयी बीजावयव ही अंकुरादिके कारण होते हैं। कारणमें युगपत् अनेक अवस्था नहीं रह सकती। इसीलिये अंकुरावस्थाको लानेके लिये बीजावस्थाको हटना पड़ता है। घटावस्था लानेमें पिण्डावस्थाको भी हटना पड़ता है। अतएव बीजावस्था या पिण्डावस्था अंकुरादिके कारण नहीं है। किंतु बीजादिके अवयव ही कारण हैं। अतएव उन्हींका कार्यमें अन्वय है, अवस्थाका अन्वय नहीं। शशविषाणादि असत‍्से उत्पत्ति नहीं होती। सुवर्णादि सत‍्से ही उत्पत्ति होती देखी जाती है, अत: अभावसे भावोत्पत्तिका सिद्धान्त सर्वथा असंगत है। यदि अभावसे भावकी उत्पत्ति हो तो प्रयत्नहीन लोगोंकी भी अभीष्टसिद्धिमें कठिनाई नहीं होनी चाहिये; क्योंकि अभावरूपी साधन तो सबको सुलभ है। कृषकको बिना प्रयत्न ही व्रीहि-यवादिकी प्राप्ति होनी चाहिये। कुलालको भी प्रयत्न बिना ही घटादिकी निष्पत्ति होनी चाहिये। तन्तुवायके प्रयत्न बिना ही वस्त्रकी प्राप्ति होनी चाहिये। शिल्पियोंके प्रयत्न बिना ही विविध प्रकारके यन्त्रोंका निर्माण हो जाना चाहिये। स्वर्ग-अपवर्गके लिये भी किसीको कोई चेष्टा करनेकी आवश्यकता नहीं होनी चाहिये। पर यह सब संगत नहीं। विज्ञानवादी योगाचारका कहना है कि बाह्यार्थवादमें बुद्धका तात्पर्य नहीं था। कुछ शिष्योंका बाह्यार्थमें अभिनिवेश देखकर ही उन्होंने पंचस्कन्धका निरूपण किया है। वस्तुत: विज्ञानमात्र एक ही स्कन्ध बुद्धको अभीष्ट था। कहा जा सकता है कि प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और प्रमिति—ये चार प्रकारके तत्त्व होते हैं। इनमेंसे एकके अभावमें भी तत्त्वका व्यवस्थापन नहीं बन सकता। अत: विज्ञानमात्रको तत्त्वसिद्ध करनेके लिये प्रमात्रादितत्त्वचतुष्टय मानना ही पड़ेगा। फिर जब चार वस्तुएँ माननी ही पड़ीं तो विज्ञानमात्र वस्तु है, यह कैसे कहा जा सकता है, परंतु विज्ञानवादीका कथन है कि यद्यपि विज्ञानरूप अनुभवसे भिन्न अनुभाव्य, अनुभविता एवं अनुभवन कुछ भी नहीं है, तथापि बुद्धिकल्पितरूपसे विज्ञानमें प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय और प्रमिति आदिका व्यवहार बन जाता है। असत्य आकारयुक्त विज्ञानका स्वरूप प्रमेय है। प्रमेय प्रकाशन एवं प्रमाण फल है। प्रकाशनशक्ति ही प्रमाण है। बाह्यार्थवादमें भी बुद्धॺारोहके बिना प्रमाणादि व्यवहार नहीं बन सकता। यदि प्रमाण और फलके भिन्न अधिकरण हों तो प्रमाण फलभाव हो ही नहीं सकता। इसलिये खदिरगोचर परशु व्यापार होनेसे भी पलाशमें द्वैधीभाव (टुकड़ा) नहीं होता। जिसमें व्यापार होता है, उसीमें फल होता है। उसी तरह प्रमाण (करण) और प्रमिति फल दोनोंका एक ही अधिकरण होनेपर ही करण फलभाव हो सकता है। यद्यपि परशु स्वावयवोंमें समवेत है और द्वैधीभाव खदिरमें समवेत है तथापि व्यापाराविष्ट करणीभूत परशु-संयोग सम्बन्धसे खदिरमें रहता है और द्वैधीभाव भी खदिरमें है ही। इस तरह करणफलका एकाधिकरण्य सामानाधिकरण्य ही है, इसी तरह एक ज्ञानमें ही प्रमाणफलभाव मानना ठीक है। अब यहाँ विचार करना होगा कि ज्ञानमें प्रमाण और फल कैसे सम्भव होंगे। जैसे कुण्डमें बदर (बेर)-की अवस्थिति होती है, उसी तरह क्या ज्ञानमें प्रमाण और फलका अवस्थान हो सकता है? कहना होगा कि ज्ञान असंयोगी वस्तु है, अत: उसमें संयोग-सम्बन्धसे प्रमाण और फल नहीं रह सकते, किंतु तादात्म्य या अभेद सम्बन्धसे ही ज्ञानमें उनकी स्थिति कहनी पड़ेगी। यदि वस्तुत: प्रमाण और फल ज्ञानसे भिन्न हों तो उनका ज्ञानके साथ एकता या तादात्म्य असम्भव ही है। अत: ज्ञानमें ही कल्पित प्रमाण फलभाव मानना ठीक है। यदि प्रमाण और फल दोनों ही ज्ञानके अंश हों, तभी प्रमाण और फल ज्ञानस्थ हो सकते हैं, परंतु ज्ञान स्वलक्षण (सर्वविशेषरहित) अनंश होता है, अत: उसमें वस्तु सत्प्रमाण और फल नहीं रह सकते, वही ज्ञान अज्ञान व्यावृत्ति या अज्ञानापोहरूपसे फल है, वही अशक्ति व्यावृत्तिरूप आत्मस्वरूप अनात्म बाह्यार्थ प्रकाश शक्तिरूपसे प्रमाण है। ज्ञानका ही बाह्याकार बाह्य घटादि पदार्थ है। वैभाषिकोंके यहाँ बाह्य अर्थ प्रत्यक्ष होता है और सौत्रान्तिकोंके यहाँ ज्ञानगत आकारके वैचित्त्यसे बाह्यार्थका अनुमान होता है। ज्ञानमें जो बाह्य नीलादि सारूप्य भासमान होता है, वह अनीलाकारका अपोहरूप ही है, वही बाह्यार्थका व्यवस्थापन करता है, जैसे कि प्रतिबिम्ब बिम्बका व्यवस्थापन करता है। इस दृष्टिसे ज्ञान ही बाह्यार्थ व्यवस्थापक होनेके कारण प्रमाण है। अज्ञान (अर्थात् ज्ञानभिन्न अन्य)-की व्यावृत्तिरूपसे ज्ञानत्व सामान्य ही प्रमाण फल है; क्योंकि वह व्यवस्थाप्य है। इस मतमें भी प्रमेय परमार्थत: भिन्न है, यही बात सौत्रान्तिकके यहाँ प्रसिद्ध है—‘नहि वित्तिसत्तैव तद्वेदनायुक्ता, तस्या: सर्वत्राविशेषात्। तान् तु सारूप्यमाविशत्, स्वरूपं यद्घटयेत्।’ अर्थात् ज्ञानकी सत्ता ही अर्थकी वेदना नहीं हो सकती; क्योंकि वित्ति (ज्ञान) सत्ता तो सभी अर्थोंमें समान है। ज्ञानमात्र सर्व ज्ञेय साधारण है, अत: उस वित्तिमें प्रविष्ट होकर स्वसारूप्यघटित करनेवाला अर्थात् ज्ञानको स्वाकारसे आकारित करनेवाला बाह्यार्थ होना चाहिये। वही अपने रूपसे वित्तिको सरूप बनाता हुआ वित्तिको सविषय बनाता है, परंतु विज्ञानवादके अनुसार वस्तुत: सर्व व्यवहार पूर्वोक्त रीतिसे ज्ञानमें ही हो सकता है, ज्ञानभिन्न बाह्यार्थ नहीं हो सकता; क्योंकि बाह्यार्थ असम्भव है। यहाँ यह विचारणीय है कि क्या बाह्यार्थ घटादि परमाणुरूप ही हैं या परमाणुसमूह? परमाणुघटादि प्रत्ययके आलम्बन नहीं हो सकते; क्योंकि व्यवहारमें एक और स्थूल घटाद्याकाराभास ज्ञान होता है, परम सूक्ष्म परमाण्वाभास ज्ञान नहीं होता। अन्याभास ज्ञान अन्यको विषय नहीं कर सकता। अत: एक घटाद्याभास ज्ञान अनेक परम सूक्ष्म परमाणुओंको विषय नहीं कर सकता। यदि ऐसा नहीं मानें तो घटाभास ज्ञानके सर्वगोचर होनेसे सर्वज्ञतापत्ति हो जायगी। इसलिये एक-एक परमाणु घटादि प्रत्ययका परिच्छेद्य नहीं हो सकता है। परमाणुसमूह भी घटादि प्रत्यय परिच्छेद्य नहीं बन सकते; क्योंकि समूहका समूहियोंसे भिन्न या अभिन्नरूपसे निरूपण नहीं हो सकता। अभिन्न कहें तो पूर्वोक्त दोष ही होगा, भिन्न कहें तो समूहियोंके पृथक् हो जानेपर भी उसकी सत्ता रहनी चाहिये, भिन्न होनेपर भी दोनों किसी सम्बन्धसे सम्बन्धित हैं या नहीं? यदि है तो कौन सम्बन्ध है। समवाय सम्बन्ध कहें तो वह समवायियोंसे सम्बन्धित हैं या नहीं? यदि नहीं तो वह स्वयं असम्बद्ध दूसरोंको कैसे सम्बन्धित करेगा। यदि स्वयं सम्बन्धान्तरसे सम्बन्धित है तो वह सम्बन्ध सम्बन्धान्तर सापेक्ष होगा, इस तरह अनवस्था प्रसंग होगा। यह भी विचारणीय है कि घटादिगत स्थूलत्वादि प्रतिभासमान ज्ञानका धर्म है अथवा प्रतिभासकालमें प्रतिभासित अर्थका। यदि पहली बात मान्य है तो ज्ञान स्वांशका ही अवलम्बन करता है। अत: ज्ञानभिन्न अर्थ नहीं है, यह पक्ष स्वीकृत हो गया, यदि कहा जाय कि रूपपरमाणु ही निरन्तर (मिलकर) एक विज्ञानके विषय होकर स्थूलरूपसे भासित होते हैं, ऐसा माननेमें भ्रान्तिको भी कोई स्थान नहीं। वे परमाणु नहीं हैं यह तो नहीं कहा जा सकता। इसी तरह वे सम्मिलित नहीं हैं, यह भी नहीं कहा जा सकता। एक विज्ञानोपारोही (एक विज्ञानके विषय) नहीं है, यह भी नहीं कहा जा सकता, अत: भले ही नीलत्वादिके तुल्य स्थूलत्व परमाणुका धर्म न हो; क्योंकि नीलत्वादिकी तरह वह प्रत्येक परमाणुमें नहीं, परंतु प्रतिभासदशापन्न परमाणुओंका स्थूलत्वादि बहुत्वादिके समान सांवृत्तिक (मायिक) धर्म हो सकता है। ग्रहेऽनेकस्य चैकेन किञ्चिद्‍रूपं हि गृह्यते। साम्प्रतं प्रतिभासस्थं तदेकात्मन्यसम्भवात्॥ १॥ न च तद्दर्शनं भ्रान्तं नानावस्तुग्रहाद्यत:। सांवृतं ग्रहणं नान्यत् न च वस्तुग्रहो भ्रम:॥ २॥ अर्थात् एक ज्ञानसे अनेक परमाणुओंका ग्रहण होनेपर सांवृत स्थूलरूप भासित होता है। विशकलित परमाणुतत्त्वको स्थूल बुद्धि ढक देती है, इसीलिये वह सांवृति है, एक-एक परमाणुओंमें स्थूल बुद्धि असम्भव है, इस तरह स्थूल दर्शनको भ्रान्त नहीं कहा जा सकता; क्योंकि नाना वस्तु परमाणु उसके विषयमें हैं ही। जो भिन्न बुद्धिसे गृहीत होते हैं, वे ही मिलित होकर एक बुद्धिगृहीत होकर स्थूलत्वाकारसे प्रतिभासित होते हैं। विज्ञानवादी बाह्यार्थवादीके इस पक्षका भी खण्डन करता है और कहता है कि परमाणुओंमें नैरन्तर्यकी प्रतीति भ्रान्ति ही है; क्योंकि रूप परमाणु गन्ध, रस, स्पर्श, परमाणुओंसे व्यवहित ही हैं, अव्यवहित (निरन्तर) नहीं, जैसे दूरसे देखनेपर व्यवधानयुक्त अनेक वृक्षोंमें भी एक सघन वन प्रत्यय होता है। उसी तरह सान्तर व्यवहित परमाणुओंसे स्थूल प्रत्यय भ्रान्ति ही है। इस घटादि प्रत्यय ‘पीत: शंख:’ इस ज्ञानके तुल्य भ्रान्ति ही है। अत: परमाणु घटादि प्रत्ययके विषय नहीं हो सकते। कुछ लोगोंका कहना है कि स्थूल प्रत्यय स्वलक्षणविषयक है, अत: निर्विकल्पक प्रत्यय होनेसे भ्रान्त नहीं है। सविकल्प प्रत्यय अवस्तुभूत सामान्यविषयक होनेसे भ्रान्त होता है, परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि यद्यपि ‘स्थूलम्’ यह ज्ञान व्यक्ति ज्ञान है, व्यक्तिमें सम्बन्ध ग्राह्य होनेसे वह शब्द वाच्य भी नहीं है तो भी पूर्वोक्त युक्तिसे स्थूल प्रत्यय भ्रान्त है। अत: वह प्रत्यय नहीं ‘कल्पनापोढमभ्रान्तं प्रत्यक्षम्’ यही प्रत्यक्षका लक्षण है। अभिलापादि कल्पनारहित कल्पना पाठ होनेपर भी वह अभ्रान्त नहीं है। इस तरह यदि परमाणुसमूह घटादि परमाणुओंसे अभिन्न है तो परमाणु स्वरूप ही होनेसे वे घटाद्याभास प्रत्ययके गोचर नहीं हो सकते। यदि भेद है तो गवाश्वादिके समान अत्यन्त विलक्षण होनेसे उनमें तादात्म्य नहीं बन सकता। समवायसम्बन्ध भी निराकृत ही है। इसी तरह जाति-गुण-कर्मादिका भी प्रत्याख्यान किया जा सकता है। जो-जो प्रतिभासित होता है, वह-वह विचारसह है। अप्रतिभासमानके सद्भावमें कोई प्रमाण नहीं है। अत: कोई भी प्रत्यय बाह्यालम्बन नहीं होते हैं। विज्ञानवादीका यह भी कहना है कि यह नहीं कहा जा सकता कि विज्ञान इन्द्रियकी तरह स्वयं विलीन (अज्ञात) रहकर ही अर्थका प्रकाशन करेगा। यह भी नहीं कहा जा सकता कि जैसे इन्द्रिय अर्थविषयक ज्ञान उत्पन्न करती है, वैसे ही ज्ञान भी किसी अन्य ज्ञानको उत्पन्न करेगा; क्योंकि इस तरह समान होनेसे वह ज्ञान भी ज्ञानान्तर जनन करेगा तो अनवस्था प्रसंग होगा। यह भी नहीं कहा जा सकता कि ज्ञान अर्थमें प्राकटॺ लक्षण फलका आधान करेगा; क्योंकि अतीत-अनागत विषयोंमें अविद्यमानताके कारण प्राक‍्स्वरूप फलका आधान हो ही नहीं सकता, इसलिये यह मानना चाहिये कि ज्ञानस्वरूपकी प्रत्यक्षता ही अर्थकी प्रत्यक्षता है, वह ज्ञान अनाकार होनेसे स्वभावत: भेदरहित है, फिर उसके द्वारा अर्थभेद अवस्था कैसे हो सकती है? अत: अर्थभेद व्यवस्थाके लिये ज्ञानमें आकार-भेद भी स्वीकार करना आवश्यक है। पीछे कहा जा चुका है कि ‘वित्तिसत्ता ही अर्थवेदन नहीं हो सकती इत्यादि, परंतु आकार एक ही अनुभूत होता है। यदि यह विज्ञानका आकार है तो अर्थ सद्भावमें कोई प्रमाण नहीं सिद्ध होता।’ एक रूपसे उत्पन्न होनेवाले ज्ञानोंमेंसे घटज्ञान, पटज्ञान आदि रूपसे प्रतिविषयोंमें पक्षपात प्रतीत होता है, वह ज्ञानगत विशेषके बिना उपपन्न नहीं हो सकता; अत: ज्ञानमें विषय-सारूप्य मानना चाहिये। यदि ज्ञानमें विषयसारूप्य मान लिया गया तो ज्ञानकी विषयाकारता ज्ञानसे ही अवरुद्ध है, फिर बाह्यार्थ सद्भावकी कल्पना व्यर्थ ही है। इसी तरह सहोपलम्भ नियमसे भी विषय और ज्ञानका अभेद मालूम पड़ता है, इनमेंसे एकके उपलम्भ हुए बिना दूसरेका उपलम्भ नहीं होता। यदि ज्ञान और अर्थका स्वाभाविक भेद हो तो यह नियम नहीं बन सकता। घट-पट आदि भिन्न हैं तो उनमें सहोपालम्भका नियम नहीं होता है। मृत्तिका और घटमें सहोपालम्भका नियम होता है, अत: मृत्तिकासे भिन्न घटकी सत्ता नहीं होती। यही स्थिति ज्ञान और ज्ञेयके सम्बन्धमें भी कही जा सकती है। जिसका जिसके साथ नियमेन सहोपालम्भ होता है, वह उससे भिन्न नहीं होता। जैसे एक चन्द्रसे भ्रान्तिसिद्ध द्वितीय चन्द्रका भेद नहीं होता, उसी तरह ज्ञानके साथ अर्थका सहोपालम्भनियत है। भिन्न-भिन्न घट-पटको एवं दो अश्विनीकुमारोंका भी ऐसा सहोपालम्भ नियम नहीं होता, अपितु पृथक् भी उनका उपालम्भ होता है। बादलसे एकके ढके रहनेपर भी दूसरा दिखता है। इस तरह भेद व्यापक अनियमके विरुद्ध सहोपालम्भ नियम तद् व्याप्यभेदको निवृत्त कर देता है, यही विज्ञानवादियोंका सिद्धान्त निम्नकारिकासे व्यक्त होता है— सहोपालम्भनियमादभेदो नीलतद्धियो:। भेदश्च भ्रान्तिविज्ञानैर्दृश्येतेन्दाविवाद्वये॥ अर्थात् सहोपालम्भके नियमसे नीलज्ञेय और नीलज्ञानका अभेद ही है। भ्रान्तिके कारण भेद उसी तरह प्रतीत होता है, जैसे अद्वितीय चन्द्रमें चन्द्रका भेद प्रतीत होता है। जैसे स्वप्न, माया, रज्जु, सर्प तथा गन्धर्वनगरादि प्रत्यय बाह्यार्थके बिना ही ग्राह्य-ग्राहकाकार होते हैं, वैसे ही जागरितकालके घटादि-प्रत्यय भी बाह्यार्थ बिना ही ग्राह्य-ग्राहकाकार होते हैं; क्योंकि सभीमें प्रत्ययत्व समान है। अर्थात् जो-जो प्रत्यय है, वह सभी बाह्यार्थशून्य है। किसीका भी बाह्यार्थ आलम्बन (विषय) नहीं होता है। प्रत्ययत्व स्वभाव ही इसमें हेतु है। जैसे शिंशपात्व निम्बत्वादि-मात्रानुबन्धिनी वृक्षता होती है, उसी प्रकार प्रत्ययत्वमात्रानुबन्धिनी बाह्यानालम्बनता रहती है। जैसे शिंशपात्व निम्बत्वादि जहाँ हैं, वहाँ वृक्षता होती ही है, उसी तरह प्रत्ययत्व जहाँ है, वहाँ निरालम्बनता है ही। इसी तरह प्रत्ययत्व हेतुसे ही स्वप्नादि प्रत्ययोंके समान ही घटादि प्रत्ययकी निरालम्बनता सिद्ध होती है। इस सम्बन्धमें सौत्रान्तिक कहता है कि बाह्यार्थ न रहनेसे घटादि प्रत्ययोंमें विचित्रता किसी तरह उपपन्न नहीं हो सकती है, अत: बाह्यार्थका स्वीकार करना आवश्यक है। इस विषयमें निम्न अनुमान किया जा सकता है, जिसके रहनेपर भी जो कादाचित्क होते हैं, वे तद्भिन्न हेतुकी अपेक्षा रखते हैं, जैसे मुझमें आलयविज्ञान जिगमिषा (गमनेच्छा) विवक्षा (भाषणेच्छा) न रहनेपर भी जब वचन, गमन प्रतिभास प्रत्यय होता है तो उन्हें मेरेसे भिन्न पुरुषान्तर संतानसापेक्ष मानना पड़ता है। इसी तरह ‘अहं अहम्’ इस रूपसे उदीयमान आलयविज्ञानसे जायमान शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध और सुखादि प्रत्यय कादाचित्क होते हैं, ये छहों अर्थ प्रकृतिके हेतु होनेसे प्रवृत्ति विज्ञान कहे जाते हैं। ये आलयविज्ञानके रहनेपर भी कभी ही होते हैं, अत: ये भी ज्ञानातिरिक्त हेतुसे उत्पन्न होने चाहिये। जो आलय-विज्ञान संतानातिरिक्तका कादाचित्क प्रवृत्ति विज्ञान विशेषका हेतु है, वही बाह्यार्थ है। यहाँ विज्ञानवादी कहता है कि वासनापरिपाक प्रत्ययमें कादाचित्क होनेसे प्रवृत्ति-विज्ञानका बाह्यार्थ-निरपेक्ष ही कादाचित्क उत्पाद बन जायगा; क्योंकि विज्ञानवादके अनुसार एक संतानवर्ती आलय-विज्ञानोंकी प्रवृत्ति विज्ञान जनन-शक्ति ही वासना है, उस शक्तिका स्वकार्य जननाभिमुखता ही परिपाक है। स्वसंतानवर्ती पूर्व क्षण ही उस परिपाकका प्रत्यय हेतु है। अर्थात् प्रवृत्ति-विज्ञानजनक आलय-विज्ञानसे पूर्व उसी आलय-विज्ञान संतानमें जब कभी उत्पन्न नीलादि प्रत्यय ही वासना परिपाकका हेतु (प्रत्यय) है। विज्ञानवादीके अनुसार स्वसंतानपतित नील प्रत्ययक्षण ही उत्तरवर्ती वासना परिपाकका हेतु माना जाता है। सर्वज्ञादि संतानवर्ती क्षण वासना परिपाकका कारण नहीं होता, इसपर सौत्रान्तिकका कहना है कि प्रवृत्ति विज्ञानजनक आत्मा-विज्ञानवर्ति-वासना परिपाकके प्रति आलय-विज्ञान संतानवर्ती सभी क्षणोंको हेतु कहना चाहिये, अन्यथा किसी भी क्षणको हेतु नहीं कहा जा सकता; क्योंकि सभी क्षण संतानान्त:पाती हैं, फिर क्या कारण है कि कोई क्षण वासना परिपाकका हेतु बने और कोई न बने। यहाँ विज्ञानवादी कहता है कि क्षणभेदसे शक्तिमें भेद होता है। इस प्रकार आलय-विज्ञान संतानवर्ती क्षणोंमें भेद है तथा प्रतिक्षणोंमें शक्ति भेद भी है। वह शक्तिविशेष कादाचित्क ही होता है। उस शक्त एक क्षणके अनन्तर उसका कार्य आलय-विज्ञान क्षणवर्तिवासना परिपाक भी कादाचित्क होगा। पुनश्च तज्जनित प्रवृत्ति विज्ञान भी कादाचित्क होगा। विज्ञानवादीके इस पक्षका खण्डन करता हुआ सौत्रान्तिक कहता है कि फिर तो आलय-विज्ञान संतानसे एक ही आलय-विज्ञानमें नीलादि प्रवृत्ति विज्ञानजनकता होगी और उसमें प्राक्तन-आलय-विज्ञानवर्ती एक नीलादि विज्ञान क्षणमें वासना परिपाक हेतुता होगी। उस तरह एक संतानमें एक ही आलय-विज्ञान प्रवृत्ति-विज्ञानजनन समर्थ होगा और उससे प्राक्तन-आलय-विज्ञानवर्ती नील विज्ञान क्षण ही वासना परिपाकका हेतु होगा। इस तरह एक आलय संतानमें दो ही क्षण कारण होंगे और कोई भी क्षण कारण नहीं होगा, परंतु होता है इसके विपरीत। अनेकों बार नील विज्ञान होते ही हैं। यदि तदितर पूर्व ज्ञानोंमें परिपाक हेतुता हो और उत्तरोत्तर आलय विज्ञानोंमें प्रवृत्ति विज्ञानजनकता हो तो यह कैसे कहा जा सकता है कि क्षण भेदसे शक्तिभेद मान्य है। ऐसी स्थितिमें यदि विज्ञानवादी आलय-विज्ञान संतानवर्ती सभी क्षणोंका प्रवृत्ति विज्ञान जनन समर्थ तथा सभी तत्संतानवर्ती प्राक्तन नीलादि ज्ञान क्षणोंको वासनापरिपाकका हेतु मानता है तो समर्थमें कालक्षेप होता नहीं। अत: सदा ही नीलज्ञान होते रहना चाहिये, नीलज्ञानको कादाचित्क न होना चाहिये। इस प्रकार विचार करनेपर स्वसंतान मात्राधीन होनेपर कादाचित्कत्वके विरुद्ध सदा तत्त्वकी प्राप्ति होती है। उससे नीलज्ञानका कादाचित्कत्व निवृत्त होगा, परंतु यह उपलब्धि विरुद्ध है। नीलज्ञानमें कादाचित्कत्व उपलब्ध होता ही है। इसलिये आलय विज्ञानसे अन्य बाह्यार्थ सापेक्ष होनेपर भी नीलज्ञानका कादाचित्कत्व बन सकता है और तब जिसके रहनेपर भी जो कादाचित्क होते हैं, वे तदतिरिक्त सापेक्ष होते हैं। इस प्रकार सौत्रान्तिकके द्वारा कथित व्याप्यव्यापकका व्याप्ति सम्बन्ध सिद्ध होता है। यदि कहा जाय कि नीलविज्ञान हेत्वन्तर अपेक्षा रख सकता है, पर वह हेत्वन्तर अन्य आश्रय-विज्ञान संतान ही हो सकता है बाह्यार्थ नहीं, परंतु यह ठीक नहीं, कारण कि विज्ञानवादी प्रवृत्ति विज्ञानोंको संतानान्तर निबन्धन नहीं मानते। जिस समय चैत्रसंतानमें गमन, वचन प्रतिभासप्रत्यय विच्छिन्न होते हैं, उस समय मैत्रसंतानमें रहनेवाले वचन, गमन प्रतिभास निमित्तक ही चैत्रमें गमनवचनादि गोचर प्रवृत्ति विज्ञान उत्पन्न होते हैं, किंतु विवक्षु, जिगमिषु चैत्रमें होनेवाले गमनवचन प्रतिभास चैत्र संतान हेतुक ही होते हैं। स्वसंतानहेतुक प्रवृत्तिविज्ञान माननेपर पूर्वोक्तरीतिसे नीलादिज्ञानका कादाचित्क नहीं बन सकता। अत: नीलादिज्ञानको बाह्यार्थ सापेक्ष मानना ही ठीक है। यदि प्रवृत्तिज्ञानको अन्यसंतान निमित्तक माना जाय तो भी वह सत्त्वान्तर संतान भी तो सदा सन्निहित ही रहता है। अत: प्रवृत्तिविज्ञानोंका कादाचित्कत्व बन नहीं सकता; क्योंकि चैत्रसंतानसे मैत्रसंतानका देश तथा कालद्वारा विप्रकर्ष (दूरी) सम्भव नहीं है। इसमें यह कारण है कि विज्ञानवादीको विज्ञानसे भिन्न देशकालादि अमान्य ही होते हैं। अमूर्त होनेसे विज्ञानोंको अदेशात्मक माना जाता है, अत: देशकृत विप्रकर्ष नहीं हो सकता। इसी तरह विज्ञान संतानोंका कालकृत विप्रकर्ष भी नहीं हो सकता; क्योंकि सादिता दोष प्रसक्तिके डरसे विज्ञानवादी नवीन सत्त्वों (विज्ञानसंतानरूप आत्मा)-का आविर्भाव नहीं मानते हैं। जब देशकृत या कालकृत विप्रकर्ष सम्भव ही नहीं तो संतानान्तर सन्निधान भी सर्वदा रहेगा ही, फिर प्रवृत्तिविज्ञानको सदा ही उपपन्न होते रहना चाहिये, किंतु प्रवृत्तिविज्ञानकी कादाचित्कता ही प्रत्यक्ष है, अत: बाह्यार्थ मानना अत्यावश्यक है, उसके बिना कादाचित्क प्रवृत्तिविज्ञान नहीं बन सकता। सौत्रान्तिकके इस मतका खण्डन करता हुआ विज्ञानवादी कहता है कि वासनावैचित्र्यसे प्रत्ययवैचित्र्य उत्पन्न हो ही सकता है। उसका अभिप्राय यह है कि स्वसंतानसे ही प्रवृत्तिविज्ञानोंकी उत्पत्ति मानी जाय तो भी उसके कादाचित्कत्वकी उपपत्ति हो जायगी। अत: सौत्रान्तिकके बाह्यार्थ साधकहेतुकी विपक्ष व्यावृत्ति सन्दिग्ध है,जिससे वह अनैकान्तिक है। नीलादि ज्ञानको बाह्यनिमित्तक मान भी लें तो भी क्यों कभी नीलज्ञान कभी पीतज्ञान होता है। यदि बाह्यनील पीतके सन्निधान-असन्निधानसे यह व्यवस्था कही जाय तो भी प्रश्न होगा कि पीत सन्निधानमें भी नीलज्ञान क्यों नहीं होता, पीत ही ज्ञान क्यों होता है। यदि कहें कि पीतमें नीलज्ञानजननकी सामर्थ्य नहीं है तो भी प्रश्न होगा कि यह सामर्थ्य-असामर्थ्यका भेद कैसे होता है। यदि हेतुभेदसे कहा जाय तो इसी तरह क्षणों (क्षणिक आलय विज्ञानों)-में भी स्वकारण भेदके कारण शक्तिभेद हो ही सकता है, संतानीक्षण ही कार्यभेदके हेतु होंगे, वे प्रति कार्य भिन्न ही होते हैं। संतान नामकी कोई एक वस्तु क्षणोंकी उत्पादिका नहीं होती, जिसके अभेदसे क्षणभेदमें बाधा पड़ सके। जो यह कहा जाता है कि आलय-विज्ञान क्षणोंमें स्वस्वहेतु वैचित्र्यसे सामर्थ्यभेद होनेपर भी एक संतानस्थ होनेके कारण सबमें एक ही प्रकारकी सामर्थ्य होगी, वह इसलिये ठीक नहीं कि यह कहा ही जा चुका है कि संतानके अभेद होनेपर भी क्षणोंमें सामर्थ्यभेद है। सौत्रान्तिकका कहना है कि क्षणके भेदाभेदसे शक्तिका भेदाभेद नहीं हो सकता; क्योंकि भिन्न क्षणोंमें भी एक सामर्थ्यकी उपलब्धि होती है, अन्यथा यदि एक ही क्षण नीलज्ञानजननसमर्थ हो तो पुन: कभी भी नीलज्ञानोंकी उत्पत्ति नहीं होनी चाहिये; क्योंकि इस दृष्टिसे जो समर्थ क्षण था, वह व्यतीत हो चुका और क्षणान्तरोंमें नीलज्ञानजनन सामर्थ्य है ही नहीं, इसलिये क्षणभेदसे सामर्थ्यभेद होता है, यह पक्ष उचित नहीं। एक ज्ञान संतानमें अनेकों बार नीलज्ञान होता ही है, किंतु संतानभेदसे ही सामर्थ्यभेद होता है। अत: आलय-विज्ञान संतानोंसे भिन्न बाह्य नीलादि संतानोंसे नीलादि प्रवृत्तिविज्ञानोंका उत्पन्न होना संगत होता है। इस दृष्टिसे बाह्यार्थ सिद्ध होता है, परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि यदि भिन्न संतानोंमें सामर्थ्यभेद मान्य होगा तो यह भी कहना पड़ेगा कि भिन्न संतानोंमें एक सामर्थ्य नहीं है। ऐसी स्थितिमें विभिन्न नीलसंतानोंमें भी नीलाकारके आधानकी एक सामर्थ्य होनी चाहिये। फिर तो अन्य नील संतानोंका सन्निधान रहनेपर भी नीलज्ञान न होना चाहिये, परंतु यह सब अनुभवविरुद्ध है। अत: नीलपीतादि संतानोंके समान ही स्वकारणाधीन उत्पन्न होनेवाले क्षणान्तरोंमें भी किन्हींमें सामर्थ्य विशेष होता है, किन्हींमें नहीं। इस प्रकार एक आलयविज्ञान संततिपतित क्षणोंमें किसी ही ज्ञानक्षणमें सामर्थ्यविशेष होता है, किसीमें नहीं होता। स्वप्रत्यय (पूर्वोत्पन्न नीलज्ञान)-से आसादित वही सामर्थ्यातिशय वासना है। किसीसे नीलाकार ही ज्ञान होता है, पीताकार नहीं और किसीसे पीताकार ही ज्ञान होता है, इस तरह वासनावैचित्र्यसे ही ज्ञानवैचित्र्य बन सकता है। विज्ञानवादीके कहनेका सार यह है कि बाह्यार्थवादमें भी नीलादि अर्थ क्षणिक होते हैं। तथा च नीलसंतान भी अनेक होते हैं, उनमें भी संतानभेदसे यदि शक्तिभेद माना जाय तो नीलादि संतानोंमें भी एक प्रकारकी शक्ति न सिद्ध होगी, तथा च एक ही नील नीलाकार ज्ञान उत्पन्न कर सकेगा, संतानान्तरवर्ती नील नीलाकार ज्ञानका उत्पादक न हो सकेगा। अत: क्षणभेदसे सामर्थ्यभेद माननेमें जो दोष आते हैं, संतान-भेदसे सामर्थ्यभेद माननेपर भी वे ही दोष हो सकते हैं। अत: कहना पड़ेगा कि जैसे किन्हीं संतानोंके परस्परभिन्न रहनेपर भी उनमें समान सामर्थ्य होता है, तभी अनेक नीलसंतानोंसे समानरूपसे नीलाकारज्ञान उत्पन्न हो सकता है। अत: सौत्रान्तिकको मानना पड़ेगा कि अनेक नीलपीतादि संतानोंमें स्वकारणभेदसे ही सामर्थ्यभेद होता है। तथा च कोई नीलज्ञानका जनक होता है, कोई पीत ज्ञानका। इसी तरह आलयविज्ञानपतित क्षणोंके सम्बन्धमें भी व्यवस्था हो सकती है। किन्हीं क्षणोंमें ही उस प्रकारसे आसादित वासनारूप सामर्थ्यातिशय होता है, जिससे नीलादि प्रवृत्तविज्ञान होते हैं। सबमें वह सामर्थ्य नहीं होता। अत: न तो यही कहा जा सकता है कि हर एक आलयविज्ञानसे नीलज्ञान होता रहेगा और न यही कहा जा सकता है कि एक ही आलयविज्ञानसे एक ही नील ज्ञान होगा। इस तरह वासनावैचित्र्यसे संज्ञानवैचित्र्य बन सकता है। अत: प्रलयसे अतिरिक्त बाह्यार्थके सद्भावमें कोई प्रमाण नहीं है। इस तरह आलयविज्ञान संतानपतित असंविदित पूर्वज्ञान ही वासना है। यद्यपि पहले शक्तिको वासना कहा गया था, पर यहाँ शक्ति-शक्तिमान‍्का अभेद समझकर पूर्व विज्ञानको ही वासना कहा गया है। वर्तमान ज्ञानसे विदित होता है, अनागत असिद्ध ही है। अत: पूर्वविज्ञानको ही असंविदित कहा गया है। वासनाके वैचित्र्यसे ही नीलादि अनुभवोंमें भी विचित्रता बनती है। पूर्वविज्ञानमें विचित्रता कैसे हुई इस शंकाका समाधान यही है कि अनादि संसारमें पूर्व-पूर्व नीलादि अनुभवोंसे ही उत्तरोत्तर विज्ञानोंमें वासनावैचित्र्य सम्पन्न होता है। इस प्रकार पूर्व नीलादि अनुभवोंके वैचित्र्यसे वासनावैचित्र्य होता है और वासनावैचित्र्यसे अनुभवोंमें भी विचित्रता आती है। बीजांकुरके समान यह परम्परा भी अनादि ही है। अन्वय-व्यतिरेकसे भी यही मालूम पड़ता है कि वासनावैचित्र्य ही ज्ञान-वैचित्र्यका हेतु है; क्योंकि स्वप्नादिमें स्पष्ट है कि बाह्यार्थके बिना भी वासनाके कारण ही विचित्र ज्ञान उत्पन्न होते हैं। यह उभयसम्मत है, परंतु वासनाके बिना अर्थनिमित्तक ज्ञान-वैचित्र्य उभयसम्मत नहीं है। अत: बाह्यार्थका अस्तित्व नहीं सिद्ध होता। इस प्रकार विज्ञानवादीके बाह्यार्थापलापका श्रीव्यासशंकराचार्यादि वैदिक आचार्योंने निराकरण किया है—‘नाभाव उपलब्धे:।’ अर्थात् बाह्यार्थका अभाव नहीं कहा जा सकता; क्योंकि उसका उपलम्भ होता है। यहाँ विज्ञानवादीसे प्रश्न हो सकता है कि क्या उपलम्भ न होनेसे बाह्यार्थका असत्त्व होता है या वह उपलम्भ ही बाह्यविषयक नहीं है। वाच्यार्थविषयक होनेपर भी बाधक प्रमाणके सद्भावसे बाह्यार्थाभाव है। प्रथम पक्ष तो ठीक नहीं; क्योंकि घटादिका उपलम्भ सर्वजनप्रसिद्ध है। खम्भ, कुडॺ, घट-पटादि बाह्यविषयक प्रत्येक ज्ञानोंमें स्पष्टतया बाह्यार्थ भासित होते हैं। यदि कहा जाय कि उपलम्भ तो अवश्य है, किंतु उपलम्भका विषय बाह्य घटादि असत् है तो यह भी ठीक नहीं, कारण कि जैसे कोई भोजन तथा भोजनसाध्य तृप्तिका अनुभव करता हुआ भी कहे कि ‘न मैं भोजन करता हूँ, न तृप्त ही होता हूँ’ तो उसका कहना अनर्गल है। इसी तरह इन्द्रिय-सन्निकर्षसे बाह्यार्थका उपलम्भ करते हुए भी विज्ञानवादीका यह कथन कि मैं बाह्यार्थका अनुभव नहीं कर रहा हूँ, सर्वथा अनर्गल है। यदि वह कहे कि मैं यह नहीं कहता कि मैं बाह्यार्थका अनुभव नहीं करता हूँ, अपितु यह कहता हूँ कि उपलब्धिसे भिन्न ही बाह्यार्थ नहीं है, परंतु यह भी उसका कथन ठीक नहीं, यत: उपलब्धिबलसे ही बाह्यार्थ स्वीकृत होता है। उपलब्धिग्राहक साक्षीसे जैसे उपलब्धि गृहीत होती है, वैसे ही उसकी बाह्यविषयता भी गृहीत होती है। घटादिके ज्ञानके साथ घटादि बाह्यविषय भी गृहीत होते हैं, इसीलिये बाह्यार्थका प्रत्याख्यान करनेवाला भी कहता है कि अन्तर्ज्ञेयरूप है। वही बाह्यवत् प्रतीत होता है। वे लोग भी लोकप्रसिद्ध बाह्यार्थविषयिणी संवित‍्को समझते हुए ही उसके प्रत्याख्यानके लिये बाह्यार्थको बहिर्वत् (बाह्यतुल्य) कहते हैं, अन्यथा बहिर्वत् कहनेका कुछ भी अर्थ नहीं रह जाता। अत्यन्त असत‍्के साथ उपमा-उपमेयभाव भी नहीं बन सकता। कोई यह नहीं कहता है कि विष्णुमित्र वन्ध्यापुत्रके तुल्य भासित होता है। इन सब दृष्टियोंसे अनुभवके अनुसार तत्त्व स्वीकार करनेवाले स्पष्टरूपसे कहते हैं कि घट-पटादि बाह्य अर्थ ही भासित होता है बहिर्वत् नहीं। यदि तीसरा पक्ष कहा जाय अर्थात् बाह्यमें अर्थ असम्भव है, अत: बाह्यवत् कहा जाता है, परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि सम्भवासम्भवका निर्णय प्रमाणकी प्रवृत्ति अप्रवृत्तिसे ही होता है। सम्भवासम्भवके आधारपर प्रमाणकी प्रवृत्ति अप्रवृत्ति नहीं होती। जो वस्तु प्रत्यक्षादि किसी प्रमाणसे उपलब्ध होती है, वह सम्भव है। जो किसी प्रमाणसे भी विदित न हो, वह असम्भव है। यहाँ तो यथायोग्य प्रत्यक्षानुमान आगमादि सभी प्रमाणोंसे बाह्यार्थ उपलब्ध होता है। ऐसी स्थितिमें उसमें सम्भवासम्भव आदि विकल्पोंको स्थान ही नहीं है। जो कहा जाता है कि ज्ञानमें विषय सारूप्य होनेसे बाह्यार्थका भान होता है, यह भी ठीक नहीं, कारण कि यदि बाह्यार्थ विषय ही न हो तो ज्ञानसे विषय सारूप्य भी क्या होगा? विषय तो ‘इदन्ता’ एवं बाह्यरूपसे ही उपलब्ध होता है, फिर उसका अपलाप कैसे किया जा सकता है। सार यह है कि यद्यपि घट-पटादि स्थूलरूपमें भासित होते हैं, परम सूक्ष्ममें नहीं। नाना दिशाओं एवं देशोंमें व्यापी होना ही अर्थकी स्थूलता है, अर्थात् युगपद्भिन्न देशव्यापित्व या भिन्न दिग्व्यापित्व ही वस्तुकी स्थूलता है। तथा च एकदिग्देशमें अर्थका आवरण और अन्य दिग्देशमें अनावरणरूप विरुद्धधर्मयोगसे एक ही स्थूलवस्तुमें भेदकी प्रसक्ति होती है, परंतु यदि वस्तु ज्ञानाकार ही हो तो उपर्युक्त दोष प्रसक्त नहीं होता। कारण ज्ञानका सदा अनावरण ही रहता है। जिस समय जिस रूपमें जितनी वस्तु दिखती है, वह उतनी है ही; क्योंकि विज्ञानसे भिन्न वह है ही नहीं, परंतु यदि वस्तु बाह्य है तो वह सर्वात्मना कभी गृहीत हो ही नहीं सकता। हाथमें रखे हुए भी आमलकका अधोभाग नहीं दिखायी पड़ता। इस तरह एक ही वस्तुका कोई अंश दृष्टिगोचर होता है, कोई नहीं। इस दर्शन-अदर्शनसे उसे आवृत्त-अनावृत दोनों ही कहना पड़ेगा, तथा च विरुद्ध धर्मके अध्याससे एक ही वस्तुमें भेद प्रसक्त होगा। विज्ञानवादमें यह दोष नहीं होता, कारण कि विज्ञानमें जितना आकार भासित होता है, उतनी ही वह वस्तु है। उनके यहाँ यदृष्ट आवृत पदार्थ है ही नहीं, तथापि विज्ञानवादीका उपर्युक्त कथन ठीक नहीं, कारण कि इस प्रकारका दोष तो उसके मतमें भी अपरिहार्य ही होगा। भले ही वस्तुका ज्ञानाकार मान लेनेसे उसमें अवभास-अनवभासरूप विरुद्ध धर्मका प्रसंग न हो, परंतु एक ज्ञानसे प्रकाशित अनेक तन्तु देशोंमें रहनेवाले चित्रपटमें तद्देशत्व अतद्देशत्व रूपविरुद्ध धर्म देखा ही जाता है। प्रदेशभेदसे उसीमें कम्प और अकम्प भी देखते हैं। रक्तत्व-अरक्तत्वकी उपलब्धि भी उसीमें होती है। इस प्रकार पटको ज्ञानाकार मान लें तो भी विरुद्धधर्मवत्ता तथा भेदप्रसक्ति समान ही है, उसका निवारण विज्ञानवादीके लिये अशक्य ही है। अर्थ और ज्ञानका अभेद माना जाय तो और भी अनेक दोष प्रसक्त होंगे, जैसे अवयवी अवयवोंसे भिन्न है या अभिन्न? यदि भिन्न है तो भी अवयवी समस्त अवयवोंमें रहता है या प्रत्येक अवयवोंमें। यदि प्रत्येक अवयवोंमें तो भी सम्पूर्णरूपसे रहता है या एक देशसे। यदि समस्त अवयवोंमें अवयवी रहता है तो अवयवीकी उपलब्धि न होनी चाहिये। कारण कि समस्त अवयवोंकी उपलब्धिसे ही अवयवीकी उपलब्धि हो सकती है। सर्वावयव सन्निकर्ष न होनेसे जब सब अवयवोंका उपलम्भ नहीं होता तो अवयवीकी उपलब्धि कैसे होगी। जैसे अनेक आश्रयोंमें रहनेवाला बहुत्व किसी एक आश्रयके ग्रहणसे नहीं गृहीत होता। इसी प्रकार सहस्र तन्तुओंमें रहनेवाला पट कुछ तन्तुओंके ही ग्रहणसे कैसे गृहीत होगा। यदि कहा जाय कि पट अपने अवयवोंद्वारा आरम्भक अवयव तन्तुओंमें रहता है तो आरम्भक अवयवोंसे भिन्न पटके पृथक् अवयव मानने पड़ेंगे। इस तरह अनवस्था भी होगी। उन अवयवोंमें भी वर्तनेके लिये पटको अन्य और अवयव अपेक्षित होंगे। यदि प्रत्येक अवयवमें अवयवी माना जाय तो एक जगह व्यापार होनेपर अन्यत्र अव्यापार प्रसंग होगा; क्योंकि जिस समय देवदत्त काशीमें वर्तमान रहता है, उसी समय काश्मीरमें सन्निहित नहीं रहता। कोई परिच्छिन्न वस्तु अगर एक समयमें ही अनेक स्थानोंमें सन्निहित हो तो उसे एक नहीं, अपितु अनेक समझना चाहिये। इस स्थितिमें यदि प्रत्येक अवयवोंमें अवयवी माना जाय तो अनेकत्वापत्ति होगी। फिर एक अवयववर्ती पटके व्यापृत होनेपर भी अन्यावयववर्ती पटको अव्यापृत ही रहना चाहिये। यदि कहा जाय कि जैसे गोत्व प्रत्येक गो व्यक्तिमें समाप्त होता है, वैसे ही प्रत्येक अवयवोंमें अवयवी परिसमाप्त हो जाता है तो यह ठीक नहीं, कारण कि जैसे गोत्व प्रति व्यक्तिमें प्रत्यक्ष उपलब्ध होता है, वैसे ही अवयवी प्रत्येक अवयवोंमें प्रत्यक्ष उपलब्ध नहीं होता। यदि प्रत्येक अवयवमें पूरा अवयवी मान लिया जाय तो शृंगसे भी स्तनका कार्य होना चाहिये, परंतु ऐसा होता नहीं। इसी तरह यदि कहा जाय कि एक अणु दूसरे अणुसे सर्वात्मना संयुक्त होता है तो उपचय नहीं होगा, यदि एक देशसे उनका मिलना माना जाय तो उनमें सावयवापत्ति होगी। कल्पित प्रदेश तो मिथ्या होनेसे अकिंचित्कर ही होंगे। जो रूपादिमान् होते हैं, वे परम कारणकी अपेक्षा स्थूल एवं अनित्य होते हैं, जैसे तन्तुकी अपेक्षा पट और अंशुओंकी अपेक्षा तन्तु स्थूल होते हैं, उसी तरह परमाणुओंको स्थूल और अनित्य होना चाहिये। पृथिव्यादि परमाणुओंमें यदि गन्धादि गुणोंका उपचय माना जाय तो परमाणुओंकी मूर्तियोंका उपचय होगा। गन्ध, रस, रूप, स्पर्श—इन चार गुणोंसे युक्त होनेके कारण पृथ्वी परमाणुको स्थूल होना चाहिये, साथ ही वायुमें केवल स्पर्श गुण होनेके कारण उसमें सूक्ष्मता प्राप्त होगी, इस प्रकार परमाणुओंमें भी तारतम्य होगा। यदि परमाणुओंमें गुणोपचय न माना जाय तो परमाणुकार्य पृथिव्यादिमें भी गुणोपचय नहीं दीखना चाहिये। यदि परमाणुको निरंश माना जाय तो द्वॺणुकादिमें स्थूलता न बन सकेगी। यदि वह सांश हो गया तो उसमें अनित्यता आदि भी होगी इत्यादि जो दोष वैशेषिकोंके मतमें लागू होते हैं, वे सब सौत्रान्तिक एवं विज्ञानवादी बौद्धोंके यहाँ भी लागू होंगे। जगत‍्को अनिवर्चनीय माननेवाले वेदान्तीके लिये तो वस्तुओंका विचारासहत्व भूषण ही है। किंतु बौद्धोंके यहाँ यह नहीं कहा जा सकता। बाह्य अस्तित्ववादी जैसे पदार्थोंको बाह्य मानता है, उसी तरह विज्ञानवादी उन सभी पदार्थोंको अन्त:सत्य मानता है। यदि आन्तर पदार्थ सत्य हैं तो जैसे बाह्यपदार्थोंमें स्थौल्य आदि असम्भव हैं, वैसे ही आन्तर पदार्थोंमें भी स्थौल्य आदि असम्भव ही होंगे, ऐसी स्थितिमें वैशेषिकोंके पक्षमें कहे गये सभी दोष विज्ञानवादमें भी लागू होंगे। यदि कहा जाय कि ज्ञानसे अभिन्न अर्थ माननेपर एक बुद्धिभासित पटमें तद्देशत्व अतद्देशत्वादि विरुद्धधर्म संसर्ग प्रसक्त न होंगे; क्योंकि ज्ञानके विषय परमाणु ही होंगे, उनमें तद्देशत्व-अतद्देशत्वादिका कोई प्रसंग ही नहीं होगा। परंतु यह भी कथन ठीक नहीं है; कारण कि यहाँ विचारना होगा कि ज्ञान-ज्ञेयका अभेद क्या है। ज्ञान ज्ञेयमात्र है या ज्ञेय ज्ञानमात्र है। पहला पक्ष ठीक नहीं; क्योंकि यदि अनेक नीलपरमाणुओंका आलम्बन करनेवाला ज्ञान ज्ञेयमात्र है तो ज्ञेय नानात्वके समान ही एक नीलज्ञानमें भी नानात्वापत्ति होगी। यदि ज्ञेय ज्ञानमात्र माना जाय तो आकारोंके ज्ञानसे अभेद होनेसे अनेक आकारोंमें एकत्वापत्ति दोष होगा। यह भी नहीं कहा जा सकता है कि जितने आकार हैं, उतने ही ज्ञान हैं; क्योंकि इस तरह नानापरमाणुओंको आलम्बन करनेवाले अनेक ज्ञानोंके परस्पर वार्तानभिज्ञ होनेसे उनमें स्थूल वस्तुका अनुभव असम्भव ही होगा। यह भी नहीं कहा जा सकता कि एक-एक ज्ञानसे संगृहीत नाना परमाणुओंका परामर्शरूप एक विकल्प ज्ञान ही स्थूलालम्बन है; क्योंकि वह ज्ञान भी आकार ही होगा। उसके आकार नाना परमाणुओंका भी ज्ञानसे अभेद ही होगा। यदि ज्ञान ज्ञेयमात्र होगा तो ज्ञेयभेदसे ज्ञानमें भेदापत्ति होगी। यदि आकार ज्ञानमात्र होगा तो भी आकारोंमें एकत्वापत्ति होगी, इसलिये स्थूलालम्बन एक ज्ञान असम्भव ही होगा! जैसा कि धर्मकीर्तिका कहना है कि— तस्मान्नार्थे न च ज्ञाने स्थूलाभासस्तदात्मन:। एकत्वं प्रतिषिद्धत्वाद‍्बहुष्वपि न सम्भव:॥ अर्थात् वृत्ति विकल्पादि पूर्वोक्त तर्कोंसे बाह्य परमाणुसमूहात्मक तथा ज्ञानात्मक आन्तरविषय माना जाय, तब भी स्थूलाभास प्रत्यय नहीं बन सकता; क्योंकि पूर्ववर्णित पद्धतिसे ही नाना परमाणुओंका आलम्बन करनेवाले एक ज्ञानमें जैसे स्थूलविषयता नहीं बन सकती, उसी तरह परमाणुगोचर नाना ज्ञान हो तो परस्पर वार्तानभिज्ञ होनेके कारण स्थूलाभास प्रत्यय नहीं हो सकता। अत: ज्ञानाकार स्थूलताके समर्थन करनेवाले विज्ञानवादीको भी प्रमाणकी प्रवृत्ति एवं अप्रवृत्तिके आधारपर ही सम्भव-असम्भवकी व्यवस्था माननी पड़ेगी। तथा च प्रमाण-प्रवृत्तिबलसे ही ज्ञानभिन्न इदन्तास्पद बाह्यार्थका अपह्नव नहीं किया जा सकता। जो ज्ञानकी प्रतिविषय व्यवस्थाके लिये ज्ञानमें विषयसारूप्य माना जाता है, उससे भी विषयका अपलाप नहीं हो सकता; क्योंकि यदि अर्थ है ही नहीं तो ज्ञानमें किसकी सरूपता होगी? और विषय न होनेपर प्रतिविषय-ज्ञान-व्यवस्थाका भी क्या अर्थ रह जाता है। सुस्पष्टरूपसे बाह्यार्थका उपलम्भ होता है, अत: उसका अस्तित्व मानना अनिवार्य है। सहोपलम्भ नियमपर भी यह विचारणीय है कि क्या ज्ञान और अर्थका साहित्येन (साथ-साथ) उपलम्भ ही होना सहोपलम्भ है? यदि हाँ, तो सहोपलम्भ हेतुविरुद्ध है, इसके द्वारा अभेदकी सिद्धि नहीं हो सकेगी। साहित्येन उपलम्भ तभी बन सकता है, जब ज्ञान और अर्थ दो वस्तु हों। अत: भेदगर्भित हेतुसे अभेदसिद्धि असम्भव है। साहित्य अभेदविरुद्ध भेदव्याप्य होता है। जहाँ साहित्य होगा, वहाँ भेदका होना अनिवार्य होता है। यदि एकोपलम्भ नियम अर्थात् एक उपलम्भ से ज्ञान और अर्थका ग्रहण होना ही सहोपलम्भ है तो यह भी संगत नहीं है; क्योंकि सहोपलम्भमें ‘सह’ शब्द एकत्वका वाचक नहीं है, फिर सहोपलम्भका एकोपलम्भ कैसे हो जायगा? यदि कहा जाय कि अर्थैकोपलम्भ ही हेतु समझ लेना चाहिये, फिर भी यह विचारणीय होगा कि एकत्वेन उपलम्भ एकोपलम्भ है अथवा ज्ञान और अर्थका एक उपलम्भ होना ही एकोपलम्भ है? पहला पक्ष ठीक नहीं; क्योंकि ज्ञान और अर्थका एकत्वेन ग्रहण नहीं होता, ज्ञान आन्तररूपसे गृहीत होता है और अर्थ बाह्यरूपसे। आगे बताया जायगा कि कहीं ज्ञानका नानात्व होनेपर भी विषयका एकत्व रहता है, कहीं विषय नानात्व रहनेपर भी ज्ञानका एकत्व रहता है, एकत्वेन उपलम्भ कहाँ है! दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं; क्योंकि वह तो उपायोपेयभावके कारण उत्पन्न हो जाता है, उससे अभेदकी सिद्धि नहीं हो सकती। अतएव सहोपलम्भ नियम भी ज्ञान और विषयके उपायोपेयभावके कारण उपपन्न है, अभेदके कारण नहीं। जिस प्रकार मनुष्योंको सभी बुद्धिबोध्य चाक्षुषरूपादि पदार्थ प्रमाके रूपसे अनुबुद्धि ही गृहीत होते हैं, प्रमाके साथ ही नील-पीतादिरूपका उपलम्भ होता है तो भी इस सहोपलम्भसे यह नहीं कहा जा सकता कि प्रमा और रूप अभिन्न हैं, किंतु यही कहना पड़ेगा कि प्रमा रूपोपलम्भका उपाय है। इसलिये सहोपलम्भ नियम होता है, इसी तरह अर्थोपलम्भका आत्मसाक्षिक अनुभव ही उपाय है। इसलिये ज्ञेय-ज्ञातका सहोपलम्भ नियम होता है, इस तरह सहोपलम्भ नियम अभेदका साधक नहीं होता। जहाँपर घट-पटादि अनेक पदार्थ एक ज्ञानगोचर होते हैं, वहाँ सभी समझदार समझते हैं कि ज्ञेय अर्थका भेद है और ज्ञानका अभेद होता है। यदि ज्ञान और ज्ञेयका अभेद ही हो तो ज्ञानके एक होनेसे विषयको भी एक होना चाहिये। वैसे भी घटज्ञान, पटज्ञान आदिमें घट-पट आदि विशेषणोंका ही भेद है, विशेष ज्ञान तो एक ही है। जैसे ‘शुक्ल गौ, कृष्ण गौ’ इत्यादि स्थलोंमें गोत्वका अभेद रहनेपर भी कृष्णता-गौरता आदिका ही भेद रहता है। दोसे एकका, एकसे दोका भेद प्रसिद्ध ही है। इस तरह जैसे अनेक शुक्लता-कृष्णतासे एक गोत्वका भेद होता है, उसी तरह अनेक घट-पटादि विषयोंसे एक ज्ञानका भी भेद ही समझना चाहिये। इसलिये ज्ञान और ज्ञेयका भेद ही सम्यक् है। इसी तरह अर्थ अभेद रहनेपर भी ज्ञानमें भेद होता है। घटका दर्शन, घटका स्मरण आदि स्थलोंमें विशेष्य दर्शन एवं स्मरणमें भेद है, घट विशेषणका अभेद है। जैसे क्षीरगन्ध क्षीररस यहाँ विशेष्य गन्ध और रसका भेद है, विशेषण क्षीरका अभेद होता है, इस तरह भी ज्ञान-ज्ञेयका भेद सिद्ध होता है। पूर्वोत्तरवर्ती दो विज्ञान स्वसंवेदनसे ही उपक्षीण हो जाते हैं। उनमें परस्पर ग्राह्य-ग्राहक भाव नहीं बन सकता। फिर भेद ही कैसे सिद्ध होगा अर्थात् स्वरूपमात्रमें पर्यवसित ज्ञान एक दूसरे ज्ञानको जान ही नहीं सकता, फिर जिन दोनोंका भेद होता है, वे ही जब अगृहीत हैं तो तद‍्गतभेद सुतरां असिद्ध ही होगा; क्योंकि भेदज्ञानके लिये अनुयोगी—प्रतियोगीका ज्ञान अपेक्षित होता है। इसी तरह सब क्षणिक हैं, सब शून्य हैं तथा सब अनात्मा हैं इत्यादि अनेक प्रतिज्ञाएँ, हेतुदृष्टान्त—ये सभी ज्ञानभेदसे ही साध्य हैं। यही दशा स्वलक्षण, सामान्यलक्षण, वास्य-वासक, अविद्योपप्लव, सदसद्धर्म, बन्ध-मोक्षादि प्रतिज्ञाओंका भी है। अन्यसे व्यावृत्त अपना असाधारणरूप ही स्वलक्षण होता है। जो व्यावृत्त होता है और जिनसे व्यावृत्त होता है, उन सबका अनेक ज्ञानोंसे ही बोध सम्भव है। इसी तरह विधिरूप या अन्यापोह रूप सामान्य लक्षण भी अनेक ज्ञान-गम्य ही होता है। वास्य-वासकभाव भी अनेक ज्ञानसाध्य है। उत्तरज्ञानमें नीलाद्याकार समर्पण करनेकी उपयुक्त शक्ति पूर्वज्ञानमें होती है। अत: पूर्वज्ञान वासक है और उत्तरज्ञान वास्य होता है। अविद्योपप्लवमें वास्यवासकत्व हेतु है। अविद्योपप्लव सदसद्धर्मोंमें हेतु होता है। जैसे नीलादिसद्धर्म है, नर-विषाणादि असद्धर्म है। अमूर्त सदसद्धर्म है; क्योंकि शशविषाणको अमूर्त कह सकते हैं। यही बात बौद्धकारिकामें कही गयी है— अनादिवासनोद‍्भूतविकल्पपरिनिष्ठित:। शब्दार्थस्त्रिविधो धर्मो भावाभावोभयाश्रय:॥ भाव यह है कि अनादिवासनाजन्य सविकल्प प्रत्यय स्वरूपज्ञानसे परिनिष्ठित अर्थात् विषयीकृत शब्दार्थ तीन प्रकारका होता है। जैसे भाव—नीलत्वादि, अभाव-नरविषाणत्वादि अभयाश्रय, अमूर्तत्वादि। इसी तरह मोक्षप्रतिज्ञा भी भेदसाध्य ही है। जो मुक्त होता है, जिससे मुक्त होता है, जिस साधनसे मुक्त होता है और जो प्रतिपादन करता है, ये सब अनेक ज्ञान-साध्य हैं। पूर्वोक्त युक्तिसे जब ज्ञानभेद ही असिद्ध है, तब इन सबमें अपेक्षित भेद कैसे सिद्ध होगा? अत: अनेक अर्थोंका प्रतिसंधान करनेवाले एक प्रतिसन्धाता, प्रत्यभिज्ञाताके बिना यह असम्भव है। विज्ञानसे भिन्न उसका आलम्बन न होकर अगर स्वांश ही विज्ञानका आलम्बन हो तो उक्त व्यवस्था कथमपि न बन सकेगी। कर्म फलभाव एवं ज्ञान-ज्ञेयभाव भी भेदमें ही सम्भव होता है। अभिन्न ज्ञानमें ही ग्राह्य-ग्राहक भाव कैसे सम्भव होगा? छिदि क्रियाके द्वारा तद्भिन्न काष्ठ आदि छिन्न होता है, स्वयं छिदि ही छिदिसे छिन्न होती नहीं देखी जाती। इसी तरह पाक क्रिया ही नहीं पकती, अपितु पाक क्रियासे तण्डुल पकते हैं। उसी तरह यहाँ भी ज्ञान ही स्वांशसे ज्ञेय नहीं होता है; क्योंकि अपनेमें ही अपनी वृत्ति विरुद्ध है। जैसे पाकसे अतिरिक्त तण्डुल, छिदिसे पृथक् छेद्य काष्ठ होता है, वैसे ज्ञानसे अतिरिक्त ज्ञेय होता है। अत: ज्ञानज्ञेयका भेद ही है। इसके अतिरिक्त यह बात भी विचारणीय है कि जब घटविज्ञान, पटविज्ञान आदि अनुभवोंके अनुसार जैसे विज्ञानको स्वीकार किया जाता है, वैसे घट-पटादि बाह्यार्थोंको अंगीकार क्यों न किया जाय? यदि कहा जाय कि विज्ञानका अनुभव होता है, तो उसी तरह बाह्यार्थ घटादिका भी अनुभव होता ही है। यदि कहा जाय कि विज्ञान प्रकाशात्मक होनेसे प्रदीपवत् स्वयं अनुभूत होता है। बाह्यार्थ इस प्रकार नहीं अनुभूत होता तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि जैसे ‘अग्नि अपनेको जलाता है’, यह कहना अत्यन्त विरुद्ध है, वैसे विज्ञान अपनेको जानता है, प्रकाशित करता है, यह कहना भी अत्यन्त विरुद्ध है। यह कहा ही जा चुका है कि पाक अपनेको नहीं पकाता है। फिर बाह्यार्थ स्वव्यतिरिक्त विज्ञानसे प्रकाशित होता है, यह लोकप्रसिद्ध तथा अविरुद्ध ही है। अप्रसिद्ध एवं विरुद्ध बातको मानना और अविरुद्ध एवं लोकप्रसिद्ध बातको न मानना—यह विज्ञानवादी बौद्धोंका कैसा पाण्डित्य है? अत: यह कहना सर्वथा निराधार है कि विज्ञेयसे अभिन्न विज्ञान स्वयं ही अनुभूत होता है; क्योंकि स्वसे स्वक्रियाका होना विरुद्ध है। फिर भी विज्ञानवादी बौद्ध कहते हैं कि ‘यदि विज्ञान स्वभिन्न विज्ञानसे ग्राह्य होगा तो वह विज्ञान भी अन्य विज्ञानसे ग्राह्य होगा और इसी तरह अन्य ज्ञान भी इस प्रकार अनवस्था दोष होगा। साथ ही प्रदीपके समान ही विज्ञान भी अवभासात्मक ही है। जैसे प्रदीपका प्रदीपान्तरसे प्रकाश नहीं होता; क्योंकि दोनों ही समानरूपसे अवभासात्मक हैं, वैसे एक ज्ञानका ज्ञानान्तर मानना भी व्यर्थ होगा; क्योंकि समान होनेसे उनमें ग्राह्य-ग्राहकभाव सम्भव नहीं होगा। इसी दृष्टिसे यदि ज्ञान स्वातिरिक्त अर्थको ग्रहण करेगा तो वह स्वयं अप्रत्यक्ष रहकर अर्थको प्रत्यक्ष न करा सकेगा। चक्षु इन्द्रियके समान स्वयं विलीन, अतएव अप्रत्यक्ष ज्ञान अर्थभेदमें प्राकटॺ आदि किसी भी विशेषताका आधान करनेमें समर्थ नहीं हो सकता। यदि चक्षुके समान अप्रकाशमान ही ज्ञान अर्थका बोधक होगा तो जैसे चक्षु ज्ञानोत्पादनद्वारा अर्थ प्रकाशक होता है, वैसे ही ज्ञान भी ज्ञानान्तरोत्पादनद्वारा वस्तुज्ञापक होगा। फिर इसी तरह ज्ञानजन्य ज्ञानकी भी ज्ञानान्तरोत्पादनद्वारा ही ज्ञापकता माननी होगी, तथा च अनवस्था दोष होगा। अत: कहना पड़ेगा कि ज्ञानकी प्रत्यक्षता ही अर्थप्रत्यक्षता है। ज्ञानको ज्ञानान्तरोत्पादनकी आवश्यकता नहीं होती। वह ज्ञान भी यदि अन्य ज्ञानसे प्रत्यक्ष होगा तो अनवस्था दोष होगा। यदि वह स्वयं अप्रत्यक्ष होगा तो उससे अर्थका प्रत्यक्ष कैसे होगा? इसीलिये कहा गया है कि— ‘अप्रत्यक्षोपलम्भस्य नार्थदृष्टि: प्रसिद्धॺति।’ अर्थात् ज्ञानके अप्रत्यक्ष होनेपर अर्थज्ञान ही नहीं हो सकता है। यदि चक्षुके समान अप्रत्यक्ष ज्ञानसे ही अर्थ प्रत्यक्ष माना जायगा, तब तो चक्षुके समान ज्ञानको अजन्य कहना पड़ेगा? इसलिये अनवस्था दोषकी अपेक्षा स्वात्मवृत्तिका मान लेना अच्छा है। जैसे प्रदीप प्रदीपान्तरकी अपेक्षा नहीं करता, वैसे ही ज्ञान भी ज्ञानान्तरकी अपेक्षा नहीं करता है।’ उपर्युक्त विज्ञानवादी बौद्धका मत असंगत है; क्योंकि विज्ञानग्राहक साक्षीको स्वीकार कर लेनेपर अनवस्था, आत्मवृत्तिता आदि समस्त दोषोंका निराकरण हो जाता है। साक्षी और ज्ञान दोनोंका चेतनत्व और जडत्वरूप स्वभाव विषम है। अत: उनमें उपलब्धृत्व तथा उपलभ्यत्व बन सकता है। साक्षी स्वयं सिद्ध होनेसे सर्वथा अप्रत्याख्येय है। ठीक है कि अप्रत्यक्ष ज्ञानसे अर्थप्रकाश नहीं बन सकता; परंतु अन्त:करण वृत्तिरूप ज्ञानका साक्षीके द्वारा प्रकाश मान्य है। तथा च आत्मचैतन्य साक्षीके द्वारा प्रकाशित वृतिरूप ज्ञानसे विषय प्रकाश सम्भव है। अन्त:करणावच्छिन्न चैतन्य ही उपलब्धा होता है। अन्त:करण और विषयाकार वृत्ति तथा विषय सभी उसीसे प्रकाशित होते हैं। उपलब्धा उपलब्धिके द्वारा विषयका उपलम्भ या प्रकाश करता है। इन्द्रिय सन्निकर्षसे अन्त:करण-विकार विशेष वृत्ति उत्पन्न होती है। वृत्तिके उत्पन्न होते ही वृत्ति और उसका विषय दोनों ही उपलब्धाको प्रत्यक्ष होते हैं। विषय अप्रकाश स्वभाव होनेके कारण प्रमाताके प्रति स्वप्रत्यक्षताके लिये अन्त:करण वृत्तिरूप अनुभवकी अपेक्षा रखता है, परंतु वह अनुभव स्वयं जड होते हुए भी स्वच्छ होनेके कारण चैतन्य प्रतिबिम्ब ग्रहण करनेके लिये दूसरे अनुभवकी अपेक्षा नहीं रखता। किंतु स्वच्छ होनेसे स्वयं चैतन्यके प्रतिबिम्बको ग्रहण कर लेता है और उसीसे स्वयं भी प्रकाशित हो जाता है। अतएव अनवस्था भी न होगी। ऐसा कभी नहीं होता कि अनुभव उत्पन्न हो और प्रमाताको उसका प्रत्यक्ष न हो। किंतु नीलादि अर्थ ऐसे नहीं होते। वे तो रहते हुए भी जबतक वृत्तिरूप अनुभव न हो, तबतक प्रमाताके लिये प्रत्यक्ष नहीं होते। अत: जैसे छेत्ता छिदि क्रियाके द्वारा छेद्य वृत्तादिपर व्याप्त होता है। अन्य छिदिद्वारा छिदिपर ही नहीं व्याप्त होता और यह भी नहीं कि छिदि ही छेत्री हो जाती हो, किंतु देवदत्तादि छेत्ता ही छिदिक्रियाके द्वारा छेद्यवृत्तादिपर व्याप्त होता है। इसी तरह पक्ता (पाचक) पाकके द्वारा पाक्य तण्डुलादिपर व्याप्त होता है, न कि पाकान्तरसे पाकपर व्याप्त होता है और न पाक ही पक्ता होता है। वैसे प्रमाता प्रमेय नीलादि पदार्थोंपर प्रमाद्वारा व्याप्त होता है, न कि प्रमान्तरसे प्रमाणपर व्याप्त होता है और न प्रमा प्रमात्री होती है। किंतु स्वत: ही प्रमाता प्रमापर व्यापक होता है। कूटस्थ नित्य चैतन्य स्वरूप प्रमाताके लिये दूसरी प्रमा अपेक्षित नहीं होती है; क्योंकि प्रमाताको अपनी प्रमाके लिये यदि अन्य प्रमाताकी अपेक्षा होगी, तब तो अनवस्था दोष अनिवार्य ही रहेगा। अत: यही ठीक है कि विज्ञान ग्रहणमात्रके लिये विज्ञान साक्षी प्रमाता आवश्यक है। कूटस्थ नित्य चैतन्यरूप प्रमाताके ग्रहणकी आकांक्षा ही नहीं उठती; क्योंकि उसमें संशय-विपर्यय अज्ञान है ही नहीं; फिर इनके निवर्तक ज्ञानान्तरोंकी आवश्यकता ही क्या है? अन्यत्र संशय, विपर्यय करता हुआ भी प्रमाता अपने सम्बन्धमें संशयादि नहीं करता है। जैसे प्रकाशस्वरूप दीपक आदिमें ‘प्रकाशते’ यह व्यवहार स्वत: होता है। अप्रकाशरूप घटादिमें प्रकाश संसर्गसे ‘प्रकाशते’ यह व्यवहार होता है, वैसे नित्य चैतन्य परम प्रकाशस्वरूप आत्मामें ‘प्रकाशते’ यह व्यवहार स्वत: होता है। तद्भिन्न जडोंमें आत्माके सम्बन्धसे ‘प्रकाशते’ ऐसा व्यवहार होता है। आत्मा और अनात्माका आध्यात्मिक ही सम्बन्ध होता है। उसी सम्बन्धके लिये वृत्तिकी आवश्यकता होती है। कारण साक्षी और वृत्तिरूप साक्षी सम नहीं। जो कहा जाता है—ज्ञान-ज्ञान सम होनेसे दो दीपकोंके समान दो ज्ञानोंमें प्रकाश्य-प्रकाशकभाव नहीं बन सकेगा, उसका भी समाधान इसीसे हो जाता है। कारण साक्षी और वृत्तिरूप प्रत्यय सम नहीं है; किंतु एक जड है, दूसरा चित् है। अत: अवभास्य-अवभासक बननेमें कोई बाधा नहीं है। भले ही सम होनेसे ज्ञानोंमें परस्पर ग्राह्य-ग्राहकभाव न बनें, परंतु ज्ञाता और ज्ञानमें वैषम्य होनेसे ग्राह्य-ग्राहकभाव सम्भव है ही। हाँ, ज्ञानमें ग्राह्यता इसलिये नहीं है कि वह ग्राहकनिष्ठ क्रियाजन्य फलशाली नहीं है। ऐसी ग्राह्यता तो बाह्यार्थमें ही होती है। वही प्रमाताकी प्रमाक्रियासे जनितफल (प्राकटॺ) शाली होता है; क्योंकि बाह्यार्थ जड होता है। अतएव वह स्वाकार वृत्ति प्रतिबिम्बित चैतन्यसे प्रकाशित होता है। यद्यपि वृत्ति भी जड ही है, तथापि वृत्ति तो उत्पन्न होते ही चैतन्य प्रतिबिम्बसे युक्त ही रहती है। अत: वहाँ प्रतिबिम्बस्वरूप फलान्तर व्यर्थ ही है। यही वार्तिककारका कहना है कि जैसे आकाश वस्तुके स्वभावानुसार कुम्भ उत्पन्न होते ही आकाशसे पूर्ण होता है, वैसे वृत्तिरूप ज्ञान उत्पन्न होते ही स्वाभाविक आकाशकल्प साक्षी चैतन्यसे पूर्ण रहता है। इसीलिये ज्ञानबुद्धि परिणाम भूतज्ञानसे नहीं ज्ञात होता है, किंतु उसमें प्रमाताके प्रति स्वत:सिद्ध चित्प्रतिबिम्बरूप प्राकटॺ होता है। इसलिये उनकी ग्राह्यता बन जाती है। इसीलिये कहा गया है—‘न संविदर्यते फलत्वात्’ अर्थात् संविद् स्वयं फल है, अत: वह अन्त:करण वृत्तिरूपज्ञानसे नहीं जानी जाती है। यद्यपि बाह्यार्थ भी प्रमाताके प्रतिग्राह्य हैं, तथापि वृत्तिरूप संविद्के रहनेपर ही बाह्यार्थ प्रकट होता है। साथ ही संविद् भी प्रकट होती है। अर्थात् अविद्यावच्छिन्न जीव ही साक्षी है, वह व्यापक होनेसे विषय प्रदेशमें भी रहता है। अत: साक्षीका जैसे ज्ञानसे सम्बन्ध है, वैसे ही विषयसे भी सम्बन्ध है ही, तथापि अन्त:करणावच्छिन्न साक्षी अनावृत रहता है, परंतु विषयावच्छिन्न साक्षी आवृत रहता है। इसीलिये उसमें आवरण-भंगके लिये वृत्तिकी अपेक्षा रहती है। अतएव बाह्यार्थ तभी साक्षिरूप अनुभवसे प्रकट होता है, जब कि विषयाकारान्त:करण वृत्तिरूप संविद् उत्पन्न होती है; क्योंकि उसी वृत्तिसे आवरणभंगद्वारा साक्षीका प्राकटॺ होता है, परंतु वह वृत्ति तो स्वप्रतिबिम्बित साक्षिस्वरूप अनुभवसे ही प्रकट होती है। निष्कर्ष यह है कि साक्षिस्वरूप अनुभव यद्यपि सर्वव्यापी है तो भी अविद्यासे आवृत होनेके कारण वह प्रकट नहीं होता। जैसे निर्मल दर्पणमें सुख प्रतिबिम्बित होता है, वैसे भास्वर स्वभाववाले अन्त:करणमें ही उसकी अभिव्यक्ति होती है। अन्त:करण वृत्ति भी भास्वर ही है, अत: विषयाकार वृत्तिपर भी स्वभावसे ही अभिव्यक्त होता है। इसीलिये वृत्ति भी स्वभावत: प्रकट होती है, परंतु बाह्यार्थ अन्त:करणसे व्यवहित रहता है, अत: स्वभावसे ही उसमें चैतन्यके अभिव्यंजन करनेकी क्षमता नहीं रहती है। यह देखा ही जाता है कि सम्बन्ध समान रहनेपर भी कोई व्यंजक होता है और कोई नहीं होता है। जैसे चाक्षुषी प्रमाके साथ समान सम्बन्ध रहनेपर भी वह रूपादिका प्रकाश करती है, वायु आदिका प्रकाश नहीं करती। घट और दर्पणका मुखसन्निधान समानरूपसे रहनेपर भी घटपर मुखका प्रतिबिम्ब व्यक्त नहीं होता, दर्पणपर प्रतिबिम्ब व्यक्त होता है। ठीक उसी तरह अन्त:करण और तत्परिणामभेद वृत्तिपर साक्षि-चैतन्यकी अभिव्यक्ति होती है, परंतु बाह्यार्थ घटादिपर उसकी अभिव्यक्ति नहीं होती। अन्त:करण और वृत्तिका अभिव्यक्त नित्य साक्षि-चैतन्यसे साक्षात् प्रकाश होता है, परंतु अर्थका स्वाकार वृत्ति व्यंग्य चैतन्यसे प्रकाश होता है। इसी अभिप्रायसे कहा जाता है कि ज्ञान स्वयं ज्ञानान्तरका कर्म हुए बिना ही प्रमाताके प्रति प्रत्यक्ष होता है। कहा जा सकता है, जो प्रकाशमान होता है, वह स्वभिन्न प्रकाशसे ही प्रकाशमान होता है। जैसे ज्ञान और अर्थ अन्य (साक्षी)-से प्रकाशित होते हैं, इसी तरह साक्षीको भी किसी अन्यसे प्रकाशित होना चाहिये। तथा च साक्षी और ज्ञान दोनोंकी विषमता असिद्ध है। किंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि साक्षी स्वयं सिद्ध होता है। उसका अपलाप करना विज्ञके लिये भी सम्भव नहीं है। साक्षीस्वरूप आत्माके सम्बन्धमें मैं हूँ या नहीं हूँ, इस प्रकारका संशय नहीं होता। ‘मैं नहीं हूँ’ इस प्रकारकी अभाव प्रमा या भ्रान्ति भी नहीं होती। यह तभी सम्भव है, जब कि साक्षी नित्य साक्षात्कार तथा अनागन्तुक प्रकाशस्वरूप हो। यह सुस्पष्ट है कि प्रमाता अन्य वस्तुओंमें सन्देह करता हुआ भी स्वयं असंदिग्ध रहता है। अन्य विषयोंमें विपर्यस्त भ्रान्त होते हुए भी स्वयं भ्रमका अविषय अविपर्यस्त रहता है, परोक्ष वस्तुओंका अनुमान करता हुआ भी स्वयं अपरोक्ष रहता है, अन्य वस्तुओंका स्मरण करता हुआ भी स्वयं अनुभवरूप होता है, ये सब बातें अन्याधीन प्रकाश होनेपर सम्भव नहीं होतीं। अन्याधीन प्रकाश होनेसे अनवस्था प्रसंग भी होगा ही। निष्कर्ष यह है कि साक्षीको ज्ञेय सिद्ध करनेके लिये ‘आत्मा ज्ञेय: प्रकाशमानत्वाद् घटवत्’ (आत्मा ज्ञेय है, प्रकाशमान होनेसे घटकी तरह) यह अनुमान उपस्थित किया जाता है। परंतु इस अनुमानके लिये ‘जो प्रकाशमान होता है, वह वेद्य होता है’ यह व्याप्ति माननी पड़ेगी। इस सम्बन्धमें प्रश्न होगा कि व्याप्तिग्राहिका (व्याप्तिको ग्रहण करनेवाली) संवित् स्वसम्बन्धमें प्रकाशमान होती है या नहीं? यदि प्रकाशमान होती है तो कर्म (विषय) रूपसे अथवा स्वप्रकाशरूप (अन्य संविद्की अपेक्षा न करके स्वव्यवहार हेतुरूप)-से? पहला पक्ष संगत नहीं हो सकता; क्योंकि स्वात्मवृत्तिताका विरोध होता है, उसी संविद्का वही संविद् विषय हो यह नहीं बन सकता। अन्तिम पक्ष भी ठीक नहीं; क्योंकि यदि व्याप्तिग्राहिका संविद् संविदन्तर निरपेक्ष स्वव्यवहारमें हेतु है (स्वप्रकाश है) तो व्याप्तिग्राहिका संविद‍्में ही व्याप्तिका व्यभिचार होगा। कारण उसमें प्रकाशमानता रहनेपर भी वेधता नहीं। यदि व्याप्तिग्राहिका संविद् प्रकाशमान नहीं होती तो इसी संविद्के विशेषका अवभास नहीं हुआ, तब तो इस संविद‍्में सकल विशेषोपसंहारवती व्याप्ति कैसे स्फुरित होगी? क्योंकि यावत् हेत्वाश्रयवर्ति साध्य समानाधिकरण ही व्याप्ति होती है। यदि सकलविशेषोपसंहारवती व्याप्तिका स्फुरण न होगा तो अनुमान क्या होगा? यदि संवित‍्का स्वत: स्फुरण मान्य है, तब भी व्याप्ति व्यभिचार होनेसे अनुमानका उदय कैसे होगा? तथा उक्त अनुमानसे आत्मा या साक्षीकी ज्ञेयता नहीं सिद्ध हो सकती। ‘अज्ञेयत्वे सति प्रकाशमानता’ ही स्वप्रकाशता है (यहाँ ज्ञेयताका तात्पर्य अपरोक्ष ज्ञान विषयतासे है। तथा च अनुमानद्वारा आत्माके ज्ञेय होनेपर भी सिद्ध साधनता नहीं) जो ज्ञानका अगोचर होकर प्रकाशमान हो, वह स्वप्रकाश होता है। प्रकाशमानता या भासमानता भी भानविषमता नहीं है, किंतु व्यावहारिक बाधरहित ‘भासते’ इत्याकारक शब्दकी लक्ष्यता ही है। अर्थात् जिसका बाध नहीं होता है, ऐसे ‘प्रकाशते’ इस शब्दका जो लक्ष्य है, वही भासमानता है। वेदान्तसे ज्ञेय होनेपर भी स्वप्रकाशतामें कोई विरोध नहीं होता; क्योंकि निरुपाधिक ब्रह्म वेदान्त महावाक्यजन्यवृत्तिका अविषय होनेपर भी वृत्तिके द्वारा आवरण भंग होनेमात्रसे भासमान होता है। वेदान्तवाक्यजन्य वृत्तिरूप उपाधिके द्वारा ही उसमें ज्ञेयता भी व्यवहृत होती है। अतएव जो कहा जाता है कि स्वप्रकाश ब्रह्म अनुमानज्ञेय होता है, यह भी नि:सार है; क्योंकि यहाँ भी अनुमितरूप उपाधि रहनेसे ही ब्रह्ममें अनुमान ज्ञेयता होती है। नित्य साक्षात्कारता अनागन्तुक प्रकाशत्वमें हेतु है। संविद्से अभिन्नता ही साक्षात्कारता है। यहाँ संविद् शब्दका नित्यबोध अर्थ है, वृत्तिरूप ज्ञान नहीं। इन्द्रियजन्य प्रतीतित्व यहाँ साक्षात्कारता अभिप्रेत है। संविद‍्में संविदभिन्नता स्वत: होती है। अन्य विषय संविद‍्में अध्यस्त होनेसे संविदभिन्नता होती है। अधिष्ठानसत्तासे अतिरिक्त अध्यस्तकी सत्ताका न होना ही अध्यस्तकी संविद्से अभिन्नता है। इस सम्बन्धमें अनुमान भी है ‘आत्मा स्वयं प्रकाश: शश्वदपरोक्षत्वात्, यन्नैवं तन्नैवं यथा घट:।’ अर्थात् शश्वत् प्रत्यक्ष होनेसे आत्माको स्वयंप्रकाश मानना चाहिये। घटादि कभी अपरोक्ष होते हैं, शश्वदपरोक्ष नहीं होते। अत: वे स्वप्रकाश नहीं होते हैं। ‘आत्मा शश्वदपरोक्ष: शश्वदसन्दिग्धत्वात्, व्यतिरेके घटवत्’ अर्थात् आत्मा सदा अपरोक्ष ही है; क्योंकि उसमें सदा ही संशय-विपर्यय-अज्ञान-शून्यता रहती है। घटादि ऐसे नहीं हैं, अत: वे अपरोक्ष भी नहीं हैं (भले ही वेदान्तवेद्य अखण्डानन्द आकारसे आत्मा संदिग्ध होता है, अतएव वही शास्त्रका विषय होता है, तथापि ज्ञान, सुखादि साक्षिरूपसे आत्मा सदा ही असंदिग्ध रहता है)। यहाँ अप्रसिद्ध विशेषता नहीं कही जा सकती है अर्थात् स्वप्रकाशत्वरूप साध्य अप्रसिद्ध है, यह नहीं कहा जा सकता; क्योंकि निम्नोक्त अनुमानसे स्वप्रकाशता प्रसिद्ध हो जाती है। ‘अयं घट:, एतदन्यज्ञेयत्वरहित-भासमानान्य:, द्रव्यत्वाद् घटवत्।’ यहाँ ‘अयं घट:’ पक्ष है। यह यद्यपि ज्ञेय है, तथापि यह पक्ष ही है, अत: इसमें पक्षान्यत्व नहीं है। अतएव यह पक्षान्यत्वविशिष्ट ज्ञेयत्व शून्य ही है और भासमान भी है। एतदन्यत्व विशिष्ट ज्ञेयत्वशून्य भासमान है, उससे अन्य पट है। इस तरह दृष्टान्तसे साध्य प्रसिद्ध हुआ। पक्षसे अन्यत्वेन विशेषित जो ज्ञेयत्व होता है, उस ज्ञेयत्वसे रहित एवं भासमानसे अन्यता साध्य है, यह पटमें है। पक्षभूत घट ज्ञेय होनेपर भी पक्षान्यत्वविशिष्ट ज्ञेयत्वरहित है और भासमान भी है। उससे अन्य पट है। उसी तरह ‘अयं घट:’ इस पक्षमें भी साध्य-सिद्धि अनुमानके द्वारा करनी है। पक्षमें अनुमान बिना साध्यसिद्धि नहीं कही जा सकती; क्योंकि वह तो पक्षान्यत्वविशिष्ट ज्ञेयत्वशून्य भासमान ही है, भासमानसे अन्य नहीं है, किंतु पक्षसे अन्य ही कोई वस्तु ऐसी होनी चाहिये, जो पक्षसे अन्य भी हो, ज्ञेयत्वरहित भी हो, भासमान भी हो। जब उस भासमानसे अन्य पक्ष होगा, तब पक्षान्यत्वविशिष्ट ज्ञेयत्वशून्य भासमानान्यता पक्षमें आ सकेगी। पक्षसे अन्य घटादि प्रसिद्ध पदार्थोंमें ऐसा कोई नहीं है, जो पक्षान्यत्वविशिष्ट ज्ञेयत्वरहित भासमान हो; क्योंकि सभी भासमान पक्षान्यघटादि पक्षान्यत्व विशिष्ट ज्ञेयत्वयुक्त ही है। उपर्युक्त अनुमानसे जो इस प्रकारकी एतदन्यत्वविशिष्ट ज्ञेयत्वशून्य भासमान वस्तु सिद्ध होती है, वही स्वप्रकाश आत्मा है। सुखादिका अनुभाविता साक्षी सर्वानुभवसिद्ध है। चार्वाक भी ‘अहं’ इस अनुभवका अपलाप नहीं करता है। किंतु शरीरको वह इसका विषय बतलाता है। कहा जा सकता है कि ‘स्वसत्ताके समय सुखादिमें भी सन्देह नहीं रहता है, फिर सुखादिको भी स्वप्रकाश क्यों न माना जाय,’ परंतु आत्मप्रकाशसे ही सुखका प्रकाश उत्पन्न हो सकता है। अत: आत्माकी स्वप्रकाशतासे भिन्न सुखकी स्वप्रकाशता नहीं मानी जाती है। यदि आत्मामें नित्य साक्षात्कारता न होती तो कभी-न-कभी आत्मामें सन्देह होता, किंतु आत्मामें सन्देह कभी देखा नहीं जाता है, अत: आत्मामें नित्य साक्षात्कारता ही सिद्ध होती है। इसी तरह यह भी कहना संगत नहीं है कि ‘आत्मविषयक अन्य प्रत्यक्ष संविद् उत्पन्न होती है;’ क्योंकि उक्त रीतिसे अनवस्था प्रसंग होगा। अत: अनिच्छयापि बौद्धको आत्माकी स्वयं सिद्धता माननी पड़ेगी। पीछे कहा जा चुका है कि जिस तरह पाक स्वयं पक्ता नहीं होता, छिदिक्रिया स्वयं छेत्री नहीं होती, उसी तरह ज्ञान स्वयं ज्ञाता नहीं होता है। विज्ञानवादी बौद्ध प्रमाताका अस्तित्व नहीं मानता है। कहता है जैसे—प्रदीप प्रदीपान्तर निरपेक्ष स्वयं प्रकाशित होता है, वैसे ही विज्ञानान्तर निरपेक्षविज्ञान स्वयं प्रकाशित होता है। विज्ञानवादी बौद्धके इस कथनका निष्कर्ष यह निकलता है कि विज्ञान प्रमाणागम्य है और उसका कोई अवगन्ता या जानकार नहीं है। यह कथन उसी तरहका है, जैसे कोई कहे कि ठोस शिलाके मध्यमें सहस्र दीप प्रकाश है। यह भी न प्रमाणगम्य है, न किसी जानकारको इसका अनुभव है। अर्थात् शिलाघनमध्यस्थ सहस्र दीप प्रकाश प्रमाणागम्य तथा ज्ञातृरहित होनेसे अमान्य होता है, वैसे ही विज्ञान प्रमाणागम्य तथा ज्ञातृशून्य होनेसे अमान्य ही होगा। यदि विज्ञान किसी ज्ञाताको भासमान नहीं हो तो उस स्वप्रकाशका विज्ञानसे क्या प्रयोजन है? बौद्धोंकी ओरसे कहा जाता है कि ‘विज्ञान ही ज्ञाता है। विज्ञानवादी बौद्धोंका विज्ञान अनुभवरूप ही है। वही साक्षी भी है।’ किंतु यह कथन संगत नहीं है; क्योंकि जैसे नेत्ररूपी साधनसे युक्त अन्य ज्ञाताको ही प्रदीपादिका प्रकाश होता है, वैसे अन्य ज्ञाताको ही विज्ञानका प्रकाश होना युक्त है। जैसे दीप ग्राह्य है। वैसे ही बौद्ध मतमें विज्ञान भी ग्राह्य है। फिर भी बौद्धका कहना है कि जब वेदान्ती साक्षीको स्वयंसिद्ध मानता है तो स्वयंसिद्ध विज्ञान माननेमें क्या आपत्ति है? वस्तुस्थिति यह है कि बौद्धके स्वयंसिद्ध विज्ञानको ही वेदान्तीने साक्षी नाम दे दिया है। तथा च नाममें ही विप्रतिपत्ति है, परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि बौद्ध विज्ञानकी उत्पत्ति और प्रध्वंस मानता है तथा विज्ञानकी अनेकता मानता है और वेदान्तीका साक्षी नित्य तथा एक, असंग एवं अनन्त है। बौद्धका विज्ञान बुद्धिवृत्तिरूप ही है। उसकी उत्पत्ति, विनाश तथा अनेकता प्रसिद्ध ही है। घटादिके तुल्य ही उसकी अतिरिक्त साक्षिवेद्यता सिद्ध की जा चुकी है। जिस विज्ञानकी उत्पत्ति होती है, वह स्वयं फलरूप है, फिर स्वयं ज्ञाता कैसे बन सकता है? वही कर्ता, वही फल नहीं हो सकता है, वही पक्ता वही पाक नहीं होता, यह कहा जा चुका है। आजकल भी बौद्ध यही कहते हैं कि ‘विज्ञानवादीका विज्ञान नित्य विज्ञानस्वरूप आत्मा ही है और श्रीशंकराचार्यके समयमें भी कुछ बौद्धोंने ऐसा कहा था, किंतु यह सब बौद्धोंका अपसिद्धान्त ही है।’ जो कहा गया था कि स्वप्नादि प्रत्ययके तुल्य ही जागरित घटादि प्रत्यय भी बाह्यार्थके बिना ही उपपन्न हो जायँगे, वह भी ठीक नहीं; क्योंकि स्वप्नादि प्रत्ययोंका जागरित प्रत्ययसे महान् अन्तर है। स्वप्नादिका बाध होता है, परंतु जागरित प्रत्ययका बाध नहीं होता। बौद्ध मतानुसार जागरित प्रपंच किसी अधिष्ठानके अज्ञानका कार्य नहीं है, जो कि अधिष्ठान ज्ञानसे शुक्ति रजतके समान बाधित हो जाय। स्वप्नकी वस्तु प्रबोध होते ही बाधित हो जाती है। इसलिये जागनेपर प्रतिबुद्ध प्राणी कहता है ‘मैंने स्वप्नमें मिथ्या ही गज-रथादि देखा था। वस्तुत: गज-रथादि न थे। मेरा मन निद्रासे म्लान था। उसीसे ऐसी भ्रान्ति हुई थी।’ इसी तरह माया प्रत्ययका भी बाध होता है। यदि जागरित प्रत्यय भी बाधित हो तो वह स्वप्न प्रत्ययका बाधक नहीं हो सकता; क्योंकि जो स्वयं बाध्य है, वह बाधक कैसे हो जायगा? फिर तो स्वप्नप्रत्यय दृष्टान्त भी नहीं सिद्ध होगा। अत: स्वप्नप्रत्ययके दृष्टान्तसे जाग्रत् प्रत्ययकी निरालम्बनता नहीं सिद्ध की जा सकती है। तथा ‘घटादिप्रत्ययो, निरालम्बन:, प्रत्ययत्वात् स्वप्नप्रत्ययवत्।’ (घटादि प्रत्यय स्वप्नज्ञानके तुल्य ही ज्ञानत्व जातिमें होनेसे निरालम्बन-विषयशून्य है) यह अनुमान भी बाध्यत्वरूप उपाधिसे दूषित है। जहाँ निरालम्बनता है, वहाँ बाध्यता है, जैसे स्वप्नादिमें। प्रत्ययत्व जागरित प्रत्ययमें भी है, परंतु वहाँ बाध्यत्व नहीं है। इसलिये साध्यव्यापक तथा साधना व्यापकरूप उपाधिसे युक्त होनेके कारण उक्त अनुमान दूषित है। जहाँतक प्रमाता है, वहाँतक जाग्रत्प्रत्ययका बाधाभाव प्रमित ही है। साथ ही प्रमाणाजन्यत्व भी उपाधि है। अर्थात् स्वप्न प्रत्यय एक प्रकारकी स्मृति ही है, जो कि संस्कारमात्रसे उत्पन्न होती है। वह जाग्रत्प्रत्ययकी तरह प्रमाणजन्य नहीं होती। जाग्रत्प्रत्यय तो वर्तमान विषयेन्द्रिय सन्निकर्ष, लिंग, शब्द, सादृश्य, अन्यथानुपपत्ति, योग्यानुपलब्धिरूप प्रमाणोंसे उत्पन्न होते हैं। निद्राकालमें उपर्युक्त कोई सामग्री नहीं रहती है, केवल संस्कार ही हेतु रहते हैं। अत: संस्कारमात्रजन्य होनेके कारण स्वप्नादि प्रत्यय स्मृति हैं। वह स्मृति भी निद्रादि दोष-परीत होनेके कारण विपरीत हो जाती है। तभी तो अवर्तमान पिता आदिको वर्तमानरूपसे ग्रहण करती है। स्मृति और उपलब्धिमें भेद होता है। स्वप्न तो विपरीत स्मृति ही है। अत: जाग्रत् कालके प्रमाणजन्य प्रमारूप प्रत्ययोंसे स्वप्न प्रत्ययमें महान् भेद है। अत: स्वप्नप्रत्ययकी तरह जाग्रत्प्रत्यय निरालम्बन नहीं हो सकते। प्रमाणोंका स्वत: प्रामाण्य होता है। जाग्रत्प्रत्ययोंकी यथार्थता अनुभवसिद्ध है। अनुमानके द्वारा उनका अन्यथात्व नहीं सिद्ध किया जा सकता; क्योंकि अनुभवविरुद्ध अनुमान उत्पन्न ही नहीं हो सकता। यह नहीं कहा जा सकता कि स्वत: प्राप्त प्रामाण्यका अनुमानद्वारा अपोहन हो जायगा; क्योंकि अबाधित विषय होनेपर ही अनुमानका प्रामाण्य होता है। यहाँ तो प्रत्यक्ष बाध है। अत: अनुमान प्रमाजनक नहीं हो सकेगा। प्रत्यक्षके प्रामाण्यका अपवाद अनुमानसे नहीं हो सकता। अबाधित विषयता भी अनुमानोत्पादक सामग्रीसे ग्राह्य होनेसे प्रमाण होती है। यहाँ तो अनुमान सामग्री प्रत्यक्षसे अनुमानका विषय बाधित ही हो जाता है।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>आत्मतत्त्व</category><category>आत्मा</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सदर्शन</category><category>मार्क्सवाद</category><category>विमर्श</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>11.14 आत्मा एवं भूत ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/11-14-aatmaa-evn-bhuut-maarksvaad/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/11-14-aatmaa-evn-bhuut-maarksvaad/</guid><description>11.14 आत्मा एवं भूत मार्क्सवादी ‘आत्माकी अपेक्षा प्रकृति या भूतको ही मूल मानते हैं। भौतिक चिन्त्य वस्तुसे भिन्न चिन्तन या विचार पृथक् नहीं किया जा सकता है। चेतना या विचार चाहे कितने ही सूक्ष्म क्य…</description><pubDate>Mon, 14 Jul 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;11.14 आत्मा एवं भूत&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt;ी ‘आत्माकी अपेक्षा प्रकृति या भूतको ही मूल मानते हैं। भौतिक चिन्त्य वस्तुसे भिन्न चिन्तन या विचार पृथक् नहीं किया जा सकता है। चेतना या विचार चाहे कितने ही सूक्ष्म क्यों न प्रतीत हों, परंतु हैं वे मस्तिष्ककी उपज ही। मस्तिष्क एक भौतिक दैहिक इन्द्रिय ही है। यह भौतिक जगत‍्का सर्वश्रेष्ठ इन्द्रिय है। मार्क्सके शब्दोंमें ‘पदार्थ मनसे उत्पन्न नहीं हुआ, किंतु मन पदार्थकी सर्वोत्कृष्ट सृष्टि है।’ लेनिनने कहा है कि ‘सृष्टि-ज्ञानका अर्थ है—पदार्थकी गति और उसकी चिन्तनशीलताका ज्ञान।’ इस तरह भौतिक पदार्थ या प्रकृति ही मूल है। विचार या चेतना उसका प्रतिबिम्ब है। व्यक्तिके विचार उसकी सामाजिक सत्ता या परिस्थितिसे स्वतन्त्र नहीं होते। कहा जाता है कि ‘एक दार्शनिक अपने युगका कीचड़ अपने पैरोंके साथ लिये जाता है। उसके &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-paashcaaty-drshn-1-1-drshnkii/&quot;&gt;दर्शन&lt;/a&gt;पर उसके समाजकी छाप अवश्य ही रहती है।’ लास्कीके शब्दोंमें ‘जो जैसा रहता है, वैसा ही सोचता है।’ एमिल वर्नसके शब्दोंमें ‘वस्तु अर्थात् वह वास्तविकता, जो अचेतन है, पहले थी। मन जो सचेतन है, बादमें आया। वस्तु अर्थात् बाह्य पदार्थ मनसे स्वतन्त्र है।’ यद्यपि पाश्चात्य आदर्शवादी दार्शनिकोंने मनस् या सर्वमनस् तत्त्वको ही मूल माना है। उसीसे अचेतनकी उत्पत्ति माना है। काण्ट, फिक्टे, हीगेल आदि इसी विचारके हैं। अद्वैतवादी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;ान्ती भी एक हदतक कहते हैं कि सम्पूर्ण विश्वप्रपंच मनका विस्तार है। यह द्वैत मनोमात्र ही है—‘मनोमात्रमिदं द्वैतम्।’ मनके अमनीभाव होनेपर द्वैत कुछ भी नहीं रह जाता—‘मनसो ह्यमनीभावे द्वैतं नैवोपलभ्यते’ (माण्डूक्यकारिका ३।३१) बौद्धोंका क्षणिक विज्ञान ही बाह्य अर्थके आकारसे परिणत होता है। यह भी इन्हीं मतोंसे मिलता-जुलता मत है, तथापि क्षणिक विज्ञान या व्यावहारिक स्थायी मन या अन्त:करण तथा उसकी इच्छा-द्वेष, सुख-दु:ख आदि सब विकृतियोंकी स्थिति, गति, अपचिति (लय) जिस नित्य अखण्ड बोधसे भासित होती हैं, वह अनन्त सद्घन, चिद्घन, आनन्दघन ब्रह्मात्मा ही वेदान्तमतमें सर्वमूल है। मन भी उसी अखण्ड बोधका विवर्त्त है। अन्वय-व्यतिरेकसे जैसे मृत्तिकाके होनेपर ही मृद्विकार घटादि उपलब्ध होते हैं, मृत्तिकाके बिना वे उपलब्ध नहीं होते, जैसे जलके रहनेपर ही तरंगादि प्रतीत होते हैं, जलके बिना वे प्रतीत नहीं होते, वैसे ही मनके होनेपर ही बाह्य एवं आभ्यन्तर भौतिक दृश्यमात्र प्रतीत होते हैं, मनके बिना कुछ भी भासित नहीं होते हैं। इसी प्रकार सर्वान्तर्द्रष्टाका अस्तित्व ही सम्पूर्ण दृश्यके अस्तित्वका मूल है। अखण्ड बोधके बिना तो मन, अन्त:करण या विज्ञान भी भासित नहीं होते। अतएव मूल पदार्थ अखण्ड बोध सच्चिदानन्द ब्रह्म ही है। मनसे भिन्न मस्तिष्क भी कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं है। मनको श्रोत्र, त्वक्, चक्षु आदि दस बाह्य इन्द्रियोंसे भिन्न ग्यारहवीं आन्तर इन्द्रिय माननेमें भी कोई आपत्ति नहीं है। उसी मनमें बुद्धि, चित्त, मन, अहंकार—ये चार भेद होते हैं। उसमें इच्छा, द्वेष, सुख-दु:खादि गुण व्यक्त हुआ करते हैं। भले ही मस्तिष्कके तन्तुविशेषोंके निघर्षसे इसकी व्यंजना होती हो; परंतु यह मस्तिष्क एवं उसके तन्तु या तन्तुका निघर्षमात्र नहीं है। जैसे ठण्डे और गरम दो तार या दो तारोंका संघर्ष ही विद्युत् नहीं है, किंतु उनसे व्यक्त होनेवाली विद्युत् उनसे भिन्न स्वतन्त्र वस्तु है, वैसे ही मन इन मस्तिष्क, तन्तु एवं उनके निघर्षसे भिन्न वस्तु है। शुद्ध स्फुरण, अखण्ड बोध तो विचारोंसे भी भिन्न स्वतन्त्र वस्तु है। मार्क्सवादी कहते हैं कि ‘विचारोंका जन्म बाह्यजगत‍्से ही होता है। फिर भी सभी विचार सत्य नहीं होते। वास्तविकताका ठोस अनुभव ही बतलाता है कि विचार सही है या नहीं। विचार करनेपर यह भी असंगत ही प्रतीत होता है। फिर भी वास्तविकताके जिस ठोस अनुभवसे ही विचारकी सत्यताका निश्चय होता है, वह अनुभव क्या है? क्या वह भी जड, बाह्य वस्तु है? अत: हर दृष्टिसे यह मानना पड़ेगा कि विचार हो या अनुभव, ठोस हो या पोला, किसी भी वस्तुका अस्तित्व निर्दोष अनुभव या विचारके बिना सिद्ध नहीं होता।’ इससे इतना ही कहा जा सकता है कि पूर्वानुभवका बाधक अनुभवान्तर होनेसे पूर्वानुभवको भ्रम समझा जाता है। बाधक अनुभव न होनेसे पूर्वानुभवको स्वत: ही सत्य माना जाता है। सर्वथा अपि अनुभवके बिना बाह्य पदार्थकी सत्ता ही सिद्ध नहीं होती है। साधारण विचार, साहित्य आदिपर अवश्य समाजकी छाप होती है। उसमें भी उच्च श्रेणीके विचारकों, लेखकोंके ग्रन्थोंमें उच्च सामाजिक स्थितियोंका अंकन होता है। निम्न विचारके ग्रन्थोंपर निम्नश्रेणीका ही प्रभाव अंकित होता है। इसी अंशमें लास्कीका कथन संगत है, परंतु प्रामाणिक दर्शनके लिये तो देश, काल, परिस्थितियोंके आवरणोंका भेदन करनेसे ही तत्त्वानुभूति होती है। बिना रंगीन चश्मा उतारे वस्तुका वास्तविक रूप-ज्ञान सर्वथा ही दुर्घट होता है। देहके समान ही इन्द्रियाँ भी आत्मा नहीं है। यदि सम्मिलित होकर इन्द्रियाँ आत्मा हैं, तब तो एक इन्द्रिय नष्ट होनेपर आत्मनाश-प्रसंग होगा; क्योंकि एकके नष्ट होनेपर भी समस्तता विनष्ट हो गयी। यदि प्रत्येक इन्द्रियाँ आत्मा हैं, तो परस्पर विरुद्ध दिक्‍क्रिया होनेसे शरीर ही उन्मथित हो जायगा। ‘योऽहं चक्षुषा घटमद्राक्षं सोऽहं घटं त्वचा स्पृशामि’ ‘जिस मैंने चक्षुसे घट देखा था, वही मैं त्वक‍्से घटका स्पर्श करता हूँ’ इस अनुभवसे स्पष्ट प्रतीत होता है कि नेत्र, श्रोत्र, त्वक‍्से काम लेनेवाला आत्मा इनसे भिन्न है। चक्षु यदि आत्मा है, तो वह स्पर्शका कर्ता क्यों नहीं हो सकता। त्वक् आत्मा है तो वह दर्शन-क्रियाका कर्ता क्यों नहीं हो सकता? अत: यहाँ कोई इन्द्रियोंसे भिन्न ही आत्मा है, जो कि दर्शन, घ्राण, स्पर्श, श्रवण आदि सभी क्रियाओंका कर्ता है, उसी एक आत्माकी विभिन्न क्रियाओंके कर्तारूपसे प्रसिद्धि है। क्षणिक विज्ञान भी आत्मा नहीं; क्योंकि अनुभव एवं स्मृति का एक ही कर्ता होता है। अन्यद्वारा अनुभूतका अन्य स्मरण नहीं करता। मैंने उसे देखा था और मैं इसे देख रहा हूँ। इस तरह अनेक काल-सम्बन्धी आत्मा क्षणिक नहीं हो सकता है। पूर्वोत्तरदर्शी एक प्रत्ययी न हो तो स्मृति नहीं हो सकती है। ‘सोऽहं’ यह प्रत्यभिज्ञा भी स्थायी आत्माके बिना नहीं बन सकती। यदि स्मरण एवं अनुभवके कर्ता भिन्न हों तो मैंने देखा, अन्यने स्मरण किया, यह व्यवहार होना चाहिये। कुछ लोग कहते हैं कि सादृश्यके कारण एकताकी प्रतीति होती है। जैसे नदी-प्रवाह, दीप, केश आदिमें तत्सदृश होनेसे ‘त एवेमे केशा:; सैवेयं दीपकलिका’ वे ही ये बाल हैं, वही यह दीपशिखा है—यह प्रत्यभिज्ञा होती है, परंतु यह भी ठीक नहीं है। ‘तेनेदं सदृशम्’ यह उसके सदृश है, इस प्रकार सादृश्यग्रहणके लिये भी तो पूर्वकालवर्ती तत्का, वर्तमान-कालवर्ती इदंका तथा तदुत्तरवर्ती सादृश्यका ग्राहक एक स्थायी आत्मा हो, तभी सादृश्यबोध भी हो सकता है। कुछ लोग कहते हैं कि सादृश्यप्रत्यय भी स्वतन्त्र ही है, परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि ऐसी स्थितिमें ‘तेनेदं सदृशम्’ इत्यादि प्रतीति न होनी चाहिये। बाह्य विषयमें भले ही कभी सादृश्यमूलक-एकत्वका भ्रम भी हो, तथापि उपलब्धि या अनुभवितामें तो सन्देह ही नहीं होता। मैं वही हूँ या तत्सदृश अन्य हूँ, किंतु यहाँ तो स्पष्ट ही निश्चित प्रत्यभिज्ञान होता है, जो मैंने कल देखा था, वही मैं आज स्मरण कर रहा हूँ।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आत्मा</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>धर्मसम्राट</category><category>पंचभूतात्मकजन्ममरणमोक्</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>11.13 मूल, वस्तु या चेतना? ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/11-13-muul-vstu-yaa-cetnaa-maark/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/11-13-muul-vstu-yaa-cetnaa-maark/</guid><description>11.13 मूल, वस्तु या चेतना? ‘मूल, भूत है या चेतना?’ इस प्रश्नके उत्तरमें आधुनिक वैज्ञानिक एडिंगटन भी कहते हैं—‘खोजते हुए अन्तमें जहाँ पहुँचा, वहाँ देखता हूँ, मनकी छायामात्र है।’ वैज्ञानिक जोन्स गणि…</description><pubDate>Sun, 13 Jul 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;11.13 मूल, वस्तु या चेतना?&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;‘मूल, भूत है या चेतना?’ इस प्रश्नके उत्तरमें आधुनिक वैज्ञानिक एडिंगटन भी कहते हैं—‘खोजते हुए अन्तमें जहाँ पहुँचा, वहाँ देखता हूँ, मनकी छायामात्र है।’ वैज्ञानिक जोन्स गणितशास्त्रके पण्डित हैं। उनका कथन है—‘अन्तमें देखता हूँ, विज्ञानकी ही विजय है। विश्वका मूलाधार, ईश्वर एक अंकशास्त्रवित् है और यह विश्व उसीके मस्तिष्कका एक अंकमात्र है।’ पूछा जा सकता है कि एडिंगटनका मानस और जोन्सका अंक क्या उनके मस्तिष्क और शरीरके ऊपर निर्भर नहीं है? क्या अपना मस्तिष्क और शरीर उनको अभौतिक या अतिभौतिक मालूम होता है? जोन्स, एडिंगटन आदिकी वर्णनशैलीमें कुछ अन्तर है, उसपर आधुनिकताकी मामूली छाप है, लेकिन बात पुरानी है—पाइथागोरसका अंक, प्लेटोका आदर्श, उपनिषदोंका ब्रह्म—केवल नयी पोशाकमें हमारे सामने आये हैं। वस्तुको लाँघकर उसके पीछे किसी अवास्तव अलौकिककी प्रतिष्ठाकी चेष्टा हमको अस्वाभाविक नहीं प्रतीत होती। श्रेणीविभाजित समाजमें वास्तव-जीवन जब अनिश्चित और जटिल होता है, तब एक अलौकिक और अन्तिम सत्यकी प्राप्तिसे वास्तव-पीड़ित मनको सान्त्वना मिलती है। धर्मकी प्रयोजनीयताका समर्थन करते हुए बड़े-बड़े धार्मिक भी यही युक्ति पेश करते हैं, पर मनुष्यका शरीरसम्बन्धी ज्ञान जितना ही उन्नत होता गया, आत्माकी धारणा भी उतनी ही सूक्ष्म होती आयी है और शरीर तथा आत्माका अविच्छेद्य सम्बन्ध उन्हें दिखायी देने लगा है। शरीरके साथ ही आत्माका निधन होता है, इस बातको मनुष्यने सभ्यताके प्राचीन युगमें ही मान लिया था। पश्चात् आत्माके दो भाग किये गये—जीवात्मा और परमात्मा। जीवात्मा नश्वर है, लेकिन परमात्मा अमर। देहातीत आत्मा या चैतन्य इस तरह जिन्दा रहा। प्लेटो और अरस्तू, रामानुज और शंकर—सभीने विदेही आत्माको इस प्रकार ईश्वर या ब्रह्मके साथ जोड़ दिया। आत्माको ‘विदेह’ माननेके अतिरिक्त कोई मार्ग भी नहीं रहा। असभ्य मनुष्यके निकट प्राकृतिक और अलौकिक दोनों ही प्रत्यक्ष सत्य हैं, उनका विज्ञान प्रधानत: मन्त्र-तन्त्र है। सभ्यजगत‍्में विज्ञानकी उन्नति रोकी नहीं जा सकती। विज्ञान अलौकिक शक्तिकी कोई परवा नहीं करता, बल्कि असभ्य मनुष्यके कल्पित अलौकिकके राज्यको क्रमश: संकीर्ण बना देता है। यही कारण है कि विज्ञानके प्रभावस्वरूप &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-paashcaaty-drshn-1-1-drshnkii/&quot;&gt;दर्शन&lt;/a&gt;की आत्मा क्रमश: विशुद्ध होती आयी है, यानी इसका प्रमाण प्रयोगके बाहर ले जाकर इन्द्रिय-बुद्धिसे परे रखा गया है। इसी आत्माको सारे विश्वतत्त्वके मूलमें उन्होंने विराजमान देखा। शांकर-&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;ान्तके अनुसार विश्वका मूलाधार ब्रह्म और आत्मा एक ही चीज है—‘तत्त्वमसि’। ‘देखा गया है कि प्रत्येक युगमें देश और जातियोंकी सीमा अतिक्रमकर मनुष्यकी विचारधारा एक प्रकार रही है। प्रेत-तत्त्व, जादू-विद्या, अनेकेश्वरवाद, एकेश्वरवाद इत्यादि मनुष्यकी चिन्ताधाराकी सीढ़ियाँ सभी देशोंमें एक ही प्रकारकी रही हैं। यह भी संधान मिलता है कि यह तत्त्व-विचार जीवनकी गतिके छन्दमें ही बदलता रहा है और सूक्ष्म भी होता आया है। हमारे असभ्य पूर्व पुरुषोंका प्रेत-विश्वास ही सभ्य मनुष्योंके अध्यात्मवादके मूलमें है, इससे हमारे सभ्यतागर्वी मनको चोट पहुँचती है, लेकिन इतिहास इसका साक्षी है। प्रकृति-जगत‍्का इतिहास हमको यह दिखलाता है कि चेतनाकी उत्पत्ति भी वस्तु-जगत‍्में ही है। आदर्शवादी दार्शनिक कहता है कि चेतना ही भूतका मूल है, लेकिन विज्ञानने यह भलीभाँति प्रमाणित किया है कि चेतना सदासे नहीं रही। वस्तु-जगत‍्के इतिहासमें ऐसा भी समय था, जब जीव-जगत‍्का अस्तित्व नहीं था। वस्तुनिरपेक्ष चेतना, रक्त-मांसविहीन अदृश्य—ये धारणाएँ मनुष्यकी बुद्धिप्रसूत हैं। लेकिन मनुष्यसे भी पहले, जीव-जगत् के अस्तित्वके पहले, चेतनाका अस्तित्व है, यह सम्भव नहीं। भूतसे ही चेतनाकी उत्पत्ति है, इसलिये भूत ही पहले है। चेतना सभी प्रकार भूतके पश्चात् है। अध्यात्मवादी वस्तु और चेतनाके सम्पर्कको केवल बुद्धिद्वारा जाँचते हैं, इतिहासकी ओर ध्यान नहीं देते।’ ‘आदिम मानवकी अपरिणत विज्ञानबुद्धिने वस्तुजगत‍्में मनुष्यकी ही भावनाधारणाकी छाया देखी है। उसीने प्रेत, परमात्मा, देवता, ईश्वर-आदर्श आदिका रूप लिया है। सदियों पहले चार्वाक और जेनोफेनीजने इसका अनुमान किया था। शताब्दियोंकी वैज्ञानिक गवेषणासे प्रमाण मिलता है कि भूतसे ही चेतनाकी उत्पत्ति हुई। चेतना भूतके ही विकासकी एक विशेष अवस्था है। इस चेतनाका, चाहे यह मनुष्यकी हो, चाहे किसी और प्राणीविशेषकी, भूत-जगत‍्से अलाहिदा कहीं पता नहीं चलता। अध्यात्मवादी सूर्यविज्ञान, भूतत्व और जीव-विज्ञानके प्रमाणित सिद्धान्तोंको मान भी लेते हैं, लेकिन साथ-ही-साथ कहेंगे कि ‘अस्फुट चेतनाने तो सारे जगत‍्को छा रखा है, यह विश्व चेतनामय है।’ इस प्रकार भूतजगत‍्की एक विशेषवस्तु या गुणको वह इसके मूलमें बिठला देते हैं, मनुष्यकी चेतनाको देश-कालातीत मानकर इसको भूतजगत‍्को चेतनाका रूप दे देते हैं। ‘अनुभव ही इस अध्यात्मवादी युक्तिका अन्तिम उत्तर है। शरीरविहीन चेतनाका कोई अस्तित्व नहीं। बर्बरके प्रेतकी तरह मानव-कल्पनाका यह प्रतिबिम्ब है। &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt; इसीलिये इतिहासके ऊपर जोर देता है। इस इतिहासका अर्थ राजाओंका युद्ध नहीं। यह समग्र मानव-समाज और सारे विश्वका इतिहास है। इतिहास ही चेतनाके ऐतिहासिक जन्मका प्रमाण है। यह चेतना देश और कालसे सीमित है। अध्यात्मवादी क्या करते हैं, वे मनुष्यकी किसी एक मानसिक क्रियाको मूल सत्य मानकर इसीको भूतजगत‍्के मूलमें पहुँचा देते हैं। कोई कहता है कि भूतके मूलमें प्रज्ञा (रीजन) है, कोई कहता है इच्छाशक्ति (विल) है और कोई कहता है प्राणशक्ति (वाइटल एयर्स) है। जहाँतक जान पड़ता है, जीवजगत‍्में मनुष्यको ही केवल अमूर्त-भावनाकी क्षमता प्राप्त है। मानव-मस्तिष्क और शरीरके संगठनकी विशिष्टतासे ही इस क्षमताकी उत्पत्ति है। असंख्य मनुष्योंकी अभिज्ञतासे ही ‘मनुष्य’ नामकी साधारण संज्ञा बनती है। लेकिन इन असंख्य मनुष्योंको छोड़कर इस साधारण संज्ञाका स्वतन्त्र अस्तित्व कहाँ रह जाता है? साधारण संज्ञा मनुष्यकी विचारक्रियाकी एक पद्धति है, यह मनुष्यके जीवनधारणके काम आती है। अन्यान्य जीव बाहरी जगत‍्की प्रेरणाओंको मिलाकर अमूर्त-भावनाकी सृष्टि नहीं कर सकते और इसीलिये प्रकृतिके सामने उनकी अक्षमता अधिक है। साधारण संज्ञाकी सृष्टिकी क्षमताने मनुष्यको प्रकृतिके रहस्यको समझनेमें काफी सहायता पहुँचायी है, लेकिन यही क्षमता मनुष्यके मनमें भ्रान्तिकी सृष्टि कर सकती है और करती है। साधारण संज्ञा वास्तवकी अभिज्ञतासे ही बनती है, लेकिन मनुष्यका मन इसको वास्तवसे हटाकर इसके एक स्वतन्त्र अस्तित्वकी सृष्टि कर सकता है और करता है, इसीलिये मनुष्यकी विचारधाराको ‘चेतना’, ‘प्रज्ञा’ आदि अनेकों साधारण संज्ञाओंमें परिवर्तित किया जा सकता है। आदर्शवादी यह भूलकर कि ‘चेतना’, ‘प्रज्ञा’ आदि साधारण संज्ञाएँ असंख्य जीवोंकी विशेष अवस्थापर निर्भर हैं, इनको एक स्वतन्त्र शक्तिके रूपमें देखते हैं।’ परंतु यह सारी कल्पना निरर्थक है। आयुर्वेद, योगशास्त्र तथा आध्यात्मिक दृष्टिके आधारपर शरीरसम्बन्धी ज्ञान लाखों वर्षोंका पुराना है। उपनिषदोंने लाखों वर्ष पहले घोषित कर दिया है—‘अविनाशी वा अरे अयमात्मा।’ (बृहदा०) यह आत्मा अविनाशी है। ‘शरीरके विनाशसे आत्माका भी विनाश होता है’ यह भ्रम पहले भी लोगोंको था। श्रुतिने भी कहा—‘एतेभ्यो भूतेभ्य: समुत्थाय तान्येवानु विनश्यति।’ (बृहदा० २।४।१२) अर्थात् शरीरादि संघातरूपमें परिणत भूतोंसे समुत्थित होकर उनके विनाशके पश्चात् ही विनष्ट हो जाता है, अर्थात् देहादिका नाश होते ही उसके साथ तादात्म्याभिमानमूलक जो औपाधिकरूप है, वह नष्ट हो जाता है। जैसे विशिष्ट तेज आदिके कारण सामुद्रिक जलमें लवण-कणका रूप बनता है, उपाधिके वियुक्त होनेपर वह औपाधिकरूप नष्ट हो जाता है, परंतु जैसे लवण-कण नष्ट होनेपर भी सिन्धुजल नहीं मिटता, वैसे ही देहादि उपाधिमूलक औपाधिकरूप नष्ट होनेपर भी वास्तविक अनौपाधिकरूप बना ही रहता है। जैसे महाकाशका अंश ही घटाकाश होता है, वैसे ही परमात्माका अंश ही क्षेत्रज्ञ आत्मा है। जीवात्माके औपाधिक रूपके नश्वर होनेपर भी उसका वास्तविकरूप कभी नश्वर नहीं है। प्रेतात्माकी कल्पना न केवल शास्त्रीय ही है, अपितु उसके प्रत्यक्ष चमत्कार आज भी उपलब्ध होते हैं। प्रेत-विद्याके आधारपर ही अन्य लोगोंको अविज्ञात गुप्त-से-गुप्त रहस्योंका ज्ञान परलोकविद्यावाले बतलाते हैं। अनेक स्थानोंमें सबके सामने किसी गृह-प्रांगणमें ईंट, पत्थर एवं अपवित्र वस्तुओंकी वर्षा होना, घरकी वस्तुओं, वस्त्रों आदिका देखते-देखते लुप्त होना आदि घटनाएँ ऐसी हैं कि पुलिसकी छान-बीन भी वहाँ व्यर्थ होती है, केवल साहसमात्रसे ऐसी वस्तुओंका अपलाप नहीं किया जा सकता। युक्तिकी दृष्टिसे भी उत्कट कामनायुक्त मन:प्रधान सूक्ष्म शरीरविशिष्ट प्राणी अपने प्राक्तन कर्मोंके अनुसार अन्य योनियोंके समान ही प्रेतयोनिमें भी प्राप्त होता है। कर्मोंके उत्कर्ष-अपकर्षके अनुसार ही उनमें भी ऐश्वर्यका तारतम्य होता है। आस्तिक प्रत्यक्षानुमानके अतिरिक्त आगम-प्रमाण भी मानते हैं। तदनुसार पूजा-पाठ, मन्त्र-तन्त्र—सभीका अस्तित्व है। ईश्वर न माननेवाले मीमांसकों एवं सांख्योंने भी मन्त्रोंका महत्त्व माना है। निरीश्वरवादी बौद्धों एवं जैनियोंमें भी मन्त्रोंका अस्तित्व मान्य है। सबके ही यहाँ प्रणवादि मन्त्रका जप चलता है। आजके वैज्ञानिक युगमें भी अधिकांश मनुष्य मन्त्रोंमें विश्वास रखते हैं। जैसे तृण, वीरुध, ओषधियोंमें भिन्न विचित्र गुण होते हैं, उनके परस्पर संश्लेष-विश्लेषसे उन गुणोंमें ह्रास-विकास एवं उद‍्गम-अभिभव होता रहता है, वैसे ही मन्त्रोंसे भी। अगणित ओषधियों एवं उनके अगणित संश्लेष-विश्लेषोंसे उद‍्भूत एवं अभिभूत होनेवाले गुणोंको केवल अन्वय-व्यतिरेकसे नहीं समझा जा सकता। अन्वय-व्यतिरेकसे एक संखियाका ही गुण, रस, स्वाद आदि लाखों प्राणियोंके भी बलिदानसे लाखों वर्षोंमें भी जान सकना असम्भव है। अतएव महातपा महर्षियोंने योगज प्रत्यक्षसे ही सब वस्तुओंके गुण जाने हैं। इसी तरह वर्णोंके भी विचित्र संश्लेष-विश्लेषमें भी विलक्षण प्रकारकी शक्तियाँ निहित होती हैं। वर्णविन्यासोंके चमत्कार लोकमें भी प्रत्यक्ष हैं ही। राजा-जारा, नदी-दीन, कपि-पिक आदि वर्णोंके व्यत्यास मात्रसे अर्थ और प्रभावमें कितना भेद होता है? कोई वर्णविन्यासज्ञ पाँच मिनटके लिये सुप्रीमकोर्टमें खड़ा होकर वर्णविन्यासकी महिमासे दूसरोंका और अपना महान् लाभ कर लेता है। कोई अननुरूप वर्णविन्यासके कारण कलहका कारण बन अपना और दूसरोंका नुकसान कर लेता है। इसीलिये योगियों, तार्किकों एवं नैयायिकोंने भी मन्त्रशक्ति मानी है। कोई भी विधिपूर्वक मन्त्रानुष्ठान करके आज भी मन्त्रका महत्त्व अनुभव कर सकता है। कुछ वैज्ञानिक भी अलौकिक शक्ति मानने लगे हैं। दर्शन वैज्ञानिकोंके विज्ञानकी परवा न करके ही अपने सत्य सिद्धान्तको वैज्ञानिकों एवं विज्ञानकी उत्पत्तिके पहलेहीसे बतला रहा है। लाखों वर्ष पहलेसे ही, जब आधुनिक वैज्ञानिक गर्भमें भी नहीं आये थे, उपनिषदें आत्माको मनोवचनातीत कहती आ रही हैं। वह इसलिये कि आन्तर वस्तुसे बाह्य वस्तुका ग्रहण होता है, बाह्यसे आन्तरका नहीं। बाह्य प्रकाशका परिज्ञान नेत्रसे होता है, परंतु सूक्ष्म नेत्र-इन्द्रियका बोध बाह्य प्रकाशसे नहीं होता। इन्द्रियोंका व्यापार मनसे विदित होता है, परंतु इन्द्रियोंसे मनका व्यापार विदित नहीं होता। मन, बुद्धि आदिका बोध सर्वभासक साक्षीसे होता है, परंतु स्वप्रकाश साक्षीका मन आदिके द्वारा बोध नहीं होता। इसी तरह जाति, गुण, क्रिया, सम्बन्धसे रहित होनेके कारण शब्दकी अभिधावृत्तिका गोचर अद्वितीय ब्रह्म नहीं होता। बराक (बेचारे) विज्ञानके भयसे दार्शनिकोंने ब्रह्मको मनोवचनातीत नहीं बनाया है।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थमूलक</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>चेतना</category><category>देकार्त्तेमनवस्तु</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>11.12 ज्ञान और आनन्द ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/11-12-jnyaan-aur-aannd-maarksvaa/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/11-12-jnyaan-aur-aannd-maarksvaa/</guid><description>11.12 ज्ञान और आनन्द ज्ञानके सम्बन्धमें अनेक प्रकारोंकी विप्रतिपत्तियोंके रहते हुए भी ‘अर्थप्रकाश’ को ही ‘ज्ञान’ कहा जा सकता है। मुक्तिमें यद्यपि अर्थ नहीं होता, तथापि जब अर्थ-संसर्ग सम्भव हो, तभी…</description><pubDate>Sat, 12 Jul 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;11.12 ज्ञान और आनन्द&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;ज्ञानके सम्बन्धमें अनेक प्रकारोंकी विप्रतिपत्तियोंके रहते हुए भी ‘अर्थप्रकाश’ को ही ‘ज्ञान’ कहा जा सकता है। मुक्तिमें यद्यपि अर्थ नहीं होता, तथापि जब अर्थ-संसर्ग सम्भव हो, तभी अर्थका प्रकाशक अर्थ ही ज्ञान है। अतएव ‘ज्ञानत्व जाति-विशेष है, साक्षात् व्यवहारजनकत्व ही ज्ञानत्व है, जड-विरोधित्व ही ज्ञानत्व है, जडसे भिन्नत्व ही ज्ञानत्व है, अज्ञानविरोधित्व ही ज्ञानत्व है’ आदि भी ज्ञानके लक्षण हैं। इनमेंसे कोई लक्षण वृत्तिप्रतिबिम्बित चिदाभासमें संगत होता है, तो कोई अखण्ड ब्रह्मरूप ज्ञानमें जाता है, किंतु अर्थप्रकाशत्व वृत्तिप्रतिबिम्बित चैतन्यरूप ज्ञान एवं ब्रह्मरूप ज्ञान दोनोंमें ही अनुगत है। सर्वावभासक ज्ञान ही ब्रह्म है; क्योंकि यह श्रुतिप्रमाण है—‘तस्य भासा सर्वमिदं विभाति।’ (कठोप० २।२।१५) सर्वप्रेमास्पदत्व, सर्वानन्दयितृत्व ही आनन्द है। ‘एष ह्येवानन्दयति’ (तैत्ति० उप० २।७)। यह ब्रह्म ही आनन्दित करता है। यह सर्वावभासक ज्ञान स्वत: भासमान होता है। यदि उसका भी कोई अन्य भासक माना जायगा, तो उसका भी भासक कोई अन्य मानना पड़ेगा? इस तरह अनवस्था-दोष अनिवार्य हो जायगा। इसपर कहा जाता है कि ‘यदि ज्ञानस्वरूप ब्रह्म सर्वदा भासमान है, तो उसमें जगत‍्का अध्यास किस तरह बन सकेगा? क्योंकि भासमान शुक्तिकामें रजतका अध्यास नहीं होता—जैसे शुक्तिका भान रजताध्यासका विरोधी होता है, वैसे ही ज्ञानस्वरूप ब्रह्मका भासमान होना भी प्रपंचाध्यासका विरोधी होगा।’ किंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि सर्वथा अभासमान शुक्तिकामें भी तो रजताध्यास कभी भी नहीं होता, सामान्यतया भासमान शुक्त्यादि अधिष्ठानमें ही रजतादिका अध्यास होता है। अभासमान एवं विशेषाकारेण भासमान अधिष्ठानमें अध्यास नहीं होता। इस तरह सामान्यतया भासमान ज्ञानस्वरूप ब्रह्मसे प्रपंचाध्यास बन सकता है। इसपर पुन: कहा जा सकता है कि ‘निर्विशेष ब्रह्ममें सामान्य-विशेष-व्यवहार नहीं बन सकता।’ पर यह भी ठीक नहीं; क्योंकि जबतक अविद्या है, तबतक निर्विशेष ब्रह्ममें भी कल्पित विशेष मान्य होता ही है। निर्विशेष ब्रह्ममें प्रपंचाध्यास माना भी नहीं जाता, किंतु अज्ञानावच्छिन्न सविशेषमें ही प्रपंचका अध्यास होता है। तथा च प्रपंचाध्यासका अधिष्ठानभूत ब्रह्मका सामान्याकार सन्मात्र है और विशेषाकार ज्ञान एवं आनन्द है। भ्रमकालमें विशेषाकारकी प्रतीति नहीं होती, सामान्याकार-प्रतीति भ्रमकालमें भी होती है। ‘इदं रजतम्’ के समान ही ‘सज्जगत्’ यह भ्रम-प्रत्यक्ष होता है। जैसे वहाँ ‘इदमंश’ अधिष्ठान सामान्यांश है, वैसे ही यहाँ सदंश अधिष्ठान सामान्यांश है। जैसे ‘शुक्तौ रजतम्’ इस प्रकार भ्रम नहीं होता, वैसे ही ‘ज्ञानमानन्दो वा जगत्’ ऐसा भ्रम नहीं होता। जैसे नीलपृष्ठ, त्रिकोण शुक्तिके साक्षात्कारसे रजतभ्रम दूर हो जाता है, उसी तरह सत्यज्ञानानन्दस्वरूप ब्रह्मके साक्षात्कारसे जगद्‍भ्रम मिट जाता है। ज्ञानानन्दरूपसे अभासमान और सद्‍रूपसे भासमान ब्रह्ममें जगत‍्का अध्यास होता है। अघटित-घटना-पटीयसी मायाके कारण ही ब्रह्ममें जगत‍्का अध्यास होता है। ‘सेव्यं भगवतो माया यन्नयेन विरुद्धॺते’ (श्रीमद्भा० ३।७।९)—भगवान‍्की माया नयसे विरुद्ध होनेपर भी प्रत्यक्ष ही प्रपंचाध्यास मायाके द्वारा सम्पन्न हो जाता है। आनन्दके सम्बन्धमें भी इसी प्रकार कहा जा सकता है—(१) आनन्दत्व जाति आनन्द है या (२) अनुकूलतया &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;नीयत्व आनन्द है या (३) अनुकूलत्वमात्र आनन्द है या (४) ज्ञानस्वरूपता ही आनन्द है अथवा (५) निरुपाधि-इष्टता ही आनन्द है अथवा (६) दु:खविरोधित्व ही आनन्द है या (७) दु:खाभावोपलक्षितत्व आनन्द है? पहला पक्ष इसलिये ठीक नहीं कि वह लक्षण अखण्डस्वरूप ब्रह्मानन्दमें नहीं जाता। दूसरा भी ठीक नहीं; क्योंकि मोक्षमें तो आनन्दस्वरूप ब्रह्म ही रहता है, उसे जाननेवाला कोई वेदिता रहता ही नहीं। आनन्दस्वरूप आत्मा वेद्य है भी नहीं, अत: वह वेदनीय भी हो नहीं सकता, तब उसमें द्वितीय लक्षण कैसे संगत होगा? अनुकूलता भी सापेक्ष होती है और वह भी अन्यके प्रति न होकर अपने प्रति ही कहनी पड़ेगी। तथा च, सविशेषता अनिवार्य होगी, निर्विशेषमें अपने प्रति अपनेमें अनुकूलवेदनीयता कथमपि उपपन्न नहीं हो सकती। इसीलिये तीसरा भी पक्ष ठीक नहीं। यदि वेदनस्वभावसे अधिक अनुकूलता स्वाभाविक है, तब भी सखण्डतापत्ति होगी। यदि अनुकूलता औपाधिक है, तब तो उस आनन्दकी कभी निवृत्ति भी हो सकती है। चतुर्थ पक्ष भी ठीक नहीं; क्योंकि उक्त रीतिसे अनुकूलता सम्भव नहीं। इस तरह तो दु:खज्ञानको आनन्द कहना पड़ेगा। निर्विषय ज्ञान अतएव निरुपाधि-इष्टता ही आनन्द है, यह पाँचवाँ पक्ष भी ठीक नहीं। सुख है, यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि ज्ञान सविषय ही होता है, विषयानुल्लेखि ज्ञान होता ही नहीं। छठा पक्ष भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि यदि विरोधनिवर्त्तन ही है, तब तो आनन्दरूप आत्मामें सदा ही दु:ख-निवृत्ति होनी चाहिये। यदि दु:खतादात्म्यकी अयोग्यता ही दु:खविरोधिता है, तब तो घटादि भी दु:खतादात्म्यके अयोग्य हैं, उन्हें भी आनन्द कहा जाना चाहिये। सप्तम पक्ष भी ठीक नहीं; क्योंकि दु:खाभावरूप वैशेषिकके मोक्षमें आनन्द न होनेपर भी दु:खाभावोपलक्षितत्वरूप वेदान्तीके आनन्दका लक्षण चला जायगा। इस तरह उपर्युक्त लक्षणोंमें दोष होनेपर भी निरुपाधि-इष्टता अर्थात् निरुपाधिक निरतिशय प्रेम या इच्छाकी विषयता ही आनन्द है, यह लक्षण निर्दोष है। इसपर कहा जा सकता है कि ‘दु:खाभाव भी निरुपाधि-इच्छाका विषय होता है, अत: लक्षण अतिव्याप्त है।’ किंतु यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि दु:खाभाव भी एक प्रकारके सुखका शेष ही है, अत: वह लक्ष्य ही है, वहाँ लक्षण जाना अतिव्याप्ति नहीं। अभाव भी विरोधि-भावान्तर ही है, अत: दु:खाभाव सुखरूप ही है। कहा जा सकता है कि ‘मुक्तिमें तो इच्छा नहीं रहती, परंतु वहाँ भी आनन्द तो रहता है, अत: अव्याप्ति हुई।’ पर यह भी ठीक नहीं; क्योंकि वहाँ भी इष्टत्वोपलक्षितत्व तो है ही। जब भी इच्छा थी, तब उसका विषय आनन्द था। इच्छाके विषय यद्यपि शब्दादि विषय भी होते हैं, तथापि वे सुखसाधन होनेसे इच्छाके विषय होते हैं, स्वत: नहीं। वे ही जब दु:खकारक होते हैं, तब उनमें द्वेष होने लगता है। अत: वे सोपाधिक इच्छाके ही विषय होते हैं। निरुपाधिक इच्छाके नहीं। उपलक्ष्यमें व्यावर्त्तक अवच्छेदकका रहना आवश्यक नहीं, जैसे कभी भी काकके रहनेसे काकोपलक्षित गृहका बोध होता है, उसी तरह कभी भी होनेवाली इच्छासे इष्टत्वोपलक्षित आनन्दका बोध हो सकता है। यहाँ शंका होती है कि ‘निरुपाधि-इष्टत्व आनन्दमें स्वाभाविक है या औपाधिक?’ अन्तिम पक्ष ठीक नहीं है; क्योंकि ब्रह्मस्वरूपमें आनन्दरूपता औपाधिक नहीं होगी; क्योंकि उसकी इष्टता तो निरुपाधिक ही है। प्रथम पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि इसमें भी विकल्प यह है कि वह निरुपाधि इष्टत्व-ज्ञानसे भिन्न है या अभिन्न? यदि पहला पक्ष कहें, तो उसमें सखण्डत्वापत्ति होगी। यदि ज्ञानसे अभिन्न ही है, तब तो उसमें आनन्द-पदप्रयोग व्यर्थ ही है, परंतु यह भी कहना ठीक नहीं; क्योंकि ज्ञान और आनन्द दोनोंका यद्यपि अभेद ही है, तथापि कल्पित भेद लेकर ज्ञानत्व-आनन्दत्व जातिभेदको लेकर दोनों शब्दोंकी प्रवृत्ति होती है। एतावता ‘विषयोल्लेखरहित ज्ञान आनन्द है’, यह पक्ष भी निर्दोष ही है। ‘ज्ञान विषयोल्लेखरहित भी होता ही है’, यह पीछे सिद्ध किया जा चुका है। जगत् दृश्यरूप होनेसे सत् नहीं कहा जा सकता; किंतु दृक्रूप होनेसे आनन्द सद्‍रूप भी है। सुख एवं वेदनका भेद न होनेसे परप्रेमास्पदरूपसे भासमान आत्मा ही आनन्दरूप है। जैसे वृत्तिरूप ज्ञान अनित्य होनेपर भी वृत्तिभासक स्फुरणरूप ज्ञान नित्य है, वैसे ही अन्त:करणवृत्तिरूप सुख भी अनित्य है; परंतु ब्रह्मात्मस्वरूप सुख नित्य ही है। ‘मैं कभी न रहूँ’ ऐसा न हो, किंतु सर्वदा बना रहूँ ‘मा न भूवम्, किंतु सर्वदा भूयासम्’ इस प्रकार आत्मामें स्वाभाविक ही प्रेम देखा जाता है। यदि आत्मा सुखरूप न हो, तो वह प्रेमास्पद नहीं हो सकता। यदि प्राणी अनित्य सुखमें भी प्रेम करता है, तो नित्य सुखमें तो परप्रेम होना ही चाहिये। सुखमें ही प्रेम होता है। सुखसाधनोंमें भी यद्यपि प्रेम होता है, तथापि सुखके प्रयोजनसे ही सुखसाधनोंमें प्रेम होता है। सुखसाधनोंमें प्रेम सुखार्थ ही होता है, परंतु सुखमें प्रेम अन्यार्थ नहीं होता। इसी तरह आत्मामें भी प्रेम आत्मार्थ ही होता है, अन्यार्थ नहीं। इसीलिये आत्मा निरुपाधिक प्रेमका आस्पद है। जैसे चणकचूर्णादि (बेसन)-में मधुरता शर्करासम्बन्धसे होती है, परंतु शर्करामें स्वत: मधुरिमा होती है। मोदक आदिमें सातिशय मिठास होती है, शर्करामें निरतिशय मिठास होती है। उसी तरह अन्यत्र सातिशय प्रेम होता है, आत्मामें निरतिशय प्रेम होता है। इसीलिये सब कुछ आत्मार्थ है, आत्मा अन्यार्थ नहीं होता। अत: आत्मा सबका ही शेषी है। संसारमें सुख-दु:ख एवं सुख-दु:ख-साधनोंके वैचित्र्यसे यह मानना पड़ता है कि यह विचित्रता जीवात्माके पिछले शुभाशुभ कर्मोंसे ही उपपन्न होगी। पिछले शुभाशुभ कर्मोंकी उत्पत्ति भी जन्मान्तरीय देहसे माननी पड़ेगी। वह जन्मान्तर भी उससे प्राचीन कर्मोंसे मानना पड़ेगा। इस तरह बीज एवं अंकुरकी परम्पराके समान ही जन्मों एवं कर्मोंकी परम्पराको भी अनादि मानना पड़ता है। यह अनादि परम्परा सादि देहके आश्रित हो नहीं सकती। अत: अनादि आत्माके ही आश्रित उसे मानना पड़ता है; अर्थात् अनादि आत्माके ही पूर्व-पूर्व देहोंसे उत्तरोत्तर कर्म होते हैं एवं पूर्व-पूर्व कर्मोंसे उत्तरोत्तर देह होते हैं। उस आत्मामें ही कर्म एवं जन्म चलते हैं। शय्या, प्रासादादि-संघात जैसे परार्थ (दूसरोंके लिये) होते हैं, वैसे ही देह, इन्द्रिय, मन आदिका संघात भी स्वविलक्षण किसी चेतनके लिये ही होता है। शय्यादि जैसे अपनेसे भिन्न देवदत्तादि शरीररूपी संघातके ही लिये दृष्ट हैं, वैसे ही यदि देहादिसंघात भी किसी दूसरे संघातके ही लिये हों, तब तो अनवस्था प्रसंग होगा; क्योंकि उस संघातको भी किसी अन्य संघातके लिये मानना पड़ेगा। अत: शरीरादि-संघातको किसी स्वविलक्षण, असंहत चेतनके लिये मानना पड़ेगा। इसीलिये त्रिगुणात्मक सुख-दु:ख-मोहात्मक अव्यक्त, महदादि प्रपंचके विपरीत त्रिगुणातीत, असंहत असंग चेतन आत्मा सिद्ध होता है। त्रिगुणात्मक जड-प्रपंच रथादि चेतन सारथी या अश्वादिसे अधिष्ठित ही जैसे कार्यकरणक्षम होता है, वैसे अचेतन प्रकृति, बुद्धि आदि भी चेतनसे अधिष्ठित होकर ही कार्यकरणक्षम होंगी। अत: त्रिगुणात्मक अचेतनसे भिन्न चेतन अधिष्ठाता आवश्यक है। भोक्ता भी अचेतनसे भिन्न चेतन ही होना चाहिये। सुख-दु:खादि भोग्य हैं। इनके द्वारा अनुकूलनीय, प्रतिकूलनीय, सुखी, दुखी चेतन ही हो सकता है। बुद्धॺादि स्वयं सुख-दु:ख-मोहात्मक हैं, अपनेसे ही स्वयं अनुकूलनीय या प्रतिकूलनीय नहीं हो सकते। इसी तरह द्रष्टाके बिना दृश्य नहीं हो सकता। बुद्धॺादि दृश्य हैं, उनका द्रष्टा उनसे भिन्न ही होना चाहिये। साक्षात् द्रष्टा होनेसे चेतन ही साक्षी हो सकता है। द्रष्टा चेतन स्वयं अदृश्य होता है। चैसे रूप दृश्य है, चक्षु द्रष्टा है, वैसे ही चक्षु भी दृश्य है, मन द्रष्टा है। संसारमें चेतनके अधीन ही अचेतनकी प्रवृत्ति होती है। भले चेतनसंयुक्त अचेतनकी प्रवृत्ति होती है, तथापि प्रवृत्ति अचेतनकी ही है; क्योंकि दोनों ही प्रत्यक्ष हैं। फिर भी अचेतन रथादिसे जीवित देहमें अचेतन-विलक्षणता स्पष्ट ही है। काष्ठादिके आश्रित दाह, प्रकाशादि क्रिया केवल अग्निमें उपलब्ध नहीं होती। फिर भी दाह, प्रकाशादि क्रिया अग्निका ही धर्म है; क्योंकि अग्निसंयोग होनेसे ही काष्ठादिमें दाहादि उपलब्ध होता है, अग्निसंयोगके बिना उपलब्ध नहीं होता। भौतिकवादी भी तो चेतन देहको ही प्रवर्तक मानते हैं। वेदान्तानुसार निर्विकार कूटस्थ आत्मा भी अचेतनका प्रवर्तक वैसे ही होता है, जैसे अयस्कान्तमणि स्वयं प्रवृत्तिरहित होनेपर भी लोहका प्रवर्तक होता है या जैसे प्रवृत्तिरहित रूपादि चक्षुरादिके प्रवर्तक होते हैं। यद्यपि जैसे दुग्ध स्वयं वत्सवृद्धॺर्थ प्रवृत्त होता है, जैसे जल अचेतन भी प्रवृत्त होता है, वैसे ही अचेतनकी प्रवृत्ति होनी ठीक है; तथापि वहाँ भी वत्सके चोषण तथा सर्वशासक अन्तर्यामीसे ही दुग्धादिकी प्रवृत्ति होती है। जैसे कर्ताके बिना कुठारादि करणोंका व्यापार नहीं बन सकता, वैसे ही देह, इन्द्रियादिका देहादिभिन्न कर्ताके बिना व्यापार नहीं हो सकता। भौतिकवादी शरीरको चेतन कहता है। कहा जाता है कि ‘जैसे नैयायिकके मुक्तात्मामें ज्ञान नहीं होता, वैसे ही मृत शरीरमें भी ज्ञानका अनुपलम्भ उपपन्न हो जाता है। प्रमाणके अभावसे ज्ञानका अभाव उपपन्न हो ही जाता है।’ परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि यदि शरीर चेतन हो, तो बाल्य-यौवनादि-भेदसे देहमें भेद सुस्पष्ट उपलब्ध होता है। फिर एक देह न होनेसे एक आत्मा भी नहीं होगा। फिर ‘जिस मैंने बाल्यावस्थामें माताका अनुभव किया था, वही मैं वृद्धावस्थामें पौत्रोंका अनुभव करता हूँ’ ऐसा अनुभव न होना चाहिये। बाल, स्थविर-शरीरमें भेद प्रत्यक्ष है। शरीरसम्बन्धी अवयवोंके उपचय-अपचयद्वारा शरीरका उत्पाद-विनाश सिद्ध है। जो कहा जाता है कि ‘पूर्वशरीरोत्पन्न संस्कारसे द्वितीय शरीरमें संस्कार उत्पन्न होता है’, तो यह ठीक नहीं। अनन्त संस्कारोंकी कल्पनामें गौरव होगा। यदि शरीर ही चेतन है, तब तो वह उत्पन्न होनेवाला शरीर नवीन ही है। फिर बालकोंकी माताके स्तन्यपानमें प्रवृत्ति न होनी चाहिये; क्योंकि इष्टसाधनता ज्ञान प्रवृत्तिमें हेतु है। सद्य:समुद‍्भूत शिशुको इष्टसाधनताका अनुभावक कुछ भी नहीं है। देहभिन्न आत्मा माननेवाले तो कह सकते हैं कि जन्मान्तरानुभूत इष्टसाधनताका स्मरण हो सकता है, परंतु जहाँ देहभिन्न आत्मा नहीं है, वहाँ तो जन्मान्तरकी बात है ही नहीं। वहाँ स्तन्यपानमें जन्मान्तरीय इष्टसाधनताका ज्ञान नहीं कहा जा सकता। शंका हो सकती है कि ‘यदि जन्मान्तरीय अनुभूत स्तन्यपानकी इष्टसाधनताका स्मरण होता है, तो अन्य जन्मान्तरीय अनुभूत पदार्थोंका स्मरण क्यों नहीं होता?’ तो इसका समाधान यह है कि उद‍्बोधक न होनेसे उनका स्मरण नहीं होता। स्तन्यपानके सम्बन्धमें तो जीवनका हेतुभूत अदृष्ट ही संस्कारका उद‍्बोधक है। यदि स्तन्यपानमें इष्टसाधनताका बोध होकर प्रवृत्ति न हो, तो जीवन ही असम्भव हो जायगा। कुछ लोग चक्षु, श्रोत्र आदि इन्द्रियोंको ही चेतन मानते हैं, परंतु चक्षु आदिके उपघात होनेपर भी स्मृति होती है, अत: यदि चक्षुरादि इन्द्रियाँ चेतन होतीं, तो उनके उपघातमें स्मृति न होनी चाहिये थी। अन्यके अनुभूतका अन्य स्मरण नहीं कर सकता। मन भी चेतन नहीं है। फिर तो वह अणु होनेसे उसकी प्रत्यक्षता न होगी। कहा जाता है कि ‘क्षणिक विज्ञान ही आत्मा है।’ परंतु ‘सोऽहं’ (मैं वही हूँ) इस प्रकार अनेकदिनवर्ती आत्माकी प्रत्यभिज्ञा होनेसे नित्य विज्ञान ब्रह्मको ही आत्मा मानना ठीक है।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt; और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>आनन्द</category><category>ज्ञानप्रेम</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>11.11 अनुभव-विमर्श ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/11-11-anubhv-vimrsh-maarksvaad/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/11-11-anubhv-vimrsh-maarksvaad/</guid><description>11.11 अनुभव-विमर्श अनुभव यदि दूसरे अनुभवसे अनुभाव्य होगा तो अनवस्थादोष होगा; क्योंकि वह जिस अनुभवसे अनुभाव्य होगा, उसे भी किसी अन्य अनुभवसे अनुभाव्य होना पड़ेगा। यदि प्रथमानुभवसे द्वितीयका एवं द्व…</description><pubDate>Fri, 11 Jul 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;11.11 अनुभव-विमर्श&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;अनुभव यदि दूसरे अनुभवसे अनुभाव्य होगा तो अनवस्थादोष होगा; क्योंकि वह जिस अनुभवसे अनुभाव्य होगा, उसे भी किसी अन्य अनुभवसे अनुभाव्य होना पड़ेगा। यदि प्रथमानुभवसे द्वितीयका एवं द्वितीयसे प्रथमका अनुभव माना जाय तो अन्योन्याश्रयदोष होगा। प्रथमका द्वितीयसे, द्वितीयका तृतीयसे अनुभव मानें तो अनवस्था और यदि प्रथमानुभवका अपनेसे ही अनुभव माना जाय तो आत्माश्रय-दोष होगा एवं वही कर्म और वही कर्त्ता होनेसे कर्म-कर्त्तृविरोध भी होगा। अतएव अनुभवत्व एवं अनुभाव्यत्व दोनोंका सामानाधिकरण्य नहीं हो सकता। लोग कहते हैं कि ‘यदि अननुभाव्यत्वके कारण अनुभवका अनुभवत्व सिद्ध किया जायगा, तब तो खपुष्प भी अननुभाव्य है, अत: उसमें भी अनुभवत्व ठहरेगा।’ परंतु ऐसा कहना ठीक नहीं। जैसे गोमें गोत्व, घटमें घटत्व होता है, वैसे ही अनुभवमें अनुभवत्व सिद्ध ही है। फिर उसे अननुभाव्यत्वरूप साधनसे सिद्ध क्या करना है? फिर भी यदि अननुभाव्यत्वरूपसे अनुभवत्व सिद्ध भी करना पड़े तो ‘सत्त्वे सत्यननुभाव्यत्व’ अर्थात् सत्त्वविशिष्ट अननुभाव्यत्व भी अनुभवत्वका साधक हेतु माना जाता है। तथा च खपुष्पमें भले ही अननुभाव्यत्व रहे, परंतु विशेषणभूत सत्त्व न होनेसे उसमें अनुभवत्व नहीं जायगा। अज्ञात घटमें भी अनुभवयोग्यता है ही। अनुभवितुं योग्य ही अनुभाव्य होता है, अत: उसमें भी अतिव्याप्ति न होगी। कुछ लोग कहते हैं कि ‘जो वर्तमान दशामें स्वाश्रयके प्रति स्वसत्तासे ही स्वविषयका साधन है, वही अनुभूति है।’ परंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि विषय साधनत्व विषय-प्रकाशकत्व ही है। उसका भी अर्थ होगा विषय-प्रकाशजनकत्व। विषय-प्रकाश विषयानुभवरूप ही होगा। तथा च निष्कर्ष यह निकलेगा कि अनुभव अनुभवका जनक है। यदि इन दोनों अनुभवोंकी एकता मान्य है, तब तो आत्माश्रय-दोष होगा। जैसे स्वयं देवदत्त अपनेसे उत्पन्न नहीं हो सकता, वैसे अनुभव भी अपनेसे ही उत्पन्न नहीं हो सकता। यदि दोनोंको भेद माना जाय तो द्वितीय अनुभवको प्रथमानुभवसे जन्य कहना पड़ेगा, परंतु प्रथमानुभव किससे उत्पन्न होगा? यदि उसे विषयेन्द्रिय सन्निकर्षसे जन्य मानें, तब तो द्वितीय अनुभवको भी उस सन्निकर्षसे जन्य मानना चाहिये। फिर उसे प्रथमानुभवसे जन्य क्यों माना जाय? अत: ‘अनुभव स्वविषय अनुभवका जनक है’ यह कल्पना व्यर्थ ही है। ‘अनुभव स्वाश्रयके प्रति स्वविषयका प्रकाशक है’ इस तरह ‘स्वाश्रयके प्रति’ यह अंश भी व्यर्थ ही है; क्योंकि अनुभव किसीके आश्रित नहीं रहता। जो कहते हैं कि ‘अनुभव आत्माके आश्रित रहता है’, वह भी ठीक नहीं है; क्योंकि अनुभव स्वयं ही तो आत्मा है। कुछ लोग कहते हैं कि ‘अनुभविता ही आत्मा है, अनुभव नहीं’, पर यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि अनुभव ही अनुभविता भी है। जैसे प्रकाशस्वरूप सविता ही प्रकाशक भी कहा जा सकता है, वैसे ही अनुभवस्वरूप आत्मा ही अनुभविता भी कहा जा सकता है। कहा जाता है कि ‘संकोचविकासशाली धर्मभूत नित्यद्रव्य आत्मस्वरूपसे भिन्न ही ज्ञान है,’ परंतु संकोचविकास सावयव पदार्थका ही धर्म होता है। जो विकारी है, वह नित्यद्रव्य नहीं हो सकता। फिर इस पक्षमें यदि धर्मभूत ज्ञानद्रव्य स्वसत्तासे ही स्वविषयका प्रकाशक होता है, तो इसी तरह ज्ञानस्वरूप आत्मा भी स्वसत्तासे विषयप्रकाशक हो ही सकता है। वस्तुतस्तु शुद्ध बोध ब्रह्मस्वरूप ही है, अतएव वह निर्धर्मक ही है। अतएव उसमें अनुभवत्व, बोधत्वादि धर्मकी कल्पना व्यर्थ है। ‘अनुभवका लक्षण क्या है?’ इस प्रश्नका उत्तर यही है कि अनुभवका स्वरूप लक्षण अनुभव ही है। यदि अनुभवका भी अन्य स्वरूप हो, तब तो उस स्वरूपका भी कोई अन्य स्वरूप होगा एवं उस स्वरूपका भी अन्य स्वरूप होगा, फिर अनवस्थाप्रसंग अनिवार्य होगा। तटस्थ लक्षण अनुभवका वही है, जो ब्रह्मका है—‘यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति तद‍्ब्रह्म’ (तैत्ति० उप० ३।१) अर्थात् जिससे समस्त भूत उत्पन्न होते हैं, जिसमें जीवित रहते हैं और जिसमें विलीन होते हैं, वही ब्रह्म है। कहा जाता है कि ‘अनुभव यदि परप्रकाश्य होगा, तो अनवस्थादि दोष होंगे, अत: उसे स्वयंप्रकाश कहना पड़ेगा। इस तरह स्वयंप्रकाशत्व धर्म उसमें रह सकता है, फिर उसे निर्धर्मक कैसे कहा जा सकता है?’ पर यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि यद्यपि ब्रह्ममें व्यावहारिक सधर्मकत्व है तथा पारमार्थिक धर्म उसमें कोई नहीं है; क्योंकि वह सजातीय-विजातीय-स्वगत सर्वविध भेदशून्य है। कहा जाता है कि ‘अनन्यावभास्यत्वविशिष्ट स्वेतरसर्वावभासकत्व ही स्वयंप्रकाशत्व है। अनुभवके सर्वावभासक होनेका अर्थ है सर्वावभास या सर्वानुभवजनक होना,’ परंतु यह कहना भी ठीक नहीं है। वस्तुत: निर्विकल्पक ज्ञान चैतन्य शब्दसे कहा जाता है और सविकल्पक ज्ञान वृत्तिशब्दवाच्य है। इस दृष्टिसे सविकल्पक ज्ञानकी उत्पत्ति निर्विकल्पक ज्ञानसे हो सकती है। यहाँ भी प्रश्न होता है कि ‘वृत्तिज्ञान क्या है? वृत्ति चैतन्य या अन्य कुछ?’ पहला पक्ष इसलिये ठीक नहीं कि वृत्ति स्वयं जड है, वह विषयावभासक नहीं हो सकती। ज्ञान भासक होता है। भान ही ज्ञान है। जडवृत्ति तो स्वकालमें भी भानरूप नहीं बन सकती। दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं; क्योंकि चैतन्यको तो वृत्तिज्ञानका जनक ऊपर कहा गया है। फिर वही जन्य कैसे होगा? तीसरा पक्ष भी संगत नहीं है। वृत्ति एवं चैतन्यसे भिन्न ज्ञानरूप कोई वस्तु प्रसिद्ध नहीं है। उपर्युक्त प्रश्नका समाधान यह है कि वृत्तिप्रतिफलित चैतन्य ही वृत्तिज्ञान है। वही चैतन्य विषयचैतन्यसे अभिन्न होकर प्रत्यक्ष होता है। इसीलिये केवल चैतन्य एवं केवल वृत्तिसे वह वृत्तिज्ञान अन्य ही है। एक ही ज्ञानमें उपाधिभेदसे जन्यजनकभाव हो सकता है अथवा अनुभव ‘स्वेतर सर्वावभासक है’ इसका अर्थ यह है कि स्वेतर सभी विषयोंमें ‘भाति’ (प्रतीत होता है) इत्याकारक प्रतीतिविषयताका जनक है। ‘भाति’ इस प्रतीतिकी विषयता ही सर्वावभास्यता है। चिदाभासरूप फलकी व्याप्ति हुए बिना कोई भी जड वस्तु ‘भाति’ इस प्रतीतिका विषय नहीं हो सकती। एतावता स्वत: सर्वदा सर्वका अवभासन करता हुआ भी वृत्तिप्रतिबिम्बित चैतन्यके द्वारा सभी वस्तुओंमें ‘भाति’ (भासमान है) इस प्रतीतिकी विषयता होती है। कहा जा सकता है कि ‘भाति यह प्रतीति ही तो अनुभव है, इससे अतिरिक्त अनुभव कुछ नहीं है,’ परंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि प्रतीतिसे अतिरिक्त अनुभव है। चक्षुसे घटका साक्षात्कार करके पुरुष निश्चय करता है कि घट है और भासमान है। इस तरह घटसाक्षात्काररूप अनुभवसे भिन्न ही अनुभवजन्य प्रतीति होती है। फिर भी ‘भाति’ इस प्रतीतिसे भिन्न अनुभव क्या है? इस प्रश्नका उत्तर वस्तुत: दुर्वच ही है। यद्यपि कहा जाता है कि ‘निर्विकल्पक अनुभव ही दुर्वच होता है, सविकल्पक अनुभव तो सुवच ही होता है।’ तो भी यह ठीक नहीं; क्योंकि सविकल्पक अनुभवकी भी वही दशा होती है। हाँ, भेद यह है कि निर्विकल्पक अनुभवका विषय दुर्वच है, सविकल्पक अनुभवविषय सुवच होता है। स्वयं अनुभव तो दोनों ही दुर्वच ही होते हैं। विषयभेदके कारण वही अनुभवका सविकल्प-निर्विकल्परूप द्वैविध्य भी होता है। स्वत: तो अनुभव एक ही होता है। वह अनन्यावभास्य होकर स्वेतर सर्वका भासक होता है। यही उसका लक्षण है। यद्यपि यहाँ भी बहुत-से विकल्प उठते हैं, जैसे अनुभवका घटावभासकत्व क्या है? घट इत्याकारक प्रतीतिकी जनकता अथवा घट इस प्रतीतिविषयताकी जनकता अथवा घटाकारानुभवजनकत्व अथवा घटानुभवविषयत्वजनकत्व? अनुभव और प्रतीति यदि एक ही हैं, तो अनुभव अनुभवका जनक कैसे हो सकेगा? क्योंकि अभेदमें कार्यकारणभाव नहीं होता। दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि घट तो सर्वदा विषय ही होता है, अत: उसमें विषयता सदा ही रहती है। फिर उसमें कादाचित्क जन्यता और अनुभवमें जनकता कैसे सम्भव होगी? इस तरह अन्य पक्ष भी असंगत ही हैं। इस सम्बन्धमें अध्यात्मवादियोंका समाधान स्पष्ट है। प्रतीति-शब्दप्रयोगलक्षण व्यवहार है। अनुभव उससे भिन्न उसका जनक है। इस तरह प्रतीति और अनुभवमें भेद होता है। यद्यपि स्वानुभवसमयमें शब्दप्रयोग नहीं होता, परोपदेशसमयमें ही शब्दप्रयोग होता है, तथापि स्वानुभव-समयमें भी सूक्ष्म मानसिक शब्दप्रयोग होता ही है। इस तरह प्रतीतिजनकता अनुभवमें संगत है ही। इसी तरह अनुभूत घट ही ‘घट’ इस व्यवहारका विषय होता है। अत: अनुभव ही घटकी व्यवहारविषयताका जनक है। यदि घटका अनुभव न हो तो घटमें व्यवहारविषयता ही नहीं बन सकती। तीसरे पक्षमें भी कोई बाधा नहीं; क्योंकि केवल अनुभव घटानुभवका जनक हो ही सकता है। जैसे केवल प्रकाश घटप्रकाशका जनक कहा जा सकता है, वैसे ही यहाँ भी व्यवहार हो सकता है। निरुपाधिक अनुभव सोपाधिक अनुभवका जनक है। इस तरह घटरूप उपाधिके द्वारा कार्यकारणभाव होता है। अतएव चौथा पक्ष भी ठीक ही है। भले ही घट सर्वदा ही सामान्यानुभवका विषय हो, तथापि विशेषानुभवविषयता सदा नहीं रहती। किंतु चक्षु एवं घटका संयोग होनेसे ही घट विशेषानुभवका विषय होता है। इस तरह घटानुभवविषयत्वजनकता भी अनुभवकी घटावभासकता हो ही सकती है। फिर प्रश्न होता है कि ‘वह सामान्यानुभव साक्षिचैतन्यरूप है अथवा साक्ष्याकार-वृत्तिज्ञानरूप?’ कहा जा सकता है कि ‘साक्ष्याकार-वृत्ति होनेपर साक्षीका साक्षात्कार समझा जायगा और फिर तो सभीको मुक्त ही होना चाहिये।’ परंतु यह ठीक नहीं है, कारण कि प्रमाणजन्य साक्षात्कारवृत्तिसे साक्षीके आवरक अज्ञानकी निवृत्तिके बिना साक्षात्कार नहीं होता है। इसपर भी विचार चलता है कि ‘साक्षीका साक्षात्कार क्या हो सकता है? क्योंकि अनुभवका अनुभव क्या होगा?’ परंतु इसका भी समाधान यही है कि साक्षीसे भिन्न द्वैतका अनुभव न होना ही साक्षीका साक्षात्कार है। कहा जा सकता है कि ‘इस तरह तो द्वैतानुभवाभाव ही साक्षीका अनुभव हुआ।’ परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि अनुभव नित्य है। फिर वह अभावका प्रतियोगी कैसे बन सकता है? अत: विशेष अनुभवका अभाव ही सामान्यानुभव है। विशेषानुभव तो चक्षुघट-संयोग आदिसे उत्पन्न होता है, अत: उसका अभाव हो सकता है। विशेषानुभवदशामें भी यद्यपि सामान्यानुभव रहता है, तथापि वह असत्-जैसा ही रहता है, किंतु विशेषानुभवाभावदशामें सामान्यानुभव सत्ताप्रकर्षको प्राप्त हो जाता है। इसीलिये विशेषानुभवाभाव सामान्यानुभवरूप साक्षीका साक्षात्कार है। कहा जाता है कि ‘विशेषानुभवाभावदशामें अज्ञानका ही अनुभव होता है, साक्षीका नहीं।’ परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि साक्षीके आवरक अज्ञानका अनुभव ही साक्षीके अनुभवरूपसे व्यवहृत होता है। अज्ञानावच्छिन्न साक्षीका अनुभव ही सामान्यानुभव है। कहा जाता है कि ‘यद्यपि सोपाधिक साक्षीका अनुभव हो सकता है; क्योंकि वह अनुभाव्य होता है, परंतु केवल साक्षीका अनुभव कैसे हो सकेगा? केवल साक्षी ही अनुभव है, यह भी नहीं कहा जा सकता।’ परंतु यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि जबतक अविद्या रहती है, तबतक साक्षी केवल रह ही नहीं सकता। अविद्या उपाधिके द्वारा साक्षीकी सोपाधिकता बनी रहती है। यह भी कहा जाता है कि ‘फिर तो समाधिमें भी अज्ञान रहता है, अत: वहाँ भी साक्षीका स्फुरण कैसे होगा? पर यह भी ठीक नहीं; क्योंकि यदि समाधिमें साक्षी केवल ही है, उपाधिशून्य है, तब तो अवश्य समाधिमें साक्षीका अनुभव नहीं हो सकता; क्योंकि साक्षीका अनुभव करनेके लिये वहाँ कोई प्रमाता ही नहीं होता। किंतु उस समय केवल साक्षी ही रहता है। इसीलिये उस समय ‘मैं साक्षीको देख रहा हूँ’ ऐसी प्रतीति नहीं होती। अत: अज्ञान एवं अज्ञानकार्य जिस किसी विशेषके अनुभवका अभाव ही साक्षीका साक्षात्कार है। कहा जा सकता है कि ‘अभाव साक्षात्काररूप कैसे हो सकता है?’ पर यह ठीक नहीं, क्योंकि अभाव स्वयं अधिकरणरूप ही होता है। अत: विशेषानुभवाभावाधिकरण साक्षी ही साक्षीका साक्षात्कार है।’ विशेषका अध्यास सामान्यमें ही होता है। अध्यासाभाव अधिष्ठानसे अनतिरिक्त अधिष्ठानरूप ही होता है। विशेषानुभवाभावरूप साक्षीका साक्षात्कार उपपन्न हो सकता है अथवा यह भी कहा जा सकता है कि ‘साक्षीका ही परिशेष रहना साक्षीका अनुभव है और सर्वद्वैतकी अप्रतीति होनेपर ही वह होता है।’ यह भी कहा जा सकता है कि ‘साक्षिस्वरूप ही साक्षीका साक्षात्कार है। जैसे राहुका शिर, आत्माका चैतन्य, सूर्यका प्रकाश आदि स्थानोंमें अभेदमें भी भेद-व्यवहार होता है, वैसे ही यहाँ भी समझना चाहिये। इस तरह प्रत्यगभिन्न स्वयंप्रकाश ब्रह्म ही नित्य अनुभव है।’ कुछ लोग कहते हैं कि ‘अनुभवका प्रागभाव अनुभवसे ही गृहीत होता है, अत: अनुभवको नित्य नहीं कहा जा सकता।’ परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि फिर प्रश्न होगा कि ‘जिस किसी वस्तुका जिस किसीसे गृह्यमाण प्रागभाव होता है अथवा अगृह्यमाण भी प्रागभाव होता है?’ दूसरा पक्ष तो सर्वथा असंगत है; क्योंकि इस तरह तो प्रमाणके बिना ही किसी वस्तुका अस्तित्व सिद्ध हो सकेगा। पहला पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि यहाँ विचारणीय यह है कि अनुभवका प्रागभाव अपनेसे ही ग्राह्य है या अन्यसे? पहली बात ठीक नहीं; क्योंकि पुत्रका प्रागभाव पितासे गृह्यमाण होता है, स्वयं पुत्र अपना प्रागभाव ग्रहण नहीं कर सकता। इसी तरह अनुभव स्वयं अपना प्रागभाव ग्रहण नहीं कर सकता। यदि अपने प्रागभाव-ग्रहणके समय अनुभव रहता है, तो उसका प्रागभाव कैसे कहा जा सकता है? यदि स्वयं नहीं है, तो प्रागभावका ग्रहण किस तरह होगा? स्वप्रागभाव अन्यसे गृहीत होना तो ठीक है, परंतु प्रकृतमें तो अनुभवसे भिन्न सब जड ही है। फिर जडसे अनुभव-प्रागभाव किस तरह गृहीत हो सकेगा? ‘अनुभवका प्रागभाव आत्मासे गृहीत होगा’ यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि आत्मा ही तो अनुभव है। कहा जाता है कि ‘अनुभवके प्रागभावको अनुभव ग्रहण नहीं करता, यह आपने कहीं देखा है या नहीं?’ पहला पक्ष ठीक नहीं है; क्योंकि उसी आपके &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-paashcaaty-drshn-1-1-drshnkii/&quot;&gt;दर्शन&lt;/a&gt;से अनुभवका प्रागभाव सिद्ध हो जायगा। अनुभवका अपने प्रागभावको ग्रहण न करना भी अनुभवका प्रागभाव ही है। उसका दर्शन आपको है ही। दूसरा पक्ष भी इसलिये ठीक नहीं है कि यदि आपने यह देखा ही नहीं, तो कैसे कह सकते हैं कि ‘अनुभव अपने प्रागभावको ग्रहण नहीं करता?’ यदि अदृष्ट भी ग्राह्य हो, तब तो शशशृंग भी ग्राह्य हो सकेगा। परंतु इस कथनमें कुछ सार नहीं है; क्योंकि पुत्रका प्रागभाव पुत्र स्वयं ग्रहण नहीं करता। ‘यह मैंने देखा है’ इससे स्वप्रागभाव अपनेसे गृहीत नहीं होता, यह व्याप्तिज्ञान होता है। इसी आधारपर यह कहना संगत है कि ‘अनुभव-प्रागभावको अनुभव नहीं ग्रहण कर सकता।’ कहा जाता है कि ‘भले ही पुत्र-प्रागभावको पुत्र ग्रहण न करे, पर क्या एतावता पुत्र-प्रागभाव सिद्ध नहीं होता? उसी तरह भले ही अनुभव स्वप्रागभाव ग्रहण न करे, तथापि उसके प्रागभावकी असिद्धि नहीं कही जा सकती।’ पर यह भी कहना ठीक नहीं है; क्योंकि दृष्टान्तमें तो पुत्र-प्रागभावको पिता ग्रहण करता है, अत: वहाँ पुत्र-प्रागभाव सिद्ध होता है, परंतु अनुभवप्रागभावको कोई भी नहीं ग्रहण करता, अत: उसकी सिद्धि नहीं हो सकती। कहा जाता है कि ‘पुत्र भी अपने प्रागभावको अनुमानसे जान सकता है, जैसे कि ‘उत्पत्तिके पहले मैं नहीं था; क्योंकि उत्पत्तिके पहले घटका असत्त्व देखा जाता है।’ परंतु यह भी कथन संगत नहीं है; क्योंकि स्वप्रागभाव स्वप्रत्यक्षका विषय नहीं होता, यही उपर्युक्त कथनका आशय है। एतावता स्वानुमानकी विषयता स्वप्रागभावमें हो भी तो कोई आपत्ति नहीं। जो लोग कहते हैं कि ‘फिर तो इसी तरह अनुभव भी अनुमानके द्वारा स्वप्रागभावको जान सकता है,’ परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि अनुभव स्वसत्तासे ही स्वविषयका प्रकाश होता है, यही अनुभववादियोंकी धारणा है। फिर अनुभव यदि अनुमानरूप अन्य व्यापारसे स्वविषयको प्रकाशित करेगा तो सिद्धान्त-विरोध होगा। ऐसा होनेमें अनुभवमें स्वयंप्रकाशता भी नहीं सिद्ध होगी।’ कुछ लोग कहते हैं कि ‘अनुभव अतीत वस्तुको भी प्रकाशित करता है, इसीलिये योगियोंको अतीत वस्तुका भी प्रत्यक्ष होता है। इसी तरह अतीत प्रागभावको भी अनुभव ग्रहण कर सकता है।’ पर यह ठीक नहीं है; क्योंकि हमारा यह कहना नहीं है कि अनुभवमें वर्तमान वस्तु ही विषय होती है, किंतु योगीको या सर्वज्ञ ईश्वरको त्रैकालिक वस्तुओंका प्रत्यक्ष हो सकता है। अनुभवप्रागभाव अनुभवका विषय नहीं होता, यही कहना है। फिर भी शंका होती है कि ‘गुरूपदेशके पहले मुझे इस श्लोकार्थका ज्ञान नहीं था’, इस प्रकारके अनुभवमें अनुभवका प्रागभाव विषय होता ही है। पर यह भी ठीक नहीं; क्योंकि यहाँ श्लोकार्थज्ञानका प्रागभाव श्लोकार्थज्ञानका विषय नहीं है; किंतु यह प्रागभाव अन्य ज्ञानका ही विषय है। इस तरह ज्ञानान्तरके द्वारा ही श्लोकार्थज्ञानका प्रागभाव सिद्ध होता है। एतावता अनुभव-प्रागभाव किसी भी ज्ञानसे सिद्ध नहीं होता। हाँ, वृत्तिज्ञानका तो प्रागभाव एवं प्रध्वंसाभाव चैतन्यसे गृहीत होता है। अत: वृत्तिज्ञानका प्रागभावादि हो सकता है, परंतु चैतन्यका प्रागभाव चैतन्यसे व्याघातदोषके कारण गृहीत नहीं होता। यदि कहा जाय कि ‘एक चैतन्यका प्रागभाव अन्य चैतन्यसे गृहीत हो’, तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि अन्य चैतन्य है ही नहीं। चैतन्य चैतन्य सब एक ही हैं, आकाशवत् उसके भेदमें कोई प्रमाण नहीं है। जैसे पुत्र यह समझता है कि मैं उत्पत्तिके पहले नहीं था, वैसे चैतन्य यह अनुभव नहीं करता कि मैं उत्पत्तिके पहले नहीं था। अत: उसकी उत्पत्ति एवं प्रागभाव कथमपि गृहीत नहीं होते। फिर भी कहा जाता है कि ‘मैं नहीं था’ इस तरह आत्मा अपने प्रागभावका अनुभव करता है और यदि आत्मा अनुभवरूप ही है, तब तो उसका प्रागभाव सिद्ध हो गया। पर यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि देहतादात्म्य (अभेद)-के अध्याससे देह-प्रागभावको ही आत्मप्रागभाव भ्रान्तिवश समझ लिया जाता है। वस्तुत: आत्मप्रागभाव अनुभूत नहीं होता। कहा जाता है कि ‘मैं सर्वदा रहा हूँ’ इस प्रकार भी अनुभव नहीं जानता। परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि अनुभवस्वरूप विद्वान् आत्मा अवश्य अनुभव करता है कि मैं सर्वदा रहा हूँ। फिर भी कहा जाता है कि ‘सृष्टिके पहले जीव आदि नहीं थे, केवल ईश्वर था। ‘भागवत’ का कहना है—‘अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम्’ (२।९।३२) अर्थात् सृष्टिके पहले मैं ही था, अन्य सत्, असत् कुछ भी न था। पर यह कहना भी ठीक नहीं है; क्योंकि सिद्धान्तमें जीव-ईश्वरकी एकता ही है, अत: ईश्वरकी नित्यतासे तदभिन्न जीवकी भी नित्यता सिद्ध हो जाती है। इसीलिये ‘अजो नित्य: शाश्वतोऽयम्’ (कठोप० १।२।१८) इत्यादि श्रुतियोंसे जीवात्माकी नित्यताका प्रतिपादन होता है। इस तरह अनुभव ही प्रत्यक् ब्रह्म है, उसका प्रागभावादि सिद्ध नहीं होता। यह स्वयंप्रकाशत्व, नित्यत्वादि अजन्य नित्यज्ञानका ही है। वृत्तिरूप इन्द्रिय-सन्निकर्षादिजन्य ज्ञानके सम्बन्धमें यह बात नहीं है।’ कुछ लोग कहते हैं कि ‘जैसे पृथ्वी नित्य है, फिर उसके अवस्थाविशेष घटादि अनित्य हैं, वैसे ही ज्ञानद्रव्यके नित्य होनेपर भी उसके अवस्थाविशेष स्मृतित्वादि अनित्य होंगे।’ पर यह कहना भी ठीक नहीं, कारण नित्य वस्तुमें अवस्था नहीं होती। सिद्धान्तत: पृथ्वी आदि भी अनित्य ही हैं। अनित्य क्षीरादि द्रव्यकी ही क्षीरत्व, दधित्वादि अवस्थाएँ होती हैं, नित्य ज्ञानकी कोई अवस्था वास्तविक नहीं होती। अवस्था स्वयं विकार है। विकारी वस्तु अनित्य ही होती है। कहा जाता है कि ‘जैसे &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;ान्ती घटावच्छिन्न चैतन्यको अनित्य मानता है, फिर भी उसे शुद्ध चैतन्य नित्य मान्य है।’ पर यह ठीक नहीं है; क्योंकि वहाँ भी चैतन्य नित्य ही है, किंतु घटकी अनित्यतासे तदवच्छिन्न चैतन्यमें अनित्यताका व्यवहार होता है। यदि उसी तरह ज्ञानकी नित्यता एवं स्मृति, प्रमा आदिकी अनित्यता जडवादीको भी मान्य हो, तब तो ठीक ही है। कुछ लोग कहते हैं कि ‘स्वयंप्रकाशत्व, नित्यत्वका सामानाधिकरण्य नहीं होता। स्वयंप्रकाश भी दीपादि अनित्य होता है। आकाश, कालादि स्वयंप्रकाश न होनेपर भी नित्य होते हैं,’ परंतु यह कथन ठीक नहीं है; क्योंकि जो स्वयंप्रकाश नहीं, वह स्वत:सिद्ध भी नहीं होता। जो स्वत:सिद्ध नहीं है, वह नित्य भी नहीं होता। काल, आकाश आदि भी अनित्य ही हैं। दीपादिकी स्वयंप्रकाशता सापेक्ष ही है। अतएव उसे भी अपने प्रकाशके लिये दीपान्तरकी अपेक्षा न होते हुए भी चक्षु, मन एवं चैतन्यकी अपेक्षा है ही। जो लोग योग्यानुपलब्धिके बलपर ज्ञानप्रागभाव सिद्ध करना चाहते हैं, वे भी भ्रान्त ही हैं; क्योंकि अनुपलब्धि-उपलब्धिका अभाव ही है। उपलब्धि अनुभव ही है। तथा च निष्कर्ष यह निकला कि अनुभवाभावसे ही अनुभवका प्रागभाव सिद्ध होता है। यहाँ विचारणीय है कि दोनों अनुभवों एवं दोनों अभावोंका यदि अभेद है, तब तो आत्माश्रयदोष होगा, अत: उसी अनुभवाभावसे अनुभव-प्रागभाव नहीं गृहीत हो सकता। यदि दोनोंका भेद है, तो प्रश्न होगा कि ‘अनुभवाभाव किससे गृहीत होगा?’ यदि दूसरे अनुभवसे, तब तो अन्योन्याश्रय-दोष होगा। कहा जाता है कि ‘यदि यहाँ घट होता तो उपलब्ध होता, घट नहीं उपलब्ध होता, अत: वह नहीं है। इसी प्रकार इस समय यदि अनुभव होता, तो वह उपलब्ध होता, अनुभव उपलब्ध नहीं होता, अत: अनुभव नहीं है। इस तरह अनुभवाभाव सिद्ध होगा।’ परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि यदि अनुभव उपलभ्य या भास्य हो, तभी इस प्रकार अभावसिद्धि हो सकती है। यदि अनुभव रहता हुआ भी वेद्य नहीं होता, स्वप्रकाश होनेसे अनुभवान्तरका गोचर नहीं होता, तो इस प्रकारकी अनुपलब्धिसे अभाव कैसे सिद्ध हो सकता है? घटका उपलब्धा आत्मा होता है, परंतु अनुभवका कोई भी उपलब्धा नहीं होता। आत्मा तो स्वयं अनुभवरूप ही है। प्रमाता भी अनुभवका ही सोपाधिक रूप है, अत: अनुपलब्धिप्रमाणसे अनुभवाभावका बोध नहीं हो सकता। कुछ लोग यह भी आपत्ति उपस्थित करते हैं कि ‘प्रत्यक्ष ज्ञान स्वसत्ताकालमें विद्यमान ही स्वविषय घटादिका साधक होता है, घटादिकी सर्वदा सत्ताका बोध नहीं कराता। इसीलिये पूर्व एवं उत्तर कालमें घटादिकी सत्ता प्रतीत नहीं होती। प्रत्यक्ष-ज्ञानरूप संवेदन कालपरिच्छिन्नरूपसे प्रतीत होता है। इसीलिये घट भी कालपरिच्छिन्नरूपसे प्रतीत होता है। यदि घटादिविषयक संवेदन स्वयं कालानवच्छिन्न होकर प्रतीत हो; तब तो वेदनाविषय घटादिको भी कालानवच्छिन्नरूपसे ही प्रतीत होना चाहिये और फिर इस तरह घटादि भी नित्य ठहरेगा।’ परंतु यह आपत्ति नि:सार है; क्योंकि यदि घटादि विषयके परिच्छिन्न होनेसे तद्विषयक प्रत्यक्ष-ज्ञान भी परिच्छिन्न कहा जायगा, तब तो यह भी कहना होगा कि ईश्वर एवं आत्मा आदि विषयके नित्य होनेसे तद्विषयक प्रत्यक्ष-ज्ञानकी भी नित्यता होनी चाहिये। यह भी नहीं कहा जा सकता कि ‘जब घटादि प्रत्यक्षस्थलमें प्रत्यक्षकी अनित्यता दृष्ट है, तब तदनुसार ही ईश्वर या आत्मादिस्थलमें भी प्रत्यक्षको अनित्य ही मानना ठीक है।’ परंतु यह भी तो कहा जा सकता है कि ‘ईश्वरात्मस्थलमें ज्ञानकी नित्यता देखकर घटादिस्थलमें भी ज्ञान नित्य ही है।’ फिर शंका होती है कि ‘संवेदनके नित्य होनेसे संवेदनविषय घटादिको भी नित्य होना चाहिये।’ परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि यहाँ भी कहा जा सकता है कि संवेदनके अनित्य होनेसे ब्रह्म आदि भी अनित्य क्यों न हों? अत: स्वविषयके नित्यत्व एवं अनित्यत्वसे प्रत्यक्षका नित्यत्व या अनित्यत्व नहीं कहा जा सकता। घटसंवेदनके क्षणिक या त्रिचतु:क्षणस्थायी होनेपर भी तद्विषय घटादिको महीनों एवं वर्षोंतक स्थिर देखा ही जाता है। अत: घटादिको संवेदनके समकालिक नहीं कहा जा सकता। यदि घट संवेदनके असमकाल हो सकता है, तो संवेदन भी घटके असमकाल हो ही सकता है। फिर तो संवेदनके नित्य होनेपर भी घटादिकी नित्यताका कोई प्रसंग नहीं आता। यह भी विचारणीय है कि ‘संवेदन अपने पूर्वोत्तरकालमें घटाभावका बोधन करता है अथवा घटका पूर्वोत्तरकाल घटाभावका बोधन करता है।’ पहला पक्ष ठीक नहीं है; क्योंकि संवेदनके पूर्वोत्तरकालमें घटका सत्त्व रहता ही है। व्यावहारिक घटकी अज्ञात सत्ता भी मान्य है ही। सामान्यतया कोई भी यह नहीं समझता कि ‘इसी समय मुझे घटज्ञान हुआ, अभी ही घट भी हुआ, पूर्वोत्तरकालमें घट नहीं था।’ अद्वैतीका जो कहना है कि ‘जब घटप्रतीति होती है, तभी घट है। घटप्रतीति नहीं तो घट भी नहीं।’ उसका आशय केवल इतना ही है कि प्रतीतिमें घट अध्यस्त होता है, अत: प्रतीतिसे अतिरिक्त घटकी सत्ता नहीं होती और दृष्टिसृष्टिवादकी व्यवस्था अत्युच्च अधिकारियोंके लिये ही है। इन्द्रियार्थ-सन्निकर्षजन्य घटादिज्ञान क्षणिक त्रिचतु:क्षणस्थायी होता है अथवा स्वविरोधिवृत्त्यन्तरोत्पत्ति-पर्यन्त स्थायी होता है। अत: उसकी अनित्यता वेदान्तीको भी अभीष्ट ही है। जो अजन्य ज्ञान है, वही नित्य है। कुछ लोग कहते हैं कि ‘अजन्य ज्ञान है ही नहीं।’ परंतु उन्हें वृत्तिरूप ज्ञानकी उत्पत्तिसे ही तदुपाधिकज्ञानकी जन्यताकी भ्रान्ति होती है। वृत्तिप्रतिबिम्बित चैतन्यरूप ज्ञान तो अजन्य ही है। उसकी जन्यतामें कोई प्रमाण नहीं है। वृत्ति एवं चैतन्यका विवेचन अतिदुष्कर है। जैसे मिले हुए क्षीर-नीरका विवेचन हंस ही कर सकता है, वैसे ही वृत्ति एवं चैतन्यका विवेचन अन्तर्मुख परमहंस ही कर सकता है। जो कहते हैं कि ‘संविद्की अपेक्षासे ही विषयकी अतीतता एवं अनागतता होती है’, उन्हें यह भी बतलाना चाहिये कि फिर संविद्की अतीतता आदि किसकी अपेक्षासे होगी? यदि संविद्का अतीततानागतत्व स्वापेक्षासे ही मान्य है, तब तो विषयका भी अतीतत्वादि स्वापेक्षासे ही हो सकेगा। फिर संविद्की अपेक्षा क्यों होगी? यदि संविद्की अतीतता, अनागतता विषयकी अपेक्षासे मानी जाय, तब तो अन्योन्याश्रय-दोष अनिवार्य होगा। एक संविद्का अतीतत्वादि अन्य संविद्की अपेक्षा मान्य हो, तब तो उस संविद्की अतीतता आदिमें अन्य संविद्की अपेक्षा होगी, उसको अन्य संविद्की अपेक्षा होगी, इस तरह अनवस्था-प्रसंग होगा। अत: कालकी अपेक्षा ही विषयकी अतीतता आदिका होना उचित है। वर्तमानकालावच्छिन्न घट वर्तमान है, अतीतकालावच्छिन्न घट अतीत होगा। आगामिकालावच्छिन्न घट अनागत कहलाता है। कहा जा सकता है कि ‘काल तो नित्य है, फिर उसमें अतीतत्वादि-व्यवहार कैसे होगा?’ परंतु यह ठीक नहीं है। दिन-मासादिलक्षण कालमें अतीतत्वादि दृष्ट ही है। ‘सविद्की अपेक्षासे कालमें अतीतत्वादि माना जाय’ यह भी ठीक नहीं; क्योंकि वस्तुत: कालकी अपेक्षासे ही संविद‍्में अतीतत्वादिका व्यवहार होता है। ‘इस समय घटज्ञान वर्तमान है, पूर्वक्षणमें घटज्ञान वर्तमान था, उत्तरक्षणमें घटज्ञान होगा’ इस व्यवहारसे संविद‍्में कालावच्छिन्नताकी प्रतीति होती है। यह भी कहा जाता है कि ‘संविद्से ही कालका अतीतत्वादि विदित होता है।’ परंतु इसमें किसीको विवाद ही नहीं है। संविद‍्से कालका वेदन होनेमें कोई आपत्ति नहीं। आपत्ति तो है घटसंविद‍्से कालवेदनमें। संविद्से भिन्न सभी वस्तुएँ संविद‍्के अधीन ही स्थितिवाली हैं। एकमात्र संविद् ही स्वत:सिद्ध है। ‘कालका अतीतत्वादि एवं कालपूर्वक विषयका अतीतत्वादि संविद‍्से ही ज्ञात होता है’ इस कथनसे संविद्का अतीतत्वादि सिद्ध नहीं होता। यह आवश्यक नहीं है कि अतीत संविद्से अतीत विषयका एवं वर्तमान तथा आगामी संविद‍्से वर्तमान तथा आगामी विषयका ग्रहण हो; क्योंकि संविदवच्छेदक कालके अतीतत्वादिसे ही विषयोंका अतीतत्वादि सिद्ध हो जाता है। जैसे एतद्दिनस्थिति सूर्यप्रकाशभास्य घट भी पूर्वदिनस्थित सूर्यप्रकाशसे ही भास्य होता है; क्योंकि कालके भेदसे सूर्यप्रकाशमें भेद नहीं होता। इसी तरह एतद्दिनसंविद्भास्य घटादि भी पूर्वदिनस्थित संविद‍्से ही भास्य होता है। दिनभेदसे संविद‍्में भेद सिद्ध नहीं हो सकता है। अत: घटज्ञान नित्य एवं स्वप्रकाश है। उसका विषयभूत घटादि अनित्य एवं जड है। घटकी अनित्यतासे ही ज्ञानमें अनित्यताका व्यवहार होता है। कुछ लोग कहते हैं कि ‘निर्विषय अनुभव ही नहीं होता; क्योंकि उसकी उपलब्धि नहीं होती।’ परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि यहाँ विचारणीय यह है कि ‘यह निर्विषय संविद्का अनुपलम्भ कहनेवालेको है या अन्यको?’ पहला पक्ष ठीक नहीं; क्योंकि जिसको निर्विषय संविद्का उपलम्भ नहीं है, वह अज्ञानी होनेके कारण ‘नहीं जानता’ यही कहा जा सकता है। दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि दूसरेका हृदय दूसरेको प्रत्यक्ष नहीं होता। ‘दूसरेको भी निर्विषय संविद्का उपलम्भ नहीं होता’ यह कैसे कहा जा सकता है? यदि कहा जाय कि ‘निर्विषय संविद् सम्भव ही नहीं है’, तो इसमें कोई-न-कोई हेतु होना चाहिये। ‘अनुपलभ्यमानत्व हेतु है’ यह भी नहीं कहा जा सकता। यह हेतु तो सविषय ज्ञानमें भी अतिव्याप्त है; क्योंकि सविषय ज्ञान भी तो स्वप्रकाश होनेसे उसमें भी उपलब्धिविषयतारूप उपलभ्यमानता नहीं है। फिर तो अनुपलभ्यमानत्वरूप हेतुसे सविषय ज्ञानका भी अभाव ही सिद्ध हो जायगा। ‘ज्ञानमें ज्ञेयत्व नहीं हो सकता’ यह कहा जा चुका है। ‘निर्विषय ज्ञान नहीं है’ यह कथन निर्विषयज्ञानाभावको जानकर कहा जाता है अथवा बिना उपलम्भके ही? पहला पक्ष ठीक नहीं; क्योंकि अभाव प्रतियोगिपूर्वक ही होता है। जो घट नहीं जानता, उसे घटाभावका भी ज्ञान कैसे हो सकता है? जो निर्विषय-ज्ञान नहीं जानता, वह निर्विषय-ज्ञानाभाव भी कैसे जान सकेगा? दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं; क्योंकि यदि निर्विषय-ज्ञानाभावकी उपलब्धि नहीं है, तब तो निर्विषय-ज्ञानकी सिद्धिमें कोई बाधा है ही नहीं। फिर भी कहा जाता है कि ‘ज्ञायते अनेन घटादिविषयजातमिति ज्ञानम्’ इस व्युत्पत्तिसे ज्ञान विषयप्रकाशनस्वभाववाला ही प्रतीत होता है। विषयप्रकाशक ही ज्ञान है। जो विषयप्रकाशक नहीं, वह ज्ञान कैसे कहा जा सकता है? वह विषयप्रकाशकत्व ही ज्ञानका स्वयम्प्रकाशत्व भी है। यदि ज्ञान निर्विषय होगा, तब तो स्वप्रकाश-ज्ञानत्व ही उसमें नहीं रहेगा। परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि यदि विषयप्रकाशकत्व ज्ञानत्व हो, तब तो घटादिप्रकाशक सूर्यादिप्रकाशको भी ज्ञान नहीं कहना चाहिये; क्योंकि उसीसे घटादिका प्रकाश होता है, अन्धकारस्थ घट भासित नहीं होता है। यदि सूर्यादिप्रकाशसे अतिव्याप्ति हटानेके लिये विषय-ज्ञानजनक ज्ञानको ज्ञान कहा जाय, तो इस वाक्यमें दो ज्ञान शब्द आते हैं। दोनोंका अर्थभेद है या नहीं? यदि भेद है तो क्या भेद है? यदि कहा जाय कि ‘जन्य ज्ञान फल है, जनक ज्ञान उसका कारण है, तो भी विचारणीय यह है कि फलभूत ज्ञान स्वप्रकाश है अथवा परप्रकाश?’ पहला पक्ष ठीक नहीं; क्योंकि जो विषयज्ञानका जनक नहीं, वह तो आपके मतमें स्वप्रकाश हो ही नहीं सकता। दूसरा भी पक्ष ठीक नहीं; क्योंकि फलभूतजन्य ज्ञानका प्रकाशक कोई है ही नहीं। यदि अन्य प्रकाशक ज्ञान माना जाय, तब तो अन्यमें होनेवाला प्रकृत फलज्ञानप्रकाशकत्व फलज्ञान ज्ञानजनकत्व ही होगा। फिर इस तरह अनवस्था प्रसक्त होगी। यदि दोनों ज्ञानशब्दोंका एक ही अर्थ है, तो व्याघातदोष होगा अर्थात् वही ज्ञान अपने-आप ही जन्य और अपने-आप ही जनक कैसे होगा? अत: यदि विषयावबोधजनकत्व ही स्वप्रकाशत्व कहा जायगा, तो विषयावबोधजनक करणभूत बोध ही स्वप्रकाश होगा, फलभूत बोध स्वप्रकाश ही न होगा। यदि करणभूतको ही स्वप्रकाश माना जायगा, तो कर्ता आत्मा भी स्वप्रकाश सिद्ध न हो सकेगा। इसी तरह ब्रह्ममें भी स्वप्रकाशता न रहेगी, अत: ‘अनन्यावभास्यत्वे सति स्वेतरसर्वावभासकत्व’ को ही स्वप्रकाशत्व कहना उचित है। करणज्ञान तो जड होनेसे चैतन्यावभास्य है, अत: वह स्वप्रकाश नहीं कहा जा सकता। यह भी कहा जा सकता है कि ‘अस्तित्वे सत्यनन्यावभास्यत्व’ ही स्वप्रकाशत्व है अर्थात् जो दूसरोंसे प्रकाशित न होकर भी स्वत: सत्तावाला है, वही स्वप्रकाश है। शशशृंगादिकोंकी सत्ता ही नहीं होती, अत: वे अन्यानवभास्य होनेपर भी स्वयंप्रकाश नहीं कहे जाते। व्यावहारिक सत्य अज्ञात जगत् अनन्यावभास्य नहीं होता, वह तो किसी ज्ञानसे भास्य ही होता है, अत: उसमें भी अतिव्याप्ति नहीं होगी। वृत्तिज्ञान भी चैतन्यभास्य है ही। फलज्ञान ही इस प्रकारका स्वप्रकाश है; क्योंकि नित्य चैतन्य ही वृत्तिपर प्रतिफलित होकर फलज्ञान कहा जाता है। विषयावच्छिन्न चैतन्यके आवरक अज्ञानका निराकरण करना वृत्तिका उपयोग है। जैसे अजन्य नित्य मोक्षमें फलत्व-व्यवहार होता है, वैसे ही अजन्य फलज्ञानमें भी फलत्वव्यवहार हो सकता है। अज्ञात-विषयावच्छिन्न चैतन्य ही ज्ञात होकर फल कहलाता है। उसमें जन्यता नहीं है। कहा जा सकता है कि ‘फिर इस तरह तो ज्ञानमें ज्ञातता मान ली गयी।’ परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि विषयावच्छिन्न चैतन्य ही ज्ञात होता है, केवल नहीं। केवल तो अनुभवरूप होनेसे स्वप्रकाश ही है। विषयगत अवभास्यत्वरूप धर्म विषयावच्छिन्न चैतन्यमें आरोपित किया जाता है। कुछ लोग कहते हैं कि ‘भले ही फलभूत चैतन्यमें उपर्युक्त ढंगकी स्वप्रकाशता रहे, परंतु करणभूत ज्ञानमें तो विषय-प्रकाशकत्वरूप ही स्वप्रकाशता उचित है। तथा च निर्विषय वृत्तिज्ञान नहीं हो सकता।’ परंतु इस सम्बन्धमें सिद्धान्तीको कोई विवाद नहीं है। वेदान्ती जो निर्विकल्पज्ञानका समर्थन करता है, उसका अभिप्राय यही है कि निर्विकल्प ब्रह्मविषयक वृत्तिज्ञान ही निर्विकल्प-ज्ञान है। वह भी सविषयज्ञान है ही। अत: वृत्तिरूप ज्ञान निर्विषय न हो, इसमें कोई आपत्ति नहीं है। चैतन्यज्ञान तो निर्विषय होता ही है। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि ‘सोकर जागे हुए प्राणीको ‘इतने समयतक मैंने कुछ भी नहीं जाना’ इस प्रकारका स्मरण होता है। इससे निद्राकालमें अनुभवाभाव सिद्ध होता है।’ पर यह भी ठीक नहीं; क्योंकि यहाँ विचारणीय यह है कि ‘सुषुप्तिमें कुछ न जाननेवालेको ही सुषुप्ति मिटनेपर उक्त स्मरण होता है अथवा कुछ जाननेवालेको निद्राके अनन्तर उक्त स्मरण होता है?’ पहला पक्ष ठीक नहीं; क्योंकि कुछका न जानना यदि मान्य है, तब तो सुषुप्तिमें अनुभवकी सिद्धि होती ही है। दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं; क्योंकि फिर तो उक्त स्मरण ही नहीं सिद्ध होता। यदि कुछ वेदन था ही, तब कुछ नहीं जाननेका स्मरण कैसे संगत होगा? यहाँ कहा जाता है कि ‘न किंचित् जाननेका अर्थ है किसी भी वेदनका अभाव अर्थात् सुषुप्तिमें कोई भी ज्ञान न था।’ परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि यह विचारणीय है कि सुषुप्तिके ज्ञानाभावको आपने जाना या नहीं जाना? यदि जाना, तब तो सुषुप्तिमें ज्ञानाभावका ज्ञान आपको था ही। फिर ज्ञानाभाव कैसे कहा जा सकता है? यदि आपने ज्ञानाभावको नहीं जाना, तो उसको स्वीकार कैसे किया जाय? यदि अविदितका भी अस्तित्व माना जाय, तब तो शशशृंगादिका भी अस्तित्व मानना पड़ेगा। अत: यही कहना ठीक है कि सुषुप्तिमें विशेषानुभव ही अभाव था। चैतन्यरूप सामान्यानुभवका अभाव नहीं कहा जा सकता है। इसी तरह यह भी शंका होती है कि ‘जहाँ भी कहीं संविद्, ज्ञान या अनुभव होता है साश्रय ही होता है, निराश्रयज्ञान कहीं भी नहीं देखा गया। संविद्को आत्माके आश्रित मानना ठीक है; क्योंकि संविद् या ज्ञान एक क्रिया ही है। क्रिया कर्ताके आश्रित होती है, अत: आत्मा कर्ता है, तदाश्रित संविद्का होना ठीक है।’ परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि आत्मा स्वयं निष्क्रिय होनेसे अकर्ता है और संविद् भी वृत्तिसे अभिव्यक्त फल है, क्रिया नहीं। आत्मा ही संविद् है, संविद् ही आत्मा है। इस तरह संविद् ही सबका आश्रय है, वही सर्वाधिष्ठान है, वह किसीके भी आश्रित नहीं है। कहा जा सकता है कि ‘आत्मा तो अनुभविता है, फिर वह अनुभवरूप कैसे होगा?’ परंतु यह ठीक नहीं। जैसे प्रकाशस्वरूप सविता ही प्रकाशक भी कहा जाता है, वैसे ही अनुभवस्वरूप आत्मामें अनुभविताका भी व्यवहार होता है। कुछ लोग कहते हैं, कि ‘ज्ञानस्वरूप आत्माके आश्रित रहनेवाले ज्ञानद्रव्यको ही अनुभव कहते हैं, आत्माको नहीं।’ परंतु यह भी ठीक नहीं। यदि आत्मा ज्ञानस्वरूप है, तब ‘आत्मा ज्ञान नहीं है’ यह कहना असंगत है। यदि आत्माके स्वरूपभूत ज्ञानसे ही सब काम चल जाता है, तो तदाश्रित अलग ज्ञानद्रव्य मानना व्यर्थ है। इसमें गौरव भी है और कोई प्रमाण भी नहीं है। यदि ज्ञानमें भी अन्य ज्ञान होगा, तो फिर उस ज्ञानमें भी ज्ञानान्तर कहना पड़ेगा। इस तरह अनवस्था होगी। यदि आत्मा ज्ञानरूपी द्रव्य है, तो तदाश्रित ज्ञानरूपी अन्य द्रव्य मानना व्यर्थ भी है। अनवस्था, गौरवादि दोषोंसे दुष्ट भी है। यदि आत्माको द्रव्य न माना जाय, तो आत्माको सगुण माननेवालोंका पक्ष बाधित होगा। सुषुप्तिमें भी ‘मैंने कुछ नहीं जाना, सुखपूर्वक सो रहा था’ इत्यादि स्मरणोंके बलसे अज्ञान एवं सुखका अनुभव रहता ही है। अत: सुप्तिमें चैतन्यरूप या वृत्तिरूप ज्ञानका अभाव सिद्ध नहीं हो सकता। चैतन्य एवं अविद्यावृत्तिका अस्तित्व स्मरणबलसे स्पष्ट सिद्ध है। विशेषानुभवाभाव अवश्य मान्य है। कहा जाता है कि ‘सुप्तिमें अन्त:करण नहीं होता, विषय भी नहीं रहता, तब विषयाकारपरिणत अन्त:करणकी वृत्तिरूप ज्ञान कैसे हो सकता है?’ परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि यद्यपि अन्य विषय न भी हो, तो भी सुख एवं अज्ञानरूप विषय होनेसे तदाकारपरिणत अविद्यावृत्ति हो सकती है। कहा जा सकता है कि ‘सुषुप्तिमें फिर तो ज्ञान भी सविशेष ही हो गया। फिर निर्विशेष ज्ञानकी सिद्धि कैसे हो सकती है?’ परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि सुप्तिमें सविशेष ही ज्ञानकी सिद्धि होती है, निर्विशेषकी नहीं। फिर भी कहा जा सकता है कि ‘सुप्ति’, ‘स्वप्न’, ‘जागर’ तथा ‘समाधि’ में भी जब निर्विषय ज्ञान नहीं होता, तब तो ‘सर्वदा सविषय ही ज्ञान होता है’ यही मानना ठीक है। तब तो फिर ‘ज्ञानवान् ही आत्मा है, ज्ञानरूप नहीं’ यही मानना उचित है। पर यह भी ठीक नहीं। व्यवहारत: यद्यपि आत्मा वृत्तिरूप ज्ञानवान् ही है; तथापि परमार्थत: ज्ञानवान् नहीं है; क्योंकि वस्तुत: वृत्तिके भासक आत्माका वृत्तिके साथ आध्यासिक सम्बन्धके अतिरिक्त कोई वास्तविक सम्बन्ध नहीं है। अत: आत्मा चैतन्यज्ञानरूप ही है। प्रश्न होता है कि ‘आत्माका स्फुरण होता है या नहीं? यदि होता है, तब तो स्फुरण होनेवाले आत्माका स्फुरण धर्म हो गया। इस तरह धर्मी आत्माका धर्मभूत ज्ञान सिद्ध होता है। जैसे प्रकाशमान सूर्यका प्रकाश धर्म है, वैसे ही यदि आत्माका स्फुरण न हो, तब तो बन्ध और मुक्तिमें कोई भेद ही न रहेगा। जैसे संसारमें आत्माका स्फुरण नहीं है, वैसे ही मुक्तिमें भी स्फुरण न हो, तो बन्ध-मुक्ति समान ही ठहरेंगे। इसके अतिरिक्त घटके समान ही यदि आत्माका भी स्वत: स्फुरण न होगा, तो घटवत् आत्मामें भी जडताकी ही प्रसक्ति होगी। मुक्तिमें अन्य है नहीं, जिससे कि परप्रकाश्यता भी सम्भव होती। परप्रकाश्यता माननेपर स्वयंज्योतिष्ट्व-श्रुतिका भी विरोध होगा,’ परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि इसी प्रकारका विकल्प आपके धर्मभूत कल्पित ज्ञानमें भी होगा। उसकी स्फूर्ति होती है या नहीं? प्रथम पक्षमें स्फूर्तिवाले धर्मभूत ज्ञानमें स्फुरणरूप धर्म मानना पड़ेगा, तथा च वह धर्मान्तर होगा। इस तरह अनवस्था होगी। द्वितीय पक्षमें घटवत् जडत्वापत्ति होगी। फिर उसे ज्ञान भी कैसे कहा जायगा? कुछ लोग कहते हैं कि ‘धर्मिभूत ज्ञानका स्फुरण नित्य है, वह भासमानता व्यवहारके अनुगुण होता है। धर्मभूत ज्ञानका स्फुरण विषयसम्बन्धजन्य होता है। वह विषयसम्बन्धके समय ही होता है, अन्यत्र नहीं। सुप्तिमें उसकी सर्वविषय-सम्बन्धार्हता वह्निशक्तिके समान प्रतिबद्ध होती है, अत: उस समय स्फुरण नहीं होता।’ परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि वस्तुत: स्फुरमाण वस्तुका स्फुरण ही स्वरूप है। जैसे भासमान सूर्यका भास ही स्वरूप है, प्रकाशातिरिक्त सूर्य नहीं होता। फिर भी ‘सूर्यका प्रकाश’ यह व्यवहार ‘राहुका सिर’ के समान औपचारिक होता है। इसलिये ‘प्रकाश भासित होता है या नहीं’ इस विकल्पके समान ही ‘आत्मा स्फुरित होता है या नहीं’—यह विकल्प भी अयुक्त ही है। आत्मा स्फुरणरूप ही है। ‘स्फुरण स्फुरित होता है या नहीं’—यह विकल्प कोई भी अनुन्मत्त नहीं कर सकता। फिर भी कुछ लोग कहते हैं कि ‘स्फुरण स्फुरमाणका धर्म ही है, स्वरूप नहीं; क्योंकि क्रिया कर्ताका स्वरूप नहीं होती। छेदनक्रिया छेत्ताका स्वरूप नहीं होती।’ परंतु यह पक्ष ठीक नहीं है; क्योंकि कहा जा चुका है कि प्रकाशस्वरूप सूर्यका प्रकाश क्रिया नहीं है, किंतु उसका स्वरूप ही है। जो आत्माको धर्मिज्ञानस्वरूप मानता है, उसके मतमें भी जब ज्ञान क्रिया नहीं है, तब स्फुरण स्फुरमाणका स्वरूप क्यों नहीं? जो लोग ज्ञानसामान्यको मृत्तिकादिकी तरह नित्य द्रव्य मानते हैं, स्मृतित्वादि अवस्थाविशेषरूप ज्ञानोंको घटादिकी तरह अनित्य मानते हैं, उनका यह कहना नितान्त असंगत है कि ‘सुप्तोत्थित पुरुषके इतने समयतक मैंने कुछ नहीं जाना इत्याकारक ज्ञानसामान्याभावबोधक स्मरणसे अनुभवका प्रागभाव सिद्ध होता है;’ क्योंकि यदि ज्ञानसामान्य नित्य है, तो उसका प्रागभाव कैसे सिद्ध हो सकता है? कोई नित्य वस्तु अभावका प्रतियोगी नहीं होती। यदि ज्ञानसामान्य भी न हो, तब तो ‘मैंने कुछ नहीं जाना’ यह स्मरण भी असम्भव ही होगा; क्योंकि यत्किंचित् ज्ञानाभावका ज्ञान होनेपर ही स्मरण हो सकता है। जागरकालमें भी ‘तुम्हारी बात मैं नहीं समझता’ इस प्रकार जो बोलता है, उसे विशेष ज्ञान न रहनेपर भी सामान्य ज्ञान है ही, अन्यथा यदि उच्यमान अर्थज्ञानाभावका ज्ञान न हो, तो वाक्य-प्रयोग भी सम्भव नहीं। अत: सामान्य ज्ञान ही विशेषज्ञानाभावको ग्रहण करता है, सामान्यज्ञानाभावका ग्रहण नहीं हो सकता। कहा जाता है कि ‘यदि अनुभव नित्य है, तो ‘मुझे यह अनुभव हुआ, यह अनुभव नष्ट हो गया’ इत्यादि व्यवहार कैसे सम्पन्न होंगे? परंतु इसका समाधान किया जा चुका है। विषयसम्बन्धके उत्पत्ति-विनाशसे अनुभवमें उत्पत्तिविनाशका व्यवहार उपपन्न होता है। घटोत्पत्तिसे घटाकाशकी उत्पत्तिका जैसा व्यवहार होता है, वैसे ही प्रकृतमें भी समझना चाहिये। घटादि स्वाभाविक जन्मादिविकारवान् हैं, किंतु अनुभूति औपाधिकरूपसे ही जन्मादिविकारवती है तथा जन्मादिविकारहीन स्वप्रकाश नित्य एक संविद् है। कुछ लोग कहते हैं कि ‘संविद् एक नहीं, किंतु अनेक हैं। जैसे अज आत्मा देहादिसे भिन्न है, अनादि भी अविद्या आत्मासे भिन्न है, वैसे अनादि एवं नित्य भी संविद् परस्पर भिन्न हो सकती है। यदि अविद्याका और आत्माका विभाग न होगा, तो अविद्यारूप ही आत्मा ठहरेगा।’ परंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि ‘संविद् अज होनेसे व्यतिरेकेण घटादिके तुल्य अविभक्त है, इस अनुमानसे संविद्की एकता ही सिद्ध होती है। संविद् ही आत्मा है, अत: आत्मासे देहादिका विभक्तत्वदृष्टान्त असंगत है। अविद्या भी प्रपंचरूपसे जायमान होनेसे अज नहीं है। घटादिके समान अन्यसे उसकी उत्पत्ति नहीं होती, इसी दृष्टिसे वह ‘अजा’ कहलाती है। अजा (बकरी)-के रूपकसे भी वह अजा कहलाती है। जैसे लोहित-शुक्ल-कृष्ण रंगवाली, अपने समान ही बहुत-से बच्चोंको उत्पन्न करनेवाली अजाका कोई अज भोग करता हुआ अनुसरण करता है, कोई भुक्तभोगा अजाको छोड़कर उदासीन हो जाता है, तद्वत् कोई जीव प्रकृतिका अनुसरण करता है, कोई उससे भोग-अपवर्गरूप प्रयोजन सम्पन्न करके उसे छोड़ देता है—‘अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वी: प्रजा: सृजमानां सरूपा:। अजो ह्येको जुषमाणोऽनुशेते जहात्येनां भुक्तभोगामजोऽन्य:॥’ (श्वेताश्व० उप० ४।५) जैसे घटादि मृत्तिकासे भिन्न नहीं ठहरते, वैसे ही देहादि प्रपंच भी संविद्‍रूप आत्माका ही विवर्त या कार्य है, अत: वह भी संविद्से भिन्न नहीं है। आत्मशक्ति होनेसे अविद्या भी आत्मासे अभिन्न ही है। जैसे वह्निशक्ति वह्निसे भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मशक्ति आत्मासे भिन्न नहीं है।’ कहा जा सकता है कि ‘यद्यपि कार्य कारणसे अभिन्न है, फिर भी कारण कार्यसे भिन्न होता है। शक्ति शक्तिमान‍्से भिन्न न होनेपर भी शक्तिमान् शक्तिसे भिन्न ही है। उसी तरह यहाँ भी संविद्को देहादिसे विभक्त कहना उचित है।’ परंतु यह भी ठीक नही; क्योंकि देहादि एवं अविद्यादि परमार्थत: यदि असत् हैं, तो फिर संविद‍्में तत्प्रयुक्त भेद कैसे रह सकता है? एतावता ‘आत्मा अविद्यारूप ही ठहरेगा’ यह आपत्ति भी निर्मूल ही है; क्योंकि वस्तुत: अविद्या है ही नहीं। यदि व्यावहारिक भेद कहा जाय, तो यह तो मान्य ही है। यावद‍्व्यहार आत्मा और देहादिका भेद है ही, अत: अज होनेसे संविद् अविभक्त ही है। कहा जाता है कि ‘निर्विकार होनेसे भले ही संविद‍्में स्वगत भेद न हो, परंतु देहादिसे तो संविद‍्में विजातीय भेद ही संविदोंके नानात्वसे सजातीय भेद मानना उचित ही है। अबाधित बोधसिद्ध दृश्यके नानात्वसे दर्शनका भी नानात्व सिद्ध होता ही है। जैसे छेद्यके भेदसे छेदनका भेद सिद्ध होता है, वैसे ही दृश्यके भेदसे दर्शनका भी नानात्व सिद्ध होता है।’ परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि जैसे प्रकाश्य पटादिके भेद होनेपर भी प्रकाशका भेद नहीं होता, वैसे ही दृश्यके नानात्व होनेपर भी दर्शनका नानात्व सिद्ध नहीं हो सकता। घटादि विषयके भेदसे घटादिवृत्तिरूप ज्ञानका भले ही भेद हो, परंतु नित्य संविद् प्रकाशके समान अभिन्न ही है। संविद् न तो छेदनके समान क्रिया है और न तो वह जन्य ही है। वृत्ति अवश्य जन्य एवं क्रिया है। संविद् ही जब आत्मा है, तब आत्माका नानात्व भी इसी तरह खण्डित है। अत: जैसे गगनमें घटादि-उपाधिसे औपाधिक ही भेद होता है, स्वाभाविक नहीं, वैसे ही संविद‍्में घटादि एवं वृत्तिके भेदसे ही औपाधिक भेद प्रतीत होता है, स्वाभाविक भेद नहीं। कहा जाता है कि ‘गगन तो घट-करकादि व्यतिरेकेण सिद्ध है, अत: उसमें औपाधिक भेद ठीक है, परंतु ज्ञान तो ज्ञेय एवं ज्ञाताके बिना कहीं उपलब्ध ही नहीं होता, फिर ज्ञानका औपाधिक भेद कैसे माना जाय? अत: ज्ञानका स्वाभाविक ही भेद मानना ठीक है।’ परंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि सबकी सत्ता अनुभवके अधीन होती है। फिर अनुभवकी सत्ता ज्ञेय एवं ज्ञाताके अधीन कैसे हो सकती है? अनुभवके बिना किसी भी वस्तुकी सत्ता सिद्ध नहीं होती। ज्ञेय तो ज्ञानाधीन है ही। ज्ञाताका तो वास्तविक रूप ज्ञान ही है। यदि अनुभवके बिना भी सत्ता मानी जाय, तब तो शश-शृंगादिकी भी सत्ता माननी पड़ेगी। अन्धकारमें रहता हुआ भी घट अनुभवके बिना असत् ही रहता है। कहा जाता है कि ‘भले ही रज्जु-सर्पादि प्रातीतिक पदार्थकी सत्ता अनुभवाधीन हो; क्योंकि उसकी अज्ञात सत्ता नहीं होती, परंतु घटादिकी सत्ता तो अनुभवाधीन नहीं होती; क्योंकि घटादि तो अनुभवके पहले और पीछे भी रहते ही हैं। प्रत्युत अनुभव ही घटादि विषयके अधीन होता है। घटादि जब होते हैं, तभी चक्षुका उनसे सन्निकर्ष होता है, तभी घटानुभव होता है,’ परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि स्वप्नमें घटादि विषयों एवं इन्द्रियोंके न होनेपर भी घटादि-अनुभव होता है। यदि कहा जाय कि ‘स्वाप्निक ज्ञान तो भ्रम है’, तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि अनधिगत, अबाधित अर्थविषयक ज्ञान ही प्रमा है। संविद‍्ब्रह्मसे भिन्न सभी बाधित है, अत: घटादि-अनुभव भी वस्तुत: भ्रम ही है। यावद‍्व्यवहार बाधित न होना जैसे घटादिका है, वैसे ही स्वाप्निक पदार्थका भी है, स्वप्न भी व्यवहार ही है। यदि कहा जाय कि ‘स्वप्न अस्थिर व्यवहार है’, तो यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि व्यवहारगत स्थिरता या अस्थिरता विषयके बाधितत्व-अबाधितत्वपर ही निर्भर है। बाधितत्व जब स्वप्न-जागर दोनोंमें ही है, तब स्थिरत्व-अस्थिरत्वका भेद कैसे सिद्ध होगा? शतायु पुरुष एवं दशायु पुरुषके भी बाधितत्व-अंशमें समानता ही है। अत: जैसे स्वप्नमें विषयेन्द्रियादि न रहनेपर भी विषय-प्रत्यक्ष होता है, वैसे ही जागरमें भी हो सकता है। निद्रादोषके भावाभावसे ही स्वप्न-जागरमें भेद है। निद्रादोषके हटनेपर स्वप्न हट जाता है। जागरमें पित्रादि-दर्शनजनक अदृष्टके मिटनेसे पित्रादिका दर्शनाभाव होता है। अनुभवसे भिन्न पित्रादि हैं ही नहीं, अत: उनकी मृति आदिका प्रसंग ही नहीं उठता। अतएव मृतके सम्बन्ध नष्ट होनेका व्यवहार होता है। नाशका अदर्शन ही अर्थ है। इस तरह प्रतीति ही विषय है, प्रतीतिसे भिन्न विषय नहीं है, फिर प्रतीतिकी सत्ता विषयाधीन कैसे कही जा सकती है? इसमें अन्वयव्यतिरेक भी है। जब प्रतीति है, तभी विषय है। जब प्रतीति नहीं, तब विषय भी नहीं। जैसे मिट्टी होनेपर ही घट है। मिट्टी नहीं, तो घट भी नहीं। वैसे ही प्रतीतिसे भिन्न विषय नहीं। कुछ लोग कहते हैं कि ‘विषय होनेपर प्रतीति होती है, विषय न रहनेपर प्रतीति नहीं होती, यही न्याय क्यों न माना जाय?’ परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि विषय न रहनेपर भी स्वप्नमें प्रतीति होती ही है। मृत पित्रादि स्वप्नमें हैं नहीं, तब भी प्रतीत होते हैं। जो लोग जन्य ज्ञानकी सत्ता विषयाधीन मानते हैं, वे भी नित्य ईश्वरज्ञान मानते हैं। फिर ईश्वरका नित्य ज्ञान अनित्य विषयोंके अधीन कैसे हो सकता है? नैयायिक तथा विशिष्टाद्वैतवादी नित्यज्ञान मानते हैं। वेदान्तानुसार तो नित्यज्ञानात्मक ब्रह्म ही अविद्यावशात् जन्य ज्ञान होता है और वही विषयसत्ताका हेतु बनता है। नित्य ज्ञान ही आत्मा है, आत्माकी सत्तासे ही अन्य सभी पदार्थ सत्तावान् होते हैं। ‘अहमस्मि’ इस रूपसे आत्माकी सत्ता आत्मासे ही सिद्ध है, परंतु ‘इदमस्ति’ इस रूपसे घटादिकी सिद्धि आत्म-प्रत्ययसे ही होती है। ‘अहं घटोऽस्मि’ इस रूपसे घट अपने आपको नहीं जानता, अत: घटादिकी सत्ता आत्मप्रत्ययके अधीन है। कहा जाता है कि ‘घटोऽस्ति’ इस प्रकारके आत्मप्रत्ययसे पहले भी घट तो है ही, परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि ‘अस्ति’ इस प्रत्ययके अविषय घटमें सत्ता नहीं हो सकती, अन्यथा शशशृंगादिमें भी सत्ता प्रसक्त होगी। कहा जा सकता है कि ‘अहमस्मि’ इस बोधके पहले भी जैसे आत्माकी सत्ता है, वैसे ही घटप्रत्ययके पहले भी घटकी सत्ता होनी चाहिये। परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि ‘अहमस्मि’ इस प्रत्ययका जो प्रत्येता है, वह तो इस प्रत्ययसे भी प्रथम सिद्ध ही है, अत: आत्माकी सत्ता हो सकती है, परंतु ‘अयं घट:’ इस प्रत्ययके पहले घट सिद्ध नहीं है, अत: घटकी सत्ता सिद्ध नहीं हो सकती, अत: अनुभवकी सत्ता विषयाधीन नहीं है। इसी तरह ज्ञाताके अधीन भी अनुभवकी सत्ता नहीं है; क्योंकि सिद्धान्तमें ज्ञाता ही अनुभव है। यदि अनुभवसे भिन्न ज्ञाता प्रमाता माना जायगा, तो उस प्रमाताकी सत्ता भी अनुभवके अधीन माननी पड़ेगी। ज्ञाताका स्वरूप ही अनुभव है, वही अज्ञान, अन्त:करण आदि उपाधिसे साक्षी, प्रमाता आदि नामसे भी व्यवहृत होता है। ‘अनुभूति दृशिरूप होनेसे व्यतिरेकेण घटादिके तुल्य दृश्यधर्मवाली नहीं है’ इस अनुमानसे अनुभूति दृश्य या वेद्य धर्मसे युक्त नहीं है, यह भी सिद्ध होता है। कुछ लोग कहते हैं कि ‘जब अनुभूतिमें नित्यत्व, स्वयम्प्रकाशत्वादि धर्म मान्य हैं, तब उसे दृश्य धर्मरहित कैसे कहा जा सकता है? नित्यत्वादि भी संवेदनमात्र हैं, यह नहीं कहा जा सकता; क्योंकि संवदेनसे इनका स्वरूप भिन्न ही है।’ परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि जो धर्म जिससे दृश्य होता है, वह उसका धर्म नहीं कहा जा सकता। जैसे चक्षुसे दृश्यमान रूप चक्षुका धर्म नहीं है। यद्यपि देवदत्त स्वगत स्थौल्यादि, सुखादि देखता है, तथापि वस्तुत: स्थौल्यादि, सुखादि देह, मन आदिके ही धर्म हैं, आत्माके धर्म नहीं हैं। आत्मा तो देह, मन आदिसे भिन्न ही है, अत: यहाँ प्रश्न होता है कि ‘यदि स्वधर्म स्वसे वेद्य नहीं होते, तो अनुभवधर्म नित्यत्वादि किससे वेद्य होंगे?’ अनुभवसे भिन्न सब जड ही है, उससे वेदन असम्भव है। अनुभव एक ही है, उसमें भेद ही नहीं है, अत: ‘अमुक अनुभवसे अमुक अनुभवका नित्यत्वादि गृहीत होगा’ यह भी नहीं कहा जा सकता। आत्मा भी अनुभवरूप ही है, अत: उससे भी नित्यत्वादिका अनुभव नहीं कहा जा सकता। इस तरह यदि नित्यत्वादि अनुभूतिके धर्म होंगे, तो वेदिता न होनेसे वे अवेद्य ही ठहरेंगे। यदि अवेद्य हैं, तो धर्म ही कैसे होंगे? अत: वस्तुत: अनुभूतिके कोई भी धर्म नहीं होते। जो नित्यत्वादि धर्म अनुभवमें विदित होते हैं, वे अनुभूतिके धर्म नहीं हैं, किंतु माया एवं मायाकार्य मूर्त वस्तुके ही धर्म हैं। मायाके द्वारा ही नित्यत्वादि अनूभूति-धर्मत्वेन कल्पित हैं। कहा जा सकता है कि ‘नित्यत्व, स्वयम्प्रकाशत्वादि यदि अनुभूतिके धर्म नहीं हैं, तब तो अनुभूति नित्य, स्वप्रकाश, एक सिद्ध नहीं होगी। फिर तो वह अनित्य, जड, अनेक ही ठहरेगी।’ परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि अनुभूतिमें जैसे पारमार्थिक नित्यत्वादि नहीं हैं, वैसे ही अनित्यत्वादि भी नहीं हो सकते। अत: अनुभूति निर्धर्मक ही है; क्योंकि यदि परमार्थत: कोई भी भास्य वस्तु होती, तभी वह भासक होती। यदि परमार्थत: कालत्रय होता, तभी कालत्रयाबाध्यत्वरूप नित्यत्व भी होता। इस तरह यदि एकत्वादि संख्या होती, तभी अनुभूतिमें एकत्व भी होता। अत: व्यावहारिक भास्य आदि पदार्थोंको लेकर ही स्वयम्प्रकाशत्वादिका व्यवहार अनुभूतिमें होता है। इसलिये अनुभूतिमें कोई भी दृश्यधर्म नहीं रह सकता। फिर भी कहा जाता है कि ‘यदि दृशिमें दृशित्वधर्म है, तब तो दृशि निर्धर्मक न हुई, उसमें दृशित्वधर्म है ही। यदि दृशिमें दृशित्व नहीं है तो दृशित्वरहित दृशि ही कैसी?’ परंतु यह भी शंका ठीक नहीं है; क्योंकि व्यवहारभूमिमें धर्म और धर्मी दो पदार्थ हैं या नहीं? यदि हैं, तो धर्मको निर्धर्मक मानना ही पड़ेगा; क्योंकि धर्ममें धर्म नहीं माना जाता। यदि धर्ममें भी धर्मान्तर होगा, तब तो वह भी धर्मी ही होगा, धर्म न रहेगा। इस तरह धर्म जैसे धर्मत्वरूप धर्मरहित सिद्ध होता है, वैसे ही दृशि भी दृशित्वधर्मरहित सिद्ध होगी। यदि धर्मधर्मी ये दो पदार्थ मान्य नहीं हैं, तब तो ‘यह धर्म है, यह धर्मी है’ इस प्रकारका व्यवहार ही लुप्त हो जायगा। इसलिये निर्धर्मक दृशिमें कोई भी धर्म नहीं है।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt; और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अनुभववाद</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>विमर्श</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>11.10 अनुभव और आत्मा ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/11-10-anubhv-aur-aatmaa-maarksvaa/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/11-10-anubhv-aur-aatmaa-maarksvaa/</guid><description>11.10 अनुभव और आत्मा ‘वार्तिकसार’ में संवित‍्के सम्बन्धमें महत्त्वपूर्ण बातें कही गयी हैं। संवित‍्का भेद स्वत: नहीं कहा जा सकता। घटसंवित्, पटसंवित् इस रूपसे वेद्यपूर्वक ही संवित‍्का भेद भासित होता…</description><pubDate>Thu, 10 Jul 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;11.10 अनुभव और आत्मा&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;‘वार्तिकसार’ में संवित‍्के सम्बन्धमें महत्त्वपूर्ण बातें कही गयी हैं। संवित‍्का भेद स्वत: नहीं कहा जा सकता। घटसंवित्, पटसंवित् इस रूपसे &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;्यपूर्वक ही संवित‍्का भेद भासित होता है, अत: संवित‍्का यह भेद स्वाभाविक नहीं; किंतु घटादि उपाधिके कारण ही प्रतीत होता है। वह सुतरां भ्रम है। इसी प्रकार सम्यक् ज्ञान, संशय एवं मिथ्याज्ञान इत्यादि भेद भी संवित् के स्वाभाविक नहीं हैं; क्योंकि ये भेद बुद्धिगत हैं। चिद्‍रूप संवित् तो सम्यक्, संशय, मिथ्या आदि सभी ज्ञानोंमें समान है; क्योंकि बाध न होनेसे रज्जु-सर्पका भी स्फुरण मिथ्या नहीं। यदि स्फूर्तिका बाध हो, तब तो रज्जुतत्त्वका भी स्फुरण कैसे हो सकेगा? यदि कहा जाय कि रज्जुस्फूर्ति सर्पस्फूर्तिसे पृथक् है; तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि ऐसी स्थितिमें दो स्फूर्तियोंमें स्फूर्ति शब्दका प्रयोग कैसे होगा? कहा जा सकता है कि स्फूर्तित्व-जातिके अनुगमसे ही दोनोंमें स्फूर्ति शब्दका प्रयोग हो सकेगा, परंतु वेदान्तमतानुसार व्यक्ति-जातिके स्थानमें व्यावृत्त एवं अनुवृत्त शब्दका प्रयोग होता है। तदनुसार यहाँ चित् अनुवृत्त है, बुद्धि व्यावृत्त है। तथा च सर्पबुद्धि, रज्जुबुद्धियोंकी परस्पर व्यावृत्ति होनेपर भी चित् या स्फूर्ति उभयत्र अनुगत है। उसीको कोई जाति कह लेते हैं। गोत्वादिमें भी यही न्याय लागू हो सकता है। सर्वत्र अनुगत ब्रह्म ही गोत्वादि जाति है। व्यावृत्त व्यक्ति मायिक है। इस तरह सम्यक्, संशय, मिथ्या आदि विभिन्न आकारवाली बुद्धि है। इसी तरह प्रमाता-प्रमाणादिका भी भेद है। जैसे घटादिका भेद है, वैसे ही सम्यक्त्वादि और प्रमात्रादिमें भी भेद है, परंतु यह भेद कल्पित है। इन्हीं कल्पित भेदोंसे संवित‍्का भेद भी कल्पित होता है। वस्तुत: प्रत्यक्स्वरूप संवित् स्वत:सिद्ध है और एक है। उसीके आधारपर भावाभाव सब व्यवहार चलता है। बोध, अनुभव, संवित् आदि शब्दोंसे वही परब्रह्म आत्मा कहा जाता है। अनुभवरूप संवित‍्से ही अहंप्रत्ययकी भी सिद्धि होती है। जो लोग अहंप्रत्ययसे आत्मसिद्धि मानते हैं, उनके यहाँ भी अहंप्रत्ययसिद्धिके लिये अनुभवरूप आत्माकी अपेक्षा रहेगी ही, इस तरह अन्योन्याश्रय दोष होगा। जो अहंधीको स्वप्रकाश एवं आत्माको जड कहते हैं, उनका केवल भाषाका ही भेद है। स्वप्रकाशसे ही जडकी सिद्धि होती है। इस सम्बन्धमें उनका तथा वेदान्तीका ऐकमत्य ही है। श्रुतिके अनुसार ब्रह्म जड नहीं है; क्योंकि ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’ यह श्रुति ब्रह्मको ज्ञानरूप कहती है। यह भी विचारणीय है कि यदि संवित् प्रमेय है, तब तो प्रमेयविषयक प्रमा फलरूप संवित् अन्य होनी चाहिये, परंतु दो संवित‍्का उपलम्भ नहीं होता। यदि कहा जाय कि यद्यपि अन्य संवित‍्का उपलम्भ नहीं होता, तथापि व्यवहारलिंगसे उसका अनुमान किया जायगा, तो यह ठीक नहीं; क्योंकि फलरूप संवित् तो स्वप्रकाश होती है, फिर उसके अनुमानकी बात कैसे चल सकती है? कहा जाता है कि जैसे ‘अयं घट:’ इस व्यवसायज्ञानका प्रकाशक ‘घटज्ञानवानहं’ यह अनुव्यवसायज्ञान होता है, वैसे ही आत्मामें भी संवित् एवं तद्विषयक संवित् इस तरह दो संवित् मान्य हैं, परंतु यह कहना असंगत है; क्योंकि यह प्रतीतिसे पराहत है अर्थात् दो संवित‍्की प्रतीति नहीं होती। जैसे घटादिविषयक संवित् होती है, वैसे संविद्विषयक संवित‍्की नहीं होती। कुछ लोग कहते हैं कि ‘आत्मा द्रव्य एक बोधस्वरूप है, अत: आत्मा द्रव्यरूपसे प्रमेय है और बोधरूपसे प्रमाता। इस तरह एकहीमें ग्राह्यता-ग्राहकता दोनों ही बन सकती है,’ परंतु इस मतमें भी आत्मा अहंधीगम्य नहीं हो सकता। यदि द्रव्यांश अहंबुद्धि है, तो अन्योन्याश्रय दोष होगा; क्योंकि जैसे भासमान ही दीप घटादिका प्रकाशक होता है, वैसे ही भासमान ही बुद्धि किसीका साधक हो सकती है। अत: उसके प्रकाशके लिये बोध आवश्यक होगा। तदर्थ आत्माके ज्ञाततारूप लिंगसे अहंबुद्धिका अनुमान करना पड़ेगा। लिंगज्ञानमें ज्ञातताविशिष्ट आत्माका भी ज्ञान हो जायगा। तथा च आत्माके ज्ञानमें अहंबुद्धि होगी एवं अहंबुद्धिसे आत्माका ज्ञान होगा। यदि अहंबुद्धि बोधांश ही है, तो अन्त:करणरूप उपाधिसे बोध ही अहंबुद्धि भी है और उसीसे सर्वव्यवहार उपपन्न हो सकता है, फिर द्रव्यांशका अंगीकार करना व्यर्थ है। फिर भी कहा जाता है कि ‘यदि बोध स्वप्रकाश ही है, तो वेदान्तोंका क्या प्रयोजन रहेगा?’ परंतु इसका समाधान यही है कि उसी बोधका अनुवाद करके उसे ब्रह्मरूप समझाना ही वेदान्तोंका प्रयोजन है। उस अखण्ड स्वप्रकाश बोधसे प्रत्यक्षानुमानागमादि प्रमाण एवं जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, समाधि, मूर्च्छा-अवस्था स्वत: सत्तास्फूर्तिरहित होनेपर भी प्रकाशित होते हैं। इसी तरह निखिल प्रपंच जिस बोधके प्रसादसे सत्ता-स्फूर्तिवाला होकर भासमान होता है, जो स्वयं स्वमहिमस्थ एवं स्वप्रकाशबोध है, वही ब्रह्मात्मा है। जो स्वयं अन्यार्थ नहीं है और सब कुछ जिसके लिये है, वही निरतिशय पर-प्रेमका आस्पद आत्मा एवं आनन्दस्वरूप बोध ही सब कुछ है; अर्थात् सब कुछ उसीमें अध्यस्त है। भावाभावात्मक सभी पदार्थ जिसका आश्रय करते हैं, प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय आदि परस्पर विलक्षण अविद्याकार्यस्वरूप जगत् जिसमें प्रतिभासित होता है, वही सर्वविकारशून्य, सर्वसाक्षी अखण्ड बोध ब्रह्म है। कहा जा सकता है ‘निद्रामें किसी नित्य अनुभवका पता नहीं लगता, फिर उसे अवस्थात्रय-साक्षी कैसे कहा जा सकता है?’ परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि निद्राकालमें भी सुख, निद्रा, विशेषज्ञानाभाव, सुखादिके भासक असंकुचित बोधका अस्तित्व है ही; अतएव श्रुति कहती है ‘न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते’ (बृह० ४।३।२३)। अर्थात् द्रष्टाकी स्वरूपभूता नित्य-दृष्टि कभी भी लुप्त नहीं होती। फिर भी जागरस्वप्नमें प्रकाश्य स्फुट होनेसे प्रकाशकत्व स्फुट है, सुप्तिमें स्थूल दृश्य न होनेसे औपाधिक साक्षिता स्फुट नहीं होती। वस्तुत: साक्ष्यके सम्बन्धसे ही आत्मामें साक्षिताका भी व्यवहार होता है। प्रत्यग्बोधस्वरूप आत्मा तो मन, बुद्धि एवं वाक‍्का भासक होनेसे उनका भी अगोचर ही है। उसीमें कर्तृत्वादि अविद्याकल्पित है। अविद्या भी बोधसे ही प्रकाशित होती है। अविद्या अनादि होनेपर भी ब्रह्माकारवृत्तिसे बाधित हो जाती है। जैसे सौरालोकप्रकाशित तूलराशि सूर्यकान्तपर अग्निरूपसे व्यक्त उसी सौरालोकसे दग्ध हो जाती है, वैसे ही अविद्याभासक भान ही ब्रह्माकार-वृत्तिपर प्रकट होकर अविद्याका दाहक हो जाता है। भले वह बोध देह, बुद्धि, मस्तिष्क आदिमें ही प्रतीत हो, फिर भी वह स्वतन्त्र है, देहादिका धर्म नहीं है। भले गृह, क्षेत्र आदिमें दिव्य रत्नादि मिलें, फिर भी वे गृह-क्षेत्रादिके धर्म नहीं हैं। भले ही काष्ठादिमें अग्नि उपलब्ध हो फिर भी अग्नि स्वतन्त्र है, काष्ठादिका धर्म नहीं है, वैसे ही बोध स्वतन्त्र, नित्य एवं ब्रह्मात्मस्वरूप है, वह देहादिका धर्म नहीं है।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt; और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अनुभववाद</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आत्मा</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>11.9 भारतीय दर्शनमें ज्ञान-सिद्धान्त ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/11-9-bhaartiiy-drshnmen-jnyaan-si/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/11-9-bhaartiiy-drshnmen-jnyaan-si/</guid><description>11.9 भारतीय दर्शनमें ज्ञान-सिद्धान्त ‘काण्टके भी अनुभव और ज्ञान—दोनोंका भेद सिद्ध नहीं हो सकता। भारतीय दर्शनोंके अनुसार अनुभवके ही भ्रम और प्रमा—ये दो भेद होते हैं। उसे ही ज्ञान भी कहते हैं। ‘सर्व…</description><pubDate>Wed, 09 Jul 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;11.9 भारतीय &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-paashcaaty-drshn-1-1-drshnkii/&quot;&gt;दर्शन&lt;/a&gt;में ज्ञान-सिद्धान्त&lt;/h3&gt;
&lt;p&gt;‘काण्टके भी अनुभव और ज्ञान—दोनोंका भेद सिद्ध नहीं हो सकता। भारतीय दर्शनोंके अनुसार अनुभवके ही भ्रम और प्रमा—ये दो भेद होते हैं। उसे ही ज्ञान भी कहते हैं। ‘सर्वव्यवहारहेतुर्गुणो बुद्धिर्ज्ञानम्’ अर्थात् आहार-विहार, शब्द-प्रयोगादि सभी व्यवहारोंका असाधारण कारण गुण ही बुद्धि है, वही ज्ञान भी है। ज्ञानके बिना कोई भी व्यवहार नहीं बन सकता, यह स्पष्ट ही है। शब्द-वाक्यादि प्रयोग भी बिना ज्ञानके नहीं बनता। घटादिका दण्डादि कारण सर्वव्यवहारका कारण नहीं है। कालादि सर्वकारण होते हुए भी असाधारण कारण नहीं है। इसीलिये बुद्धि या ज्ञानका यह लक्षण दण्डादि एवं कालादिमें अतिव्याप्त नहीं है। वह बुद्धि या ज्ञान दो प्रकारका है—एक स्मृति और दूसरा अनुभव। इनमें संस्कारमात्र-जन्य ज्ञान ‘स्मृति’ कही जाती है और स्मृतिभिन्न ज्ञान अनुभव है। अनुभव भी यथार्थ एवं अयथार्थ—इस तरह दो प्रकारका होता है। तद्वान‍्में तत्प्रकारक ज्ञान ‘यथार्थ’ ज्ञान है, जैसे रजतमें रजतज्ञान और अतद्वान‍्में तत्प्रकारक ज्ञान ‘अयथार्थ’ है, जैसे शुक्तिमें रजत-ज्ञान। यथार्थानुभव या प्रमा, प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्दादिभेदसे अनेक मतोंके अनुसार अनेक प्रकारका होता है। यथार्थानुभव या प्रमाके व्यापारवान् असाधारण कारणोंको ‘प्रमाण’ कहा जाता है। अयथार्थानुभव भी संशय, विपर्यय एवं तर्कभेदसे तीन प्रकारका होता है—एक धर्मीमें विरुद्ध नानाधर्म-वैशिष्टॺबोधक ज्ञान ‘संशय’ है, जैसे कि ‘स्थाणुर्वा पुरुषो वा’ अर्थात् वह स्थाणु है या पुरुष। मिथ्याज्ञान ‘विपर्यय’ है, जैसे कि शुक्तिमें रजत-ज्ञान। व्याप्यके आरोपसे व्यापकका आरोप तर्क है, जैसे कि यदि वह्नि न होगा तो धूम भी नहीं होगा। यहाँ वह्निके अभावरूप व्याप्यके आरोपसे धूमाभावरूप व्यापकका आरोप किया जाता है। स्मृति भी प्रमाजन्य यथार्थ और अप्रमाजन्य अयथार्थ होती है। सांख्यमतानुसार प्रकृतिका परिणाम बुद्धि स्वतन्त्र पदार्थ है। महत्तत्त्व या बुद्धि अव्यक्ततत्त्वसे उत्पन्न होती है। महत्तत्त्व अर्थात् बुद्धिसे अहंकारकी उत्पत्ति होती है, बुद्धिद्वारा अध्यवसित निश्चित विषयमें ‘मैं अधिकृत हूँ’ इस प्रकारका अभिमान करनेवाला अहंकार है। उसी तरह अहंकारसे मन उत्पन्न होता है। इन्द्रियके द्वारा सम्बुद्धाकार पदार्थका संकल्प-विकल्प करना मनका काम है। पहले आलोचनात्मक ज्ञान होता है, उसके बाद सविकल्प ज्ञान होता है। इन्द्रियोंके द्वारा मनोव्यापारके पहले प्रतिपत्ताको प्रथम अविकल्पित वस्तुमात्रका ही ग्रहण होता है। उस समय सामान्य-विशेषरूपसे अनाकलित और अविविक्त विषयका ही ग्रहण होता है। प्रतिपत्ता मनके व्यापारसे फिर सामान्य-विशेषरूपसे वस्तुकी विकल्पना करता है। यह सांख्यों तथा भट्टपाद कुमारिल आदिकोंको सम्मत है। ‘प्रथमं सविकल्पकप्रत्ययात् पुरा यद्वस्तुमात्रगोचरं बालमूकादिविज्ञानसमानं निर्विकल्पकज्ञानमस्ति, तत्प्रतीतिसिद्धमालोचनात्मकं ज्ञानमभ्युपेयम्, तदभावे सविकल्पकज्ञानानुपपत्ते:।’ निर्विकल्प ज्ञानके उपरान्त बुद्धिके द्वारा नीलत्व घटत्वादिरूपसे विविक्त होकर जो गृहीत होता है, वही सविकल्पक ज्ञान है। एतावता केवल इन्द्रियसे उत्पन्न ज्ञान निर्विकल्पक एवं इन्द्रियसहकृत मनसे उत्पन्न ज्ञान सविकल्पकज्ञान है। प्रभाकरके मतानुसार ‘स्वप्रकाशज्ञान विषयरूपसे घटादिका प्रकाश करता है और आश्रयत्वेन आत्माका प्रकाशक होता है। अत: ‘अहं जानामि’ इस अंशमें अहं रूपसे आत्मा ही भासमान होता है। ‘अहं’ यह अनात्मा नहीं है। कहा जाता है कि ‘जैसे ‘अयो दहति’ (लोहपिण्ड दहन करता है) यहाँ वस्तुत: लौहपिण्डमें जैसे स्वत: दाहकत्व नहीं होता, वैसे ही ‘अहं’ में भी स्वत: ज्ञातृत्व नहीं हो सकता।’ परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि शीतल लौहपिण्ड और दीप-ज्वालात्मक दग्धा—दोनों जिस प्रकार विविक्तरूपसे उपलब्ध होते हैं, उस प्रकार अहंकार और ज्ञाताका कहीं भी विवेकेन उपलम्भ नहीं हो सकता। इसलिये आत्मा अहंकारास्पद है। वही संवित‍्का आश्रय होनेसे अपरोक्ष है। सांख्यवादी जड अन्त:करणमें चित् प्रतिबिम्बको देखकर उसके कारणभूत तादृशबिम्बकी कल्पना वैसे ही करते हैं, जैसे दर्पणस्थ प्रतिबिम्बके आधारपर मुखका अनुमान किया जाता है, परंतु इन पक्षोंमें यदि आत्मा नित्यानुमेय है तो अपरोक्षावभास विरुद्ध है। नैयायिक आत्माको मानस प्रत्यक्षका विषय मानते हैं। मनका अन्वय-व्यतिरेक विषयानुभवसे ही गतार्थ हो जाता है। वस्तुत: विषयानुभवके आश्रयरूपसे जब आत्माकी सिद्धि हो सकती है, तब पृथक् आत्म-विषयक ज्ञान मानना व्यर्थ ही है।’ भट्टपादके मतानुसार आत्मा प्रत्यक्ष होनेसे घटवत् ज्ञानका विषय है। एकहीमें कर्म-कर्तृविरोध होता है, परंतु यहाँ तो द्रव्यांशमें प्रमेयता और बोधांशमें प्रमातृता है। उसमें भी प्रमेय-अंशमें प्रधानता और प्रमाता-अंशमें अप्रधानता रहती है। प्रभाकर इस पक्षका भी विरोध करते हैं। उनके मतानुसार अचेतन द्रव्यांशको आत्मा नहीं कहा जा सकता। यदि बोधांशको ही कर्म कहा जाय तो कर्म-कर्तृविरोध होगा। बोध समकालमें ही प्रमेयरूपसे और प्रमातारूपसे परिणत हो नहीं सकता; क्योंकि वह नित्य है। यदि प्रधान आदिके समान वह परिणत हो, तो भी प्रमातृभागके स्वप्रकाश होनेसे संवित‍्के आश्रयरूपसे वह प्रतीत न हो सकेगा। ऐसी स्थितिमें अपसिद्धान्त भी होगा। विषयरूपसे प्रतीत होनेपर घटादिके समान प्रमातामें भी अनात्मताकी प्रसक्ति होगी। इसलिये संवित् आश्रयरूपसे ही आत्माका एवं संवित‍्के विषयरूपसे घटादिका प्रत्यक्ष मानना चाहिये। प्रमिति स्वसत्तामें कभी भी अ&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;्य होकर नहीं रहती। उपर्युक्त प्रकारसे प्रभाकरका ज्ञान या संवित् स्वप्रकाश है। भट्टपादके अनुसार विषय प्राकटॺरूप ही बोध उत्पन्न होता है। बौद्धोंका क्षणिक विज्ञान स्वतन्त्र है। उनमें सौत्रान्तिक ज्ञानमें विषयप्रतिबिम्ब देखकर उसके आधारपर और प्रतिबिम्ब बिम्बपूर्वक होता है, इस आधारपर ज्ञाननिष्ठ विषय प्रतिबिम्बके बलपर बिम्बरूप सत्य-विषयका अनुमान करते हैं। विज्ञानवादी ‘विज्ञानरूप ही विषय है’, यह मानकर विषयोंकी अपरोक्षता मानते हैं। नैयायिकलोग मन:संयुक्त आत्मामें प्रमितिरूप ज्ञानकी उत्पत्ति कहते हैं। वे ज्ञानविषयक ज्ञान मानते हैं। ‘अयं घट:’ यह ज्ञान व्यवसायात्मक होता है और ‘ज्ञातो मया घट:’ अथवा ‘घटमहं जानामि’ इस आकारका ज्ञान अनुव्यवसायात्मक कहा जाता है। उत्तरोत्तर ज्ञानोंसे पूर्व-पूर्व ज्ञानोंका प्रामाण्य भी कहा जाता है, परंतु इस स्थितिमें पूर्व-पूर्व ज्ञानोंका अज्ञान भी मानना पड़ेगा, तभी अज्ञान-निवर्तकरूपसे उत्तरोत्तर ज्ञानोंकी सार्थकता हो सकती है। कोई भी प्रतीति स्वसत्ताकालमें प्रकाशहीन नहीं होती, अतएव घटादिके तुल्य उसे अवेद्य नहीं कहा जा सकता। कुछ लोगोंका कहना है कि ‘जैसे घटादिरूप वेद्य होता है, वैसे ही प्रमाणरूप आत्मव्यापारसे जायमान घटादिनिष्ठ प्राकटॺ भी वेद्य हो सकता है।’ यहाँ भी प्रश्न होता है कि ‘वह आत्मव्यापार क्या है, परिस्पन्द या परिणाम?’ प्रथम पक्ष इसलिये माना नहीं कि सर्वगत आत्मामें परिस्पन्द नहीं हो सकता। दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि मृत्तिकाका परिणामभूत घट जैसे मृत्तिकामें ही रहता है, वैसे ही आत्म-परिणामभूत ज्ञान आत्मामें ही रहना चाहिये, उसकी विषयनिष्ठता नहीं हो सकती। कहा जाता है कि ‘बालोंके पकने (श्वेत होने)-रूप परिणामसे जैसे शरीरमें वार्धक्य होता है, वैसे ही आत्मपरिणामसे विषयमें ज्ञानका प्राकटॺ होता है।’ इसपर भी विचारणीय यह है कि ‘प्राकटॺका जो आश्रय है, वह चेतन है या प्राकटॺका जो जनक है, वह चेतन है अथवा प्राकटॺजनक ज्ञानाख्य व्यापारका आधार ही चेतन है?’ यदि पहला पक्ष ठीक है, तब तो घटादि विषयको चेतन होना चाहिये; क्योंकि विषय ही प्राकटॺका आश्रय है। दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि चक्षुरादि भी प्राकटॺके जनक हैं; अत: वे ही चेतन कहे जायँगे। तीसरा पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि ‘भोजनक्रियाजन्य तृप्ति-फल-सम्बन्धी देवदत्तके समान आत्मा ज्ञानक्रियाजन्य-फल-सम्बन्धी होनेसे ज्ञानक्रियावान् है’, इत्यादि अनुमानके आधारपर आत्माकी ज्ञानाधारताका अनुमान करना पड़ेगा, परंतु आत्मामें फल-सम्बन्धका अभाव होनेसे हेतु असिद्ध है; क्योंकि प्राकटॺरूप फल विषयमें ही रहता है, आत्मामें नहीं। अतएव तार्किकों और भाट्टोंका मत ग्रहण न करके प्रमातृव्यापारप्रमाण एवं प्रमाणफल-प्रमितिको स्वप्रकाश ही मानना उचित है। बौद्ध संवेदन (अनुभव)-को ही प्रमाण और उसे ही प्रमाणफल मानते हैं, परंतु इस पक्षमें वही प्रमाण और वही प्रमाणफल होनेसे कर्म-कर्तृ-विरोध स्पष्ट ही है। कहा जाता है कि ‘यद्यपि प्रमाता आत्माका कोई व्यापार नहीं है, तथापि आत्मा, मन, चक्षु एवं विषयोंका संनिकर्ष ही प्रमाणरूप होकर प्रमातृव्यापाररूपसे उपचरित होता है। प्रमाणफल तो अव्यभिचरितरूपसे प्रमिति ही है। हान, उपादान, उपेक्षा व्यभिचरित होनेवाले हैं, अत: उन्हें प्रमाणफल नहीं कहा जा सकता।’ इस तरह प्रभाकरका मत है कि ‘स्वप्रकाश विषयसंवेदनके आश्रयरूप प्रदीपाश्रय-वर्त्तिकाके तुल्य प्रकाशमान अहंकार आत्मा है, दृग्दृश्यका अन्योन्याध्यासरूप अहंकार नहीं।’ परंतु वेदान्ती आत्माको अनुभवरूप ही मानते हैं। यहाँ विचारणीय यह है कि ‘क्या आत्मा ही चित्प्रकाश है अथवा आत्मा और अनुभव—दोनों ही चित्प्रकाश हैं अथवा केवल अनुभव ही चित्प्रकाश है और आत्मा जड ही है?’ यदि आत्मा ही चित्प्रकाश है, तो ‘क्या अनुभव चक्षुरादिके तुल्य स्वयं अप्रकाशित रहकर ही विश्वको प्रकाशित करेगा या आलोकादिके तुल्य सजातीय प्रकाशान्तर-निरपेक्ष प्रकाशमान होकर विषयका प्रकाशक होगा?’ पहला पक्ष ठीक नहीं है; क्योंकि चक्षु तो स्वातिरिक्त अनुभवका जनक होता है। इस तरह अनुभव स्वातिरिक्त अनुभवका जनक नहीं है। दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि अनुभव स्वजातीय अनुभवान्तरकी अपेक्षा न करके ही प्रकाशमान होता है। इस तरह स्फुरण लक्षणयुक्त होनेसे अनुभव ही चित्प्रकाश सिद्ध हो जाता है। यद्यपि अनुभव, चक्षु तथा आलोक—तीनों ही घटादिके व्यंजक हैं, तथापि अनुभव विषयाज्ञानका विरोधी होनेसे चित्प्रकाशरूप है। आलोक विषयगत तमका विरोधी होनेसे जड प्रकाशस्वरूप है और चक्षु अपरोक्ष अनुभवका साक्षात् साधन होनेसे अज्ञात कारण है। इसपर भी कहा जाता है कि ‘आलोकके तुल्य अनुभव सजातीय प्रकाशानपेक्ष है।’ परंतु यह कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि आलोक भी अपने प्रकाशके लिये सजातीय चक्षुकी अपेक्षा रखता ही है, कारण आलोक स्वत: तमसे रहित है, अत: चक्षुका तमके निवारणमें उपयोग नहीं है। हाँ, चक्षुर्जन्य अनुभवके द्वारा आलोकका प्रकाश होता है, परंतु वह आलोकका विजातीय ही है, अत: आलोककी तरह सजातीयानपेक्ष अनुभवका चित्प्रकाशरूप होना ठीक है। यदि इस प्रकाशको जड माना जाय, तो जगत‍्में अन्धता-प्रसक्ति हो जायगी। प्रमातृ-चैतन्य ही जडानुभवबलसे सबका अवभासन करता है। यदि आत्म-चैतन्यका विषयके साथ सम्बन्धमात्रके लिये जडानुभवका उपयोग है, तब तो यह वेदान्तका ही मत है। वृत्तिरूप अनुभव सम्बन्धार्थ या आवरणाभिभवार्थ ही होता है। कुछ लोग आत्म-चैतन्यसे पृथक् ही विषयकी अभिव्यक्तिके लिये जडानुभवजन्य अनुभवान्तर मानते हैं; परंतु वह अनुभव भी यदि जड है तो उसे भी अन्य अनुभव अपेक्षित होगा। इस तरह अनवस्था होगी। ‘आत्मा और अनुभव दोनों ही चित्प्रकाश हैं’ यह पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि इस तरह आत्मा और अनुभव दोनों ही अन्योन्य-निरपेक्ष सिद्ध होंगे, फिर उनका सम्बन्ध किसके द्वारा विदित होगा? दोनोंके ही अन्योन्यवार्तानभिज्ञ होनेके कारण दोनोंमेंसे कोई भी सम्बन्धग्राही नहीं हो सकता। कहा जा सकता है कि ‘जैसे पुरुषान्तरका ज्ञान चिद्‍रूप होनेपर भी दूसरेको विदित नहीं होता, वैसे ही चिद्‍रूप होनेपर भी आत्मा स्वयं प्रकाशित नहीं होगा। इसलिये अनुभवाधीन ही आत्माकी सिद्धि होती है।’ परंतु यह कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि तब तो यही आपत्ति अनुभवके सम्बन्धमें भी हो सकती है। यदि कहा जाय कि ‘पुरुषान्तर संवेदनव्यवहित होता है, किंतु अपना अनुभव अव्यवहित है, अत: स्वप्रकाश है,’ तो आत्माके सम्बन्धमें भी यही कहा जा सकता है। आत्मा चिद्‍रूप एवं अव्यवहित होनेसे अपने अनुभवके समान स्वयं ही प्रकाशित होता है। ‘अनुभव ही चित्प्रकाश है’ यह तीसरा पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि ‘आत्मा ही चित्प्रकाश है’ यह पक्ष मानना अनिवार्य है। कारण, आत्मा और अनुभवका अभेद ही है। ‘यह अनुभव आत्माका गुण है’ ऐसा तार्किक और प्राभाकर मानते हैं। ‘आत्मस्वरूप होनेसे द्रव्य ही अनुभव है’ यह सांख्यमत है। ‘ज्ञान-परिणाम क्रियाका फल है तथा च क्रिया और फलमें अभेदकी विवक्षासे कर्म ही ज्ञान है’ यह भाट्टमत है, परंतु ज्ञानको कर्मरूप माननेसे गमनादि क्रियाके तुल्य ही उसमें प्रकाशरूपता और फलता नहीं बन सकती। द्रव्य होनेपर भी अनुभव यदि अणुपरिणाम हो, तब तो खद्योतके समान परिमित वस्तुके एक देशका ही प्रकाशक होगा, सम्पूर्ण वस्तुका प्रकाशक ज्ञान नहीं होगा। यदि अनुभव महत्परिमाण द्रव्य माना जाय, तब तो अनुभवस्वरूप आत्माका सर्वत्र अवभास होना चाहिये। यदि आत्मा महत्परिमाण अनुभवका आश्रय हो तो भी वही प्रसंग रहेगा। यदि अनुभवको मध्यम परिमाण माना जाय तो उसे सावयव कहना पड़ेगा और फिर अनुभव अवयवोंके परतन्त्र होगा, आत्माधीन रहेगा। यदि कहा जाय कि ‘जैसे भूतलपरिणाम घट भूतलाधीन होता है, वैसे ही आत्मपरिणाम अनुभव आत्मपराधीन होगा,’ तब भी प्रदीप एवं प्रकाशके समान आत्मा और अनुभवका अभेद ही कहना पड़ेगा। जैसे प्रदीपसे घटादि प्रकाशित होते हैं, वैसे ही ‘घटो मयावगत:’ (मैंने घट जाना) इत्यादि व्यवहार होता है। यदि आत्मा और चैतन्य या ज्ञानका भेद होगा, तब तो ‘काष्ठेन प्रकाशित:’ (काष्ठके द्वारा प्रकाशित होता है)-के समान ‘मयावगतम्’ यह प्रयोग भी औपचारिक ही समझा जायगा। ‘ज्ञान गुण है’ इस पक्षमें जैसे प्रदीपमें रहनेवाले भास्वररूपकी उत्पत्ति आश्रयकी उत्पत्तिसे भिन्न नहीं होती, वैसे ही अनुभवकी भी उत्पत्ति उसके आश्रयकी उत्पत्तिसे भिन्न नहीं होगी। ऐसी स्थितिमें आत्मा नित्य है, उसमें अनुभवका व्यभिचार कभी नहीं होता, अत: अनुभव और आत्मा दोनोंमें भेद नहीं है, किंतु अनुभवस्वरूप ही आत्मा है। यदि आत्माकी सिद्धि अनुभवके अधीन हो, तब तो घटादिके समान ही आत्मा भी अनात्मा ही ठहरेगा। कहा जा सकता है कि ‘नील-पीतादि अनुभव अनेक हैं, वे आत्म-स्वरूप कैसे हो सकते हैं?’ परंतु अनुभवोंमें स्वरूपत: कोई भी भेद नहीं है। जैसे एक अनन्त आकाशमें घटादि उपाधिके भेदसे भेद प्रतीत होता है, वैसे ही नील-पीतादि विषय एवं तदाकार बुद्धिवृत्ति आदि उपाधिसे आकाशवत् अनन्त अखण्ड एक अनुभवमें औपाधिक भेद प्रतिभासित होते हैं। अनुभवके भेदमें कोई प्रमाण नहीं है। अनुभवका जन्म और विनाश भी अप्रामाणिक है, अत: ‘घटमें पाकके अनन्तर रक्तरूप उत्पन्न होनेपर रक्तानुभव उत्पन्न होता है। रक्तानुभवके पहले श्यामरूपका अनुभव था, अब वह नहीं है,’ इत्यादि कथन ठीक नहीं हैं; क्योंकि भेदसिद्धि होनेपर जन्म-विनाश सिद्ध होगा और जन्म-विनाश सिद्ध होनेपर भेदसिद्धि होगी। इस तरह अन्योन्याश्रय दोषकी प्रसक्ति होती है। कुछ लोगोंका कहना है कि ‘चक्षुरादि साधनोंकी अर्थवत्ताके लिये उत्तर संवित‍्का जन्म मानना आवश्यक है और एक कालमें दो संवित् नहीं रह सकतीं, अत: पूर्व संवित‍्का विनाश भी मानना चाहिये।’ परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि एक ही संवित्के भिन्न-भिन्न विषयोंके साथ होनेवाले सम्बन्धोंके ही उत्पत्ति-विनाशसे साधनोंकी सार्थकता एवं यौगपद्य (एककालिकता)-की निवृत्ति बन जायगी। बौद्धोंका कहना है कि ‘संविदोंमें भेद रहता हुआ भी सादृश्यके कारण प्रतीत नहीं होता। नील-पीतादि विषयरूप उपाधिके संसर्गसे ही वह भेद प्रतीत होता है,’ परंतु यह कथन भी ठीक नहीं; क्योंकि ज्वालाएँ अन्यवेद्य हैं, उनमें भेदकी अप्रतीति हो सकती है, परंतु स्वप्रकाश संवित‍्में होनेवाले भेदकी अप्रतीति नहीं बन सकती। कहा जा सकता है कि ‘जैसे वेदान्तियोंका स्वप्रकाश भी ब्रह्म अज्ञात रह सकता है, वैसे ही संवित‍्का भेद भी अप्रतीत रह सकता,’ परंतु यह भी ठीक नहीं है। ब्रह्ममें अविद्याका आवरण प्रमाणसिद्ध है, अत: एक ही संवित् अनादि है; क्योंकि उसका प्रागभाव नहीं है। सुरेश्वराचार्यका कहना है कि प्रत्येक कार्य प्रागभावपूर्वक ही होता है। उस प्रागभावकी भी सिद्धि संवित‍्से ही होती है, अत: संवित‍्का प्रागभाव नहीं है। यदि संवित् न हो तो प्रागभाव ही सिद्ध नहीं हो सकता और जब संवित् है ही, तब उसका प्रागभाव कैसे कहा जा सकता है? ‘कार्यं सर्वैर्यतो दृष्टं प्रागभावपुरस्सरम्। तस्यापि संवित्साक्षित्वात् प्रागभावो न संविद:॥’ इस तरह स्वप्रकाशानुभव नित्य है, वही आत्मा भी है। आत्मा ही विषयोपाधिक होकर अनुभव कहलाता है। विषयोपाधिकी विवक्षा न होनेसे वही अनुभव आत्मा कहलाता है। जैसे वृक्ष ही समूहरूप उपाधिके कारण वन कहलाते हैं और उपाधि-विवक्षा न होनेसे वे ही वृक्ष कहलाते हैं। अत: प्रभाकरका यह कहना ठीक नहीं है कि ‘अनुभवके आश्रयरूपसे आत्माका प्रकाश होता है।’ कहा जाता है कि ‘घटमहं पश्यामि’ यहाँ अहंकार ही घटका द्रष्टा है, वही आत्मा है, परंतु यह ठीक नहीं है। यदि ‘अहं’ ही आत्मा है, तब तो सुषुप्तिमें भी उसका स्फुरण होना चाहिये, परंतु सुषुप्तिमें अहंकी प्रतीति नहीं होती, अत: अहंकार आत्मा नहीं है। कुछ लोग कहते हैं कि ‘सुषुप्तिमें विषयानुभव नहीं होता, अत: अहंकारकी भी प्रतीति नहीं होती।’ यह कहना भी ठीक नहीं है। यहाँ यह विचारणीय है कि ‘क्या सुषुप्तिमें अनुभव ही नहीं है अथवा विषयसम्बन्धका ही अभाव है?’ पहला पक्ष ठीक नहीं है; क्योंकि अनुभव नित्य है, अत: उसका अभाव नहीं कहा जा सकता। दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि विषय-सम्बन्ध आत्मप्रतीतिका कारण नहीं है। कहा जाता है कि ‘आत्माका द्रष्टृत्वरूप आकार ही अहंकार है, द्रष्टृत्वकी प्रतीतिमें विषय-सम्बन्ध आवश्यक है,’ परंतु यह कहना भी ठीक नहीं है। यहाँ विचारणीय यह है कि ‘द्रष्टृत्व क्या है? क्या दृश्यका अवभासकत्व ही द्रष्टृत्व है अथवा दृश्यभिन्नता द्रष्टृता है, किंवा चिन्मात्र ही द्रष्टृत्व है? पहले और दूसरे पक्षमें दृश्यके ही द्वारा द्रष्टाका निरूपण होता है। दृश्यके आगन्तुक होनेसे द्रष्टा भी आगन्तुक ही होगा। तब वह आत्मा कैसे होगा? अत: अहंकार आत्मा नहीं हो सकता। तीसरे पक्षमें तो दृश्यकी अपेक्षा ही नहीं रहती, अत: सुषुप्तिमें विषय न रहनेपर भी अहंकारका उपलम्भ होना चाहिये। ‘सुषुप्तिमें अहंकी प्रतीति होती है’ यह नहीं कहा जा सकता; क्योंकि जैसे पूर्व दिनके अहंका स्मरण होता है, वैसे ही सुषुप्तिके भी अहंका उल्लेख होना चाहिये। यद्यपि जिसका अनुभव होता है, उसका स्मरण होना अनिवार्य नहीं है। फिर भी जब आत्माका स्मरण होता ही है, तब चिद्‍रूप अहंकारका स्मरण होना ही चाहिये। कहा जा सकता है कि ‘सुषुप्तिके अहंकारका भासक नित्य चैतन्यरूप अनुभव है। उसका विनाश न होनेसे संस्कार उत्पन्न नहीं होता, अत: स्मृति नहीं होती।’ परंतु तब तो पूर्व दिनके अहंकारका भी स्मरण न होना चाहिये। वेदान्तमतमें तो अहंकारावच्छिन्न चैतन्यसे ही अहंकारकी प्रतीति होती है। वह अनित्य ही है, अत: संस्कारोत्पत्ति तथा स्मरण बननेमें कोई आपत्ति नहीं। यदि कहा जाय कि ‘सुषुप्तिके भी अहंकारका स्मरण होता ही है, अतएव ‘सुखमहमस्वाप्सम्’ (मैं सुखपूर्वक सोया था) इस सुप्तोत्थितके स्मरणमें अहंकी प्रतीति होती है।’ इसपर तार्किकका कहना है कि ‘यह स्मरण है ही नहीं, किंतु उत्थानकालमें प्रतीत होनेवाले आत्मामें सुखोपलक्षित दु:खाभावका अनुमान किया जाता है। मैं स्वप्न एवं जागरितके बीचमें दु:खरहित था; क्योंकि उस बीचके दु:खका घटादिके समान कभी स्मरण नहीं होता।’ मुख्य सुख सुषुप्तिमें हो नहीं सकता, अत: जैसे सिरका भार हटनेपर प्राणीको सुखका अनुभव होता है, वैसे ही सुषुप्तिमें दु:ख न होनेसे सुखका व्यवहार होता है। कहा जा सकता है कि ‘सुखका स्मरण होनेसे सुषुप्तिमें मुख्य ही सुख मानना ठीक है।’ परंतु फिर तो सामान्य विशेषनिष्ठ होता है, अत: भोजनसुख, पानसुख आदि रूपसे विशिष्ट सुखका भी स्मरण होना चाहिये। यदि कहा जाय कि ‘उस विषयमें संस्कारका उद‍्बोध नहीं हुआ’, तब भी ‘सुखमहमस्वाप्सम्’ के साथ ‘नाहं किञ्चिदवेदिषम्’ (मै कुछ भी नहीं जानता था) यह ज्ञानाभावका परामर्श सुखानुभवका विरोधी है, अत: दु:खाभावमें ही सुखका व्यवहार मानना ठीक है। जो कहा जाता है कि ‘सुप्तोत्थितमात्रका अंगलाघव, प्रसन्नवदनत्वादिसे पूर्वकालमें सुखानुभवका अनुमान होता है,’ तो वह भी ठीक नहीं है। अनुभवके अनन्तर क्षणमें स्मरण ही हो सकता है, फिर अनुमान व्यर्थ है। यह भी कहा जाता है कि ‘तारतम्यरूपसे दृश्यमान अंगलाघवादि सातिशय स्वापसुखानुभवके बिना उपपन्न नहीं हो सकते। दु:खाभाव तो एक रूप ही होता है, अत: उस आधारपर अंगलाघवादिका तारतम्य नहीं बन सकता।’ परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि प्रतियोगिदु:खजनक करण-व्यापारोंके उपरमके तारतम्यसे अंगलाघवादिके तारतम्यकी प्रतीति होनेमें कोई बाधा नहीं है। वेदान्तसिद्धान्तानुसार तो स्वप्रकाश साक्षिचैतन्यस्वरूप ही आनन्द है। वह यद्यपि सर्वदा ही भासमान रहता है, फिर भी जाग्रत् एवं स्वप्नमें तीव्र वायु विक्षिप्त प्रदीपप्रभाके समान ‘अहं मनुष्य:’ इत्यादि मिथ्याज्ञानसे विक्षिप्त होनेके कारण स्पष्ट प्रतीत नहीं होता, परंतु सुषुप्तिमें वह मिथ्या ज्ञान नहीं रहता, अत: वहाँ साक्षीरूप आनन्द स्पष्टरूपसे भासित होता है। आवरणभूत अविद्या ब्रह्मतत्त्वाकारका आच्छादन करती हुई भी स्वभासक साक्षिचैतन्याकारको नहीं ढकती, अन्यथा बिना साक्षीके तो अविद्या भी सिद्ध न हो सकेगी। अत: सुषुप्तिमें अनुभूत आनन्द, आत्मा एवं भावरूप अज्ञान, इन्हीं तीनोंका सुप्तोत्थितको ‘सुखमहमस्वाप्सम्, नाहं किञ्चिदवेदिषम्’ इस तरह स्मरण होता है। कहा जाता है कि ‘इन तीनोंका अनुभव अन्त:करण वृत्तियोंसे नहीं हो सकता; क्योंकि सुषुप्तिमें वृत्ति नहीं रहती। चैतन्यसे अनुभव हो सकता है, परंतु वह अविनाशी होनेसे संस्कारका उत्पादक न होगा, अत: स्मरण नहीं बनेगा,’ परंतु यह ठीक नहीं है। सुषुप्तिमें अविद्या-वृत्तिसे ही तीनोंका ग्रहण सम्भव है। अविद्या-वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यसे ही उक्त तीनों वस्तुओंका अनुभव होता है, उसीका नाश भी सम्भव है और संस्कार भी सम्भव है। उसी संस्कारसे स्मृति हो सकती है। कहा जाता है कि ‘इस तरह तो अविद्याविशिष्ट आत्मा अनुभविता होगा और अन्त:करणविशिष्ट आत्मा स्मर्ता होगा, अत: वैयधिकरण्य होगा। अन्यके अनुभूतका अन्य स्मर्ता नहीं होता।’ परंतु यह भी कहना ठीक नहीं है; क्योंकि उत्थानकालमें भी अविद्याविशिष्ट ही आत्माका स्मर्ता है। स्मृत अर्थका शब्दानुविद्ध व्यवहार अन्त:करणसे होता है। जो कहा जाता है कि ‘सुखमस्वाप्सम्, नावेदिषम्’ यह ज्ञान दु:खाभाव एवं ज्ञानाभावको ही विषय करता है, वह ठीक नहीं है; क्योंकि सुषुप्तिमें यद्यपि ज्ञानाभाव एवं दु:खाभाव रहते हैं, फिर भी उनका अनुभव नहीं होता, कारण सुषुप्तिमें उनके प्रतियोगी दु:ख तथा ज्ञानका स्मरण नहीं रहता। प्रतियोगिस्मरणके बिना अभावका ग्रहण असम्भव ही होता है। कहा जाता है कि ‘तो फिर वेदान्त-पक्षमें भी सौषुप्त ज्ञानाभाव तथा दु:खाभावका अनुभव कैसे होगा?’ इसका समाधान अर्थापत्तिसे किया जाता है। उक्त रीतिसे सुषुप्तिके अविक्षिप्त सुखका अनुस्मरण करके तद्विरोधी दु:खका अभाव प्रमित हो सकता है। परामृष्टभावरूप अज्ञानकी अन्यथा अनुपपत्तिसे अज्ञानविरोधी ज्ञानका अभाव निश्चित हो जाता है। कुछ लोग कहते हैं कि ‘भावरूप अज्ञान ज्ञानके विरुद्ध नहीं है; क्योंकि जागरणकालमें ज्ञान और अज्ञान दोनों ही एक साथ रहते हैं।’ परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि यद्यपि अज्ञानमात्रका प्रपंच-ज्ञानके साथ विरोध नहीं है, तथापि विशेषाकाररूपसे परिणत अज्ञानका ज्ञानके साथ विरोध होता है। घटज्ञानाकारसे परिणत अज्ञान पटादि ज्ञानोंसे विरुद्ध होता ही है। अन्यथा घटज्ञानकालमें पटादि सम्पूर्ण जगत‍्को प्रकाशित होना चाहिये। इस दृष्टिसे सुषुप्तावस्थाकारसे परिणत अज्ञानका अशेष विशेष ज्ञानोंके साथ विरोध है ही, अत: अर्थापत्तिसे ज्ञानाभाव सिद्ध होगा। कुछ लोग प्रबोधकालमें ज्ञानका स्मरण होनेसे सुषुप्तिमें ज्ञानाभावका अनुमान करते हैं, परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि मार्गस्थ तृणादिका भी स्मरण नहीं होता। फिर भी उनका अभाव नहीं कहा जा सकता। कहा जाता है कि ‘यदि स्मरण न होनेसे अभावका अनुमान नहीं हो सकता, तो अस्मर्यमाण होनेसे गृहमध्यमें प्रात:काल गज नहीं था, यह अनुमान कैसे बनेगा?’ परंतु यह कोई दोष नहीं है। वहाँ तो गृहमें कुसूलादि विविध पदार्थोंका अनुभव करके मध्याह्नमें उन्हींका स्मरण करके उनकी अन्यथानुपपत्तिसे प्रात: गजाभाव प्रमित होता है, अत: सुषुप्तिमें दु:खाभाव एवं ज्ञानभाव अर्थापत्तिसे ही वेद्य होते हैं। भावरूप अज्ञान, आनन्द तथा आत्माका स्मरण होता है। फिर भी सुषुप्तिमें न अहंकारका अनुभव होता है और न तो उत्थितको उसका स्मरण ही होता है। ‘सुखमहमस्वाप्सम्’ इस रूपसे स्मरणमें जो अहंका उल्लेख होता है, उसकी स्थिति यह है कि सुषुप्तिमें अहंकार अज्ञानमें विलीन हो जाता है। प्रबोधमें वह पुन: उद‍्भूत होता है। उत्पन्न होकर वही अहंकार स्मर्यमाण आत्माको स्पष्ट व्यवहारके लिये सविकल्परूपसे उपलक्षित करता है। अहंकारवृत्तिका यही प्रयोजन भी है। इसलिये आत्मा अहंवृत्तिको छोड़कर अन्य अन्त:करणवृत्तियोंसे कभी भी व्यवहृत नहीं होता। इसीलिये नैष्कर्म्य-सिद्धिकारका कहना है कि ‘प्रत्यक्स्वरूप एवं अति सूक्ष्म होने तथा आत्मदृष्टिसे उसका अनुशीलन होनेसे घटपटाद्याकार अन्य वृत्तियोंको छोड़कर अहंवृत्तिसे ही आत्मा उपलक्षित होता है। अहंकार या तो आत्माके साथ ही व्याप्त होकर रहता है अथवा विलयको प्राप्त होता है। उसकी अन्य तीसरी अवस्था नहीं होती। इसीलिये अहंबुद्धिसे आत्माका सविकल्प होता है। इस तरह जाग्रत्-स्वप्नमें आत्मरूपसे भासमान होनेपर भी अहंकार सुषुप्तिमें नहीं रहता, अत: वह स्वप्रकाश आत्माका स्वरूप नहीं है। अहंकार परमेश्वराधिष्ठित स्वविद्यासे ही उत्पन्न होता है। ज्ञानशक्ति एवं क्रियाशक्ति उसका स्वरूप है। कूटस्थ चैतन्यसे ही उसकी सिद्धि होती है। कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि उसके कार्य हैं। सुषुप्तिमें अन्त:करणका प्रलय हो जाता है, अत: वह वहाँ नहीं रहता। यद्यपि क्रियाशक्तिरूप प्राण सुषुप्तिमें भी रहता है, तथापि प्राण अहंकारसे भिन्न है, अत: अहंकारके लयमें कोई विरोध नहीं है। यदि प्राण अन्त:करणका ही अंश माना जाय, तो यह मानना चाहिये कि प्राणांशको छोड़कर अवशिष्ट अन्त:करणका सुषुप्तिमें लय होता है। दृष्टि सृष्टि-पक्षमें तो सुप्त पुरुषके प्रति सभीका मुख्य प्रलय ही होता है। जो लोग स्वतन्त्र अचेतन प्रकृति आदिको ही महत्त्व, अहंतत्त्व आदि सब प्रपंचका उपादान मानते हैं, परमेश्वराधिष्ठित अविद्याको नहीं, उनके यहाँ सब वस्तुएँ इदंरूपसे ही गृहीत होनी चाहिये। ‘अयं कर्ता, अयं भोक्ता’ (यह कर्ता है, यह भोक्ता है) इस रूपसे प्रतीति होनी चाहिये, ‘अहं कर्ता, अहं भोक्ता’ (मैं कर्ता हूँ, मैं भोक्ता हूँ) इस प्रकारसे नहीं। ऐसी प्रतीति तो तभी बन सकती है, जब सभी वस्तुएँ आत्मामें अध्यस्त हों।’ नैयायिक अणु-परिमाण मनको इन्द्रिय मानते हैं। उसीको सुख-दु:ख, इच्छा-ज्ञानका निमित्तकारण मानते हैं। इस मनके बिना आत्मा इन्द्रिय तथा विषयके संयुक्त होनेपर भी एक कालमें अनेक ज्ञान नहीं होते। मन अणु है, अत: एक कालमें अनेक इन्द्रियोंसे संयुक्त नहीं हो सकता। जिस समय वह जिस इन्द्रियसे संसृष्ट होता है, उस समय उसी विषयका ज्ञान होता है। इसीलिये एक कालावच्छेदेन दो ज्ञानकी उत्पत्ति न होना ही मनका लिंग है। ‘युगपज्ज्ञानानुत्पत्तिर्मनसो लिङ्गम्’ (न्यायदर्शन० १।१।१६) यह कहा गया है। मनसे भिन्न मध्यम परिमाण अन्त:करण नैयायिकोंको मान्य नहीं है। उनके मतानुसार मनके द्वारा सर्वगत आत्मामें समवायसम्बन्धसे ज्ञान-गुणकी उत्पत्ति होती है। आत्मा यद्यपि ज्ञानाश्रय है और वह सर्वगत है, तथापि निरवयव होनेसे उसका सर्वसंयोग सम्भव नहीं है, अत: युगपत् (एक साथ) सर्वप्रकाश नहीं होगा। क्रियारूप या गुणरूप ज्ञानका—स्वाश्रयका उल्लंघन करके—अन्यत्र संयोग सम्भव नहीं है, अत: उस ज्ञानसे किसी भी वस्तुका प्रकाश न होना चाहिये। यदि ज्ञान बिना संसर्गके असंसृष्टका ही ग्रहण करे तो अतिप्रसंग होगा, अर्थात् असंसर्ग समान होनेसे किसी भी वस्तुका ग्रहण होना चाहिये। ‘शरीरावच्छिन्न आत्मप्रदेशसमवायी ज्ञान होता है’ इस पक्षमें भी विचारणीय है कि यदि प्रदेश आत्माका स्वाभाविक धर्म है, तब तो आत्मामें सावयवत्वापत्ति होगी। यदि प्रदेश औपाधिक है तो भी ज्ञान तत्प्रदेशसंयुक्त वस्तुका ही ग्राहक है, अत: देहादिसे बाह्य घटादिका प्रकाश न होना चाहिये। यदि ज्ञान बाह्यात्मप्रदेश-संयुक्त वस्तुका भी ग्राहक है, तो फिर सभी बाह्य वस्तुएँ बाह्यात्मप्रदेश-संयुक्त हैं ही, अत: सबका ही ग्रहण होना चाहिये। कुछ लोगोंका यह भी कहना है कि ‘ज्ञानाधार आत्मासे मन संयुक्त होता है, मनसे इन्द्रिय संयुक्त होती है और इन्द्रियसे विषय संयुक्त होता है। इस तरहकी संयोगपरम्परासे वस्तुका बोध होता है,’ परंतु यह कहना भी ठीक नहीं है; क्योंकि यह परम्परा तो ज्ञानोत्पादनमें ही उपयुक्त होती है। ज्ञान उत्पन्न होनेके बाद भी यदि संयोगपरम्परासे विषयका प्रकाश हो, तब तो विषयसंयुक्त, तत्संयुक्तादिरूपसे अवस्थित सभी जगत‍्का प्रकाश होना चाहिये। वेदान्त-मतानुसार सर्वगत चिदात्माको आवृत करके स्थित भावरूप अविद्या ही सम्पूर्ण जगत‍्के आकारसे स्थित होती है। शरीरके मध्यमें अविद्याविवर्त्त अन्त:करण रहता है। इसीकी सूक्ष्म पंचभूतोंके समष्टि सात्त्विक अंशसे भी उत्पत्ति मानी जाती है। वही धर्माधर्मसे प्रेरित होकर नेत्रादि इन्द्रियोंद्वारा निकलकर घटादि विषयोंको व्याप्त होकर तत्तद्-विषयोंके आकारसे आकारित होता है। जैसे पूर्ण सरोवरका जल सेतुच्छिद्रके द्वारा निकलकर कुल्याप्रवाहरूप (नहर-नालियों)-से खेतोंमें पहुँचकर तदाकार हो जाता है, वैसे ही प्रकृतमें भी समझना चाहिये। फिर भी जलके समान अन्त:करण बहता नहीं है, किंतु सूर्यरश्मिके तुल्य ही है। तैजस होनेसे अन्त:करण दीर्घ प्रभाकारसे परिणत होता है और रश्मिके समान ही सहसा उसका संकोच भी उपपन्न होता है। अन्त:करण सावयव है, अत: उसका परिणाम उपपन्न होता है। वह अन्त:करण घटाद्याकारसे परिणत होकर देहके भीतर और घटादिमें व्याप्त होकर देह एवं घटादिके मध्यमें दण्डायमान अविच्छिन्नरूपसे अवस्थित रहता है। देहावच्छिन्न अन्त:करणका भाग ‘अहंकार’ एवं ‘कर्ता’ कहा जाता है। मध्यवर्ती दण्डायमान अन्त:करणका भाग ‘वृत्तिज्ञान’ नामकी क्रिया कही जाती है। विषयव्यापक भाग विषयको ज्ञानका कर्म बनानेवाला अभिव्यक्ति योग्य कहा जाता है। वह तीनों ही भागवाला अन्त:करण अतिस्वच्छ होता है, अत: उसमें स्वच्छ काँचपर सौर प्रकाशके समान आत्म-चैतन्य अभिव्यक्त होता है। अभिव्यक्त चैतन्य यद्यपि एक ही है, तथापि अभिव्यंजकके त्रैविध्यसे उसमें त्रिधा व्यवहार होता है। कर्तृभागावच्छिन्न चिदंश ‘प्रमाता’, क्रियाभागावच्छिन्न चिदंश ‘प्रमाण’ और विषयगत योग्यत्वभागावच्छिन्न चिदंश ‘प्रमिति’ कहलाता है। तीनों ही भागोंमें अनुगत एकाकार अन्त:करणमें प्रमातृ-प्रमेय-सम्बन्धरूप ‘मयेदमवगतम्’ (मैंने इसे जाना) यह विशिष्ट व्यवहार बनता है। व्यंग्य चैतन्य एवं व्यंजक अन्त:करणका ऐक्याध्यास होनेसे अन्योन्यमें अन्योन्य-धर्मका व्यवहार भी संगत है। प्रकाशरूप होनेसे या प्रकाशसंसृष्ट होनेसे ही वस्तुओंका प्रकाश होता है। सूर्यादि प्रकाशरूप होनेसे प्रकाशित होते हैं। घटादि प्रकाशसंसर्गी होनेसे प्रकाशित होते हैं। वैसे ही आत्मचैतन्य या अखण्ड बोध अथवा नित्यज्ञान प्रकाशरूप होनेसे एवं अन्य वस्तुएँ तत्संसर्गी होनेसे प्रकाशित होती हैं। चैतन्यका विषयके साथ संयोग, समवायादि सम्बन्ध नहीं होता, किंतु आध्यासिक ही संसर्ग होता है। जैसे रज्जुमें सर्पका अध्यास होता है, वैसे ही चैतन्यमें प्रपंचका अध्यास है। अत: अधिष्ठान चैतन्यमें प्रपंच अध्यस्त है। उसी चैतन्यसे प्रपंचका प्रकाश होता है। किंतु वह चैतन्य अविद्यांशोंसे ढका रहता है। उन्हीं आवरणांशोंके हटानेके लिये प्रमाता-प्रमाणादिका व्यापार होता है। घटादिकी प्रत्यक्षतामें आलोक, चक्षु, मन आदिकी आवश्यकता पड़ती है। आलोककी अपरोक्षताके लिये अन्य आलोक अपेक्षित नहीं होता। चक्षुके ज्ञानमें दूसरे चक्षु आदिकी अपेक्षा नहीं होती। सर्वविज्ञाता, प्रमाता या ज्ञानको अपने प्रकाशके लिये अन्यकी अपेक्षा नहीं होती। सर्वसाक्षी प्रमाताका भी प्रकाशक अखण्डभान साक्षात् अपरोक्ष कहा जाता है। दो उपाधियोंके एकत्रित होनेसे दो उपहितोंका भी अभेद हो जाता है। जैसे घट और मठ एकत्रित होनेसे घटाकाश और मठाकाश दोनों एक ही हो जाते हैं, वैसे ही जहाँ अन्त:करण विषय-प्रदेशपर इन्द्रियादिद्वारा जाता है, वहाँ विषय एवं अन्त:करण दोनों उपाधियाँ एकत्रित होनेसे विषयावच्छिन्न चैतन्य और वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य एक हो जाते हैं। इसीको प्रत्यक्ष प्रमाण कहते हैं। जहाँ अन्त:करणवृत्ति विषयसे संसृष्ट नहीं होती, वहाँ परोक्ष ज्ञान होता है और अन्त:करण तथा विषय दोनों एकत्रित होनेसे अन्त:करणावच्छिन्न एवं विषयावच्छिन्न चैतन्यकी एकता हो जाती है। उस समय विषयावच्छिन्न चैतन्यमें अध्यस्त विषय विषयावच्छिन्न चैतन्यभिन्ना अन्त:करणवच्छिन्न प्रमातृ चैतन्यमें भी अध्यस्त समझा जाता है। इसीलिये प्रमातृ चैतन्यसे विषयका अपरोक्षज्ञान होता है। इसपर शंका होती है कि ‘अन्त:करणसे चैतन्यकी अभिव्यक्ति क्या है? यदि आवरण-विनाश, तब तो घटज्ञानसे ही मोक्ष हो जाना चाहिये; क्योंकि वेदान्तमतमें आवरण-विनाश ही मोक्ष है। यदि अभिव्यक्ति आत्मगत अतिशय-विशेष है, तब तो सातिशय आत्मा विकारी ही होगा,’ परंतु इसका समाधान यह है कि आवरणाभिभव ही अभिव्यक्ति है। एतावता निरावरण चैतन्यसे विषयका प्रकाश होता है। कहा जाता है कि ‘चैतन्य सर्वगत है, फिर स्वसंसृष्ट सर्वभासक होनेसे प्रतिकर्म-व्यवस्था नहीं होगी। प्रमाण-प्रमेयादि व्यवहार ही प्रतिकर्म-व्यवस्था है, परंतु यह दोष नहीं है। ‘जो सुख-दु:खादि एक पुरुषको अनुभूत होते हैं, वे क्या सभी पुरुषोंको अनुभूत होने चाहिये; क्योंकि चैतन्य एक ही है?’ यह आपत्ति है अथवा यह कि ‘देवदत्त जिस समय घटका अनुभव करता है, उसी समय सम्पूर्ण जगत‍्का अनुभव होना चाहिये; क्योंकि देवदत्तका चैतन्य सर्वगत है।’ पहली आपत्ति इसलिये संगत नहीं है कि केवल चैतन्य अनुभवका हेतु नहीं है; क्योंकि वह अविद्यासे आवृत है, किंतु अन्त:करणद्वारा अभिव्यक्त चैतन्यसे ही विषयोंका अनुभव होता है। वह अन्त:करण प्रतिपुरुष भिन्न है, अत: जिस पुरुषके अन्त:करणसे अभिव्यक्त चैतन्यद्वारा जिस विषयका सम्पर्क होता है, उसीको उसका ज्ञान होता है। दूसरी आपत्ति भी ठीक नहीं है; क्योंकि परिच्छिन्न अन्त:करणसे अभिव्यक्त चैतन्यका युगपत् सम्पूर्ण जगत‍्से सम्बन्ध नहीं होता, अत: सर्वावभासका प्रसंग ही नहीं है। अत: प्रतिकर्म-व्यवस्थामें कोई अनुपपत्ति नहीं है।’ कहा जाता है कि ‘परिच्छिन्न अन्त:करणका भी सूर्यरश्मिवत् सर्वव्यापी परिणाम होगा।’ परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि पुण्य-पाप, नेत्र-श्रोत्र आदिके रूपसे अन्त:करणके परिणामकी सामग्री प्रतिविषयमें निश्चित है, अत: परिणाममें भी व्यवस्था ही सिद्ध होगी। जो कोई योगाभ्यासद्वारा अन्त:करणकी सर्वव्यापी परिणाम-सामग्री सम्पादन कर लेता है, वह सर्वज्ञाता हो ही सकता है। यहाँ भी शंका होती है कि ‘क्या चैतन्यके असंग होनेके कारण स्वत: विषयोपराग असम्भव होनेसे विषयोपरागके लिये अन्त:करण-उपाधि अपेक्षित है अथवा उपराग होनेपर भी विषय-प्रकाश-सिद्धिके लिये अन्त:करण-उपाधि मान्य है?’ पहला पक्ष ठीक नहीं है; क्योंकि असंगी होनेसे अन्त:करणोपाधिपर भी चैतन्यका उपराग सम्भव नहीं है। दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि चित् सम्बन्धसे ही प्रकाश सिद्ध होता है, फिर उपाधि व्यर्थ है। तब तो उपाधि-परित्यागसे सर्वगत चैतन्यसे संयुक्त सर्ववस्तुका प्रकाश होना ही चाहिये। इसी प्रकार यह समाधान भी पर्याप्त नहीं है कि ‘प्रतिबिम्बभूत जीव चैतन्य परिच्छिन्न होनेसे सर्वभासक नहीं हो सकता।’ बिम्बभूत ईश्वरकी सर्वज्ञता मान्य ही है। यद्यपि जीव-ब्रह्मका अद्वैत-वेदान्तमें भेद मान्य नहीं है, तथापि व्यावहारिक अल्पज्ञता-सर्वज्ञता आदिका भेद तो है ही; क्योंकि विषयका अनुभव ब्रह्मचैतन्यरूप है। जीवमें सर्वज्ञताके समान ही अल्पज्ञता भी नहीं बन सकेगी। यदि कहा जाय कि ‘जीवोपाधि अन्त:करणका चक्षु आदिद्वारा विषयसम्बन्ध होता है, अत: जीव विषयोंका ज्ञाता हो सकेगा’ सो भी ठीक नहीं; क्योंकि यदि अन्त:करणसे सृष्ट होनेसे जीव ज्ञाता हो, तब तो जीवको सदा ही ब्रह्मस्वरूपका भी ज्ञाता होना चाहिये; क्योंकि सर्वगत ब्रह्मका अन्त:करणके साथ संसर्ग है ही। यदि कहा जाय कि ‘अविद्योपाधिक ही जीव सर्वगत है और वह सभी जगत‍्को प्रकाशित कर सकता है, फिर भी वह अविद्यासे आवृत होनेके कारण स्वयं भी अप्रकाशमान रहता है, अतएव ‘अहमज्ञ:’ ऐसा अनुभव होता है। अविद्या यद्यपि परिच्छिन्न है, फिर भी वह सर्वगत चैतन्यका तिरोधान करती है। नेत्रके समीपमें धारित अंगुलिमात्रसे महान् आदित्यादिका भी तिरोधान होता ही है। इस दृष्टिसे जहाँ अन्त:करणका उपराग (सम्बन्ध) होता है, वहीं अविद्या-आवरणका अभिभव होता है। वहाँ ही अभिव्यक्त चैतन्यसे किंचित् अंशका ही प्रकाश होता है,’ परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि अविद्याकार्यभूत अन्त:करणसे अविद्याका अभिभव असम्भव है। इसलिये प्रतिकर्म-व्यवस्था नहीं बन सकती। इन सब बातोंका वेदान्तीय समाधान यह है कि जीव चैतन्य असंग होनेसे यद्यपि अन्यसम्बन्धित नहीं होता, तथापि अन्त:करणसे उसका सम्बन्ध होता है; क्योंकि अन्त:करणका ऐसा ही स्वभाव है। जैसे सर्वगत भी गोत्वजाति सास्नादि (गल-कम्बलादि) मती गो-व्यक्तिमें ही सम्बन्धित होती है, अन्यत्र नहीं, वैसे ही प्रकृतमें भी समझना चाहिये अथवा जैसे प्रदीप-प्रभा रूप, रस, गन्ध, वायु आदि प्रदेशोंमें व्याप्त होनेपर भी रूपको ही प्रकाशित करती है, अन्यको नहीं, वैसे ही अन्त:करण-उपाधि चैतन्यसे विषयोपराग-सिद्धिके लिये संगत होगी। उपरागके बिना चित्प्रकाश विषयोंका प्रकाश नहीं कर सकता। जैसे प्रदीप-प्रकाश स्वसंयुक्तका ही द्योतक होता है, वैसे ही चैतन्य भी स्वोपरक्तका ही प्रकाशन कर सकता है। ब्रह्म सर्वप्रपंचका उपादान कारण है, अत: औपाधिक उपरागके बिना ही स्वस्वरूपके समान ही स्वाभिन्न सर्वजगत‍्का प्रकाशन करता है। जीव ऐसा नहीं कर सकता; क्योंकि वह प्रपंचका उपादान नहीं है। कहा जा सकता है कि ‘जब जीव स्वत: अवभासक नहीं है, तब घटादिके समान ही अन्य सम्बन्धसे भी प्रकाशक नहीं हो सकता,’ परंतु यह ठीक नहीं। केवल लौह तृणादिका दाहक न होनेपर भी लौहपिण्डपर व्यक्त अग्नि जैसे तृणादिका दाहक होता है, वैसे ही असंग-साक्षी चैतन्य विषयोंका प्रकाशक न होनेपर भी अन्त:करणवशात् निरावरण होकर विषयोंका प्रकाशक होगा। जिस पक्षमें अन्त:करणस्थ चित्प्रतिबिम्ब ही जीव है, तब तो परिच्छिन्न होनेसे सुतरां प्रतिकर्म-व्यवस्था उपपन्न होगी। भले ही विषयानुभव ब्रह्म-चैतन्य हो, फिर भी जीवोपाधिभूत अन्त:करणका वृत्तिरूप परिणाम जबतक विषयाकार नहीं होता, तबतक वह अव्यक्त ही रहता है। विषयाकार अन्त:करण वृत्तिपर अभिव्यक्त चैतन्यको जीव-चैतन्य भी कहनेमें कोई विरोध नहीं है। ब्रह्मके अन्त:करण-संसृष्ट होनेपर भी ब्रह्माकार अन्त:करण वृत्ति न होनेसे जीवको सदा ब्रह्म-ज्ञान-प्रसंग नहीं आता। अन्त:करणस्वरूप मात्र वस्तुका व्यंजक नहीं होता, किंतु तत्तद्वस्त्वाकार-अन्त:करणके परिणाम ही उन-उन वस्तुओंके व्यंजक होते हैं। अतएव तदाकारवृत्ति न होनेसे ही अन्त:करणमें ही रहनेवाले धर्मादिकी अभिव्यक्ति नहीं होती। जीव भी जीवाकार अहंवृत्तिरूपसे परिणत अन्त:करणमें ही अभिव्यक्त होता है, अन्त:करणमात्रमें नहीं। इसीलिये सुषुप्तिमें अहंवृत्ति न होनेसे जीवकी भी प्रतीति नहीं होती। इस तरह अन्त:करण प्रतिबिम्ब जीवत्व-पक्षमें भी सब व्यवस्था बन जाती है। जिस पक्षमें अविद्योपाधिक सर्वगत जीव है, उस पक्षमें भी आवरणतिरोधायक अन्त:करणसे सब व्यवस्था बनती है। जैसे, गोमय-कार्य वृश्चिक एवं मृदादिकार्य वृक्ष अपने कारण गोमय तथा मृदादिके तिरोधायक होते हैं, वैसे ही अविद्याकार्य अन्त:करण भी अविद्याका तिरोधायक बन जाता है। वृश्चिक-शरीरमें गोमयके और वृक्ष-शरीरमें मृदादिके किंचित् भी अंशकी प्रत्यभिज्ञा नहीं होती। इस तरह वेदान्तमतमें प्रमात्रादि व्यवहार ठीक सम्पन्न हो जाते हैं। चिदुपरागके लिये अथवा विषय-चैतन्याभेदकी अभिव्यक्तिके लिये या आवरणाभिभवके लिये वृत्तिका उपयोग हो सकता है। वृत्तिके द्वारा चैतन्य तथा विषयका विषय-विषयिभाव सम्बन्ध होता है। कुछ लोग विषयसंयुक्त वृत्तिके तादात्म्यसम्बन्धसे चैतन्यद्वारा विषयका प्रकाश मानते हैं। अन्य लोगोंका मत है कि अपरोक्ष जीव-चैतन्यके साथ साक्षात् सम्बन्धसे ही सुखादिका साक्षात्कार होता है, अत: परम्परासम्बन्ध ग्रहण न करके साक्षात् सम्बन्ध ही ग्रहण करना चाहिये। इसलिये जैसे तरंग और तरुके संस्पर्शसे तरुमें नदी-स्पर्श माना जाता है, वैसे ही विषयवृत्ति-संसर्गसे जीव-विषय-संसर्ग भी मान्य है। जैसे कारणाकारण-संयोगसे कार्याकार्य संयोग होता है, वैसे ही कार्याकार्य-संयोगसे कारणाकारण-संयोग भी होता है; अर्थात् नैयायिक लोग जैसे हस्त एवं वृक्षके संयोगसे देह-वृक्षका संयोग मानते हैं, हस्त अवयव होनेसे शरीरका कारण है, वृक्ष शरीरका अकारण है। कारण (हस्त) तथा अकारण (वृक्ष)-के संयोगसे कार्य (शरीर) तथा अकार्य (वृक्ष)-का सम्बन्ध मान्य है, वैसे ही वृत्ति जीव-चैतन्यका कार्य है और विषय अकार्य है, अत: कार्य (वृत्ति) तथा अकार्य (विषय) संयोगसे कारण (जीव-चैतन्य) और अकारण (विषय)-का भी सम्बन्ध बन जायगा। इस तरह वृत्तिद्वारा जीव-चैतन्यका विषयके साथ साक्षात् सम्बन्ध बन जाता है। कुछ लोगोंका यह भी मत है कि ‘अन्त:करणोपहित विषयावभासक चैतन्यका विषयतादात्म्यापन्न ब्रह्म-चैतन्यके साथ अभेदाभिव्यक्तिद्वारा विषयतादात्म्यसम्पादन ही चिदुपराग है।’ इस पक्षमें विषयकी अपरोक्षतामें आध्यासिक सम्बन्ध ही मुख्य कारण है। वृत्तिद्वारा अभेद व्यक्त होनेपर विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्य और अन्त:करणावच्छिन्न जीवचैतन्य एक ही हो जाता है, अत: विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्यमें अध्यस्त विषय-विषयावच्छिन्न चैतन्याभिन्न अन्त:करणावच्छिन्न चैतन्यरूप जीवचैतन्यमें भी अध्यस्त समझा जा सकता है। अभेदाभिव्यक्ति क्या है, इसपर कुछ लोगोंका कहना है कि ‘जैसे कुल्याद्वारा तड़ाग एवं केदारसलिलकी एकता होती है, वैसे ही वृत्तिद्वारा विषय एवं अन्त:करणावच्छिन्न चैतन्यकी एकता होती है। यद्यपि विषयावच्छिन्न चैतन्य ब्रह्म-चैतन्य ही है और वही विषय-प्रकाशक है, तथापि वृत्तिद्वारा जीव-चैतन्यके साथ अभेद होनेसे उसमें जीवत्व सम्पन्न हो जाता है, इसलिये जीव विषयका प्रकाशक बन सकता है।’ दूसरे लोग कहते हैं कि ‘बिम्बस्थानीय विषयावच्छिन्न चैतन्य ब्रह्मके साथ प्रतिबिम्बभूत जीवकी (अभेदाभिव्यक्ति) नहीं होती। व्यावर्त्तक उपाधि दर्पणके समान जबतक बनी है, तबतक उपहितोंकी एकता नहीं हो सकती। जबतक दर्पण है, तबतक बिम्ब-प्रति-बिम्बभाव रहेगा ही। इसी तरह अन्त:करणादि उपाधि जबतक है, तबतक जीव-ईश्वरभाव रहेगा ही। फिर ब्रह्म-चैतन्यका जीवचैतन्य बनना असम्भव ही रहेगा। यदि वृत्तिकृत अभेदकी अभिव्यक्तिसे विषयावच्छिन्न ब्रह्म जीव हो जायगा, तब तो ब्रह्मका विषय-संसर्ग न रहनेसे ब्रह्म उस विषयका ज्ञाता न रहेगा। फिर उसकी सर्वज्ञता बाधित होगी। अत: विषयावच्छिन्न ब्रह्मचैतन्य विषयसंसृष्ट वृत्तिके अग्रभागमें विषयप्रकाशक प्रतिबिम्बका समर्पण करता है। उसी प्रतिबिम्बका जीवके साथ एकीभाव होता है। इसी तरह अन्त:करण, वृत्ति तथा विषयोंसे अवच्छिन्न चैतन्योंमें क्रमेण प्रमाता, प्रमाण एवं प्रमेय-व्यवहार असंकररूपसे सम्पन्न होगा।’ कहा जा सकता है कि ‘वृत्तिसे उपहित चैतन्य विषय-प्रमा होगी, उसका विषयाधिष्ठान चैतन्यके समान विषयके साथ आध्यासिक सम्बन्ध नहीं होगा। फिर विषयकी अपरोक्षतामें आध्यासिक सम्बन्ध प्रयोजक है, यह सिद्धान्त असंगत हो जायगा,’ परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि विषयसे अवच्छिन्न विषयाधिष्ठान चैतन्य ही वृत्तिमें प्रतिबिम्बित है। इस दृष्टिसे अभेद उपपन्न होता है। कुछ लोग विषयाधिष्ठान-चैतन्यसे ही विषयका साक्षात् आध्यासिक सम्बन्ध होनेसे बिम्बभूत ब्रह्मचैतन्यको ही विषयप्रकाशक मानते हैं; किंतु बिम्बत्वादि विशिष्टरूपसे उसका भेद होनेपर भी बिम्बत्वोपलक्षितरूपसे एकीभाव ही अभेदाभिव्यक्ति है। बिम्बादिरूपमें भेद बना ही रहता है। अत: जीवब्रह्मके सांकर्यमें एवं ब्रह्मकी सर्वज्ञतामें विरोध आदि नहीं। इसी तरह ‘वृत्तिसे आवरणका अभिभव होता है’, इस पक्षमें भी विचारणीय है कि आवरणाभिभव क्या है? यदि अज्ञाननाश ही आवरणाभिभव माना जाय तब तो घटज्ञानसे अज्ञानका नाश होगा और अज्ञानमूलक प्रपंचकी ही निवृत्ति हो जायगी। कुछ लोगोंके मतमें चैतन्यमात्रके आवरक अज्ञानका विषयावच्छिन्न-प्रदेशमें ज्ञानसे एकदेशेन नाश उसी तरह होता है, जिस तरह महान्धकारमें खद्योत-प्रकाशसे एकदेशेन अन्धकारका नाश होता है। अत: घटज्ञानसे विषयप्रदेशस्थ अज्ञानके एकदेशका ही नाश होगा, सम्पूर्ण अज्ञानका नहीं, अत: प्रपंच-निवृत्तिका प्रसंग नहीं होगा अथवा ज्ञानसे विषयाज्ञानका कट (चटाई)-के समान संवेष्टन या संकोच हो जाता है, यही आवरणाभिभव है, अथवा रणमें भीत भट (योद्धा)-के पलायनके समान ज्ञानसे विषयावच्छिन्न चैतन्यनिष्ठ अज्ञान हट जाता है, यही आवरणाभिभव है। अन्य लोगोंका कहना है कि ‘अज्ञानका एकदेशसे नाश होनेसे उपादान न रहनेसे विषयावच्छिन्न चैतन्य-प्रदेशमें फिर आवरणकी उत्पत्ति न होगी। अतएव मानना यह चाहिये कि चैतन्यमात्रके आवरक अज्ञानका तत्तदाकारवृत्ति संसृष्ट अवस्थावाले विषयावच्छिन्न चैतन्यको आवरण न करनेका स्वभाव ही आवरणाभिभव है।’ कहा जाता है कि ‘घटादि विषयको ढककर स्थित होनेवाले पटके समान विषयावच्छिन्न चैतन्यको आवृत करके स्थित होनेवाला अज्ञान विषयको आवृत क्यों न करेगा?’ परंतु यह कहना भी ठीक नहीं है; क्योंकि ‘अहमज्ञ:’ इस प्रतीतिके आधारपर कहा जा सकता है कि अहमनुभवमें प्रकाशमान चैतन्यका आश्रय करके अज्ञान स्थित होता है और वह स्वाश्रयभूत चैतन्यको आवृत नहीं करता है। अन्य लोगोंका कहना है कि ‘घटं न जानामि’ (मैं घट नहीं जानता) इस तरह अज्ञान घटज्ञान विरुद्धरूपसे प्रतीत होता है। घटज्ञान होनेपर घटका अज्ञान निवृत्त हो जाता है। इस तरह घटज्ञानद्वारा निवर्त्यरूपसे अनुभूयमान घटाज्ञान मूलाज्ञान नहीं है। शुद्ध चैतन्यविषयक अज्ञान शुद्ध चैतन्य-ज्ञानसे ही निवर्त्य होता है। घटज्ञान-निवर्त्य घटाज्ञान वैसा नहीं है, अतएव घटावच्छिन्न चैतन्यविषयक अज्ञान मूलाज्ञानका अवस्थाविशेष है। उस अवस्था—अज्ञान (मूलाज्ञान)-का नाश ही आवरणाभिभव है। कहा जाता है कि ‘फिर भी एक ज्ञानसे अज्ञानका नाश होनेपर तत्समानविषयक ज्ञानान्तरोंमें आवरणाभिभावकता कैसे होगी?’ यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि जितने ज्ञान हैं, उतने ही अज्ञान हैं। इसलिये प्रत्येक ज्ञानसे प्रत्येक अज्ञानका नाश होता है। यह अवस्थारूप अज्ञान मूलाज्ञानके तुल्य ही अनादि है। व्यावहारिक जगत् और जीवको आवृत करके स्वाप्निक जीव-जगत‍्को प्रतिभासित करनेवाली आवरण एवं विक्षेप-शक्तिवाली निद्रा अज्ञानकी अवस्था है। इसी तरह सुषुप्तिमें अन्त:करणादिके विलीन होनेपर ‘सुखमहमस्वाप्सम्, नाहं किञ्चिदवेदिषम्’ (मैं सुखपूर्वक सोया, मैंने कुछ नहीं जाना) इस तरह स्मरण होनेसे मूलाज्ञानके तुल्य अनुभूयमान सुषुप्ति भी अज्ञानकी अवस्थाविशेषरूप ही है। जाग्रत् भोगप्रद कर्मोंके उपरम होनेपर इन दोनों ही अवस्थाओंका प्रादुर्भाव होता है, अत: ये सादि हैं। इसी तरह अन्य अवस्था—अज्ञान भी सादि ही है। यदि सभी मूलाज्ञान अनादि माने जायँ, तब तो प्रथम उत्पन्न घटज्ञानसे ही घटविषयक सभी अज्ञानोंका नाश होगा। किस अज्ञानका नाश हो, किसका न हो, इसमें कोई विनिगमका अर्थात् निर्णायक युक्ति नहीं है। ‘घटावच्छिन्न चैतन्यावरक सर्व अज्ञानोंके नाश हुए बिना घटविषयक प्रकाश ही न होगा। अत: पीछे होनेवाले ज्ञान आवरणके अभिभावक सिद्ध न होंगे।’ इसका समाधान कुछ लोग यह करते हैं कि ‘जैसे अनेक ज्ञान-प्रागभावोंके रहनेपर भी एक ज्ञानसे एक ही प्रागभाव नष्ट होता है, संशयादि-उत्पादनमें समर्थ घटावरणरूप अन्य ज्ञान-प्रागभावोंके रहनेपर भी घटज्ञानसे एक घटप्रागभावके नष्ट होनेपर ही घटविषयका प्रकाश होता है, वैसे ही एक ज्ञान उत्पन्न होनेपर एक ही अज्ञान निवृत्त होता है, इतर अज्ञानोंके रहनेपर भी विषयका प्रकाश होता है।’ दूसरे लोगोंका मत है कि ‘सब अज्ञान सर्वदा आवरण नहीं करते, किंतु जिस समय जो अज्ञान आवरण करता है, उस समयके उस ज्ञानसे उसी अज्ञानका नाश होता है। वृत्तिद्वारा आवरक अज्ञानका नाश होनेपर जब वृत्ति उपरत होती है, तब अन्य अज्ञान आवरण करते हैं।’ इसपर कहा जाता है कि ‘यदि सब अज्ञान सर्वदा आवरक न हों, तब तो ब्रह्मज्ञानकालमें ब्रह्मज्ञानसे भी उन अज्ञानोंकी निवृत्ति नहीं होगी, फिर तो मुक्तिमें भी उन अज्ञानोंकी प्रसक्ति होगी,’ परंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि उक्त सभी अज्ञान मूलाज्ञानकी अवस्था ही हैं, अत: ब्रह्मज्ञानसे मूलाज्ञानके नष्ट होनेसे उसके अवस्थाभूत अन्य अज्ञानोंका भी नाश होना संगत है। कई लोग कहते हैं कि ‘अज्ञान स्वभावसे ही सविषय होता है, अत: सभी अज्ञान सर्वदा ही अपने विषयको आवृत करते हैं।’ कहा जा सकता है कि ‘घटादिविषयकी उत्पत्तिके पहले अज्ञान किसे आवृत करेगा?’ परंतु कारणमें सूक्ष्मरूपसे घटादि सदा ही रहते हैं, अत: उनका आवरण सदा ही हो सकता है। उनके मतानुसार एक ज्ञानसे एक अज्ञानका नाश होता है, अन्योंका अभिभव होता है। जैसे ‘बहुजनसमाकुल प्रदेशमें एकके ऊपर भी वज्र पड़नेपर दूसरोंका अपसारण हो जाता है, वैसे ही प्रकृतमें भी समझना चाहिये अथवा जैसे सन्निपातहर औषध एक दोषको हटाता हुआ इतर दोषोंको भी हटाता है, वैसे ही एक अज्ञानको नष्ट करता हुआ भी ज्ञान इतर अज्ञानोंको भी तिरस्कृत करता है। जबतक ज्ञान रहता है, तबतक आवरणशक्तिका प्रतिबन्ध ही उनका तिरस्कार है।’ कहा जा सकता है कि ‘धारावाहिक ज्ञानस्थलमें प्रथम वृत्तिके द्वारा अज्ञानका निवारण होगा, परंतु द्वितीय आदि वृत्तियाँ अज्ञानकी निवारक न होंगी; क्योंकि प्रथम ज्ञानसे ही एक अज्ञानका निवारण और अन्योंका तिरस्कार सम्पन्न है,’ परंतु इसका समाधान कुछ लोग यह करते हैं कि ‘जैसे दीपधारा तमको तिरस्कृत करके स्थित रहती है, वैसे ही वृत्तिधारा भी अज्ञानको तिरस्कृत करके स्थिर होती है। जैसे प्रदीप-तिरस्कृत भी तम प्रदीपके उपरत होनेपर पुन: प्रवृत्त होता है, वैसे ही वृत्ति-तिरस्कृत भी अज्ञान-वृत्तिके उपरत होनेपर पुन: विषयको आवृत करता है; परंतु वृत्त्यन्तरोंके उदय होनेपर तिरस्कृत ही रह जाता है, जैसे प्रदीपान्तरके उदय होनेपर तम तिरस्कृत ही रहता है। जिसके रहनेपर अग्रिम क्षणमें जिसका सत्त्व रहता है, जिसके अभावमें जिसका असत्त्व रहता है, वह तज्जन्य मान्य होता है। तथा च प्रदीपधारासे तमके प्रागभावका पालन जैसे सम्पन्न होता है, वैसे ही वृत्ति-परम्परासे अनावरणका परिपालन होता है। वही द्वितीय आदि वृत्तिका फल है।’ कुछ लोगोंके मतानुसार ‘पर्यायसे ही अज्ञानविषयको आवृत करते हैं, अत: ज्ञान स्वकालके ही आवरक अज्ञानका नाश करता है। इसलिये धारावाहिक ज्ञानस्थलमें द्वितीयादि वृत्तियाँ भी अज्ञानकी नाशक हैं।’ इस पक्षमें कहा जा सकता है कि ‘यदि ज्ञानोदयकालमें भी अज्ञान रहता है, तो विषयका आवरण भी सम्भव है,’ परंतु इसका समाधान यह है कि अवस्थारूप अज्ञान तत्तत्कालोपलक्षित-स्वरूपका ही आवरण करते हैं। ज्ञान भी स्वकालोपलक्षितविषयावरक अज्ञानका नाश करते हैं। तथा च किसी ज्ञानके उदय होनेपर तत्कालीन विषयावरक अज्ञानका ही नाश होता है। विद्यमान भी अज्ञान अन्यकालीन विषयोंके ही आवरक होते हैं, इसलिये तत्कालीन विषयावभासमें कोई अनुपपत्ति नहीं हो सकती। कुछ लोग कहते हैं कि ‘आद्य घटादिज्ञानसे घटादिके अज्ञान नष्ट होते हैं। द्वितीयादि ज्ञानोंसे तो कालविशिष्ट वस्तु-विषयक अज्ञानकी ही निवृत्ति होती है। अतएव एक बार चैत्र-ज्ञान होनेपर ‘चैत्रं न जानामि’ इस प्रकार स्वरूपावरण अनुभूत नहीं होता। किंतु ‘इस समय वह कहाँ है, यह मैं नहीं जानता’ इस तरह कालादिविशिष्टविषयक ही आवरणका अनुभव होता है। भले विस्मृतिशालीको एक बार अनुभवके अनन्तर भी स्वरूपावरणकी अनुभूति हो, परंतु अन्यत्र द्वितीयादिज्ञान विशिष्टविषयक ही होते हैं।’ कहा जा सकता है कि ‘इस तरह तो धारावाहिक ज्ञानस्थलमें द्वितीयादिज्ञान अज्ञाननिवर्तक न होंगे; क्योंकि स्थूलकालविशिष्टाज्ञान प्रथमज्ञानसे ही निवृत्त हो चुका है। पूर्वापरज्ञानोंसे व्यावृत्त सूक्ष्म कालादिविशिष्टाज्ञानकी निवृत्ति द्वितीयादिज्ञानसे हो ही नहीं सकती; क्योंकि सूक्ष्मकाल द्वितीयादिज्ञानके विषय ही नहीं हैं,’ परंतु धारावाहिक स्थलमें प्रथमोत्पन्न एक ही वृत्ति तावत्काल स्थायीरूपसे मान्य है, अत: वहाँ वृत्तिभेद है ही नहीं। वृत्तिभेद माननेपर भी बहुकालावस्थायी वृत्ति मान्य होती है, अत: स्थूलकालादिविशिष्ट ही वस्तुका अज्ञान निवृत्त होता है। प्रतिक्षण उत्पन्न होनेवाली अनेक वृत्तियोंकी ही यदि धारा मानी जाय, तब तो द्वितीयादिज्ञान ज्ञातविषयक ही होनेसे प्रमाण नहीं हैं। अत: आवरण-निवर्तक न भी हों, तो भी कोई हर्ज नहीं। ‘विवरण’ कारने साक्षिसिद्धि अज्ञानको ज्ञानाभावभिन्न सिद्ध करनेके लिये अनुमानादि-वेद्य बतलाकर भी अज्ञानको प्रमाणवेद्य इसीलिये कहा है कि अज्ञात-ज्ञापक ही प्रमाण मान्य होता है, अज्ञान सदा ही साक्षिवेद्य होनेसे अज्ञात नहीं है, अत: अनुमानागमादि-वेद्य होनेपर भी वह प्रमाणवेद्य माना जाता है। इसलिये द्वितीयादि वृत्तियाँ उपासनादि वृत्तियोंके तुल्य अज्ञाननिवर्तक न भी हों, तो भी कोई हानि नहीं। प्रमाणवृत्तियोंके ही अज्ञाननिवर्त्तनका नियम होता है। विषयावरक अज्ञान दो प्रकारका मान्य होता है—एक विषयाश्रित होता है, जो कि अनिर्वचनीय रज्जु-सर्पादिका उपादान होता है। अनिर्वचनीयकार्यके उपादानरूपसे उसकी सिद्धि होती है। दूसरा विषयावरक अज्ञान पुरुषमें ‘इदमहं न जानामि’ (इसे मैं नहीं जानता) इस रूपसे अनुभूत होता है। पुरुषाश्रित अज्ञान विषयाश्रित सर्पादि विक्षेपका उपादान नहीं हो सकता और विषयाश्रित अज्ञानका प्रकाशरूप साक्षीके साथ संसर्ग नहीं हो सकता, अत: दोनों ही अज्ञान मानना उचित है। परोक्षज्ञानस्थलमें वृत्ति बाहर नहीं जाती, अत: दूरस्थ वृक्षोंमें आप्तवाक्यसे परिमाण-विशेषका ज्ञान होनेसे यद्यपि पुरुषगत अज्ञान निवृत्त हो जाता है तथापि विषयगत अज्ञान नहीं मिटता, अत: उनमें विपरीत परिमाण-भ्रम देखा जाता है। उपदेशके अनन्तर ‘शास्त्रार्थं न जानामि’ इत्याकारक अज्ञानकी निवृत्ति देखी ही जाती है। अन्य लोगोंका कहना है कि ‘जैसे नेत्रगत काचादि दोष विषयको आवृत करते हैं, वैसे ही पुरुषाश्रित अज्ञान ही विषयका आवरक होता है।’ वाचस्पतिमिश्रके मतानुसार ‘जीवाश्रित अज्ञानके विषयीभूत ब्रह्मका ही विवर्त्त सम्पूर्ण संसार है। जैसे दर्शकोंसे अविज्ञात मायावी ही अनेक मायिक प्रपंचके रूपमें प्रकट होता है, वैसे ही पुरुषसे अज्ञात शुक्तिकादिसे अवच्छिन्न ब्रह्म ही शुक्ति-रजतादिरूपमें विवर्जित होता है। परोक्षवृत्तिसे अज्ञानसम्बन्धी एक आवरणावस्थाकी निवृत्ति होनेपर भी विक्षेपरूप अवस्थान्तर अज्ञान बना रहता है।’ अन्य लोगोंका कहना है कि ‘शुक्ति-रजतादि परिणाम विषयगत अज्ञानका ही हो सकता है, अत: विषयको आवृत करनेवाले पटके समान विषयगत आवरण ही मानना ठीक है।’ कहा जा सकता है कि ‘इस तरह अज्ञानका साक्षीके साथ संसर्ग न होनेसे साक्षीके द्वारा उसका प्रकाश नहीं बन सकेगा और परोक्ष-वृत्तिसे विषयसंसर्ग न होनेसे उसकी निवृत्ति भी नहीं बनेगी।’ परंतु इसका समाधान यह है कि ‘शुक्तिमहं न जानामि’ यह मूलाज्ञान ही साक्षीसे संसृष्ट है। उसीका साक्षीसे भान होता है। शुक्तिविषयगत अज्ञान मूलाज्ञानका अवस्थाविशेष ही है। शुक्ति आदिका भी मूलाज्ञानके विषयभूत चैतन्यके साथ अभेद होनेसे शुक्तिविषयताका अनुभव उपपन्न हो जायगा। विवरणादिमें मूलाज्ञानके साधन-प्रसंगमें ‘इदमहं न जानामि’ इस रूपसे मूलाज्ञानमें प्रत्यक्ष-प्रमाणका उपन्यास किया गया है। ‘अहमज्ञ:’ इस प्रकार सामान्यतया अज्ञानका अनुभव मूलाज्ञानका अनुभव माना गया है। ‘शुक्तिमहं न जानामि’ इत्यादि विषय-विशेषके अज्ञानका अनुभव अवस्था-अज्ञानका ही अनुभव है। फिर भी अवस्था-अवस्थावान‍्का अभेद होनेसे मूलाज्ञानका साक्षिसंसर्ग होनेसे ही अवस्था-ज्ञानका भी भान बन जाता है अथवा विषयचैतन्य तथा साक्षिचैतन्य, दोनोंका अभेद होनेसे अवस्थाज्ञान भी साक्षिचैतन्यका विषय समझा जा सकता है। परोक्ष-ज्ञान यद्यपि विषयसंसर्ग न होनेसे अज्ञानका निवर्तक नहीं है, तथापि सत्ता निश्चय परोक्षवृत्त्यात्मक प्रतिबन्धके कारण अज्ञानके अनुभवकी भ्रान्ति होती है, अत: अपरोक्षज्ञान ही अज्ञानका निवर्तक होता है, परंतु अविद्या-अहंकार सुख-दु:खादि-विषयक अपरोक्षज्ञानमें भी अज्ञाननिवर्त्तकता नहीं होती; क्योंकि ये सब सदा ही साक्षिभाष्य होते हैं, कभी भी अज्ञात नहीं रहते। कूटस्थ, व्यापकचैतन्यसे वृत्तियाँ तथा वृत्तियोंका अभाव भासित होता है। अहंकार आदिका सदा ही साक्षिरूप प्रकाशसे संसर्ग रहता है, अत: वे सदा ही भासमान रहते हैं। अन्य ज्ञानधाराकालमें ‘अहम्’ भासित ही रहता है। अतएव ‘एतावन्तं कालमिदमहं पश्यन्नेवासम्’ (इतने कालतक मैं इसे देखता ही रहा) इस प्रकार अहंकारका अनुसंधान होता है। जैसे राहुका प्रकाश राहुसमावृत सूर्य-चन्द्रद्वारा ही होता है, वैसे ही अविद्याका प्रकाश अविद्यावृत साक्षिचेतनद्वारा ही होता है। साक्षीके नित्य होनेपर भी वृत्तिके नाशसे संस्कार और स्मृति हो सकेगी। अनवस्था-भयसे वृत्तिगोचर वृत्ति न माननेपर भी वृत्तिके नाशसे ही तद‍्गोचर संस्कार आदि उपपन्न होते हैं। सुख-दु:खादिके ही नाशसे तद‍्गोचर संस्कार बन सकेगा। साक्षिचैतन्य स्वत: नित्य होनेपर भी भास्य विशिष्टरूपसे अनित्य है, अत: भास्यके नाशसे तद्विशिष्ट चैतन्यका भी नाश होता है। उसीसे संस्कार, स्मृति आदि बन सकेंगे। अन्य लोग सौषुप्त अज्ञान-सुखादिग्राहक अविद्यावृत्तिके समान अहंकार-सुखादिको स्मृतिके लिये अविद्या-वृत्ति मानते हैं। उसीके नाशसे संस्कारादि बनते हैं। इस पक्षमें यह कहा जा सकता है कि ‘एतावन्तं कालमिदमहं पश्यन्नेवासम्’ (इतने समयतक मैं इसे देखता ही रहा) इस प्रकार विषयज्ञानधाराके साथ अहंकार-ज्ञानकी धारा कैसे बन सकेगी? परंतु यह कोई दोष नहीं है; क्योंकि ‘शिरसि मे दु:खं पादयोर्मे सुखम्’ (मेरे सिरमें दु:ख है, पैरमें सुख है) इस तरह जैसे अवच्छेदकके भेदसे ‘सुख-दु:खका यौगपद्य हो सकता है, वैसे ही अहमाकारवृत्ति और इदमाकारवृत्ति—दोनों ही एक साथ रह सकती हैं।’ कुछ लोग कहते हैं कि ‘अहमाकारवृत्ति अविद्या-वृत्ति नहीं है, किंतु उपास्तिके तुल्य मनोवृत्ति है, ज्ञान नहीं। ‘सोऽहं’ इस प्रत्यभिज्ञामें भी तदंशभूत स्मृति है, अहमंशमें ज्ञान नहीं है। अहमाकारवृत्ति ज्ञान इसलिये नहीं है कि ज्ञान करण चक्षु-श्रोत्रादि तथा लिंगादिसे जन्य नहीं है। मन स्वयं ज्ञानका उपादान है, वह करण नहीं हो सकता। जैसे ‘पर्वते वह्निमनुमिनोमि’ इस ज्ञानमें परोक्षता-अपरोक्षता दोनों होती है। ‘इदं रजतम्’ इस ज्ञानमें अंशभेदसे जैसे प्रमात्व-अप्रमात्व सम्भव है, वैसे ही ‘सोऽहं’ इस प्रत्यभिज्ञामें भी अंशभेदसे ज्ञानत्व-अज्ञानत्व (ज्ञानभिन्नत्व) भी सम्भव है। अन्य लोग मनको इन्द्रिय मानते हैं, अत: ‘मामहं जानामि’ इस प्रकारकी वृत्ति ज्ञान ही है, अतएव ब्रह्मविषयक अपरोक्षवृत्ति आवरणकी अभिभावक होती है। इस सम्बन्धमें भी विवाद यह है कि शुक्तिमें ‘इदं रजतम्’ ज्ञान होता है। यहाँ इदमाकार अपरोक्ष वृत्ति होती है, फिर भी इदमंशका आवरण अभिभूत नहीं होता। यदि ऐसा होता, तो शुक्तिमें रजतका अध्यास न होता।’ इसका कुछ लोग समाधान यह करते हैं कि ‘इदमाकारवृत्तिसे शुक्तीदमंशविषयक अज्ञान निवृत्त होता है, परंतु शुक्तित्व विशेषका अज्ञान निवृत्त नहीं होता। उसी अज्ञानसे रजतका भ्रम होता है; क्योंकि शुक्तित्वके अज्ञानसे ही रजतभ्रम होता है। शुक्तित्वज्ञानसे ही रजतभ्रम दूर होता है, अत: शुक्तित्वके अज्ञानसे ही अनिर्वचनीय रजतकी उत्पत्ति होती है। इसीलिये ‘इदं रजतम्’ इस भ्रममें इदमंशका स्फुरण होता है। रजतभ्रममें शुक्त्यंश अधिष्ठान है, इदमंश आधार है। सकार्य अज्ञानका विषय अधिष्ठान है। अतद्‍रूप भी तद्‍रूपसे आरोप्य बुद्धिमें स्फुरित होते हुए आधार कहा जाता है—‘संसिद्धा सविलासमोहविषये वस्तुन्यधिष्ठानगीर्नाधारेऽध्यसनस्य वस्तुनि ततोऽस्थाने महान् सम्भ्रम:।’ (संक्षेप शारीरक ३।२३९) अन्य लोगोंका मत है कि ‘इदमंशाज्ञान’ का ही परिणाम रजत है, अतएव ‘इदं रजतम्’ इस तरह ‘इदम्’ से संसृष्ट ही रजत प्रतीत होता है। इदमाकारवृत्तिसे आवरण शक्तिमात्रकी निवृत्ति होती है। फिर भी विक्षेप-शक्तिके साथ अज्ञान बना रहता है। वही कल्पित रजतका उपादान है। अधिष्ठान-साक्षात्कारसे अधिष्ठानाज्ञान निवृत्त हो जानेपर भी विक्षेप-शक्तिसहित अज्ञान ही जलप्रतिबिम्बित वृक्षका अधोऽग्रत्वाध्यास तथा जीवन्मुक्तिमें अनुवृत प्रपंचाध्यासका उपादान होता है। कुछ आचार्य कहते हैं कि ‘इदं रजतम्’ यह ज्ञान भ्रमात्मक है। इसमें इदमाकार-ज्ञान प्रमाणज्ञान नहीं है। ‘इदं रजतम्’ इस भ्रममें दो ज्ञानोंका अनुभव नहीं होता है, अतएव ‘इदं’ यह प्रमाज्ञान है, ‘रजतम्’ यह भ्रमात्मक ज्ञान है, परंतु यह पक्ष संगत नहीं है; क्योंकि सामान्य-विशेष संसर्गविषयक यहाँ एक ही ज्ञान है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि अधिष्ठान-सामान्यज्ञान अध्यासका कारण है, अत: अध्यास देखकर उसके कारणभूत इदंवृत्तिकी कल्पना करनी चाहिये; क्योंकि अधिष्ठान-सामान्यज्ञान अध्यासका हेतु है ही नहीं। कहा जा सकता है कि ‘अधिष्ठान-सम्प्रयोगके बिना प्रातिभासिक रजतकी उत्पत्ति नहीं होती। यही इदंवृत्तिके होनेमें प्रमाण है।’ परंतु यह ठीक नहीं है। इससे इतना ही सिद्ध होता है कि दुष्टेन्द्रिय-सम्प्रयोग ही अध्यासका कारण है। यह भी शंका होती है कि ‘इन्द्रिय-सम्प्रयोग सभी भ्रमोंमें कारण नहीं है; क्योंकि अहंकारके अध्यासमें इन्द्रिय-सम्प्रयोग अपेक्षित है ही नहीं। अत: अधिष्ठान-सामान्यज्ञानको ही अध्यासका हेतु मानना ठीक है। रजतादि अध्यासमें इन्द्रियसे शुक्तिके इदमंशका ज्ञान होता है। अहंकाराध्यासमें स्वत: प्रकाशमान प्रत्यगात्माका सामान्य-ज्ञान हेतु है।’ परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि घटादिके अध्यासमें अधिष्ठान सामान्यज्ञान नहीं होता है; क्योंकि घटादि प्रत्यक्ष होनेके पहले घटादिके अधिष्ठानभूत नीरूप ब्रह्ममात्र गोचर चाक्षुष वृत्तिका उत्पन्न होना असम्भव ही है। स्वरूप-प्रकाश तो आवृत ही रहता है। यदि कहा जाय कि ‘आवृत-अनावृत साधारण अधिष्ठान प्रकाशमात्र अध्यासका कारण है,’ तब तो शुक्तिके इदमंशसे इन्द्रिय-सम्प्रयोग हुए बिना भी आवृत शुक्त्यवच्छिन्न चैतन्य रहता ही है, अत: उस समय भी शुक्तिमें रजतका अध्यास होना चाहिये। यह भी नहीं कहा जा सकता कि ‘अध्यास-सामान्यमें अधिष्ठान-प्रकाश सामान्य हेतु है और प्रातिभासिक अध्यासमें अभिव्यक्त अधिष्ठान-प्रकाश हेतु है, इसलिये कहीं दोष न आयेगा। सामान्यमें सामान्य और विशेषमें विशेष हेतु होता ही है;’ क्योंकि ‘पीत: शङ्ख:, नीलं कूपजलम्’ इत्यादि प्रातिभासिक अध्यासोंमें भी अभिव्यक्त अधिष्ठानका प्रकाश नहीं होता है। रूपके बिना चाक्षुषज्ञान नहीं होता। शंखादिगत शुक्ल-रूपका उपलम्भ उस समय है ही नहीं। अध्यासके पहले नीरूप शंखादि गोचरवृत्ति असम्भव ही है। यदि यह माना जाय कि ‘प्रातिभासिक भ्रमोंमें भी रजतादि अध्यासोंमें ही अभिव्यक्त अधिष्ठान-प्रकाश हेतु है’ तो भी ठीक नहीं है; क्योंकि फिर भी ‘पीत: शङ्ख:’ इत्यादि स्थलोंमें दुष्टेन्द्रिय-सम्प्रयोगको हेतु कहना ही पड़ेगा। ऐसी स्थितिमें प्रातिभासिक अध्यासोंमें दुष्टेन्द्रिय-सम्प्रयोगको ही हेतु क्यों न माना जाय? इसीसे रजताध्यासके कादाचित्कत्वका भी निर्वाह हो जाता है। इसलिये यह नहीं कहा जा सकता कि सामान्यतया एवं विशेषतया अधिष्ठान-प्रकाश अध्यासका कारण है। फिर भी शंका होती है कि ‘सादृश्यनिरपेक्ष अध्यासोंमें अधिष्ठान-प्रकाश हेतु न भी हो, तो भी सादृश्यसापेक्ष रजतादि अध्यासमें रजतादि सादृश्यभूत भास्वररूप विशेषादिविशिष्ट धर्मिज्ञानको कारण मानना चाहिये। यदि दुष्टेन्द्रिय-सम्प्रयोगमात्रको अध्यासमें कारण कहा जाय, तब तो शुक्तिके तुल्य ही इंगाल (कोयला)-में भी रजतादिका अध्यास होना चाहिये।’ कुछ लोगोंका कहना है कि ‘सादृश्य भी विषयदोषरूपसे ही अध्यासमें कारण है।’ परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि वि-सदृशमें सादृश्यभ्रमसे भी अध्यास होता है, जैसे कि समुद्रजलमें दूरसे नील शिलातलका अध्यारोप होता है। कुछ लोग सादृश्य-ज्ञान-सामग्रीको ही अध्यासका कारण कहते हैं; परंतु ज्ञान-सामग्री ज्ञानका कारण हो सकती है, अर्थका कारण नहीं। अत: लाघवात् सादृश्य-ज्ञान ही अध्यासका कारण है। कुछ लोग कहते हैं कि ‘जैसे स्वत: शुभ्र रजतपात्रगत स्वच्छ जलमें ही नैल्याध्यास होता है, मुक्ताफलमें नैल्याध्यास नहीं होता, वैसे ही शुक्तिमें ही रजताध्यास होता है, इंगालादिमें नहीं। यह फल-बल-कल्प्य स्वभावभावविशेष ही व्यवस्थाका कारण है। सादृश्य-ज्ञानका होना-न-होना हेतु नहीं है।’ परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि स्वत: पटखण्डमें कमल-कुड्मल आदिका अध्यास यद्यपि नहीं होता, तथापि कर्तनादिके द्वारा कमलाकार सम्पन्न होनेपर उसी कर्तनादिद्वारा कमलाकारघटित पटखण्डमें कमलका अध्यास देखा जाता है। यहाँ वस्तुस्वभावानपेक्षसादृश्यज्ञान ही अन्वयव्यतिरेकसे अध्यासका हेतु निश्चित होता है, अन्यथा कमलाकाररहित पटखण्डमें भी कमलका भ्रम होना चाहिये। इसपर भी कुछ लोग कहते हैं कि ‘सादृश्य-ज्ञानको यदि अध्यासमें कारण माना जाय तो भी विशेष दर्शनप्रतिबध्य रजतादि अध्यासोंमें ही उसे कारण मानना ठीक है।’ ‘पीत: शङ्ख:’ इत्यादि विशेष दर्शनसे अप्रतिबध्य स्थलोंमें सादृश्य-ज्ञान सम्भव ही नहीं है। विशेष दर्शनसे प्रतिबध्य शुक्ति रजतादि स्थलोंमें प्रतिबन्धक ज्ञान-सामग्रीको प्रतिबन्धक माननेका नियम है। इस दृष्टिसे विशेष दर्शन सामग्रीको अवश्य प्रतिबन्धक कहना पड़ेगा। इसीसे सब व्यवस्था बन सकती है। फिर सादृश्य-ज्ञानको अध्यासका कारण क्यों माना जाय? इंगालादिके चक्षु:सम्प्रयुक्त होनेपर उसमें नैल्यादिरूप विशेष दर्शन सामग्री होनेसे रजतादि अध्यास नहीं होता। शुक्ति आदिमें भी यदि नीलपृष्ठत्वादिके साथ चक्षु:सम्प्रयोग होता है तो विशेष दर्शन-सामग्री होनेसे रजताध्यास नहीं होता। सदृशभागमात्रका सम्प्रयोग होनेसे विशेष दर्शन-सामग्री न होनेके कारण अध्यास होता है। कहा जा सकता है कि ‘उस समय भी शुक्तित्वरूप विशेष दर्शनकी सामग्री तो है ही, फिर अध्यास क्यों नहीं होता?’ परंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि अध्यास-समयमें भी शुक्तित्व-दर्शनाभावसे तत्सामग्रॺभाव आपको भी मानना ही पड़ेगा। यदि सादृश्य-ज्ञानरूप अध्यास कारणदोषसे प्रतिबन्धके कारण शुक्तित्व-दर्शन-सामग्रॺभाव मान्य है, तब तो घट्टकुटीप्रभातन्यायसे सादृश्य-ज्ञानको अध्यासका कारण मानना ही पड़ा। इसपर दूसरे पक्षका कहना है कि रजताध्याससे समीप आनेपर शुक्तिमें रजतसादृश्यरूप चाकचिक्यके दृश्यमान रहनेपर ही शुक्तित्वका उपलम्भ होता है। इससे सादृश्य-ज्ञान शुक्तित्वरूप विशेष दर्शनकी सामग्रीका प्रतिबन्धक सिद्ध नहीं हुआ। अत: दूरत्वादि दोषोंसे प्रतिबद्ध होनेसे अथवा शुक्तित्व-व्यंजक नीलपृष्ठत्वादिग्राहक मानाभावसे विशेष दर्शन-सामग्रीका अभाव मानना पड़ेगा। इसी तरह दूरस्थ समुद्र-जलमें नीलशिलात्वका आरोप हो सकता है; क्योंकि वहाँपर नियत नीलरूपाध्यासके प्रयोजक दोषसे दूरत्वके कारण नीरत्व-व्यंजक तरंगादिग्राहक साधनके सन्निहित न होनेसे शुक्लरूप, जलराशित्व आदि विशेषोंके दर्शनकी सामग्रीका अभाव है। विस्तृत वस्त्रमें परिणाहादिरूप विशेष-दर्शनकी सामग्री होनेसे कमलत्वादिका अध्यास नहीं होता है। कर्त्तनादिद्वारा कमलाकारसम्पन्न पटमें विशेष दर्शन-सामग्री न होनेसे कमलत्वादि अध्यास हो जाता है। एक शंका यह भी होती है कि ‘अध्यासमें यदि सादृश्य-ज्ञानकी अपेक्षा न हो तो करस्पृष्ट लौहखण्डमें उसके नीलरूपकी ग्राहक विशेष दर्शन-सामग्री न होनेसे रजताध्यास क्यों नहीं होता?’ परंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि ऐसे स्थलोंमें रजताध्यास होता ही है। हाँ, ताम्रादिव्यावर्त्तक विशेष सामग्री न होनेसे ताम्रादि अध्यास भी होता है, कहीं अनेक अध्यास होनेसे अध्यस्तमें संशय भी होता है। ‘ताम्र है या रजत है’ इत्यादि कहीं रजतप्राय वस्तुपूर्ण कोषगृहादि लौहशकलमें रजतहीका अध्यास होता है। कहीं सादृश्य-ज्ञान रहनेपर भी करणदोष न रहनेसे शुक्तिमें रजताध्यास नहीं होता। वैसे ही कभी अध्यास न भी हो तो भी कोई दोष नहीं। अत: कार्यकल्प्य इदमाकारवृत्ति आवश्यक नहीं है। फिर ‘इदमाकारवृत्ति आवरणभंग करती है या नहीं’ इत्यादि विचार व्यर्थ है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि ‘अप्रतिबद्ध इदमर्थ-सम्प्रयोगरूप कारणसे भी इदमाकारवृत्तिकी कल्पना होगी’ क्योंकि इदमर्थ-सम्प्रयोगरूप कारणसे उत्पन्न होती हुई इदंवृत्तिका दुष्टेन्द्रिय-सम्प्रयोगसे क्षुभित अविद्याके परिणामभूत इदंवृत्तिके समकाल उत्पन्न रजत ही विषय होता है। वहीं प्रातिभासिक रजत दोषयुक्त चक्षुसे गृहीत होता है। कहा जा सकता है कि चक्षुसे रजतका सम्प्रयोग हुए बिना रजत चाक्षुष नहीं हो सकता। दुष्टेन्द्रिय-सम्प्रयोगजन्य रजत इदंवृत्तिके समकाल नहीं हो सकता; क्योंकि ज्ञान-कारण इन्द्रिय-सम्प्रयोगसे ज्ञान ही उत्पन्न हो सकता है। रजत तो अर्थ है, उसकी उत्पत्ति कैसे हो सकती है? अत: इदंवृत्तिके अनन्तर तज्जन्य तदभिव्यक्त साक्षीमें ही रजतका अध्यास होता है, इसलिये साक्षीसे ही रजतका भान होता है। रजतमें चाक्षुषत्वका अनुभव इसलिये होता है कि स्वभासक चैतन्यव्यंजक इदंवृत्तिका चक्षु जनक है, अत: परम्परासे चक्षुर्जन्य होनेके कारण चाक्षुषत्वका अनुभव होता है। इस पक्षमें अन्य लोग यह दोष देते हैं कि ‘इस तरह तो पीत शंखभ्रममें चक्षुकी अपेक्षा न होनी चाहिये; क्योंकि रूपके बिना केवल शंख चक्षुसे ग्राह्य हो नहीं सकता। पीतिमा ग्रहणके लिये भी चक्षु अनावश्यक है; क्योंकि साक्षिभास्यत्वपक्षमें आरोप्य ऐन्द्रियक मान्य नहीं होता।’ यह भी नहीं कहा जा सकता कि ‘पीतिमाका स्वरूपाध्यास नहीं होता, अपितु नयनगत पित्तकी पीतिमा ही अनुभूयमान होती है। उसका केवल शंख-संसर्ग ही अध्यस्त होता है, इसलिये उसी पीतिमाके अनुभवार्थ चक्षुकी अपेक्षा होती है।’ कारण इस स्थितिमें तो शंख और पीतिमाका संसर्ग प्रत्यक्ष नहीं होना चाहिये; क्योंकि नयनप्रदेशगत पित्तकी पीतिमाकारवृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यके साथ शंख और पीतिमाके संसर्गका सम्बन्ध ही नहीं है, अत: वे साक्षिभास्य नहीं हो सकते। पीतिमासे संसृष्ट शंखगोचर एकवृत्ति स्वीकृत नहीं है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि ‘नयनप्रदेशस्थित पित्तकी पीतिमाके दोषसे शंखमें संसर्गाध्यास नहीं होता, किंतु नयनरश्मियोंसे निर्गत विषयव्यापी पित्त द्रव्यकी पीतिमाका ही संसर्गाध्यास होता है। जैसे रक्त रंगसे व्याप्त घटमें अनुभूयमान रक्तरूपके संसर्गका भान होता है। अत: पित्त पीतिमाकारवृत्तिसे शंखदेशमें चैतन्यकी अभिव्यक्ति होनेसे शंखपित्तपीतिमाका अपरोक्ष अनुभव हो सकता है, परंतु उक्त कथन इसलिये ठीक नहीं है कि फिर तो जैसे सुवर्णलिप्त घटादिमें अन्य लोगोंको भी पीतिमाका अनुभव होता है, वैसे ही शंखमें लिप्त पित्तकी पीतिमाका अनुभव अन्य लोगोंको भी होना चाहिये।’ कुछ लोग कहते हैं कि ‘समीपमें गृहीत होकर ही पीतिमा दूरगृहीत होती है। जैसे दूर आकाशमें उड़ते हुए पक्षीका तभी दर्शन होता है, जब उसका समीपमें दर्शन हुआ हो, परंतु अन्य नयनगत पित्तद्रव्यकी पीतिमा अन्यको समीपसे गृहीत नहीं होती, अत: उसे शंखव्यापी पित्तकी पीतिमा भी गृहीत नहीं होती।’ परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि पित्तरोगवाले मनुष्यके चक्षुके समीप चक्षु रखनेसे पीतिमा-सामीप्य तो है ही; फिर उसका ग्रहण अन्य लोगोंको होना ही चाहिये। इसी तरह अतिधवल बालुकामय तलमें बहनेवाली स्वच्छ नदीके जलमें नीलत्वके अध्यासमें तथा गगनमें नीलत्वके अध्यासमें एवं चाँदनीमें स्थित रक्त वस्त्रके नैल्याध्यासमें अनुभूयमान आरोपका निरूपण नहीं हो सकता। यदि यहाँ नैल्यसंसृष्ट तादृग् जल या गगनादि-अधिष्ठान-गोचर चाक्षुषवृत्ति स्वीकार नहीं की जायगी, तब तो चक्षुका अनुपयोग दुष्परिहार्य ही होगा। ‘पंचपादिका’ कारकी दृष्टिमें जिस बालकने इस जन्ममें तिक्तरसका अनुभव नहीं किया है, उसे मधुर दुग्धमें तिक्तताकी प्रतीति जन्मान्तरीय अनुभवजन्य संस्कारसे होनी मान्य है। इससे स्वरूपत: अध्यस्त तिक्तरसका रसनासे ही अनुभव मानना स्पष्ट है, अन्यथा रसना-व्यापारके बिना भी तिक्तताकी प्रतीति होनी चाहिये। अत: पूर्वोक्त नीलता-अध्यासस्थलोंमें भी अधिष्ठानसम्प्रयोगसे तद्विषयक चाक्षुषवृत्तिका उदय होता है और उसी समय नीलताका अध्यास होता है। वही अध्यस्त नीलता उस वृत्तिका विषय होती है, अत: वह भी चाक्षुष ही है; क्योंकि रूपके बिना गगनादि अधिष्ठानोंमें चाक्षुषवृत्ति हो नहीं सकती। अत: अधिष्ठानावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति न होनेसे अध्यस्तनीलता अधिष्ठानचैतन्यसे भास्य नहीं हो सकती। तिक्त-रसस्थलोंमें तो अध्यस्त एवं अधिष्ठान दोनों ही एक रसनेन्द्रियग्राह्य नहीं हैं।’ त्वक् इन्द्रियसे मधुर दुग्धरूप अधिष्ठानगोचरवृत्ति उत्पन्न होती है। उस वृत्तिसे अधिष्ठान-चैतन्यकी अभिव्यक्ति होनेसे पित्तोपहत रसनाका सम्प्रयोग होता है, उसी चैतन्यमें तिक्तरसका अध्यास होता है। उसी समय अध्यस्त रसविषयक रासनवृत्ति उत्पन्न होती है। त्वगिन्द्रियजन्य अधिष्ठानगोचरवृत्तिमें अभिव्यक्त चैतन्यसे भास्य तिक्तरसमें यदि परम्परासे भी रसनाका उपयोग न होगा तो रासनत्वानुभवका समर्थन किसी भी तरह नहीं होगा। इसी तरह रजतके भी चाक्षुषत्वकी उत्पत्ति हो सकती है। अतएव ‘चक्षुषा रजतं पश्यामि’ (नेत्रसे रजत देखता हूँ) यह अनुभव होता है। कहा जा सकता है कि ‘चक्षुसे रजतका सन्निकर्ष हुए बिना ही यदि रजतमें चाक्षुषत्व हो, तब तो प्रत्यक्ष रजतमें विषयेन्द्रिय-सन्निकर्ष कारण है, द्रव्य-प्रत्यक्षमें द्रव्येन्द्रिय-संयोग कारण है। रजत-प्रत्यक्षमें रजतेन्द्रिय-संयोग कारण है, इत्यादि कार्य-कारणभाव भंग होगा,’ परंतु यह कोई दोष न होगा। सन्निकर्ष, संयोगादि कोई एक कारण अनुगत नहीं है, अत: प्रथम नियम नहीं बनता। नैयायिकोंके मतमें संयोगायोग्य तमरूप अद्रव्यमें भी द्रव्यत्वका अध्यास होता है और संयोगायोग्य गुणादिमें भी द्रव्यत्वका अध्यास होता है, अत: द्वितीय नियमका अभिप्राय यह है कि व्यावहारिक द्रव्यत्वाधिकरणके प्रत्यक्षमें इन्द्रियसंयोग कारण है, अत: प्रातिभासिक रजतमें तो अधिष्ठानगत इदंत्वके समान ही अधिष्ठानगत द्रव्यत्वका भी आरोप ही होता है। इसलिये प्रातिभासिक द्रव्यत्वाधिकरण रजतके इन्द्रियसंयोगके बिना भी प्रत्यक्ष होनेमें कोई हानि नहीं है। अतएव तृतीय नियमका भी कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। जहाँ बीज-सामान्यका अंकुर सामान्यके साथ कार्य-कारणभाव माननेपर बीजान्तरसे अंकुरान्तरकी उत्पत्तिका प्रसंग होता है, वही विशिष्ट कार्य-कारणभाव मानना आवश्यक होता है। प्रकृतमें वह सर्वथा व्यर्थ है। कहा जा सकता है कि ‘द्रव्यप्रत्यक्षमें द्रव्य-संयोग कारण है, यह सामान्य नियममात्र माननेसे अन्य द्रव्यसंयोगसे अन्य द्रव्य-प्रत्यक्ष होने लगेगा।’ परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि तत्तद्‍द्रव्यके प्रत्यक्षमें तत्तद्‍द्रव्यसंयोग कारण है, ऐसा माननेपर कोई अतिप्रसंग नहीं होता। अन्यथा अन्य रजतसंयोगसे अन्य रजतका प्रत्यक्ष होनेका अतिप्रसंग भी अनिवार्य ही होगा। इसके अतिरिक्त ‘इदं रजतं पश्यामि, नीलं जलं पश्यामि, नीलं गगनं पश्यामि’ इत्यादि अनन्यथासिद्ध अनुभवोंमें ‘प्रत्यक्षमात्रमें विषय-सन्निकर्ष कारण है’ इत्यादि नियमोंका व्यावहारिक विषयमें ही संकोच करना चाहिये। कहा जा सकता है कि ‘इस तरह तो यही कहना ठीक है कि प्रमामें सन्निकर्ष कारण है, भ्रममें नहीं, यह भी संकोच कल्पना हो सकती है। फिर तो असन्निकृष्ट देशान्तरस्थ रजतादिका भी भ्रम हो सकता है। इस तरह अन्यथाख्यातिका प्रसंग होगा।’ परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि अभिव्यक्त चैतन्यका सम्बन्ध हुए बिना देशान्तरस्थ रजतकी अपरोक्षता नहीं बन सकती। रजतप्रतीति और बाध, दोनों ही बातोंमें भ्रमविषयक अनिर्वचनीय रजतको स्वीकार किये बिना काम नहीं चल सकता। कहा जा सकता है कि ‘अधिष्ठान-सम्प्रयोगमात्रसे यदि प्रातिभासिक रजतको ऐन्द्रियक माना जायगा, तब तो शुक्ति-रजताध्यास-समयमें ही वही कालान्तरमें अध्यसनीय रंग (राँगा)-का भी चाक्षुषत्व होना चाहिये, परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि रजताध्यास-समयमें रंग-रजतसाधारण चाकचिक्य दिखलायी पड़नेपर भी जिस राँगादिरूप दोषके अभावसे वहाँ रंगाध्यास नहीं होता, उसीके कारण रंगादिविषयक वृत्ति भी उत्पन्न नहीं होती। रजतमें राँगादि होता है, इसीलिये रजताध्यास एवं रजताकारवृत्ति उत्पन्न होती है। अत: इदमंशयुक्त रजताकार एक ही वृत्ति इन्द्रियजन्य उत्पन्न होती है। उसके पहले इदमाकारवृत्ति नहीं होती, परंतु अन्य लोगोंका मत है कि ‘इदमाकारवृत्ति’ एक ही होती है। वही अध्यासके प्रति कारण है। अध्यस्त रजतादिका उस वृत्तिसे अभिव्यक्त साक्षिचैतन्यसे भान होता है। अत: रजताकारवृत्ति निरर्थक है।’ अन्य लोगोंके मतानुसार ‘इदमाकार सामान्य-ज्ञानरूपिणी एक ही वृत्ति होती है। इदं एवं रजतके तादात्म्यगोचरवृत्ति दूसरी होती है। अत: दो ज्ञान ही मान्य होना ठीक है।’ अन्य लोगोंका मत है कि ‘जैसे इदमंशावच्छिन्न चैतन्यस्थ अविद्या रजतज्ञानाभासरूपसे परिणत होती है, इदंवृत्तिके तुल्य रजतज्ञान अनध्यस्त नहीं है, जैसे रजतमें अधिष्ठानगत इदंताके संसर्गका भान होता है, वैसे ही रजतज्ञानमें अधिष्ठानगत इदंत्व-विषयत्व संसर्गका भान हो सकता है। अत: ‘इदं रजतम्’ यह द्वितीय ज्ञान इदंविषयक नहीं कहा जा सकता।’ कहा जा सकता है कि ‘साक्षिचैतन्यसे ही सब पदार्थोंका भान हो सकता है, वृत्तिकी क्या आवश्यकता है? यदि घटादिविषयक संस्कारके लिये वृत्ति आवश्यक भी हो, तो भी उसका निर्गम अनावश्यक है। परोक्षस्थलके समान ही अनिर्गत वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्यसे ही घटादिका प्रकाश हो ही सकता है। फिर भी परोक्ष-अपरोक्षकी विलक्षणता वैसे ही उत्पन्न हो सकेगी, जैसे परोक्षमें भी शाब्द एवं अनुमितिमें करणविशेषप्रयुक्त-वृत्तिसे विलक्षणता सम्पन्न हो जाती है।’ अन्य लोगोंके अनुसार ‘प्रत्यक्ष-स्थलमें विषयावच्छिन्न चैतन्य ही विषयप्रकाश होता है, अत: विषय-चैतन्यकी अभिव्यक्तिके लिये वृत्ति-निर्गम आवश्यक है। परोक्ष-स्थलमें व्यवहित वन्ध्यादिके साथ वृत्ति-संसर्ग नहीं होता, वहाँ इन्द्रियोंके समान वृत्ति-निर्गमका द्वार उपलब्ध नहीं होता, अत: अगत्या अनिर्गत वृत्त्यवच्छिन्न चैतन्य ही स्वरूपसम्बन्धसे विषय-प्रकाश माना जाता है।’ अन्य लोगोंके मतानुसार जैसे साक्षात् चैतन्यसंसर्गी अहंकार तथा सुख-दु:खादिका चैतन्यसे प्रकाश होता है, वैसे ही विषयसंसृष्ट चैतन्य ही अपरोक्षताका हेतु है। अत: विषयचैतन्यकी अभिव्यक्तिके लिये वृत्ति-चैतन्य आवश्यक है। अन्य लोगोंका कहना है कि ‘शब्दानुमानावगत विषयोंकी अपेक्षा प्रत्यक्षावगत विषयकी स्पष्टता अनुभूत होती है। रसालके सौगन्ध्य-माधुर्यादिकी हजारों शब्दानुमानोंसे भी उतनी स्पष्टता नहीं होती, जितनी रासन, घ्राणजादि प्रत्यक्ष-ज्ञानसे होती है; क्योंकि प्रत्यक्षके बिना रसालका माधुर्य-सौगन्ध्य कैसा है, यह जिज्ञासा बनी ही रहती है। अत: प्रत्यक्ष ग्राह्य पदार्थ अभिव्यक्त अपरोक्ष-चैतन्यसे अवगुण्ठित होता है, इसलिये उसकी स्पष्टताविषयक जिज्ञासा प्रशान्त हो जाती है। शब्दसे रसालकी मधुरता आदिका ज्ञान होनेपर भी तद‍्गत माधुर्यादि वृत्ति अवान्तर जातिका बोध नहीं होता। इसीलिये साक्षिवेद्य सुखादि भी स्पष्ट हैं। शब्दवृत्तिवेद्य ब्रह्म भी मननादिके पहले अस्पष्ट होता है। मननादिसे जब पूर्ण अज्ञान मिटता है, तब स्पष्टता होती है।’ इसपर भी कुछ लोग कहते हैं कि ‘विषयावच्छिन्न चैतन्यगत आवरक अज्ञान अनिर्गतवृत्तिसे नष्ट हो सकेगा और कहीं अतिप्रसंग भी नहीं होगा।’ कहा जा सकता है कि ‘समानविषयक होनेसे देवदत्तके घटज्ञानसे यज्ञदत्तके घटाज्ञानकी निवृत्ति होनी चाहिये। अहमर्थ एवं विषयचैतन्यमें रहनेवाले ज्ञान-अज्ञानका भिन्नाश्रय होनेपर भी विरोध होगा ही; क्योंकि समानाश्रयता विरोधका प्रयोजक नहीं।’ परंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि समानाश्रयविषयत्वको ज्ञानाज्ञानके विरोधका प्रयोजक मानकर वृत्ति-निर्गम माननेपर भी देवदत्तीय घटज्ञान एवं यज्ञदत्तीय घटाज्ञान दोनों ही एक घटावच्छिन्न चैतन्यको आश्रय करते हैं, अत: अतिप्रसंग होगा ही। इसलिये कहना पड़ेगा कि ‘विशिष्ट विरोधप्रयोजक जो अज्ञान जिस पुरुषके प्रति जिस विषयका आवरण करता है, वही अज्ञान तद्विषयक ज्ञानसे निवृत्त होता है। फिर समानाश्रयता अपेक्षित नहीं है। दूसरे लोग उपर्युक्त पक्षको असंगत कहते हैं। उनके अनुसार ‘वृत्ति-निर्गम अंगीकार किये बिना ज्ञान एवं अज्ञानके विरोधका कोई भी प्रयोजक निश्चित नहीं हो सकेगा।’ कोई लोग विषयगत अज्ञानकी निवृत्तिके लिये वृत्तिका निर्गम आवश्यक समझते हैं। कुछ लोग चिदुपरागार्थ अर्थात् चैतन्यके साथ सम्बन्धके लिये वृत्ति-निर्गम आवश्यक समझते हैं और कई लोग अभेदकी अभिव्यक्तिके लिये वृत्ति-निर्गम आवश्यक समझते हैं।’ ‘तत्त्वशुद्धि’ कारका कहना है कि ‘प्रत्यक्ष-प्रमाण न तो घटपटादिको ग्रहण ही करता है और न उनका सत्त्व ही ग्रहण करता है। किंतु वह (प्रत्यक्ष-प्रमाण) अधिष्ठानरूपसे घटादि-अनुगत सन्मात्रको ही ग्रहण करता है। ‘सत् ही प्रत्यक्ष-प्रमाणका विषय है, घटादिका प्रत्यक्ष नहीं होता। जैसे भ्रममें अधिष्ठानका इदमंश ही प्रत्यक्षसे ग्रहण होता है, इन्द्रियोंका अन्वय-व्यतिरेक इदमंशके प्रत्यक्षमें ही उपक्षीण हो जाता है, आरोपित रजतांशका प्रतिभास भ्रान्तिसे होता है, वैसे सन्मात्रका प्रत्यक्षसे ग्रहण होता है। उसीमें इन्द्रियका व्यापार सार्थक है। घटादि-भेद प्रतिभास, भ्रान्तिसे ही होता है।’ कहा जा सकता है कि ‘रजतादिकी तरह घटादिका बाध नहीं होता, अत: घटादि-प्रतिभासको भ्रान्ति मानना निर्मूल है।’ परंतु यह ठीक नहीं। बाधदृष्टि न होनेपर भी देशकालव्यवहित वस्तुके समान घटादिभेद वस्तु प्रत्यक्षके अयोग्य है, अत: उनका प्रतिभास भ्रान्ति है। इन्द्रिय-व्यापारके अनन्तर प्रतीयमान घट स्वभिन्न समस्त पदार्थोंसे भिन्न ही प्रतीत होता है। घटादि सर्वभिन्नरूपसे असंदिग्ध, अविपर्यस्तरूपसे प्रतीत होते हैं। भेद-ग्रह प्रतियोगिग्रह-सापेक्ष होता है, परंतु देश, काल-व्यवधानसे असन्निकृष्ट प्रतियोगियोंका प्रत्यक्षसे ग्रहण नहीं हो सकता। जो लोग कहते हैं कि ‘भेदज्ञान प्रतियोगि-अंशमें संस्कारकी वैसे ही अपेक्षा करता है, जैसे प्रत्यभिज्ञान तत्तांशमें संस्कारकी अपेक्षा करता है।’ परंतु यहाँ तो प्रतियोगि-अंशमें स्मृति भी सम्भव नहीं है। कहा जाता है कि ‘वस्तुभेद होनेसे कनकाचल भेदका प्रतियोगी है—इस तरहके अनुमानसे प्रतियोगि-सम्बन्धगोचर संस्कार सम्भव है।’ परंतु यह भी ठीक नहीं है। भेदज्ञानके बिना अनुमिति भी नहीं होगी। अनुमिति तभी हो सकती है, जब पक्ष, साध्य, हेतुका भेद ज्ञात हो। पक्षादि-भेदज्ञान तभी हो सकता है, जब अनुमिति हो, इस तरह आत्माश्रय दोष होता है। अत: भेदगत प्रतियोगि-सम्बन्धका भान नहीं हो सकता। पक्षादिके अभेद-भ्रम निराकरणके लिये भेदज्ञान आवश्यक है। सम्बन्धिद्वयका प्रत्यक्ष हुए बिना सम्बन्धका प्रत्यक्ष नहीं होता। प्रतियोगीका प्रत्यक्ष हुए बिना प्रतियोगि-विशिष्ट भेदका प्रत्यक्ष नहीं होता। प्रत्यक्षायोग्य प्रतियोगीका प्रतिभान भ्रान्तिरूप ही है। फिर उसी ज्ञानमें भासित भेद एवं भेदविशिष्ट घटादि भी उसी भ्रममें भासित होते हैं, अत: निर्विशेष सन्मात्र ही भासित होते हैं।’&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt; और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>ज्ञानसिद्धान्त</category><category>धर्मसम्राट</category><category>भारतीयदर्शन</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>11.8 स्वतन्त्रताका अवबोध ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/11-8-svtntrtaakaa-avbodh-maar/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/11-8-svtntrtaakaa-avbodh-maar/</guid><description>11.8 स्वतन्त्रताका अवबोध मार्क्सवादी कहते हैं कि ‘जनता जन्मत: ही स्वतन्त्र नहीं उत्पन्न होती, परंतु शनै:-शनै: स्वतन्त्रता उपार्जित कर लेती है। स्वतन्त्रता प्रकृतिपर प्रभुत्व प्राप्त करनेके लिये कि…</description><pubDate>Tue, 08 Jul 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;11.8 स्वतन्त्रताका अवबोध&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt;ी कहते हैं कि ‘जनता जन्मत: ही स्वतन्त्र नहीं उत्पन्न होती, परंतु शनै:-शनै: स्वतन्त्रता उपार्जित कर लेती है। स्वतन्त्रता प्रकृतिपर प्रभुत्व प्राप्त करनेके लिये किये जानेवाले संघर्ष एवं वर्गसंघर्षद्वारा उपार्जित एवं विकसित की जाती है। समाजमें विभिन्न वर्गोंद्वारा वस्तुत: उपार्जित एवं अधिकृत स्वतन्त्रता एवं उस स्वतन्त्रताके बन्धन तत्तद्वर्गोंकी स्थिति एवं उद्देश्योंके अनुसार स्थूलत: एवं स्पष्टत: विभिन्न होते हैं। साररूपमें, स्वतन्त्रताका संघर्ष जनताका अपनी निजी आवश्यकताओंकी पूर्ति या सन्तुष्टि करनेमें समर्थ हो जानेका संघर्ष है। मनुष्यजाति पशुस्थितिसे उठकर स्वतन्त्रताके अवबोधके उस राजमार्गपर अनवरत गतिसे प्रगति कर रही है, जो कि वर्गवादी समाजकी ओर ले जाता है। स्वतन्त्रताके विकासकी सीढ़ियाँ नैतिकता (चरित्र या सदाचार) के विकासकी भी सीढ़ियाँ हैं।’ पर स्वतन्त्रताका अवबोध भौतिकवादमें सम्भव ही नहीं। मनुष्य स्वतन्त्रताका उपार्जन करता है, फिर भी प्रभुत्व प्राप्त करना चाहता है, शासनशक्ति प्राप्त करना चाहता है। पराधीनताराहित्य ही स्वतन्त्रता है। यह देहधारी पराधीन जीवके लिये सापेक्ष ही होती है। यों तो बकरीके गलेसे रस्सी खुल जानेपर बकरी भी स्वतन्त्र कही जा सकती है, परंतु यह स्वतन्त्रता कितनी है? बहुत छोटी-सी मंजिल है। वस्तुत: देह-इन्द्रिय-मन-बुद्धि आदि कार्यकारण-संघटन-सम्पर्कजनित आत्मनिष्ठ पारतन्त्र्यकी निवृत्ति ही स्वतन्त्रता है। तदर्थ ही विविध क्रियाओं एवं ज्ञानोंकी आवश्यकता होती है। आत्मा नित्य अखण्ड बोधरूप है। उसमें ही अनात्माका अध्यास एवं तन्मूलक ही भ्रमात्मक बन्धन होता है। क्रियाओं, ज्ञानों एवं अन्तिम परम तत्त्व-विज्ञानसे इस बन्धनकी पूर्णतया निवृत्ति होती है, उसे ही मोक्ष कहा जाता है। उसके पहले भी जिसमें जितना अधिकाधिक ज्ञान-क्रिया-शक्ति व्यक्त होती है, उतनी ही उसमें स्वतन्त्रता एवं शासनशक्ति व्यक्त होती है। संघर्ष जब विजयका जनक होता है, तब स्वतन्त्रता एवं शासन-शक्तिका कारण बनता है। जब पराजयका कारण होता है, तब परतन्त्रताका भी कारण होता है। मार्क्सवादका ‘वर्गसंघर्ष’ तो काकतालीयन्यायसे कहीं ही स्वतन्त्रताका कारण हो सकता है, अन्यथा तो अनर्थका ही कारण होता है, वस्तुत: वर्गसंघर्ष मिटाकर वर्गप्रेम फैलाकर एक वर्गको दूसरे वर्गका पोषक बनानेसे ही अधिकांशमें अनर्थ-निवृत्ति एवं स्वतन्त्रता-प्राप्ति होती है। समन्वय-सामंजस्यकी स्थापनासे ही निराकुल समाज स्वधर्मनिष्ठा तथा उपासनाके द्वारा मनकी एकाग्रताका सम्पादन करके श्रवण-मनन-निदिध्यासन-क्रमसे परम तत्त्वका साक्षात्कार करके सर्वबन्धनविमुक्त होकर पूर्ण स्वतन्त्रता भी प्राप्त कर सकता है। आवश्यकताओंकी पूर्ति एवं सन्तुष्टि भी विचार एवं संयमसे ही हो सकती है, केवल संघर्षसे नहीं। जैसे घृतकी आहुतिसे अग्निका प्रज्वलन बढ़ता ही जाता है, उसी तरह वस्तुओंकी प्राप्ति एवं संघर्षसे भी उत्तरोत्तर असन्तुष्टि बढ़ती जाती है। तृष्णा—कामनाका कभी अन्त नहीं होता। ‘जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई’ के अनुसार जैसे-जैसे लाभ बढ़ता है, वैसे-वैसे तृष्णा भी बढ़ती है— न जातु काम: कामानामुपभोगेन शाम्यति। हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते॥ (मनु० २।९४; विष्णुपु० ४।१०।२३; लिङ्गपु० ६७।१७; महा० १।७५।५७) अभीष्ट पदार्थोंके उपभोगसे काम कभी भी प्रशान्त नहीं होता; अपितु घृताहुतिसे अग्नि-ज्वालाके समान वह उत्तरोत्तर बढ़ता ही जाता है। &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;के अनुसार संघर्षके स्थानपर समन्वय अपनानेसे ही सर्वत्र सुख-शान्ति सम्भव होती है— सब नर करहिं परस्पर प्रीती। चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और रामराज्य, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट नि&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;न : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>अवबोध</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>धर्मसम्राट</category><category>नागरिकस्वतन्त्रता</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>11.7 आवश्यकता एवं स्वतन्त्रता ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/11-7-aavshyktaa-evn-svtntrt/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/11-7-aavshyktaa-evn-svtntrt/</guid><description>11.7 आवश्यकता एवं स्वतन्त्रता ‘युक्तिपूर्ण या उपपत्त्यात्मक ज्ञान वस्तुओंकी ‘आवश्यकताओं’ का उद्घाटन करता है और यह भी बतलाया है कि आवश्यकका महत्त्व सर्वदा काकतालीय (ऐक्सिडेण्टल)-से ही विदित होता है…</description><pubDate>Mon, 07 Jul 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;11.7 आवश्यकता एवं स्वतन्त्रता&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;‘युक्तिपूर्ण या उपपत्त्यात्मक ज्ञान वस्तुओंकी ‘आवश्यकताओं’ का उद्घाटन करता है और यह भी बतलाया है कि आवश्यकका महत्त्व सर्वदा काकतालीय (ऐक्सिडेण्टल)-से ही विदित होता है। ज्ञानकी प्राप्ति (acquisition) से हमें स्वतन्त्रता मिलती है, जो आवश्यकताके ज्ञानपर आधारित आत्मनियन्त्रण एवं बाह्यप्रकृति-नियन्त्रणके ही रूपमें हैं। हम उस समय स्वतन्त्र हैं, जब ज्ञानके आधारपर निश्चित करते हैं कि ‘क्या करें’ और अपने उद्देश्यकी पूर्तिको प्रभावित करनेवाले विदित विषयोंपर जान-बूझकर नियन्त्रण करनेका प्रयत्न करते हैं।’ भौतिक, औपपत्तिक, आगमिक, आनुमानिक, प्रत्यक्षात्मक, संशयात्मक या विपर्ययात्मक—ये सभी ज्ञान बुद्धि अथवा मनके तत्तत्साधनोंसे होनेवाले परिणामविशेष हैं। इन सभीमें स्फुरण, स्फूर्ति या बोध समानरूपसे होता है। ज्ञानके अनुसार क्रिया होती है, ज्ञानसे भ्रमात्मक बन्धन भी कटते हैं, तभी स्वतन्त्रता मिलती है। वैसे पूर्ण स्वतन्त्रता तो नित्य ज्ञानसे ही होती है। आवश्यकताकी प्रतीतिके साथ असाधारण सम्बन्ध रहता है। आत्मनियन्त्रण या बाह्य प्रकृतिपर नियन्त्रण स्वतन्त्रताकी मंजिल है, सम्पूर्ण स्वतन्त्रता नहीं। अन्योंपर नियन्त्रण शासन कहलाता है, आत्मगत स्वतन्त्र नियन्त्रणादि ही स्वतन्त्रता है। यह भौतिकवादीके लिये आकाशकुसुम-तुल्य ही है।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt; और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट नि&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;न : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>आवश्यकता</category><category>धर्मसम्राट</category><category>नागरिकस्वतन्त्रता</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>11.6 विकास ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/11-6-vikaas-maarksvaad-aur-raamr/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/11-6-vikaas-maarksvaad-aur-raamr/</guid><description>11.6 विकास ‘ज्ञान, जब हम वस्तुओंके साथ सक्रिय सम्बन्धोंमें आते हैं, तब प्राप्त होता है और प्रतीतिसे निर्णयकी ओर विकसित होता है। ज्ञानका विकास प्रत्ययात्मकसे उपपत्त्यात्मक (युक्तिपूर्ण सिद्धि) तक, …</description><pubDate>Sun, 06 Jul 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;11.6 विकास&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;‘ज्ञान, जब हम वस्तुओंके साथ सक्रिय सम्बन्धोंमें आते हैं, तब प्राप्त होता है और प्रतीतिसे निर्णयकी ओर विकसित होता है। ज्ञानका विकास प्रत्ययात्मकसे उपपत्त्यात्मक (युक्तिपूर्ण सिद्धि) तक, वस्तुओंके रूप-रंग आदिके केवल बहिरंग (ऊपरी-ऊपरी) निर्णयोंसे उनके आवश्यक गुण-धर्मों, पारस्परिक संयोगों तथा नियमोंके विषयमें तर्कपूर्ण निष्कर्षोंतकके मार्गपर होता है। इस प्रकार हम बाह्य (वस्तुमय) संसारका उत्तरोत्तर अधिक पूर्ण एवं गम्भीर ज्ञान प्राप्त करते चलते हैं। प्रत्येक अवस्थामें हमारा ज्ञान सीमित है। पर वह इन सीमाओंको जीतता हुआ प्रगति कर रहा है, करता जा रहा है।’ बुद्धिवृत्तिरूप ज्ञानोंका विकास ही नहीं, किंतु ह्रास भी होता है। कोई प्राणी ज्ञान-साधनोंसे ज्ञानार्जन, ज्ञान-विकास करता है, किंतु प्रमादसे वह उत्पन्न ज्ञान भी नष्ट हो जाता है। आजके पुरातत्त्ववेत्ता तो यह भी कहते हैं—‘प्रथम ज्ञान अत्यन्त विकसित था, परंतु अब वह संकुचित हो गया है।’ पर &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;ों, पुराणों, भारतादि ग्रन्थोंको पढ़नेसे मालूम होगा कि आज पहलेकी अपेक्षा सभी क्षेत्रोंमें ज्ञानका संकोच हो गया है। नित्य ज्ञानस्वरूप आत्मा तो चित् नित्य स्वप्रकाश ही है। उसके विकासका प्रश्न ही नहीं उठता।&lt;/p&gt;
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&lt;hr&gt;
&lt;p&gt;श्रोत: &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt; और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>वर्गविहीनसमाज</category><category>विकासवाद</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>11.5 ज्ञानका मूल ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/11-5-jnyaankaa-muul-maarksvaad-au/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/11-5-jnyaankaa-muul-maarksvaad-au/</guid><description>11.5 ज्ञानका मूल ‘ज्ञान वस्तुगत सत्यताकी यथासम्भव निर्दुष्ट प्रतिच्छायाओंके रूपमें प्रतिष्ठापित एवं परीक्षित मान्यताओं, दृष्टियों एवं प्रस्तावनाओंका योग है। यह निश्चितरूपसे एक सामाजिक उपज है, जिसक…</description><pubDate>Sat, 05 Jul 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;11.5 ज्ञानका मूल&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;‘ज्ञान वस्तुगत सत्यताकी यथासम्भव निर्दुष्ट प्रतिच्छायाओंके रूपमें प्रतिष्ठापित एवं परीक्षित मान्यताओं, दृष्टियों एवं प्रस्तावनाओंका योग है। यह निश्चितरूपसे एक सामाजिक उपज है, जिसकी जड़ें सामाजिक व्यवहारोंमें हैं; जिन्हें व्यावहारिक आशाओं एवं अपेक्षाओंकी पूर्तिद्वारा परीक्षित एवं संशोधित कर लिया जाता है। सभी ज्ञानोंका प्रारम्भ उन इन्द्रियानुभूतियोंमें निहित है, जिनकी विश्वसनीयता मनुष्यके व्यवहारोंमें सिद्ध है। ज्ञान कभी भी सम्पूर्ण या अन्तिम नहीं हो सकता, परंतु उसका सर्वदा विस्तृत एवं आलोचित होते रहना आवश्यक है।’ वस्तुत: नित्य ज्ञान ही सबका मूल है, उसका मूल कोई नहीं। अनित्य-ज्ञान विषयों एवं इन्द्रियोंके संनिकर्षसे अन्त:करण-वृत्तिरूप ज्ञान उत्पन्न होता है। वह भी ज्ञान तभी बनता है, जब उसमें नित्य-बोधका प्रतिबिम्ब पड़ता है। सामान्यतया क्रियाएँ ज्ञानके प्रतिफल भले ही हों, परंतु ज्ञान क्रियाओंका फल नहीं हो सकता। जड वायु, जल एवं अग्निमें अनेक प्रकारकी क्रियाएँ होती हैं, उन्हें अन्तर्यामी चेतनसे प्रेरित तो कहा जा सकता है, परंतु उन क्रियाओंके द्वारा उनमें कोई ज्ञान नहीं उत्पन्न होता। ‘ज्ञायते अनेनेति ज्ञानम्’ इस व्युत्पत्तिसे ज्ञान शब्दका अन्त:करण-वृत्ति अर्थ है, परंतु ‘ज्ञप्तिर्ज्ञानम्’ इस व्युत्पत्तिसे स्फुरणमात्र ही ज्ञानपदार्थ है। ज्ञानमें क्रिया और स्फुरण दो अंश हैं। ‘जानाति’ के ‘तिङ्’ का अर्थ चिदाभास है, धात्वर्थ क्रिया है। दोनोंको मिलाकर ही ‘जानाति’ का व्यवहार होता है। चैतन्य प्रतिबिम्बयुक्त बुद्धिकी घटादिवृत्ति चैतन्यसे व्याप्त होती है; इसीलिये बुद्धिवृत्तिमें ही ज्ञानकी भ्रान्ति होती है। आरोपित सर्वदृश्यका भासक होनेसे ब्रह्ममें ही ज्ञानता मुख्य है। प्रत्ययकारिता बुद्धिके साक्षीमें अध्यस्त होनेसे साक्षीमें भी भासकत्वकी कल्पना होती है, वस्तुत: है वह भानस्वरूप ही। बुद्धिकर्तृक सभी प्रत्यय चैतन्यखचित ही उत्पन्न होते हैं, इसी आधारपर ‘ज्ञानं क्रियते’ (ज्ञान किया जाता है) वह व्यवहार होता है. जैसे बुद्धिके पहले अनवच्छिन्नबोध कूटस्थ है, वैसे ही बुद्धि उत्पन्न होनेपर भी वह बोध निष्क्रिय ही रहता है; इसीलिये श्रुतियाँ द्रष्टाकी स्वरूपभूता दृष्टिका सर्वथा अविपरिलोप ही बतलाती हैं— ‘न हि द्रष्टुर्दृष्टेर्विपरिलोपो विद्यते।’ (बृहदारण्यकोपनिषद् ४।३।२३) आलोचन-संकल्प-अभिमानादिकरण व्यापार बुद्धिमें उपसंक्रान्त होकर बुद्धिके अध्यवसायरूप व्यापारके साथ उसी तरह एक व्यापारवान् हो जाते हैं, जैसे अपनी सेनाके साथ ग्रामाध्यक्षादिकी सेना सर्वाध्यक्षकी ही हो जाती है। &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;ान्त-मतानुसार सूक्ष्म पंचभूतोंके समष्टि सात्त्विक अंशोंसे मन या अन्त:करण उत्पन्न होता है। व्यष्टि सात्त्विक अंशोंसे श्रोत्रादि पंचज्ञानेन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं और चित्त, अहंकार, बुद्धि सब उसी मन या अन्त:करणकी ही वृत्तियाँ हैं, जैसे लोहपिण्डमें स्वत: दाहकत्व न होनेपर भी वह्निके साथ तादात्म्यसम्बन्ध होनेसे लोहपिण्डमें दाहकत्व होता है, उसी तरह भौतिक अन्त:करण यद्यपि जड है, उसमें प्रकाशकत्व नहीं है, फिर भी स्वप्रकाश आत्मचैतन्यके तादात्म्याध्यास-सम्बन्धसे उसमें भी चैतन्यका उपलम्भ होने लगता है। स्वप्रकाश अखण्डबोध आत्मा ही मुख्य-ज्ञान है, उसीके प्रकाशसे मन अन्त:करण आदिमें भी प्रकाश व्यक्त होता है। अनन्त आकाशस्वरूप बोधात्मक ब्रह्म ही उपाधिभेदसे विभिन्न ज्ञानोंके रूपमें भासित होता है, जैसे घटादि उपाधि-भेदसे घटाकाश आदिका भेद प्रतीत होता है। जहाँ विषयावच्छिन्न चैतन्यका प्रमातृचैतन्यके साथ अभेद होता है, वहाँ अपरोक्ष-ज्ञान होता है। जहाँ प्रमातृचैतन्यसे विषय-चैतन्यका भेद विद्यमान रहता है, वहाँ प्रमाणके बलसे केवल परोक्ष-ज्ञान होता है। इसलिये अनुव्यवसायको विशिष्ट विषय बनानेके लिये सामान्य-विशेषविषयक ही इन्द्रियोंको मानना चाहिये। ‘योगभाष्यकार’ का भी यही कहना है— न च तत्सामान्यमात्रग्रहणाकारम्, कथमनालोचित:, विषयविशेष इन्द्रियेण मनसानुव्यवसीयेत। (योगभाष्य ३।४७) कुछ लोग कहते हैं आलोचन-ज्ञान सामान्यज्ञान-विषयको ग्रहण करता है; किंतु मन विशिष्टविषयको ग्रहण करता है, परंतु यह ठीक नहीं, वस्तुत: इन्द्रिय-जन्य आलोचन अविविक्त सामान्यविशेषको ग्रहण करता और अनुव्ययसाय-ज्ञान विविक्त सामान्यविशेषको ही ग्रहण करता है, इसीलिये ‘योगवार्तिक’ में कहा गया है— निर्विकल्पकबोधेऽपि द्वॺात्मकस्यापि वस्तुन:। ग्रहणं लक्षणाख्येयं ज्ञात्रा शुद्धं तु गृह्यते॥ निर्विकल्पकज्ञान सामान्यमात्रको ही नहीं ग्रहण करता; क्योंकि उसमें विशेषका भी प्रतिभास होता है। इसी तरह विशेषमात्रका ही ग्रहण होता है, यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि उसमें सामान्याकारका भी भान होता है, किंतु सामान्यविशेष—दोनोंहीका ग्रहण करता है, परंतु ‘यह सामान्य है, यह विशेष’ इस तरह विवेचनपूर्वक ग्रहण नहीं होता है; क्योंकि कालान्तरका अनुसंधान नहीं होता। जैसे ग्रामाध्यक्ष कुटुम्बियोंसे कर लेकर विषयाध्यक्षको अर्पण करता है, विषयाध्यक्ष सर्वाध्यक्षको, सर्वाध्यक्ष भूपतिको कर समर्पण करता है; इसी तरह बाह्येन्द्रिय विषयोंका आलोचन करके मनको अर्पण करती है, मन संकल्प करके अहंकारको अर्पण करता है, अहंकार उसका अभिमान करके अर्थात् संवेदन और स्मृतियोंके समूहको आत्मीयत्वेन ग्रहण करके अर्थात् बाह्येन्द्रियोपलब्ध क्षणिक संवेदन एवं स्मृतियोंको संग्रथित करके सर्वाध्यक्षभूता बुद्धिको समर्पण करता है; इस तरह सभी करण बुद्धिमें अर्थ-समर्पण करके पुरुषको अर्थ-प्रकाश कराते हैं।&lt;/p&gt;
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&lt;hr&gt;
&lt;p&gt;श्रोत: &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt; और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थमूलक</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>ज्ञानप्रेम</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>11.4 सत्य ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/11-4-sty-maarksvaad-aur-raamraa/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/11-4-sty-maarksvaad-aur-raamraa/</guid><description>11.4 सत्य ‘सत्य का अर्थ होता है धारणाओं एवं वस्तुगत सचाई की समन्विति। ऐसी समन्विति बहुधा केवल आंशिक एवं प्रायिक (लगभग) ही होती है। हम जिस सत्यताको स्थापित कर सकते हैं, वह सर्वदा सत्यके अन्वेषण एवं…</description><pubDate>Fri, 04 Jul 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;11.4 सत्य&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;‘सत्य का अर्थ होता है धारणाओं एवं वस्तुगत सचाई की समन्विति। ऐसी समन्विति बहुधा केवल आंशिक एवं प्रायिक (लगभग) ही होती है। हम जिस सत्यताको स्थापित कर सकते हैं, वह सर्वदा सत्यके अन्वेषण एवं अभिव्यंजनके हमारे साधनोंपर अवलम्बित रहती है; परंतु इसीके साथ धारणाओंकी सत्यता, यहाँके अर्थमें आपेक्षिक ही सही, उन वस्तुगत तथ्योंपर आधारित रहती है, जिनके साथ धारणाओंकी समन्विति है। हम कभी भी सम्पूर्ण, समग्र विशुद्ध सत्यताको प्राप्त कर ही नहीं सकते, परंतु सदा उस ओर बढ़ते जा रहे हैं।’ ठीक है, जिसके मतमें मनुष्य एवं उसका ज्ञान-विज्ञान सब जडभूतका ही परिणाम है और अभी विकास ही हो रहा है, वह परम सत्यके सम्बन्धमें इससे अधिक कह ही क्या सकता है? परंतु अध्यात्मवादी इससे सहमत नहीं होता; क्योंकि वह तो सर्वदा सर्वशक्तिमान् परमेश्वरसे विश्वका निर्माण मानता है। उसीके द्वारा विश्वका निर्धारण एवं संचालन होता है। उस दृष्टिसे सत्य त्रिकालाबाध्य है, पर &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt;ी किसी भी सर्वसम्मत तर्क या सिद्धान्त तथा सत्यको नहीं मानते; इसलिये सब सत्योंको भी अपूर्ण ही कहते हैं।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट नि&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;न : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अखंड-सत्य</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>ज्ञानप्रेम</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>11.3 विज्ञान एवं समाजवाद ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/11-3-vijnyaan-evn-smaajvaad-maar/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/11-3-vijnyaan-evn-smaajvaad-maar/</guid><description>11.3 विज्ञान एवं समाजवाद ‘बोर्जिआई विज्ञानने जहाँ महान् वैज्ञानिक उन्नतियाँ प्राप्त की हैं, वहीं पूँजीवादी सम्बन्धोंने विज्ञानोंके विकासपर बन्धन (सीमाएँ) लगा दिये। समाजवादके अधीन जहाँ विज्ञानका जन…</description><pubDate>Thu, 03 Jul 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;11.3 विज्ञान एवं समाजवाद&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;‘बोर्जिआई विज्ञानने जहाँ महान् वैज्ञानिक उन्नतियाँ प्राप्त की हैं, वहीं पूँजीवादी सम्बन्धोंने विज्ञानोंके विकासपर बन्धन (सीमाएँ) लगा दिये। समाजवादके अधीन जहाँ विज्ञानका जनताकी सेवाके लिये विकास किया जाता है, ये बन्धन दूर कर दिये जाते हैं। विशेषत: समाजवादके लिये मजदूरवर्गके संघर्षके उदयके साथ समाजविज्ञान स्थापित हुआ है। समाजवादी समाजमें पुरानी आदर्शवादी मृगमरीचिकाएँ या स्वप्न नष्टमूल हो जाती हैं और एक विश्वव्यापी वैज्ञानिक आदर्शवाद अस्तित्वमें आने लगता है।’ यदि पूँजीपति अपने स्वार्थ-साधनके लिये विज्ञानका विकास करना चाहते हैं तो &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt;ी भौतिकवादतक ही उसे सीमित रखना चाहते हैं। अपने मतके विरुद्ध तथ्य निकालनेवाले वैज्ञानिकोंको फाँसीतककी सजा रूसमें दी गयी है, अगर सत्यकी खोज विज्ञानका लक्ष्य है, तो भी जैसा भी सत्य हो और जैसे उपलब्ध होता हो, वैसा ही प्रयत्न वैज्ञानिक प्रयत्न है।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट नि&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;न : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>धर्मसम्राट</category><category>प्राकृतिक-विज्ञान</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>समाजवाद</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>11.2 आदर्शवाद ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/11-2-aadrshvaad-maarksvaad-aur-r/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/11-2-aadrshvaad-maarksvaad-aur-r/</guid><description>11.2 आदर्शवाद ‘काल्पनिक धारणाओंका प्रयोग किसी-न-किसी प्रकारकी वस्तुओं अथवा विचारपद्धतियोंकी सुव्यस्थित दृष्टियोंके निरूपणमें ही किया जाता है। ये दृष्टियाँ या विचारपद्धतियाँ समाज-विकासकी विभिन्न अव…</description><pubDate>Wed, 02 Jul 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;11.2 आदर्शवाद&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;‘काल्पनिक धारणाओंका प्रयोग किसी-न-किसी प्रकारकी वस्तुओं अथवा विचारपद्धतियोंकी सुव्यस्थित दृष्टियोंके निरूपणमें ही किया जाता है। ये दृष्टियाँ या विचारपद्धतियाँ समाज-विकासकी विभिन्न अवस्थाओंमें विभिन्न सामाजिक वर्गोंद्वारा आविष्कृत होती हैं। आदर्शविषयक विकास समाजके भौतिक जीवनके विकासपर अवलम्बित है तथा आदर्शादि वर्गविशेषकी रुचियों या स्वार्थोंकी पूर्ति करते हैं, परंतु इसके साथ-ही-साथ यह भी आवश्यक है कि आदर्शवाद ऐसा बनाया जाय कि वह बौद्धिक आवश्यकताओंकी भी पूर्ति कर सके। इसीके परिणामस्वरूप आदर्शवादोंके विकास तथा उनकी आलोचनामें निरन्तर वदतोव्याघात या विरुद्धताएँ रहा करती हैं और इसीलिये उसकी आलोचना भी की जाती है। इसीलिये आदर्शवादोंमें सत्य एवं कल्पना-मृगमरीचिका दोनोंके तत्त्व साथ-साथ रहते हैं।’ वस्तुत: सूक्ष्मबोधतक बुद्धिके न पहुँचनेके कारण ही भौतिकवादियोंको बहुत-से निगूढ़ तत्त्वोंमें केवल कल्पना ही दृष्टिगोचर होती है। व्यवहारमें उच्च आदर्शोंके अनुसार देह-इन्द्रियादिकी प्रवृत्ति बनानेकी चेष्टा होती है, पर कभी-कभी बाह्य प्रवृत्तियाँ वहाँतक नहीं पहुँच पातीं। उन्हीं उच्च आदर्शोंको भौतिकवादी मृगमरीचिकातुल्य समझने लगते हैं। ‘आदर्शवादी मृगमरीचिकाओं; स्वप्नोंका उद‍्गम है समाजके उत्पादनसम्बन्धोंसे, परंतु वे इस उद‍्गम या स्रोतसे विदितरूपमें उद‍्भूत नहीं होतीं, परंतु अविदित या अप्रतिभातरूपमें अनजाने या सहजरूपमें ही उद‍्गत हो आती हैं। आदर्शवादियोंको यह ज्ञात (पता) तो रहता नहीं कि उनकी इन भ्रान्त स्वाप्निक धारणाओंका वास्तविक मूलस्रोत क्या है; वे सोचते हैं कि ‘हमने शुद्ध विचारकी पद्धतिसे इन्हें जन्म दिया’ और इसलिये आदर्शवादमें प्रतीपन (उलट देने)-की प्रक्रियाका आगमन होता है, जिसके द्वारा वास्तविक सामाजिक सम्बन्धोंको काल्पनिक धारणाओंके प्रतिनिधिरूपमें दिखलाया जाता है। अन्तमें, आदर्शवादी स्वप्न एक वर्गविशेषलक्षित प्रवंचनापद्धति (धोखेकी पद्धति)-का निर्माण करते हैं।’ यह भी ‘अशक्तास्तत्पदं गन्तुं ततो निन्दां प्रकुर्वते’ का ही उदाहरण है। सदा ही आत्मचालित स्थूल-सूक्ष्म देहके समान ही सम्पूर्ण जड-जगत‍्की चेष्टाएँ अध्यात्मनियन्त्रित होती हैं—यही तथ्य है। सुतरां इनकी प्रवृत्तिका निर्धारण भी ज्ञान-विज्ञानके आधारपर ही होता है। ‘आदर्शवादी मृगमरीचिकाओंके ठीक विपरीत, लोग अपने व्यावहारिक प्रत्यक्ष क्रियाकलापों या प्रवृत्तियोंकी शृंखलामें सत्यकी खोज करते हैं। ऐसी खोजका प्रथम मूलस्रोत सामाजिक उत्पादनमें निहित है। उत्पादन-विषयकी प्रक्रियासे आविष्कृत धारणाओंसे प्राकृतिक विज्ञान (नेचुरल साइंस) उत्पन्न होते हैं, जो कि उत्पादनसे पृथक्‍कृत, विशिष्ट गवेषणाका रूप ग्रहण करते हैं। यह कार्य कुछ विशिष्ट वर्गोंद्वारा किया जाता है और ये वर्ग अपने वर्ग-विशेषके आदर्शोंको विज्ञानोंमें घुसेड़ देते हैं। इसीके साथ सामाजिक विज्ञानोंका विकास होता है, जिसका मूल वर्ग-संघर्षमें प्राप्त अनुभवोंमें होता है और जो सामाजिक मामलोंके सामान्य व्यवस्थापन एवं नियन्त्रणके अन्तका काम देते हैं, परंतु शोषक-वर्गोंके हाथोंमें रहकर सामाजिक विज्ञान कभी भी प्राकृतिक विज्ञानोंके वैज्ञानिक स्तरको नहीं प्राप्त कर सकते।’ &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt;ी सत्यकी खोजमें भी अपने वर्ग-संघर्षको ही घुसेड़नेका प्रयत्न करते हैं। वस्तुत: सत्यकी खोज प्रमाणोंपर ही निर्भर होती है। प्रत्यक्ष प्रमाण नेत्र-श्रोत्रादि एवं उनके सहायक सूक्ष्म-दूरवीक्षणयन्त्र काच आदिके द्वारा जैसे सत्यका पता लगता है, वैसा वर्णन करना विज्ञानका काम है। वस्तुस्थिति किसी आवश्यक क्रिया एवं संघर्ष-विशेषसे सम्बन्ध रखनेके लिये बाध्य नहीं हो सकती। इसके अतिरिक्त जैसे नेत्रगम्य रूपकी खोज कानसे करनी व्यर्थ है, वैसे अनुमान या आगमगम्य बातोंकी खोज आँख-कानसे करनी व्यर्थ है।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट नि&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;न : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>आदर्शवाद</category><category>धर्मसम्राट</category><category>नैतिक-शिक्षा</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>11. मार्क्स और ज्ञान - 11.1 मन और शरीर ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/11-maarks-aur-jnyaan-11-1-mn-aur-shr/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/11-maarks-aur-jnyaan-11-1-mn-aur-shr/</guid><description>11. मार्क्स और ज्ञान (मार्क्सीय मन या ज्ञानपर विचार) मोरिस कौर्न फोर्थकी ‘दि थ्योरी ऑफ नालेज’ में कहा गया है कि—‘मन शरीरसे विभाज्य नहीं है। मानसिक क्रियाएँ मस्तिष्ककी क्रियाएँ हैं। मस्तिष्क प्राणी…</description><pubDate>Tue, 01 Jul 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h2&gt;11. मार्क्स और ज्ञान&lt;/h2&gt;
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&lt;p&gt;(मार्क्सीय मन या ज्ञानपर विचार) मोरिस कौर्न फोर्थकी ‘दि थ्योरी ऑफ नालेज’ में कहा गया है कि—‘मन शरीरसे विभाज्य नहीं है। मानसिक क्रियाएँ मस्तिष्ककी क्रियाएँ हैं। मस्तिष्क प्राणीके बाह्य जगत‍्के साथ रहनेवाले जटिलतम सम्बन्धोंका अवयव है। वस्तुओंकी प्रत्ययात्मिका जानकारी (Conscious, awareness) का प्रथम रूप ‘सेंसेशन’ (Sensation) अनुभूति है, जो प्रतिनियत सहज प्रतिक्रियाओं, ‘कण्डीशण्ड रिफ्लेक्सेज’ (Conditioned) के विकाससे उत्पन्न होता है। अनुभूतियाँ (सेंसेशन) प्राणीके लिये बाह्य-जगत‍्के साथ उसका जो सम्बन्ध है, उसके संकेतोंकी एक पद्धति निर्मित करती हैं। मनुष्यमें एक द्वितीय संकेतपद्धति विकसित हो गयी है—वाणी! यह काल्पनिक (भावप्रधान) [ऐब्स्ट्रैक्टिंग] और साधारणीकरणके कार्य करती है और इसी वाणीसे सम्पूर्ण उच्चतर मानसिक जीवन बढ़ चलता है, जो कि मनुष्य-प्राणीकी निजी विशेषता है। मानसिक प्रक्रियाओंकी अनिवार्य बात यह है कि उन्हीं गतिविधियोंके भीतर और उन्हींके द्वारा प्राणी अपने चारों ओरके वातावरणके साथ जटिल और विभिन्न सम्बन्ध अनवरत बनाता रहता है। इसलिये प्रत्ययोंकी प्रक्रियाएँ वास्तवमें बाह्य जड (मेटीरियल) सत्यको प्रतिबिम्बित करनेवाली प्रक्रियाएँ हैं। मस्तिष्ककी जीवन-प्रक्रियामें जड (भौतिक) जगत‍्का प्रतिबिम्ब ही ‘प्रत्यय’ (कौंशसनेस) है।’ आश्चर्य है कि इस विज्ञानके युगमें जब कि सूक्ष्म-से-सूक्ष्म वस्तुओंकी खोज हो रही है, तब भी मन-जैसी सूक्ष्मवस्तुको जड स्थूल देहकी ही एक अवस्था माना जाता है। इसपर आगे पर्याप्त विवेचन किया जायगा कि मन &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-paashcaaty-drshn-1-1-drshnkii/&quot;&gt;दर्शन&lt;/a&gt;, श्रवण आदि इन्द्रियजन्य क्रियाओंमें सहकारी सूक्ष्म देहसे भिन्न तत्त्वान्तर है। ‘मनुष्यकी मानसिक क्रियाओंका विकास उसके सामाजिक कार्यकलापोंसे उद‍्भूत होता है। इसकी प्रक्रिया है—दर्शन, प्रेक्षण, अनुभूति, प्रतीति, ज्ञान (Perception) से विचारणा। विचारने एवं बोलनेकी क्षमता उत्पन्न होती है सामाजिक श्रमकी प्रक्रियासे, जो (सामाजिक श्रम) कि मनुष्यका मूलभूत (आधारभूत) सामाजिक कार्य (प्रवृत्ति) है।’ सामाजिक कार्य-कलापोंका प्रभाव यद्यपि क्रियाओंपर अवश्य पड़ता है, परंतु एतावता प्रकाशस्वरूप बोध, जड, बाह्य वस्तुओं एवं उनकी जड क्रियाओंका परिणाम नहीं हो सकता। ‘विचारनेमें हम उन प्रारम्भिक धारणाओंसे, जिनके अनुसार साक्षादिन्द्रियगम्य वस्तुएँ हैं—प्रारम्भकर कल्पनामयी धारणाओंकी ओर आगे बढ़ते हैं। कल्पनामयी धारणाओंका उद‍्गम है सामाजिक सम्बन्धोंके विकास तथा बाह्य प्रकृतिसे सम्बद्ध उत्पादनविषयक एवं अन्य प्रवृत्तियोंके विकाससे, जबकि मनुष्योंका अज्ञान तथा उनकी असहायता जन्म देती है रहस्यमयी, इन्द्रजालमयी तथा स्वाप्निक, मृगमरीचिकामयी काल्पनिक धारणाओंको। मानसिक श्रम, मास्तिष्किक श्रम (दिमागी मेहनत)-का भौतिक श्रमसे विभाजन काल्पनिक धारणाओंसे ही प्रारम्भ होता है और फिर सैद्धान्तिक प्रवृत्तियोंका व्यावहारिक प्रवृत्तियोंसे सम्बन्धविच्छेद होता है; जिसमें कि सिद्धान्तकी सत्यसे दूर उड़ चलनेकी प्रवृत्ति हो जाती है। आदर्शवादी एवं भौतिकवादी दलोंकी विचारपद्धतिके विरोधकी शाखाएँ ही नहीं, स्कन्ध भी यहींसे पृथक् होते हैं।’ वस्तुत: किन्हीं भी प्रवृत्तियोंमें ज्ञान ही मूल होता है। ज्ञानसे ही संघ या समाजका निर्माण होता है। स्थूल बाह्य-जगत‍्की अपेक्षा मन बहुत सूक्ष्म है। अत: मानसिक ज्ञान-विज्ञान तथा कल्पनामें एक ही भौतिक स्थूल प्रवृत्तियाँ आगे बढ़ी होती हैं, यह स्वाभाविक है। इतना ही क्यों, मन ही तो सबका मूल भी है।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt; और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट नि&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;न : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>आत्मामन</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>ज्ञानप्रेम</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सदर्शन</category><category>मार्क्सवाद</category><category>मोक्षसूक्ष्मशरीर</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>10.11 द्वन्द्वन्याय और विकास ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/10-11-dvndvnyaay-aur-vikaas-m/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/10-11-dvndvnyaay-aur-vikaas-m/</guid><description>10.11 द्वन्द्वन्याय और विकास मार्क्सवादी कहते हैं कि ‘जगत् परिवर्तनशील है। विकास परिवर्तनका ही एक प्रकार है। इस परिवर्तनको देखनेके विभिन्न दृष्टिकोण हैं। अतिभौतिकवादी और नैसर्गिकवादीका दृष्टिकोण ए…</description><pubDate>Mon, 30 Jun 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;10.11 द्वन्द्वन्याय और विकास&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt;ी कहते हैं कि ‘जगत् परिवर्तनशील है। विकास परिवर्तनका ही एक प्रकार है। इस परिवर्तनको देखनेके विभिन्न दृष्टिकोण हैं। अतिभौतिकवादी और नैसर्गिकवादीका दृष्टिकोण एक है और द्वन्द्वात्मक भौतिकवादीका दृष्टिकोण और है। लेनिनकी व्याख्यासे इसपर काफी प्रकाश पड़ता है। विकास विरोधियोंका संघर्ष है। विकासकी दो ऐतिहासिक धाराएँ हैं। पहली विकासवृद्धि और ह्रास तथा दुहरानेके रूपमें और दूसरी विकासविरोधियोंके समन्वित एकत्व तथा परस्परसम्बन्धित रूपमें। पहली धारणा मृत, शुष्क, नि:सार है, दूसरी जीवित है। दूसरी धारणाके द्वारा ही हर विद्यमान वस्तुकी स्वयं गति समझी जा सकती है और इसकी कल्पना की जा सकती है कि पुरानेका ध्वंस होकर नयेका आविर्भाव कैसे होता है’ (लेनिन—मेटेरियेलिज्म एण्ड इम्पीरियलिज्म—क्रिटिसिज्म)। विकासकी पहली धारणासे हम मौलिक परिवर्तनको नहीं समझ सकते। इस धारणाके अनुसार परिवर्तनको क्रमपरिवर्तनके रूपमें देखा जाता है। परिवर्तित वस्तु भी मुख्यत: मूल वस्तु ही है। मूल वस्तुमें परिवर्तनकी मात्रा अत्यल्प होती है और इन स्वल्प मात्राओंको जोड़कर ही परिवर्तित वस्तु बन जाती है। लेकिन इस प्रकार मौलिक परिवर्तनोंको समझा नहीं जा सकता। उदाहरणोंसे यह सिद्ध है कि प्राकृतिक वस्तुओंकी एक अवस्थासे दूसरी अवस्थाकी कुदान होती है। प्रकृतिमें क्रान्तिकारी परिवर्तनके उदाहरण मिलते हैं। विकास ही प्रकृतिका एकमात्र नियम नहीं है, क्रान्तिकारी परिवर्तनका भी उसमें स्थान है। किसी वस्तुके आविर्भाव या तिरोभावकी कल्पना उसके क्रमश: आविर्भाव या तिरोभावकी कल्पना है। लेकिन सत् (अस्तित्व)-का परिवर्तन न केवल एक गुणसे दूसरे गुणका परिवर्तन है, बल्कि परिमाणात्मकसे गुणात्मक परिवर्तन है। इस प्रकार एक परिवर्तन घटित होता है, जो एक दृश्यगत घटनाको दूसरीके स्थानापन्न करता है और धारा टूट जाती है, जब प्रवाहकी धारा टूट जाती है, तब विकासके रास्तेमें एक आकस्मिक परिवर्तन घटित होता है। हीगेलने अनेकों दृष्टान्तोंसे यह प्रमाणित किया है कि ‘प्रकृति और इतिहासमें कितनी ही बार आकस्मिक परिवर्तन होते रहते हैं।’ साधारण जन-विदित विकासवादके सिद्धान्तके पोलेपनको उन्होंने अच्छी तरह दर्शाया है। हीगेलके शब्दोंमें क्रमविवर्तनकी बुनियादी बात यह है कि जिसका आविर्भाव होता है, वह पहलेसे ही विद्यमान रहता है, केवल सूक्ष्म होनेके कारण अदृश्य रहता है। इसी प्रकार जब हम किसी दृश्यगत घटनाके तिरोभावकी बात करते हैं, तब हम ऐसी कल्पना करते हैं कि जिसका तिरोभाव होता है, वह तिरोहित हो चुका है और पूर्वगत घटनाका जो स्थान लेता है, वह पहलेसे ही विद्यमान है, लेकिन दोनों ही दृष्टिगोचर नहीं होते, परंतु इस प्रकारसे हम आविर्भाव या तिरोभावके सम्पूर्ण ज्ञानको दबा देते हैं। किसी घटनाके आविर्भाव या तिरोभावकी व्याख्या क्रमविवर्तनके द्वारा करना शब्दसम्भारमात्र है और इसका अन्तर्हित अर्थ यह है कि जो वस्तु आविर्भाव या तिरोभावकी प्रक्रियामें है, हम ऐसा समझते हैं कि वह आविर्भूत या तिरोहित हो चुकी है!’ ‘हीगेलने स्वयं इस वस्तुका जो वर्णन दिया है, वह महत्त्वपूर्ण है। लोग परिवर्तनको उसके क्रमकी न्यूनतासे अपनी कल्पनाके अन्तर्गत करना चाहते हैं, लेकिन क्रमिक परिवर्तन नाममात्रका परिवर्तन है और गुणात्मक परिवर्तनके विपरीत है। क्रमिकता दो वास्तविकताके संयोगको, चाहे ये दो अवस्थाएँ हों, चाहे दो स्वतन्त्र वस्तु, दबा देती है। परिवर्तन समझनेके लिये जिनकी आवश्यकता है, उनका अपसरण हो जाता है। संगीतसम्बन्धोंमें परवर्ती स्वर आरम्भके मूलस्वरसे दूर हट जाता है। फिर ऐसा मालूम होता है कि एकाएक वह मूलस्वर लौट आया। यह पिछले स्वरमें जोड़का परिणाम नहीं है, इसका सम्बन्ध दूरके स्वरसे मालूम पड़ता है। सब मृत्यु और जन्म धारावाहिक क्रमिक न होकर इसके विघ्न ही हैं और परिमाणात्मकसे गुणात्मक परिवर्तनकी यह एक कुदान है। साधारण कल्पना जब कि किसी उत्थान या निर्वाणका ख्याल करती है, तब इसे वह क्रमिक उत्थान या निर्वाणके रूपमें देखती है, परंतु अस्तित्वमें परिवर्तन न केवल एक परिमाणसे दूसरे परिमाणका रूपान्तरण है, बल्कि गुणात्मकसे परिमाणात्मक तथा इसके विपरीत रूपान्तरणमें है। यह स्वरसे भिन्न होनेकी एक क्रिया है, जो क्रमकी धारा तोड़ देती है।’ ‘प्रारम्भिक बात यह है कि प्रकृतिको समझनेके लिये इसके इतिहासके अध्ययनकी आवश्यकता है। परिमाणकी दृष्टिसे यह तो निश्चय ही है कि किसी भी मुहूर्तमें विश्व (संसार) वही है, जो पहले था और जो कि भविष्यके संसारके निर्माणकी क्रियामें है। इसी अनुमानके आधारपर विश्व (संसार) बुद्धिगम्य और व्यवहारयोग्य है। गुणात्मक दृष्टिसे यह समानरूपमें स्वयं सिद्ध है कि किन्हीं दो मुहूर्तोंमें विश्व (संसार) एक-सा नहीं है। यहाँतक हालत डार्विनकी क्रान्तिकारी पुस्तक ‘ओरिजन ऑफ मैन’ के प्रकाशित होनेके बाद, साधारण विकासवादकी कल्पनाके अनुरूप ही है। लेकिन यदि इस कल्पनाको व्यवहारोपयोगी बनाना है तो इसे और गहराईतक ले जाना पड़ेगा। विशेषकर इस जानकारीकी आवश्यकता है कि विश्व (संसार)-का निरन्तर रूप-परिवर्तन ऊपरी परिवर्तनतक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका बुनियादी संघटन भी उसमें सम्मिलित है और वे गतियाँ भी, जिनके योगकी सम्पूर्णतामें विश्वकी क्रियाशीलता है। इस ज्ञानसे भी इसको समृद्ध करना चाहिये कि विश्वके असीम परिवर्तनमें अपरिवर्तनीयताकी मात्रा कितनी है। विज्ञानमें पुनरावर्तनके दृष्टान्तोंसे यह बिलकुल स्पष्ट हो जाता है।’ पर ये बातें अविचारितरमणीय हैं। वस्तुत: विकास परिणामका ही एक स्वरूप है। परिणामवादमें सत‍्कार्यवाद ही मान्य होता है। क्रमपरिवर्तन या प्राकृतिक वस्तुओंकी एक अवस्थासे दूसरी अवस्थामें कुदान अर्थात् क्रान्तिकारी परिवर्तन सब परिणाम ही हैं। बादलोंकी टक्‍करसे तत्काल दिग्दिगन्तव्यापी महाविद्युत्प्रकाशका विकास, काष्ठसे अग्निका क्रमिक विकास, जलका शीतल होना या बर्फ बन जाना, गर्म होना या भाप बन जाना, कुछ भी परिणामसे भिन्न नहीं है और न तो मूल वस्तुसे अत्यन्त भिन्न किसी वस्त्वन्तरका निर्माण ही होता है। अल्पज्ञ, अल्पायु मानवोंकी दृष्टिमें उत्तरोत्तर नवीन-नवीन वस्तुका ही विकास होता है, परंतु ईश्वर और दीर्घायु, दीर्घज्ञ, दीर्घदर्शी महर्षियोंकी दृष्टिमें वही भूतग्राम पुन:-पुन: उत्पन्न होकर प्रलीन हुआ करता है—‘भूतग्राम: स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।’ (गीता ८।१९)। किसी प्रकारका भी परिवर्तन मर्त्यता, शुष्कता एवं नि:सारताका ही द्योतक है। जड वस्तु न स्वयं गति है, न सार और न अमृत ही है; बल्कि वह क्रियाशील, विकारी एवं ध्वस्त होनेवाली वस्तु है। जो भी उत्पन्न होनेवाली वस्तु है; उसकी वृद्धि, परिणाम, अपक्षय एवं विनाश ध्रुव है। अविनश्वर तो सर्वकारण, सर्वाधिष्ठान, अखण्डबोधात्मक ब्रह्मात्मा है, जिसे मोहवश मार्क्सवादी भुलानेका प्रयत्न करते हैं। मार्क्सवादी और हीगेल जिसे ‘आकस्मिक घटना एवं प्रकृतिकी कुदान या क्रान्ति’ कहते हैं, विकासवादी जिसे ‘क्रमिक’ कहते हैं, दोनोंका ही सांख्यीय परिणामवादमें अन्तर्भाव है। केवल शीघ्रता एवं विलम्बमात्रसे परिणाममें भेद नहीं हो जाता और इस अर्थमें कि अत्यन्त अविद्यमान (बालूमें तेल-जैसी चीज)-का कभी भी आविर्भाव नहीं हो सकता, कोई भी आकस्मिक घटना नहीं होती, परंतु एक अल्पज्ञकी दृष्टिमें कई वस्तुएँ आकस्मिक ही प्रतीत होती हैं। जलके बर्फ बन जाने या भाप बन जानेपर स्थूल रूपसे क्रमविच्छेद प्रतीत होनेपर भी सूक्ष्मक्रम ज्यों-का-त्यों विद्यमान रहता ही है। चाहे जन्म और मरण हो, चाहे परिमाणात्मकसे गुणात्मक परिवर्तन हो, चाहे गुणात्मकसे परिमाणात्मक परिवर्तन हो, मूल वस्तुका अत्यन्त विच्छेद कभी नहीं होता। माता-पिताका सूक्ष्म शुक्रशोणित ही एकत्रित होकर क्रमेण विकसित होकर गर्भावस्था, शैशवावस्था, यौवन एवं वार्धक-अवस्थाको प्राप्त होता है। ‘जायते अस्ति वर्धते’ आदि षड‍्विध भावविकारको प्राप्त होते हुए भी मूलत: प्राकृतिक वस्तु ही सब कुछ थी और है। परमार्थ-सत्यदृष्टिसे सब कुछ स्वप्रकाश सत‍्से अनतिरिक्त ही है। दो अवस्थाएँ या दो स्वतन्त्र अवस्थावाली वस्तुएँ मूल वस्तुसे भिन्न नहीं होतीं, अत: उनका संयोग भी कोई नयी वस्तु नहीं है। रूईसे चाहे कितने भी चमत्कारपूर्ण वस्त्र, मृत्तिकासे कितने ही अच्छे मकान और लोहेसे कितने ही अच्छे यन्त्र बन जायँ, फिर भी क्या ये सब वस्तुएँ चाकचिक्यमात्रसे मूल वस्तुसे भिन्न हो जायँगी? बर्फ बन जानेपर भी क्या जलसे कोई बर्फ स्वतन्त्र वस्तु हो जायगी? मार्क्सवादियों एवं हीगेलियन लोगोंके वागाडम्बरमात्रसे कार्य कभी कारणसे भिन्न नहीं हो सकता। संगीतके स्वरोंमें भी परस्परभिन्नता और विच्छिन्नता आरोहावरोहसे भिन्न होते हुए भी परिणामीके क्रमिक परिणाममें कोई अन्तर नहीं है। पुष्कर-शतपत्रका तत्क्षणच्छेद यद्यपि अक्रमिक ही प्रतीत होता है, फिर भी वहाँ सूक्ष्म क्रम रहता है। निर्वाण या निर्माणमें भी मूल वस्तुसे भिन्नका अस्तित्व नहीं होता। प्रकृतिके पदार्थोंमें एक-सी परिणामधारा नहीं होती। वह धारा कभी सूक्ष्म होती है, कभी स्थूल। सूक्ष्म धाराका स्थूल धाराके रूपमें परिवर्तन ही जन्म कहा जाता है। स्थूल धाराका पुन: सूक्ष्म धारामें परिवर्तन होनेमें ही ध्वंस या मरणका व्यवहार होने लगता है। इसीको ‘धारा टूट जाना’ कहा जाता है। इसीमें मूल वस्तु भिन्न होनेकी भ्रान्ति होने लगती है। इतिहासका अध्ययन और उससे भी अधिक &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-paashcaaty-drshn-1-1-drshnkii/&quot;&gt;दर्शन&lt;/a&gt;का अध्ययन प्राकृतिक परिणाम समझनेके लिये आवश्यक है। किसी प्रकारके परिवर्तन एवं परिवर्तनशील विश्वके मूलमें एक अपरिवर्तनशील, स्वत: सिद्ध स्वप्रकाश अखण्डबोध साक्षीका रहना अनिवार्य है, जिसके बिना न क्रमिक परिवर्तन, न आकस्मिक परिवर्तन ही सिद्ध होता है। विश्व एवं उसकी मूलभूत सप्तप्रकृति, विकृति एवं अविकृतिभूत मूलप्रकृति, सबका ही परिवर्तन तत्त्वदर्शियोंद्वारा अनुभूत है, परंतु उससे भी परस्तात् वह स्वयंसिद्ध सत्ता, जिसके बिना सब असत् एवं अप्रकाश, निरात्मक हो जाते हैं, महर्षियोंद्वारा साक्षात्कृत है।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट नि&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;न : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>द्वन्द्वन्याय</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>विकासवाद</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>10.10 व्यवहार और तथ्य ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/10-10-vyvhaar-aur-tthy-maarksv/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/10-10-vyvhaar-aur-tthy-maarksv/</guid><description>10.10 व्यवहार और तथ्य मार्क्सवादी कहते हैं कि ‘भूत पहले या मानस, यह प्रश्न एक दूसरे रूपमें भी जीवनके सामने उठ खड़ा होता है। प्रयोग पहले या सिद्धान्त? व्यवहार पहले या तथ्य? इसका उत्तर हमको जीवनपथमे…</description><pubDate>Sun, 29 Jun 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;10.10 व्यवहार और तथ्य&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt;ी कहते हैं कि ‘भूत पहले या मानस, यह प्रश्न एक दूसरे रूपमें भी जीवनके सामने उठ खड़ा होता है। प्रयोग पहले या सिद्धान्त? व्यवहार पहले या तथ्य? इसका उत्तर हमको जीवनपथमें एक विशिष्ट दिशाकी ओर ले जाता है। इस विषयमें मार्क्सवादी दृष्टिकोण भी अपनी विशेषता रखता है। कुछ लोग कहते हैं कि प्रयोग और सिद्धान्तमें कोई समन्वय नहीं हो सकता। प्रयोग इस गन्दी, स्थूल, असत्य, मायावी दुनियाँकी चीज है। सिद्धान्त चिरसत्य, &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/shivbhujngm/&quot;&gt;शिव&lt;/a&gt; और सुन्दर है। दोनोंका क्या सम्बन्ध है? ‘सिद्धान्त &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-paashcaaty-drshn-1-1-drshnkii/&quot;&gt;दर्शन&lt;/a&gt;-ज्ञान ही सब कुछ है, इसके अतिरिक्त कुछ है ही नहीं’, इस तरहके विचार रखनेवाले लोग मकड़ीकी भाँति अपने भीतरसे सिद्धान्तको निकालते हैं। दूसरे लोग हैं, जो प्रयोगसे एकदम इनकार तो नहीं करते; किंतु वे सिद्धान्तको ही प्रधान मानते हैं। उनकी दृष्टिमें सिद्धान्त प्रयोगकी संतान नहीं है, वह एक स्वयम्भू तत्त्व है। ऐसे मतवालोंके लिये प्रयोगका आश्रित होना निम्नकोटिके लोगोंको ही शोभा देता है। सिद्ध-महर्षि इसके ऊपर हैं। यह गौर करनेकी बात है कि प्राचीन भारतका प्रगतिशील युग प्रयोग-निर्भर ही था, जैसा कि अलबेरूनीद्वारा उद‍्धृत आर्यभट (४७६ ई०)-के निम्न सूत्रसे स्पष्ट हो जाता है। ‘सूर्यकी किरणें जो कुछ प्रकाशित करती हैं, वही हमारे लिये पर्याप्त है। उनसे परे जो कुछ है और वह अनन्त दूरतक फैला हो सकता है, उसका हम प्रयोग नहीं कर सकते। जहाँ सूर्यकी किरणें नहीं पहुँचतीं, वहाँ इन्द्रियोंकी गति नहीं और जहाँ इन्द्रियोंकी गति नहीं, उसे हम जान नहीं सकते।’ ‘पूर्वोक्त दृष्टिकोण श्रेणी-विभाजित समाजका और उस समाजमें शारीरिक और मानसिक श्रमके विभाजनका परिणाम है। पूँजीवादमें शारीरिक और मानसिक श्रमका विच्छेद पूरे तौरपर हो जाता है। श्रमके इस विभाजनके कारण प्रयोगसे बिलकुल स्वतन्त्र होकर सिद्धान्तका निर्माण होता है और विद्वत्तापूर्ण तथ्योंका आविष्कार होता है, जो व्यवहारकुशल लोगोंकी अवज्ञाके पात्र बन जाते हैं। इस प्रकार उत्पन्न प्रयोग और सिद्धान्तका विच्छेद पूँजीवादी विचारधाराकी रक्षणशील संकीर्णताके कारण अधिक गहरा बन जाता है और जो आजके दिनके ढोंगपूर्ण विचारोंके लिये जिम्मेदार हैं। विज्ञानकी विभिन्न शाखाओंके अध्ययनसे भी हम इसी नतीजेपर पहुँचते हैं कि प्रयोग ही सिद्धान्तका जनक है। देशविजय और व्यापारने भूगोलको जन्म दिया। पैदावार तथा उद्योग और लड़ाईके औजारोंने खनिज-विज्ञानकी सृष्टि की। कृषिमें बीज बोनेके लिये ऋतुओंके ज्ञानकी आवश्यकता हुई। इस आवश्कताके कारण नक्षत्रशास्त्रकी रचना हुई। इसी नक्षत्रशास्त्रकी शाखा-उपशाखाके रूपमें आलोक-विज्ञान (दूरबीन आदिका आविष्कार) तथा पदार्थ-विज्ञानकी सृष्टि हुई। व्यावहारिक उपयोगिता ही यन्त्रगति शास्त्रका जनक है। जैसे नील नदीकी सतहको उठाकर खेत सींचनेकी आवश्यकता इत्यादि। इतर धातुओंको सोनेमें परिवर्तित करनेकी चेष्टासे रसायनशास्त्रकी उत्पत्ति हुई। रसायनशास्त्रके पर्यायवाची अंग्रेजी शब्द केमिस्ट्रीकी उत्पत्ति है मिस्र-भाषाके शब्द कीमियासे। गणितशास्त्र एक ऐसा शास्त्र है, जो सबसे अधिक बुद्धिप्रसूत और प्रयोगसे असम्बन्धित जान पड़ता है। लेकिन इसके इतिहासके अध्ययनसे भी यही विचारधारा पुष्ट होती है। खेतोंकी नाप-जोखसे ज्यामिति (रेखागणित)-का सम्बन्ध है और जिस समय रोम-अधिपति आगस्टसने सिकंदरियाके हीरोको रोमन-राज्यका नकशा खींचनेके लिये नियुक्त किया, उससे भी ज्यामिति-शास्त्रने काफी पोषण प्राप्त किया। ‘साइंस ऐट दी क्रास-रोड्स’ (विज्ञान—चौमुहानेपर) नामक लेखमें हेसेनने न्यूटनपर जो प्रकाश डाला है, उससे इस भ्रमका निराकरण होता है कि न्यूटन किसी द्युलोकका स्वप्नद्रष्टा है, जिसका पार्थिव व्यवहारसे कोई संस्पर्श नहीं है। उसने यह दिखलाया है कि न्यूटनने जिन समस्याओंका समाधान किया है, उनकी उत्पत्ति उस समयके मानव-समाजकी व्यावहारिक आवश्यकताओंसे ही हुई है।’ ‘भूत पहले या मानस’ यह प्रश्न इस अभिप्रायसे है कि दृक्-दृश्य, ज्ञान-ज्ञेय इनमेंसे कौन पहलेसे है? यदि मानसका अर्थ उस मानससे है, जो कि एक आन्तर इन्द्रिय या सूक्ष्म पंचमहाभूतोंके समष्टि सात्त्विक अंशोंसे निर्मित अन्त:करणरूपसे प्रसिद्ध है, तब अधिक मतभेद नहीं रह जाता। प्रयोग पहले या सिद्धान्त, व्यवहार पहले या तथ्य? कोई भी समझ सकता है कि प्रमाण से ही प्रमेयकी सिद्धि होती है। कभी भी बोधसे ही बोध्यकी सिद्धि होती है। फिर बोध तो वह वस्तु है कि प्रमाण भी उसीसे सिद्ध होता है। इस बोधका प्रागभाव एवं प्रध्वंस समझनेके लिये भी बोध आवश्यक ही है। जड अबोधसे उसका प्रागभाव समझना कठिन ही नहीं असम्भव है। बोधमें सविशेषता लानेके लिये इन्द्रिय-मन आदिका व्यापार आवश्यक होता है। प्रयोगोंसे नियमों एवं सिद्धान्तोंकी जानकारी होती है, निर्माण नहीं होता। किन-किन वस्तुओंमें क्या-क्या गुण हैं, यह हमारी जानकारीसे पहले भी कम-से-कम भौतिकवादीको तो मान्य होना ही चाहिये। इसलिये व्यापार, विजय-यात्राके कारण भौगोलिक स्थितिका ज्ञान होता है, निर्माण नहीं। इसी प्रकार पैदावार, उद्योग, लड़ाई और औजारोंने खनिजके ज्ञानमें सहायता की है, परंतु इनके कारण खनिजका निर्माण नहीं हुआ। कृषिके कारण ऋतुओंका ज्ञान भले ही हुआ हो, परंतु ऋतुओंका अस्तित्व कृषिके कारण नहीं हुआ। प्रयोगके आधारपर विद्यमान वस्तुका ही ज्ञान और उपयोग कहा जा सकता है। अग्निकी उष्णता, जलकी शीतलता, वायुकी प्रवहण-शीलता हमारे प्रयोगके आधारपर नहीं बनी। इस तरह प्रयोग और आवश्यकताके अनुसार गुण-उपयोगिता एवं सिद्धान्तोंका ज्ञान होता है, परंतु गुण-उपयोगिता और सिद्धान्त पहलेसे ही होते हैं। इतना ही क्यों? सभी प्रवृत्तियोंमें संकल्प या ज्ञान हेतु होते हैं। क्रियाओं, अनुभवोंसे जानकारीमें विशेषताएँ होती हैं। ये ज्ञान भी सदा प्रयोगोंके आधारपर नहीं होते। व्यवहारमें देखते हैं कि जो गाँवके किसान खेती करते हैं, उन्हें इतना कृषिविज्ञान नहीं रहता, जितना पुस्तकों और प्रयोगशालाओंके द्वारा विद्यार्थियोंको होता है। सदा संग्राम करनेवालोंको भी इतना परिज्ञान नहीं होता, जितना एक फील्डमार्शलको और मजदूरोंको शिल्पका इतना ज्ञान नहीं होता, जितना इंजीनियरोंको। बुद्धिका महत्त्व तो सभीको मान्य होना ही चाहिये। सहस्रों मनुष्य जो काम नहीं कर पाते, वह काम बुद्धिनिर्मित मशीनोंसे सरलतासे हो जाता है। इसी तरह लाखों वर्षोंकी वृत्तियोंसे भी जो ज्ञान सम्पन्न नहीं होता, वह ज्ञान शान्त-समाहित, योग-शक्तिसम्पन्न मनसे हो जाता है। जैसे बुद्धिनिर्मित दूरवीक्षण या सूक्ष्मवीक्षणसे दूर-सूक्ष्म वस्तुओंका ज्ञान हो सकता है, वैसे ही योग-जन्यशक्ति-विशिष्ट मनसे बाह्य प्रयोगके बिना भी अनेक वस्तुओं, उनके गुणों एवं सिद्धान्तोंका ज्ञान हो जाता है। ‘जहाँ सूर्यकी किरणें नहीं पहुँचतीं, वहाँ इन्द्रियोंकी गति नहीं और जहाँ इन्द्रियोंकी गति नहीं, उसे हम जान नहीं सकते’—यह कथन योगज-ज्ञानविहीन व्यक्तियोंके लिये ही ठीक है। यह भी रूपवान् वस्तुके ही सम्बन्धमें कहा गया है। शब्द और स्पर्शके सम्बन्धमें सूर्यकिरणें प्रकाश नहीं फैला सकतीं; फिर भी श्रोत्रत्वके द्वारा उनका ज्ञान होता ही है। प्रकृति-परमाणु आदिका ज्ञान अनुमानसे होता है। इन्द्रियों, मन एवं बुद्धिमें सूर्यकी किरणें नहीं पहुँचतीं; फिर भी उनका ज्ञान साक्षीसे होता ही है। रेडियो, टेलीविजनद्वारा इस समय अतिदूरस्थ शब्द एवं रूपका अनुभव किया ही जा रहा है। यह सामान्य इन्द्रियगतिसे भिन्न ही यान्त्रिक शक्तिका चमत्कार है। इसी तरह यौगिक चमत्कार भी है। रसायनशास्त्रके कारण भी जिन-जिन सम्बन्धोंसे जिन-जिन धातुओंमें सुवर्ण बननेकी शक्ति है, उन्हीं धातुओंसे उन्हीं सम्बन्धोंके द्वारा सुवर्णनिष्पत्ति होती है। इसी तरह क्या गणित क्या अन्य विषय—सबमें सिद्धान्त स्थायी ही होते हैं। उनकी जानकारीके लिये ही शिक्षा-प्रयोग आदि अपेक्षित होते हैं। मार्क्सवादी कहते हैं कि ‘अनुभव सामाजिक प्रयोगोंका परिणाम तथा जोड़ है। लेनिनके शब्दोंमें अनुभवमें हमारी बुद्धिपर अनिर्भर होकर बुद्धिके विषयोंका आविर्भाव होता है।’ मौसमी हवा और सामुद्रिक धाराएँ जीवरूपके आविर्भावके बहुत पहलेसे थीं। मानव-ज्ञान और सामाजिक प्रयोगके आविर्भावके करोड़ों वर्ष पहले ये वर्तमान थीं, लेकिन बहुत दिनोंकी समुद्रयात्राके अनुभवसे ही इन हवाओं और धाराओंका ज्ञान सम्भव हो सका। फिर लेनिनके ही शब्दोंमें वह इसी रूपमें अनन्तकालसे चली आ रही है। युक्तियुक्त बुद्धिका आधार है, मानव-व्यवहार, जो लाखों बार दुहरानेपर संज्ञाके अन्दर तर्कज्ञानके रूपमें प्रतिष्ठित हो जाता है। यद्यपि व्यावहारिक आवश्यकताओंकी पूर्तिके लिये ही सिद्धान्तका जन्म होता है। जन्म ग्रहण करनेके बाद एक सीमातक इसका स्वतन्त्र विकास होता है और जिस व्यावहारिक आधारपर यह उठ खड़ा होता है, उसको प्रभावित, संशोधित और परिवर्धित किये बिना नहीं रहता। इस प्रकार प्रयोग और सिद्धान्त ‘विरोधियोंका एकत्व’ है, जिनके परस्पर प्रभावका कोई अन्त नहीं है—जबतक मनुष्य-जातिका अस्तित्व है, मानव-व्यवहार प्राथमिक है। गेटेके शब्दोंमें—‘आरम्भमें था कर्म’ लेकिन चूँकि व्यवहार पूर्णता लाता है, इसलिये प्रयोगका विकास सिद्धान्तको आगे बढ़ाता है और यह पुन: प्रयोगको प्रभावित करता है। यहाँपर बुखारिनका यह उद्धरण अनुपयुक्त न होगा—‘उद्योग और सिद्धान्त—दोनों ही सामाजिक मनुष्यकी क्रिया है, यदि हम सिद्धान्तको एक निश्चित प्रणालीके रूपमें और प्रयोगको एक बनी-बनायी वस्तुकी तरह न देखें, बल्कि क्रियाशील-अवस्थामें इनको देखें तो हमें श्रम-क्रियाके दो रूप दिखलायी पड़ेंगे। श्रमका शारीरिक और मानसिक भागोंमें विभाजन सिद्धान्त-प्रयोगका संचित और साररूप है। प्रयोग और सिद्धान्तकी परस्पर क्रिया-प्रतिक्रिया और उनकी एकताका विकास प्रयोगकी प्राथमिकताकी बुनियादपर होता है। इतिहासमें व्यावहारिकताके क्षेत्रमें विज्ञानने जन्म ग्रहण किया, विचारोंकी उपज वस्तुओंकी उपजसे ही अपना रूप ग्रहण करती है। सामाजिकताके क्षेत्रमें सामाजिक रहन-सहन सामाजिक चेतनाका मूल है। सम्पूर्ण सामाजिक विकास वस्तु-उत्पादक श्रम-क्रिया-शक्ति-जनित है। मार्क्ससे ही हमें प्रयोगकी प्राथमिकताकी बुनियादपर प्रयोग और सिद्धान्तके समन्वयकी शिक्षा मिलती है। प्रयोग ही सिद्धान्तकी सत्यताका प्रमाण है।’ परंतु विचार करनेपर यही सिद्ध होता है कि कुछ अनुभव अवश्य प्रयोगोंके परिणाम हों, परंतु सबके सम्बन्धमें ऐसा नहीं कहा जा सकता। बुद्धिके विषय जो भी होंगे, वे उसी हालतमें बुद्धिपर अनिर्भर रह सकेंगे, जिनकी स्वतन्त्र सत्ता होगी। बुद्धि या अनुभव प्रमाणकोटिमें आते हैं, जिनपर सभी वस्तुओंकी सिद्धि निर्भर होती है। ‘मौसमी हवा और सामुद्रिक धाराएँ जीवरूप एवं मानव-विज्ञान और सामाजिक प्रयोगके करोड़ों वर्ष पहले थीं’, यह भी अल्पज्ञ प्राणिकृत कोरी कल्पना ही है। बीज एवं अंकुरके समान कर्मों एवं शरीरोंकी अनादि परम्परा है। अनादि जीवको बिना स्वीकृत हुए कर्मों, शरीरों, प्रबोधों, निद्राओं-जन्मों-मरणोंकी परम्पराएँ निराश्रय हो जायँगी। किसी वस्तुका भाव या अभाव सिद्ध करनेके लिये प्रमाण और द्रष्टा तो अपेक्षित होता ही है। अतीत कालका भी बोध होना चाहिये। कालपरिमित वस्तुओंका भी ज्ञान होना चाहिये। अनुमान भी सामाजिक ज्ञानके ही आधारपर चलता है। फिर इसी तरह सामाजिक ज्ञानके ही आधारपर यह भी तो सिद्ध है, जैसे स्वप्न एवं जागरणके पूर्व भी निद्राका प्रबोध होता है। उसी तरह मौसमी हवा और सामुद्रिक धाराकी कौन कहे, आकाश और उससे भी सूक्ष्म अहंकार, उससे भी प्रथम बुद्धि एवं बुद्धिसे पहले समष्टि निद्रारूप अविद्या और उससे भी पहले उसका भासक अखण्ड अनुभव था। विद्यमान वस्तुकी ही अभिव्यक्ति होती है। बालूमें तेलकी तरह अत्यन्त अविद्यमान वस्तुका कभी भी प्रादुर्भाव हो नहीं सकता। लेनिनकी युक्तियुक्त बुद्धिकी विशेषता अन्त:करणकी वृत्तिसे ही सम्बन्ध रखती है। जैसे विभिन्न काष्ठों, तारों तथा अनेक उपाधियोंके कारण प्रकट विशिष्ट अग्निके प्रकारोंमें विशेषता आ सकती है। व्यापक मूल अग्निकी सत्तामें इन उपाधियोंके भाव-अभावका कुछ असर नहीं पड़ता। इसी तरह बुद्धिकी विभिन्न अवस्थाओं एवं बाह्य उपाधियोंमें भेद होनेपर भी सर्वभासक अखण्ड बोधमें इन बाह्य व्यवहारोंका कुछ भी असर नहीं पड़ता। प्रमाणोंके आधारपर वादि-प्रतिवादियोंद्वारा निर्णीत सत्य ही सिद्धान्त होता है। प्रामाणिक निर्णय न तो पुरुषोंकी इच्छापर निर्भर होता है और न आवश्यकताकी अपेक्षा रखता है। अनिष्ट निर्णयकी न तो आवश्यकता ही होती है और न पुरुषकी इच्छा ही वैसी होती है। फिर प्रमाणके द्वारा वस्तुतन्त्रज्ञान होता ही है। हाँ, सिद्धान्तोंको जानकर उनके आधारपर आवश्यकता-पूर्ति होती है। जैसे जल-अग्नि आदिका सामान्यरूपसे प्रयोगसे सिद्धान्त और सिद्धान्तसे प्रयोगमें प्रगति होती है, परंतु ये बातें आपेक्षिक हैं। सिद्धान्त न तो रबड़छन्दकी तरह घटता-बढ़ता है और न तो गिरगिटकी तरह क्षण-क्षणमें रंग ही बदलता रहता है। कहा जा चुका है कि प्रमाणोंके आधारपर वादि-प्रतिवादिद्वारा सत्यका निर्णय ही सिद्धान्त है। त्रिकालबाध्य सत्य परिवर्तनशील नहीं होता है। अग्नि उष्ण है—यह सिद्धान्त अस्थायी नहीं। उद्योग और सिद्धान्त दोनों ही सामाजिक मनुष्यकी क्रिया है। बुखारिनका यह कहना भी इसी अंशमें सही है कि जानकारी मानसी क्रिया है, परंतु इससे भी प्रकाशस्वरूप ज्ञानकी नित्यता एवं सिद्धान्तकी स्थिरतामें फरक नहीं पड़ता। हाँ, यह सही है कि जिस वस्तुका ज्ञान अपूर्ण है, उसके सिद्धान्त भी अपूर्ण होंगे। उस सम्बन्धमें जितना ही अधिकाधिक परिचय होगा, उतनी जानकारी होगी, उसी ढंगका सिद्धान्त बनेगा। इसमें भी सन्देह नहीं है कि प्रयोगमें शारीरिक श्रमकी विशेषता रहती है और सिद्धान्तमें मानसिक श्रमकी विशेषता। फिर भी यह व्यवस्थित नहीं है। कितने ही प्रयोग भी मानसिक ही होते हैं। प्रयोग और सिद्धान्त जबतक अन्तिम रूपसे निश्चित नहीं होते, तबतक उनमें विकास या परिवर्तन होता रहता है, परंतु अन्तिम रूपसे निश्चित हो जानेपर विकास समाप्त हो जाता है। इसीलिये यह भी नहीं कहा जा सकता कि प्रयोग और सिद्धान्तकी क्रिया-प्रतिक्रिया और उनकी एकताका विकास प्रयोगकी प्राथमिकताकी बुनियादपर होता है; क्योंकि प्रयोग-प्रवृत्ति भी ज्ञानपूर्वक ही हुआ करती है। प्रवृत्तिमात्रकी प्रथम बुनियाद है ज्ञान। अतएव कहा जा सकता है कि सर्वत्र ज्ञानसे ही व्यवहारने जन्म ग्रहण किया है। सर्वव्यवहारहेतु आत्मा या अन्त:करणका गुण ही ज्ञान कहा जाता है। जैसे हमारे ज्ञानसे घटादि वस्तुएँ उपजती हैं, उसी तरह ईश्वरीय ज्ञानसे आकाशादि वस्तुएँ उपजती हैं। ‘जानाति, इच्छति, अथ करोति’ यह व्यापक सिद्धान्त है। कोई व्यक्ति जानता है, इच्छा करता है, फिर क्रिया करता है। सामाजिक रहन-सहन सामाजिक चेतनका मूल है, यह भी अर्धसत्य है। सत्य यह है कि रहन-सहन भी विचारमूलक होते हैं। उनमें उत्तरोत्तर स्पष्टता होती रहती है। शिक्षणपरम्परा या किसी कारणसे अभिव्यक्त विशेष ज्ञान ही सामाजिक चेतनाका मूल है। अतएव श्रम-क्रिया-शक्तिजनित सामाजिक विकास अंशत: मान लेनेपर भी हर क्रियाके मूलमें ज्ञान है। यह न भूलना चाहिये कि क्रिया इच्छाजन्य है, इच्छा ज्ञानजन्य है, क्रियाजन्य जब इच्छा भी नहीं है, तब इच्छाका भी जनक ज्ञान क्रियाजन्य कैसे होगा? प्रयोगकी प्राथमिकताकी बुनियादपर प्रयोग और सिद्धान्तके समन्वयका मार्क्सीय शिक्षाका सिद्धान्त सर्वथा असंगत है।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट नि&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;न : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>तथ्य</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>व्यवहार</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>10.9 काण्टका ज्ञान-सिद्धान्त ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/10-9-kaannttkaa-jnyaan-siddhaant/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/10-9-kaannttkaa-jnyaan-siddhaant/</guid><description>10.9 काण्टका ज्ञान-सिद्धान्त ‘काण्ट इससे सहमत है कि हमारा ज्ञान अनुभवसे आरम्भ होता है और इस अनुभवकी प्रारम्भिक बात है—बाहरी वस्तुओंका अस्तित्व। वह केवल इस बातसे इनकार करता है कि यहीं इसका अन्त होत…</description><pubDate>Sat, 28 Jun 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;10.9 काण्टका ज्ञान-सिद्धान्त&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;‘काण्ट इससे सहमत है कि हमारा ज्ञान अनुभवसे आरम्भ होता है और इस अनुभवकी प्रारम्भिक बात है—बाहरी वस्तुओंका अस्तित्व। वह केवल इस बातसे इनकार करता है कि यहीं इसका अन्त होता है; क्योंकि हमें ऐसी चीजोंका ज्ञान है, जो अनुभवसे परे हैं। वह इसको मान लेता है कि शेषोक्त प्रकारका ज्ञान पूर्वोक्त प्रकारके ज्ञानका अनुमान कर लेता है; क्योंकि यह कैसे सम्भव है कि पहचान (ज्ञान)-की शक्तिका उद‍्बोध न हो सिवा उन वस्तुओंके संयोगसे, जिनका प्रभाव हमारी इन्द्रियोंपर पड़ता है और जो स्वयं अपने प्रतिबिम्ब उत्पन्न करती हैं और अंशत: हमारी बुद्धिको जाग्रत् करती हैं, ताकि वह इन प्रतिबिम्बोंकी तुलना कर सके, इनको जोड़ सके तथा अलग-अलग कर सके और इस प्रकार हमारे इन्द्रिय-लब्ध चित्रोंके सच्चे मालको वस्तुओंके ज्ञानके रूपमें परिणत करता है और जिसको हम अनुभवका नाम देते हैं। इसलिये समयके ख्यालसे हमारा कोई ज्ञान अनुभवसे पहले नहीं है, बल्कि इसके साथ ही आरम्भ होता है। ‘वह आगे चलकर कहता है कि ‘ज्ञानका एक और अंग है। यद्यपि हमारा ज्ञान अनुभवसे आरम्भ होता है, इसका यह अर्थ नहीं कि अनुभवसे ही सब ज्ञानकी उत्पत्ति होती है; क्योंकि इसके विपरीत यह बहुत सम्भव है कि जो कुछ हमको इन्द्रिय-संयोगसे प्राप्त होता है और जो कुछ हमारी पहचानकी शक्ति स्वयं अपना अंश मिलाती है, इन दोनोंके मिश्रणसे ही हमारा व्यावहारिक ज्ञान बनता है। लेकिन मुद्दतकी आदतसे ही हमारे अन्दर वह कौशल और एकाग्रता आती है, जिससे हम इन दोनोंको पृथक् करनेमें समर्थ होते हैं। काण्टके पहलेके दार्शनिक दो मुख्य दलोंमें बँटे हुए थे, एक भौतिकवादी, जो इन्द्रियानुभव तथा उसके ऊपर सोच-विचारके दूसरे रास्तेद्वारा बाहरी दुनियाँसे एक ज्ञानकी उत्पत्ति बताते थे और दूसरे आदर्शवादी, जो कहते थे कि मानसमें ऐसे विचार हैं, जिनका कारण नहीं बताया जा सकता। ऐसे विचार जिनकी सार्वभौमिकता और अमूर्तरूप यह निर्देश करता है कि ये स्वयं प्राप्त हैं और सब अनुभवके मूलमें हैं।’ ‘काण्टकी ऐतिहासिक स्थिति यह है कि दोनों दृष्टिकोणोंके समन्वयके द्वारा उसने इस विरोधका अन्त किया और उसका यह दावा था कि इस नये दृष्टिकोणमें उसने इन दोनोंका सम्मेलन एक ऊँचे स्तरपर कराया है। उसने यह मान लिया कि स्थान, काल, कारण इत्यादि अमूर्त कल्पनाओंको केवल अनुभवमें रूपान्तरित नहीं किया जा सकता, दूसरी ओर यद्यपि ये स्वयं प्राप्त हैं। यह कल्पना नहीं की जा सकती कि ये बिलकुल ही अनुभवपर निर्भर नहीं हैं। उसका दावा था कि वास्तविकता यह है कि सब अनुभवके मूलमें पूर्व परिस्थितियोंके रूपमें ये विद्यमान हैं और इस तरह ये अनुभवके रूपोंका निर्णय करते हैं।’ ‘उसने यह दलील दी कि बाहरी वस्तु और दूसरी मानव बुद्धि—ये ज्ञानके दो उद‍्गम नहीं हैं—ज्ञानका एक ही उद‍्गम है—वह है कर्ता और कर्म (बुद्धियुक्त मनुष्य और वस्तु)-का सम्मेलन। जैसे जलका कारण अम्लजन और उद्रजनका सम्मेलन है। यहाँ यह नहीं कहा जा सकता कि जलके दो कारण हैं, किंतु दोनोंका सम्मेलनरूप एक ही कारण है। उसी तरह प्रकृतमें भी समझना चाहिये। कर्ता और कर्मका सम्मेलन ही जलका कारण है। सारा संसार हमारे लिये दृश्यमान घटनाओंकी एक परम्परा है। क्या ये दृश्य मानसकी उपज हैं, जिसके सामने ये दर्शित होते हैं या कि ये वस्तुओंके विशुद्ध प्रतिनिधि हैं? आदर्शवाद या वस्तुवाद—दोनोंमेंसे कोई नहीं और दोनों मानस और वस्तु सहयुक्त होकर दृश्य या प्रत्यक्षीकरणको उत्पन्न करते हैं। प्रत्यक्षीकरण दोनोंके सम्मेलनका ही फल है।’ ‘अनुभवसे ज्ञानका आरम्भ होता है’, इत्यादि काण्टका कथन इन्द्रिय-व्यापार आदिके अभिप्रायसे संगत होता है। इन्द्रिय, मन, अहंकार एवं बुद्धिके व्यापारोंको ही अनुभव, संकल्प आदि अनेक नाम दिये गये हैं। वस्तुत: ये सभी जड हैं। जड़ोंमें जब अपने ही प्रकाशकी शक्ति नहीं है, तब उनसे विषय-प्रकाशकी कल्पना सर्वथा निरर्थक है। मन या अन्त:करणकी वृत्ति भी ज्ञानपदसे कही जाती है, परंतु यह सब कथन औपचारिक ही है। इन्हीं जड व्यापारोंकी उत्पत्ति और नाश कहा जा सकता है। सर्वप्रकाशक बोधका न प्रागभाव सिद्ध होगा और न तो प्रध्वंसाभाव ही। वस्तुओंके संयोगसे इन्द्रियोंपर प्रभाव पड़ता है और विषयरूपी वस्तुओंका प्रतिबिम्ब भी वृत्तिमें उत्पन्न हो बुद्धिके जागरणमें भी वस्तुओंका उपयोग होता है। फिर भी इनके द्वारा नित्य-बोधकी अभिव्यक्ति ही होती है, उत्पत्ति नहीं। जैसे काष्ठोंके संघर्षसे दाहकत्व-प्रकाशकत्वविशिष्ट अग्निका प्राकटॺ होता है, ठण्डे-गरम तारोंके योगसे विद्युत्प्रकाशका प्राकटॺ होता है, किंवा सूर्यकान्तमणिके योगसे व्यापक सौरालोकका अग्निके रूपमें प्राकटॺ होता है, स्वच्छ काँच आदिके योगसे सौरालोक चमत्कृत होता है, उसी तरह वृत्तियोंके योगसे व्यापक अखण्ड बोध चमत्कृत होता है। इस तरह अनुभव और ज्ञानका भिन्न-भिन्न अर्थोंमें प्रयोग केवल ज्ञानकी उपाधियोंमें ही होता है। वस्तुत: स्वतन्त्र नित्य नीरूप चित्प्रकाश ही अनुभव एवं ज्ञान आदि शब्दोंका लक्ष्य अर्थ है। व्यावहारिक ज्ञान-पहचान, अनुभव, इनकी उत्पत्ति, विनाश, स्पष्टता, अस्पष्टता, एकता एवं अनेकता—ये भी बातें इन्द्रिय, मन, अहंकार एवं बुद्धिके ही विभिन्न व्यापारोंसे सम्भव हैं, परंतु एक समान प्रकाश तो सर्वत्र एक-सा ही रहता है। उसी एक नित्यप्रकाशको ही किन्हीं पाश्चात्योंने मानसमें स्वयंसिद्ध माना है। अतएव ‘अनुभवकी स्पष्टता या उसका निरूपण बाह्यवस्तुसापेक्ष है’—यह काण्टका कथन भी इसी दृष्टिसे संगत होता है। बुद्धियुक्त मनुष्य और बाह्यवस्तुओंसे अनुभव उत्पन्न होता है, यह कथन भी वृत्तिरूप ज्ञानके सम्बन्धमें है। बुद्धिवृत्तिरूप ज्ञानके उत्पन्न होनेपर उसीके द्वारा नित्य ज्ञानका प्राकटॺ होता है। यद्यपि परमार्थ सत्य यही है कि सम्पूर्ण संसार मानसकी ही उपज है। इतना ही क्यों? मानस भी तो अखण्ड बोधका ही एक भ्रान्तिसिद्ध रूप है। क्या हम देखते नहीं कि स्वप्नका देह, स्वप्नका प्रपंच, स्वप्नका सभी दृश्य एक ढंगके बोधका ही विवर्त है। कुछ निम्नस्तरकी दृष्टिसे मानस और बाह्यवस्तुओंके सम्मेलनसे प्रत्यक्षीकरण आदि व्यापारके भासक साक्षीका अपलाप नहीं किया जा सकता। ‘हीगेलके बहुतेरे सिद्धान्तोंका मूल काण्टके &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-paashcaaty-drshn-1-1-drshnkii/&quot;&gt;दर्शन&lt;/a&gt;में मिलता है। जब काण्टने सब सम्भव ज्ञानके क्षेत्रको उन रूपोंमें सीमित कर दिया, जिनमें मनुष्य बाहरी दुनियाँको देखता है तो उसने हीगेलके इस वाक्यकी नींव डाली कि जो कुछ वास्तव है, वह तर्कसंगत है और जो कुछ तर्कसंगत है, वह वास्तव है। यह ठीक है कि काण्टने अस्वीकार किया कि वस्तुस्वरूप कोई ज्ञान प्राप्त हो सकता है, लेकिन हीगेलको दो दिशाओंमें यह असम्बद्ध मालूम हुआ। पहली बात तो यह है कि इस सिद्धान्तके अनुसार कि ‘विचाररूप’ के अन्दरकी वास्तविकताको देनेवाला अनुभव ही है। वस्तुस्वरूप नामक विचाररूप तभी सत्य हो सकता है, जब इसकी उत्पत्ति किसी अनुभवसे ही हो। दूसरी बात यह है कि दृश्यगत घटनाओंमें तथा इनके और बुद्धिके बीचके सम्बन्धमें ही अनुभवका निवास है। एंजिल्सने इसीका भाषान्तर करके कहा ‘यदि हम किसी वस्तुके सभी गुणोंको जान लें, तो वस्तुस्वरूपके विषयमें कुछ आविष्कार करना बाकी नहीं रह जाता, सिवा इसके कि वह वस्तु हमारे बाहर है और उसका अस्तित्व हमारे ऊपर निर्भर नहीं है।’ ‘इन्द्रियानुभूतिवादियों (लॉक इत्यादि) के खण्डनकी क्रियामें काण्टके सिद्धान्तोंने उसको यह कहनेके लिये बाध्य किया कि हम पृथक् रूपसे केवल गुणोंका प्रत्यक्षीकरण नहीं करते। सम्पूर्ण प्रत्यक्षकारी संज्ञा क्रियाशील प्रत्यक्षीकरणमें सम्पूर्ण बाहरी वास्तविकताके द्वारा संशोधित और परिवर्तित होती है। हीगेलने इन दोनों सम्पूर्णोंको एक विकासमान सम्पूर्णके धनात्मक और ऋणात्मकरूपमें माना और इस प्रकार पूर्ण आदर्शवादको पहुँचे। ‘काण्टने कर्ता और कर्म (वस्तु)-के विरोधात्मक एकत्वको अपनी दर्शन-व्यवस्थाका केन्द्र बनाया। लेकिन उसकी इस कल्पनामें यह असंगति थी कि एक ही ओर यानी कर्ताकी ओर ही यह एकत्व क्रियाशील तथा फलोत्पादक है। हीगेलने इस असंगतिको दूर किया और इस बुनियादपर अपनी सारी प्रथाका निर्माण किया कि सत्यका अवस्थान न केवल शुद्ध कर्तामें और न केवल शुद्ध वस्तुमें है, बल्कि इनके बीचके क्रियाशील सम्बन्धमें है—जिस सम्बन्धके द्वारा कर्ता और वस्तु, दोनोंमें क्रमवर्धनशील रूपान्तर होता रहता है। आदर्शवादके स्तरपर यह कल्पना हमको ले जाती है, मार्क्सीय विश्वकल्पनाकी ओर। आदर्शवादने क्रियाशील पक्षको विकसित किया, लेकिन केवल अमूर्तरूपमें द्वन्द्वमान, तर्क और विचारके व्यापक नियमोंके विकासमें तथा मनुष्यकी मस्तिष्क-क्रियाकी सीमाओंको रेखांकित करनेमें। वस्तुओंके द्वारा रक्तमांससम्पन्न मनुष्य-व्यवहारके क्रियाशील पक्षका विकास भौतिकवादियोंने किया नहीं और आदर्शवादी अपने आदर्शवादके कारण कर न सके।’ ‘प्रारम्भमें दिये गये ज्ञानकी परिभाषाका द्वन्द्वात्मकरूप अब समझा जा सकता है। मनुष्यके बाहर स्थित प्रकृति ही ज्ञानका उद‍्गम है। ज्ञानप्रक्रिया मनुष्य और वस्तुके बीच एक क्रिया-प्रतिक्रिया है, जो मनुष्य और वस्तुको भिन्न बना देती है, ज्ञात होनेके कारण। ज्ञात वस्तु अपने पहले रूपसे विभिन्न बन जाती है और ज्ञानी मनुष्य भी अपने पहले रूपसे भिन्न है। ज्ञानका मूल है मनुष्यकी व्यावहारिक क्रिया—वस्तुओंके द्वारा, अनुभवके द्वारा। ज्ञानप्राप्तिकी पहली सीढ़ी है इन्द्रियानुभूति। इन्द्रियानुभूति कोई ऐसी चीज नहीं है, जो मनुष्य-अवयवके साथ सदा एक-सी बनी रहती हो। यह इन्द्रियानुभूति एक विशेष उपज है और यह पैदा होती है पशुओंकी इन्द्रियानुभूतिसे भिन्नरूपमें; ऐतिहासिक, सामाजिक प्रयोगकी बुनियादपर। सामाजिक ज्ञानका विकास इन्द्रियानुभूति तथा युक्तियुक्त ज्ञान दोनोंको समृद्ध करता है। किसी भी असभ्य मनुष्यके विचार और इन्द्रियानुभूतिका स्तर इतना निम्न होता है कि किसी सभ्य मनुष्यसे उसकी तुलना नहीं हो सकती। उसके निम्नस्तर और अत्यन्त सीमित पार्थिव आचार-व्यवहारपर ही उसके विचार और इन्द्रियानुभूति दोनों ही निर्भर हैं। ज्ञानकी दूसरी सीढ़ी है तर्कबुद्धि। यह बुद्धि भी प्रयोग और व्यवहारके द्वारा आती है।’ वृत्तिरूप ज्ञानका ही क्षेत्र किन्हीं रूपोंमें सीमित हो सकता है। निर्विषय, निर्दृश्य शुद्धबोधके सम्बन्धमें यह नहीं कहा जा सकता। साथ ही बाह्यरूप भी सीमित नहीं है। केवल जो कुछ मानवबुद्धिग्राह्य है, वही सब कुछ नहीं है। मनुष्यकी अल्पज्ञता तो स्पष्ट ही है। यदि हम वस्तुका सभी गुण जान लें तो वस्तुस्वरूपके विषयमें कुछ आविष्कार बाकी नहीं रह जाता। एंजिल्सका यह विचार भी आकाशकुसुमकी कल्पना ही है। स्वाप्निक दृश्यवस्तु जैसे द्रष्टापर ही निर्भर होती है, उसी तरह जाग्रत्-प्रपंच भी द्रष्टापर ही निर्भर है। इसीलिये हीगेलको चेतनसे अचेतनकी उत्पत्ति माननेको बाध्य होना पड़ा। काण्ट और हीगेलके इस भेदमें कोई तथ्य नहीं है कि कर्ता और कर्मका क्रियाशील एकत्व क्रियाशील तथा फलोत्पादक है या क्रियाशील सम्बन्ध फलोत्पादक है; क्योंकि ज्ञान स्वयं चेतन एवं प्रकाशात्मक होनेसे कर्ताकी जातिका है, अत: कर्ताकी ओर फलोत्पत्तिका व्यवहार होता है—यह काण्टका अभिप्राय है। निर्विकार, निर्दृश्य अखण्ड बोधमें विषयोपराग स्वत: सम्भव नहीं है। अत: दृक्, दृश्य, चेतन, अचेतनके अन्योन्याध्याससे ही व्यावहारिक सप्रपंच ज्ञान होता है। यही हीगेलका अभिप्राय है। मार्क्सके अनुसार ‘मनुष्य एवं वस्तुके बीचकी क्रिया-प्रतिक्रिया ही ज्ञानप्रक्रिया है और ज्ञानका मूल मनुष्यकी व्यावहारिक क्रिया है। इन्द्रियानुभूति और तर्क-बुद्धि ही प्रयोग एवं व्यवहारके द्वारा युक्तियुक्त ज्ञानका निर्माण करती है।’ जहाँतक व्यावहारिक वृत्तिरूप-ज्ञानकी बात है, सांख्यवादी भी यही मानते हैं। इतना अवश्य है कि सांख्योंका मनुष्य रक्त-मांस-अस्थिपंजरमात्र नहीं; किंतु वह चेतन असंग आत्मा है और उसी दृष्टिसे द्रष्टा तथा दृश्य, कर्ता और कर्म, भोक्ता तथा भोग्यका भेद भी सिद्ध होता है अथवा इससे निम्नस्तरपर उतरें तो कह सकते हैं कि सूक्ष्म सत्त्वात्मक बुद्धितत्त्व ही कर्ता या ज्ञाता है। तामस, राजस, स्थूल-प्रपंच वस्तु है। यही कर्ता, कर्म, ज्ञाता एक ज्ञेयका भेद है, परंतु मार्क्सके अनुसार ‘भूत ही सब कुछ है। उसका ही परिणाम वस्तु है और उसीका परिणाम मनुष्य है।’ फिर उसकी क्रिया-प्रतिक्रियासे भी अति विलक्षण प्रकाशरूप ज्ञान किस तरह उत्पन्न हो सकेगा, यह विचारणीय विषय है।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt; और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट नि&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;न : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>काण्ट</category><category>ज्ञानप्रेम</category><category>धर्मसम्राट</category><category>पूर्वनिर्धारण-का-सिद्धान</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>10.8 द्वन्द्वन्याय और अन्तिम सत्य ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/10-8-dvndvnyaay-aur-antim/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/10-8-dvndvnyaay-aur-antim/</guid><description>10.8 द्वन्द्वन्याय और अन्तिम सत्य कहा जाता है ‘द्वन्द्वमान किसी भी अन्तिम सत्यको नहीं मानता, इसके विपरीत आदर्शवादी दर्शन हर समय एक अन्तिम सत्यकी खोज करता रहता है। यह सत्य अनादि, अनन्त और निर्विकार…</description><pubDate>Fri, 27 Jun 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;10.8 द्वन्द्वन्याय और अन्तिम सत्य&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;कहा जाता है ‘द्वन्द्वमान किसी भी अन्तिम सत्यको नहीं मानता, इसके विपरीत आदर्शवादी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-paashcaaty-drshn-1-1-drshnkii/&quot;&gt;दर्शन&lt;/a&gt; हर समय एक अन्तिम सत्यकी खोज करता रहता है। यह सत्य अनादि, अनन्त और निर्विकार है; लेकिन द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद इस परिवर्तनशील जगत‍्में अपरिवर्तनीय सत्यकी खोज नहीं करता। इस दृष्टिकोणकी कहीं अन्तिम समाप्ति नहीं है। भूत-जगत् निरन्तर प्रवहमान है, कहीं विराम नहीं। हम व्यावहारिक सुविधाकी दृष्टिसे और प्रकृतिको विचारबद्ध करनेकी दृष्टिसे वस्तुजगत‍्की किसी एक दिशाकी विशेषताओंको अलग कर लेते हैं, लेकिन सनातन युक्तिका अनुसरणकर इनको अपरिवर्तनीय नहीं मानते। परमाणु गतिशील तरंगकी तरह है, लेकिन यह केवल वस्तु-जगत‍्के एक विशेष क्षेत्रके लिये ही सत्य है। दूसरे जगत‍्में यही ठोस पदार्थका आकार ग्रहण करता है। चेतन और अचेतन पदार्थको हम ‘पृथक् रूपमें देखते हैं और इस पार्थक्यकी आपेक्षिकताको भी देखते हैं। चेतन पदार्थके बीच भी अचेतन पदार्थका उपादान है, भूत-जगत‍्के अन्तर्निहित विरोधी गुण ही कभी चेतन और कभी अचेतन पदार्थकी सृष्टि करते हैं। एक अवस्थामें परमाणु अविभाज्य और मौलिक दीखता है और फिर यही अपनी शक्तिसे टूटकर नये परमाणुको जन्म देता है। पंचेन्द्रियकी क्षमताकी सीमाको हम देखते हैं, पुन: ये ही यन्त्रकी सहायतासे अदृश्यको दृश्यमान करते हैं। ‘इनफ्रारेड’ फोटो-प्लेटमें कुहरेके भीतरसे १५, २० मील दूरकी तस्वीर उतर जाती है।’ ‘वस्तु जगत‍्के गतिप्रवाहमें कोई विराम नहीं है, एक ही वस्तुकी विरोधी शक्ति उसको एक जगहसे दूसरी जगह ले जाती है, कणिकासे तरंग और अचेतनसे सचेतन हो रही है। द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद इसी प्रकार वैज्ञानिक परीक्षाके क्षेत्रमें प्रमाणित हो रहा है। ‘बँधी पगडण्डीपर चलनेवाले बुर्जुआ, बुद्धिजीवी अवज्ञाके साथ कहते हैं कि विज्ञानके सिद्धान्त तो रोज बदलते रहते हैं, उनकी सत्यता कहाँ? नासिकाग्रपर दृष्टि स्थिरकर जो योगबलसे सब कुछ जान लेते हैं, उनके सिद्धान्त नहीं बदलते; क्योंकि उन्होंने तो अन्तिम सत्यपर अधिकार जमा लिया है, लेकिन वैज्ञानिक सिद्धान्त तो बदलते रहते हैं। व्यवहारमें इन सिद्धान्तोंकी जाँच होती रहती है और यहींपर वैज्ञानिक सिद्धान्तकी सार्थकता है।’ अध्यात्मवादमें भौतिक पदार्थोंकी सत्यताके अनेक तारतम्य हो सकते हैं, परंतु भौतिक प्रपंचका आधारभूत स्वप्रकाश चेतन आत्मा तो परमार्थ सत्य ही है। अत्यन्ताबाध्यता ही पारमार्थिक सत्यता है। सर्वाधिष्ठान, सर्वसाक्षी, अत्यन्ताबाध्य है ही। साक्षीविहीन बाध भी सिद्ध नहीं होता। जब सर्वबाधका साक्षी होना अनिवार्य है ही और उस साक्षीका कोई बाधक प्रमाण सिद्ध नहीं है, तब त्रिकालाबाध्य परमार्थसत‍्का अपलाप कौन कर सकता है? व्यावहारिक सत्य भी ऐसा ढुलमुल नहीं है, जैसी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt;ियोंकी धारणा है। मार्क्सवादियोंका टूटनेवाला, विभक्त होनेवाला परमाणु अध्यात्मवादियोंको मान्य नहीं है। यहाँ तो जिसका विभाग न हो सके, उसी अन्तिम अवयवको परमाणु कहा जाता है। किसी तरह भी जिसका विभाजन हो सकता है, वह परमाणु है ही नहीं। परिवर्तनशील जगत् है, इस सिद्धान्तको तो सत्य मानना ही चाहिये। इसी प्रकार चेतन-अचेतन भूत-जगत‍्के अन्तर्निहित विरोधी गुण हैं, यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि वस्तुको भी चेतन या अचेतन किसीमें अन्तर्निहित करना पड़ेगा। अचेतनसे चेतनकी उत्पत्तिकी अपेक्षा चेतनसे अचेतनकी उत्पत्तिमें अधिक युक्तियाँ हैं, यह बात कही जा चुकी है। पंचेन्द्रियोंकी क्षमताकी सीमामें साधनोंके साहित्य, राहित्यसे अन्तर पड़ सकता है। फिर भी उनकी इस सीमामें कोई अन्तर नहीं होता कि श्रोत्रसे शब्दका ही ग्रहण होता है, रूपका नहीं; घ्राणसे गन्धका ही ग्रहण होता है, शब्दका नहीं; इत्यादि। ‘अचेतनसे चेतनकी उत्पत्ति होती है’ इस सम्बन्धमें कोई भी वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। विज्ञानमें परिवर्तन आये दिन होता ही रहता है। इसका अपलाप प्रौढिवादसे नहीं हो सकता। जैसे बुर्जुआलोग बँधी पगडण्डीके अन्धविश्वासी हैं, वैसे ही मार्क्सवादी राजमार्गको छोड़कर विपथगामी होनेके अन्धविश्वासी हैं। कोई भी मार्ग हो आखिर मार्ग ही है, उसपर चलनेसे वैज्ञानिक जाँच होती रहे; परंतु इसीसे एकान्तनिश्चित सिद्धान्त परित्याग नहीं किया जा सकता। धार्मिक, आध्यात्मिक, राजनीतिक कोई भी कार्यपद्धति अनिश्चित अवस्थामें नहीं चल सकती। एक निश्चित चिकित्सापद्धतिको छोड़कर कोई बुद्धिमान् अपने शरीरको नवसिखिये वैज्ञानिकोंकी प्रयोगशाला बनानेको प्रस्तुत न होगा। जिस आध्यात्मिक, धार्मिक सत्य-निर्णयसे लौकिक, पारलौकिक कल्याणका सम्बन्ध है, उसे अनिश्चित अवस्थामें डालकर कोई भी बुद्धिमान् सन्तुष्ट नहीं हो सकता। फिर विज्ञानकी भी तो कुछ सीमाएँ हैं। यह कहा जा चुका है कि घ्राण या रसनाद्वारा रूप या शब्दके निर्णयकी वैज्ञानिक चेष्टा व्यर्थ ही है। मार्क्सवादी कहते हैं कि ‘ज्ञान-विज्ञान सभी मनुष्यके कर्म और विचारके बीच सृष्ट होते हैं। वैज्ञानिक तत्त्व पारस पत्थरकी तरह एकाएक नहीं मिल जाता। मनुष्यके कर्म और विचारकी क्षमता उसकी शिक्षा पारिपार्श्विक और यन्त्रादिके ऊपर यदि अलौकिक प्रेरणा ही ज्ञानका मूल होती तो पाँच सालकी उम्रका बालक भी जंगलमें बैठकर ही सब कुछ आविष्कार कर लेता। वैज्ञानिक सिद्धान्तोंकी आपेक्षिकताका कारण यह है कि वैज्ञानिक ज्ञान उत्पादन-व्यवस्थाकी उन्नति तथा वैज्ञानिक शिक्षाका स्तर और पारिपार्श्विकके ऊपर निर्भर हैं। दूसरा कारण यह है कि वैज्ञानिक तत्त्वका संग्रह हम भूत-जगत‍्से करते हैं। यदि यह भूत-जगत् अपरिवर्तनीय होता तो हम सब कुछ बिना अवशिष्टके जान सकते। लेकिन यह भूत-जगत् ही द्वन्द्वात्मक रीतिसे बनता बिगड़ता है। इस ध्वंस और निर्माणके एक विशेष अंशको अलगकर इसकी परीक्षाकर अपनी ज्ञानकी सत्यताको हम प्रमाणित करते हैं, परंतु द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद हमको आगाह कर देता है कि चरम ज्ञानकी खोज मत करो; क्योंकि जिसको जान रहे हो, उसीका कोई चरम शेष नहीं है। भूत जगत् निरन्तर परिवर्तित हो रहा है। नुख्ताबन्द घोड़ेकी तरह चलनेवाले बुर्जुआ दार्शनिक तब नसीब ठोककर कहते हैं—‘इसीलिये तो सभी माया है, हम कुछ नहीं जान सकते, परम पिता परमेश्वर ही जान सकते हैं।’ व्यावहारिक ज्ञान यह सिद्ध करता है कि भूत-जगत‍्को हम जान सकते हैं। वह इसका पूर्व विभाग है, लेकिन इसकी कोई सीमा नहीं है। यदि तुम्हारा यह ख्याल है कि एक विराम-दण्ड खींचे बिना तुम्हारे मनको सान्त्वना नहीं मिलेगी, समुद्रके उच्छ्वासके स्तब्ध हुए बिना समुद्रका ज्ञान प्राप्त नहीं हो सकेगा, तो यह तुम्हारी दुर्बलता है। न भूत-जगत‍्का कोई अपराध है, न वैज्ञानिक धाराकी कोई त्रुटि। वैज्ञानिक हर समय नये तत्त्व और नये तथ्यका संधान करता रहता है और हरेक वैज्ञानिक सत्यभूत जगत‍्के गति-प्रवाहका अपेक्षित और आंशिक विवरणमात्र है। इसको भ्रम कहकर उड़ाया नहीं जा सकता।’ ‘भौगोलिक तत्त्वका एक दृष्टान्त लीजिये, भारतवर्षका जो वर्तमान मानचित्र हम आज देख रहे हैं, वह क्या सदासे ऐसा ही रहा है? दो हजार वर्ष पूर्व भारतवर्षका जो रूप था, वह आजसे बहुत भिन्न था और दस हजार वर्षोंके बाद इसका रूप और भी बदल जायगा। बंगालकी खाड़ीके बीच रेत उठ सकती है, कोई पहाड़ ऊँचा या नीचा हो सकता है। किसी नदीका प्रवाह बदल सकता है। इसलिये आजका मानचित्र, जो परीक्षित सत्य है, दस हजार वर्ष बाद एक ऐतिहासिक सत्यमात्र रह जायगा। ग्रीनलैण्डकी वर्तमान अवस्थाके वर्णनका दो हजार वर्ष पूर्वकी अवस्थासे कोई सम्बन्ध नहीं है। आज वह जनविहीन है। एक समय वह जनबहुल था और वहाँकी जलवायु मनुष्यके निवासके लिये उपयुक्त थी। ये भौगोलिक सत्य चरम सिद्धान्त नहीं हो सकते; क्योंकि भौगोलिक अवस्था परिवर्तनशील है। वैज्ञानिक सिद्धान्त भी इसीलिये आपेक्षिक है, तथापि यह परीक्षासिद्ध और कार्यकारी है। तर्ककी आतिशबाजीसे इस सत्यको उड़ाया नहीं जा सकता।’ ‘वैज्ञानिक सत्यसे कुछ दूसरे प्रकारकी आपेक्षिकता है। एक दृष्टान्त ले लीजिये। जब चन्द्रके ऊपर पृथ्वीकी छाया पड़ती है, तो हम कहते हैं कि चन्द्रग्रहण हो गया। हमारी यह दृष्टि पृथ्वीसे सम्पृक्त है। इसी घटनाको यदि कोई चन्द्रके ऊपरसे देख ले तो वह कहेगा कि सूर्यग्रहण हो गया; क्योंकि चन्द्रके ऊपरसे वह देखेगा कि सूर्यके ऊपर पृथ्वीकी छाया पड़ी है। जिस घटनाका यह अवलोकन किया जा रहा है, वह न भूल है और न मायादृष्टिकेन्द्र (फ्रेम-ऑफ-रिफरेन्स)-की विभिन्नताके कारण एक ही घटना दो प्रकारसे दीख रही है। यहाँ भी वैज्ञानिक ज्ञानकी आपेक्षिकता प्रमाणित हो रही है। सत्य आपेक्षिक है सही, लेकिन इस आपेक्षिकताको अति तक पहुँचाया जा सकता है और तब यह हास्यास्पद बन जाता है। इसी प्रकारकी आपेक्षिकताकी आड़ लेकर वर्तमान पूँजीवादी भविष्यके एक वैज्ञानिक चित्रको देखनेसे मुँह मोड़ता है। सत्यकी परिभाषा करते हुए लेनिनने लिखा है कि यह दृश्यगत घटनाके सब पहलुओंका जोड़ है, उनकी वास्तविकता है, पारस्परिक निर्भरता है।’ अध्यात्मवादी इसे अनुक्तोपालम्भ कहते हैं। यह &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;वादीका कभी भी मत नहीं है। विज्ञानके लिये शिक्षा अपेक्षित नहीं है। अवश्य ही शिक्षा, विचार, कर्म और पारिपार्श्विक यन्त्र आदि ज्ञान-विज्ञानमें सहायक होते हैं। इन सामग्रियोंसे एक ज्ञानशक्तिसम्पन्न चेतनको ही ज्ञान-विज्ञान उत्पन्न होते हैं। इन सब सामग्रियोंके रहनेपर भी किसी काष्ठ, पाषाणको ज्ञान-विज्ञान नहीं सम्पन्न होता। काष्ठमें अग्नि है, तिलमें तैल है—वह प्रयत्नसे प्रकट होता है। इसी तरह चेतन प्राणीमें ज्ञानशक्ति है, वही प्रयत्नसे व्यक्त होती है। इसमें पूर्वके संस्कार भी हेतु होते हैं। आद्य शंकराचार्य आठ ही वर्षकी अवस्थामें सर्वशास्त्रोंके विद्वान् हो गये थे, परंतु सबमें यह क्षमता नहीं। ध्रुवको ईश्वरके विशेष अनुग्रहसे सम्पूर्ण ज्ञान हो गया था। गीताके कृष्ण तो स्वीकार करते हैं कि भगवान् आराधनाओंसे सन्तुष्ट होकर प्राणीको वह ज्ञानयोग प्रदान करते हैं, जिससे वह भगवान‍्को प्राप्त कर लेता है— ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते। (गीता १०।१०) बहुत प्रकारके ज्ञान पशु-पक्षियोंको भी होता ही है, हंसका क्षीरनीरविवेक, मधुमक्खियोंद्वारा मधुका निर्माण, भेड़ियों, बाजों तथा बिल्ली आदिद्वारा शिकारकी दक्षता आदि गुण बिना शिक्षाके भी हो जाते हैं। पक्षियोंमें उड़नेकी कला, मछलियोंमें तैरनेकी कला जन्मजात ही होती है; फिर वैज्ञानिकोंका घमण्ड क्या अर्थ रखता है? भूतजगत‍्का परिवर्तन तो परिणामवादी, आरम्भवादी सभी मानते हैं; परंतु उनके भी कुछ नियम हैं ही। वैज्ञानिकोंको भी कुछ नियम निश्चित करने पड़ते हैं। मार्क्सवादियोंको भी आखिर निर्वाण एवं निर्माणका नियम तथा परिवर्तनशील होनेका नियम, क्रम-परिवर्तन और क्रान्तिकारी परिवर्तन आदिके कुछ-न-कुछ नियम मानने ही पड़ते हैं। द्वन्द्वात्मक रीतिसे बनने-बिगड़नेका भी आखिर नियम हुआ ही। जैसे कूपमण्डूक या उदुम्बरफलके बीचमें रहनेवाला नगण्य जन्तु अपनी जानकारीको ही बहुत मानता है, उसी तरह मार्क्सवादी अपनेको सर्वज्ञ होनेका घमण्ड करते हैं। पर वस्तुस्थिति यह है कि हर बातमें वैज्ञानिककी भी खोपड़ीपर अज्ञान ही सवार रहता है। समझदार वैज्ञानिक नतमस्तक होकर यही कहता है कि ‘आजका सबसे बड़ा ज्ञान यही है कि अभी हमलोग कुछ भी नहीं जानते।’ फिर विज्ञान या वैज्ञानिकको यह अधिकार कहाँसे प्राप्त हुआ कि वह सत्य ज्ञानकी खोजको मना करे? अल्पज्ञान (अधूराज्ञान) और सम्यक् ज्ञानका भेद स्पष्ट प्रतीत हो तो किसी भी सम्बन्धमें तत्त्वज्ञानकी रुचि स्वाभाविक है। सिवा अल्पज्ञके आज भी कौन दावा कर सकता है कि हम सभी भूत-जगत‍्को जानते हैं? वैज्ञानिक हो चाहे और कोई, वह सत्यको बनाता नहीं; किंतु सत्यकी जानकारी प्राप्त करता है। यथाभूत वस्तु ही सत्य कहलाती है, उसको अयथाभूत जानना भ्रान्ति है। एक अल्पायु अज्ञ प्राणी अपने परिमित साधनोंसे, नि:सीम संसारमेंसे बहुत-सी वस्तुओंको बहुत अंशमें जानता है, उन्हींको नयी-नयी वस्तु, नये-नये तथ्यके रूपमें जानता-समझता है, परंतु एतावता दीर्घायु, दीर्घतपा, दीर्घदर्शियोंकी ऋतम्भरा प्रज्ञाद्वारा होनेवाले परमार्थ सत्यज्ञानका अपलाप नहीं किया जा सकता। भौगोलिक उथल-पुथलका परिज्ञान भी उन महातपस्वियोंको था ही। शास्त्रोंमें योगवासिष्ठ आदिमें यह स्पष्ट वर्णन है। जहाँ आज समुद्र लहराता है, वहीं कभी भीषण मरुस्थल परिलक्षित होने लगता है। जहाँ आज हिमालय है, वहाँ कभी समुद्र हो सकता है, इतना ही क्यों, उनकी दृष्टिमें सूर्य, चन्द्र, सागर, भूधर एवं समस्त वसुन्धराका अनेक बार उद्भव एवं अनेक बार प्रलय हुआ है। फिर भी भिन्न-भिन्न वस्तुओंके गुण, स्वभाव, परिमाण आदिका तथ्य वर्णन किया जाता है। व्यावहारिक वस्तुएँ आपेक्षिकरूपसे ही तथ्य हैं, यह तो शास्त्रोंका परम सिद्धान्त है। ‘तर्ककी आतिशबाजी नहीं’, तर्ककी गोलाबारी होती है, जिससे अपसिद्धान्त ध्वस्त हो जाता है। प्रमाण, युक्ति, तर्कविहीन विज्ञान विज्ञान ही नहीं, वह है निरा अज्ञान और निरा अभिमान। जिस भूमण्डलपर जो प्राणी रहता है, वहाँसे वह सूर्यग्रहण या चन्द्रग्रहणका विचार करता है। चन्द्रमासे सूर्यग्रहण या सूर्यसे चन्द्रग्रहणके विचारका मतभेद उपस्थित हो, तभी उस सम्बन्धमें विचार चल सकते हैं। आपेक्षिकताकी अति कहाँ है, इसकी सीमा भी प्रमाणके आधारपर ही निश्चित हो सकती है। क्या जो मार्क्सवादियोंके विपरीत पड़े, वही आपेक्षिकताकी अति है? जैसे पूँजीवादी, मार्क्सवादियोंके भविष्य-चित्र देखनेसे मुँह मोड़ते हैं, वैसे ही रामराज्यवादियोंकी भविष्य-निर्धारणासे भौतिकवादी भी मुँह बिचकाते हैं। ‘दृश्यगत घटनाके सभी पहलुओंका जोड़ सत्य है, उनकी परस्पर निर्भरता ही वास्तविकता है,’ इत्यादि लेनिनका कथन भी असंगत है; क्योंकि घटनाएँ क्रिया हैं, वे स्वयं बाध्य एवं असत्य होती हैं; फिर उनके पहलुओंकी भी यही स्थिति होगी। उनके जोड़की यही स्थिति अवश्यम्भावी है। वस्तुत: अबाध्यता ही सत्यता है, जिस वस्तुमें जितनी अबाध्यता है, उतनी ही सत्यता है। यहाँतक कि रज्जु, सर्प, शुक्ति, रजतादि प्रातिभासिक पदार्थ भी प्रतिभास कालमें अबाधित होनेसे प्रातिभासित सत्य होते हैं। आकाशादि व्यवहारकालमें अबाधित होनेसे व्यावहारिक सत्य हैं। सर्वाधिष्ठान, अखण्डबोधस्वरूप सर्वसाक्षी अत्यन्ताबाध्य होनेसे वही परमार्थ सत्य है। ‘प्रैग्मेटिज्मके जन्मदाता विलियम जेम्सका कहना है कि जिसकी व्यावहारिक उपयोगिता है, वही सत्य है। सत्य हमारे विचारोंमें प्रतिबिम्बित वास्तविकताका रूप नहीं है, बल्कि जो व्यक्तिविशेषकी भावनाओं और आवश्यकताओंके साथ खप जाता है। शीलरका मत भी इसी प्रकार है। सामाजिक मनुष्य वास्तवभूतकी विचार-क्रियासे सत्यपर उपनीत नहीं होता, बल्कि मनुष्य ही सत्यकी सृष्टि करता है। पिलैण्डेलोके नाटक ‘तुम सही हो, यदि तुम अपनेको ठीक समझते हो’ में इस दर्शनवादका सुन्दर चित्र मिलता है। तुमको हाँ या ना करनेके लिये दस्तावेजका प्रमाण चाहिये। मेरे लिये इनकी कोई आवश्यकता नहीं; क्योंकि मेरी रायमें इन दस्ताबेजोंमें सत्यका निवास नहीं, बल्कि उन व्यक्तियोंके मनमें है, जिनके अन्दर सिवा उन्हींके दिये हुए प्रमाणसे हम प्रवेश नहीं कर सकते। डीबीके शब्दोंमें ‘हमारे लिये सत्य वही है, जिससे हमको सहायता मिलती है और जिसका हमारे ऊपर प्रभाव है।’ प्रयोजनवादका सारतत्त्व यही है कि व्यावहारिकता ही हमारे लिये सब कुछ है। इससे अधिक हम कुछ नहीं जान सकते। यह दर्शन साम्राज्यवादकी अवनतिका द्योतक है।’ मार्क्सवादियोंका यह कहना है कि ‘अन्य दर्शन मायाविमूढ़की तरह हमें पथभ्रष्ट करते हैं, मार्क्सीयदर्शन जीवनपथ निर्देश करता है’ अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना है। जैसे किसी आंशिक दृष्टिकोणसे मार्क्सीयदर्शन दर्शन कहला सकता है, वैसे ही अन्य पाश्चात्य-दर्शन भी भारतीयदर्शनोंकी दृष्टिसे तो यह सब ‘दर्शन’ कहलानेके योग्य ही नहीं हैं। समुचित प्रमाण, प्रमेय, फल तथा साधनोंका निरूपण पूर्णरूपसे किसी पाश्चात्त्य दर्शनमें नहीं है। छायावादी ढंगके वाक्योंसे केवल आपेक्षिक एकांगी दृष्टिकोणसे ही सिद्धान्तोंका निरूपण किया जाता है। इस दृष्टिसे उपर्युक्त दृष्टिकोण ठीक नहीं है। हजार अन्य सत्य भले ही हों, परंतु प्रयोजनवादीके लिये अगर वे उपयोगी नहीं तो प्रयोजनवादी दृष्टिकोणसे व्यर्थ ही हैं। शीलरका सत्य भी इसी दृष्टिका है। अपनी सचाई-झुठाई प्राणी जितना अपने-आप जान सकता है, उतना दूसरा नहीं समझ सकता। इस दृष्टिसे ‘तुम सही हो, यदि तुम अपने आपको ठीक समझते हो,’ कितनी सुन्दर बात है। दर्शन साम्राज्यकी अवनतिका जीता-जागता नमूना तो है, मार्क्सका जडवादी दर्शन, जिसमें ‘धर्मो विश्वस्य जगत: प्रतिष्ठा’ के बदले ‘अर्थो विश्वस्य जगत: प्रतिष्ठा’ के सिद्धान्तको भी सिद्धान्तनामसे पुकारा जाता है। आमतौरपर वादि-प्रतिवादि-सम्भव प्रमाणों, तर्कों, सिद्धान्तोंके आधारपर ही विप्रतिपन्न विषयोंकी सिद्धि की जाती है, परंतु मार्क्सवादी किन्हीं भी सिद्धान्तों-तथ्यों, न्यायोंको स्थिर नहीं मानते। कारण, उन कसौटियोंपर वे एक क्षण भी नहीं टिक सकते। अत: उनके पास यह कहनेके सिवा कि ‘परमात्मा, ईश्वर, धर्मके अतिरिक्त मार्क्सवादी स्थिर आत्माका भी अस्तित्व नहीं मानता’, कोई दूसरा चारा नहीं। भला इसे दर्शन भी कैसे कहा जा सकता है? मार्क्सवादी स्वयं ही कहते हैं—‘जो दार्शनिक जिस परिस्थितिमें रहता है, उसी ढंगका उसका दर्शन होता है’, एतावता सिद्ध है कि उस दर्शनपर उस दार्शनिकके दिमागी फितूरके अतिरिक्त सत्यका अंश कुछ भी नहीं रहता।&lt;/p&gt;
&lt;/blockquote&gt;
&lt;hr&gt;
&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और रामराज्य, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट नि&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;न : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अखंड-सत्य</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अन्तिम</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>द्वन्द्वन्याय</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>10.7 क्या मनुष्यकी इच्छाशक्ति स्वाधीन है? ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/10-7-kyaa-mnussykii-icchaashkt/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/10-7-kyaa-mnussykii-icchaashkt/</guid><description>10.7 क्या मनुष्यकी इच्छाशक्ति स्वाधीन है? ‘मनुष्यकी इच्छा स्वतन्त्र है या नहीं’, यह दार्शनिक क्षेत्रमें एक प्राचीन प्रश्न है। द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी इसका उत्तर देते हैं—‘नहीं, इस प्रश्नका मूल भी …</description><pubDate>Thu, 26 Jun 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;10.7 क्या मनुष्यकी इच्छाशक्ति स्वाधीन है?&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;‘मनुष्यकी इच्छा स्वतन्त्र है या नहीं’, यह दार्शनिक क्षेत्रमें एक प्राचीन प्रश्न है। द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी इसका उत्तर देते हैं—‘नहीं, इस प्रश्नका मूल भी धर्मविद्यामें है। यदि मनुष्यका कर्म उसकी स्वेच्छासे नहीं है, तो वह पाप-पुण्यके भारसे मुक्त हो जाता है तथा स्वर्ग और नरकका कोई अर्थ नहीं रह जाता। यही कारण है कि धर्म-विद्या मनुष्यकी इच्छाको स्वतन्त्र मानती है। ‘इस प्रश्नका यों विचार कीजिये। सारा संसार कार्य-कारणके नियमसे बँधा हुआ है। क्या मनुष्य इस संसारका अंश नहीं? केवलमात्र मनुष्यकी इच्छा ही क्या इस प्राकृतिक नियमसे परे है? सब वस्तुओंकी तरह मनुष्यकी इच्छा भी कारणजनित है। उसकी इच्छाके प्राकृतिक तथा सामाजिक कारण हैं। मनुष्य ऐसा सोचता अवश्य है कि वह अपनी इच्छानुसार ही सब कुछ करता है। लेकिन वास्तविकता यह नहीं है। कविने उदाहरण दिया है कि प्रत्येक वारिबिन्दु भी यह सोचता है कि अपनी इच्छासे ही वह जमीनपर गिरता है। मातृ-स्तन पीते समय बच्चा भी यह सोचता है कि अपनी इच्छाको ही वह पूरी कर रहा है। यदि हमारी इच्छा स्वाधीन नहीं है तो बाध्य होनेपर ही हम कोई काम करते हैं। इस बाध्यताके सम्बन्धमें हीगेलने लिखा है—‘बाध्यता उसी हदतक दृष्टिहीन है, जहाँतक हम इसको समझते नहीं।’ इसपर टीका करते हुए एंजिल्सने लिखा है कि ‘प्रकृति और मनुष्यके समाजमें ही स्वतन्त्रताका निवास है और इसकी बुनियाद है प्रकृतिकी मजबूरियोंका ज्ञान।’ इसका खण्डन करते हुए यह कहा जाता है कि—जहाँ हम मजबूरीके सामने सर झुकाते हैं वहाँ स्वतन्त्रता कहाँ?’ यहाँपर मजबूरीके अर्थपर हमें गौर करना चाहिये। ‘अरस्तूने इस अवश्यम्भाविवाद या नियतिवादके विभिन्न अर्थोंपर बहुत पहले ही विचार किया था। यदि हमें रोगमुक्त होना है तो हम दवा लेनेके लिये बाध्य हैं। जीवनधारणके लिये श्वास लेना आवश्यक है। किसी स्थलमें दिये गये ऋणकी वसूलीके लिये वहाँ जाना जरूरी है, यह प्रयोजनीयता अवस्थापर निर्भर है, एक अवस्था दूसरी अवस्थापर निर्भर है, जैसे जीवन-धारण श्वास लेनेपर निर्भर है। मनुष्यको बाह्य प्रकृतिके सम्बन्धमें इसी तरहकी मजबूरियोंका सामना करना पड़ता है। फसल काटनेके लिये फसलका बोना जरूरी है। इसमें कुछ लोगोंको पराधीनताकी गन्ध आती है। निस्सन्देह मनुष्य अधिक स्वतन्त्र होता, यदि बिना परिश्रम ही उसकी आवश्यकताएँ पूरी हो जातीं। जब वह प्रकृतिको अपना मतलब पूरा करनेके लिये बाध्य करता है, तब भी वह प्रकृतिका अनुवर्ती है। लेकिन यह अनुवर्तिता ही उसकी स्वतन्त्रताकी शर्त है। प्रकृतिका अनुगामी बनकर प्रकृतिपर वह विजय पाता है और इस प्रकार वह अपनी स्वतन्त्रताके राज्यका विस्तार करता है।’ अब हीगेलके इस वाक्यका अर्थ स्पष्ट हो जाता है कि ‘प्रयोजनकी स्वीकृति ही स्वतन्त्रता है।’ किंतु यह ठीक नहीं है। ज्ञानसे इच्छा होती है, इच्छानुसार ही प्राणीकी कृति होती है। भले ही संसार कार्य-कारणके नियममें बँधा हो और भले ही मनुष्य तथा उसकी इच्छा भी संसारका अंश ही हो तथापि उसी संसारमें तो स्वतन्त्रता-परतन्त्रताका व्यवहार चलता है। जो प्राणी किसी अन्यकी प्रेरणा या आशासे काम करता है, वह परतन्त्र कहा जाता है। अपरप्रेरित अपनी इच्छासे काम करनेवाला स्वतन्त्र कहा जाता है। रहा यह कि इच्छा भी कारणजनित ही होती है। सो तो ‘ज्ञानजन्या भ&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;िच्छा’ ज्ञानसे इच्छा होती है, यह सिद्धान्त है। अन्यान्य प्राकृतिक तथा सामाजिक भी कारण रह सकते हैं। फिर भी स्वेच्छाधीन कार्य करनेवाला स्वतन्त्र कहा जाता है। इसमें विप्रतिपत्ति नहीं हो सकती। तभी स्वेच्छाधीन भला बुरा काम करनेवाला मनुष्य निग्रह या अनुग्रहका भागी होता है। बिन्दुकी पृथ्वीपर गिरनेकी इच्छा तो काल्पनिक ही है; क्योंकि इच्छा चेतनका धर्म है, अचेतनका नहीं। फिर भी ‘नद्या: कूलं पिपतिषति’ (नदीका कगार गिरना चाहता है), इस प्रकारकी इच्छाएँ वस्तुत: काल्पनिक हैं। आसन्नपतनता देखकर ऐसा व्यवहार किया जाता है। मातृस्तन पीनेकी इच्छा तो चेतनकी इच्छा है, वह क्षुधासे भी होती है। फिर भी इष्ट-साधनता-ज्ञानसे ही इच्छा मुख्य है। रोगमुक्त होनेके लिये भी एक तो स्वेच्छासे ओषधि खायी जाती है, दूसरे अभिभावकोंद्वारा बाध्य किये जानेपर भी ओषधि खायी जाती है। इसी प्रकार जीवन-धारण करनेके लिये श्वास लेनेकी भी बात है। वस्तुत: प्रयोजनकी स्वीकृति ही स्वतन्त्रता है। इस परिभाषासे ‘स्वतन्त्र: कर्ता’ यह पाणिनिकी परिभाषा ही श्रेष्ठ है, जिसका आशय है ‘क्रियामें स्वतन्त्ररूपसे विवक्षित अर्थ ही कर्ता होता है।’ स्वेतर समस्त कारकोंका प्रयोजक होकर स्वयं किसीसे प्रयुक्त न होना ही स्वतन्त्रता है। व्यवहारमें भी जितने विधि-निषेध होते हैं, सभी स्वतन्त्रके ही होते हैं। जिसके हाथ-पैर हथकड़ी-बेड़ीसे जकड़े हों, ऐसे परतन्त्र व्यक्तिको जल लाने या दौड़नेको कौन आदेश दे सकता है? यों कोई भी बुरा काम करता है तो परिस्थितियोंसे बाध्य होकर ही करना पड़ता है। काम, क्रोध, लोभ—सभी परिस्थितियोंके अनुसार ही होते हैं। चोरी कोई तभी करता है, जब वह परिस्थितियोंसे उसके लिये बाध्य हो। तो भी क्या समाजसे चोरी करनेको अपराध मानना बन्द हो जाना चाहिये? संसारमें सभी कार्य कामना या इच्छापूर्वक ही होते हैं। इच्छामें भी जब प्राणी सदा परतन्त्र ही है, तब तो फिर किसी बुरे कामसे हटनेका उपदेश या प्रयत्न व्यर्थ ही होंगे। इसी तरह किसी अच्छे काममें प्रवृत्त होनेका उपदेश और प्रयत्न भी व्यर्थ है। अत: सुस्पष्ट है कि परिस्थितियोंसे सम्बन्ध होते हुए भी इच्छाके अनुसार होनेवाले कार्योंको स्वाधीनतापूर्वक कर्म कहा जाता है। तभी शुभाशुभ कर्मोंके अनुसार प्राणीको निग्रह एवं अनुग्रहका भागी होना पड़ता है, अन्यथा यह तो कोई भी अपराधी कह सकता है कि ‘अमुक परिस्थितियोंने ही हमसे यह काम कराया है, अत: दण्ड उन परिस्थितियोंको मिलना चाहिये या परिस्थिति उत्पन्न करनेवालेको मिलना चाहिये।’ परिस्थिति उत्पन्न करनेवाले भी यही कह सकते हैं कि ‘हमने भी परिस्थितिवश ही ऐसा किया है।’ &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt;ी कहते हैं कि ‘श्रेणी-विभाजन समाजमें जितना ही सुदृढ़ होता गया, शासक श्रेणी उतनी ही उत्पादनशक्तियोंसे दूर हटती गयी। कृषिकार्यका भार, कारखाना चलानेका भार होता है गुलामोंके ऊपर, मजदूरोंके ऊपर। पूँजीपति सोच-विचारकर समाजव्यवस्थाके नीतिविधानकी रचनामात्र करते हैं, वस्तुजगत‍्का उनसे कोई सम्पर्क नहीं। हाथ-पैरसे काम करनेके लिये हैं मजदूर, मिस्त्री या इंजीनियर; लाभकारी आविष्कारके लिये हैं वैज्ञानिक। यहाँतक कि पूँजीपतिको देखभालकी आवश्यकता नहीं। ईरानमें तेलकी खानें चलती हैं और लाखों मील दूर बैठकर पूँजीपति मुनाफा कमाता है। धनिक वस्तुजगत‍्के जिस अंशका भोग करता है, वहाँ वह देखता है कि वही कर्ता है, वह स्वाधीन और सर्वेसर्वा है और उसीकी आज्ञासे सब चलता है। इसलिये आधुनिक संस्कृति और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-paashcaaty-drshn-1-1-drshnkii/&quot;&gt;दर्शन&lt;/a&gt;में इच्छा-स्वाधीनताका दावा सहज ही मंजूर हो जाता है।’ ‘वर्तमान आदर्शवादी दार्शनिक इच्छा-स्वतन्त्रताके दावेके प्रमाणके लिये आधुनिक विज्ञानकी शरण लेते हैं। आइसनवर्गके—‘प्रिंसिपुल ऑफ मिनेसी’ में उनको एक सहारा मिलता है। संक्षेपमें इसका सिद्धान्त यह है कि ‘कोई इलेक्ट्रॉन दूसरे मुहूर्तमें क्या करेगा, यह निश्चित नहीं है। इलेक्ट्रॉन एक कक्षसे दूसरे कक्षको कूद रहा है, लेकिन कौन इलेक्ट्रॉन कूदेगा, इसका निश्चय नहीं।’ जैम्स, एलिंगटन, शोडिंगगेर इसीकी इच्छा—स्वतन्त्रताके प्रमाणके रूपमें सादर अभ्यर्थना करते हैं। यहाँपर दो बातें जान लेनेकी हैं; एक यह कि किसी एक इलेक्ट्रॉनकी गतिविधिको लक्ष्य करनेके लिये उसके ऊपर जो आलोक पार किया जाता है, उसीसे उसका स्थान परिवर्तन हो जाता है। दूसरी बात यह है कि मोरके ‘करसपाण्डेंस प्रिंसिपुल’ के अनुसार परमाणुओंके संख्याधिक्यसे उनकी गतिकी निश्चयता बढ़ जाती है। इस प्रकार आधुनिक विज्ञान भी कारणविहीन स्वतन्त्रताका अन्त कर देता है।’ परंतु यह बात भी ठीक नहीं है। इच्छा-स्वतन्त्रताका प्रश्न केवल पूँजीपतियोंसे ही नहीं है; क्योंकि इच्छा और तदनुसार विविध चेष्टाओंका प्रश्न तो सभीके साथ रहता है, भेद होता है, इच्छापूर्तिमें। जिनके पास पर्याप्त साधन है, उनकी इच्छाओंकी पूर्ति होती है, जिनके पास साधन नहीं हैं, उनकी इच्छापूर्तिमें बड़ी कठिनाई पड़ती है। जबतक पूँजीपतियोंके पास साधन हैं, उनकी इच्छापूर्तिमें सरलता रहेगी। जब मजदूरोंके हाथमें साधन हो जायँगे, तब फिर उनकी इच्छापूर्तिमें सरलता हो जायगी, यद्यपि साधनोंके मिलनेके साथ-साथ इच्छाएँ भी बढ़ती जाती हैं। शास्त्रकारोंका तो कहना है कि संसारमें विवेक-वैराग्यके बिना भोगप्राप्तिसे कभी कामनाओं और इच्छाओंकी पूर्ति नहीं हो सकती। जैसे घीकी आहुतिसे अग्निज्वाला बढ़ती है, वैसे ही भोगप्राप्तिसे इच्छाएँ बढ़ती हैं—‘न जातु काम: कामानामुपभोगेन शाम्यति। हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्द्धते॥’ (विष्णुपुराण १०।१०।२३) यहाँतक कि संसारभरकी सम्पूर्ण धन-धान्य, हिरण्य आदि सम्पत्तियाँ मिल जायँ, तब भी एक पुरुषकी भी तृप्ति सम्भव नहीं—‘यत् पृथिव्यां व्रीहियवं हिरण्यं पशव: स्त्रिय:॥ नालमेकस्य तत्सर्वमिति मत्वा शमं व्रजेत्।’ (लिंगपुराण पूर्व० ६७।१७-१८)। संसारकी सभी स्वतन्त्रताएँ तो सीमित ही हैं। अविद्या-काम-कर्मके परतन्त्र प्राणीमें स्वतन्त्रताकी भी एक सीमा होती है, पूर्ण स्वतन्त्रता तो निरुपाधिक स्वप्रकाश आत्मामें ही है। जिनमें ‘जायते, वर्धते, अस्ति, विपरिणमते, अपक्षीयते, विनश्यति’—ये छ: विकार होते हैं, उनकी पूर्ण स्वतन्त्रता कभी कैसे हो सकती है? षड्भावविकारवर्जित कूटस्थ आत्मा ही सर्वथा स्वतन्त्र है, फिर भी आपेक्षिक स्वतन्त्रता तो रज्जुमुक्त गोवत्सादिकी भी स्वतन्त्रतामें व्यवहृत होती है। वैसे कारागारमें बन्द प्राणी भी बहुत अंशोंमें स्वतन्त्र कहा जाता है। यों राष्ट्रकी पराधीनतासे भी प्राणी पराधीन कहा जाता है। वेदान्तकी दृष्टिसे स्थूल-सूक्ष्म-कारण-शरीरत्रयवर्जित होनेपर ही पूर्ण स्वतन्त्रताका व्यवहार होता है। कार्योंकी सुविधाके लिये श्रेणीविभाजन अनिवार्य ही है, सभीको सब कामका उत्तरदायित्व देनेसे कोई भी सुव्यवस्था नहीं बन सकती। वकील, इंजीनियर, चिकित्सक आदिसे कृषिका कार्य या मिलोंके करघे चलानेका काम करानेसे हानि ही है। इसीलिये प्राचीन कालमें प्रधानरूपसे ज्ञानार्जन, ज्ञानवितरणका काम ब्राह्मणोंपर; बलार्जन, बलवितरण, राष्ट्ररक्षण आदिका काम क्षत्रियोंपर; कृषि, गोरक्षा, वाणिज्य आदिद्वारा धनार्जन, धनवितरण आदिका काम वैश्योंपर, राष्ट्रोपयोगी विभिन्न कर्मों, शिल्पादि कलाओंके अर्जन, रक्षण आदिका भार शूद्रोंपर डाला गया था। इससे उन-उन विषयोंके लोग निरन्तर विशेषता-सम्पादनके लिये प्रयत्नशील रहते थे। आज भी शिल्प, चिकित्सा आदि विविध विषयोंमें विशेषज्ञता-सम्पादनके लिये ‘स्पेशलिष्ट’ तैयार किये जाते हैं। आज भी संग्राम लड़नेवाले सिपाही अलग होते हैं, विचारकर युद्धनीति निर्धारित करनेवाले अन्य होते हैं, वैज्ञानिक अनुसंधान करनेवाले दूसरे लोग होते हैं और अनुसंधानके फलभूत विविध यन्त्रोंके निर्माण तथा संचालन करनेवाले दूसरे लोग हुआ करते हैं। जैसे कोई अपने शारीरिक बलसे लाभ उठाता है, वैसे ही बौद्ध-बलसे फायदा उठानेका बुद्धिजीवियोंका अधिकार है ही। व्यावहारिक भौतिक-जगत‍्में कारण-विहीन निरपेक्ष स्वतन्त्रता तो अध्यात्मवादी कभी नहीं मानते, इसके लिये विज्ञानकी खोज व्यर्थ है, किंतु सापेक्ष सकारण होनेपर भी इच्छा तथा कर्मोंकी स्वतन्त्रता अवश्य मान्य है, जिससे इच्छानुसार कर्तापर उत्तरदायित्व होता है और अपनी इच्छाओं तथा कर्मोंके सुपरिणाम-दुष्परिणामको वह भोगता है। जहाँतक किसी ढंगकी राज्यव्यवस्था होगी, वहाँतक अपराध एवं दण्डविधानकी भी आवश्यकता रहेगी। फिर उन-उन अपराधियोंकी इच्छाके आधारपर होनेवाले अपराधोंका उत्तरदायित्व भी उनपर मानना पड़ेगा, तभी दण्डविधान न्यायपूर्ण कहा जा सकेगा। ऐसी स्थितिमें इच्छाओं एवं कर्मोंमें स्वतन्त्रता स्वीकार किये बिना निग्रहानुग्रहकी कोई भी व्यवस्था नहीं चलेगी। सभी लोग परिस्थितियोंके ही जिम्मे सब दोष डालकर बरी हो जानेका प्रयत्न करेंगे।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>इच्छाशक्ति</category><category>धर्मसम्राट</category><category>प्राचीनमनुष्य</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>स्वाधीन</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>10.6 भूत और शक्ति ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/10-6-bhuut-aur-shkti-maarksvaad-au/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/10-6-bhuut-aur-shkti-maarksvaad-au/</guid><description>10.6 भूत और शक्ति मार्क्सवादी कहते हैं, ‘कुछ आधुनिक वैज्ञानिक अब रहस्यवादकी शरण लेते हैं। उन वैज्ञानिकोंका कहना है कि ‘भूत शक्ति ही है और शक्तिका पूर्णरूपसे बोध नहीं हो सकता।’ लेकिन यह बात सही नही…</description><pubDate>Wed, 25 Jun 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;10.6 भूत और शक्ति&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt;ी कहते हैं, ‘कुछ आधुनिक वैज्ञानिक अब रहस्यवादकी शरण लेते हैं। उन वैज्ञानिकोंका कहना है कि ‘भूत शक्ति ही है और शक्तिका पूर्णरूपसे बोध नहीं हो सकता।’ लेकिन यह बात सही नहीं है। यदि यह मान लिया जाय कि भूत बिजली ही है, तथापि इस बिजलीका परिमाण और वजन है; इसलिये भूतकी धारणा भले ही बदल जाय, इसका अस्तित्व नहीं मिट जाता। जैक्सनके शब्दोंमें ‘उन वैज्ञानिकोंकी, जो भूतको केवल शक्तिका ही संगठन मानते हैं, तुलना उस वीरसे की जा सकती है, जिसने केवल धारसे तलवार बनायी अथवा उन केवटोंसे जिन्होंने जालकी यह परिभाषा की कि यह सुतलीसे बँधा हुआ छेद है।’ आईंस्टीनके सापेक्षताके नियमका प्रारम्भ है कि निरपेक्ष गतिकी न तो धारणा की जा सकती है और न इसको मापा जा सकता है। किसी दी हुई रेखा या बिन्दुसे ही इसको मापा जा सकता है। इससे कुछ वैज्ञानिक इस नतीजेपर पहुँचे कि ‘गति वास्तविक नहीं है;’ किंतु यह हीगेलका ही सिद्धान्त है कि ‘अस्तित्व सम्बन्ध-बोधक है। किसी वस्तुको दूसरी वस्तुद्वारा ही मापा जा सकता है और किसी पदार्थका गुण किसी दूसरे पदार्थपर प्रतिक्रियाका नाम है।’ द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद प्रयोगको ही प्रथम स्थान देता है। निरपेक्ष गति हो या न हो, हमारे लिये घड़ी और स्थान दोनोंकी आवश्यकता है; इसलिये दोनों ही वास्तविक हैं। वस्तुत: ईमानदार वैज्ञानिक ही कहीं भूतके रूपमें शक्ति मानते हैं और उसे दुर्ज्ञेय मानते हैं। पूर्वोक्त न्यायसे कहा गया है कि सूक्ष्मसे ही स्थूलकी उत्पत्ति होती है। धारसे तलवार तथा सुतलीसे बँधे हुए छेदसे और शक्तिसे भूतनिर्माणमें पर्याप्त अन्तर है। तन्तुसे पट बनता है, फिर भी पटका तन्तु है, यह भी व्यवहार होता है। मृत्तिकासे घट उत्पन्न होता है; फिर भी घटकी मृत्तिका है, यह भी व्यवहार होता है। आमतौरपर पृथ्वीका गन्ध, जलका रस, तेजका रूप, वायुका स्पर्श और आकाशका शब्द गुण माना जाता है। फिर भी सांख्य &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;ान्त-सिद्धान्तानुसार शब्दतन्मात्रासे ही आकाश, स्पर्शतन्मात्रासे ही वायु, रूपतन्मात्रासे तेज, रसतन्मात्रासे जल तथा गन्धतन्मात्रासे पृथ्वीकी उत्पत्ति होती है। यह स्पष्ट है कि जिन भूतोंमें केवल शब्द है, वह सूक्ष्म आकाश है। वायुमें शब्द, स्पर्श दो गुणोंका उपलम्भ होता है। वह आकाशकी अपेक्षा स्थूल है। उत्तरोत्तर रूप, रस, गन्ध गुणोंकी जैसे-जैसे अधिकता होती है, वैसे ही तेज आदिमें स्थूलता उपलब्ध होती है। इस दृष्टिसे शब्दस्पर्शात्मक ही भूत है। उपनिषदोंके अनुसार सत‍्से आकाशादिकी उत्पत्ति होती है, फिर भी आकाशादिकी सत्ताका व्यवहार होता है। कारणसे कार्य उत्पन्न होनेपर मायाद्वारा प्रधान कारणकी अप्रधानता तथा अप्रधान कार्यकी प्रधानता हो जाती है, इसीलिये कार्य विशेष्य हो जाता है, कारण विशेषण हो जाता है। इसी कारण आकाशकी सत्ता, घटकी मृत्तिका, पटका तन्तु आदिका व्यवहार होता है। हर जगह शक्तिसे ही कार्य उत्पन्न होता है, मृत्तिकामें घट-शक्ति होती है, बीजमें अंकुर-शक्ति होती है। ऐसे ही सम्पूर्ण कार्योंके उत्पादनानुकूल उन-उन कारणोंमें शक्तियाँ रहती हैं, इस दृष्टिसे सत‍्में प्रपंचोत्पादिनी शक्ति रहती है। उसी सत्-शक्तिसे भूतोंकी उत्पत्ति होती है। सूक्ष्मरूपसे स्थूल भिन्न नहीं होता। सूक्ष्म कारण है, स्थूल कार्य है, यह कहा जा चुका है। घट कपालमात्र है, कपाल चूर्णरूप है, वह भी रजोमात्रा है। रज भी परमाणु रह जाता है। मृत्तिकासे भिन्न घट नहीं होता, रससे भिन्न जल नहीं, रूपसे भिन्न तेज नहीं। ऐसे ही धारसे भिन्न तलवार नहीं है, यह नहीं कहा जा सकता। उसी तरह सुतलीसे भिन्न होकर सच्छिद्र जाल नहीं है; परंतु जालसे भिन्न होकर सुतली नहीं है, यह नहीं कहा जा सकता; अत: विषम दृष्टान्त है। गति पदार्थकी आवश्यकता है, अवस्था अवस्थावान‍्से भिन्न नहीं। नाप-तौल तथा मार्क्सवादियोंका प्रयोग भी बिना ज्ञानके नहीं होता है, अत: प्रयोगवादको भी सर्वकारण परममूलका अन्वेषण तो करना ही चाहिये।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>धर्मसम्राट</category><category>पंचभूतात्मकजन्ममरणमोक्</category><category>मायाशक्ति</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>10.5 व्यभिचारका उन्मूलन ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/10-5-vybhicaarkaa-unmuuln-maar/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/10-5-vybhicaarkaa-unmuuln-maar/</guid><description>10.5 व्यभिचारका उन्मूलन मार्क्स लिखता है कि ‘हम स्त्रीको पुरुषकी सम्पत्ति बनाने और धर्मके भयसे जकड़ देनेके पक्षमें नहीं हैं। यह भी हमें स्वीकार नहीं है कि संतान उत्पन्न करनेके लिये किसी स्त्रीका ए…</description><pubDate>Tue, 24 Jun 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;10.5 व्यभिचारका उन्मूलन&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;मार्क्स लिखता है कि ‘हम स्त्रीको पुरुषकी सम्पत्ति बनाने और धर्मके भयसे जकड़ देनेके पक्षमें नहीं हैं। यह भी हमें स्वीकार नहीं है कि संतान उत्पन्न करनेके लिये किसी स्त्रीका एक पुरुष-विशेषकी दासी या सम्पत्ति बन जाना जरूरी है। वह स्त्री-पुरुषके सम्बन्धको स्त्री-पुरुषकी शारीरिक आवश्यकताका सम्बन्ध मानता है; परंतु इसके लिये वह दोनोंमेंसे एक-दूसरेका दास बन जाना आवश्यक नहीं समझता। इस सम्बन्धमें वह कानूनके भी दखल देनेकी जरूरत नहीं समझता; परंतु इसके साथ ही वह स्त्री-पुरुषके सम्बन्धकी उच्छृंखलताको भी स्वीकार नहीं करता। किसी स्त्री या पुरुषका दूसरोंके शारीरिक भोगके लिये अपने शरीरको किरायेपर चढ़ाना वह अपराध समझता है। समाजवादी और समष्टिवादी समाजमें जीविकाके साधन अपनी योग्यता और अवस्थाके अनुसार सभीको प्राप्त होंगे, इसलिये जीविकाके लिये व्यभिचारसे धन कमानेकी आवश्यकता हो नहीं सकती और जो लोग पूँजीवादी-समाजके संस्कारोंके कारण ऐसे करेंगे, वे अपराधी होंगे। संक्षेपमें स्त्री-पुरुष और विवाहके सम्बन्धमें &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt; समाजके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्यके विचारसे पूर्ण स्वतन्त्रता देता है, परंतु उच्छृंखलता, गड़बड़ या भोगको पेशा बना लेनेको और इसके साथ ही अपने भोगकी इच्छाके लिये दूसरे व्यक्तियों और समाजकी जीवन-व्यवस्थामें अड़चन डालनेकी वह भयंकर अपराध समझता है। स्त्री-पुरुषके सम्बन्धमें मार्क्सवादका रुख लेनिनकी एक बातसे स्पष्ट हो जाता है। लेनिनने कहा था—स्त्री-पुरुषका सम्बन्ध शरीरकी दूसरी आवश्यकताओं—भूख, प्यास, नींदकी तरह ही एक आवश्यकता है। इसमें मनुष्यको स्वतन्त्रता होनी चाहिये, परंतु प्यास लगनेपर शहरकी गन्दी नालीमें मुँह डालकर पानी पीना उचित नहीं। उचित है स्वच्छ जल, स्वच्छ गिलाससे पीना। स्त्री-पुरुषका सम्बन्ध मनुष्योंकी शारीरिक, मानसिक-तुष्टि और समाजकी रक्षाके लिये होना चाहिये न कि स्त्री-पुरुषोंको रोग और कलहका घर बना देनेके लिये। अबतकके पारिवारिक और विवाह-सम्बन्धी बन्धन पूँजीवादी आर्थिक संगठनपर कायम हैं, जिनमें स्त्रीका निरन्तर शोषण होता रहा है; इसलिये अब समाजको इसे बदलकर स्त्री-पुरुषकी समानतापर लाना चाहिये।’ यह सही है, कि मार्क्सवादमें जीविकाके लिये स्त्रियोंको व्यभिचार न करना पड़ेगा, परंतु काम-प्रेरणासे होनेवाले व्यभिचारपर मार्क्सवादमें क्या रोक है? गन्दी नालीका पानी पागल ही पीता है, अन्य सभी स्वास्थ्यकर स्वच्छ ही जल पीना चाहते हैं। क्या मार्क्सवादमें अपने पति या अपनी पत्नीसे अन्य स्त्री-पुरुषसे सम्बन्ध गन्दी नालीके जल पीनेके तुल्य मान्य है? किसी भी मार्क्सवादी ग्रन्थमें ढूँढ़नेपर भी स्त्री-पुरुषके स्वेच्छापूर्वक सम्बन्धोंमें कोई रुकावटकी बात नहीं दिखलायी देती, सिर्फ दूसरेकी इच्छाके बिना या पेशा किंवा जीविकाके लिये व्यभिचार करना अपराध माना गया है, परंतु शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्यके विचारसे नितान्त स्वेच्छापूर्ण स्त्री-पुरुष-सम्बन्धकी मार्क्सवादमें पूरी स्वाधीनता है। फिर इससे भिन्न और उच्छृंखलता या गड़बड़ क्या है? स्त्री-पुरुष दोनोंमें किसीकी जिसमें अनिच्छा न हो, जो पेशेके लिये न हो, जो शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्यके प्रतिकूल न हो; ऐसे स्वेच्छापूर्ण मनमाने सम्बन्धमें कोई रुकावट नहीं है। फिर जब पाप-पुण्यका प्रश्न है ही नहीं, तब ऐसे सरल, सुखकर कामसे पेशेपर ही रुकावट क्यों हो? किन्हीं मार्क्सवादी वाक्योंसे भी चारित्रिक जीवनका समर्थन नहीं मिलता और पुलिस एवं गुप्तचरकी आँखोंमें धूल डालकर, अदालतको धोखा देकर कोई दुराचार कर सके तो क्या होगा? अध्यात्मवादीकी दृष्टिमें तो प्रथम संयतात्मा सावधान व्यक्तियोंका गुरु ही शास्ता है, उनके लिये राज्यशासन आवश्यक ही नहीं है, परंतु दुरात्मा प्राणीका नियन्त्रण करनेके लिये राजा शास्ता होता है। किंतु जो प्रच्छन्न पातकी होते हैं, जो पुलिस एवं अदालतको चकमा देकर पाप करते हैं, उनका शासक वैवस्वत यम ही हैं। (नारदस्मृ० १८।१०८; विदु० नी०) एक जडवादीके मतमें यदि निर्विघ्न रूपसे दूसरेका धन या दूसरेकी सुन्दर कलत्र प्राप्त हो जाय, तो उससे बचना, उसे अस्वीकार कर देना या वह जिसकी है, उसके पास सही-सलामत पहुँचा देना शुद्ध मूर्खता ही कही जायगी; क्योंकि उसके सिद्धान्तानुसार किसीकी व्यक्तिगत सम्पत्ति जायज नहीं है, सब सम्पत्ति राज्यकी ही है। स्त्री-पुरुष कोई भी किसीकी वस्तु नहीं है, सब समाजकी वस्तु है, उसके लेनेमें पाप-पुण्यकी कोई बात ही नहीं है, परंतु एक अध्यात्मवादी, परान्न, पर-वित्तको स्वीकार करना जघन्य कृत्य समझता है। वह कहता है कि पर-वित्त, परान्न यदि मार्गमें पड़ा हो, चाहे घरमें, अपना वैध स्वत्व हुए बिना उसे कभी ग्रहण नहीं करना चाहिये, यही सत्पुरुषका लक्षण है—‘परान्नं परद्रव्यं वा पथि वा यदि वा गृहे। अदत्तं नैव गृह्णीयादेतद् ब्राह्मणलक्षणम्॥’ अपने यहाँ पति-पत्नी, माता-पुत्र आदिका सम्बन्ध धार्मिक एवं सांस्कृतिक, शास्त्र एवं परम्परामूलक समझा जाता है, जब कि मार्क्सवादी सम्पूर्ण धार्मिकताओं, परम्पराओंको मिटाकर शुद्ध अर्थमूलक सम्बन्धको ही क्रान्तिके लिये लाभदायक मानते हैं। इनके मतानुसार ‘अपनी शारीरिक प्रेरणाओंसे ही स्त्री-पुरुष सम्बन्धित होते हैं, उनसे तीसरा व्यक्ति बतौर ‘एक्सिडेंट’ (आकस्मिक घटना)-के उत्पन्न हो जाता है। माँका दूध पिलाना भी उसके लिये अनिवार्य है, बिना स्तनसे दूध निकले उसे कष्ट हो सकता है, इसीलिये माँ बच्चेको दूध पिलानेके लिये बाध्य होती है।’ अत: ‘माता पितासे सहस्रगुणित पूज्य है’—‘सहस्रं तु पितॄन्माता गौरवेणातिरिच्यते’ (मनु० २।१४५) का मार्क्सवादमें कोई महत्त्व नहीं है। सीता, सावित्री, दमयन्ती, अरुन्धती आदिके पातिव्रत्यका भी मार्क्सवादमें कोई गौरव नहीं, केवल भूख-प्यासकी तरह शारीरिक आवश्यकताकी पूर्तिमात्र ही वहाँ स्त्री-पुरुषके सम्बन्धका आधार है। राम-राज्यमें पातिव्रत्य सर्वधर्मसार है और सीता, सावित्री आदि उसके उच्च आदर्श एवं मार्गदर्शक हैं।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट नि&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;न : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>उन्मूलन</category><category>एकसत्तावाद</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>व्यभिचार</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>10.4 वर्गवाद ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/10-4-vrgvaad-maarksvaad-aur-raa/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/10-4-vrgvaad-maarksvaad-aur-raa/</guid><description>10.4 वर्गवाद मार्क्सके मतसे ‘भारतमें औद्योगिक विकाससे होनेवाला परिवर्तन यूरोपके प्रभावसे देरमें आरम्भ हुआ, बल्कि अभी शनै:-शनै: हो रहा है और पूरे रूपमें हो भी नहीं पाया, स्त्रियोंकी अवस्थामें भी पर…</description><pubDate>Mon, 23 Jun 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;10.4 वर्गवाद&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;मार्क्सके मतसे ‘भारतमें औद्योगिक विकाससे होनेवाला परिवर्तन यूरोपके प्रभावसे देरमें आरम्भ हुआ, बल्कि अभी शनै:-शनै: हो रहा है और पूरे रूपमें हो भी नहीं पाया, स्त्रियोंकी अवस्थामें भी परिवर्तन अभीतक यहाँ नहीं हो पाया है। जनसाधारण या जमींदार-श्रेणी और पूँजीपति-श्रेणीकी स्त्रियाँ इस देशमें अभीतक उसी अवस्थामें हैं, परंतु मध्यम श्रेणीकी स्त्रियोंकी अवस्थामें—जिनपर आर्थिक परिवर्तनका प्रभाव गहरा पड़ा है, परिवर्तन तेजीसे आ रहा है।’ ‘यूरोपमें जहाँ पूँजीवाद पूर्ण उन्नति कर चुकनेके बाद ठोकरें खाने लगा है, स्त्रियोंकी अवस्था पुरुषोंकी अपेक्षा जीवन-निर्वाहके संघर्षमें कम योग्य होनेके कारण पुरुषोंसे भी गयी-बीती है। बेकारी और जीवन-निर्वाहकी तंगीके कारण लोग ब्याहकर परिवार पालनेके झगड़ेमें नहीं फँसना चाहते, इसलिये स्त्रियोंके लिये घर बैठकर बच्चे पालने और निर्वाहके लिये रोटी-कपड़ा पाते रहनेका भी मौका गया। अब उन्हें भी मिलों, कारखानों, खानों, खेतों और दफ्तरोंमें मजदूरीकर पेट पालना पड़ता है। यदि उनका विवाह हो जाता है तो माता बननेका उनका काम ज्यों-त्यों निभ जाता है और वे फिर मजदूरी करने चल देती हैं। यदि विवाह नहीं हुआ और शरीरकी स्वाभाविक प्रवृत्तिके कारण वे माता बन गयीं तो उनकी मुसीबत है। प्रसवकी अवस्थामें उनके निर्वाहका सवाल बहुत कठिन हो जाता है और प्रसवकालमें ही उन्हें सहायताकी अधिक आवश्यकता रहती है। प्रसवकालमें यदि वे कामपर नहीं जा सकतीं तो उनकी जीविका छूट जाती है और प्रसवकालके बाद जब उन्हें एकके बजाय दो जीवोंकी जरूरतोंको पूरा करना पड़ता है, तो वे बिना साधनके हो जाती हैं। इससे समाजमें उत्पन्न होनेवाली संतानके पोषण और अवस्थापर क्या प्रभाव पड़ता है, यह समझ लेना कठिन नहीं।’ ‘स्त्रियोंकी इस अवस्थाके कारण देशकी जनताके स्वास्थ्यपर जो बुरा प्रभाव पड़ता है, उसके कारण अनेक पूँजीवादी सरकारोंने स्त्रियोंकी रक्षाके लिये मजदूरीसम्बन्धी कुछ नियम बनाये हैं। जिनके अनुसार मिल-मालिकोंको प्रसवके समय स्त्रियोंको बिना काम किये कुछ तनख्वाह देनी पड़ती है और बच्चा होनेपर मिलमें काम करते समय माँको बच्चेको दूध आदि पिलानेकी सुविधा भी देनी पड़ती है। इन कानूनी अड़चनोंसे बचनेके लिये मिलें प्राय: विवाहित स्त्रियोंको और खासकर बच्चेवाली स्त्रियोंको मिलमें नौकरी देना पसन्द नहीं करतीं। यूरोपमें अस्सी या नब्बे प्रतिशत लड़कियाँ विवाहसे पहले किसी-न-किसी प्रकारकी मजदूरी या नौकरीकर अपना निर्वाह करती हैं या अपने परिवारको सहायता देती हैं, परंतु विवाह हो जानेपर उन्हें जीविका कमानेकी सुविधा नहीं रहती। इन कारणोंसे स्त्रियाँ विवाह न करने या विवाह करनेपर भी गर्भ हटा देनेके लिये मजबूर होती हैं। जीविकाका कोई उपाय न मिलनेपर उन्हें अपने शरीरको पुरुषोंके क्षणिक आनन्दके लिये बेचकर अपना पेट भरनेके लिये मजबूर होना पड़ता है।’ ‘वैयक्तिक सम्पत्तिके आधारपर कायम पूँजीवादी-समाजमें स्त्री व्यक्तिकी सम्पत्ति और मिल्कियतका केन्द्र होनेके कारण या तो पुरुषके आधिपत्यमें रहकर उसके वंशको चलाने, उसके उपयोग-भोगमें आनेकी वस्तु रहेगी या फिर आर्थिक संकट और बेकारीके शिकंजोंमें निचोड़े जाते हुए समाजके तंग होते हुए दायरेसे, अपनी शारीरिक निर्बलताके कारण—जिस गुणके कारण वह समाजको उत्पन्न कर सकती है, समाजमें जीविकाका स्थान न पाकर केवल पुरुषके शिकारकी वस्तु बनती जायगी। पर यह अवस्था है साधनहीन गरीब और मध्यम श्रेणीकी स्त्रियोंकी। साधन-सम्पन्न और अमीर श्रेणीकी स्त्रियाँ यद्यपि भूख और गरीबीसे तड़पती नहीं, परंतु उनके जीवनमें भी आत्मनिर्णय और विकासका द्वार बन्द रहता है।’ मार्क्सके अनुसार ‘समाजमें स्त्रियोंका समान अधिकार होनेके लिये उन्हें भी समाजमें पैदावारके कार्यमें सहयोग देनेका अवसर मिलना चाहिये।’ &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt; इस बातको स्वीकार करता है कि ‘समाजमें संतान उत्पन्न करना न केवल स्त्रीके, बल्कि सम्पूर्ण समाजके सभी कामोंमें महत्त्वपूर्ण काम है; क्योंकि मनुष्य-समाजका अस्तित्व इसीपर निर्भर करता है। इस महत्त्वपूर्ण कार्यके ठीक रूपसे होनेके लिये अनुकूल परिस्थितियाँ होनी चाहिये। स्त्रीको संतानोत्पत्ति मजबूर होकर या दूसरेके भोगका साधन बनकर न करनी पड़े, बल्कि वह अपने आपको समाजका एक स्वतन्त्र अंग समझकर, अपनी इच्छासे संतान पैदा करे। संतान पैदा करनेके लिये समाजकी सभी स्त्रियोंके लिये ऐसी परिस्थितियाँ होनी चाहिये, जो स्वयं स्त्री और संतानके स्वास्थ्यके लिये अनुकूल हों। गर्भावस्थामें स्त्रीके लिये इस प्रकारकी परिस्थिति होनी चाहिये कि वह अपने स्वास्थ्यको ठीक रख सके और स्वस्थ संतानको जन्म दे सके, परंतु पूँजीवादी-समाजमें साधनहीन तथा पूँजीपति दोनों ही श्रेणियोंके लिये ऐसी परिस्थितियाँ नहीं हैं। साधनहीन श्रेणीकी स्त्रियोंको गर्भावस्थामें उचितसे अधिक परिश्रम करना पड़ता है और पूँजीवादी श्रेणीकी स्त्रियाँ बिलकुल निष्क्रिय रहनेके कारण जैसी संतान पैदा करना चाहिये, वैसी नहीं कर पातीं।’ ‘समाजवादी और समष्टिवादी-समाजमें स्त्री भी समाजका परिश्रम या पैदावार करनेवाला अंग समझी जाती है। उसे केवल पुरुषके भोग और रिझावका साधन नहीं समझा जाता। ‘मार्क्सवाद’ मनुष्यमें आनन्द, विनोद और रिझावकी जगह भी स्वीकार करता है, परंतु उसमें पुरुषको प्रधान बनाकर स्त्रीको केवल साधन बना देना उसे स्वीकार नहीं। पूँजीवादी-समाजमें स्त्री अपने माता बननेके लिये कार्यके कारण पुरुषके सामने आत्मसमर्पण करनेके लिये मजबूर होती है (क्योंकि पुरुष जीविका कमाकर लाता है)। समाजवाद और समष्टिवादमें स्त्रीके गर्भवती होने, प्रसवकाल और उसके बाद जबतक वह फिर परिश्रमके काममें भाग लेनेके योग्य न हो जाय, स्त्रीकी आवश्यकताओंकी पूर्ति और स्वास्थ्यकी देख-भालकी जिम्मेदारी समाजपर होगी। प्रसवसे दो-ढाई मास पूर्वसे लेकर प्रसवके एक मास पश्चात्तक वह समाजके खर्चपर रहेगी। संतान पैदा होनेके बाद समाज जो काम उसे करनेके लिये देगा, उसमें बच्चेकी देख-भालका समय और सुविधा भी उसे देगा। बच्चेके पालने-पोसने और शिक्षाकी जिम्मेदारी भी गरीब स्त्रीके ही कन्धोंपर न होकर समाजके सिर होगी। इस प्रकार संतान पैदा करना स्त्रीके लिये भय और मुसीबतका कारण न होकर उत्साह और प्रसन्नताका विषय होगा।’ उपर्युक्त मार्क्सवादी मन्तव्यसे यह स्पष्ट है कि मार्क्सवादियोंको स्त्री-हितसे उतना प्रयोजन नहीं है, जितना कि स्त्रीको अपने पति-पुत्रादि परिवारसे विच्छिन्नकर उसे समाजकी वस्तु बनानेसे है। स्पष्ट है कि पतिको अपनी पत्नीमें जितनी प्रीति है, पुत्रको अपनी मातामें जितना स्नेह है, उतनी प्रीति, उतना स्नेह समाजकी साधारण वस्तुमें समाजका क्यों होगा? जेलों एवं अनाथालयोंमें भी स्त्रियों-पुरुषोंको भोजन मिलता है, वस्त्र मिलते हैं, इलाज मिलता है और गर्भ तथा प्रसवकालमें बहुत-सी सुविधाएँ भी मिलती हैं, परंतु क्या स्वाधीनतापूर्वक गरीबी हालतके भी जीवनका सुख उपर्युक्त स्थितिमें सम्भव है? पति, सास-ससुर, देवर-जेठ, पुत्र-पौत्र आदिके सहज सम्बन्ध और स्नेहकी तुलना समाजमें कहाँ प्राप्त हो सकती है? &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;-प्रणालीमें स्त्री गृहलक्ष्मी रहेगी। &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;ोंने विवाहके समय वरके मुखसे वधूको कहलाया है कि तुम श्वसुर, श्वश्रू, ननद और देवरमें सम्राज्ञी बनो—‘सम्राज्ञी श्वशुरे भव सम्राज्ञी श्वश्र्वां भव। ननान्दरि सम्राज्ञी भव सम्राज्ञी अधि देवृषु॥’ (ऋक्० सं० १०।८५।४६) स्त्री ससुर, पति, पुत्रादिकी कमाईकी रानी एवं मालकिन होगी, परिवारके लोग उसके इशारेपर काम करेंगे, उसका ही दिया हुआ खायेंगे और खर्च करेंगे। उसे मिलोंमें मजदूरी करने नहीं जाना पड़ेगा, समाजके नामपर हुकूमत करनेवाले मुट्ठीभर तानाशाहोंके प्रबन्धस्थापनमें कोई वस्तु पानेके लिये पंक्तिबद्ध खड़े रहकर उसे बाट नहीं जोहना पड़ेगा। बिना मजदूरी किये ही वह समाजमें पुरुषोंके बराबरका ही नहीं, उनसे हजारगुना अधिक ऊँचा स्थान प्राप्त करेगी। रामराज्यके अनुसार सन्नारीके बलपर कुल, गोत्र एवं वंशकी रक्षा होगी। समाजवादी-व्यवस्थामें इच्छानुसार किन्हीं नये-नये पुरुषोंसे संतान उत्पन्न करनेवाली नारीके पुत्र-पुत्रीका कुल, गोत्र, धर्म क्या होगा? एक ही माँसे उत्पन्न अनेक भाई-बहनें कितने ही पिताओंसे उत्पन्न हुए होंगे, उनका परस्पर क्या सम्बन्ध होगा? इससे मार्क्सवादीसे क्या मतलब होगा? मार्क्सवादमें तो जैसे सभी सम्पत्ति सरकारी, भूमि सरकारी; वैसे ही सब औरतें सरकारी, सब मर्द सरकारी और सभी बच्चे भी सरकारी होंगे। जैसे गाय-बैल, घोड़े-घोड़ी, ऊँट-ऊँटिनी आदि पशुओंका अपना न निजी कोई पति है, न पत्नी है, न अपना कोई माता-पिता है, न अपना कोई बच्चा-बच्ची है, सब सरकारी-ही-सरकारी हैं; वैसे ही स्त्री-पुरुष, बच्चे-बच्ची सब सरकारी-ही-सरकारी होंगे। फिर कहाँका पिण्डदान, कहाँका श्राद्धतर्पण, कहाँका गयाश्राद्ध, कहाँका धर्म, दान, पुण्य, मोक्ष; कहाँका परिवार, कुटुम्ब और कैसे पारिवारिक स्नेह?—सब पशुवत् जीवन होगा। सरकारी अफसरके आदेशानुसार जैसे किसी घोड़ा-घोड़ीका सम्बन्ध कराया जाता है, वैसे ही समाज या समाजवादी सरकारके आदेशानुसार अनियतरूपसे स्त्री-पुरुषका सम्बन्ध करा दिया जायगा। समाजके नामपर तानाशाही सरकार और उसके नौकर सब व्यवस्था करेंगे। वे ही लोगोंसे विभिन्न काम करायेंगे, वे ही रोटी-कपड़ा देंगे, वे ही गर्भधारण करायेंगे, वे गर्भ तथा प्रसवकालका सब प्रबन्ध करेंगे। फिर पति-पुत्र और कुटुम्बका कोई भी स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं रहेगा। गो, गर्दभ, श्वान, शूकरादि जानवरोंके या काक, कुक्‍कुट, कपोत आदि पक्षियोंके समूहके तुल्य ही मानव-समूह होगा। ‘गरीब स्त्रीसमाजके कन्धेपर कोई भार न दिया जायगा, दयालु समाजमें और समाजवादी सरकारके कन्धोंपर ही सब भार रहेगा’, यह है समाजवादमें स्त्रियोंका स्थान। समाजमें यदि समानाधिकार लेना है, तो स्त्रियोंको यह सब स्वीकार करना पड़ेगा। बिना कमाये उन्हें अधिकार न मिल सकेगा। मार्क्सवादमें स्त्रियोंके लिये सरकारी गुलामी और सरकारी मजदूरी ठीक समझी जाती है, परंतु अपने सास-ससुर, पति-पुत्र आदिकी सेवा, लालन-पालन असह्य है। यह स्त्रीके लिये गुलामी है, उसे आत्म-समर्पणके लिये बाध्य करना है। श्वशुरकुलकी साम्राज्ञी, पतिके घर एवं हृदयकी महारानी, पुत्रोंकी पूज्या होकर गृहस्वामिनी, गृहलक्ष्मी बनना श्रेष्ठ है या सरकारी नौकरानी बनकर पिल्ली-कुतियाका जीवन व्यतीत करना श्रेष्ठ है, इसे समझदार स्त्रियाँ स्वयं सोचें और सोचें वे पुरुष, जिन्हें आगेसे ऐसी ही पत्नी और माता पाना है।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और रामराज्य, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>वर्गवाद</category><category>वर्गविहीनसमाज</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>10.3 अर्थमूलक समाजमें सामाजिक सम्बन्ध ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/10-3-arthmuulk-smaajmen-saamaaji/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/10-3-arthmuulk-smaajmen-saamaaji/</guid><description>10.3 अर्थमूलक समाजमें सामाजिक सम्बन्ध मार्क्सवादी सभी सम्बन्धोंकी धार्मिकता एवं परम्परामूलकताका नष्ट हो जाना आवश्यक मानते हैं। उनकी दृष्टिमें ‘सब सम्बन्ध जब अर्थमूलक हो जायँगे, तब पति-पत्नी, पिता-…</description><pubDate>Sun, 22 Jun 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;10.3 अर्थमूलक समाजमें सामाजिक सम्बन्ध&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt;ी सभी सम्बन्धोंकी धार्मिकता एवं परम्परामूलकताका नष्ट हो जाना आवश्यक मानते हैं। उनकी दृष्टिमें ‘सब सम्बन्ध जब अर्थमूलक हो जायँगे, तब पति-पत्नी, पिता-पुत्र, भाई-बहन, शिक्षक-शिष्यका अर्थमूलक सीधा संघर्ष हो सकेगा। किसी परम्पराकी ओटमें संघर्षके कारणको छिपाया न जा सकेगा। सीधा संघर्ष क्रान्तिके अनुकूल ही होगा’, परंतु जिन्हें कुटुम्ब, समाज, धर्म, कर्म, सभ्यता, संस्कृति, भक्ति, प्रेम एवं आध्यात्मिक उन्नति अभीष्ट है, उनके लिये तो ये बातें गुण नहीं, अपितु कॉलरा एवं प्लेगके समान एक रोग ही होंगी। &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;-प्रणालीमें स्त्रियोंकी यह दुर्दशा किसीको स्वप्नमें भी नहीं देखनी पड़ेगी। जैसे लता, वल्लरी आदि वृक्षाश्रित रहकर ही पनपती, फलती-फूलती हैं, उन्हें यदि अपने ही पैरों खड़ा करनेका प्रयत्न किया जाय तो भी वे वृक्षके समान सीधी खड़ी नहीं हो सकती हैं, पृथ्वीपर ही वे फैलती हैं और फिर उन्हें शतश: पादप्रहारकी भागिनी बनना पड़ता है, वैसी ही स्त्रियोंकी भी स्थिति है। उन्हें स्वतन्त्रताका पाठ पढ़ाकर ही पाश्चात्य जगत‍्‍ने भीषण दुर्दशातक पहुँचा दिया है। यह तो सभीको मानना पड़ता है कि अनेक अंशोंमें स्त्रीसमाज तथा पुरुषसमाजमें समानता होते हुए भी अनेक अंशोंमें भिन्नता भी है। स्त्रियोंमें जितनी कोमलता, सुन्दरता और विश्रान्तहेतुता है, उतनी पुरुषोंमें नहीं है। वह गर्भ-धारण करती है और शिशुका पालन-पोषण करती है, अत: उसे पुरुषका आश्रय अपेक्षित है। बुद्धि एवं मस्तिष्ककी विचक्षणता होते हुए भी उसमें श्रद्धा एवं भक्तिका भी अंश अधिक होता है। पुरुषके कठोर, परिश्रमपूर्ण एवं रूक्ष जीवनको इसीसे सरसता मिलती है। प्राचीन दार्शनिकोंका तो मत है कि जैसे अग्नि एवं दाहिकाशक्ति, जल एवं शीतलता, दुग्ध एवं उसकी स्वच्छता, बीज एवं उसकी अंकुरोत्पादिनी शक्तिका अविच्छेद्य सम्बन्ध है, वैसे ही पति-पत्नीका भी अविच्छेद्य सम्बन्ध है। शक्ति आधेय है और शक्तिमान् आधार। शक्तिके बिना शक्तिमान् अकिंचित्कर है। &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/shivbhujngm/&quot;&gt;शिव&lt;/a&gt; जब शक्तिसे समन्वित होता है, तभी संसारका उत्पादन, पालन, संहरण कर सकता है, अन्यथा शक्तिके बिना देव शिव हिल-डुल भी नहीं सकता—‘शिव: शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्त: प्रभवितुम्। न चेदेवं देवो न खलु कुशल: स्पन्दितुमपि॥’ (सौन्दर्यल० १) विश्व-निर्माण जैसे महाकार्यनिर्माणकी बात तो दूर रही, शक्तिमान‍्से शक्तिके पृथक् करनेसे दोनोंकी ही दुर्गति होती है। इसीलिये भारतीय सभ्यतामें शक्तिसहित ही शक्तिमान‍्की आराधना होती है। अतएव मन्दिरोंमें गौरी-शंकर, लक्ष्मी-नारायण, सीता-राम, राधा-कृष्ण, शक्ति-शक्तिमान् दोनोंकी आराधना चलती है। अभ्यर्हित होनेसे, पिताकी अपेक्षा भी माताके सहस्रगुणित अधिक पूज्य होनेके कारण ही नाममें पहले गौरी और पीछे शंकरका, पहले लक्ष्मी और पश्चात् नारायणका, प्रथम सीता एवं राधाका तथा पश्चात् राम और कृष्णका उच्चारण होता है। राष्ट्ररूपी मन्दिरमें भी लक्ष्मीस्थानीय नीतिके सहित ही नारायणस्थानीय धर्मका सम्मान श्रेयस्कर होता है। धर्महीन नीति विधवा-तुल्य और नीतिहीन धर्म विधुर-तुल्य माना जाता है। व्यष्टिरूपमें दस वर्षपर्यन्तकी कुमारी नव-दुर्गारूपमें और सुवासिनी साक्षात् भगवतीके रूपमें पूजित होती है। साक्षात् परमेश्वर ही जैसे शिव, विष्णु, राम, कृष्ण आदि रूपमें पूजित होता है, वैसे ही शक्तिप्रधान परमेश्वर ही दुर्गा, लक्ष्मी, सीता, राधा आदिके रूपमें पूजित होता है। अधार्मिक, जडवादी लोग ही स्त्रीको केवल भोगकी सामग्री समझकर उसका अपमान करते हैं और उसे विपज्जालमें डालते हैं तथा उसी पापके कारण वे स्वयं भी सर्वनाशके गर्तमें निपतित होते हैं। स्वतन्त्रता, आत्मनिर्णयका अधिकार आदि मोहक नामोंसे स्त्रियोंको बरगलाकर अपना शिकार बनाना और उन्हें मजदूरी या वेश्यावृत्ति करनेके लिये निराश्रय एवं असहाय छोड़ देना उनके साथ घोर अन्याय करना है। पुरुष जब सहर्ष अपनी कमाई स्त्रियोंको खर्च करनेके लिये समर्पण करता है, तब उन्हें कमानेके काममें लगानेका अर्थ ही क्या है? इसके अतिरिक्त गृहका कार्य भी कुछ कम नहीं है। यदि गृहिणी सुप्रबन्ध करनेवाली गृहलक्ष्मी न हो तो पुरुषके लाखों कमानेपर भी घरमें बरक्‍कत नहीं होती। मानव-जीवन और गृहको सरस एवं मांगलिक बनानेवाली स्त्रीके सिरपर कमानेका भार न होना ही अच्छा है। स्त्रीद्वारा उत्पादित रामचन्द्र, हरिश्चन्द्र, प्रह्लाद, ध्रुव, शिबि, दिलीप, भगीरथ-जैसी एक भी संतान समष्टि-व्यष्टि जगत‍्के लोक-परलोकका जीवन मांगलिक एवं समुन्नत बना सकती है। उपयोगितावादी स्मिथ तो धर्म, संस्कृति, प्रेम, सौन्दर्य, कला, क्षमा, दया, त्याग आदि सभी उदात्त गुणोंमें उपयोगिता ही ढूँढ़ता है। लोककल्याणार्थ अपने प्राणतकको बलिदान कर देनेमें स्मिथको कुछ भी उपयोगिता नहीं दिखायी दे सकती, परंतु क्या इतनेसे ही यह त्याग व्यर्थ कहा जा सकता है? संसारमें उपयोगिता ही सब कुछ नहीं है। माता, भगिनी, पुत्री, पत्नीका महत्त्व उपयोगिताकी कसौटीपर नहीं परखा जा सकता।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और रामराज्य, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट नि&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;न : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थमूलक</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>वर्गविहीनसमाज</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>सम्बन्धी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>10.2 पातिव्रत-धर्म ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/10-2-paativrt-dhrm-maarksvaa/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/10-2-paativrt-dhrm-maarksvaa/</guid><description>10.2 पातिव्रत-धर्म मार्क्सके अनुसार ‘पातिव्रत-धर्म’ केवल व्यक्तिगत सम्पत्तिके आधारपर ही बना है। व्यक्तिगत सम्पत्तिके आधारपर बना हुआ समाज तहस-नहस न हो जाय, इसीलिये एक ही पुरुषके साथ सम्बन्ध रखनेके …</description><pubDate>Sat, 21 Jun 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;10.2 पातिव्रत-धर्म&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;मार्क्सके अनुसार ‘पातिव्रत-धर्म’ केवल व्यक्तिगत सम्पत्तिके आधारपर ही बना है। व्यक्तिगत सम्पत्तिके आधारपर बना हुआ समाज तहस-नहस न हो जाय, इसीलिये एक ही पुरुषके साथ सम्बन्ध रखनेके लिये स्त्रीको समझा-बुझाकर राजी किया गया। तदनुसार ही धर्म, नीति, रिवाज गढ़े गये। स्त्रीकी स्वतन्त्रतासे धर्म और भगवान‍्के नाराज होनेका डर दिखलाया गया। ठीक ही है; जडवादी मार्क्ससे इसके सिवा और अधिककी आशा भी क्या की जा सकती थी? जिसकी दृष्टिमें विश्वका कारण सर्वज्ञ ईश्वर ही नहीं जँचता, जो भूत-प्रेतकी कल्पनाको ही परिष्कृतरूपमें ईश्वर-कल्पना समझता है, जिसके अनुसार धर्म-कल्पना भीरु मस्तिष्कका फितूरमात्र है, वह सीता, सावित्री आदिके परम गम्भीर पातिव्रतधर्मको कैसे समझ सकता था? अनसूयाद्वारा ब्रह्मा, विष्णु, रुद्रको पातिव्रतबलसे तीन महीनेके बालक बनाया जाना, सावित्रीका यमराजसे अपने मृत पतिको पुन: प्राप्त कर लेना, शाण्डिलीका सूर्यनारायणके उदयपर प्रतिबन्ध लगा देना आदि &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt;की दृष्टिसे कोरी कल्पनाएँ ही ठहरेंगी। आश्चर्य है कि परम सत्य आर्ष इतिहास मार्क्सवादियोंकी दृष्टिमें झूठे हैं, परंतु निराधार बन्दरसे मनुष्य उत्पन्न होनेका विकासवादी इतिहास सत्य है। भारतमें अभी-अभी हालहीमें सौ-पचास वर्षोंके भीतर सैकड़ों सतियाँ हुई हैं। वे हँसती-हँसती चितापर अपने पतिके साथ परलोक चली गयीं। उत्तरप्रदेश तथा राजस्थानमें तो कई सतियाँ बिना अग्निके ही अपने शरीरसे दिव्याग्नि प्रकट करके सती हुई हैं। चित्तौड़गढ़की पद्मिनी आदिके ऐतिहासिक सतीत्वसे कोई समझदार व्यक्ति आँख नहीं मूँद सकता। मार्क्सवादी सिवा अनर्गल प्रलापके इन बातोंका क्या उत्तर दे सकते हैं? स्पष्ट है कि जिन्हें धर्म, सभ्यता, संस्कृति, पातिव्रत मान्य है, ऐसे स्त्री-पुरुषोंके लिये मार्क्सवाद धर्म एवं मानवताका शत्रु ही है। मार्क्सवादकी दृष्टिसे व्यक्तिगत सम्पत्ति तथा उत्तराधिकारका सम्बन्ध तो अब समाप्त हो गया; क्योंकि मार्क्सवादी दृष्टिकोणसे भूमि एवं सम्पत्तिका उत्तराधिकार-नियम समाप्त करके सबका राष्ट्रियकरण या समाजीकरण होना ही उचित है। जब व्यक्तिगत सम्पत्ति तथा उत्तराधिकारकी प्रथा समाप्त हुई, तब फिर तदर्थ स्त्रीका एक पुरुषसे सम्बन्धवाला नियम क्यों रहेगा? सम्बन्धित पतिके मरनेके बाद ही नहीं, अपितु एक साथ ही स्त्री यदि सैकड़ों पुरुषोंसे सम्बन्ध रखे तो भी कोई आपत्ति नहीं। जैसे एक पानीभरी बाल्टीसे अनेक व्यक्ति प्यास बुझा सकते हैं, वैसे ही एक स्त्रीसे भी यदि असंख्य पुरुष प्यास बुझा लें तो भी कोई हर्ज नहीं है। लेनिनके शब्दोंमें ‘गन्दी नालीके जलसे प्यास बुझाना ठीक नहीं; किंतु जैसे स्वास्थ्यकर, तृप्तिकर स्वच्छ जलसे ही प्यास बुझाना उचित है, वैसे ही तृप्तिकर, स्वास्थ्यवर्द्धक स्त्री-पुरुष-सम्बन्धमें कोई भी हानि नहीं है और अब तो गर्भपात करानेकी स्वाधीनता भी रूसमें मिल गयी है। ‘पुरुष-समाजके हाथमें ही धर्म, नीति, रिवाज सब कुछ था, इसलिये पुरुषने स्त्रीको स्वाधीन बनानेका प्रयत्न किया, मार्क्सवादियोंका यह कथन भी दुरभिसंधिपूर्ण है। मार्क्सवादी अधिकार पाकर जैसे दूसरोंको सदाके लिये कुचल देना चाहते हैं, महर्षियों तथा ईश्वरके सम्बन्धमें भी उनकी वैसी ही धारणा होती है। उनके मस्तिष्कमें अब्भक्ष, वायुभक्ष, परम निष्काम लोककल्याणपरायण महर्षियोंमें भी पक्षपात ही प्रतीत होता है, परंतु मार्क्सवादियोंकी यह धारणा संगत नहीं है। धर्मबुद्धिसे शिष्य जैसे स्वेच्छापूर्वक गुरुका अनुसरण (दास्य) करनेमें लज्जित नहीं होता, पुत्र जैसे माता-पिताका दास्य करनेमें नहीं हिचकता, वैसे ही स्त्री भी अपने पति एवं सास-ससुरका दास्य या सेवन एवं अनुसरण करनेमें लज्जित नहीं होती। जबतक धर्मबुद्धि रहेगी, वहाँ यह भाव भी पहलेके समान ही जारी रहेगा। इसपर सम्पत्ति-विपत्तिका असर नहीं पड़ता है, बल्कि आपत्तिकालमें तो धीरज, धर्म, मित्र एवं नारीकी विशेषरूपसे परीक्षा होती है—‘धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी॥’ &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;-जैसी धन-सम्पदा, ऐश्वर्य-वैभवमें भी स्त्री-पुरुष अपने पूज्यों, गुरुजनोंके प्रति दास्यभाव ही रखते थे—‘दासवत् सन्नतार्याङ्घ्रि:’ (भागवत ७।४।३२)। प्रह्लाद गुरुजनोंके चरणोंमें सदा दासतुल्य विनत रहते थे। धन एवं सम्पत्तिकी वृद्धि खलोंको ही घमण्डी एवं उद्दण्ड बनाती है, सत्पुरुषोंको नहीं। इसीलिये औद्योगिक समृद्धिके युगमें भी सन्नारियोंके शीलस्वभावमें कोई अन्तर नहीं पड़ा। प्राचीनकालमें भी असत् स्त्री-पुरुष होते ही थे, वे उस कालमें भी उद्दण्ड ही थे, कोई किसीके नियन्त्रणमें नहीं रहता था। वैयक्तिक सम्पत्ति एवं नर-नारीके धर्ममूलक सम्बन्ध शाश्वतिक हैं। जडवाद एवं नास्तिकताके प्रचारसे कुछ थोड़ा-बहुत ह्रास होना सम्भव है; फिर भी इनका मिट सकना सम्भव नहीं। पुरुषकी अपेक्षा भी नारी-जाति श्रद्धालु है। वह अपने पतिसे भिन्न पुरुषको भ्राता, पिता, पुत्रकी ही दृष्टिसे देखना उचित समझती है, धर्महीन मनमाने यौन-सम्बन्धको वह पाप ही समझती है।’ &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;ोंकी नीतिमें तो मुख्य विशेषता ही यह थी कि देशमें कोई स्वैरी पुरुष भी नहीं होता था, फिर स्वैरिणी स्त्रीका तो होना सम्भव ही कैसे था—‘न स्वैरी स्वैरिणी कुत:’ (छान्दो० ५।११।५)। स्त्री सर्वदा ही लज्जाशील होती है, वह कभी भी अभियोक्त्री नहीं होती। वेश्या भी अभियुक्ता होनेमें ही सुखका अनुभव करती है। पुरुष ही स्वैरी होकर स्त्रीको स्वैरिणी बनाता है। जहाँ पुरुष स्वैरी न होगा, वहाँ स्त्री भी स्वैरिणी नहीं हो सकती। स्त्री पुरुषकी हृदयेश्वरी है, प्राणेश्वरी है, आत्मा है, सब कुछ है। उसके हिस्से एवं अधिकारकी बात जडवादी नास्तिकोंके द्वारा ही उठायी जाती है। स्त्रीको पुरुषके बराबर बनानेका प्रयत्न करना उसका अपमान करना है, उसको हजारगुना नीचे उतारना है। शास्त्रोंने पितासे सहस्रगुना अधिक माताका सम्मान करना बतलाया है—‘सहस्रं तु पितॄन्माता गौरवेणातिरिच्यते।’ (मनु० २।१४५) धार्मिक दृष्टिसे चतुर्थाश्रमी यति सर्ववन्द्य है। गृहस्थ पिता भी पुत्र संन्यासीका वन्दन करता है, परंतु उस संन्यासीको धर्मानुसार मातृवन्दन विहित है—‘सर्ववन्द्येन यतिना प्रसूर्वन्द्या प्रयत्नत:।’ (स्क० पु०, काशी० ११।५०) इस तरह माताको कुछ अधिकार प्रदान करना, क्या उसके सर्वाधिकारको सीमित करना नहीं है? किसी भी उपासना एवं साधनामें शिष्यको जैसे अपनी आत्मा गुरुकी आत्मामें मिलानी पड़ती है, गुरुकी इच्छामें शिष्यको अपनी इच्छा विलीन कर देनी पड़ती है, वैसे ही पत्नीको अपनी आत्मा, अपनी इच्छा पतिकी आत्मा तथा इच्छामें मिलानी पड़ती है। पतिद्वारा किये हुए सत्कर्मों तथा आराधनाओंमें पत्नीका भाग रहता है। पाश्चात्य राजतन्त्रने जडवादकी धुनमें ईश्वर एवं धर्मसे नाता तोड़ लिया, फिर पूँजीपतियोंने राजतन्त्रको भी समाप्त कर दिया। जहाँ ईश्वर एवं धर्मका राजतन्त्रपर नियन्त्रण नहीं, वहाँ सामाजिक बन्धनोंका ढीला पड़ना स्वाभाविक है। पाश्चात्य शिक्षाका प्रभाव भारतपर अवश्य ही पड़ रहा है। इतना ही क्यों, भारतकी परिस्थिति तो अन्य देशोंकी अपेक्षा भी बदतर होती जा रही है। सर्वप्रथम औद्योगिक विकास जिस इंग्लैण्डमें हुआ था, वहाँके सर्वप्रथम एवं सर्वोत्कृष्ट नागरिक राज्य-सिंहासनाधीश तथा उसके परिवारके सिंहासन-सम्बन्धित व्यक्तियोंके लिये अभी भी पर्याप्त धार्मिक नियन्त्रण अधिक है। उन्हें तलाक देनेवाले स्त्री-पुरुषके साथ शादी करनेकी मनाही है। तलाक दी हुई स्त्रीके साथ शादी करनेके लिये अष्टम एडवर्डको राजगद्दी छोड़नी पड़ी। इसी प्रकार ब्रिटेनकी रानीकी बहन कुमारी मार्गरेटको धार्मिक नियन्त्रणके कारण अपने प्रेमीसे शादीका निश्चय छोड़ना पड़ा। वहाँ ‘बाइबिल’ के अनुसार पति-पत्नीका सम्बन्ध-विच्छेद ईश्वरीय नियमके विरुद्ध एवं पाप कहा गया है, परंतु जडवादसे प्रभावित, समाजवादका अन्धानुकरण करनेवाली भारतसरकार तलाकका नियम बनाकर स्त्रियोंको स्वाधीन करनेके नामपर उनका सर्वनाश कर रही है। घटना अवश्य समाजवादियोंके अनुसार घट रही है, परंतु यह घटना कॉलरा और प्लेगके समान अनिष्ट ही है, इष्ट नहीं। मार्क्सवादी-वर्णित स्त्रीसमाजकी दुर्दशाका मूल कारण धर्मविमुखता ही है, इसीसे बरक्‍कतमें भी कमी हुई। पहले घरमें एक व्यक्ति कमाता था, उससे घरभरका काम चलता था। आज पुरुष कमाता है, स्त्री कमाती है और बच्चे भी कमाते हैं, तब भी परिवारका पेट नहीं भरता। प्राचीन कालमें यथोचित वयमें कन्याओंका विवाह हो जाता था, स्त्रीको अनाथकी तरह भटकनेकी नौबत नहीं आती थी। अविवाहित दशामें प्रसवकालका, अनाथ-अवस्थाका उसे कोई अनुभव नहीं करना पड़ता था। मार्क्सवादी उत्तरोत्तर प्रगतिकी कल्पनाका स्वप्न देख रहे हैं, परंतु स्थिति यह दिखायी देती है कि समाजका उत्तरोत्तर अधिक पतन होता जा रहा है। स्त्रीसमाजकी दीनदशा उत्तरोत्तर बढ़ रही है। स्वतन्त्रताके नामपर तलाक-प्रथाके विस्तार होनेका परिणाम भीषण होगा। अल्पवयस्क लड़की भले ही तलाक देकर अपनी दूसरी शादी कर पाये, परंतु वही जब चार बच्चोंकी माँ हो चुकी होगी, उसका यौवन ढल गया होगा और सुन्दरता समाप्त हो गयी होगी, तब उसे यदि तलाक मिल गया तो उस अवस्थामें उसकी पुन: शादी होनी मुश्किल हो जायगी। उस दशामें वह औरत क्या स्वयं खायेगी और क्या बच्चोंको खिलायेगी? उस समय वह खूनके आँसू बहाती हुई भारतको नरककुण्ड बनायेगी। धर्महीन क्या पूँजीवाद, क्या समाजवाद, सर्वत्र ही स्त्री-समाजकी दुर्गति ध्रुव है। रामराज्य-प्रणालीमें बाल्यावस्थामें ही लड़कियोंकी शादी हो जायगी। प्रत्येक कुटुम्ब एवं नागरिककी बेकारी, बेरोजगारी दूर करके सबका ही जीवनस्तर उन्नत बनाया जायगा। रामराज्यके अनुसार स्त्रियाँ गृह-लक्ष्मी, घरकी रानी होंगी, उन्हें नौकरानी बननेकी आवश्यकता ही न रहेगी। पुरुषोंका काम घरके बाहर होगा और स्त्रियोंका काम घरके भीतर। वैसे किसी खास अवसरपर उनकी बाहर आवश्यकता अपवादरूपमें ही होगी। सीता सदा गृहके भीतर रहती हुई भी शतमुख रावणका दर्प-दलन करनेके लिये रणचण्डीका रूप धारणकर पुष्करद्वीप गयी थी। (अद‍्भु० रामा० १७।२४) इसी कोटिका हाडी और झाँसीकी रानी आदिका उदाहरण है। विवाहकर परिवार-पालन करनेके उदात्त कर्तव्यको झगड़ा या झंझट समझनेकी प्रवृत्ति जडवादी उच्छृंखलपंथियोंकी ही प्रेरणा है। स्त्री और पुरुष सभी यदि नौकर-नौकरानी बनेंगे, तो उनकी संतानें भी अवश्य ही नौकर-मनोवृत्तिकी ही बनेंगी। माताका दुग्ध न पाकर, जननीका लाड़-प्यार, लालन-पालन न पाकर; डिब्बोंके दूध पीनेवाले बच्चे निम्न श्रेणीके ही होंगे। माता-पिताका भी बच्चोंमें कोई प्रेम न होगा, बच्चोंका भी माँ-बापके प्रति कुछ आकर्षण—अनुराग न होगा। पति-पत्नीका भी परस्पर स्थायी प्रेम न होनेसे किसी भी सम्बन्धकी स्थिरता न होगी। सभी सम्बन्ध वासना-तृप्ति और पैसेके कारण होंगे। विवाह और तलाककी अबाध परम्परा चलती ही रहेगी।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और रामराज्य, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>ईश्वरधर्म</category><category>धर्मसम्राट</category><category>पातिव्रत</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>वर्गविहीनसमाज</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>10. मार्क्सीय समाज-व्यवस्था - 10.1 पूँजीवादी युग और स्त्री ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/10-maarksiiy-smaaj-vyvsthaa-10/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/10-maarksiiy-smaaj-vyvsthaa-10/</guid><description>10. मार्क्सीय समाज-व्यवस्था मार्क्सके अनुसार ‘समाज’ व्यक्तियों और परिवारोंका समूह है। समाजकी व्यवस्थामें आनेवाला कोई भी परिवर्तन व्यक्तियों और परिवारोंपर प्रभाव डाले बिना नहीं रह सकता। परिवार—स्त्…</description><pubDate>Fri, 20 Jun 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h2&gt;10. मार्क्सीय समाज-व्यवस्था&lt;/h2&gt;
&lt;p&gt;मार्क्सके अनुसार ‘समाज’ व्यक्तियों और परिवारोंका समूह है। समाजकी व्यवस्थामें आनेवाला कोई भी परिवर्तन व्यक्तियों और परिवारोंपर प्रभाव डाले बिना नहीं रह सकता। परिवार—स्त्री-पुरुषका सम्बन्ध समाजका केन्द्र है। समाजकी आर्थिक अवस्था मनुष्योंको जिस अवस्थामें रहनेके लिये मजबूर करती है, उसी ढंगपर मनुष्य परिवारको बना लेता है। कुछ देशोंमें बहुत बड़े-बड़े सम्मिलित परिवार होते हैं और कुछ देशोंमें छोटे-छोटे। कहीं परिवार पिताके वंशसे होते हैं और कहीं माताके वंशसे। स्त्री समाजकी उत्पत्तिका स्रोत है। इसके साथ ही वह कई तरहसे पुरुषसे शारीरिकरूपसे कमजोर भी है। इन सब बातोंका प्रभाव समाजमें स्त्रीकी स्थितिपर पड़ता है। ‘समाज जब बिलकुल आदि अवस्थामें था और मनुष्य जंगलोंमें घूम-फिरकर जंगली फलों और शिकारसे पेट भर लिया करते थे, या जब वे खेती और पशु-पालनद्वारा अपना निर्वाह करते थे, उस समय कबीलोंमें भूमिके भाग या इस प्रकारकी दूसरी चीजोंके लिये लड़ाइयाँ होती रहती थीं। इन लड़ाइयोंमें शारीरिक रूपसे स्त्रीके कमजोर होनेके कारण उसका अधिक महत्त्व नहीं था। इसके अलावा स्त्रीको लड़ाई लड़नेके लिये आगे भेजना खतरेसे खाली न था; क्योंकि स्त्रियोंके लड़ाईमें मारे जाने या उनके कैदी होकर शत्रुके हाथमें पड़ेनेसे कबीलोंमें पैदा होनेवाले पुरुषोंकी संख्यामें घाटा पड़ जाता था और कबीला कमजोर हो जाता था। इसलिये स्त्रियोंको लड़ाईमें पीछे रखा जाने लगा; बल्कि सम्पत्तिकी दूसरी वस्तुओंकी तरह उनकी भी रक्षा की जाने लगी। सम्पत्तिकी ही तरह उनका उपयोग भी किया जाता था। उस समय साधनोंका विकास न हो सकनेके कारण पैदावारके कामोंमें विशेष परिश्रम करना पड़ता था; क्योंकि स्त्रीकी अपेक्षा पुरुष पैदावारके कठिन कामको अधिक अच्छी तरह कर सकता था, इसलिये स्त्रीको पुरुषकी प्रधानता मानकर उसकी सम्पत्ति बन जाना पड़ा। उस समय वैयक्तिक सम्पत्तिका चलन न था, इसलिये स्त्री सम्पूर्ण कबीले या परिवारकी साझी सम्पत्ति थी।’ ‘जब विकाससे वैयक्तिक सम्पत्तिका काल आया तो स्त्री भी पुरुषकी वैयक्तिक सम्पत्ति बन गयी, जिसका काम पुरुषके घरेलू कामोंको करना और उसके लिये संतानके रूपमें उत्तराधिकारी पैदा करना था, परंतु स्त्री दूसरे घरेलू पशुओंके ही समान उपयोगकी वस्तु न बन सकी। पुरुषके समान ही उसका भी विकास होनेके कारण या कहिये उसके भी पुरुषके समान ही मनुष्य होनेके कारण, पुरुषकी सम्पत्तिमें ठीक पुरुषके बाद उसका दर्जा मुकर्रर हुआ। आलंकारिक भाषामें इसे यों कहा गया कि वैयक्तिक सम्पत्ति या परिवारके राजमें पुरुष राजा है तो स्त्री मन्त्री। मनुष्य-जीवके विकासके नाते स्त्री और पुरुषमें कुछ भी अन्तर नहीं। मनुष्य-समाजकी रक्षाके लिये वे दोनों एक समान आवश्यक हैं। पुरुष यदि शारीरिक बलमें मस्तिष्कके कामोंमें अधिक सफलता प्राप्त कर सकता है, तो स्त्रीका महत्त्व पुरुषको उत्पन्न करनेमें कम नहीं है। पुरुष-समाजका जीवन स्त्रीके बिना सम्भव नहीं, इसलिये पुरुषकी सम्पत्ति होकर भी स्त्री पुरुषके बराबर ही आसनपर बैठती रही है।’ ‘&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt;में स्त्री-पुरुष-सदाचारका चाहे कितनी भी लीपा-पोतीके साथ महत्त्व गाया जाय, परंतु यह प्रश्न प्रमुखरूपसे बना ही रहेगा कि ‘क्या एक गिलास पानीके लिये गलेमें बाल्टी बाँधकर घूमते रहें? कहीं भी गिलासभर पानी मिल सकता है।’ व्यक्ति एवं परिवारका समूह ही समाज है और स्त्री-पुरुषका सम्बन्ध परिवार और समाजका केन्द्र है। समाजमें सम्पत्ति-विपत्तिके कारण बहुत प्रकारके रद्दोबदल होते रहते हैं; फिर भी बहुत-से धार्मिक-सामाजिक नियम प्राकृतिक नियमोंके समान सुस्थिर होते हैं।’ मार्क्सवादियोंकी ऐतिहासिक कल्पनाएँ सर्वथा निराधार हैं। जगत्-प्रपंच निरीश्वर नहीं है। सर्वज्ञ ईश्वरकी सृष्टि लावारिस एवं निर्विवेक भी नहीं थी। आदिम कालके ब्रह्मा, वसिष्ठ, अत्रि, अंगिरा, भृगु, बृहस्पति, शुक्र आदि आधुनिक लोगोंकी अपेक्षा कहीं अधिक बुद्धिमान् और बलवान् थे। स्वार्थ-मूलक संघर्ष जैसे आज चलता है, वैसे ही कभी पहले भी चलता था। कठिन अवसरोंपर स्त्रियाँ भी लड़ाईमें शामिल होती थीं। इसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण है दुर्गाके अनेक अवतारों—महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती आदिके द्वारा मधु-कैटभ, महिषासुर, शुम्भ, निशुम्भ, चण्ड-मुण्ड, धूम्रलोचनादि दानवोंका संहार। पत्नीरूपमें नारी पुरुषकी भोग्या है, परंतु माताके रूपमें वही पुत्रकी पूज्या है। शृंगाररसके लिये नारी कोमलांगी है, परंतु प्रचण्ड दैत्य-दर्प-दलनमें वही भीषण कराल कालिका है। भगवतीकी यह गर्जना मार्क्सवादियोंने कभी नहीं सुनी कि जो मुझे संग्राममें जीत ले, जो मेरा दर्प दूर कर सके और जो मेरे समान बलवान् हो, वही मेरा भर्ता हो सकता है—‘यो मां जयति सङ्ग्रामे यो मे दर्पं व्यपोहति। यो मे प्रतिबलो लोके स मे भर्ता भविष्यति॥’ (दुर्गासप्त० ५।१२०)। नारी सदासे ही शक्तिकी प्रतीक रही है और पुरुष &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/shivbhujngm/&quot;&gt;शिव&lt;/a&gt;का प्रतीक रहा है। उसका ही रामके साथ सीतारूपमें, विष्णुके साथ लक्ष्मीरूपमें, ब्रह्माके साथ सरस्वतीरूपमें और कृष्णके साथ राधा-रुक्मिणीके रूपमें आदर होता रहा है। वह रणांगणमें प्रचण्डरूपधारिणी होनेपर भी शिवके विश्राम एवं विनोदके लिये ‘सत्यं शिवं सुन्दरम्’ की प्रतिमा बनकर परम कोमलांगी एवं रक्षिणीरूपमें व्यक्त होती थी। वह साझेकी सम्पत्ति कभी नहीं रही। वह सदा ही गृहस्वामिनी एवं गृहलक्ष्मी रही है। द्रौपदी, मारिषाका उदाहरण विशेष वर-शापमूलक अपवादस्वरूप घटनाएँ हैं। वे आचारमें प्रमाण नहीं हैं। आचारमें उदाहरणका आदर न होकर विधि (काँस्टिटॺूशन)-का ही आदर होता है। उसके उदाहरण सती, सीता, सावित्री, दमयन्ती, अरुन्धती, अनसूया, लोपामुद्रा, शाण्डिली आदि पतिव्रताएँ हैं। क्वचित् स्त्रियोंके अनावृत होनेकी कहानियाँ अनादि, अपौरुषेय, समस्त पुंदोष-शंका-कलंकशून्य शास्त्रोंके विरुद्ध होनेसे सर्वथा तात्पर्यशून्य हैं। अपवादभूत विपत्कालिक नियोग-प्रवर्तनकी पशु-तुल्य प्रवृत्तियोंका समर्थन ही उन मिथ्यार्थ-बोधक अर्थवादोंका उद्देश्य था। मन्वादिकोंने पतिके मरनेपर भी पत्यन्तरवरणका वर्जन किया है और नियोग आदिको वेन-राज्यका विगर्हित पशुधर्म बतलाया है। मार्क्सवादी कहते हैं—‘औद्योगिक युग आनेपर जब सम्मिलित परिवार आर्थिक कारणोंसे बिखर गये, जब पुरुषोंको प्रत्येक नगरमें जीवन-निर्वाहके लिये भटकना पड़ा, उस समय सम्पूर्ण परिवारको साथ लिये फिरना सम्भव न था। इसके साथ ही पैदावारके साधन, मशीनोंका विकास हो जानेसे ऐसे हो गये कि उनमें कठोर शारीरिक परिश्रमकी जरूरत कम पड़ने लगी और स्त्रियाँ भी उन कामोंको करने लगीं। बहुधा ऐसा भी हुआ कि जीवनके लिये उपयोगी पदार्थोंकी संख्या बढ़ जानेसे, जिसे दूसरे शब्दोंमें यों भी कहा जा सकता है कि जीवनका दर्जा Standard of living ऊँचा हो जानेसे अकेले पुरुषकी कमाई उसके परिवारके लिये काफी न थी, तब स्त्री और पुरुष दोनों मिलकर मजदूरी करने लगे और घरका खर्च चलाने लगे। इन अवस्थाओंमें पुरुषका स्त्रीपर वह कब्जा न रहा, जो कृषि और घरेलू उद्योग-धन्धोंकी प्रधानताके जमानेमें था। ऊपर जिस ऐतिहासिक विकासका जिक्र हम करते आ रहे हैं, वह औद्योगिक विकासके साथ हुआ और चूँकि यह विकास यूरोपमें अधिक तेजीसे हुआ, इसलिये वहीं लोगोंने इसे अधिक उग्ररूपमें अनुभव भी किया। इस विकासका प्रभाव समाजके रहन-सहनके ढंगपर पड़नेसे स्त्रियोंकी अवस्थापर भी पड़ा। स्त्रियोंकी स्थिति पुरुषोंके बराबर होने लगी। उन्हें भी पुरुषोंके समान ही सामाजिक और राजनैतिक अधिकार मिलने लगे; परंतु वैयक्तिक सम्पत्तिकी प्रथा जारी रही; क्योंकि वह पूँजीवादके लिये आवश्यक थी। परिणाम-स्वरूप स्त्रीके एक पुरुषसे बँधे रहनेका नियम भी जारी रहा। अब स्त्रीको पुरुषका दास न कहकर उसका साथी कहा गया, जिसे यह उपदेश दिया गया कि परिवारकी रक्षाके लिये उसे एक पुरुषके सिवा और किसी तरफ न देखना चाहिये। मौजूदा पूँजीवादी-प्रणालीमें स्त्रीकी स्थिति इसी नियमपर है।’ ‘फिर भी आर्थिक दृष्टिकोणसे जीवनके उपायोंको प्राप्त करनेके लिये स्त्री पुरुषके आधीन रही; क्योंकि परिवारके हितके ख्यालसे पुरुषने स्त्रीको अपने वशमें रखना आवश्यक समझा। जबतक समाज भूमिकी उपजसे या घरेलू धन्धोंसे अपने जीवन-निर्वाहके साधन प्राप्त करता रहा, स्त्रीकी अवस्था परिवार और समाजमें ऐसी ही रही; क्योंकि स्त्रीकी खोपड़ीमें भी पुरुषकी तरह सोचने-विचारने और उपाय ढूँढ़ निकालनेकी सामर्थ्य है; अत: पुरुष उसे गलेमें रस्सी बाँधकर नहीं रख सका। समाजने अपने कल्याण और हितके विचारसे स्त्रीको भी पुरुषकी तरह ही जिम्मेदार ठहराया; लेकिन स्त्रीके व्यवहारपर ऐसे प्रतिबन्ध लगाये गये, जो कि सम्पत्तिके आधारपर बने परिवारकी रक्षाके लिये आवश्यक थे। उदाहरणत: स्त्रीका एक समय एक ही पुरुषसे सम्बन्ध रखना ताकि उसके दो व्यक्तियोंकी सम्पत्ति बननेमें झगड़ा न उठे। पुरुषकी संतानके बारेमें झगड़ा न उठे कि संतान किसकी है, कौन पुरुष उस संतानको अपनी सम्पत्ति देगा? यह सब ऐसे झगड़े थे, जिनके कारण परिवारोंका नाश हो जाता। इसलिये स्त्रियोंके आचरणके बारेमें ऐसे नियम बनाये गये कि झगड़े उत्पन्न न हों। पतिव्रताधर्म—अर्थात् एक पुरुषसे सम्बन्ध रखनेको स्त्रीके लिये सबसे बड़ा धर्म बताया गया, ताकि व्यक्तिगत सम्पत्तिके आधारपर बना हुआ समाज तहस-नहस न हो जाय। जैसा कि ऊपर बताया गया है, स्त्री बुद्धिकी दृष्टिसे मनुष्यके समान ही सामर्थ्यवान् है, इसलिये पशुओंकी तरह उसके गलेमें रस्सी बाँध देनेसे काम नहीं चल सकता था। उसे समझाकर और विश्वास दिलाकर समाजमें मुख्य ‘पुरुष’ के हितके अनुसार चलानेकी जरूरत थी। इस कारण पुरुष और समाजके हाथमें जितने भी ऐसे साधन धर्म, नीति, रिवाज आदिके रूपमें थे, उन सबसे स्त्रीको पुरुषके आधीन होकर चलनेकी शिक्षा दी गयी। उसे समझाया गया, यहाँ चाहे वह पुरुषका मुकाबला भले ही एक ले, परंतु बादमें उसे पछताना पड़ेगा; क्योंकि उसकी स्वतन्त्रतासे भगवान् और धर्म नाराज होते हैं।’ वैयक्तिक सम्पत्तिके सम्बन्धकी भी मार्क्सीय प्रथा अप्रामाणिक है। ईश्वरकी सृष्टि उसकी व्यक्तिगत सम्पत्ति ही थी, उसीसे उत्तराधिकार-रूपमें वह उसकी संतानभूत विभिन्न प्राणियोंको मिली। जिस तरह आज अखण्ड भूमण्डलमें कोई भी पर्वत, वृक्ष, नदी, क्षेत्र, ग्राम, नगर बिना मालिकके नहीं हैं, उसी तरह संसारका कोई भी अंश कभी भी बिना मालिकके नहीं था। हॉब्स या लॉकके मतानुसार निरीश्वर राज्य कभी भी नहीं था और केवल किसी व्यक्तिके द्वारा सीमाकी एक रेखामात्र बना देनेसे ही कोई भूमि उसकी व्यक्तिगत सम्पत्ति नहीं बन गयी और न तो रिकार्डोंके अनुसार कुछ श्रममिश्रित हो जाने मात्रसे वस्तुओंपर व्यक्तिगत स्वत्वका जन्म ही हुआ। किंतु मुख्यरूपसे दायसे और फिर जय, क्रय, दान, पुरस्कारादिरूपमें भूमिसम्पत्ति आदिपर व्यक्तिगत अधिकार हुए हैं। अपने-अपने कर्मोंसे सुख-दु:ख एवं तत्तत्साधनोंका व्यक्तिगत सम्बन्ध हुआ है। कर्मोंके ही तारतम्यसे साधनोंकी भी तारतम्यरूपसे प्राप्ति होती है। कन्यापर उसके माता-पिताका स्वत्व रहता है। पिता जिसे देता है, वही कन्याका पति होता है। माता-पिताके न रहनेपर भाई आदिका उसपर स्वत्व होता है। वे जिसे देते हैं, वही उसका पति होता है। कन्याका भी अपनेपर स्वत्व होता है। अत: वह स्वयं भी जिसे आत्मसमर्पण करती है, वह उसका पति होता है। कन्या ऐसी वस्तु नहीं है कि जो भी चाहे उसे अपना ले या साझेदारीकी चीज बना ले। स्त्रीसम्बन्धकी मार्क्सीय ऐतिहासिक धारणा अत्यन्त भ्रमपूर्ण है। मनुकी दृष्टिसे तो जहाँ नारीकी पूजा होती है, वहाँ देवता एवं सभी सद‍्गुण रमते हैं और जहाँ उसकी पूजा नहीं होती, वहाँ सब क्रियाएँ निष्फल होती हैं— यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता:। यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफला: क्रिया:॥ (मनु० ३।५६) पुरुष सदासे ही नारीको मातारूपमें पूज्य एवं मार्गदर्शक मानता रहा है। पत्नीरूपमें प्राणोंसे भी अधिक प्रिय एवं हृदयेश्वरी बनाकर उसे अपना सर्वस्व समर्पण करके उसके रक्षण, पोषणके लिये, भूषण-आभरण जुटानेके लिये दिन-रात परिश्रम करता रहा है। इतना ही नहीं—नारीके इशारेपर ही पुरुष सब काम करता रहा है। प्रेमसे ही पुरुष स्त्रीको वशीभूत रखता था, प्रेमसे ही स्त्री भी पुरुषको अपने इशारेपर नचाती रही है। किन्हीं धार्मिक, आध्यात्मिक संस्कार-शून्य जंगली प्रदेशके लोगोंमें स्त्रीको गलेमें रस्सी बाँधकर रखनेकी प्रथा हो सकती है, पर वह भारतमें नहीं रही। स्त्रीका एक ही पुरुषके साथ सम्बन्ध शुद्ध धर्म-मूलक ही है, धर्म-नियन्त्रित स्नेह एवं अर्थ-व्यवस्था उसका आनुषंगिक फल है। यह पहले कहा जा चुका है कि पशुओंकी अपेक्षा मनुष्योंकी मनुष्यता एवं विशेषता ही यह है कि मनुष्य प्रत्यक्षानुमानसे अतिरिक्त आगम-प्रमाण भी मानता है और तदनुकूल वह धार्मिक होता है। धर्ममूलक ही उसमें पति-पत्नीका धार्मिक सम्बन्ध होता है। पति-पत्नीके असाधारण सम्बन्धसे ही पत्नी, पुत्री, भगिनी, माता आदिकी असाधारण व्यवस्था होती है। तदनुकूल ही उत्तराधिकारकी व्यवस्था भी चलती है। इसीलिये आस्तिकोंका कहना है कि प्रत्यक्षानुमानाश्रित मति जहाँतक दौड़ती है, वहाँतक ही चलनेवाले वानर आदि पशु होते हैं और प्रत्यक्षानुमानातिरिक्त आगमके अनुसार धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक व्यवस्था करके चलनेवाले लोग ही नर अर्थात् मानव होते हैं— मतयो यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति वानरा:। शास्त्राणि यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति ते नरा:॥ (तन्त्रवार्तिक)&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट नि&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;न : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थव्यवस्था</category><category>धर्मसम्राट</category><category>पूँजीवादी</category><category>मार्क्सवाद</category><category>मार्क्सीय</category><category>वर्गविहीनसमाज</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>स्त्री</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>9.15 मार्क्स और धर्म ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/9-15-maarks-aur-dhrm-maarksv/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/9-15-maarks-aur-dhrm-maarksv/</guid><description>9.15 मार्क्स और धर्म भौतिकवादियोंका कहना है कि ‘सभ्य मनुष्यका विश्वास है कि आध्यात्मिक शक्ति सदा मंगलमय है, लेकिन असभ्य मनुष्यके लिये यह शक्ति निष्ठुर है, इसलिये सदा ही उसको विपत्तिमें डालती रहती …</description><pubDate>Thu, 19 Jun 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;9.15 मार्क्स और धर्म&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;भौतिकवादियोंका कहना है कि ‘सभ्य मनुष्यका विश्वास है कि आध्यात्मिक शक्ति सदा मंगलमय है, लेकिन असभ्य मनुष्यके लिये यह शक्ति निष्ठुर है, इसलिये सदा ही उसको विपत्तिमें डालती रहती है। पत्थर जब गिरकर आदमीको घायल करता है, अचानक पेड़की डाल टूट जाती है, तब यह सब प्रकारके भूतों या पेड़के भूतकी शैतानीको छोड़कर और क्या है? जबतक औजार—हथियारोंके ज्ञानकी वृद्धि नहीं हुई, तबतक असभ्य मनुष्य भूतोंको वशीभूत करनेके लिये मन्त्र-तन्त्रके ही फेरमें पड़ा रहा। हथियार-औजारोंके ज्ञान बढ़नेके साथ-साथ प्राकृतिक शक्तिपर मनुष्यकी प्रभुता बढ़ने लगी। ‘भौतिक शक्ति निष्ठुर ही नहीं है, बल्कि यह भलाई भी कर सकती है’, जब इस धारणाका जन्म हुआ, तब असभ्य मनुष्यके प्रेततत्त्वपर सभ्यताकी मुहर पड़ी। प्रेत-तत्त्व असभ्य मनुष्यका है, देवता-तत्त्व इसके ऊपरकी सीढ़ी है—जो सभ्य मनुष्यका है। आदिम असभ्य मनुष्यके लिये प्रकृति निष्ठुर भयावह है। प्रकृतिके रहस्यका भेद जानकर सभ्य मनुष्य कहने लगा—‘मंगलमयी विश्वजननी।’ यह परिवर्तन अकस्मात् एक दिनमें नहीं हो गया। आदिम भूत-प्रेतोंने सभ्य होकर यह रूप ग्रहण किया है। आदिम मनुष्यका प्रेत-तत्त्व सभ्यताकी सीढ़ीपर चढ़कर सूक्ष्म बन गया है। प्रकृति-जगत‍्को चलानेवाली है असंख्य निष्ठुर प्रेतोंकी शक्ति; और इसी प्राथमिक कल्पनाका संशोधितरूप है देवताओंकी कल्पना। ये सब देवता प्रकृति-जगत‍्के एक-एक हिस्सेके मालिक हैं। ये भलाई भी करते हैं और बुराई भी कर सकते हैं। जल, अग्नि, वायु—सभी प्राकृतिक शक्तियाँ किसी-न-किसी देवताके अधीन हैं। देव-समाज भी मनुष्यसमाजके साँचेपर ढला हुआ है। ये असंख्य देवता घटते-घटते एक ईश्वरतक पहुँचे। सभ्यताकी सीढ़ीपर चढ़कर वस्तु-जगत‍्के विषयमें मनुष्यका ज्ञान ज्यों-ज्यों बढ़ने लगा, त्यों-त्यों देवताओंकी संख्या घटने लगी। मनुष्य ज्यों अगणित पदार्थोंमें एक मेल देखने लगा, त्यों देवताओंका बहुत्व भी एकत्वमें परिणत हो गया।’ ‘पहले भूत या चैतन्य? इस प्रश्नका आदिम असभ्य जातियोंके प्रेत-तत्त्वसे बहुत निकट सम्बन्ध है। इस बातको स्मरण रखना चाहिये कि आदिम असभ्य मनुष्यको जीवनकी प्राथमिक बातें सोचनी पड़ी थीं। अनुमानके ऊपर प्रतिष्ठित मन्त्र-तन्त्रोंके द्वारा उसको जीवन-धारणका कौशल सीखना पड़ा था। उसकी यह कोशिश चाहे जितने बचपनकी हो, उसका मूल है जीवन-धारणकी अभिलाषा। इसलिये जीवन-मरणके रहस्यने आदिम मनुष्यको काफी चिन्तित कर डाला था। मनुष्यका शरीर जीवित-अवस्थामें एक प्रकारका और मरनेपर दूसरे प्रकारका क्यों होता है, जागरण, निद्रा, स्वप्न, रोग और व्याधि—ये सब क्यों होती हैं, स्वप्नमें जो मनुष्य-मूर्तियाँ दिखायी देती हैं, वे सब क्या हैं, स्वप्नमें मनुष्योंकी जो छाया-मूर्तियाँ दिखायी देती हैं, वही शायद जीवनकी कुंजी है, शायद इस छायामूर्तिका शरीर छोड़ना ही मृत्यु है—असभ्य मनुष्यकी प्रेतात्माकी धारणा इसी प्रकार बनी है। यहाँ इस धारणाकी ऐतिहासिक आलोचना करनेकी आवश्यकता नहीं, लेकिन इसमें सन्देह नहीं कि यही प्रेतात्मा सभ्यताके साबुनमें धुलकर चैतन्य परमात्मा आदि बन गयी है। मानव आत्माके विषयमें असभ्य जातियोंकी धारणा है कि यह सूक्ष्म भापकी तरह है। इसके शरीर त्याग देनेसे मृत्यु हो जाती है।’ ‘मनुष्य तथा अन्य उन्नत प्राणियोंके शरीर-धारणके लिये श्वासक्रिया बहुत ही आवश्यक है। मरते समय श्वासक्रिया क्षीण होते-होते बन्द हो जाती है। आदिम असभ्य जातियोंने भी इसको देखा था। इसीलिये श्वासक्रियाको ही उन्होंने आत्मा मान लिया था। आस्ट्रेलियाके आदिम निवासियोंकी भाषामें ‘श्वास’ और ‘आत्मा’ इन सबके लिये एक ही शब्द है। हिब्रू तथा सभी आर्य भाषाओंके भाषा-विज्ञानमें श्वास और आत्मबोधक शब्दोंका निकट सम्बन्ध है। यूनानी ‘साइक’ और ‘न्यूमा’, लैटिन ‘एनिमस’, ‘एनिमा’, ‘स्पिरीट्स’, इनका रूप-परिवर्तन इसी प्रकारसे हुआ है।’ इसपर कहना यह है कि यद्यपि मस्तिष्क अतिभौतिक प्रतीत न हो, तथापि यह तो नहीं कहा जा सकता कि जिससे जो निश्चित हो, वह उसका स्वरूप ही होता है। यदि ऐसी ही बात हो, तब तो ज्ञानसे ही सब ज्ञेय निश्चित किया जाता है, यहाँ तक कि मस्तिष्क भी ज्ञानसे ही निश्चित किया जाता है, फिर क्या भौतिकवादी सबको ही ज्ञानस्वरूप माननेको तैयार हैं? यदि नहीं, तब तो भले ही भौतिक मस्तिष्कसे ही ईश्वर विदित हो, परंतु वह भौतिक नहीं कहा जा सकता। स्वयं इन्द्रियाँ नीरूप एवं सूक्ष्म हैं, परंतु उनसे रूपादिमान् स्थूल प्रपंच विदित होता ही है। इसी तरह मस्तिष्क आदिद्वारा अभौतिक आत्मा, ब्रह्म आदिका बोध होता ही है। परिवर्तनशील भौतिकवादियोंका भूत ही नयी-नयी पोशाकोंमें भले उपस्थित हो, उपनिषदोंका ब्रह्म तो सदासे ही औपाधिकरूपमें अनेक रस और निरुपाधिकरूपसे एकरस ही रहा है और वैसे ही रहेगा। जिसको भौतिकवादी वस्तु कहते हैं, वही अवस्तु है। जिसे वे अवस्तु समझते हैं, विचारकी दृष्टिसे वही वस्तु है। स्थूलदर्शी कार्यको ही वस्तु समझता है। एक स्थूलदर्शी पटको सत्य मानता है, परंतु एक सूक्ष्मदर्शी तन्तुभिन्न पटको ही असत् कहता है। इसी तरह कारणपरम्पराका विचार करते हुए तन्तु भी अंशुसे भिन्न असत् है। अंशु भी बिनौलामात्र है, बिनौला भी पृथ्वीमात्र है, पृथ्वी भी जलमात्र ही है, जल तेजसे भिन्न होकर कुछ नहीं ठहरता। तेज वायुमात्र है, वायु आकाशमात्र ठहरता है; किंतु स्थूलदर्शीको यह सब ढोंग ही जँचता है। अन्तिम सत्यका विचार सर्वदा ही उपयुक्त है, चाहे श्रेणीविभाजित जीवन हो, चाहे समष्टिवादी जीवन। सभीके लिये विक्षेपशून्य, निष्प्रपंच, सत्य, स्वप्रकाश ब्रह्म अपेक्षित है। इन्द्र भी अनन्त आनन्दसामग्री भुलाकर निष्प्रपंच सौषुप्त सुखकी ओर प्रवृत्त होता है। कोई कितना भी निर्द्वन्द्व, शान्त एवं सुखी क्यों न हो, सुषुप्तिकी निष्प्रपंचताके बिना उसे विश्राम नहीं मिलता। ‘ईश्वरको न युक्तिसे जाना जा सकता है, न उसे प्रकाशित किया जा सकता है’ यह काण्टका कथन तथा ‘ईश्वर वाङ्मनसगोचर नहीं है’ यह हिन्दू&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-paashcaaty-drshn-1-1-drshnkii/&quot;&gt;दर्शन&lt;/a&gt;ोंका कथन, यह सिद्ध नहीं करते कि ईश्वर अवास्तव एवं असत् है। किंतु उनका अभिप्राय यही है कि श्रद्धा, समाधान तथा एकाग्रताके बिना ईश्वरका साक्षात्कार नहीं हो सकता। ईश्वरके अस्तित्वमें अनुमान, आगमादि अनेकों प्रमाण हैं। श्रुति ब्रह्म या आत्माको साक्षात् अपरोक्ष ही बतलाती है—‘यदेव साक्षादपरोक्षाद् ब्रह्म।’ (बृहदा० उप० ३।५।१) विज्ञाता प्रमाता प्रमाणानपेक्षरूपसे ही स्वत:सिद्ध होता है। संशय, विपर्यय एवं अज्ञान मिटानेके लिये ही प्रमाण अपेक्षित होते हैं। आत्मा अन्यत्र संदिहान होता हुआ भी स्वयं असंदिग्ध है, अन्यत्र विपर्ययज्ञानवान् होता हुआ भी स्वयं अविपर्यस्त रहता है। अन्यत्र अनुमिमान होता हुआ भी (अनुमान करता हुआ भी) स्वयं अपरोक्ष रहता है। फिर प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय आदि सभी जिस अखण्ड बोधके अनुग्रहसे भासित होते हैं, उसे किससे सिद्ध किया जाय? यही बात ‘विज्ञातारमरे केन विजानीयात्’ इत्यादि श्रुतियोंद्वारा कही गयी है। अतएव प्रमाणसिद्ध एवं स्वत:सिद्ध ईश्वर या ब्रह्म परमकल्याणकारी होनेसे ग्राह्य, उपास्य एवं ज्ञेय है। अनादि स्वत:सिद्ध वस्तुको बुद्धॺारूढ करनेके लिये युक्ति, श्रुति आदि अपेक्षित होती है। इतिहास घटनाओंका ही होता है, फिर भी औपचारिकरूपसे ‘तर्ह्यव्याकृतमासीत्’, ‘सदेव सोम्येदमग्र आसीत्’ इत्यादि श्रौत इतिहासके आधारपर सर्वकारण-स्वप्रकाश ब्रह्मका अस्तित्व सिद्ध होता ही है। तदनुगुण युक्ति भी श्रुतिने ही दी है। जैसे अन्न (पृथ्वी)-रूप अंकुरसे जलरूपी बीजका पता लगता है, जलरूपी अंकुरसे तेजरूपी मूलका पता लगता है, वैसे ही तेजरूपी अंकुरसे सद्‍रूपी मूलका पता लगता है—‘तेजसा सौम्य शुङ्गेन सन्मूलमन्विच्छ।’ दार्शनिक पण्डितोंके इन तत्त्वविचारोंको गलत कहना बुद्धिकी अजीर्णताका ही द्योतक है। वास्तविक अभिज्ञता और व्यावहारिक ज्ञानसे तो भौतिकवादियोंने ही शत्रुता कर रखी है। विश्वके उपादानकारणरूपसे, विश्वके निमित्तकारणरूपसे, विश्वके आधार या अधिष्ठानरूपसे, विश्वके प्रकाशक तथा व्यवस्थापकरूपसे, कर्मफलदातारूपसे, सर्वशासकरूपसे ईश्वरकी सिद्धि होती ही है। जैसे दर्पणके अन्दर प्रतिबिम्ब भासित होता है, वैसे ही अनन्त चिद्‍रूप दर्पणमें मनुष्य, पश्वादि, जंगम-स्थावरादि सभी प्रपंच भासित होते हैं। काष्ठपर व्यक्त अग्निको काष्ठसे भिन्न समझना ही पड़ेगा, ज्ञान या चेतनाको मनुष्यादि देहोंसे भिन्न समझना ही पड़ेगा। आदिम जंगली मनुष्योंके वस्तु और चेतनासम्बन्धी विचारोंको इतिहासके बलसे सिद्ध करनेकी दुश्चेष्टा निराधार है। यह इतिहास कपोलकल्पित, मिथ्या एवं पूरा मनगढ़न्त है। जड़वादियोंका इतिहास-सम्बन्धी मनोराज्य केवल विनोदका विषय है। कोई प्रमाणचक्षु पुरुष इसे केवल भौतिकवादियोंका दिमागी फितूर ही कहेगा। प्रामाणिक आस्तिकोंके इतिहासोंके अनुसार तो विश्वकारण ईश्वरकी संतानें ईश्वरीय ज्ञानरूप &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;ादि शास्त्रोंद्वारा पूर्णरूपसे शिक्षित ही होती हैं। उत्तरोत्तर जहाँ-कहीं सच्छिक्षा एवं सत्संगमें विच्छेद हुआ, वहीं असभ्यता, अज्ञता एवं मिथ्या धारणाएँ बनती हैं। भौतिकवादियोंकी यह धारणा नितान्त असत्य है कि ‘अध्यात्मवादियोंकी अतिभौतिक देवता, ईश्वर या ब्रह्म इत्यादि कल्पनाएँ हैं और इनका मूल असभ्यों, जंगलियोंकी तन्त्र-मन्त्र, भूत-प्रेतकी कल्पनाएँ हैं।’ जिन्होंने सच्चे इतिहासोंका अध्ययन किया है, रामायण, महाभारत, पुराणों, उपपुराणों, तन्त्रों, आगमों एवं मन्त्र-ब्राह्मणात्मक वेदों एवं उनके आरण्यक, उपनिषदोंका मनन किया है और जिन्होंने व्यास, वसिष्ठ एवं श्रीकृष्णभगवान‍्के दिव्य दर्शनोंका अध्ययन किया है, उनको यह समझनेमें कठिनाई न होगी। भौतिकवादी जिन बाह्य भौतिक वस्तुओंको सत्य मानते हैं, देवता, ईश्वर, ब्रह्मकी बात तो पृथक् रहे, भूत-प्रेतकी कल्पना भी उनसे अधिक सत्य है। इसीलिये उपनिषद् या गीताके जिस निर्गुण ब्रह्मको भौतिकवादी अन्तिम कल्पना मानते हैं, उस कल्पनाके साथ भी भूत-प्रेत एवं देवताओंकी कल्पनाएँ हैं। यह समझना नितान्त भ्रम है कि विकासक्रमसे भिन्न-भिन्न कालोंकी ही यह कल्पनाएँ हैं। एक उच्चकोटिका ब्रह्मदर्शन परमार्थ-दृष्टिमें सजातीय-विजातीय-स्वगतभेदशून्य ब्रह्मतत्त्व बतलाता है, परंतु वही अन्य अधिकारियोंके लिये ईश्वरकी उपासना बतलाता है। कुछ और ढंगके अधिकारियोंके लिये सगुण ईश्वरकी आराधना, अन्य लोगोंके लिये विभिन्न देवताओंकी आराधना बतलाता है। अन्य ढंगके लोगोंके लिये प्रेत-पिशाचकी आराधना भी उचित मानता है। ‘बृहदारण्यक’ आदि उपनिषदोंमें भी निर्गुण ब्रह्म, ईश्वर और साथ-ही-साथ अनेक देवताओंका भी वर्णन है। भारत, रामायण, गीता आदिमें तो सबका वर्णन है ही। यदि पिछली-पिछली कल्पनाएँ उत्तरोत्तर कल्पनाओंकी दृष्टिसे असत्य हैं, तब तो उनको मिथ्या ही कहना चाहिये। किसीके लिये भी उनकी ग्राह्यता एवं उपासनाका उपदेश कैसे हो सकता है? इसलिये व्यावहारिक दृष्टिसे प्रेत, पिशाच आदि सभी तत्त्वोंका अस्तित्व है। प्रेतादि केवल कल्पना नहीं, उनकी देवयोनिमें गणना है। परलोकविद्यावालोंकी दृष्टिसे प्रेत-तत्त्वकी सिद्धि होती है। भूतावेश, प्रेतावेश आज भी वैसी ही सत्य वस्तु है, जैसी पुराने कालमें। इसके अतिरिक्त भौतिकवादियोंकी प्रेतकल्पनाका युग कितना पुराना है? जब मानवका इतिहास ही लाखों नहीं हजारों ही वर्षोंका है, तब उनके प्रेतकल्पनाका युग भी उनकी दृष्टिमें हजारों वर्षका ही पुराना है, परंतु आर्ष इतिहासके अनुसार निर्गुण ब्रह्मकी कल्पना तो लाखों वर्ष पुरानी है। द्वापरके कृष्ण, त्रेताके राम और सृष्टिके मूल कारण ब्रह्मा, विष्णु एवं महेशकी अतिप्राचीन दृष्टिमें भी निर्गुण ब्रह्मकी सत्ता स्वत:सिद्ध है। भौतिकवादियोंके तथाकथित मनगढ़न्त मिथ्या इतिहासोंकी अपेक्षा आर्ष इतिहासोंकी तथ्यता कहीं अधिक श्रेष्ठ है। अतएव जागरण, निद्रा तथा स्वप्नके आधारपर देह-भिन्न आत्माका निर्णय करना, प्राणधारणसे जीवन, प्राणराहित्यसे मरण आदिकी धारणा जंगली असभ्योंकी नहीं, किंतु सभ्यशिरोमणि महादार्शनिकोंकी भी यही धारणा थी और आज भी है। श्रीशंकराचार्यका कहना है कि जो स्वप्न, जागर एवं सुषुप्तिको जानता है, वही आत्मा है, भूतसंघ नहीं—‘यत्स्वप्नजागरसुषुप्तमवैति नित्यं तद‍्ब्रह्म निष्कलमहं न च भूतसङ्घ:।’ भागवतमें कहा गया है कि स्वप्न, सुषुप्ति बुद्धिकी वृत्तियाँ हैं, जिस द्रष्टासे इनका बोध या प्रकाश होता है, वही अध्यक्ष पर पुरुष है—‘बुद्धेर्जागरणं स्वप्न: सुषुप्तिरिति वृत्तय:। ता येनैवानुभूयन्ते सोऽध्यक्ष: पुरुष: पर:॥’ (श्रीमद्भा० ७।७।२५)। इस शरीरकी विभिन्न अवस्थाओंमें उसके भीतर अन्तरसे भी अन्तरतमरूपसे आत्माको देखनेकी पद्धति लाखों वर्ष पुरानी है। जैसे मुंजमेंसे बुद्धिमानीसे इषीका (सींक) निकाली जाती है, वैसे ही शरीरसे, इन्द्रियों, मन, बुद्धि, अहंकार या आनन्दमयसे, जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्तिसे अन्वयव्यतिरेकादि युक्तियोंद्वारा समझकर पृथक् रूपसे आत्मा समझा जाता है। शरीरके भीतर ही अतत‍्को त्याग करते हुए भगवत्तत्त्वको समझा जा सकता है—‘अन्तर्भवेऽनन्त भवन्तमेव ह्यतत्त्यजन्तो मृगयन्ति सन्त:।’ (श्रीमद्भा० १०।१४।२८) ‘गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम्’, ‘यो वेद निहितं गुहायाम्।’ शरीरके भीतर बुद्धिरूपा गुहामें अभिव्यक्ति अनन्त चित्-स्वरूप आत्माका उपलम्भ होता है। प्राणधारणके आधारपर जीवशब्दकी प्रवृत्ति भी अति प्राचीन ही है। यह हजार दो हजार वर्षके जंगली मनुष्योंकी कल्पना नहीं, बल्कि यह कहना चाहिये कि अतिप्राचीन वास्तविक आर्षज्ञानका विकृतरूप अवशेष है। उपनिषदोंने मरनेके सम्बन्धमें बड़ी गम्भीरतासे विचार किया है। नचिकेताका प्रश्न ही मुख्य यही था—‘येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके।’ (कठोप० १।१।२०) अर्थात् मरनेके बाद जो यह सन्देह होता है, कुछ लोग कहते हैं कि देह-भिन्न आत्मा बचा रहता है, कुछ कहते हैं कि कुछ भी बाकी नहीं बचता, इसमें तथ्य क्या है? इसीपर यमराजने वरप्रदानके रूपमें अनन्त, सर्वाधिष्ठान, सर्वद्रष्टा आत्माका निरूपण किया है। देवताओंके सम्बन्धमें तो भगवान् व्यासकी उत्तरमीमांसा (१।३।९) शाङ्करभाष्यद्वारा स्पष्ट ही बतलाया गया है कि ‘इन्द्रो ह वै देवानामभि प्रवव्राज’ इत्यादि आख्यायिकाओंद्वारा ऐश्वर्यशील देवतातत्त्वका स्पष्ट बोध होता है। महादार्शनिक विद्यारण्य स्वामीने सर्वाधिष्ठान ब्रह्मको अनिर्वचनीय तथा प्रकृतिविशिष्ट रूपको ईश्वर बतलाया है। प्रकृतिके सूक्ष्म कार्य समष्टि सप्तदशतत्त्वात्मक लिंगशरीरसे विशिष्ट उसी ईश्वरको हिरण्यगर्भ बतलाया है और समष्टि स्थूलशरीर एवं स्थूलप्रपंचविशिष्ट उसी हिरण्यगर्भको विराट् कहा है। ईश्वर, हिरण्यगर्भ, विराट्—तीनों ही ईश्वरके ही रूप हैं। स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीरोंसे विशिष्ट ब्रह्म ही तीनों रूपमें व्यक्त होता है। स्थूल, सूक्ष्म, कारण तीनों प्रपंच और उसका प्रत्येक अंश ईश्वर ही है। ईश्वररूपसे आराधना करनेपर इसीलिये निम्ब, पिप्पल, पाषाणादि भी फलप्रद होते हैं। अस्ति, भाति, प्रिय, नाम, रूप यह पाँच रूप सर्वत्र उपलब्ध होते हैं। नाम, रूप मायाके अंश हैं और शेष—अस्ति, भाति, प्रिय—तीनों ब्रह्मके ही रूप हैं। जंगली लोगोंकी विचारधाराओंका यह निष्कर्ष नहीं कि ‘प्रेततत्त्व, जादूविद्या, अनेकेश्वरवाद, ऐकेश्वरवाद मनुष्यकी चिन्ताधाराके विभागकी सीढ़ियाँ हैं और अध्यात्मवादका मूल भीरुतामय प्रेतकल्पना ही है।’ उसका निष्कर्ष तो यह है कि ईश्वरसे निहित ऋषियों, महर्षियोंके उच्च स्तरका ब्रह्मविज्ञान, आत्मविज्ञानका ही विकृत अवशेष जंगलियोंमें मिलता है। उच्चकोटिका ब्रह्मविज्ञान, आत्मविज्ञान कालक्रमसे लुप्त हो गया। सच्छिक्षा, सत्संग लुप्त हो जानेसे उदात्त विचार नष्ट हो गये। निम्नश्रेणीकी प्रेतविद्या, जादूगरी आदिके भाव रह गये। अत: उस आधारपर चलनेसे भ्रम ही बढ़ेगा।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt; और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>ईश्वरधर्म</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सदर्शन</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>9.14 उत्पत्तिके साधन और न्याय ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/9-14-utpttike-saadhn-aur-nyaay/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/9-14-utpttike-saadhn-aur-nyaay/</guid><description>9.14 उत्पत्तिके साधन और न्याय मार्क्सवादी कहते हैं कि ‘न्याय भी सदा एक-सा नहीं रहता; किंतु उसमें रद्दोबदल होता रहता है। जैसे प्राचीन भारतमें शूद्रोंका विद्या पढ़ना अन्याय और एक पुरुषको दो पत्नियाँ…</description><pubDate>Wed, 18 Jun 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;9.14 उत्पत्तिके साधन और न्याय&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt;ी कहते हैं कि ‘न्याय भी सदा एक-सा नहीं रहता; किंतु उसमें रद्दोबदल होता रहता है। जैसे प्राचीन भारतमें शूद्रोंका विद्या पढ़ना अन्याय और एक पुरुषको दो पत्नियाँ रखना न्याय था। विधवाका सती होना महापुण्य था, परंतु आज वह अपराध है। न्याय क्या है, इसका निर्णय रहता है उन लोगोंके फैसलेपर, जिनके हाथमें शक्ति रहती है। जिस श्रेणीके हाथमें पैदावारके साधन होते हैं, वही न्याय-अन्यायका निर्णय करती है। जिससे उनके हितोंकी रक्षा हो, उनके हाथमें शक्ति बनी रहे, उसी ढंगके तरीकोंको वे न्याय कहा करते हैं। पूँजीवादी समाजमें जिस तरह पूँजीपतिके कब्जेमें पूँजी बनी रहे, वही न्याय है। वे व्यक्तिकी पूँजी छीननेको महापाप बतलाते हैं। समाजमें मुनाफा कमाकर पूँजी बढ़ानेके अधिकारको न्याय कहते हैं। कम मूल्यमें सौदा खरीदकर अधिक दाममें बेचने, सौ रुपयेका काम कराकर नौकरको पचास रुपया देनेको भी न्याय कहते हैं। रूस इन सब बातोंको अन्याय समझता है। पूँजीवादी देशोंमें पूँजीपतिके हितकी बात न्याय है और रूसमें मजदूरोंके हितकी बात न्याय है।’ वस्तुत: ऐसी ही भ्रान्त धारणाओंके कारण भौतिकवादी अपने विरोधियोंको कुचलनेके लिये अमानवताका व्यवहार करते हैं और उसे भी न्याय समझते हैं। समाजके नामपर व्यक्तियोंकी भूमि-सम्पत्ति छीनकर विचार-स्वातन्त्र्यपर प्रतिबन्ध लगाकर व्यक्तियोंके शरीर, वाणी एवं मस्तिष्कपर ताला लगा देने-जैसे बुरे-से-बुरे पापको अपनी हित-रक्षाका साधन समझकर उसे न्याय कहते हैं। भारतमें विद्या, ज्ञान, जानकारीपर कभी भी प्रतिबन्ध नहीं था। विदुर, धर्मव्याध, मूक आदि शूद्र एवं अन्त्यज भी परम ज्ञानवान् थे और समाजमें आदरणीय थे। बड़े-बड़े ब्राह्मण, ऋषि-महर्षि भी धर्मव्याधके पास धार्मिक परामर्शके लिये जाते थे। जिन &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;ादि ग्रन्थोंका विधिपूर्वक अध्ययन पुण्यविशेषकी दृष्टिसे जिन वर्णोंके लिये विहित है, उनका अध्ययन उन्हींके लिये आज भी है, तब भी था। जो वेदादि शास्त्रके अनुसार अदृष्ट अर्थमें विश्वास रखते हैं, वे तदनुसारी नियम प्रसन्नतासे ही मानते हैं। यहाँ किसी श्रेणीके स्वार्थका प्रश्न ही नहीं उठता। जो वेदोंको किसी दूसरी श्रेणीके स्वार्थकी चीज समझते हैं, वे पुण्यकी दृष्टिसे उनका अध्ययन करना ही क्यों चाहेंगे? फिर उनके लिये निषेधका प्रश्न ही क्यों उठेगा? जो विधिपूर्वक वेदाध्ययनसे जिस आधारपर किसीके लिये पुण्य मानेगा, उसी आधारपर किसीके लिये उसे पाप भी मानना ही पड़ेगा। आजकल मूर्तिपूजाके सम्बन्धमें भी यही बात है। पाषाणादि मूर्तिमें देवताका अस्तित्व माननेपर ही मूर्तिपूजाका प्रश्न उठता है। जो मूर्तिमें देवताकी सत्ता नहीं मानता, उसके लिये मूर्तिपूजाका प्रसंग ही नहीं आता। प्रत्यक्षानुमानादिके आधारपर मूर्तिमें देवता सिद्ध हो, तब तो कम्युनिष्ट भी अवश्य ही मूर्तिपूजक बन जायँगे। अत: कहना होगा कि प्रत्यक्षानुमानसे मूर्तिमें देवताका अस्तित्व एवं उसकी पूजासे लाभ सिद्ध नहीं होता। केवल शास्त्रप्रमाण माननेसे ही मूर्तिमें प्रतिष्ठाविधिके द्वारा देवताका आवाहन-प्रतिष्ठापन होता है, तभी उसकी पूजासे पुण्यकी बात उठती है। फलत: मूर्तिप्रतिष्ठा पूजादिविधायक शास्त्रोंमें विश्वास रखनेवाला जब मूर्तिपूजामें प्रवृत्त होगा तो उसे उस शास्त्रकी अन्य बातें भी माननी पड़ेंगी। यदि शास्त्रोंके अनुसार ही मन्दिरस्थ प्रतिष्ठित मूर्तिमें और म्यूजियममें रहनेवाली मूर्तियों तथा आपणस्थ (बाजारमें बिकनेवाली) मूर्तियोंमें विशेषता सिद्ध होती है, तो उन्हीं शास्त्रोंके अनुसार यह भी मानना होगा कि अमुक-अमुक हेतुओंसे मूर्तिसे देवत्व नष्ट हो जाता है और अमुकको मूर्तिपूजासे कुछ लाभ न होगा, किंतु उलटा नुकसान होगा। यह सब बातें भी उन्हीं शास्त्रोंसे माननी पड़ेंगी। शास्त्रोंकी दृष्टिसे न्याय-अन्यायका निर्णय किसी श्रेणीके हित या अहितकी दृष्टिसे नहीं होता। ब्राह्मणको राजसूय करना अधर्म कहा गया है, क्षत्रियके लिये वही धर्म है। वैश्यके लिये वाजपेय करना अधर्म कहा गया है, वही ब्राह्मणके लिये धर्म है। इसी तरह वैश्यस्तोम, निषादस्थपति इष्टि वैश्य एवं शूद्रविशेषके लिये धर्म है, अन्यके लिये अधर्म। यहाँ उन अनुष्ठाताओंके हिताहितकी दृष्टिसे धर्माधर्मका निर्णय किया गया है, शासक या धनवान् श्रेणीकी दृष्टिसे नहीं। औषध-विशेषके सेवनका विधि-निषेध रोगियोंके हिताहितसे सम्बन्ध रखता है, शासक-शासित श्रेणियोंसे नहीं। किसी अवस्थामें किसी रोगीको किसी औषधसे लाभ हो सकता है और किसी औषधसे हानि। उसी दृष्टिसे विधि-निषेध होता है। हर जगह श्रेणी-स्वार्थकी बात जोड़ना कलुषित मनोवृत्तिका ही परिचायक है। इसी तरह अवस्था-विशेषमें दो पत्नीका होना तब भी धर्म था और अब भी धर्म है। अवस्था-विशेषमें वही तब भी अधर्म था और अब भी अधर्म है। यदि सन्तानके लिये, पिण्ड-श्राद्धके लिये, अपने पूर्वजोंका नाम चलानेके लिये, पूर्व पत्नीकी सम्मतिसे ही दूसरा विवाह किया जाय तो इसमें अन्याय-जैसी कोई बात नहीं। कोई विधवा सती न होकर वैधव्य-धर्म पालन करे, तब भी उसकी सद‍्गति शास्त्रसम्मत है। वह धर्म उसपर लादा नहीं जाता, उसकी इच्छापर निर्भर है। यहाँ उसीके हिताहितका सम्बन्ध है, अन्यका स्वार्थ नहीं। अथ च विधवाका सती होना तब भी धर्म था और अब भी धर्म है। कानून बन जानेमात्रसे धर्म-अधर्ममें भेद नहीं पड़ता। ईश्वरीय धर्माधर्ममें सरकारें रद्दोबदल, हस्तक्षेप करनेमें सर्वथा असमर्थ हैं; क्योंकि धर्माधर्मका वास्तविक फल देना सरकारोंके हाथकी बात ही नहीं है। इसी तरह रूसी कानूनसे व्यक्तिगत सम्पत्ति छीनना भी धर्म नहीं हो सकता। वस्तुत: जो कानून स्वार्थकी दृष्टिसे बनाये जाते हैं, कोई भी तटस्थ विवेचक उन कानूनोंको न्याय नहीं कह सकता। न्याय स्व-पर-पक्षपातविहीन होता है, जिसके आधारपर रामचन्द्रने एक विद्वान् बलवान् धनवान् ब्राह्मण एवं नगण्य श्वानके विवादमें अपराधी ब्राह्मणको ही दण्ड दिया था। धोबीके मुकाबले सीतातकको वनवास दिया था। शाहजहाँने हकीकतरायके मृत्युदण्डके बदलेमें काजीको भीषण दण्ड दिया, जो उसकी ही श्रेणीका था। सगरने अपने पुत्र असमंजसको देशबहिष्कृत कर दिया था। अपराधी पुत्रको भी दण्ड देना, निरपराध शत्रुको भी दण्ड न देना ही न्याय कहलाता है। विश्वासघात, मित्रद्रोह, चोरी, व्यभिचार, परपीड़न आदि अधर्म-अन्याय हैं। इसी प्रकार औचित्य-अनौचित्य, सत्य एवं सिद्धान्तोंके सम्बन्धमें भी मार्क्सवादी कहते हैं कि ‘ये कोई भी स्थिर नहीं होते।’ पर यदि सर्वसम्मत प्रमाण, न्याय, औचित्य, सत्यको आधार न माना जाय तो फिर कोई सिद्धान्त स्थिर करनेके लिये पुस्तकादि लिखनेका प्रयास भी मार्क्सने क्यों किया? फिर तो उचित-अनुचित, प्रमाण-अप्रमाण, सत्तर्क-असत्तर्कसे कोई भी कुछ भी सिद्ध कर सकता है। फिर जब सभी सिद्धान्तों, सत्योंकी यही हालत है, तब मार्क्सद्वारा प्रचारित सिद्धान्तोंकी भी यही हालत होगी।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>उत्पत्ति</category><category>धर्मसम्राट</category><category>न्याय-और-विचारधारा</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>साधन</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>9.13 धर्म और अर्थ ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/9-13-dhrm-aur-arth-maarksvaad-au/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/9-13-dhrm-aur-arth-maarksvaad-au/</guid><description>9.13 धर्म और अर्थ मार्क्सवादी कहते हैं कि धर्म, प्रेम या परोपकारके नामपर सर्वस्व लुटा देने या प्राण न्योछावर कर देनेका भी आधार आर्थिक ही है; क्योंकि सब कुछ सन्तोष-तृप्तिके लिये ही किया जाता है। अन…</description><pubDate>Tue, 17 Jun 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;9.13 धर्म और अर्थ&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt;ी कहते हैं कि धर्म, प्रेम या परोपकारके नामपर सर्वस्व लुटा देने या प्राण न्योछावर कर देनेका भी आधार आर्थिक ही है; क्योंकि सब कुछ सन्तोष-तृप्तिके लिये ही किया जाता है। अन्यायके विरोधमें आत्मबलिदान करता हुआ भी प्राणी सब कुछ स्वार्थके उद्देश्यसे करता है, परंतु यहाँ स्वार्थका अर्थ व्यक्ति न समझकर श्रेणी समझना उचित है। समाजमें व्यवस्था एवं शान्ति न रहनेसे समाजके नुकसानके साथ व्यक्तिका भी नुकसान होता है। समाजकी रक्षामें ही व्यक्तिकी भी रक्षा होती है; परंतु जडवादमें उपर्युक्त बातें संगत नहीं होतीं। जो देहमात्रको आत्मा मानता है, देहके नष्ट हो जानेपर आत्माका नाश मानता है, वह आत्मनाशके काममें कभी भी प्रवृत्त नहीं हो सकता। आत्माके नष्ट हो जानेपर समाजकी रक्षासे फिर किसकी रक्षा होगी? जिसकी रक्षाके लिये समाजकी रक्षा करनी है, जब उसका नाश सामने ही है, तो उसकी रक्षाके लिये समाज-रक्षाकी बात ही कहाँ उठती है? शान्ति या सन्तोषके लिये त्याग भी वहींतक किया जा सकता है, जहाँतक जिसे शान्ति-सन्तोष चाहिये, वह बना रहे। जब शान्ति-सन्तोषका भोक्ता ही नष्ट हो जायगा तो शान्ति-सन्तोषका सुख कौन भोगेगा? अध्यात्मवादी देहादिके नष्ट हो जानेपर भी सुख-शान्ति-सन्तोष भोगनेवाली आत्माको अमर मानते हैं। अत: उनका त्याग, बलिदान बन सकता है। आत्म-कल्याणके लिये धर्मार्थ, परोपकारार्थ प्राणत्यागतक करना उनकी दृष्टिसे उचित हो सकता है। अध्यात्मवादमें भी दो प्रकारका स्वार्थ होता है—एक संकुचित और दूसरा वास्तविक। जहाँ ‘स्व’ शब्दका अर्थ देहादि ही माना जाय, वह संकुचित स्वार्थ है। वहाँ रोटी-कपड़े आदि लौकिक अभीष्ट वस्तुओंकी प्राप्ति ही स्वार्थ गिना जाता है, परंतु जहाँ ‘स्व’ शब्दका अर्थ देहादिभिन्न नित्य आत्मा माना जाता है, वहाँ स्वार्थका अभिप्राय वस्तुभूतस्वरूप परमेश्वरका साक्षात्कार, परमेश्वरप्राप्ति, अनर्थनिवृत्ति तथा परमानन्दस्वरूप मोक्षप्राप्ति ही है। यह सच्चा स्वार्थ कहा जाता है—‘स्वारथ साँच जीव कहुँ एहा। मन क्रम बचन राम पद नेहा॥’ इसी वास्तविक स्वार्थके अभिप्रायसे कहा गया है कि ‘सब कुछ आत्माके लिये ही होता है। सर्वभूत, सर्वलोक, सर्वदेव आदिकोंमें प्रेम सर्वभूत, सर्वलोक, सर्वदेवके लिये नहीं, किंतु आत्माके लिये ही होता है। ‘न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति।’ (बृहदा० उ० २।४।५) परंतु यहाँ प्रबोध होनेपर व्यष्टि-समष्टि दो नहीं रह जाते। अविद्या-दशामें ही सर्वस्वरूप आत्मामें असर्वता अध्यारोपित है। बोध होनेपर अध्यारोपित असर्वताके बाधित होनेपर स्वाभाविक सर्वता ही व्यक्त हो जाती है। अत: वास्तविक स्वार्थ समष्टि-व्यष्टिका एक ही होता है; परंतु जडवादमें यह सब सम्भव नहीं।’ किसीके पैदावारका साधन छीनना सदासे सभी पाप समझते रहे। परान्न-परद्रव्य मार्गमें पड़ा हो या अपने घरमें ही कोई डाल गया हो तब भी नहीं लेते थे—‘परान्नं परद्रव्यं वा पथि वा यदि वा गृहे। अदत्तं नैव गृह्णीयादेतद‍्ब्राह्मणलक्षणम्।’ दायभागमें प्राप्त अपनी बपौती सम्पत्तिको ही अपनी सम्पत्ति मानते थे। दान-पुरस्कार तथा परिश्रमार्जित सम्पत्तिको ही अपनी वैध सम्पत्ति मानते थे। फिर छीनने, अपहरण करनेका उनसे सम्बन्ध ही क्या हो सकता था? लोक, परलोक, ईश्वर, धर्म न माननेवाला जडवादी ही दूसरोंकी सम्पत्ति लेनेकी सलाह दे सकता है। आस्तिक दूसरेकी गिरी हीरेकी माला या लाखोंका नोटका बण्डल जिसके हैं, उन्हींको लौटा देनेकी सलाह देगा, परंतु एक कम्युनिष्ट ऐसी सलाह दे ही कैसे सकता है? आस्तिककी दृष्टिमें सब मनुष्य ही नहीं; किंतु सभी प्राणी परमेश्वरकी संतान हैं। फिर भी शिष्य गुरुको, पुत्र माता-पिताको, पत्नी पतिको, नौकर मालिकको पूज्य और अपनेको सेवक मानते हैं। पूज्यको सेव्य समझते हैं। व्यवहारमें वह सेव्य-सेवक-भाव मान्य होता है। अतएव आस्तिक किसीको गुलाम नहीं मानता। मनुष्य-मनुष्यमें सेव्य-सेवकभाव चलता है। यह अब भी है और सदा रहेगा। नाम भले बदल जाय, पर वस्तु कभी नहीं बदल सकती। मिस्रके पिरामिडों, यूनान एवं भारतकी विशाल इमारतोंके बनानेमें गरीबोंको रोजी और नौकरी मिली है, उनका पोषण हुआ है। उनकी सम्पत्ति छीनकर ये सब चीजें नहीं बनायी गयीं। सब सम्पत्ति गरीबों, मजदूरोंकी ही होती, तो वे गरीब और मजदूर ही क्यों होते? मजदूरोंने पैदावारमें हाथ बँटाया तो उसके बदलेमें वेतन पाया। कमाईका सारा फल मजदूरका ही है, यह सिद्धान्त असिद्ध है। हाँ, उनका जीवन उन्नत और समृद्ध हो, इसके लिये आस्तिकोंका सदा प्रयत्न रहा। फलस्वरूप वे सुखी भी रहे। देशमें कोई दरिद्र, दुखी, अविद्वान् नहीं रहता था। ‘न मे स्तेनो जनपदे न कदर्यो न मद्यप:।’ ‘नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना। नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना॥’ सभ्यता, संस्कृति, शिल्प, संगीतका विकास अमीर, गरीब सबके ही हितकी चीज है। रूसी विद्वान् साहित्य, संगीत, ज्योतिषके अध्ययनमें संलग्न हो रहे हैं, एतावता क्या वे भी शोषक हो जायँगे? वैज्ञानिक लोग अनेक प्रकारके आविष्कारमें लगे हैं, वे भी तो किसान-मजदूरोंकी ही कमाई खाते हैं? पर क्या वे शोषक कहे जायँगे? वस्तुत: जो भी अपने कर्तव्यका पालन करते हैं, वे शोषक नहीं कहे जाते। शासक, शिक्षक, अन्वेषक यदि शोषक नहीं तो शिल्प, संगीत, साहित्यके अभ्यासमें लगे लोग भी शोषक कैसे कहे जा सकते हैं? श्रमके अतिरिक्त प्राकृतिक साधनोंका भी उत्पादनमें प्रमुख हाथ रहता है। अत: श्रमवालोंको यदि लाभका अंश मिलता है, तो साधनवालोंका भी लाभमें हिस्सा होना अनिवार्य है। श्रमवालेको उचित पारिश्रमिक मिलना चाहिये और साधनवालोंको लाभ। शरीर, मस्तिष्क, श्रमशक्ति भी वस्तुत: प्राकृतिक ही वस्तु है। मनुष्योंने इतर यन्त्रोंके समान मस्तिष्क एवं देहोंका निर्माण नहीं किया। जैसे इन प्राकृतिक साधनोंसे मनुष्य लाभ उठाता है, वैसे ही अन्य प्राकृतिक साधनोंसे दूसरोंको भी लाभ उठानेका अधिकार है। मशीनों, कल-कारखानोंके विस्तारसे उत्पादनमें वृद्धि, वस्तुओंकी बहुलतासे दाममें कमी होना, कम मजदूरोंका उपयोग, अधिकोंकी बेकारी आदिका होना तो अनिवार्य है, परंतु बच्चों एवं स्त्रियोंसे काम लेना, चार घण्टेके बदले मजदूरोंसे बारह घण्टे काम लेना, कम मजदूरी देना और उन्हें असहाय छोड़ देना आदि जुर्म है। यह कहीं भी हो, इसका समर्थन नहीं किया जा सकता। यह सार्वदेशिक एवं सार्वकालिक इतिहासकी बात नहीं। अन्यान्य अनाचारोंके समान यह भी शुद्ध उपद्रव ही है, जो सर्वथा हेय है। यह अतिरंजित बीभत्स वर्णन एक वर्गके प्रति घृणा फैलानेके उद्देश्यसे भी हो सकता है। वैसे रूसमें विरोधियोंके साथ लोग इससे भी अधिक भीषण दुर्व्यवहारकी बात करते हैं। भौतिकवादी ईश्वर एवं धर्मके सम्बन्धमें बहुत उलटा प्रचार करते हैं और कहते हैं कि ‘इस पक्षमें सब कुछ ईश्वरकी इच्छासे ही होता है। मनुष्यके विचार भी ईश्वरप्रेरणाके ही अधीन होते हैं। ईश्वरवादी संसारको मिथ्या मानकर उससे भागनेके लिये ही फेरमें रहते हैं।’ वे कहते हैं कि ‘इतिहास इस पक्षका समर्थन नहीं करता,’ परंतु ये बातें बहुत ही छिछली हैं। लाखों-करोड़ों वर्षका इतिहास वस्तुत: ईश्वरवादका ही समर्थक है। ईश्वरवादियोंने ही बड़ा-बड़ा पुरुषार्थ किया है। समुद्रमें सौ योजनका पुल ईश्वरवादियोंने ही तैयार किया है। अखण्ड भूमण्डलका साम्राज्य, पुष्पकविमान-जैसे वायुयान, हाइड्रोजनबमसे करोड़ों गुना अधिक शक्तिशाली ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र ईश्वरवादियोंने ही प्रकट किये हैं। मनुष्योंके अतिरिक्त दिव्य शक्तियोंके साथ प्रत्यक्ष व्यवहार भी उन्होंने ही किया है। एक देहात्मवादी उसी बड़े काममें हाथ लगा सकता है, जिसका फल वह जीवनमें देख सके। उसके जीवनमें जिसका फल सम्भव नहीं, उस काममें वह किस उद्देश्यसे प्रवृत्त होगा? परंतु आत्मवादी आत्माको अमर मानता है, वह जानता है कि ‘इस जन्ममें नहीं तो जन्मान्तरमें मेरे प्रयत्नका फल होगा ही।’ वह कोटि-कोटि जन्मतक भी किसी बड़े कामको पूरा करनेका दृढ़ संकल्प कर सकता है—‘जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु न त रहउँ कुआरी।’ कई पीढ़ीके प्रयत्न करनेसे गंगाके लानेका प्रयत्न भी इसी कोटिका था। जैसे अंकुरोत्पत्तिमें पर्जन्य साधारण कारण है, अंकुरके रूप, रस, फल आदि विचित्रताका असाधारण कारण पर्जन्य नहीं, किंतु बीजकी निजी विशेषता है, वैसे ही ईश्वर सर्व प्रवृत्तियोंमें कारण हैं। तत्तद्विशिष्ट फलोंकी प्राप्तिमें प्राणियोंके पुरुषार्थ ही मुख्य कारण हैं। प्राणियोंके अपने पुरुषार्थ-प्रमादके अनुसार ही सफलता-असफलता चलती है। योगवासिष्ठ आदिसे पुरुषार्थका जितना जबर्दस्त समर्थन है, जडवादी कभी भी उतने पुरुषार्थकी कल्पना नहीं कर सकते। कई लोग आजकल कहते हैं कि ‘आस्तिकलोग जीने-मरने, स्वर्ग-नरककी ही चिन्तामें परेशान रहते हैं। इसीलिये उन्होंने लौकिक-भौतिक उन्नतिमें सफलता नहीं पायी। भौतिक लोग स्वर्ग-नरककी चिन्तासे मुक्त थे, अत: वैज्ञानिक उन्नतिमें बढ़ गये, परंतु यह उनका भ्रम है, हम भौतिक वैज्ञानिक उन्नतिकी चर्चा कर आये हैं। अलबत्ता आत्मा-परमात्मा माननेवाला, स्वर्ग-नरकविश्वासी प्राणियोंको परमेश्वरका अंश मानकर उन्हें सतानेमें सकुचायेगा। कोई प्राणी एक कारीगरके बनाये हुए खिलौनेको बिगाड़नेमें सकुचाता है, फिर कोई समझदार ईश्वरके बनाये प्राणियोंको सताने या मौतके घाट उतारनेसे अवश्य सकुचायेगा। भौतिकवादी पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरकसे डरते नहीं, अत: भीषण-से-भीषण नरसंहारमें, प्राणिसंहारमें उन्हें कुछ भी संकोच नहीं। उनका स्वार्थ भीषण-से-भीषण घृणित-से-घृणित कार्यसे भी सम्पन्न हो तो भी वे स्वार्थ-साधनके लिये तैयार हो जाते हैं। मार्क्सके &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-paashcaaty-drshn-1-1-drshnkii/&quot;&gt;दर्शन&lt;/a&gt;, जीव-विकास एवं मृत्यु आदिकी समालोचना पिछले प्रकरणमें की जा चुकी है। डार्विन, हैकल आदिके सिद्धान्त भारतीय दर्शनोंकी कसौटीपर मिनटभर भी नहीं ठहरते।’ बहुत-से समाजवादी मार्क्सवादी भी मार्क्सके अर्थसम्बन्धी दर्शनसे सहमत होते हुए भी उसके अध्यात्मविचारसे सहमत नहीं होते। अनेकों लोग समाजवादी होते हुए भी ईश्वर एवं धर्ममें विश्वास रखते हैं। विशेषत: भारतमें हजारमें नौ सौ निन्यानबे समाजवादी धार्मिक एवं ईश्वरवादी होते हैं, परंतु मार्क्सवादी दृष्टिकोणसे वे गलत रास्तेपर ही समझे जाते हैं। यह दुरंगा ढंग उनकी दृष्टिमें सर्वथा अवैज्ञानिक है। उनका कहना है कि जब आत्मा-परमात्माका अस्तित्व विज्ञान एवं तर्कद्वारा सिद्ध नहीं होता तो वह क्यों माना जाय? ईश्वर इन्द्रियोंका विषय नहीं, किंतु अनुभवका विषय है। ऐसे विश्वासोंको अन्ध-विश्वास ही कहते हैं। उनके मतानुसार भूत-प्रेतकी कल्पनाके समान ही ईश्वरकी कल्पना है। वे कहते हैं कि विज्ञानकी उन्नतिके लिये मनुष्यने ईश्वरकी कल्पनामें भी उन्नति कर ली है। आरम्भकालकी भूत-प्रेतकी कल्पना ही मध्यकालमें परिष्कृत होकर देवी-देवताके रूपमें प्रकट होती है। अधिक प्रगतिशील युगमें देवी-देवताकी कल्पना भी परिष्कृत होकर एक ईश्वरका रूप ले लेती है और परिष्कृत होकर वही कल्पना अद्वैत निर्गुण-निराकार ब्रह्मका रूप धारण कर लेती है। मार्क्सका कहना है कि जो वस्तु है ही नहीं, उसपर विश्वास करनेसे क्या लाभ? और झूठी कल्पनासे मनुष्यको क्या आश्रय मिलेगा? और क्या उत्थान होगा? सबसे बड़ी अड़चन यह है कि अध्यात्मवादियोंके मतानुसार आत्मा परमात्मामें परिवर्तन नहीं होता। सुतरां ईश्वरनिर्दिष्ट धार्मिक-सामाजिक नियमोंमें भी रद्दोबदल नहीं हो सकता, परंतु मार्क्सके मतानुसार कोई धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक नियम शाश्वत नहीं है। उनमें रद्दोबदल होता ही रहता है। तभी उसका राष्ट्रीकरण समाजीकरण चल सकता है। ईश्वर मानना एवं उसके निर्दिष्ट नियमको न मानना यह अर्धजरतीयन्याय कैसे चलेगा? अपरिवर्तनीय ईश्वर एवं धर्मको मानते हुए व्यक्तिगत सम्पत्ति-भूमिका समाजीकरणके नामपर छीनना कथमपि नहीं हो सकता। मार्क्सवादी कहते हैं कि धार्मिक, आध्यात्मिक विचारवाले समाजकी प्रगतिका सदा ही विरोध करते हैं। फ्रांसके वाल्टेयरने कहा था कि यदि परमेश्वर नहीं है तो हमें स्वयं परमेश्वर गढ़ लेना चाहिये; क्योंकि उसका भय मनुष्योंको उचित मार्गपर चलानेमें सहायक होता है, परंतु मार्क्स ऐसे काल्पनिक भयसे लाभकी अपेक्षा हानि ही देखता है। उसे भय है कि ईश्वर माननेवाला व्यक्ति ईश्वरीय शास्त्र एवं ईश्वरीय नियमोंको भी माननेके लिये बाध्य होता है। फिर उसे श्रेणी-संघर्ष एवं किसी व्यक्तिगत सम्पत्ति एवं भूमिके छीन लेनेके सिद्धान्तमें विश्वास जमना असम्भव हो जायगा। वस्तुत: ईमानदारीकी बात यही है कि मार्क्सवादी, ईश्वरवादी दोनोंका समन्वय हो नहीं सकता। अन्तत: जो ईश्वरवादी हैं, उन्हें मार्क्सवाद छोड़ना ही पड़ेगा। मार्क्सकी अर्थनीति ईश्वर एवं धर्मके रहते-रहते चल ही नहीं सकती। ईश्वरवादी मार्क्सवादी बनकर या तो मार्क्सवादियोंको धोखा देते हैं या अपनेको धोखा देते हैं। जब भौतिक सूक्ष्म वस्तुओंके ज्ञानमें अणुवीक्षण आदि अनेक साधन अपेक्षित होते हैं, तब परमाणु एवं आकाशसे भी परम सूक्ष्म अहं महान् अव्यक्त एवं इन सबसे परम सूक्ष्म स्वप्रकाश सत्स्वरूप परमेश्वर बिना साधनोंके कैसे बुद्धॺारूढ़ हो सकता है। स्वधर्मानुष्ठानद्वारा शुद्धान्त:करण प्राणी विवेक, वैराग्य, शान्ति, दान्ति, उपरति, तितिक्षा, श्रद्धा-समाधान एवं मुमुक्षुत्व आदिसे युक्त होकर उपनिषद्, गीता, ब्रह्मसूत्रका विचार करनेसे परमेश्वरको समझ सकता है। शंकराचार्य-उदयनाचार्यके तर्कोंको सुनकर कोई समझदार पुरुष नहीं कह सकता कि ईश्वर भीरु मस्तिष्ककी कल्पना है या अन्धविश्वासकी चीज है। अभय सत्त्वशुद्धि ज्ञानयोगव्यवस्थितिपूर्ण तर्क एवं योगाभ्यासजनित एकाग्रता आदि जिसके समझनेके साधन हैं, उसे अन्धविश्वासकी बात समझना बड़ी भयंकर मूर्खता है। भूत-प्रेतकी कल्पनाने ही परिष्कृत होकर निर्गुण ब्रह्मकल्पनाका रूप ले लिया, यह कथन भी अनभिज्ञतामूलक है, लाखों बरस पहलेसे ही सबकी मान्यता साथ-साथ चली आ रही है। तामस प्राणियोंके लिये भूत-प्रेत, सात्त्विकोंके लिये देवी-देवता एवं सर्वोच्च अधिकारीके लिये सगुण परमेश्वर एवं साक्षात्कार सम्पन्न अत्यन्त अन्तर्मुखके लिये निर्गुणब्रह्मका उपदेश है। तत्त्वविद् भी व्यावहारिक दृष्टिसे सबका सम्मान करता है। कर्मकाण्ड, देवता आदिकी व्यावहारिक सत्ता तत्त्ववित‍्को ही नहीं, अपितु सर्वज्ञशिरोमणि ईश्वरको भी मान्य है।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट नि&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;न : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थव्यवस्था</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>ईश्वरधर्म</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>9.12 श्रेणी और वृत्ति ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/9-12-shrennii-aur-vrtti-maarks/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/9-12-shrennii-aur-vrtti-maarks/</guid><description>9.12 श्रेणी और वृत्ति मार्क्सवादी कहते हैं कि ‘जीविका पैदा करनेके क्रममें जो मनुष्य जिस स्थानपर है, वही उसकी श्रेणी है। मनुष्य जीविका उपार्जन करनेके ढंगके अनुसार अपने रहन-सहनका ढंग बना लेता है, अत…</description><pubDate>Mon, 16 Jun 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;9.12 श्रेणी और वृत्ति&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt;ी कहते हैं कि ‘जीविका पैदा करनेके क्रममें जो मनुष्य जिस स्थानपर है, वही उसकी श्रेणी है। मनुष्य जीविका उपार्जन करनेके ढंगके अनुसार अपने रहन-सहनका ढंग बना लेता है, अतएव जीविकोपार्जनका ढंग बदलनेसे समाजका रूप भी बदल जाता है। समाजमें पैदावारकी दृष्टिसे श्रेणियाँ अपना-अपना स्थान रखती हैं। पैदावारके फल या पैदावारके साधनोंपर अधिकार करनेके लिये जो संघर्ष चलता है, वही मनुष्यसमाजका इतिहास है, वही मनुष्यसमाजके विकासका मार्ग है। विकासके मार्गमें विरोध आना आवश्यक है, विरोधसे नया विधान तैयार होता है। नया विधान समाजके विकासको आगे बढ़ाता है।’ शरीरमात्रको आत्मा माननेवाले शरीरभिन्न आत्मा एवं उसका जन्मान्तर होने, ईश्वर एवं धर्माधर्मका रहस्य न समझनेवाले चार्वाकप्राय जडवादियोंकी दृष्टिमें उपर्युक्त बातें ठीक ही हैं, परंतु तद्विपरीत &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;वादीको ‘पशुओं, वृक्षों-जैसी ही मनुष्योंकी भी जन्मना ही ब्राह्मणादि श्रेणी मान्य है। जीविका चलानी हर मनुष्यकी मुख्य समस्या नहीं, किंतु लौकिक-पारलौकिक विविध अभ्युदय एवं परम नि:श्रेयस ही उसका मुख्य उद्देश्य है। तदर्थ धर्म, संस्कृति, ज्ञान, विज्ञान, शिल्प, संगीत, कला-कौशलका आविर्भाव परमावश्यक होता है। केवल मनुष्योंके लिये ही जीविका कोई असाधारण समस्या नहीं है। वह पशु-पक्षियोंके लिये भी अपेक्षित ही होती है।’ आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्। धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीना: पशुभि: समाना:॥ (हितो०) अतएव आस्तिकोंके यहाँ वर्णानुसारिणी जीविका होती है। जीविकानुसारी वर्ण नहीं। वर्णोंके भेदसे ही शास्त्रोक्त कर्मोंका भी भेद है। राजसूय, वाजपेयादि क्षत्रिय-ब्राह्मणादिके भेदसे विहित हैं। इस तरह धर्मकी दृष्टिसे ब्राह्मणादि श्रेणियाँ ही मुख्य एवं उपादेय हैं। धनी, गरीब, पूँजीपति, मजदूर आदि वास्तविक श्रेणी ही नहीं हैं। ऐसी कृत्रिम श्रेणियाँ सदा ही हानिकारक होती हैं। ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों, शूद्रों—सभीमें ये अमीर-गरीब होते हैं। बुद्धिमान्, निर्बुद्धि, दुर्बल, सबल कोई जाति नहीं होती। उनके विवाह, खानदान आदि भी इन्हीं अकृत्रिम श्रेणियोंमें होते हैं। इन श्रेणियोंमें साधनोंके हथियानेके लिये कभी भी संघर्ष नहीं हुआ। मार्क्स-जैसे कुछ लोगोंद्वारा यह कृत्रिम भेद उत्पन्न किया जाता है और उनमें संघर्ष, विद्वेष फैलाकर अपना मतलब गाँठनेका प्रयत्न किया जाता है। लाखों वर्षोंके पुराने इतिहासमें किसीकी भूमि-सम्पत्ति, कल-कारखाना छीननेका श्रेणीबद्ध प्रयत्न नहीं होता था। हाँ, एक राजा दूसरे राजाका राज्य छीननेके लिये प्रयत्न करता था। कुछ व्यक्ति कुछ व्यक्तियोंकी कोई वस्तु छीननेका प्रयत्न यदि करते थे तो वे दण्डके भागी होते थे। मार्क्सवादियोंके मनगढ़न्त इतिहासकी घटनाएँ केवल हजार-पाँच सौ वर्षकी ही हैं। सभी देशों, सभी धर्मोंके पुराने इतिहासोंमें मार्क्सवादी-क्रमकी गन्ध भी नहीं प्रतीत होती। इतना ही क्यों, युक्तियों एवं शास्त्रोंसे मालूम पड़ता है कि ऐसी क्रान्तियाँ क्षुद्रोपद्रवमात्र हैं। इनका कोई ऐतिहासिक महत्त्व नहीं। &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;ों, रामायण, महाभारत तथा पुराणोंमें करोड़ों, अरबों वर्षों एवं अगणित युगों, कल्पों तथा विभिन्न सृष्टियोंके इतिहास हैं। जैसे प्रतिवर्ष वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा आदि ऋतुओंका समानरूपसे आवर्तन होता रहता है, वैसे ही प्रतिकल्प प्रतिसृष्टिमें समानरूपसे सूर्य, चन्द्र आदि उत्पन्न होते हैं। अनेक ढंगकी प्रधान-प्रधान वस्तुएँ एक-सी ही होती हैं। कभी भी जीविकाके आधारपर श्रेणीबद्धता और संघर्षको सिद्धान्तरूपमें नहीं माना गया। जैसे कभी-कभी चोरी, डाका, दुराचार आदि उपद्रवके रूपमें आते रहते हैं, वैसे ही नास्तिकता, अराजकता, अनुचित गिरोहबन्दी एवं छीना-झपटी भी उपद्रवके रूपमें ही कभी-कभी हुआ करती हैं। प्रतिद्वन्द्विता, प्रतियोगितासे आधिभौतिक, आध्यात्मिक उन्नति होती है, परंतु छीना-झपटी एवं अपहरणके लिये संघर्ष सदा ही अपराध माना गया और उससे समाजका विकास नहीं, विनाश होता है। मार्क्सवादियोंद्वारा उपस्थापित शोषक-शोषितश्रेणी, उनके शोषण एवं संघर्षका इतिहास उन्हीं उपद्रवोंका एक अंशमात्र है, वह भी एक अत्यन्त क्षुद्र कालका एवं अति क्षुद्र देशका। जिनके अधिकांश मनगढ़न्त मिथ्या तथा दुरुद्देश्यसे कल्पित किये गये हैं। सार्वकालिक एवं सार्वदेशिक इतिहासके अनुसार मनुष्योंने अपने शुभाशुभ कर्मों, तपस्याओं, आराधनाओं तथा परिश्रमोंके आधारपर धन-धान्य एवं सभ्यताकी उन्नति की है, दूसरोंको गुलाम बनाकर उनकी कमाईके आधारपर नहीं। आस्तिक मनुष्योंने केवल मनुष्योंको ही नहीं, अपितु प्राणिमात्रको परमेश्वरकी संतान एवं परमेश्वर-स्वरूप माना है। ‘अमृतस्य पुत्रा:’ के अनुसार वे प्राणिमात्रके साथ समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृताका व्यवहार पसन्द करते हैं। ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म’ ‘वासुदेव: सर्वमिति’ ‘ईश्वरो जीवकलया प्रविष्टो भगवान् स्वयम्’ ‘नानाविधैश्च नैवेद्यैर्द्रव्यैर्मे नाम्ब तोषणम्’ वे मनुष्य ही क्या किसी भी प्राणीके अपमान या शोषणसे भगवान‍्का ही अपमान समझते हैं। वे एक नगण्य प्राणीके लिये अपना सर्वस्व प्राणतक न्योछावर कर देते थे; शिबि, दिलीप आदि इसके उदाहरण हैं।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और रामराज्य, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>दुखनिवृत्ति</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>श्रेणी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>9.11 समाज—विकासकी कुंजी ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/9-11-smaaj-vikaaskii-kunjii-maar/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/9-11-smaaj-vikaaskii-kunjii-maar/</guid><description>9.11 समाज—विकासकी कुंजी ‘सोशलिज्म’ का अर्थ है ‘समाजवाद’ और साम्यवादका अर्थ है समाजमें समानता लाना। समाजवादका अभिप्राय यह है कि ‘समाज ही उत्पादन-साधनोंका स्वामी हो। व्यक्तिके स्थानपर समाजका शासन हो…</description><pubDate>Sun, 15 Jun 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;9.11 समाज—विकासकी कुंजी&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;‘सोशलिज्म’ का अर्थ है ‘समाजवाद’ और साम्यवादका अर्थ है समाजमें समानता लाना। समाजवादका अभिप्राय यह है कि ‘समाज ही उत्पादन-साधनोंका स्वामी हो। व्यक्तिके स्थानपर समाजका शासन होना ही समाजवाद है।’ फ्रांसके सेंट साइमन और इंग्लैण्डके राबर्ट्स ओबेनने (जिनका जन्म क्रमश: १७६० और १७७१ में हुआ था) पहले-पहल साम्यवादी विचारधारा फैलायी। उनके विचार थे कि ‘सरकारकी बागडोर महात्माओं एवं वैज्ञानिकोंके हाथमें होनी चाहिये।’ &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt;ी कहते हैं कि ‘चूँकि ये विचार धार्मिक भावनाके थे, इसलिये वे लोग वास्तविकतासे परिचित न हो सके।’ फ्रांसके लुई ब्लां (जिसका जन्म सन् १८११ में हुआ था) ने आधुनिक समाजवादका रूप व्यक्त किया और मजदूरोंके हाथमें राजनैतिक सत्ता देना आवश्यक समझा। फिर भी मार्क्सवादी अपने समाजवादको उन सबसे विलक्षण कहते हैं। एंजिल्सका कहना है कि ‘समाजवाद शब्दका प्रयोग अनेक बेसिर-पैरकी हवाई आयोजनाओंके लिये हुआ है। परोपकारकी भावनाओंद्वारा मजदूरोंकी अवस्था सुधारनेके ऐसे सैकड़ों प्रयत्नोंसे भी इस शब्दका सम्बन्ध रहा है, जो एक तरफ मजदूरोंके कल्याणकी फिक्र करते हैं और दूसरी ओर पूँजी तथा उसके मुनाफेको भी सुरक्षित रखना चाहते हैं।’ इसीलिये ‘कम्युनिष्ट मैनीफेस्टो’ का ‘समाजवादी मैनीफेस्टो’ नाम नहीं रखा गया। फ्रांसके प्रौधोंने भी कहा कि ‘मजदूरोंके साधनहीन होनेसे उन्हें अपने परिश्रमका पूरा फल नहीं मिलता। साधनोंसे मालिक बिना परिश्रम किये ही मजदूरोंके परिश्रमका फल हथिया लेता है।’ अत: प्रौधोंने ‘समाजको सब सम्पत्तिका मालिक’ होना ठीक समझा। इनमेंसे अनेकोंने स्त्री-पुरुषोंके सामाजिक बन्धनोंको भी अनावश्यक समझा। फलत: इनके बहुत अनुयायी आचारहीन भी हो गये। जिसका समाजपर बुरा असर पड़ा। मार्क्सकी मुख्य विशेषता यह बतायी जा सकती है कि ‘उसने मनुष्य-समाजके इतिहासकी घटनाओंको कार्य-कारणकी शृंखलामें जोड़ दिया। प्रकृतिके समान ही मनुष्य-समाजके विकास एवं परिवर्तनके नियम हैं। समाजका रूप और संघटन किसी बाह्यशक्तिसे नहीं, बल्कि स्वयं मनुष्य-समाजके विचारों, निश्चयों और कार्योंसे होता है। आगे भी समाजका रूप आवश्यकतानुसार बदला जा सकता है। पूँजीवादी प्रणाली अपने विकाससे समाजमें इस प्रकारकी स्थिति उत्पन्न कर देती है कि उसका आगे बढ़ना असम्भव हो जाता है और पूँजीवादी समाजको विनाशकी ओर बढ़ाता है, अत: श्रेणी-संघर्षके द्वारा समाजवाद विकसित होता है।’ &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;वादीका इसपर कहना है कि जड प्रकृतिमें समीक्ष्यकारिता नहीं बन सकती। कोई समीक्ष्यकारी व्यक्ति या समूह आक्रमणकारी या आक्रमणका सामना करनेके लिये परस्परविचारसे निश्चित कार्यक्रम बनाता है। अमुक अश्वारोही, अमुक गजारोही, अमुक रथारोही, अमुक वायुयानारोही होकर तलवार, भाला, बर्छा, बन्दूक, तोप, विस्फोटक तथा अंगार (बम्ब) आदि लेकर आक्रमण या मुकाबला करेगा। अवसर आनेपर वह पूर्वसंकेतानुसार वैसा ही करता है। पर अचेतन प्रकृति या उसके जडकार्यमें या घटनाओंमें समीक्ष्यकारिता सर्वथा असम्भव है। अतएव प्रकृति या प्रकृति-कार्य किसीमें भी स्वतन्त्ररूपसे नियमित प्रवृत्ति नहीं हो सकती। निरीश्वरवादी सांख्योंमें भी ‘नद्या: कूलं पिपतिषति’ (नदीका किनारा गिरना चाहता है)-के समान प्रकृतिके विचार या ईक्षणको गौण या औपचारिक ही माना है। नदीका किनारा जड है, उसमें गिरनेकी इच्छा नहीं हो सकती; किंतु आसन्न पतन अर्थात् शीघ्र गिरना देखकर इस प्रकारका वाक्य-प्रयोग किया जाता है। जैसे अचेतन रथादिकी प्रवृत्ति चेतन सारथ्यादिद्वारा अधिष्ठित होनेसे ही होती है, वैसे ही अचेतन प्रकृति या उसके कार्य जड-वर्गकी प्रवृत्ति भी चेतन-नियन्त्रित ही होती है। घटनाएँ उसी अचेतनकी हलचलमात्र हैं। वे स्वयं भी जड हैं। उनके नियम या कार्यकारणभाव—कुछ भी स्वतन्त्र नहीं हो सकते। मीमांसकोंका अचेतन कर्म भी ईश्वराधिष्ठित होकर ही फल देता है, उनके कार्यकारणभाव भी ईश्वरनियन्त्रित ही हैं—‘ईक्षतेर्नाशब्दम्’ (ब्रह्मसूत्र १।१।५) शांकरभाष्य आदिमें यह विषय विस्तारसे वर्णित है। अचेतन यन्त्रोंकी नियमित प्रवृत्तिके मूलमें भी किसी चेतनको ही अनिवार्यरूपसे सबका नियामक मानना पड़ता है। किसी-किसी घटनाका परस्पर कार्य-कारणभाव होता है, यह कोई मार्क्सकी नयी बात नहीं है। दण्ड, चक्र, चीवर, कुलालादिके व्यापारकी घटना घटनिर्माण (घटना)-का कारण है। तन्तु, तूरी, वेमा, तन्तुवायादिकी हलचलें पटनिर्माणका कारण हैं। संग्रामसे धन, जन, शक्तिका अपक्षय होता है। उससे किसीकी हानि और अन्तमें किसीको लाभ भी होता है—यह कार्य-कारणभाव मान्य ही है। सब घटनाओंका कार्य-कारणभाव सर्वथा ही असंगत है। यदि सभी घटनाओंका परस्पर कार्य-कारणभाव हो तो कार्यकारणभावकी कल्पना ही समाप्त हो जाती है। किसीका कोई कारण होकर अन्यका अकारण हो, तभी कार्य-कारण-भावकी विशेषता होती है। कुलालका पिता भी यद्यपि कुलालजननद्वारा घटका कारण कहा जा सकता है तथा बाणनिर्माता भी किसीके वधमें परम्परया कारण हो सकता है, परंतु तार्किकोंने ऐसे कारणोंको ‘अन्यथासिद्ध’ कहा है। अन्यथा-सिद्धिशून्य कार्याव्यवहित पूर्वक्षणवर्तीको ही कारण कहा जाता है। कालान्तरभावी स्वर्गादिके प्रति अग्निहोत्रादि पूर्वक्षणवर्ती नहीं हो सकता। अत: बीचमें अपूर्व (अदृष्टरूप) व्यापार मानकर उसके द्वारा कार्य-कारणभाव निश्चित होता है। ‘तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनकत्व’ ही व्यापार है। अग्निहोत्रादिजन्य होकर अग्निहोत्रादिजन्य स्वर्गका जनक अदृष्ट है। काकके बैठने, तालके गिरनेमें यद्यपि कार्य-कारणभाव प्रतीत होता है, तथापि ‘काकतालीयन्याय’ का अकार्यकारणभाव स्पष्ट ही है। इसके अतिरिक्त ‘इति-ह-आस’ (इतिहास) ऐसा हुआ—इस ऐतिह्यको ही इतिहास कहते हैं। ‘वटे यक्ष:’ यह प्रसिद्धि इतिहास नहीं है। अन्धपरम्पराकी प्रसिद्धि अप्रमाण और आप्तपरम्पराकी प्रसिद्धि प्रमाण होती है। इसीलिये अतीत घटनाओंके सम्बन्धमें वचन या लेख ही प्रमाण होते हैं। कुछ अंशोंमें अनुमान भी सहायक होते हैं। करोड़ों वर्षोंकी अगणित घटनाओंका उल्लेख हो ही नहीं सकता। यदि एक-एक वर्षकी घटनाओंका एक-एक पन्नेमें भी संकलन करें तो भी करोड़ों पन्नोंका इतिहास होगा। उसे कौन कितने दिनमें पढ़ेगा, फिर कब निष्कर्ष निकालेगा? सम्पूर्ण घटनाओंका ज्ञान न होनेसे अधूरी घटनाके अधूरे ज्ञानसे निकाला हुआ निष्कर्ष भी अधूरा ही होगा। फिर घटनाओंकी सच्चाई जाननेमें भी पर्याप्त भ्रम रहता है, आँखों-देखी घटनाओंके सम्बन्धमें विभिन्न संवाददाताओं, समाचार एजेंसियोंमें पर्याप्त मतभेद रहता है। समाचारपत्रों एवं सम्पादकीय लेखोंमें जाते-जाते एक ही घटनाका रूप सैकड़ों ढंगका बन जाता है। इसीलिये पुरानी घटनाओंका पढ़ना-लिखना गड़े मुर्दोंके उखाड़ने-जैसा ही व्यर्थ होता है। म्यूनिसिपलबोर्डोंमें मनुष्योंके ही जनमने-मरनेका लेखा-जोखा होता है, मच्छरों-मक्खियोंके जीने-मरनेका लेखा-जोखा नहीं रहता; क्योंकि उनका कोई महत्त्व नहीं होता। वैसे ही प्रतिवर्ष इतिहासमें मुख्य-मुख्य व्यक्तियों एवं घटनाओंका ही उल्लेख होता है, लाखों ही नहीं, करोड़ों व्यक्तियों एवं घटनाओंका उल्लेख छोड़ दिया जाता है; क्योंकि लेखक उनका महत्त्व नहीं मानता, परंतु एतावता क्या कोई कह सकता है कि ‘उनमें कोई व्यक्ति या घटना भी महत्त्वपूर्ण नहीं?’ इसीलिये भारतीय महर्षियोंने योगज ऋतम्भरा प्रज्ञाके द्वारा ही अतीतकी महत्त्वपूर्ण आवश्यक घटनाओंका साक्षात्कारकर उनका उल्लेख किया है। ‘योगजविशेषता नहीं होती’ यह कहना मूर्खता होगी। स्पष्ट ही देखते हैं कि ‘जब चित्त शान्त, एकाग्र होता है तो सूक्ष्म ज्ञान उत्पन्न होता है। चित्तके चंचल एवं अशान्त होनेपर आँखों-देखी, कानों-सुनी बातोंका भी ठीक-ठीक ज्ञान नहीं होता।’ वाल्मीकीय रामायणके लिये ब्रह्माका वरदान है—‘न ते वागनृता काव्ये काचिदत्र भविष्यति’ (वाल्मी० १।२।३३) इस काव्यमें तुम्हारा एक भी वाक्य अनृत नहीं होगा। यदि ये सब बातें झूठी हैं, तो जडवादियोंकी सम्पूर्ण ऐतिहासिक कल्पनाएँ और उनके कार्यकारणभाव भी सुतरां झूठे हैं। मनुष्योंको विचारने, सोचने, उन्नत करनेमें अवश्य स्वतन्त्रता है, परंतु उसके लिये भी शिक्षण, मार्ग&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-paashcaaty-drshn-1-1-drshnkii/&quot;&gt;दर्शन&lt;/a&gt; अपेक्षित होते हैं। आज भी शिक्षणादिकी आवश्यकता सूर्यके समान स्पष्ट है। सर्वज्ञ ईश्वर, आप्त, महातपा, महर्षियोंके शिक्षण मार्गदर्शनके अनुसार सोचने, विचारने, उन्नतिके प्रयत्न करनेसे सफलता निश्चित होती है, मनमानी करनेसे भटककर परेशान होना पड़ता है। आज भी न्याय, नीति, शिक्षा, शिल्पादिके सम्बन्धमें परम्परासे ही शिक्षा ली जाती है। अदालतोंमें भी पुरानी नजीरें पेश की जाती हैं। नीतिके सम्बन्धमें भी पुरानी मान्यताओंकी खोज की जाती है। यदि अतीतसे शिक्षा नहीं लेनी है, तो फिर इतिहासका महत्त्व ही क्या? अतीत घटनाओंमें कितनी ही अनिष्ट हैं, कितनी इष्ट हैं, कितनी भली हैं, कितनी बुरी हैं। अधिकांश अनाचार, पापाचार एवं बुराईकी ही घटनाएँ घटती हैं। अत: महर्षियों, शिष्टोंसे सम्मत, सत्य, लाभदायक इतिहास ही आदरणीय होता है। अत: राष्ट्रको अपने भविष्यनिर्माण करने, धार्मिक, आध्यात्मिक, सामाजिक, राजनीतिक उचित शिक्षण प्राप्त करनेके लिये ही प्राप्त इतिहासोंका उल्लेख होता है। पूँजी जड है, वह स्वयं मुर्दा है, प्रयोक्ताओंके गुण एवं दोषसे उसमें गुण या दोष आते हैं। पूँजीद्वारा होनेवाले विकाससे पूँजीपतिका ही विनाश नहीं होता, किंतु मजदूरका भी होता है, अन्यथा उसकी भी बेकारी बढ़ती है। बेकारी बढ़नेसे ही मजदूरोंका राज्य नहीं बन जाता। यदि यही बात हो तो फिर राज्य बनानेके लिये व्यक्ति या समूह बेकार ही प्रयत्न करें; परंतु ऐसा देखा नहीं जाता। इसके साथ ही यह भी समझना चाहिये कि वैज्ञानिक आविष्कारक आदि आधुनिक विकासके मूल हैं। यदि विकासके परम्परागत हेतु होनेसे पूँजीपतिका विनाश होता है, तो साक्षात् ‘संश्लिष्ट’ आविष्कारकों एवं मजदूरोंका विनाश क्यों न होगा? जैसे पूँजीपतियोंका विनाश इतिहाससिद्ध है, वैसे ही पूँजीपतियोंसे अधिक संख्यामें मजदूरोंका विनाश भी इतिहाससिद्ध है। फिर भी जैसे मजदूर रहते हैं, वैसे पूँजीपति भी हैं। यह दूसरी बात है कि मजदूरके नामपर कुछ सरकारी अधिनायक पूँजीपति बन जाते हैं। किसी भी कार्यमें आनेवाले दोषों एवं दुष्परिणामोंको बुद्धिमान्, ईमानदार मिटानेका प्रयत्न करता है और सफल होता है; कोई खास वर्ग या व्यक्ति ही ऐसा करता है; यह नहीं कहा जा सकता। फिर धर्म-नियन्त्रित शासन सुतरां ईश्वरीय एवं आर्ष सम्मतियोंके अनुसार आगत दोषोंको दूर कर ही सकता है।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और रामराज्य, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट नि&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;न : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>कुंजी</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>वर्गविहीनसमाज</category><category>विकासवाद</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>9.10 पाप-पुण्य और शोषण ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/9-10-paap-punny-aur-shossnn-maarks/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/9-10-paap-punny-aur-shossnn-maarks/</guid><description>9.10 पाप-पुण्य और शोषण मार्क्सवादी कहते हैं कि ‘प्रबल मनुष्य दुर्बल मनुष्योंको अपनी गुलामीमें जकड़े रखनेके लिये ही अपनी शक्तियोंका प्रयोग करता था और तदर्थ ही उसने अनेक सिद्धान्त बनाये। बहुतोंने नि…</description><pubDate>Sat, 14 Jun 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;9.10 पाप-पुण्य और शोषण&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt;ी कहते हैं कि ‘प्रबल मनुष्य दुर्बल मनुष्योंको अपनी गुलामीमें जकड़े रखनेके लिये ही अपनी शक्तियोंका प्रयोग करता था और तदर्थ ही उसने अनेक सिद्धान्त बनाये। बहुतोंने निर्बलोंको सन्तोषका पाठ पढ़ाया और साधन-सम्पन्नोंको भी दया, सहानुभूति एवं त्यागका उपदेश किया; इस जीवनमें एवं मृत्युके बाद दूसरे जीवनमें सुखादि लानेका विश्वास दिलाया। व्यक्तियोंको समझाया गया कि ‘ये गुण व्यक्तिगत पूर्णताके लक्षण हैं और ऐहलौकिक-पारलौकिक सुखके साधक हैं। इन सभी उपदेशोंकी तहमें शान्ति एवं व्यवस्थाकी इच्छा और उद्देश्य ही मुख्य है।’ उनके मतानुसार ‘इसी इच्छाने धर्मको जन्म दिया है। फिर भी समाजके भीतर आनेवाली असमानताके कारण असन्तोष एवं अशान्तिकी सम्भावना बनी ही रहती है। इसीलिये समाजहितैषियोंने सदा ही असमानता दूर करने और समानता लानेका प्रयत्न किया। सभी सन्तों एवं धर्मोंने समानताका गुण गाया है।’ उपर्युक्त कथनका सार यह है कि वस्तुत: धर्म, सन्तोष, दया, त्याग, सहानुभूति वास्तवमें कोई महत्त्वकी चीज नहीं। केवल शोषकोंके कुछ पिट्ठुओंने शोषितोंके आँसू पोंछने, उन्हें शान्त रखने, विद्रोह न करनेके लिये ही इन सबको गढ़ रखा है। चार्वाकोंने भी धर्मके सम्बन्धमें ऐसी ही उलटी सीधी कल्पना की है। वस्तुत: महात्मा, आप्तकाम, परम विरक्त महर्षियोंने परम सूक्ष्म ऋतम्भरादृष्टिसे अपौरुषेय &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;ादिशास्त्रोंके आधारपर कर्मका निर्णय किया है। श्रीकृष्ण एवं शंकराचार्य-जैसे तार्किकों, दार्शनिकोंने जिसका पूर्णरूपसे समर्थन किया है, भौतिकवादियोंकी बहिर्मुख दृष्टिमें वह समझमें न आये, तो क्या आश्चर्य? सृष्टिमें ही सत्त्व, रज, तम तीनों गुणोंका क्रमेण अभिभव-उद्भव होता रहता है। फलस्वरूप दैवी, आसुरी शक्तियाँ देश विदेशमें समय-समयपर उद‍्भूत होती रहीं। दैवी शक्तिके लोग आत्मा, ईश्वर, शास्त्र तथा धर्म लेकर चलते थे और दूसरे उसके विरुद्ध। हिरण्यकशिपुने भी जैसी विधिकी व्यवस्था थी, उससे विपरीत व्यवस्था बनानेकी प्रतिज्ञा की। ‘अन्यथेदं विधास्येऽहमयथापूर्वमोजसा॥’ जर्मनीमें हीगेल, एडवर्ड आदि विचारकोंने भी इस सम्बन्धमें अपना मत व्यक्त किया है।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>धर्मसम्राट</category><category>पुण्यपाप</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>शोषण</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>9.9 सामाजिक व्यवस्था ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/9-9-saamaajik-vyvsthaa-maark/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/9-9-saamaajik-vyvsthaa-maark/</guid><description>9.9 सामाजिक व्यवस्था कम्युनिष्ट यह मानते हैं कि ‘मनुष्य जिस किसी भी अवस्थामें रहा हो, उसके समक्ष कुछ सिद्धान्त, नियम एवं आदर्श रहे हैं’ परंतु उनके मतानुसार ‘समाजकी अवस्था बदलनेके साथ उनके सिद्धान्…</description><pubDate>Fri, 13 Jun 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;9.9 सामाजिक व्यवस्था&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;कम्युनिष्ट यह मानते हैं कि ‘मनुष्य जिस किसी भी अवस्थामें रहा हो, उसके समक्ष कुछ सिद्धान्त, नियम एवं आदर्श रहे हैं’ परंतु उनके मतानुसार ‘समाजकी अवस्था बदलनेके साथ उनके सिद्धान्तों, नियमों एवं आदर्शोंमें भी परिवर्तन होता रहता है।’ उनकी इस मान्यताका मूल कारण यही है कि ‘सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान्, विश्वस्रष्टा ईश्वर उनकी समझमें आता ही नहीं।’ अतएव सर्वदेश-कालके अनुसार निर्धारित शाश्वत सिद्धान्तों, सत्यों एवं नियमोंपर उनका विश्वास नहीं जमता। सबसे बड़ा दोष तो यह है कि ‘वे परिस्थिति-परतन्त्र मनुष्योंकी परिस्थित्यनुसारिणी विचार-धाराओंको ही &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-paashcaaty-drshn-1-1-drshnkii/&quot;&gt;दर्शन&lt;/a&gt;ोंका स्रोत मानते हैं, जो एक प्रामाणिककी दृष्टिमें अत्यन्त हेय एवं नगण्य है।’ वे कहते हैं कि ‘विचारोंके जीवनकी बदलती हुई परिस्थितियाँ ही विभिन्न विचारधाराएँ उत्पन्न करती हैं। किसी विशिष्ट समयकी विशिष्ट परिस्थितियोंमें जीवनका विकास होनेसे विचारकोंके संस्कार एवं विचारधाराएँ एक विशिष्ट मार्गपर ढल जाती हैं। वे तदनुसार ही सामाजिक एवं व्यक्तिगत जीवनके उद्देश्य एवं आदर्श निश्चित करनेका प्रयत्न करते हैं।’ उनके मतानुसार ‘सुकरात, अरस्तू, अफलातून आदि दार्शनिकोंने भी अपनी जीवनस्थितिके अनुसार ही अपने विचार व्यक्त किये।’ इन बातोंसे यह स्पष्ट है कि इन विचारकोंने प्रमाणके आधारपर तत्त्वकी दृष्टिसे किसी सत्यवस्तुका विचार नहीं किया। मार्क्सकी भी यही हालत थी, वह भी गरीबोंकी श्रेणीमें उत्पन्न हुआ था। अत: उसे भी अपनी परिस्थितिके अनुसार ही विचार करना पड़ा। इससे स्पष्ट है कि इन किन्हीं भी विचारोंका वस्तुस्थितिसे कोई सम्बन्ध नहीं। किंतु भारतीय दर्शनोंकी स्थिति ऐसी नहीं। यहाँ तत्त्वके सम्बन्धमें परिस्थितिका प्रभाव रोककर भी प्रमाणके बलसे काम लिया जाता है। प्रामाणिक निर्णय अमीर-गरीब, सुखी-दुखी, सम्पन्न-विपन्न, नौकर-मालिक-सबका एक-सा ही रहता है। आलोकसहकृत मन:संयुक्त निर्दोष चक्षुद्वारा सभी लोग रूपवान् पदार्थके सम्बन्धमें एकमत ही होंगे। उसी प्रकार निर्दोष श्रोत्रादिसे शब्दादि ज्ञान भी सबको एक-से ही होंगे। इस सम्बन्धमें परिस्थिति अकिंचित्कर ही रहेगी। इसीलिये शुक-जैसे महाविरक्त, वसिष्ठ-जैसे महान् श्रोत्रिय एवं राम-जैसे सम्राट् आदिकोंके धर्म, दर्शन आदिके सम्बन्धमें एक ही ढंगके विचार थे। उनके तत्त्व-निर्णयपर परिस्थितियों या सम्पत्ति-विपत्ति आदिका कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता था। कम्युनिष्ट कहते हैं कि ‘मनुष्य सर्वज्ञ परमेश्वर एवं शास्त्रोंके अनुसार होनेवाली सामाजिक व्यवस्थापर सन्तुष्ट नहीं होता। अपनी व्यवस्थामें उसे त्रुटियाँ मालूम पड़ती हैं; वह उनमें परिवर्तनकर फिर आगे बढ़ता है। पुनश्च उनमें आनेवाली रुकावटोंका अनुभवकर उसमें रद्दोबदल करता है। इस प्रकारके परिवर्तनोंसे ही विकास होता है।’ परंतु अल्पज्ञ मनुष्यकी बनायी हुई व्यवस्थासे कभी भी शान्तिकी आशा नहीं की जा सकती। &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt;ी अपनी व्यवस्थाको ‘अन्तिम व्यवस्था’ कहते हैं। मजदूरों-पूँजीपतियोंके संघर्षको ही वे संघर्षकी अन्तिम कड़ी कहते हैं, परंतु विकास-क्रममें इसे भी अन्तिम कैसे कहा जा सकता है? वस्तुत: जैसे समय-समयपर असत्य-अधर्मके विस्तारसे सत्य एवं धर्म भी कुछ समयके लिये दब जाता है, तथापि अन्तमें सत्य और धर्मकी ही विजय होती है, वैसे ही ईश्वरीय व्यवस्था भी जो सर्वज्ञद्वारा सर्वदेश-काल एवं सर्वहितकी दृष्टिसे निर्धारित की गयी है, कभी-कभी दब-सी जाती है। पर अन्तमें उसीकी विजय एवं स्थिरता रहती है। अल्पज्ञोंद्वारा निर्धारित व्यवस्था थोड़े ही दिनोंमें दोषपूर्ण प्रतीत होने लगती है। अत: उसमें परिवर्तन आवश्यक प्रतीत होता है। इस तरह कोई भी मनुष्य मार्क्सके समान ही अपनी व्यवस्थाको ही सर्वोत्कृष्ट एवं अन्तिम समझता है,परंतु उससे भी उत्तम योजना लेकर दूसरे भी सामने आ ही जाते हैं। कई तार्किक बड़े-बड़े प्रयत्नसे दिव्य तर्कोंद्वारा कोई व्यवस्था उपस्थित करते हैं, पुनश्च उससे भी अच्छा तर्क लेकर दूसरे महाशय सामने आ जाते हैं। यत्नेनानुमितोऽप्यर्थ: कुशलैरनुमातृभि:। अभियुक्ततरैरन्यैरन्यथैवोपपाद्यते॥ (ब्रह्म० शां० भा० १।१।१) पर ईश्वरीय व्यवस्था हजारों नहीं लाखों वर्षोंसे सफल होती हुई चली आ रही है। संसारकी सभी सरकारोंने उसे मान्यता भी दी है। प्राय: सभी सरकारोंने व्यक्तियों एवं जातियोंकी धार्मिक स्वाधीनता एवं दायभाग आदिके सम्बन्धमें धार्मिक व्यवस्थाओंको स्वीकृत किया है। धर्म-नियन्त्रित मनुष्य सदा ही एक-दूसरेका पोषक रहा। उच्छृंखल होते ही उसमें ‘मात्स्यन्याय’ फैलता और वह एक-दूसरेका शोषक बन जाता है। उसी अवस्थामें प्रबल दुर्बलका घातक बनता है; धनवान्, शक्तिमान् निर्धन एवं शक्तिहीनका शोषक या भक्षक बन जाता है। जीवरूपसे सब समान होते हुए भी एक जीव दूसरे जीवोंको अपने उपयोगमें लाता है। उसी तरह मनुष्यताके नाते सब समान होनेपर भी एकका दूसरेके उपयोगमें आना पहले भी और आज भी अनिवार्य ही है। अंगांगिभाव, शेष-शेषिभावको उपकार्योपकारकरूपसे आदरणीय बना लिया जा सकता है। जैसे बेगार पहले कुछ शूद्रोंसे ही ली जाती थी, आज श्रमदानके रूपमें वही बेगार बड़े-से-बड़े लोगोंसे भी ली जा रही है।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट नि&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;न : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थव्यवस्था</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>सामाजिक-गतिशीलता</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>9.8 ज्ञानका मूल ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/9-8-jnyaankaa-muul-maarksvaad-au/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/9-8-jnyaankaa-muul-maarksvaad-au/</guid><description>9.8 ज्ञानका मूल मार्क्सवादी ज्ञानकी परिभाषा करते हुए कहते हैं कि ‘ज्ञान सम्बन्धोंकी चेतना, वस्तु विषय तथा आत्मविषयक जीवधारी मनुष्यके रूप हम और बाहरी दुनियाँके सम्बन्धोंकी चेतना, बाहरी दुनियाँमें व…</description><pubDate>Thu, 12 Jun 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;9.8 ज्ञानका मूल&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt;ी ज्ञानकी परिभाषा करते हुए कहते हैं कि ‘ज्ञान सम्बन्धोंकी चेतना, वस्तु विषय तथा आत्मविषयक जीवधारी मनुष्यके रूप हम और बाहरी दुनियाँके सम्बन्धोंकी चेतना, बाहरी दुनियाँमें व्यापक और विशिष्ट तफसीलोंके बीचका सम्बन्ध और दृष्टिभूत वस्तु तथा उसकी कल्पनाके बीचका सम्बन्ध जिसमें और जिसके द्वारा हम अस्तित्वका अनुभव करते हैं। अपना अस्तित्व और बाहरी दुनियाँका भी अस्तित्व हम दृष्टिभूत वस्तुओं उनकी कल्पनाओंमें ही अपने और बाहरी दुनियाँके बीच समता और प्रभेद दोनोंका एक साथ अनुभव करते हैं। प्राकृतिक वास्तविकताकी बाहरी दुनियाँ और मननक्रियाकी भीतरी दुनियाँमें विविध प्रकार परिणामकी समता और प्रभेदका मानस चित्रमें चित्रित कर सकना और इन सबको सम अस्तित्व (को एविजर्सास) और अनुवर्तन (सक्सेशन) क्रिया, प्रतिक्रिया, परस्परक्रिया और कार्यकारण निर्भरताके उचित सम्बन्धोंमें सजाने और व्यवस्थित करनेका नाम ही जानना है।’ ‘सम्बन्धकी चेतना ही ज्ञान है, विशेषकर वस्तु-जगत‍्के अस्तित्वोंके बीचका तथा आत्मानुभूत (दृष्टिगत वस्तु, कल्पनाएँ आदि) अस्तित्वोंके बीचका सम्बन्ध तथा इन दोनों जगतोंके बीचके सम्बन्धकी चेतना ही ज्ञान है। एक और दृष्टिकोणसे व्यावहारिक अर्थमें विचार वस्तु-जगत‍्को ठीक-ठीक प्रतिफलित और प्रतिबिम्बित करता है, इसकी निश्चयता ही ज्ञान है। भौतिकवादने प्रकृतिको क्रियाशील रूपमें माना और विचारको अक्रिय रूपमें, जिसका केवलमात्र काम था इन्द्रियग्राह्य वस्तुओंको ग्रहण करना तथा उसपर मन्थन करना। यह काण्ट और काण्टके पश्चात‍्के आदर्शवादी थे, जिन्होंने मननशक्तिकी रचनात्मक क्रियापर जोर दिया, लेकिन इतना अधिक जोर दिया कि उसको बेहिसाब बढ़ा-चढ़ा दिया।’ ‘अंग्रेजी और फ्रांसीसी भौतिकवादने इस मूल स्वीकृतिसे आरम्भ किया कि विचारकी वस्तु (विचारका कर्म)-का अस्तित्व विचारकर्ताके अस्तित्वसे पहले है और विचारकर्ता इसकी अनुभूति प्राप्त करता है। लेकिन वह इससे आगे न बढ़ सके। हमास् हबस‍्ने इस मतको इन शब्दोंमें रखा है। ‘मनुष्यके विचारके सम्बन्धमें अलग-अलग रूपमें इनमेंसे प्रत्येक वस्तु, हमारे शरीर और मनके बाहर किसी वस्तुके किसी गुणका प्रतीक या प्रतिनिधि है, जो वस्तुकी मनुष्यकी इन्द्रियोंपर अपनी क्रियाकी विचित्रतासे विविध दृश्योंकी सृष्टि करती है (लिवायथन)। यह प्रश्न भौतिकवादियोंके सामने इस रूपमें था कि इस ज्ञानकी उत्पत्ति इन्द्रियग्राह्य रूपोंके मूल उद‍्गमस्थानसे होकर एक विशेषशक्ति प्रज्ञाद्वारा होती है, लेकिन यह विशेषशक्ति क्या है, यही एक झगड़ेका विषय हो गया। आदर्शवादी इस मतका पोषण करते थे कि यह ‘प्रज्ञा’ धर्मपण्डितोंकी आत्मा ही है, जो एक अतिप्राकृतिक शक्ति है, जो इन्द्रियानुभूत मायावी रूपोंको परम और अनन्त सत्यमें परिणत करती है। भौतिकवादी इस मतके लिये झगड़ते रहे कि यह ‘प्रज्ञा’ कितनी ही रहस्यमयी हो, फिर भी यह प्राकृतिक ही है।’ प्रसिद्ध लेखक आनातोल फ्रांसने परिस्थितिको इस तरह चित्रित किया है ‘मठकी दीवारके नीचे जहाँ छोटे बच्चे अपना खेल खेल रहे थे, हमारे साधुमित्र वहाँ एक और खेल खेल रहे थे, जो उतना ही व्यर्थ था, लेकिन मैं वहाँ जा मिला; क्योंकि समय बिताना ही चाहिये। हमारा खेल शब्दोंका खेल था, जो हमारे गूढ मगज लेकिन सूक्ष्म दिमागके लिये सुखकर था, एक विचारशैलीको दूसरी विचारशैलीके विरुद्ध उभाड़नेवाला था और उसने सारे ईसाई समाजमें हलचल मचा दी। हम दो विरोधी दलोंमें बँट गये। एक दलका कहना था कि सेवों (फल)-के पहले सेव जाति थी, केलोंके पहले केला जाति थी, भ्रष्टचरित्र और लालची साधुओंके पहले साधु-जाति, लालच तथा भ्रष्टचरित्रता थी ही। पीठपर लात जमानेके लिये लात और पीठसे पहले पीठ जमानेवाला लात सदासे ईश्वरके अन्त:स्थलमें विद्यमान था’ और दूसरे दलने उत्तर दिया कि ‘नहीं, सेवोंसे ही सेव जातिकी धारणा होती है, केलोंसे ही केला जातिका अस्तित्व है। साधुओंसे ही साधु-जाति, लालच तथा भ्रष्ट-चरित्रताकी उत्पत्ति है। लात जमाने और खानेके बाद ही पीठपर लातका कोई अर्थ होता है। बस खिलाड़ी गरम हो गये और घूँसा चलने लगा। मैं दूसरे दलका पृष्ठ-पोषक था; क्योंकि उसका मत मेरे लिये बुद्धिग्राह्य था और सोवासोंकी बैठकने इस मतको अग्राह्य बनाया (रिवोल्ट ऑफ ऐंजिल्स)।’ ‘प्रज्ञावादी दृष्टिकोणसे वैज्ञानिक ज्ञानका चिह्न है, इसके प्रतिपाद्योंकी व्यापकता और अवश्यम्भाविता। व्यापकताका अर्थ है कि सिद्धान्तका प्रयोग बिना व्यतिक्रमके हमारे सब अनुभवोंपर हो सके और अवश्यम्भाविताका अर्थ है कि सब मनुष्योंकी बुद्धि ऐसे सत्यको ग्रहण करनेके लिये उनको बाध्य करे। लेकिन प्रज्ञावादीको कार्यकारण-सम्बन्धोंका एक सूत्रबद्ध सिलसिला कहाँसे मिल जाता है, जो उनके अनुसार वस्तुओंके भ्रमपूर्ण चित्रोंके मूलमें है? इन विचारोंके स्पष्ट और स्वयं सिद्ध तथा तर्कसंगत होनेसे ही ऐसा क्यों अनुमान किया जाय कि ये बाहरी दुनियाकी सच्ची तस्वीरें हैं? लेनिनके शब्दोंमें इस रहस्यका इस प्रकार उद्घाटन हो जाता है। करोड़ों बार दुहरानेसे मनुष्यके अभ्यास और अनुभव चेतनामें तर्क संकेतका रूप धारण कर लेते हैं। तथाकथित तर्कसंगत विचारके सार्वभौमरूपोंका ऐतिहासिक आधार यही है।’ वस्तुत: यह परिभाषा अन्योन्याश्रय-दोषसे युक्त है। ज्ञानका निश्चय होनेपर ही ज्ञान-सम्बन्धका निश्चय होगा और ज्ञान-सम्बन्ध निश्चय होनेसे ज्ञानका निश्चय होगा। साथ ही ज्ञान और चेतना—दोनों एक ही वस्तु हैं; फिर ‘ज्ञान-सम्बन्धोंकी चेतना ज्ञान है,’ इसका यह अर्थ हुआ कि ज्ञान-सम्बन्धोंका ज्ञान ही ज्ञान है। इस तरह आत्माश्रय दोष भी है। जबतक ज्ञान नहीं विदित है, तबतक ज्ञान-सम्बन्धोंका भी ज्ञान कैसे होगा? इसी प्रकार ‘वस्तुविषयक, आत्मविषयक तथा जीवधारी मनुष्यके रूप और बाहरी दुनियाके चेतनाको ज्ञान कहते हैं’, यह परिभाषा भी अपूर्ण है; क्योंकि ज्ञान और चेतना दोनों एक ही वस्तु हैं। फिर ‘ज्ञानके लक्षणकी जिज्ञासा अमुक सम्बन्धकी चेतना ज्ञान है’, इतना कह देनेसे वह कैसे पूर्ण होगी? इसके अतिरिक्त सम्बन्ध-चेतना यदि ज्ञान है तो प्रश्न होगा कि वस्तु-चेतना ज्ञान है या नहीं? सम्बन्ध-चेतना ही वस्तुकी चेतना है, यह कहना भी असंगत है; क्योंकि सम्बन्ध सम्बन्धीसे भिन्न ही होता है। अतएव सम्बन्ध-सम्बन्धीका आधाराधेय भाव होता है। जैसे घट-ज्ञान पट-ज्ञानका लक्षण नहीं होता, उसी तरह वस्तु-सम्बन्ध-ज्ञान वस्तु-ज्ञानका लक्षण नहीं हो सकता। इसी प्रकार बाहरी दुनियाके व्यापक और विशिष्ट तफसीलोंके बीचका सम्बन्ध भी ज्ञान नहीं कहा जा सकता। सम्बन्ध द्विष्ठ होता है; अर्थात् दो सम्बन्धियोंमें रहता है, जैसे संयोग। जिन दो वस्तुओंका संयोग होता है, उन दोनोंमें ही सम्बन्ध रहता है। ज्ञान आत्मामें ही रहता है। इसके अतिरिक्त सम्बन्ध स्वयं ही ज्ञेय पदार्थ है, उसका भी ज्ञान होता है, फिर वह स्वयं ही ज्ञान कैसे हो जायगा? इसी तरह ‘दृष्टिभूत वस्तु तथा उसकी कल्पनाके बीचका सम्बन्ध जिसमें और जिसके द्वारा हम अस्तित्वका अनुभव करते हैं, वह ज्ञान है’, यह भी कहना गलत है; क्योंकि अनुभव भी तो ज्ञान ही है। चेतना, अनुभव, ज्ञान आदि पर्यायवाची शब्द हैं। उसी वस्तुका लक्षण करनेमें उसीका उपयोग होना अयुक्त है। ‘अपने और बाहरी दुनियाके बीच समता और प्रभेद दोनोंका जिन दृष्टिभूत वस्तुओं और उनकी कल्पनाओंमें अनुभव करते हैं, वह ज्ञान है’, यह भी कहना अपर्याप्त है; क्योंकि दृष्टि और उनकी कल्पनाओंका भी अन्तर्भाव ज्ञानमें ही है। अत: जबतक ज्ञान या अनुभव या चेतनाका स्पष्ट लक्षण न हो जाय, तबतक इन वाक्याडम्बरोंसे काम नहीं चल सकता। इसी तरह ‘मनन-क्रियाकी भीतरी दुनियामें विचित्र प्रकार एवं परिमाणकी समता और प्रभेदका मानचित्रमें चित्रित कर सकना और इन सबको सम अस्तित्व और अनुवर्तनक्रिया, प्रतिक्रिया, परस्परक्रिया और कार्य-कारण-निर्भरताके उचित सम्बन्धोंमें सजाने तथा व्यवस्थित करनेका नाम ही ज्ञान है’, यह कथन भी शब्दाडम्बरको छोड़कर कुछ नहीं है। वस्तुत: कल्पना, मनन-क्रिया, चित्रण करना, सजाना आदि क्रिया कर्तृतन्त्र ही होती है, परंतु ज्ञान तो कृति और इच्छासे भी पहले होता है। इसीलिये ‘जानाति, इच्छति, अथ करोति’ का व्यवहार होता है। अर्थात् कोई भी प्राणी जानता है, फिर इच्छा करता है, पुनश्च कर्म करता है। प्राणी जैसा संकल्प करता है, वैसी ही क्रिया करता है—यह पीछे कहा जा चुका है। कोई भी क्रिया चाहे वह शारीरिक हो या मानसिक, कर्ताके परतन्त्र ही होती है। किंतु ज्ञान कर्ताकी इच्छापर निर्भर नहीं होता; प्रमाणकी उपस्थितिमें कर्ताकी इच्छा न होनेपर भी ज्ञान होता है। दुर्गन्ध-ज्ञानको हम नहीं चाहते, तब भी निर्दोष घ्राणकी उपस्थितिमें दुर्गन्ध रहनेपर ज्ञान अनिवार्य ही है, यहाँ कर्ताकी स्वतन्त्रता नहीं होती है। मानस परिणाम होनेपर भी मनन-क्रिया, भावना एवं ज्ञानमें यही भेद रहता है। बाहरी दुनियाकी वास्तविकता और भीतरी दुनियाकी समता तथा भिन्नताका मनमें चित्रण करना ज्ञाता या प्रमाताका काम हो सकता है। इन सबका सम अस्तित्व और अनुवर्तनक्रिया, प्रतिक्रिया और कार्य-कारणके उचित सम्बन्धमें सजाने और व्यवस्थित करने आदिका काम भी प्रमाताका ही है, ज्ञानका नहीं। भौतिकवादियोंके यहाँ जीवित मनुष्य ही प्रमाता हो सकता है। देहसे भिन्न प्रमाता कोई आत्मा मार्क्सवादियोंको मान्य नहीं है। ज्ञान स्वयं-प्रकाश है। व्यवस्थापन करना, सजाना आदि ज्ञानका काम नहीं होता। प्रमाण भी अज्ञात-ज्ञापक होता है, अकृतकारक नहीं। इसी तरह ‘सम्बन्धकी चेतना ही ज्ञान है या वस्तु-जगत‍्के अस्तित्वोंके बीचका तथा आत्मानुभूत अस्तित्वोंके बीचका सम्बन्ध एवं इन दोनों जगतोंके बीचके सम्बन्धोंके बीचकी चेतनाका नाम भी ज्ञान है’, यह भी कथन व्यर्थ है; क्योंकि वस्तुत: अस्तित्वका स्वत: सम्बन्ध नहीं होता। अस्तित्ववाली वस्तुओंका सम्बन्ध होता है और वे सम्बन्ध ज्ञेय एवं गुणविशेष होते हैं, चेतना या ज्ञान नहीं। इसी प्रकार आत्मा मार्क्सवादमें देह-भिन्न है ही नहीं। अनुभव-ज्ञानसे भिन्न कोई वस्तु नहीं होती, फिर आत्मानुभूत अस्तित्वोंका सम्बन्ध भी स्वयं अनुभव या ज्ञानस्वरूप नहीं हो सकता। विचार वस्तु-जगत‍्को ठीक-ठीक प्रतिफलित, प्रतिबिम्बित करता है, इसकी निश्चयता ही ज्ञान है। यहाँ भी वस्तुत: वस्तुका अन्त:करणमें प्रतिफलन या प्रतिबिम्बन ही विचार या निश्चय कहलाता है। यहाँ भी निश्चय, ज्ञान, विचारादि समानार्थक हैं। यहाँ भी अन्योन्याश्रय आदि दोष उपस्थित होते हैं। भारतीय नैयायिकोंकी दृष्टिसे सर्वव्यवहारहेतु आत्मगुणको ही ज्ञान माना जाता है। सुस्पष्ट है कि संसारके सभी व्यवहार तथा व्यापार ज्ञानमूलक हैं। संसारमें अकामकी कोई भी क्रिया नहीं होती और सभी काम संकल्पमूलक ही होते हैं। &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;ान्तकी दृष्टिसे काम, संकल्प, विचिकित्सा, श्रद्धा, अश्रद्धा, ह्री, धी, भय—ये सभी मनके धर्म हैं। नैयायिकोंके तथा वैशेषिकोंके अनुसार आत्ममन:संयोगसे उत्पन्न होनेवाले ये सब आत्माके ही गुण हैं।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>ज्ञानप्रेम</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सवाद</category><category>मूलप्रकृति</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>9.7 गुण-परिवर्तन ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/9-7-gunn-privrtn-maarksvaad/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/9-7-gunn-privrtn-maarksvaad/</guid><description>9.7 गुण-परिवर्तन ‘पूँजीवादमें समाज और प्रकृतिका विरोध तो विद्यमान रहता है; लेकिन इस विरोधके विशिष्टरूपका निराकरण होता है भौगोलिक परिवेष्टनके गुणोंद्वारा नहीं; बल्कि पूँजीवादके विकासके मूल नियमोंके…</description><pubDate>Wed, 11 Jun 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;9.7 गुण-परिवर्तन&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;‘पूँजीवादमें समाज और प्रकृतिका विरोध तो विद्यमान रहता है; लेकिन इस विरोधके विशिष्टरूपका निराकरण होता है भौगोलिक परिवेष्टनके गुणोंद्वारा नहीं; बल्कि पूँजीवादके विकासके मूल नियमोंके द्वारा। समाज अपने आन्तरिक नियमोंसे और अपनी उत्पादक-शक्तियोंके विकाससे हर विशेष सामाजिक संगठनोंके विशेष साधनोंद्वारा अपने भौगोलिक परिवेष्टनमें परिवर्तन करता है। जंगलोंकी कमी हो गयी है, पेड़ोंके लगाने और गिरानेपर नियन्त्रण रखा जाता है। कोयला काफी नहीं है, पेट्रोलियम उसके स्थानपर इस्तेमाल किया जाता है। चमड़ा, रेशम, ऊनकी कमी है, अत: ये कृत्रिम उपायोंसे बनाये जाते हैं। हवामें नमीकी कमी है, आबपाशीसे काम लिया जाता है। पशु और वनस्पति जगत‍्में नये रूपमें प्राप्त होते हैं; क्योंकि इनके नये किस्मकी सृष्टि होती रहती है। यदि इतना होते हुए भी पूँजीवादी समाजमें प्राकृतिक परिवर्तन इतना सीमित है तो इसका कारण प्रकृति और समाजके विरोधमें नहीं मिलेगा, बल्कि पूँजीवादी उत्पादक सम्बन्धोंमें मिलेगा, जो उत्पादक-शक्तियोंका पूरा-पूरा विकास नहीं होने देता। समाजवादमें ही यह प्राकृतिक परिवर्तन पूर्णरूपमें सम्भव है, जिसमें मुनाफाके लिये नहीं, उपभोगके लिये पदार्थ बनाये जाते हैं।’ ‘किसी वस्तुकी मूल गति ही उसके गुणका निर्देश करती है। भूत अपनी गतिसे ही असंख्य गुणोंकी सृष्टि करता है। मनुष्य, सामान्य जीवनकोष, जड पदार्थ—सभी एक ही भौतिक विकासकी चढ़ती सीढ़ीके कदम हैं और ये कदम भिन्न गुणसम्पन्न हैं। प्रत्येक गतिमें यान्त्रिक गति सम्मिलित है और इसके कारणभूत कणोंकी सजावटमें भिन्नता आ जाती है। इन यान्त्रिक गतियोंको समझना विज्ञानका पहला काम है; लेकिन यह केवल पहला ही कदम है। यान्त्रिक गतिसे व्यापक गतिका अन्त नहीं हो जाता। गति केवल स्थान-परिवर्तनमात्र नहीं है। यन्त्र-राज्यसे ऊपर यह गुणका भी परिवर्तन है। यान्त्रिक गति हर उच्च प्रकारकी गतिका एक आवश्यक अंग है, यद्यपि यह गतिके और गुणोंकी भी सृष्टि करती है। रासायनिक क्रियाके साथ उत्ताप और वैद्युतिक परिवर्तनका निरन्तर संयोग है। सावयव जीवन बिना यान्त्रिक, कणिक, रासायनिक उत्ताप और बिजली-सम्बन्धी परिवर्तनोंके असम्भव है। लेकिन प्रत्येक क्षेत्रोंमें इन समवर्तमान रूपोंसे मूलरूपके तत्त्वका भण्डार चुक नहीं जाता।’ ‘इसमें कोई सन्देह नहीं कि विशिष्ट गुणसम्पन्न भूतकी नयी अवस्थाका आविष्कार गतिके एक नये प्रकारका आविष्कार होगा। परिणामकी वृद्धिसे वस्तुविशेषका गुण अपने विपरीतमें परिवर्तित हो जाता है। जैसे, निर्विरोध प्रतियोगिता पूँजीवादका और साधारणत: पण्य-उत्पादनका मौलिक गुण है। एकाधिकार इसका ठीक उलटा है। लेकिन हम अपनी आँखके सामने प्रतियोगिताको एकाधिकारमें रूपान्तरित होते देख रहे हैं, जिससे बड़े पैमानेपर उत्पादनकी सृष्टि होकर छोटी फैक्टरियाँ दबती जा रही हैं और उत्पादन बड़े-से-बड़े पैमानेपर होकर अन्तमें पूँजी और उत्पादनका इस प्रकार एकत्रीकरण हो जाता है कि इसका परिणाम एकाधिकार हो जाता है।’ (लेनिनका साम्राज्यवाद) वस्तुत: समाज और प्रकृतिमें विरोध नहीं होता; क्योंकि प्रकृतिद्वारा समाजका विकास एवं उपोद्वलन होता है; प्रकृतिसे ही सम्पूर्ण प्रकारकी सुविधा प्राप्त होती है। समाजद्वारा उपयोग करते-करते जो प्राकृतिक वस्तुओंकी कमी होती है, इसे विरोध नहीं कहा जा सकता। पृथ्वीसे घटादिका निर्माण होता है, मृत्तिकाका उपयोग होता है; फिर भी घटादि कार्य प्रकृतिविरोधी नहीं समझे जाते। कारणसे कार्यकी उत्पत्ति होती है, किंचित् कारणांशका उसमें उपक्षय भी होता है। माता-पितासे सन्तानोंकी उत्पत्ति होती है, वहाँ भी किंचित् उपक्षय होता है, तथापि यहाँ विरोध नहीं समझा जाता। जंगलोंकी कमी रोकनेके लिये पेड़ लगाना तथा गिरानेपर नियन्त्रण करना, कोयलेकी कमी होनेपर पेट्रोलियमका प्रयोग आदि समाज अपना काम चलानेके लिये करता है, इसे विरोध-निराकरण नहीं कहा जा सकता। अन्तत: प्राकृतिक परिवर्तनोंसे उन-उन कमियोंकी पूर्ति होती है, जैसे खेतोंकी उर्वराशक्ति अधिक फसल उपजानेसे नष्ट हो जाती है, तदर्थ कृत्रिम खाद डालने आदि उपायोंसे उर्वराशक्ति बढ़ायी जाती है, परंतु कुछ समयतक फसल न उपजानेसे या बाढ़ आदि प्राकृतिक परिवर्तनसे पुन: उर्वराशक्तिकी वृद्धि हो जाती है। इसी तरह अतिवृष्टि, अनावृष्टि, भूकम्प, महामारी, युद्ध, खण्ड प्रलयादिद्वारा प्राकृतिक परिवर्तन होता है। काल-क्रमसे कितने ही अरण्य नगर तथा नगर अरण्य हो जाते हैं। इन परिवर्तनोंकी दृष्टिसे शताब्दि तथा सहस्राब्दिका काल अत्यल्प है। पशुओं तथा वनस्पतियोंके कृत्रिम कलम एवं नस्ल-सुधारद्वारा नया रूप प्राप्त होता है, यह मनुष्यकी कृतिकी विशेषता है। इसमें भी प्रकृतिके सहयोगसे ही काम चलता है। वस्तुत: ईश्वरका अंश ही जीव है। ईश्वरकी ज्ञान-क्रिया-शक्तिका ही अंश जीवकी ज्ञान-क्रिया-शक्ति है; इसीलिये ईश्वरके तुल्य अनेक वस्तुओंकी निर्माणशक्ति मनुष्य आदि जीवोंमें भी उपलब्ध होती है। इस तरह प्राकृतिक वस्तुओंकी कमी होनेपर मनुष्य प्राकृतिक वस्तुओंके सहारे प्रकारान्तरसे कमी पूरी करनेका प्रयत्न करता है। उत्पादक-शक्तियोंके विकासके मूलमें समाजवाद या पूँजीवाद नहीं है। किंतु आवश्यकताकी अनुभूति तथा तदनुकूल प्रयत्नपरायणता ही है। इसीलिये &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;ों, पुराणोंसे विदित होता है कि आध्यात्मिक धार्मिक विस्तारके समय भी उत्पादकशक्तियोंका पर्याप्त विकास था। फिर भी बेकारी आदिका कारण होनेसे उसे अधिक सार्वजनिक रूप नहीं दिया गया। आज भी समाजवादी रूसकी अपेक्षा पूँजीवादी अमेरिकामें उत्पादक-शक्तियोंका कम विकास नहीं कहा जा सकता। समाजके उपभोगको ही लक्ष्य बनाकर उत्पादन-साधनोंका विकास &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;प्रणालीमें मान्य होता है, किंतु उससे मुनाफा आनुषंगिक रूपमें ही प्राप्त होता है। उपभोगसे अधिक माल बननेसे मालकी खपतमें कमी होनेसे सुतरां उद्योगपतियोंकी अन्य अपेक्षित वस्तुओंके उत्पादनमें प्रवृत्ति स्वाभाविक है। भूतोंकी स्वयं गति असिद्ध है। अचेतनकी प्रवृत्ति चेतनसे ही अधिष्ठित होती है। सत्त्व, रज आदि गुण; वायु, तेज, जल आदि भूतोंकी स्वयं गति निर्विवाद नहीं है। चेतनाधिष्ठित भूतोंकी गतिका भी गुणात्मक परिणाम सीमित है; निस्सीम नहीं। इसीलिये तैजस परिणाम चक्षुसे ही रूपका &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-paashcaaty-drshn-1-1-drshnkii/&quot;&gt;दर्शन&lt;/a&gt; होता है, पार्थिव घ्राणेन्द्रियसे नहीं। इसीलिये भूतोंका गुणात्मक परिणाम होनेपर भी भूतोंसे चैतन्यकी उत्पत्ति नहीं होती है। जैसे पटात्मक परिणामके लिये तन्तुमें ही शक्ति है, वायुमें नहीं। तिलसे ही तेल होता है, बालूसे नहीं। उसी तरह जड भूतोंका शब्दादि गुण-परिणाम सम्भव है, किंतु चैतन्यभूतोंका परिणाम नहीं सिद्ध होता। भले ही भूत तथा भौतिक देह, दिमाग, मस्तिष्क आदिके होनेपर ही चैतन्यका उपलम्भ होता है, तथापि इतने मात्रसे चैतन्य भूतका धर्म नहीं सिद्ध हो सकता; क्योंकि यदि अन्वयमात्रसे ही गुण-धर्मनिर्णय हो, तब तो आकाशके रहनेपर भी सब कार्य होते हैं, फिर तो गन्धादि भी आकाशके धर्म समझे जाने चाहिये। अत: अन्वय-व्यतिरेक—दोनोंके घटनेपर ही कारण-कार्य-भाव या धर्म-धर्मीभावका निर्णय होता है। प्रस्तुत प्रसंगमें अन्वय व्यभिचरित है। घटादिमें एवं मृत शरीरमें भूत रहता है, किंतु वहाँ चैतन्यका उपलम्भ नहीं होता। ‘विशिष्ट अवस्थायुक्त अन्नसे मदशक्तिकी तरह विशिष्ट अवस्थावाले भूतोंसे ही चैतन्यकी उत्पत्ति होती है’, यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि अन्नमें मदशक्ति पहले भी रहती है। यह अनशनके पश्चात् अन्न लेनेसे स्पष्ट प्रतीत होता है। यदि बालूमें तेलकी तरह वह पहले न हो तो किसी भी अवस्थामें उसका प्राकटॺ नहीं हो सकता। भूतोंमें चैतन्यका अस्तित्व होता तो अवश्य ही वह घटादिमें भी उपलब्ध होता। व्यतिरेक तो सर्वथा ही संदिग्ध रहता है। भूतोंके न रहनेपर चैतन्य रहता ही नहीं, इसीलिये अनुपलम्भ है अथवा रहता हुआ भी अभिव्यंजक भूत न होनेसे अनुपलम्भ होता है? सुस्पष्ट है कि लोहा, लक्‍कड़, तार आदि पार्थिव जलीय पदार्थ अग्निके अभिव्यंजक हैं। अतएव उनके न रहनेपर अग्निके रहते हुए भी अभिव्यक्ति नहीं होती। इसी तरह देह, दिल, दिमाग आदि आत्मचैतन्यके व्यंजक हैं; अतएव उनके न रहनेपर आत्मचैतन्यकी रहते हुए भी अभिव्यक्ति नहीं होती। भूतोंकी यान्त्रिक गति और व्यापक गतिमें वास्तविक भेद नहीं है। व्यष्टि चेतन मनुष्यादिद्वारा यान्त्रिक गति बनती है। समष्टि ईश्वर चेतनद्वारा व्यापक गति बनती है। सर्वथापि चेतनके बिना भूत या गुण किसीकी स्वाभाविक गति नहीं हो सकती। गुणात्मक परिवर्तन भी यन्त्र-राज्यके बहिर्भूत नहीं है। तन्तुसे पट, जलसे बर्फ या भाप आदिका निर्माण यान्त्रिक गतिसे सम्पन्न होता ही है। वस्तुत: प्रत्यक्षानुमानद्वारा विदित भूत ही प्रकृति नहीं है। किंतु प्रत्यक्षानुमानसे अज्ञात अपौरुषेय तथा आर्षशास्त्रोंसे विज्ञात भूत एवं उससे भी अधिक उच्च स्तरकी सत्त्व, रज, तम आदिकी साम्यावस्थारूप प्रकृति अत्यधिक सूक्ष्म है और उसका भण्डार सचमुच अखण्ड है। उसीसे सबकी कमियोंकी पूर्ति होती रहती है। उसी कारण धरतीसे अगणित अपरिमित अन्नोंके उपजानेपर भी उसका भण्डार नहीं टूटता। उत्ताप एवं वैद्युतिक परिवर्तन सबकी यान्त्रिक गतिपूर्वक ही है। यह जैसे मान्य है, वैसे ही अन्य परिवर्तनोंमें भी ईश्वरीय या मानवीय यान्त्रिक गति ही काम देती है। इसीलिये विशिष्ट गुणसम्पन्न भूतकी प्रत्येक अवस्था चेतनद्वारा ही आविष्कृत होती है। विपरीत गुणमें परिवर्तन भी यान्त्रिक गतिका ही परिणाम है। निर्विरोध प्रतियोगिता या एकाधिकार अपनी-अपनी सीमामें गुण है। राम-राज्य-प्रणालीमें जहाँ विकासके लिये प्रतियोगिता गुण है, वहाँ वह नि:सीम भी नहीं है। इसीलिये तो महायन्त्रोंके निर्माणपर प्रतिबन्ध आवश्यक समझा गया है। प्रतियोगितापर भी नियन्त्रण अपेक्षित माना गया है, उत्पादनके केन्द्रीयकरणकी अपेक्षा विकेन्द्रीकरणको रामराज्य-प्रणाली अधिक महत्त्व देती है, परंतु समाजवादमें उलटा महायन्त्रोंका अधिकाधिक विकास करके छोटी फैक्टरियोंका अस्तित्व सर्वथा ही समाप्त कर दिया जाता है। समाजवादियोंका फैसला तो बन्दरबाँटका फैसला है। मजदूरों तथा छोटी फैक्टरियोंका पक्ष लेकर मिलमालिकों एवं बड़े-बड़े कल-कारखानोंको भला-बुरा कहते-कहते बड़े-छोटे सब कारखानों, मालिक-मजदूर, किसान, जमींदार सभी भूमि-सम्पत्ति, उद्योग-धन्धोंको राष्ट्रियकरणके नामपर छीन लेते हैं। समाजवादी समाजके नामपर ऐसा भीषण तानाशाही एकाधिकार स्थापित करते हैं कि सबकी भूमि, सम्पत्ति, कल-कारखानोंको छीनकर लेखन, भाषणकी स्वतन्त्रता छीनकर सभीको परतन्त्रताके बन्धनोंमें जकड़ देते हैं। कहा जाता है कि ‘गुणसे परिणामके परिवर्तनका साधारण उदाहरण है अच्छा बीज, जिसके बोनेसे उपजका परिमाण बहुत बढ़ जाता है। इसी तरह रूसकी सामूहिक खेती इसका दूसरा उदाहरण है, जिसके कारण भी उपजका परिमाण बहुत बढ़ जाता है। लेवीने गुणपरिवर्तनके सम्बन्धमें वस्तुओंको दो श्रेणियोंमें विभक्त किया है। कणिक (वैयक्तिक, आटोमैटिक) तथा सामूहिक (स्टैटिस्टिकल) और गुण-परिवर्तनको चार श्रेणियोंमें विभक्त किया है।’ १-कणिक-से-कणिक (वैयक्तिक-से-वैयक्तिक)। २-सामूहिक-से-सामूहिक। ३-कणिकसे सामूहिक। ४-सामूहिकसे कणिक। उदाहरण १-(क) मनुष्यकी बाल्यावस्थासे वृद्धावस्था। (ख) खनिज पदार्थ—प्राकृतिक अवस्थासे व्यावहारिक वस्तुके रूपमें। (ग) जमीनका टुकड़ा जिसका व्यावहारिक मूल्य सामाजिक विकासके कारण बढ़ गया हो। २-आस्ट्रेलियामें भेजा गया खरगोशका पहला जोड़ा, जहाँ अब उनका ढेर एक उत्पात बन गया है। ३-एक धूपका ‘दिन’, बहुत-से धूपके दिन सूखा। ४-इसमें सभी वे उदाहरण हैं, जिसमें समूह टूटकर अलग-अलग हो जाते हैं, जैसे एक परिवारका टूटना। ‘परिवर्तनकी कल्पनाके लिये ये उदाहरण सहायक हैं, लेकिन यह ध्यान रहे कि सभी उदाहरण द्वन्द्वात्मक परिवर्तनके उदाहरण नहीं। इसी प्रकार लेवीने उद्भिज्जराजके दो उदाहरण दिये हैं। १—जंगलमें सोतोंके पास एक प्रकारकी काई जमती है स्फैगमनसास, जो धीरे-धीरे जंगलको उजाड़ देती है। २—एक झील है। उसकी तहपर उद्भिज्ज सड़ते रहते हैं। तह ऊपरको उठती है और उसकी सतहपर लता तैरने लगती है। झील दलदल बन जाती है। लताओंकी जड़ें जमकर धीरे-धीरे घासका मैदान बन जाती है। हवाके झोंकोंसे बीज उड़कर लगनेसे पेड़-पौधे जम जाते हैं, फिर एक जंगल बन जाता है।’ अच्छे बीजसे, अच्छे खेतसे, अच्छी खादसे भी उपजके परिमाणका बढ़ना सर्वसम्मत है, परंतु यहाँ भी बीजादिके अच्छाईरूप गुणसे उपजका विस्तार होता है। यहाँ गुणका परिमाणके रूपसे परिवर्तन नहीं कहा जा सकता। गुण, गुण ही रहता है, वह गुण रहकर ही उपजके परिमाणकी वृद्धिका कारण बनता है। दूसरी दृष्टिसे बीजादिकी अच्छाईसे उपजकी अच्छाई होती है, उपजकी अच्छाईके स्वरूपमें ही वस्तुकी अच्छाई और संख्यावृद्धि आ जाती है। लेवीके गुण-परिवर्तनके कणिकसे कणिकका उदाहरण भी कोई चीज नहीं है। मनुष्यकी बाल्यावस्थासे वृद्धावस्था, खनिज पदार्थोंका प्राकृतिक अवस्थासे व्यावहारिक अवस्थाके रूपमें परिवर्तन होना, सामाजिक विकासके कारण भूमिके टुकड़ेका व्यावहारिक मूल्य बढ़ जाना आदिका षड्भाव-विकारमें अन्तर्भाव हो जाता है। बाल्यावस्थासे वृद्धावस्थाका परिवर्तन, वृद्धि और विपरिणामके भीतर ही है। दूसरा उदाहरण भी इसी तरहका है। तीसरा उदाहरण तो माँगपूर्तिके सिद्धान्तानुसार माँग बढ़ जानेसे मूल्य बढ़ जाना है। आस्ट्रेलियाके खरगोशके जोड़ेसे बहुत-से खरगोशोंका उत्पन्न हो जाना भी कौन-सी नयी बात है? अनुकूल परिस्थिति मिलनेसे कुत्ते, शूकर, मुर्गे आदि किसी भी जोड़ेसे सामूहिक विस्तार होता है। कणिकसे सामूहिक परिवर्तनका उदाहरण भी इसी ढंगका है। ‘एक धूपका दिन साधारण है, परंतु वही परिमाणकी वृद्धिसे होकर बहुत-सा धूपका दिन सूखा बन जाता है,’ यह भी कोई चमत्कृति नहीं है। दीपक आदिरूपमें छोटी अग्नि वायुसे बुझ जाती है, बड़ी अग्निका वायु सहायक बन जाता है। मृदु आतप रोचक होता है, तीव्र हो जानेपर वही उद्वेजक हो जाता है। अग्निका एक सीमाका संनिधान अनुकूल होता है, अन्य प्रकारका संनिधान मारक हो जाता है। सामूहिकसे कणिकका उदाहरण, समूह टूटकर अलग-अलग हो जाना, परिवार टूटकर पृथक्-पृथक् हो जाना आदि भी किसी सिद्धान्तका साधक नहीं है। विभाजनसे समूहका विशरण होना प्रसिद्ध है। इसी प्रकार लेवीका जंगलकी काईसे जंगलके उजड़ जानेका उदाहरण भी कोई अपूर्व नहीं है। शरीरसे ही उत्पन्न रोगके द्वारा शरीरका नाश हो जाता है। कई लताओंके आश्रित होते ही वृक्ष नष्ट हो जाते हैं। किसी वृक्षपर एक बाँदाकी शाखा उत्पन्न होनेसे वृक्ष नष्ट हो जाता है। इसी प्रकार झीलका जंगल बन जानेका उदाहरण भी साधारण ही है। इतना ही क्यों, भौगोलिक परिवर्तनोंसे जलमें स्थल, स्थलमें जल, पहाड़में समुद्र, समुद्रमें पहाड़ादि बनते ही रहते हैं। इन आधारोंपर केवल कारणोंकी अपेक्षा कार्योंमें अनिर्वचनीय विलक्षणतामात्र सिद्ध होती है; परंतु इनसे यह सिद्ध नहीं होता कि कारणमें अत्यन्त अविद्यमान कोई वस्तु कार्यरूपमें व्यक्त होती है। अतएव भूतसे चैतन्यकी अभिव्यक्ति आदि भी नहीं सिद्ध हो सकती।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt; और रामराज्य, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रंगपरिवर्तन</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>सद्गुणी-जीवन</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>9.6 अन्तर्विरोधपर बुखारिन ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/9-6-antrvirodhpr-bukhaarin-m/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/9-6-antrvirodhpr-bukhaarin-m/</guid><description>9.6 अन्तर्विरोधपर बुखारिन ‘एक-दूसरेकी विरोधी भिन्न कार्यकारी शक्तियाँ पृथ्वीमें वर्तमान हैं। व्यतिक्रमके रूपमें इन शक्तियोंका समीकरण होता है, तब विरामकी स्थिति होती है। यानी उनके वास्तविक विरोधपर …</description><pubDate>Tue, 10 Jun 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;9.6 अन्तर्विरोधपर बुखारिन&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;‘एक-दूसरेकी विरोधी भिन्न कार्यकारी शक्तियाँ पृथ्वीमें वर्तमान हैं। व्यतिक्रमके रूपमें इन शक्तियोंका समीकरण होता है, तब विरामकी स्थिति होती है। यानी उनके वास्तविक विरोधपर एक आवरण पड़ जाता है। लेकिन किसी एक शक्तिमें तनिकमात्र परिवर्तन करनेहीसे अन्तर्विरोधोंका पुनराभास होता है और उस समीकरणका अन्त होता है और यदि एक नये समीकरणकी सृष्टि होती है तो यह एक नये आधारपर यानी शक्तियोंके एक नये संयोगसे ही होती है। मार्क्सीय द्वन्द्वन्याय इस विरोधको भुला नहीं देता, लेकिन सामाजिक विकासमें इस विरोधको मुख्य स्थान नहीं देता। इतिहासके अध्ययनसे हम यह पाते हैं कि यद्यपि भिन्न देशोंमें भूगोल, जलवायु, उद्भिज्ज, जंगम और प्राकृतिक सम्पद‍्में परिवर्तन नहींके बराबर हुआ, तथापि वहाँके सामाजिक सम्बन्धोंमें महान् परिवर्तन हो गये, जैसे सामन्तप्रथाके स्थानपर पूँजीवादकी स्थापना।’ रूप एवं सार आदिका संघर्ष तथा परिमाणका गुणमें परिवर्तनकी कल्पना निराधार है। जीवन-मृत्युका तिरोभाव-आविर्भाव, अन्तर्ग्रहण तथा बहिर्मोचन आदि काल और विषयभिन्न होनेसे विरोध या संघर्षका प्रश्न ही नहीं उठता। ये सब चीजें समान वस्तुके विषयमें समान कालमें परस्पर विरुद्ध ठहरती हैं। कालभेदसे किसी भी वस्तुका आविर्भाव-तिरोभाव आदि निर्विरोध ही है। इसी तरह एक ही कालमें एककी मृत्यु, अन्यका जन्म आदि होनेसे कोई विरोध नहीं होता। पूर्वगृहीत वस्तुका बहिर्विमोचन, अगृहीत वस्तुका ग्रहण भी परस्पर विरुद्ध नहीं है। अत: इसे संघर्ष नहीं कहा जा सकता। पूँजीवादके अन्तर्विरोधकी कल्पना भी अतात्त्विक ही है। &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;प्रणालीसे उत्पादन तथा वितरणकी व्यवस्था होनेसे यह विरोध टिक ही नहीं सकता। धन एवं पूँजीका भेद सिद्धान्तत: अमान्य है। प्रजाके उपभोगार्थ उत्पादनसे भी लाभ आनुषंगिकरूपमें प्राप्त होता है। उत्पादन-कार्यमें लाभके अनुसार कामके घण्टोंमें कमी, मजदूरोंकी संख्याकी वृद्धि तथा मजदूरोंका भी उचित दर होनेसे न बेकारी ही रहेगी और न क्रयशक्तिमें ही कमी आयगी और न मालकी खपतमें कोई गड़बड़ी होगी। भोगोपयोगी वस्तुओंका ही निर्माण करना और मजदूरोंके समुन्नत जीवनस्तर बनानेकी जिम्मेदारी मालिकोंपर होगी। व्यक्ति, समाज तथा सरकार—सभीका अनिवार्यरूपसे यह कर्तव्य होगा कि बेकारी तथा आर्थिक असन्तुलन सर्वथा दूर कर दिया जाय। विद्रोह भी प्रचारमूलक है, वास्तविक नहीं। वर्गसहयोगकी सम्भावनाका विस्तार होनेसे विद्रोहका अन्त हो सकता है। मशीनोंकी उन्नति बाध्यतामूलक नहीं है, किंतु लोभमूलक ही है। अन्ततोगत्वा मनुके सिद्धान्तानुसार महायन्त्रोंके निर्माणपर प्रतिबन्ध भी आवश्यक होगा। जैसे विश्वका संहारकारक एवं अनिष्टकारक होनेसे हाइड्रोजन बम आदिके विकासपर प्रतिबन्ध लगाना &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt;ियोंको भी आज आवश्यक प्रतीत हो रहा है, उसी तरह बेकारी एवं संघर्ष तथा व्यक्तिगत स्वतन्त्रताका नाश होनेसे महायन्त्रोंपर भी प्रतिबन्ध लगाना आवश्यक होगा। अर्थ तथा औद्योगिक पूँजीका आपसमें कार्यकारण भाव है। दोनोंका दोनोंसे विस्तार होता है। उद्योगवृद्धिसे अर्थमें वृद्धि होती है। उससे उद्योगवृद्धिमें सहायता मिलती है। पूँजीपर सूद तो अब रूसमें भी मिलता है। पूँजी उत्पादनसाधन है, जैसे सब उत्पादनोंसे लाभ होता है, वैसे ही पूँजीसे भी सूदके रूपमें लाभ होना उचित ही है। फिर रामराज्यकी दृष्टिमें तो कुसीदवृत्ति निम्नकोटिका जीविका-साधन माना जाता है। प्रथाओं एवं क्रियाओंमें अन्तर्विरोध अप्रामाणिक है। सर्वहाराके अधिनायकत्वमें राज्यलोपकी कल्पना तो अभी स्वप्न ही है। अभी तो सर्वहाराका अधिनायकत्व भीषण तानाशाही बन रहा है। सर्वहाराके अधिनायकत्वमें वर्गका लोप केवल डण्डेके बलपर प्रतीत होता है। वस्तुत: लेखन भाषण, प्रेसकी स्वतन्त्रता न होनेसे वर्गभेद व्यक्त नहीं हो पाता। जब कभी अवकाश मिलेगा, वर्गभेद व्यक्त हो जायगा। मजदूर-किसान आदि समान वर्गोंमें भी परस्पर संघर्ष चलता ही है। सोवियत रूसमें भी कम्युनिष्टोंमें स्टालिन, ट्राटस्की आदिका भीषण संघर्ष विख्यात है। आपेक्षिक एवं पूर्ण सत्यका भी विषयभेद होनेसे विरोध असंगत है। एक ही वस्तु आपेक्षित तथा पूर्ण सत्य नहीं हो सकती, यह कहा जा चुका है। व्यापकमें कोई विरोध नहीं है—जैसे पशुत्वका गोत्वसे, मनुष्यत्वका ब्राह्मणत्वसे कोई विरोध नहीं। इसी प्रकार सभी व्यापक-व्याप्योंमें अविरोध ही है। बुखारिनका यह कथन आंशिक सत्य है कि एक-दूसरेके विरुद्ध भिन्न कार्यकारिणी शक्तियाँ पृथ्वीपर वर्तमान हैं। यह कहना उचित है कि विचित्र विश्वमें विरोधिनी तथा अनुरोधिनी अनेक प्रकारकी शक्तियाँ वर्तमान हैं। यदि विरोध ही जगत‍्का तथ्य है, तब तो सहयोगमूलक कार्य ही नहीं होना चाहिये। किंतु वैर, प्रेम, सहयोग, विरोध—सभी संसारमें चलता है। सत्त्वादि गुण परस्पर विरोधी होनेपर भी विमर्दवैचित्र्य, परस्पर सहकारसे वे भी कार्यक्षम होते हैं। गुणोंकी विषमतासे गुणोंमें सहकार होता है; समतामें विरोध होता है। सारी सृष्टि गुणोंकी विषमता एवं सहकारके आधारपर ही टिकी है। परिणामी गुणोंका समता, विषमता—दोनों ही धर्म है। प्रलयानुगुण कर्मोंकी अपेक्षासे समता तथा सृष्टिके अनुगुण कर्मोंसे विषमता होती है। संसारमें प्रेम, परोपकार, सहयोग स्वाभाविक है; विरोध, ध्वंस निम्नगामिनी प्रवृत्तियोंके परिणाम तथा प्रामादिक हैं। &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;ान्तकी दृष्टिसे सभी चराचर विश्व विशेषत: प्राणिवर्ग परमेश्वरकी ही संतान है—‘अमृतस्य पुत्रा:।’ उनका तो समानता, स्वतन्त्रता, भ्रातृता ही मुख्य स्वभाव है। विरोध ही आवरणका कारण होता है, आवरण हटते ही विरोधका कहीं पता नहीं लगता—‘उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध। निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध॥’ जो जगत‍्की स्वाभाविक मूलभूत स्वाभाविक स्थितिको पहचानते हैं, वे लोग सम्पूर्ण संसारको भगवद्‍रूप ही देखते हैं। फिर वे किससे विरोध करें? स्वाभाविक स्थितिसे अविद्या, काम, कर्मद्वारा प्रच्युति होनेपर अविद्या स्वार्थ आदिके जागरूक होनेपर फिर विरोधवैमनस्य चलता है। तभी ‘जीवो जीवस्य जीवनम्’ जीवसे ही जीवका जीवन चलता है—यह धर्म-प्रच्युतिमूलक मात्स्यन्याय फैलता है। स्पेन्सर आदिके संघर्षवादका अन्धानुकरण ही मार्क्सवादियोंका अन्तर्विरोध है। इसके अनुसार जो प्रबल होगा, उसीका जीवित रहना न्यायसिद्ध है। इसमें किसी गरीब कमजोरकी सहायता करना मूर्खता है। जो अपनेको बदली हुई परिस्थितिके अनुकूल नहीं बदल सकता, वही गरीब है। उसपर दया करना बेकार है, परंतु आजके परस्पर सहकार सहयोगके जमानेमें यह एक अत्यन्त उपहासास्पद वस्तु है। इसी तरह ‘पुराने समीकरणका अन्त तथा नये समीकरणकी नये आधारपर शक्तियोंके नये संयोगसे सृष्टि होती है’—यह कहना भी पिष्टपेषण ही है। अभ्युदयानुगुण परिवर्तनमें नये संयोगों या नये परिणामोंका अंगीकार सभीको सम्मत है ही। सामाजिक परिवर्तनोंका कारण ज्ञान, क्रिया, शक्तिका परिवर्तन ही है और उसमें भी ज्ञान-शक्तिका विकास ही मुख्य है। भौगोलिक तथा वातावरणका परिवर्तन भी इन नये परिवर्तनोंमें कारण होते हैं। जो लोग उत्पादन-साधनोंके परिवर्तनोंके आधारपर ही सामाजिक परिवर्तन मानते हैं, उन्हें भी उत्पादन-साधनोंके परिवर्तनका कारण ढूँढ़ना पड़ेगा और अन्ततोगत्वा बुद्धिपर ही आना पड़ेगा। बुद्धिमें कारण शिक्षण तथा अभ्यास ही होता है। आरम्भमें शिक्षण, अन्तमें अभ्यास और अन्वेषणके ही प्राखर्यसे बुद्धिका विकास होता है। बुद्धिविकाससे धन-धान्य-समृद्धिके कारण यन्त्रोंका भी विकास होता है और उसके बिना भी आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक क्षेत्रमें विकास होता है; इसीलिये कल-कारखानोंके विकासके बिना भी प्राचीन भारतमें आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक विकास उच्चकोटिका हुआ था। यद्यपि महायन्त्रोंका विकास प्राचीनकालमें भी हुआ था, तथापि उसका दुष्परिणाम देखकर उसे उपपातक निश्चितकर उसपर प्रतिबन्ध लगा दिया गया। फिर भी विशिष्ट शस्त्रास्त्र, विमान, रथ तथा शिल्पकलादिका विकास मय, विश्वकर्मादिद्वारा होता ही रहा। अत: यह नहीं कहा जा सकता कि भाप या बिजलीकी चक्‍की तथा कपड़ों, लोहों, ताम्रादिके बड़े-बड़े कल-कारखानोंके विकासके बिना धार्मिक, सामाजिक विकास या कोई उन्नति नहीं होगी। वस्तुत: व्यापक इतिहासके महान् क्षेत्रमें सामन्तवाद और पूँजीवाद-जैसी प्रथाओंका कोई बड़ा महत्त्व नहीं है। प्रमाद-पुरुषार्थ, सुव्यवस्था-दुर्व्यवस्थाके अनुकूल ही अनुकूल-प्रतिकूल परिवर्तन होते रहते हैं। मार्क्सवादियोंके सामने केवल कुछ शताब्दियोंका ही इतिहास है। यदि शताब्दियोंके इतिहासमें इतने परिवर्तन हुए हैं, तो सहस्राब्दियों एवं लक्षाब्दियोंके इतिहासमें क्या-क्या परिवर्तन हुए होंगे, इसका भी तो विचार करना चाहिये। आस्तिकोंकी दृष्टिसे मनुष्यलोकमें ही नहीं, किंतु देवलोकके भी विकास तथा अभ्युदयकी पराकाष्ठा निर्धारित ही है और परम उत्कर्ष कैवल्य—अपवर्गका भी स्वरूप निश्चित है। तैत्तिरीय, बृहदारण्यक, कौषीतकि आदि उपनिषदों, इतिहास, पुराणोंमें लौकिक-पारलौकिक उन्नति तथा परम नि:श्रेयसके स्वरूप निर्धारित हैं। अन्तमें कहा गया है कि अचिन्त्य अनन्त स्वरूपभूत परमानन्द सुधासिन्धुका एक तुषारमात्र आनन्द ही अनन्त ब्रह्माण्डके धर्मिष्ठ सार्वभौम सम्राट्, मनुष्यगन्धर्व, देवगन्धर्व, कर्मदेव, आजानदेव, इन्द्र, बृहस्पति, प्रजापति, ब्रह्मादिके उत्तरोत्तर प्रकृष्ट आनन्दके रूपमें वितरित होता है। मनुष्यलोकके उत्कर्ष-अपकर्षकी कोई ऐसी अवस्था नहीं, जो इन करोड़ों वर्षोंमें न आयी हो; अत: शताब्दियोंकी परिवर्तनपरम्परा कोई अभूतपूर्व घटना नहीं है।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और रामराज्य, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अन्तर्विरोध</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>धर्मसम्राट</category><category>बुखारिन</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>9.5 अतिभौतिकवाद और द्वन्द्वमान ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/9-5-atibhautikvaad-aur-dvndv/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/9-5-atibhautikvaad-aur-dvndv/</guid><description>9.5 अतिभौतिकवाद और द्वन्द्वमान अतिभौतिकवादी विचारमें—‘प्रकृति वस्तुओं और दृश्यगत घटनाओंका एक आकस्मिक बटोर है, जहाँ वे एक-दूसरेसे विच्छिन्न तथा स्वतन्त्र हैं।’ इसके विपरीत द्वन्द्वमान इन वस्तुओं और…</description><pubDate>Mon, 09 Jun 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;9.5 अतिभौतिकवाद और द्वन्द्वमान&lt;/h3&gt;
&lt;p&gt;अतिभौतिकवादी विचारमें—‘प्रकृति वस्तुओं और दृश्यगत घटनाओंका एक आकस्मिक बटोर है, जहाँ वे एक-दूसरेसे विच्छिन्न तथा स्वतन्त्र हैं।’ इसके विपरीत द्वन्द्वमान इन वस्तुओं और दृश्यमान घटनाओंको एक सूत्रमें बाँधता है, जिसमें उनकी पारस्परिक निर्भरता प्रकाश पाती है। इसलिये द्वन्द्वमानके अनुसार किसी प्राकृतिक घटनाको स्वतन्त्ररूपसे, अपने बहिरावेष्टनसे अलगकर नहीं समझा जा सकता; क्योंकि वे इन बहिरावेष्टनोंसे सम्बन्धित हैं और अपनी पारिपार्श्विक अवस्थाद्वारा सीमित हैं। अतिभौतिकवादके विपरीत द्वन्द्वमान यह मानता है कि प्रकृतिकी अवस्था स्थिर और गतिहीन नहीं है, बल्कि अविराम गति और परिवर्तनकी अवस्था है, अविराम नवीन और विकासकी अवस्था है, जहाँ किसी-न-किसी चीजका उत्थान और विकास होता है और किसी-न-किसी चीजका ध्वंस और निर्माण। इसलिये द्वन्द्वमानके तरीकेकी यह माँग है कि दृश्यगत घटनाओंका विचार न केवल उनके पारस्परिक सम्बन्ध और उनकी पारस्परिक निर्भरताके दृष्टिकोणसे होना चाहिये, बल्कि उनकी गति, उनका परिवर्तन, विकास, आविर्भाव और अन्तर्धानकी दृष्टिसे भी होना चाहिये। द्वन्द्वमानका तरीका मुख्यरूपसे उसको महत्त्व नहीं देता, जो उस मुहूर्तमें स्थायी और दृढ़ मालूम होता है, लेकिन जिसका अन्त होना आरम्भ हो गया हो; बल्कि उसको जिसका उत्थान और विकास हो रहा हो, यद्यपि उस क्षणमें वह भंगुर ही मालूम पड़ रहा है; क्योंकि द्वन्द्वमान उसीको अजेय मानता है, जिसका उत्थान और विकास हो रहा हो। एंजिल्सके शब्दोंमें सारी प्रकृति, छोटी-से-छोटी लेकर बड़ी-से-बड़ी चीज, एक बालूके कणसे सूर्यतक, प्रोटिस्टा (प्राथमिक जीवित कोष)-से मनुष्यतक, लगातार आविर्भाव और तिरोधानकी अवस्थामें है, सदा परिवर्तनशील है और परिवर्तनकी अवस्थामें है, इसलिये एंजिल्सका कहना है कि द्वन्द्वमान वस्तुओं और उनके मानसिक प्रतिबिम्बोंको उनके पारस्परिक सम्बन्ध और संयोगमें उनकी गति, उनके उत्थान और अन्तर्धानमें देखता है। ‘अतिभौतिकवादके विपरीत द्वन्द्वमान विकासकी क्रियाको सामान्य वृद्धिके रूपमें, जहाँ परिमाणकी वृद्धि और ह्राससे गुणोंका परिवर्तन नहीं होता, नहीं देखता, बल्कि ऐसे विकासके रूपमें देखता है, जो नगण्य और अदृश्य परिवर्तनसे बुनियादी गुणोंके परिवर्तनके रूपमें परिणत होता है। इस विकासमें गुणात्मक परिवर्तन धीरे-धीरे नहीं होता, बल्कि एकाएक और द्रुतगतिसे; जो एक अवस्थासे दूसरी अवस्थामें कुदानका रूप लेता है। यह आकस्मिकरूपसे घटित नहीं होता, बल्कि क्रमवर्धमान परिमाणात्मक परिवर्तनोंके संग्रहका परिणाम है। द्वन्द्वमानके तरीकेके लिये यह आवश्यक है कि इस विकासकी क्रियाको हम चक्रगतिके रूपमें न देखें, न इस रूपमें कि जो कुछ पहले घटित हो चुका है, उसकी सामान्य पुनरावृत्ति हो रही है, बल्कि एक अनुगति और ऊर्ध्वगतिके रूपमें, एक गुणात्मक अवस्थासे दूसरी नयी गुणात्मक अवस्थामें परिवर्तनके रूपमें, साधारणसे असाधारण, निम्नस्तरसे उच्चस्तरपर विकासके रूपमें देखना चाहिये।’ अवश्य ही वस्तु-वैचित्र्य विचार-विस्तारमें उपयोगी है, फिर भी वस्तु बिना भी स्वप्नों, मनोरथोंमें विचार, विस्तार परिलक्षित होते हैं, परंतु विचार बिना तो वस्तुका विकास असम्भव ही है। जैसे वैज्ञानिक यन्त्र, रासायनिक तत्त्वोंका विकास, विश्लेषण विचारप्रभूत हैं, वैसे ही प्राकृतिक, भौतिक गति या विकास भी ईश्वरीय विचारमूलक ही हैं। इसीलिये— ‘तदैक्षत बहु स्यां प्रजायेयेति’ (छां० उ० ६।२।३) —इत्यादि वचनोंसे उपनिषदोंमें स्पष्टरूपसे कहा गया है कि स्वप्रकाश, सत्, चेतनने ही ईक्षणपूर्वक विश्व-निर्माण किया। द्वन्द्वमानके जादूसे जड-प्रकृति या जड-भूतोंमें स्वत: चन्द्र, सूर्य आदि निर्माणकी क्षमता नहीं सिद्ध होती। पशु-मनुष्य एवं उसके दिव्य मस्तिष्क आदि यदि केवल भूतोंका ही करिश्मा है, तो विविध यन्त्रोंके निर्माणके लिये भी चेतन मनुष्यकी अपेक्षा न होनी चाहिये। अध्यात्मवादमें प्रकृति, वस्तुओं एवं घटनाओंका आकस्मिक बटोर नहीं है। यह कल्पना तो असमीक्ष्यकारी जडमें ही हो सकती है। अध्यात्मवादमें तो संसारके किसी पदार्थकी चेष्टा कर्मसापेक्ष ईश्वरके विचारसे ही होती है। किसी भद्दे पाश्चात्य अध्यात्मवादमें प्रकृतिको वस्तुओं एवं घटनाओंका आकस्मिक बटोर कहा जा सकता है। &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt;का प्रकृति शब्द भी भ्रामक है, वस्तुत: वे सांख्योंकी प्रकृतितक पहुँच भी नहीं सके हैं। वे तो भूतों, परमाणुओं तथा उसके कतिपय विश्लेषणोंतक ही पहुँच सके हैं। अध्यात्मवादियोंकी दृष्टियोंसे आकाशसे भी सूक्ष्म शब्द तन्मात्रा और उससे भी सूक्ष्म अहं, अहंसे भी सूक्ष्म महत्तत्त्व, महत्तत्त्वसे भी सूक्ष्म प्रकृति है। इसका विस्तृत विवेचन अन्यत्र किया जा चुका है। प्रपंचकी विचित्रतासे सम्बन्धकी भी विचित्रता होती है, अतएव विच्छिन्न, अविच्छिन्न, स्वतन्त्र, अस्वतन्त्र—अनेक प्रकारके पदार्थ संसारमें होते हैं। प्रत्येक भोग्य पदार्थ भोक्तृसम्बद्ध होते हैं। प्रत्येक कार्य कारणसम्बद्ध भी होते हैं। साथ ही अनेक पदार्थ परस्पर सम्बद्ध होते हैं, कई असम्बद्ध होते हैं। कई अनुकूल सम्बन्धवाले, कई प्रतिकूल सम्बन्धवाले होते हैं। भौतिकवादी सम्मत-प्रपंचकी अप्रामाणिक एक सूत्रबद्धताकी अपेक्षा ईश्वर, काल, कर्म तथा भोक्तासे उसकी सम्बद्धता कहीं श्रेष्ठ है। घटनाओंके सम्बन्धमें भी यही बात कही जा सकती है। संसारमें कितने ही पदार्थ उत्पन्न होकर नष्ट हो जाते हैं, उनका परम्परासे भी परस्पर सम्बन्ध नहीं होता; फिर प्रत्येक पदार्थको परस्पर निर्भर कैसे कहा जा सकता है? द्वन्द्वमानमें ही नहीं, किसी भी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-paashcaaty-drshn-1-1-drshnkii/&quot;&gt;दर्शन&lt;/a&gt;में किसी वस्तुको समझने, पहचाननेके लिये अपेक्षित अंगोपांगका ज्ञान सम्पादित किया जाता है। किसी रोगको समझनेके लिये उसके निदान, आहार-विहार, देश-काल, साक्षात् या परम्परासे प्रभाव डालनेवाले पदार्थों तथा घटनाओंपर विचार किया ही जाता है। इसी प्रकार सम्बन्धित सभी घटनाओंके सम्बन्धमें विचार किया ही जाता है। प्रकृतिकी अविराम गति और प्राचीनका तिरोभाव, नवीनका आविर्भाव आदि कल्पनाएँ सांख्योंकी ही हैं। इसी आविर्भाव-तिरोभावको निर्माण तथा ध्वंस कहा जा सकता है। अवश्य ही सांख्यके मतानुसार सत‍्का ही आविर्भाव-तिरोभाव होता है; अत्यन्त असत‍्का नहीं— ‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:।’ (गीता २।१६) यह कोई द्वन्द्वमानका नया दृष्टिकोण नहीं है। सभी विचारक किसी भी घटनामें आविर्भाव-तिरोभावके विचारको आदर देते हैं। जिसकी आयति (भविष्य) उत्तम होती है, वही महत्त्वपूर्ण होता है। इसीलिये द्वितीयाके चन्द्रका वन्दन किया जाता है; क्योंकि वह उत्तरोत्तर वर्धमान दशामें रहता है। आयतिशून्य पूर्णिमाका पूर्ण चन्द्र भी इतना मांगलिक नहीं माना जाता; क्योंकि उसके अभ्युदयके दिन समाप्त हो चुके होते हैं, अब उसका उत्तरोत्तर ह्रास ही होनेवाला है—‘प्रतिपच्चन्द्रमिव प्रजा:।’ फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि जो ह्रासको प्राप्त हो रहा है, अब उसका विकास होगा ही नहीं। देखते ही हैं कि जिस चन्द्रमाका ह्रास होता है, उसीका पुन: विकास होता है। जिस समुद्रमें भाटा आता है, उसमें पुन: ज्वार आता है। अनेक बार मनुष्यकी रुग्णता और पुन: स्वस्थता होती है। माली हालतमें भी बिगाड़, सुधार होता रहता है। पृथ्वी अनेक बार अनुर्वरा हो जाती है, उपज घट जाती है; पुन: उपचारसे उर्वरा बनायी जाती है। मार्क्स तथा लेनिनकी भविष्यवाणी थी कि ‘मजदूरोंद्वारा ही क्रान्ति होगी। किसान सामान्य पूँजीवादी भले ही संख्यामें अधिक हों और गरीब भी हों; तब भी वे कभी वर्धमान, विकासमान नहीं हैं; अत: उनकी कभी उन्नति होनेवाली नहीं।’ पर चीन और भारतमें ठीक इसके विपरीत हुआ, यहाँ किसानों, मध्यवर्गों, सामान्य उत्पादन साधनवालों अर्थात् साधारण पूँजीपतियोंद्वारा ही क्रान्ति हुई। इतना ही नहीं, भारतमें तो शान्तिपूर्ण अहिंसात्मक आन्दोलनद्वारा पर्याप्त सफलता मिली है, जिसकी मार्क्सवादमें कल्पना भी नहीं हो सकती। परिवर्तनसम्बन्धी एंजिल्सकी बात अध्यात्मवादीके लिये कोई नवीन वस्तु नहीं है। हाँ, आत्मा कूटस्थ होनेसे अपरिवर्तनशील है, वह सब परिवर्तनोंका द्रष्टा है, अन्यथा परिवर्तनका अस्तित्व भी कैसे सिद्ध होगा? बाह्य वस्तुओंमें मन एवं मानसिक परिवर्तनोंके होनेपर भी सर्वसाक्षी अपरिवर्तित ही रहता है। सच्ची बात तो यह है कि मार्क्सवादियोंने भारतीय दर्शनोंकी गम्भीरता ही नहीं समझी। वे अध्यात्मवादके नामपर बहुत-सी अनर्गल बातें कहते हैं। अध्यात्मवादी सामान्य-वृद्धिरूप विकास नहीं मानते, किंतु बादलोंके संघर्षसे या ऋणात्मक, धनात्मक विद्युत्-धाराओंके सम्पर्कसे एकाएक महान् प्रकाश-जैसा द्रुतगामी प्रकाशरूप विकास भी मानते हैं। जलका बर्फ बन जाना और बाष्प बन जाना यह कौन नहीं जानता? इसे एक अवस्थासे दूसरी अवस्थाकी कुदान कही जाय या क्रमवर्धन परिमाणात्मक परिवर्तनोंके संग्रहका परिणाम कह लिया जाय अथवा सीधी भाषामें परिणामविशेष कह लें, कोई विशेष अन्तर नहीं पड़ता। इसी तरह विकासकी गति उत्तरोत्तर अग्रगति, ऊर्ध्वगतिकी ओर अवश्य होती है; परंतु जिनका इतिहास क्षुद्रतम है, उन्हीं लोगोंके लिये ऐसी अनुभूति होती है। जिनके यहाँ वर्तमान सृष्टिका ही इतिहास अरबों वर्षोंका है, फिर अनन्त सृष्टि-संहारोंका इतिहास भी जिनके सामने है, उनके लिये तो चन्द्रमाके ह्रास-विकासके तुल्य, सूर्यके उदय-अस्तकी तरह दिन-रात, जन्म-मरण, समुद्रके ज्वार-भाटा, सोने-जागने तथा ग्रीष्म, वर्षा, शरद्, हेमन्त, शिशिर, वसन्त ऋतुके परिवर्तनके तुल्य सृष्टि-प्रलयकी परम्परा चलती है। संसारके सबसे प्राचीन ग्रन्थ अपौरुषेय अनादि &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt; कहते हैं— ‘सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत।’ (तै० आ० १०।१।१४) ‘धाताने यथापूर्व ही सूर्य-चन्द्रका निर्माण किया।’ महादार्शनिक भगवान् श्रीकृष्ण गीतामें कहते हैं— ‘भूतग्राम: स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते।’ (८।१९) ये वे ही भूतग्राम पुन: उत्पन्न होकर प्रलीन होते हैं। यह प्रपंच-प्रवृत्ति निरुद्देश्य नहीं है। जड प्रकृतिका स्वतन्त्र कोई उद्देश्य नहीं होता। उद्देश्य चेतनका ही होता है। अनादि अविद्या काम-कर्मबद्ध जीवोंको भोग एवं अपवर्ग सम्पादन करना ही प्रकृतिप्रवर्तनका ईश्वरीय उद्देश्य है। मार्क्सीय विचार-धाराका आधार इतिहास लघुतम है। जिसमें कुछ शताब्दियोंसे ही मनुष्य संसारकी उत्पत्ति, वर्गसंघर्षके इतिहासका प्रारम्भ और कुछ ही शताब्दियोंमें वर्गसंघर्षके इतिहासकी समाप्ति भी हो जाती है। मार्क्सके मतानुसार कम्युनिष्ट-राज्य होते ही वर्ग-संघर्षकी समाप्ति हो जाती है। इस वर्ग-संघर्षके भी विकासकी उत्तरोत्तर प्रगति क्यों नहीं होती, यह तो वे ही जान सकते हैं। यदि किसी भी सिद्धान्तके विरोधी कुछ लोग हो सकते हैं और उनकी संख्या बढ़कर प्रतिवाद खड़ा हो जाता है, तो कम्युनिज्म ही इसका अपवाद क्यों? उसके भी तो विरोधी हैं ही, उनकी संख्या भी बढ़ती ही है। सिद्धान्ततस्तु— सर्वे क्षयान्ता निचया: पतनान्ता: समुच्छ्रया:। संयोगा विप्रयोगान्ता मरणान्तं हि जीवितम्॥ (वाल्मी० रा० अयोध्या० १०५।१६) संसारके सभी संग्रहोंका एक दिन क्षय होता है, सभी उत्थानोंका एक दिन पतन होता है, सभी संयोगोंका एक दिन वियोग होता है और सभी जीवनोंका एक दिन मरण होता है। फिर कम्युनिष्ट राज्यका कभी अन्त न होगा, यह कल्पना भी अन्ध-विश्वास ही है। यदि सब पुरानी वस्तुओंका विनाश होता है, तो कभी कम्युनिष्टराज्य या वर्गविहीन-राज्य भी पुराना होगा और इसका भी विनाश, ध्वंस किंवा निर्वाण ध्रुव है। एंजिल्सके शब्दोंमें ‘प्रकृति द्वन्द्वमानका परीक्षास्थल है।’ यह मानना पड़ेगा कि आधुनिक प्रकृति-विज्ञानने इसके प्रभूत उदाहरण दिये हैं, जो प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं और इस प्रकार यह प्रमाणित कर दिया है कि अन्तिम विश्लेषण करनेपर प्रकृति आतिभौतिक नहीं बल्कि द्वन्द्वात्मक है। अनन्तकालसे यह किसी चित्रगतिसे नहीं घूमती; बल्कि इसका एक इतिहास है। यहाँ डार्विनका नाम सर्वप्रथम है, जिसने यह प्रमाणित कर कि आजका सावयव संसार उद्भिज्ज पशु और इस प्रकार मनुष्य भी कोटिश: वर्षोंकी विकास-क्रियाका परिणाम है, प्रकृतिकी आतिभौतिक कल्पनापर प्रचण्ड प्रहार किया। वह कहता है—‘भूतविज्ञानमें प्रत्येक परिवर्तन परिणामका गुणमें परिवर्तन है। यह परिणाम किसी-न-किसी प्रकारकी गतिका परिणाम है, जो या तो वस्तुविशेषमें वर्तमान है या उसको दी जाती है। उदाहरणार्थ पानीके उत्तापको एक सीमातक बढ़ाते हुए उसकी द्रवावस्थापर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। लेकिन ज्यों-ज्यों यह उत्ताप घटता या बढ़ता है, एक क्षण आता है, जब पानीकी अवस्थामें परिवर्तन होता है और एक दशामें यह भाप बन जाता है और दूसरी दशामें बर्फ। किसी प्लैटिनमके तारको गर्म करनेके लिये कि वह चमक सके, एक निश्चित परिमाणकी बिजली आवश्यक है। हर खनिज पदार्थके लिये गलनेका एक विशेष उत्ताप होता है। हर वायवीय पदार्थके लिये एक निश्चित बिन्दु है, जब कि उचित ठंढक और दबावके प्रयोगसे उसको तरल पदार्थमें परिणत किया जा सकता है। पदार्थ-विज्ञानमें जिनको स्थिरसंज्ञक माना जाता है, अधिकांश क्षेत्रमें वे ही बिन्दु हैं, जब गति या बिन्दुके ह्राससे वस्तुविशेषमें गुणात्मक परिवर्तन होता है। ऐसी स्थिर संज्ञाका उदाहरण है वह कोण, जिसपर आलोक रश्मिका परिवर्तन होकर सीधा प्रतिफलन होता है।’ रसायनशास्त्रपर विचार करते हुए एंजिल्स आगे चलकर कहता है—‘रसायनशास्त्रके विज्ञानका सार यह है कि वस्तुओंमें परिमाणात्मक परिवर्तनके फलस्वरूप उसके गुणोंमें परिवर्तन होता है। हीगेलको इसका ज्ञान था। अम्लजन, यदि इसके अणुमें दो न होकर तीन परमाणु हों, तो यह ओजोन बन जाता है, जिसका गुण साधारण अम्लजनसे भिन्न है। अतिभौतिकवादके विरुद्ध द्वन्द्वमान यह समझता है कि सब वस्तुओंमें तथा दृश्यगत घटनाओंमें अन्तर्विरोध वर्तमान है; क्योंकि इनमें एक भावात्मक और दूसरा अभावात्मक कोण है। एक भूत तथा भविष्य है। इनमें कुछ विकास हो रहा है, परिमाणात्मक परिवर्तनोंकी गुणात्मक परिवर्तनोंमें परिणति हो रही है। विकास क्रियाकी भीतरी बात है इन विरोधियोंका संघर्ष, पुराने और नयेमें; जिसका विनाश हो रहा है और जन्म हो रहा है, उसमें; जो अदृश्य हो रहा है तथा जिसका विकास हो रहा है, उसमें।’ आधुनिक विज्ञान कोई ऐसी चीज नहीं है, जो इदमित्थं सही हो और उसके आधारपर आत्मा, धर्म तथा ईश्वरकी समस्या हल की जा सके। उसके सम्बन्धमें कितने ही विकल्प हैं। लार्ड केल्विनकी घोषणा थी कि वे ऐसा भाव समझनेमें असमर्थ थे, जिसको वे यन्त्र-रचनामें परिणत न कर सकें, परंतु अब तो केन्द्राकर्षण, काल और दिक्सम्बन्धी विचारतक बदल गये। गणित तथा पदार्थ-विज्ञानमें बहुत-से सिद्धान्त ऐसे हैं, जो परस्पर विरोधी हैं। उदाहरणार्थ पहले यूक्लिडके स्वत:सिद्ध नियम अनिवार्य विचार-तत्त्व माने जाते थे; परंतु सालिवानके अनुसार अब वह पुरानी वस्तु हो गयी। उनका कहना है आजसे सौ वर्ष पूर्व लोवाशेफ्स्की नामक रूसीने और बोलीयाई नामक हंगेरियनने यह जान लिया था कि यूक्लिडका रेखागणित अविवेच्य आवश्यकताका स्थान नहीं ले सकता। दो हजार वर्षतक यूक्लिडके सिद्धान्तोंने निर्विरोध राज्य किया, सभी वैज्ञानिक उन्हें जितना मनुष्योंके लिये, उतना ही देवताओंके या ईश्वरके लिये भी आवश्यक मानते थे। उस समय लोआशेफ्स्की तथा बोलियाईको लोग विक्षिप्त कहते थे। महान् विद्वान् गाँसतकको जो स्वयं इसे समझ चुका था, अपना आविष्कार प्रकाशित करनेका साहस न हो सका, परंतु अन्तमें लोआशेफ्स्की आदिकी बात मान्य हुई। सालिवानके अनुसार ‘आज जर्मन रेखागणितकार रीमानके रेखा-गणितसे ही अपने प्रश्नोंका निर्णय होता है।’ अब वैज्ञानिकोंको विश्वास हो गया कि जिस दिक्में हमारा अस्तित्व है, वह यूक्लिडके रेखा-गणितके नियमोंपर नहीं चलती, रीमानके दो रेखागणितके नियमोंपर चलती है। आज पहलेके सिद्धान्तोंके विपरीत मान्यता है कि दिक‍्का विस्तार असीम नहीं, सीमित है। दो बिन्दुओंके बीचका न्यूनतम अन्तर ऋजु रेखा नहीं, एक त्रिकोणके तीनों कोण सम्मिलित होकर दो समकोण नहीं बनाते। प्रकाशकी किरणें ऋजु रेखाओंमें नहीं फैलतीं। जिस वस्तुपर प्रकाश-रश्मि पड़ती है, उसपर दबाव डालती है। सीमित एवं गोलाकार दिक‍्का आकार निरन्तर तेजीसे बढ़ता जा रहा है। दिक् पारिमाणिक नहीं। एक परमाणुका प्रभाव सम्पूर्ण विश्वपर रहता है। परमाणुमें इलेक्ट्रान (परमाणुका अस्थिर शक्तिकण), प्रोटान (केन्द्रित शक्तिसमूह)-के चारों ओर घूमे हुए बिना ही बीचके स्थानकी यात्राके एक मार्ग-चिह्नसे दूसरे मार्गचक्रमें पहुँच जाता है। आज तो विज्ञान-वेत्ताओंने विद्युत्कणको स्वेच्छाचारी भी मान लिया है, जिससे यन्त्रवादका बिलकुल ही नाश हो जाता है। जिस आइजक न्यूटनके केन्द्रिय आकर्षणका सिद्धान्त आज भी श्रद्धासे पढ़ाया जाता है, उसीके सम्बन्धमें सालिवानका कहना है कि न्यूटनका यह आविष्कार और इसकी पुष्टि मानुषी बुद्धिकी चरम कृति समझी जाती थी, तो भी आज हम केन्द्रियाकर्षणकी व्याख्या सर्वथा भिन्न परिभाषाद्वारा करते हैं। इस विषयपर हमारा सम्पूर्ण दृष्टिकोण न्यूटनके दृष्टिकोणसे जड़से ही भिन्न है। न्यूटनके सिद्धान्तको लागू करनेसे कई अंशोंमें वह अवास्तविक और अशुद्ध ठहरता है। आज वह प्रणाली जड़ और शाखासहित उखाड़ फेंकी गयी, जिसकी नींवपर इस सिद्धान्तको खड़ा किया गया था। इस तरह आजके पाठॺग्रन्थोंमें पढ़ाया जाता है कि पृथ्वीमें गम्भीर प्रवेश करनेवाली प्रकाशरश्मियाँ दूरवर्ती तारकगणोंके स्तरपर हो रहे द्रव्यनिर्माणकी उपज हैं। दूसरे सिद्धान्तद्वारा इसी प्रकारकी उपजका कारण द्रव्यनाश बतलाया जाता है, जो कि ठीक पूर्वके विपरीत है। एक सिद्धान्तके अनुसार अस्थिर विद्युत्कण तरंगका गुण रखते हैं, दूसरे सिद्धान्तके अनुसार कणोंका इनमेंसे किसीका भी त्यागना सम्भव नहीं; क्योंकि कुछ घटनाओंकी व्याख्या पहले सिद्धान्तानुसार होती है, कुछका दूसरे ही द्वारा। मनोविज्ञानके क्षेत्रमें भी परस्परविरोधी सिद्धान्तोंपर आधारित चार सम्प्रदाय बन गये हैं। इन फ्रायड, एटलर, यूंग और स्टैक्‍कैलके सम्प्रदायमें बड़े-बड़े प्रतिभाशाली विद्वान् अपने पक्षका समर्थन करते हैं। जीवशास्त्रमें भी आकस्मिक परिवर्तनोंके प्रश्नपर प्रो० वाइजमैन एवं लेमार्कके अनुयायी एक-दूसरेका निरन्तर विरोध करते हैं। एलोपैथिकमें बी० सी० जी० के प्रामाणिक विद्वान् पी० बी० बैंजमिनके अनुसार बी० सी० जी० प्रभावशाली एवं निरापद यक्ष्मानिरोधक उपचार है। पर डॉक्टर डब्ल्यू०एफ० ब्राडले (इंग्लैंड) अभी भी इसे विवादास्पद ही समझते हैं। पाश्चात्य मनोविज्ञानका प्रवर्तक फ्रायड कहता है कि हिस्टीरियामें जो डॉक्टर औषध देता है, वह कोरा ठग है; किंतु सभी डॉक्टर हिस्टीरियामें औषध देते हैं। सालिवानके अनुसार सत्यसे वैज्ञानिकोंका वास्तविक अन्तिम अभिप्राय सुविधासे है। वैज्ञानिक सैद्धान्तिक दृष्टिकोणसे अपने-आपको कुछ भी समझें, वास्तवमें वे क्रियासाधक होते हैं। अलेक्सिस कैरलका कहना है कि गणित, भौतिक और रसविज्ञान आवश्यक विज्ञान हैं, परंतु चेतन द्रव्योंकी खोजमें मूल प्रारम्भिक विज्ञानोंका स्थान इन्हें प्राप्त नहीं हो सकता। उसके अनुसार मानव-जातिके दुष्ट और पतित बड़ी संख्याके नियन्त्रण तथा मार्गदर्शनके लिये सात्त्विक आहार-विहारद्वारा आध्यात्मिक प्रवृत्तिवाले तपस्वियोंकी एक अल्प संख्या बननी चाहिये—यह भारतीय ही सूझ है। अभी थोड़े ही दिन हुए डॉक्टर लोकी यह बात इंग्लैण्डकी विज्ञानपरिषद‍्में दुहरायी गयी है कि आधुनिक विज्ञानकी सबसे बड़ी खोज यह है कि ‘अभी हमलोग कुछ भी नहीं जानते हैं।’ फिर विज्ञानके बलपर मार्क्स, एंजिल्सका सब कुछ जान सकनेका दावा करना निरा दम्भ नहीं तो क्या है? जहाँ अभीतक अहंतत्त्व और महत्तत्त्वतक; शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध—इन मात्राओंको जाननेमें विज्ञान सफल नहीं हुआ है, फिर अहंतत्त्व, महत्तत्त्व और अव्यक्त प्रकृतिकी बात तो दूरकी है। फिर ‘अणोरणीयान्’ आत्मा और परमात्माको वैज्ञानिकोंकी यान्त्रिक कसौटीपर कसना केवल उपहासास्पद नहीं तो क्या है? इसी प्रकार एंजिल्स तथा मार्क्सका इतिहास महान् आर्ष इतिहासकी अपेक्षा एक विकृत अप्रामाणिक क्षुद्रतम इतिहास है, अत: इसके आधारपर संसारका स्वरूप निर्धारित नहीं हो सकता। डार्विनने स्वयं ही अपने लिये अनेक विषयोंको अज्ञेय माना है। उद्भिज्ज, पशु और मनुष्योंकी विकास-कहानी स्वयं ही अप्रामाणिक है, फिर इसके द्वारा अतिभौतिकवादपर प्रचण्ड आघात आकाशमुष्टिहननके तुल्य है। हेतुविशेषोंसे वस्तुओंका रूपान्तरण होता है; किंतु वह रूपान्तरण वस्त्वन्तरण नहीं है। बर्फ हो जानेपर भी वस्तु जल ही रहता है। इसी तरह भाप बन जानेपर भी जलका अभाव नहीं हो गया। ‘नासतो विद्यते भाव:’ का निश्चित सिद्धान्त सुस्थिर है। जैसे प्रसारित पट और संकुचित पट पटकी अवस्था-विशेष है, वैसे ही बर्फ और भाप जलकी अवस्था-विशेष ही हैं। अन्य उदाहरण भी इस सिद्धान्तके विरोधी नहीं हैं। रसायनशास्त्रके उदाहरण भी उक्त सिद्धान्तके बाधक नहीं हैं। अम्लजनके तीन परमाणुओंसे ओजोन बनता है, उसका गुण अम्लजनसे भिन्न होता है। इसी तरह नैयायिकोंके अनुसार दो परमाणुओंके द्वॺणुक बनते हैं; परंतु तीन परमाणुका कुछ भी नहीं बनता। छ: परमाणुओंका त्रसरेणु बनता है, पाँचका कुछ नहीं। औषधोंकी मात्राभेदसे गुणभेद तो प्रसिद्ध ही है। पृथक्-पृथक् ओषधियोंके गुणोंसे सम्मिलित ओषधियोंके गुणोंमें संसर्गजनित विशेषता होती है। एक मात्रासे पानी, अन्न या दुग्ध शरीरके पोषक होते हैं और वे ही दूसरी मात्रासे शरीरके नाशक बन जाते हैं। ऐसी बातोंको अतिभौतिकवादके विरुद्ध समझना नितान्त भ्रम है। वस्तुओं एवं घटनाओंमें अन्तर्विरोधकी कल्पना भी तत्त्वशून्य है। भावात्मक-अभावात्मक यदि क्रमिक हों तो उनका विरोध कहा ही नहीं जा सकता, विरोध तो सम देश-कालमें उसी वस्तुके भावाभावका होता है। भूत और भविष्य आविर्भाव-तिरोभाव पुराने-नये—ये सभी भिन्नकालिक होनेसे विरोधी हैं ही नहीं। पिता-पितामहादि प्राचीन, पुत्र-पौत्रादि नवीन, अध्यापक प्राचीन, छात्र नवीन, इनमें विरोध नहीं है, किंतु उपकार्योपकारभाव है। मनुष्यकी बैठने, लेटने, चलने आदिमें कई ढंगकी अवस्थाएँ विकसित होती हैं, जो परस्पर एक-दूसरेसे विलक्षण होती हैं। इसी तरह बीजके अवयवोंकी बीज, अंकुर, नाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा आदि अनेक अवस्थाएँ होती हैं, इनमें पूर्व-पूर्व अवस्था उत्तरोत्तर अवस्थाओंकी जननी है—सहायक है, विरोधकल्पना दूरभिसंधिपूर्ण है। सिर्फ वर्गविद्वेष, वर्गविध्वंसके काले कारनामोंके समर्थनके लिये उसे दार्शनिकरूप देनेका प्रयत्न किया जाता है। जैसे पिता अपने उत्तराधिकारी पुत्रके जन्मके लिये प्रयत्नशील होता है, उसी प्रकार कारण भी अपने उत्तराधिकारी कार्यके जन्मके लिये अनुकूल होता है। राजा शिबि एवं दिलीपने तो स्वशरीर देकर भी कपोत तथा नन्दिनी गायकी रक्षाके लिये प्रयत्न किया था। यहाँ विरोध नहीं, किंतु उपकारकी भावना है। वस्तुस्थिति तो यह है कि विवर्धमान क्षीयमानका सहायक होता है, युवक वृद्धकी सेवासे अपनेको पुण्यात्मा मानता है; बलवान् निर्बलका, विद्वान् अविद्वान‍्का, धनवान् निर्धनका सहायक होता है—यही मानवता है। कहा जाता है कि ‘द्वन्द्वमानके अनुसार निम्न स्तरसे ऊँचे स्तरपर विकासको हम साधारण पट-परिवर्तनके रूपमें नहीं देखते; बल्कि वस्तुओं और दृश्यगत घटनाओंमें वर्तमान विरोधके रूपमें तथा इन विरोधियोंकी बुनियादपर कायम दो विपरीत गतियोंके संघर्षके रूपमें देखते हैं। लेनिनके शब्दोंमें द्वन्द्वमान वस्तुओंकी सत्ताके आन्तरिक विरोधका अध्ययन है। लेनिनके ही शब्दोंमें द्वन्द्वमान वस्तुओंकी सत्ताके आन्तरिक विरोधका अध्ययन है और विकास विरोेधियोंके संघर्षका नाम है। द्वन्द्वमान प्रतिदिनके साधारण तर्कशास्त्रका स्थान नहीं ले सकता, जिस प्रकार बीजगणित या संख्यानुगणित अंकगणितका स्थान नहीं ले सकते। जिस प्रकार अंकगणितकी सीमाके बाहरकी समस्याओंको हल करनेके लिये गणितकी उच्च शाखाओंका प्रयोग किया जाता है, उदाहरणार्थ उन समस्याओंका जिनमें अज्ञात और परिवर्तनीय परिमाण या संख्या और उनके सम्बन्धोंका विचार होता है। उसी प्रकार द्वन्द्वमान गतिशील सम्बन्धों और क्रियाओंका साधारण तर्कशास्त्रके दायरेमें लानेका साधन है; क्योंकि साधारण तर्कशास्त्र केवल स्थिर सम्बन्धोंको लेकर चलता है, द्वन्द्वमान उसीको लेकर कार्यारम्भ करता है, जिसको अपने दायरेके बाहर रख छोड़नेके लिये साधारण तर्कशास्त्र मजबूर है, वह यह कि किसी वस्तुको अपने ही द्वारा समझा नहीं जा सकता। इसको यों ही समझा जा सकता है कि यह और किसी वस्तुसे आया और किसी अन्य वस्तुकी ओर यह जा रहा है और इसकी गतिका कारण है, इसके और इसके बहिरावेष्टनके बीचका एक क्रियाशील सम्बन्ध। इसलिये द्वन्द्वमान प्रत्येक वस्तुकी अन्य वस्तुओंके बीच पारस्परिक क्रिया-प्रतिक्रियाके फलस्वरूप गतिका मूर्तरूप ही समझता है। प्रत्युत्पादक, विपरीतानुवर्तन, विरोध और संघर्ष (जो परिवर्तन और विकासका भी जनक है)-के बिना द्वन्द्वमान असम्भव हो जाता है। गति और उसके रूपान्तरके अध्ययनके लिये द्वन्द्वमान अत्यावश्यक है। लेकिन जहाँ रूप, सार सम्बन्धका विकार तुलनात्मकरूपसे नहीं होता, वहाँ साधारण तर्कशास्त्रका प्रयोग ही सिद्ध है।’ ‘द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद मनुष्यके वास्तविक भौतिक अस्तित्वके स्थूल सत्यको लेकर चलता है। यह उस अतिभौतिकवादी तरीकोंका तिरस्कार करता है, जो संसारके विषयमें एक कल्पित मतका प्रचार करना चाहता है, जैसे यह एक है या अनेक, यह युक्त है या विच्छिन्न इत्यादि। प्रत्यक्षीकरण और प्रत्यक्षीभूत कल्पनाका रूप प्रतिबिम्बका रूप है। बाहरी दुनियाका द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद इस ओर भी दृष्टि आकर्षित करता है कि यह मानसिक क्रियाशील है, यह निष्क्रिय प्रतिबिम्बमात्र नहीं है। इसके अनुसार विचार, भूत जिसका वास्तविक अस्तित्व है, जो क्रियाशील और इसलिये विकासमान है कि सम्बन्धित सम्पूर्णता और जीवित मनुष्योंके बीच व्यावहारिक सम्बन्धका परिणाम है। यान्त्रिक भौतिकवाद विश्वको मशीनकी तरह एक प्रणालीबद्ध रूपमें देखता है, जब कि द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद इसको एक असीम सृजनात्मक क्रियाके रूपमें देखता है।’ पूर्वोक्त युक्तियोंसे स्पष्ट है कि मार्क्सवादियोंका विरोध एक विचित्र वस्तु है, जो कारणगत विरोधरूपसे उच्चस्तरीय विकासका कारण बनता है। अध्यात्मवादीको इसमें विरोधकी कोई बात ही नहीं दिखती। जो एक साथ मिलकर कार्योत्पादक होते हैं, उन्हें अध्यात्मवादी सहयोगी ही कहते हैं, विरोधी नहीं। अग्नि, जल, सत्त्व, रज, तम आदि परस्पर विरोधी तत्त्व भी सहयोगी होकर कार्योंके जनक होते हैं, यह स्पष्ट किया जा चुका है। साधारण तर्कशास्त्र एवं द्वन्द्वमानका भेद भी वैसा ही है, जैसे मित्रातनय एवं वन्ध्यातनयका। कहना न होगा कि ऐसा कोई भी द्वन्द्वमानका विषय नहीं है, जो तर्कशास्त्रका विषय न हो। जो वस्तु अनादि, अपौरुषेय, शास्त्रैकसमधिगम्य है, वह धर्म-ब्रह्मादि न तर्कका विषय है, न द्वन्द्वमानका। अत: ‘अंकगणितकी सीमाके बाहरकी समस्याओंको हल करनेके लिये जैसे बीजगणित-संख्यानुगणित अपेक्षित होते हैं, वैसे ही साधारण तर्ककी सीमाके बाह्यकी समस्याओंको हल करनेके लिये द्वन्द्वमान है, यह भी साधारण तर्कसे उच्चकोटिका तर्क है,’ इत्यादि कथन भी मार्क्सवादियोंका स्वगोष्ठिनिष्ठ सिद्धान्त है। स्थिर, अस्थिर—सभी सम्बन्धोंमें तर्कशास्त्रका प्रवेश होता है। वस्तुत: मार्क्सवादमें साधारण तर्क या द्वन्द्वमानका कोई भी स्पष्ट अव्याप्ति, अतिव्याप्ति, असम्भव दोषरहित लक्षण और परिभाषा नहीं है। इसीलिये रबड़-छन्दके समान मार्क्सवादमें मनमाना तर्क चलता है। किंतु तर्कशास्त्रमें तर्ककी विशेष परिभाषा है—‘व्याप्यारोपेण व्यापकारोपस्तर्क:।’* व्याप्यके आरोपसे व्यापकका आरोप तर्क कहलाता है। तर्क स्वयं प्रमाण नहीं होता, किंतु अनुमानमें अपेक्षित व्याप्तिज्ञानका सहायक होता है। जो अतर्क्य है, उसीको तर्कशास्त्र छोड़नेको मजबूर होता है। उस सम्बन्धमें द्वन्द्ववाद भी मूक ही रहेगा। साध्य, साधनभाव जैसे स्थिर, वैसे ही गतिशील पदार्थोंके सम्बन्धमें भी लागू होते हैं। * अथवा ‘अविज्ञात तत्त्वको प्रमाण, हेतु, उपपत्तिसे जाननेके लिये ऊहापोह करना तर्क है।’ (न्याय० १।१।४०) किसी वस्तुको समझनेके लिये सम्भावित, असम्भावित सम्बन्धों तथा विविध परिस्थितियोंको जानना तर्कशास्त्रको भी अभीष्ट है। कुछ भारतीय तार्किकोंका तो यहाँतक कहना है कि एक घटका ज्ञान भी पूरा और सही तब होता है, जब घटेतर सकल वस्तु प्रतियोगि-भेदयुक्त घटका बोध होता है। अर्थात् स्वेतर सकल पदार्थोंसे ‘भिन्नत्वेन रूपेण’ घटका बोध होता है। इतर-भिन्नता जाननेके लिये इतर सकल पदार्थोंका ज्ञान भी आवश्यक होता है। कौन वस्तु किन-किन हेतुओंसे उद‍्भूत होती है, किन-किन प्रमाणोंसे विदित होती है, इसका अन्तिम परिणाम क्या होगा, उसका किन वस्तुओंपर किस ढंगका प्रभाव होगा—यह तो राजनीति, अर्थशास्त्र, वाणिज्य, आयुर्वेद, अध्यात्मशास्त्र, मन्त्रशास्त्र आदि शास्त्रोंमें विचारा जाता है। इतना ही नहीं, किसका कितना दृष्ट प्रभाव पड़ेगा, कितना अदृष्ट प्रभाव पड़ेगा, यह भी विचार भारतीय शास्त्रोंमें होता है। फिर भी संसारकी प्रत्येक वस्तुका क्रिया-प्रतिक्रियारूप सम्बन्ध नहीं होता। संसारमें कितने ही पदार्थ परस्पर सहयोगी होते हैं, कितने विरोधी होते हैं, कितने ही उदासीन भी होते हैं। हाँ, प्रत्येक कार्य वस्तु त्रिगुणात्मक होनेसे और गुणोंका चल स्वभाव होनेसे गतिका मूर्तरूप तो नहीं, किंतु गतिका फल कहा जा सकता है। उसमें जैसे गति निदान है, वैसे ही सत्त्वका प्रकाश और तमका अवष्टम्भ भी मिला हुआ है। विपरीतानुवर्तन विरोध एवं संघर्षके अनेक स्थान हैं, परंतु वहाँ द्वन्द्वमान नामकी कोई सर्वसम्मत वस्तु नहीं है। गतिका रूपान्तरण स्वयं नहीं होता, किंतु किसी वस्तुके रूपान्तरणमें गति कारण अवश्य है, परंतु वहाँ द्वन्द्वमानकी गन्ध भी नहीं है। द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद और यान्त्रिक भौतिकवादका भेद भी अवास्तविक है। एकता-अनेकता, युक्तता-अयुक्तता, विच्छिन्नता-अविच्छिन्नताका विचार काल्पनिक नहीं है। इन विचारोंके बिना वस्तुयाथात्म्यका बोध असम्भव ही है। समूचे शरीरको ही मनुष्य या आत्मा मान रखना अविवेकका पूरा परिचय है। जैसे ईंट, चूना, पत्थर, काष्ठ आदिसे बना हुआ मकान एक संघात है, वह किसी अपनेसे असंहत भोक्ता चेतनके लिये होता है, वैसे ही माता-पिताके शुक्र, शोणितसे बना हुआ अस्थि, मांस, चर्ममय पंजर देह भी मकानके समान ही किसी अपनेसे असंहत, असंग चेतनके लिये होना चाहिये। अचेतनके सभी व्यवहार चेतनकी दु:ख-निवृत्ति—सुखप्राप्तिके लिये होते हैं, वैसे ही देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि, दिल, दिमाग आदिकी प्रवृत्तियोंको भी किसी चेतनके सुखार्थ मानना युक्तियुक्त है। इसे काल्पनिक कहना अनुचित है। अतएव मानसिक क्रियाको क्रियाशील मानना भी अनभिज्ञता है। गुण और क्रिया स्वयं ही द्रव्याश्रित होते हैं। जैसे गुण गुणका आश्रय नहीं होता, वैसे ही क्रिया भी क्रियाका आश्रय नहीं होती है। वस्तुत: मानसिक क्रिया भौतिक है—यह भारतीय अध्यात्मवादी भी मानते हैं। ब्रह्मात्मक ज्ञान नित्य-ज्ञान है, वह विभिन्न मानसिक क्रियाओंका भी निर्विकार भासक है। मानसी क्रियाओंकी विशेषता स्पष्ट है, नित्य ज्ञान क्रिया नहीं है, अध्यात्मवादी इसे प्रतिबिम्बरूप मानते ही नहीं। ‘फिर निष्क्रिय प्रतिबिम्ब नहीं है’—यह कथन भी अनुक्तोपलम्भ है। विकासमान भूतकी सम्बन्धित पूर्णता या जीवित मनुष्योंके बीच व्यावहारिक सम्बन्धका परिणाम ही ज्ञान है—यह कथन मानसिक क्रियारूप ज्ञानके सम्बन्धमें कहा जा सकता है, परंतु नित्यज्ञानके सम्बन्धमें ऐसा नहीं कहा जा सकता; क्योंकि ज्ञानका प्रागभाव या प्रध्वंसाभाव नहीं सिद्ध होता; क्योंकि भाव, अभाव किसी वस्तुके ग्रहणके लिये ज्ञान आवश्यक ही है। ज्ञानको स्वभावका ज्ञापक कहना ‘वदतोव्याघात’ है। जैसे महाकाशमें घटादि उपाधिद्वारा परिच्छिन्नता और अनेकता प्रतीत होती है, वैसे ही विषयों एवं मानसी वृत्तियोंके कारण नित्य ज्ञानमें परिच्छिन्नता तथा अनेकता प्रतीत होती है। वस्तुत: निरुपाधिक अनन्त आकाशके तुल्य ही निरुपाधिक ज्ञान भी नित्य एवं अनन्त है। अपरप्रेरित जडपदार्थोंमें स्वत: सर्जनकी शक्ति नहीं होती। विज्ञानसे भी नहीं सिद्ध होता है कि किसी चेतन मनुष्यके प्रयत्नके बिना जडपरमाणु, जडविद्युत्कण, जडभूत या प्रकृति गतिशील होनेपर भी नियमित तथा अनुकूल गति बनाकर अभीष्ट कार्य-सिद्धि कर सकेंगे। जल तथा वायु गतिशील हैं, फिर भी कार्यसिद्धिके अनुकूल गतिशील बनाना चेतनका ही कार्य है। इसी तरह गतिशील भूतोंको भी नियामक चेतनकी आवश्यकता है। क्रिया कोई भी असीम नहीं होती, कर्म या क्रिया स्वयं क्षणभंगुर ही होती है। हाँ, सदृश क्रियाओंका प्रवाह असीम हो सकता है, परंतु यह असीमता भी तो प्रत्यक्ष नहीं है। असीमताका अनुमान ही करना पड़ेगा। अनुमानका भी कोई निश्चित लिंग नहीं है। संसारभरके प्राय: सभी अध्यात्मवादी सम्प्रदाय तथा बौद्ध योगाचार, सौत्रान्त्रिक, वैभाषिक एवं माध्यमिकतक बन्धको अनादि, किंतु सान्त मानते हैं। भगवान् कृष्णकी गीता भी उसे अनन्त बतलाती है। ‘नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा’ (१५।३)। इस संसारका न अन्त है, न आदि है। अद्वैतवेदान्तके अनुसार अनादि होते हुए भी सान्त है। गीताके वचनका अभिप्राय यही है कि तत्त्व-साक्षात्कारके बिना इस संसारका अन्त नहीं होता। असीम भी हो, सर्जनशक्ति भी हो, तो भी, जडका प्रेरक-प्रवर्तक चेतन आवश्यक ही है। किसी भी जडकी अनुकूल सर्जनशक्तिके बिना नियन्त्रणके सर्वथा अदृष्टचर है। ‘मनुष्यके मानसिक तथा बाहरी वस्तुओंके संयोगजनित व्यवहारने यह सिद्ध किया कि जिस दिशामें प्राचीन भौतिकवादी सत्यको खोजना चाहते थे; वह वहाँ नहीं है, उसको खोजनेके लिये दूसरी दिशाको जाना पड़ेगा। मनुष्यका विचार जिस सत्यको पहुँच सकता है, वह अनन्त कालके लिये सम्पूर्ण सत्य नहीं है, जिसका अस्तित्व ऐसे पुरुषके लिये है, जो मनुष्यके राग-द्वेष और ससीमतासे मुक्त हो। जिस सत्यको मनुष्य पहुँच सकता है, वह उन सम्बन्धोंका—जिनके अन्दर मनुष्य जाता है, चलता-फिरता है और रहता है—एक विकासमान समन्वय है। यह आपेक्षिक सत्य है; क्योंकि यह कुछ पारस्परिक सम्बन्धों तथा क्रिया-प्रतिक्रियाओंका रूप है, जिनको हम उन सम्बन्धोंके अन्दरसे ही देखते हैं। पुन:परिमाणकी दृष्टिसे भी यह आपेक्षिक है; क्योंकि इसमें सदा वृद्धि होती रहती है और अधिकतर वृद्धिप्राप्ति करनेकी इसमें शक्ति है। लेकिन गुणात्मक दृष्टिसे और तुलनात्मकरूपमें यह सत्यपूर्ण भी है। यद्यपि यह पूर्ण सत्य नहीं, तथापि जहाँतक यह प्रयोग सिद्ध है, वहाँतक यह सत्य ही है।’ ‘सिद्धान्त और प्रयोग, पूर्णता और आपेक्षिकता, पुरानी अवस्थाका जारी रहना और परिवर्तित होना, कायमी अवस्था और वृद्धि, इन विरोधियोंके एकत्वमें ही काण्टके पूर्व यान्त्रिक भौतिकवाद तथा द्वन्द्वात्मक भौतिकवादका प्रमेय है। एंजिल्सके शब्दोंमें—‘पिछली सदीमें भौतिकवादका रूप यान्त्रिक होनेके कारण यह था कि उस समय प्रकृतिविज्ञानकी शाखाओंमें यन्त्रविज्ञानका ही काफी विस्तार हो चुका था। देकार्तेके लिये पशु एक मशीन-जैसा था। अठारहवीं सदीके भौतिकवादके लिये मनुष्य भी वैसे ही था। उस समयके फ्रांसीसी भौतिकवादकी यह संकीर्णता थी कि वह हर प्रक्रियाके सम्बन्धमें यन्त्रवादका प्रयोग करता था, चाहे वह रसायन-शास्त्र हो, चाहे जीव-प्रकृति; जिसके सम्बन्धमें यान्त्रिक सिद्धान्त लागू है सही, लेकिन जिनका नियन्त्रण और उच्चकोटिके नियमोंद्वारा होता है। उसकी दूसरी संकीर्णता यह है कि वह विश्व संसारको सक्रियरूपमें भूतके ऐतिहासिक विकासके रूपमें नहीं देखता। प्रकृतिकी अविराम गतिका ज्ञान तो लोगोंको था, लेकिन उस समयके विचारके अनुसार यह गति अनन्तकालसे एक चक्रके आकारमें है और उन्हीं परिणामोंका बारम्बार आविर्भाव होता रहता है। यान्त्रिकवाद एक यन्त्रचालकका अनुमान करता है और इस प्रकार ईश्वर और अप्रकृतिवादकी पुन: सृष्टि करता है। वास्तविक परिवर्तनकी व्याख्या यह नहीं कर सकता। वास्तविक परिवर्तनका कारण है वस्तुकी स्वयंगति।’ द्वन्द्वमानके संक्षिप्त सूत्र १६ हैं—हीगेलके तर्कशास्त्रके ऊपर लेनिनने १६ सूत्रोंका विस्तार किया है, जिनके अध्ययनसे द्वन्द्वमानको समझनेमें बहुत सहायता मिलती है। लेनिनके शब्दोंमें द्वन्द्वमानका संक्षिप्त विवरण है, विरोधियोंका एकत्व। एक प्रकारसे ये सोलहों सूत्र इसीके विशद विस्तार हैं। मनन-क्रियाका आरम्भ होता है, विश्व-प्रक्रियासे। उसके कुछ विशिष्ट गुणोंको अलग करके उनके अलग रूपको ही ध्यानमें लाकर वस्तु (कर्म)-को लेकर ही मनन-क्रियाका आरम्भ है। इसलिये द्वन्द्वात्मक मनन-क्रियाके लिये पहले आवश्यक है, वस्तुओंको ज्यों-की-त्यों उनके अलग रूपमें देखना। यही लेनिनका पहला सूत्र है—वस्तुनिरीक्षण। ‘लेकिन वस्तुतत्त्वके तोड़नेके पहले कदमको पूरा करना पड़ता है। दूसरे कदमसे इस द्वन्द्वमानका पुनर्निर्माण करके यदि विश्व संसार एक परिवर्तनशील प्रक्रिया है, जिसके अंग परस्पर सम्बन्धित हैं तो हम इनकी पहचान यों करते हैं कि मस्तिष्कमें इन आंशिक क्रियाओंको, यथा समाज उत्पादनके साधन परिवर्तनशील वस्तु शब्दको अलग कर लेते हैं। इनका हम नाम देते हैं—पृथकित (आइसोलैट्स)। यह पृथकित, पारिपार्श्विक अवस्थासे (बहिरावेष्टन) या स्थान, काल, भूतसे अलग कर लिया गया है। इसलिये स्वयं पृथकित एक कल्पनामात्र है; क्योंकि द्वन्द्वात्मक दृष्टिसे पारिपार्श्विक अवस्थासे मुक्त कोई वस्तु रह नहीं सकती। लेकिन यह कल्पना भी वास्तविक ही है, इसलिये कि वस्तुराज्यमें इसका अस्तित्व है। द्वन्द्वमानके अध्ययनका पहला कदम है इन पृथकितोंका स्वतन्त्ररूपसे अध्ययन करना और फिर उनको अपनी पारिपार्श्विक अवस्थासे संयुक्तकर द्वन्द्वमान पुनर्निर्माण करना। इसी प्रकार हम अतिभौतिकवादी अलाहिदापने और एकतरफापनेके ऊपर उठ सकते हैं और दुनियाको एक अन्त:सम्बन्धित गतिके रूपमें देख सकते हैं। यही लेनिनका दूसरा सूत्र है। हमें प्रत्येक वस्तुके दूसरे वस्तुओंसे सम्बन्धोंकी विचित्रता और परिपूर्णताका विचार करना चाहिये।’ प्राचीन भौतिकवादी एवं द्वन्द्वात्मक भौतिकवादी दोनोंहीकी खोजसे परमार्थ सत्य मिलनेवाला नहीं है। परमार्थ नि:सीम सत्य एक ही है, उसमें पूर्णता-अपूर्णताकी खिचड़ी नहीं है। उसी परमार्थ सत्यका औपाधिकरूप स्वप्न, शुक्ति, रजतादिमें प्रातिभासिक सत्यरूपमें प्रस्फुटित होता है। व्यावहारिक आकाशादिमें व्यावहारिक सत्यरूपमें प्रस्फुटित होता है। अत्यन्त अबाध्य वस्तु ही परमार्थ सत्य होती है, अत: परमार्थ सत्यका अनन्त एवं कालातीत होना स्वाभाविक है। अविचारित संघातप्राय मनुष्य भले ही आपेक्षिक सत्य हो, परंतु विचारनिर्णीत स्वरूप तो मनुष्योंका ही नहीं, प्राणिमात्रका अनन्त सत्य ही है और इस अनृत मर्त्य मनुष्य-देहादिसे ही सत्य अमृत प्राप्त करना जीवनका ध्येय है, यही बुद्धिमानोंकी मनीषाका माहात्म्य है— एषा बुद्धिमतां बुद्धिर्मनीषा च मनीषिणाम्। यत्सत्यमनृतेनेह मर्त्येनाप्नोति मामृतम्॥ (श्रीमद्भा० ११।२९।२२) अठारहवीं सदीके भौतिकवादियोंसे बहुत पहले ईसाके भी बहुत पहले भगवान् श्रीकृष्णने स्थूलदेह एवं इन्द्रिय, मन, बुद्धि, प्राणादियुक्त सूक्ष्म शरीरको यन्त्र मानकर यन्त्रारूढ़ जीवोंको ईश्वराधिष्ठित मायाद्वारा भ्रमण करना माना है— ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥ (गीता १८।६१) शरीर, दिमाग आदिसे उत्तम यन्त्र अबतक कोई भी नहीं निकले हैं। बल्कि यों कहना चाहिये कि रेल, तार, रेडियो, मोटर, हवाईजहाज एवं अन्य कारखानोंके मशीन-यन्त्र आदि सबका आविर्भाव करनेवाला मनुष्य शरीर, बुद्धि, मस्तिष्क ही है। सुतरां इस सर्वोत्कृष्ट यन्त्रका निर्माता तथा संचालक सर्वज्ञ ईश्वर ही है। वस्तुकी स्वयंगति असिद्ध है। अचेतन रथादिकी गति चेतनाधिष्ठित ही होती है। अत: जल, वायु आदिकी प्रवृत्ति भी अन्तर्यामी चेतनसे अधिष्ठित ही होती है। यदि स्वयंगति भूत है, तब उनसे स्वयं ही विलक्षण कार्योंकी उत्पत्ति होनी चाहिये, फिर चेतन मनुष्यके इच्छानुसार जडभूतकी कार्याकारेण परिणति न होनी चाहिये। अग्नि, जल, वायुके तुल्य स्वयं गति होनेपर भी कार्यानुकूल गतिके लिये चेतन ईश्वर नियामक एवं व्यवस्थापकरूपसे आवश्यक है। विरोधियोंके एकत्वके सम्बन्धमें कहा जा चुका है कि भाव, अभाव-जैसे विरोधियोंकी एकता सर्वथा असम्भव तथा अदृष्ट है। अग्नि, जल, सत्त्व, रज, तम-जैसे विरोधियोंका भी सहयोग होता है, एकता नहीं। ‘वस्तु अर्थात् कार्यसे मनन-क्रिया अर्थात् ज्ञानका आरम्भ होता है’, यह कल्पना भी व्यर्थ है। अनुभव-सिद्ध बात है कि ‘जानाति, इच्छति, अथ करोति’ प्राणी किसी वस्तुको जानता है, फिर इच्छा करता है, फिर कर्म करता है। किसी भी कर्मके लिये पहले संकल्प अपेक्षित होता है। ‘यत्क्रतुर्भवति तत्कर्म कुरुते।’ (छा० उ०) प्राणी जैसा संकल्प करता है, वैसा ही कर्म करता है— सङ्कल्पमूल: कामो वै यज्ञा: सङ्कल्पसम्भवा:। व्रतानि यमधर्माश्च सर्वे सङ्कल्पजा: स्मृता:॥ अकामस्य क्रिया काचिद् दृश्यते नेह कर्हिचित्। यद्यद्धि कुरुते किञ्चित्तत्तत्कामस्य चेष्टितम्॥ (मनुस्मृ० २।३-४) सभी काम संकल्पसे ही होते हैं और सकामकी ही क्रिया होती है। नि:संकल्प निष्कामकी कोई भी क्रिया कभी भी देखी नहीं जाती। विश्वनिर्माण भी ईश्वरीय संकल्प तथा चिकीर्षामूलक ही है। व्यवहारमें भी कोई शिल्पी पहले वस्तुकी कल्पना या संकल्प करता है, फिर इच्छा करता है, पुन: साधन-संग्रहपूर्वक मन:स्थ वस्तुको बाह्याकार देता है। लेनिनका सूत्र इस सहज स्वाभाविक व्यवहारका उल्लंघन करता है। वस्तु-तत्त्वको तोड़ना और पुनर्निर्माण करना यह द्वन्द्ववादी भाषा ही असंगत है। पुनर्निर्माण शब्द निर्मित वस्तुके ही पुनर्निर्माणके अर्थमें प्रयुक्त होता है, नव निर्माण और पुनर्निर्माणमें यही अन्तर है। मृत्पिण्डका विभाजन घट-निर्माणके लिये होता है। एक अवस्था हटनेपर ही दूसरी अवस्था आ सकती है। अत: पिण्डावस्था हटती है, तब घटावस्था आती है। इस तरह कार्यावस्थासे पूर्व व्यवस्थाका प्रत्यावर्तन नहीं होता। देशकाल तथा विविध सम्बन्धित पदार्थोंसे सम्बन्ध रहनेपर भी पृथक्त्व रहता ही है, वैज्ञानिक विश्लेषण भी तभी सार्थक है। सम्मिलित, सम्बन्धित, अविविक्त भूमण्डल सूर्यमण्डलमें विवेकद्वारा विभिन्न गुणधर्मयुक्त अनेक पदार्थ मिलते हैं। यों तो कारणरूपसे सभीकी एकता है। पार्थिवरूपसे अभिन्न होते हुए भी लोहा, सोना, चाँदी, पत्थर, मिट्टी आदि रूपसे भिन्नता मानना ही तत्त्वज्ञान है। अध्यात्मवादके लिये यह कोई नयी वस्तु नहीं है। वस्तुके यथार्थ जो भी दृष्टिकोण हों, उपयोगिताकी दृष्टिसे सभीपर विचार होना चाहिये। काकदन्तपरीक्षा, गर्दभरोमगणना आदि व्यर्थकी परीक्षाएँ होती हैं, वे अमान्य होती हैं। कहा जाता है कि ‘प्रत्येक वस्तु विराट् विश्वप्रक्रियाका एक अंग है। इसकी प्रकृतिको इसकी रूपान्तरिक अवस्थासे अलग करके नहीं समझा जा सकता।’ यही लेनिनका तीसरा सूत्र है। ‘हमें वस्तु या दृश्यगत घटनाओंके विकास, इसकी अपनी गति, इसके अपने जीवन आदिका विचार करना चाहिये। लेकिन यह विकास ऐसा नहीं है, जो मनमानी ढंगसे, बिना किसी कारणके रहस्यमयरूपमें होता है। विकास सदा बाहरी सम्बन्ध तथा आन्तरिक सम्बन्धोंकी जाँचका है। हमें वस्तुकी अन्तर्विरोधी प्रवृत्तियों और दिशाओंकी खोज करनी चाहिये।’ यही लेनिनका चौथा सूत्र है। पाँचवाँ सूत्र है कि ‘हमें वस्तुको विरोधियोंके एकत्व तथा योगफलके रूपमें देखना चाहिये।’ छठा सूत्र है—इन विरोधियोंके पटविस्तार तथा संघर्षको हमें देखना चाहिये और सातवाँ सूत्र वस्तु-विश्लेषण तथा समन्वयका एकीकरण है। आठवाँ सूत्र है—प्रत्येक वस्तुका सम्बन्ध न केवल बहुविध है, बल्कि सार्वभौमिक है। प्रत्येक वस्तु प्रत्येक अन्य वस्तुसे सम्बन्धित है। नवाँ सूत्र न केवल विपरीतोंका एकत्व बल्कि प्रत्येक गुणका उसके विपरीतमें रूपान्तरित होना है। दसवाँ सूत्र नये पार्श्वों और सम्बन्धोंके दृश्यगत होनेकी असीम क्रिया है। ग्यारहवाँ सूत्र है—मनुष्यद्वारा वस्तु, दृश्य, क्रिया इत्यादिके ज्ञानको गहराईमें ले जानेकी तथा बाह्यावरणसे तत्त्वपर और कम गहराईके तत्त्वसे अधिक गहराईके तत्त्वपर पहुँचनेकी असीम क्रिया। बारहवाँ सूत्र है—सह अस्तित्वसे कार्यकारणके सम्बन्धको पहुँचना। एक प्रकारके सम्बन्ध और पारस्परिक निर्भरतासे अधिक गहरा तथा अधिक व्यापक सम्बन्ध-तथा पारस्परिक निर्भरताकी ओर जाना। तेरहवाँ सूत्र निम्नस्तरसे ऊँचे स्तरपर विकासकी क्रियामें कुछ गुणोंकी पुनरावृत्ति है। चौदहवाँ सूत्र प्रतीयमानरूपसे पुराने रूपपर लौट जाना ‘प्रतिषेधका प्रतिषेध’ है। &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;की दृष्टिमें प्रत्येक वस्तु महाविराट्का ही अंश है। सुतरां मूलके गुण-धर्म, शाखा-उपशाखाओंमें होने उचित ही हैं। कारणकी अपेक्षा कार्योंमें अनिर्वचनीय विलक्षणता भी होती ही है। स्पष्टतया स्पर्शहीन आकाशसे स्पर्शवान् वायुकी, रूपहीन वायुसे रूपवान् तेजकी उत्पत्ति स्पष्टरूपसे होती है। मनमानी ढंगसे विकास तो जडवादी ही मानते हैं। अध्यात्मवादी तो हरएक कार्यके साधारण, असाधारण—कई ढंगके कारण मानते हैं, परंतु सभी कारण दृष्ट ही नहीं, कुछ अदृष्ट भी होते हैं। दिक्, काल, आकाश, ईश्वर, अपूर्व ‘अदृष्ट’ प्रागभाव, प्रतिबन्धकाभाव आदि साधारण कारण होते हैं। उपादान, निमित्त, सहकारी आदि अनेक असाधारण कारणका योग होता है, तभी कोई विकार सम्पन्न होता है। विरोधियोंके एकत्वकी अपेक्षा सहयोगियोंके सहयोगसे कार्यकी उत्पत्ति कहना कहीं अधिक संगत है। विरोधियोंके संघर्षकी कल्पनाकी अपेक्षा यही कहना ठीक है कि किसी समान उद्देश्यकी सिद्धिके लिये विरोधी भी सहयोगी हो जाते हैं। विरोधियोंके संघर्षका सहयोगरूपमें परिवर्तन हुए बिना दोमेंसे एकका विनाश ध्रुव है। फिर विरोधियोंकी एकताका स्वप्न व्यर्थ ही है। संघर्ष रहते हुए पदविस्तारकी कल्पना भी निराधार है। वस्तुके विश्लेषण तथा समन्वयका एकीकरण क्रमेण विश्लेषण, विभाजन तथा समन्वय हो सकता है, परंतु समकालमें दोनोंका अस्तित्व तथा एकीकरण असंगत एवं अप्रमाणित है। प्रत्येक वस्तुके सम्बन्धोंका बहुविधत्व, सार्वभौमत्व अंशत: ठीक ही है; पर इसमें भी सहयोग विरोध तथा उदासीनताको भी गिन लेना चाहिये। वाच्यत्व, प्रमेयत्वादि तथा दैशिक, कालिक सार्वभौम सम्बन्ध अध्यात्मवादको भी मान्य है। किंतु इससे कोई मार्क्सीय अभिप्राय नहीं सिद्ध होता। विपरीतोंका एकत्व तथा प्रत्येक गुणका रूपान्तरित होना सारशून्य है। भाव-अभाव, सत्-असत् आदि विपरीतोंकी एकता असम्भव है, यह कहा जा चुका है। अग्नि, जल, सत्त्व, रज आदि विपरीतोंका एकत्व न कहकर सहयोग ही कहना ठीक है। कारणकी अपेक्षा कार्योंमें तथा अल्पसंख्यकोंकी अपेक्षा बहुसंख्यकोंमें गुणधर्मका वैलक्षण्य अध्यात्मवादमें मान्य है। मृत्तिकासे जलानयनका कार्य नहीं सम्पन्न होता, मृत्तिकाके कार्य घटसे वही कार्य सम्पन्न हो जाता है। तृण साधारण नगण्य तथा अल्पशक्ति होता है, पर वही सामूहिकरूपमें एकत्रित रज्जु बनकर दुरुच्छेद्य बन जाता है। वस्तुत: कारणसे भिन्न होकर कार्य नहीं होता, फिर भी व्यवहारमें कारण-कार्यका वैलक्षण्य मान्य होता है। अतत्त्वभूत रज्जुसर्पसे भी सत्य भय-कम्प आदि देखा जाता है। अतएव नये पार्श्वों और सम्बन्धोंकी कल्पना निराधार है; क्योंकि अत्यन्त अविद्यमान कोई वस्तु या सम्बन्ध व्यक्त नहीं होता है। वटबीजमें जितनी शक्ति विद्यमान है, उतना ही विकास होता है। विकास ही नहीं, किंतु विकासके साथ ह्रास भी स्पष्ट दिखायी देता है। संश्लेषण-विश्लेषणकी विचित्रतासे शक्तियोंमें विचित्रता भी परिलक्षित होती है। औषधोंके संयोग-वियोग तथा पौधोंके कलम ‘जोड़’ से तथा बीजोंके संस्कारसे विकासमें विचित्रता होती है; फिर भी विकास निस्सीम नहीं है। प्रत्येक वस्तुमें ‘जायते अस्ति वर्धते’ के बाद ही ‘विपरिणमते अपक्षीयते एवं विनश्यति’ की स्थिति आ जाती है। अर्थात् उत्पत्ति वृद्धिकी एक सीमा है। उसके बाद ही विपरिणाम, अपक्षय एवं विनाश आ जाता है। व्यष्टिमें जो गुण-धर्म हैं, समष्टिमें भी उनका अस्तित्व रहता है। अत: शुद्ध स्वप्रकाश ब्रह्मातिरिक्त किसी भी वस्तुको निस्सीम नहीं कहा जा सकता। जब संसारमें सावयव पदार्थोंकी उत्पत्ति और विनाश दृष्ट है, तब सावयव विश्व-प्रपंचकी भी उत्पत्ति तथा विनाश मानना अनिवार्य है। प्रवाह भी प्रवाहियोंसे भिन्न नहीं होता। दिन-रातका प्रवाह या बीजांकुरका प्रवाह एवं कर्म तथा देहोंका प्रवाह आदि सभी प्रवाह प्रवाहियोंके अनित्य होनेसे अनित्य ही है। जिस वस्तुका प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अन्योन्याभाव तथा अत्यन्ताभाव बन सकता है, उस वस्तुको निस्सीम कहना उपहासास्पद ही है। जैसे अनादि परमाणुकी श्यामता अग्निजन्य पाकसे नष्ट होती है, अग्निसे दग्ध होनेसे अनादि बीजांकुरकी परम्परा टूट जाती है, उसी तरह विश्वप्रपंचकी परम्परा भी कालसे किंवा तत्त्वज्ञानसे टूट जाती। मार्क्सवादी विश्वकी निस्सीमतामें प्रत्यक्ष-प्रमाण एवं प्रत्यक्ष साधन-यन्त्रोंका प्रयोग वर्तमान कालके लिये जो भी करें, परंतु भविष्यके सम्बन्धमें तो प्रत्यक्ष या यन्त्र कथमपि सफल नहीं हो सकते। अनुमान कोई ऐसा निर्दोष नहीं है, जिससे विश्वकी अनन्तता या निस्सीमता विदित हो सके। फिर क्रिया कोई भी चाहे वह प्रातिस्विक हो या सामूहिक, नि:सीम नहीं कही जा सकती। मनुष्यद्वारा वस्तु, दृश्य, क्रिया इत्यादिके ज्ञानकी गहराईमें ले जानेकी तथा बाह्यावरणसे तत्त्वपर और कम गहराईके तत्त्वसे अधिक गहराईपर पहुँचनेकी असीम क्रियाकी बात भी कल्पना ही है। अतत्त्व अनात्मसम्बन्धी ज्ञान यद्यपि अल्पज्ञ जीवके लिये असीम ही है; फिर भी सर्वज्ञ ईश्वरके लिये वह भी निस्सीम नहीं। दूसरी दृष्टिसे ज्ञातरूपसे तथा अज्ञातरूपसे सभी वस्तु साक्षीभास्य हैं—‘किञ्चिज्जानामि किञ्चिन्न जानामि’ अमुकको नहीं जानता हूँ, अमुकको जानता हूँ—इस रूपसे अज्ञानविषयतया या ज्ञानविषयतया सभी वस्तु साक्षीभास्य हैं। सर्वकारण सर्वाधिष्ठानरूपसे भी परम तत्त्वका ज्ञान अन्तिम ही तत्त्वज्ञान है। इसी ज्ञानके सम्बन्धमें गीताचार्यका कहना है— ‘यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते॥’ (७।२) जिसको जानकर पुन: अन्य कुछ भी ज्ञातव्य नहीं रहता। ‘एतद‍्बुद्‍ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत॥’ (१५।२०) इस तत्त्वको जानकर प्राणी बुद्धिमान् होता है और कृतकृत्य हो जाता है। उपनिषदें भी कहती हैं—आत्माके श्रवण, मनन, विज्ञानमें सबका श्रवण, मनन तथा विज्ञान हो जाता है— ‘आत्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम्॥’ (बृहदा० उप० २।४।५) जैसे पृथ्वीके विज्ञानसे पार्थिवतत्त्व, जलके विज्ञानसे जलीयतत्त्व तरंग आदिका विज्ञान हो जाता है, वैसे ही सर्वकारण सर्वाधिष्ठानके विज्ञानसे सब कुछ विज्ञात हो जाता है। सहयोगियोंका सहअस्तित्व तो सभी मानते हैं। विरोधियोंका सहअस्तित्व अगर मार्क्सवादको मान्य है, तब तो फिर मजदूर और मालिकका भी सहअस्तित्व हो ही सकता है। फिर मार्क्सवादी चूहा, बिल्लीके तुल्य वर्गोंका अमिट विरोध क्यों मानते हैं? पारस्परिक सम्बन्ध तथा निर्भरताकी बात अच्छी है, पर स्वात्मनिर्भरताका भी महत्त्व नहीं भूलना चाहिये। परमुखापेक्षिता दोष भी है। अध्यात्मपक्ष माननेपर तो बाह्य साधनानपेक्षता बड़े ही महत्त्वकी वस्तु है। उत्तरोत्तर ज्ञान, क्रिया, शक्तिका विकास हो रहा है, संसार उन्नतिके उच्च शिखरकी ओर बढ़ रहा है, इस विश्वासमें भी अन्धविश्वासका ही अंश अधिक है। स्तर-भेद होनेपर भिन्नता ही कहनी चाहिये, पुनरावृत्ति नहीं। प्रतिषेधके प्रतिषेधकी मार्क्सवादी मान्यता असंगत है, यह पीछे दिखाया जा चुका है। अंकुरके कारणभूत जौके दाने अंकुरके फलभूत जौके दानोंसे सर्वथा भिन्न हैं। यह प्रतिषेधके प्रतिषेधका उदाहरण नहीं हो सकता। इसका शुद्ध उदाहरण पीछे दिखलाया जा चुका है। ‘पन्द्रहवाँ सूत्र लेनिनका है—रूप और सार, आकार और आकारके अन्दर अस्तित्वका संघर्ष तथा इसका विपरीत। सोलहवाँ सूत्र है—परिमाणका गुणोंमें परिवर्तन तथा इसका विपरीत; व्याख्या और उदाहरण। जीवनका उदाहरण प्रकृतिके द्वन्द्वात्मक रूपपर स्पष्ट प्रकाश डालता है। अवयवके तथा कोषके जीवनमें जीवन और मृत्यु, आविर्भाव और तिरोभाव, अन्तर्ग्रहण तथा बहिर्मोचन, भूत और शक्तिको ये पास-पास ही मिलते हैं तथा परस्पर संश्लिष्ट रहते हैं। इसके अतिरिक्त पूँजीवादमें अन्तर्विरोधके तीन सूत्र हैं—१. प्रत्येक भिन्न फैक्टरीमें उत्पादनका सुचारुरूपसे संघटन होता है और सामाजिक उत्पादन क्षेत्रमें अराजकताकी चेष्टा की जाती है। २. एक ओर मशीनकी उत्पत्ति और उत्पादनका विस्तार प्रत्येक पूँजीवादीके लिये बाध्यतामूलक नियम है; दूसरी ओर उद्योगकी रिजर्व सेनामें वृद्धि और सामयिक संकटका बार-बार होना, ये उत्पादनके सम्बन्ध पूँजीवादी उत्पादन सम्बन्धोंके विरुद्ध विद्रोह करते हैं। ३. सम्पूर्ण पूँजीवादी प्रथामें एक ओर पूँजी ही सम्पत्ति है और दूसरी ओर उद्योगमें पूँजीका प्रयोग किया जाता है, यानी एक ओर बैंकमें एकत्रित पूँजी है और दूसरी ओर औद्योगिक पूँजी है। इस प्रभेदके उदाहरण हैं सूदजीवी, जिनकी जीविका है पूँजीपर सूदद्वारा और दूसरे जो अपनी जीविका पूँजीके व्यावहारिक प्रयोगसे अर्जन करते हैं।’ (लेनिन) ‘हर प्रथा या क्रियाके आन्तरिक विरोधोंके रूप और गुण भिन्न होते हैं। सर्वहाराके अधिनायकत्वमें राष्ट्रका लोप भी विरोधका उदाहरण है, पर यही वर्ग-संघर्षके अन्तका कारण बन जाता है और इस प्रकार राष्ट्रका लोप होता है। आपेक्षिक और पूर्ण सत्य भी विरोधका उदाहरण है। विशिष्ट और व्यापकके सम्बन्धमें अन्त:प्रवेश भी विरोधका एक उदाहरण है। व्यापक (साधारण)-के सम्बन्धसे विच्छिन्न होकर विशिष्टका कोई अस्तित्व नहीं है और विशिष्टोंसे ही व्यापकका अस्तित्व है। प्रत्येक व्यापकरूप केवल करीब-करीब ही सब विशिष्ट वस्तुओंको अपनी व्यापकतामें ला सकता है और प्रत्येक विशिष्ट वस्तु कुछ-न-कुछ व्यापक रूप ग्रहण करती है।’&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और रामराज्य, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अतिभौतिक</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>एकसत्तावाद</category><category>द्वन्द्वमान</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>9.4 ऐतिहासिक द्वन्द्ववाद ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/9-4-aitihaasik-dvndvvaad-maa/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/9-4-aitihaasik-dvndvvaad-maa/</guid><description>9.4 ऐतिहासिक द्वन्द्ववाद कहा जाता है कि ‘इतिहासके लिये भी यही बात लागू है। सब सभ्य जातियोंका, जो एक निर्दिष्ट अवस्थाको पार कर चुकी हैं, आरम्भ भूमिके सामृद्धिक स्वामित्वसे होता है। कृषिके विकासके ल…</description><pubDate>Sun, 08 Jun 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;9.4 ऐतिहासिक द्वन्द्ववाद&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;कहा जाता है कि ‘इतिहासके लिये भी यही बात लागू है। सब सभ्य जातियोंका, जो एक निर्दिष्ट अवस्थाको पार कर चुकी हैं, आरम्भ भूमिके सामृद्धिक स्वामित्वसे होता है। कृषिके विकासके लिये एक स्तरपर भूमिका सामूहिक स्वामित्व उत्पादन-क्रियाके लिये बाधकस्वरूप बन जाता है। इसका अन्त किया जाता है, इसका प्रतिषेध होता है और कुछ बीचके स्तरोंको पारकर व्यक्तिगत सम्पत्तिमें रूपान्तरित हो जाता है, व्यक्तिगत सम्पत्तिसे ही कृषिका ऊँचे स्तरपर विकास होता है, लेकिन व्यक्तिगत सम्पत्ति ही आगे चलकर कृषि-उत्पादनकी क्रियाके लिये बाधकस्वरूप हो जाती है। अब इसके प्रतिषेधकी और भूमिपर सामूहिक स्वामित्वकी माँग होने लगती है, लेकिन यह मूलरूपसे बहुत भिन्न होगा, जिसमें आधुनिक आविष्कारोंका पूरा उपयोग किया जा सकेगा।’ पर यह कहना भी संगत नहीं है। भूमिपर सामूहिक स्वामित्व ऐतिहासिक नहीं है। ईश्वर-निर्मित भूमि ईश्वरकी थी। बलिकी पत्नी विन्ध्यावलिने भगवान् वामनसे कहा था कि आपने क्रीड़ाके लिये ही जगत‍्की रचना की है, परंतु दुर्बुद्धि-लोग उसे अपना समझने लगते हैं। आप सर्वकर्ता हैं, आपहीद्वारा जीवोंमें भी कर्तृत्व सफल होता है, फिर बलि आदि आपको क्या दे सकते हैं— क्रीडार्थमात्मन इदं त्रिजगत् कृतं ते स्वाम्यं तु तत्र कुधियोऽपर ईश कुर्यु:। कर्तु: प्रभोस्तव किमस्यत आवहन्ति त्यक्तह्रियस्त्वदवरोपितकर्तृवादा:॥ (श्रीमद्भा० ८।२२।२०) ईश्वरके उत्तराधिकारी ब्रह्मा, इन्द्र, मनु आदि हुए। धर्म-नियन्त्रणकी स्थिति कमजोर पड़नेपर मात्स्यन्याय-निराकरणके लिये जनताने मनुको शासक बनाया। तदनन्तर विभिन्न व्यक्ति भी व्यष्टिभूमिके ही स्वामी हुए। प्राणियोंका कर्मद्वारा सृष्टिमें हाथ होता है, कर्मोंके अनुसार ही और भोग-साधन प्राप्त होते हैं। हिरण्यगर्भ, मन आदिको कर्मानुसार समष्टि-भोग-साधन मिलते हैं, सामान्य जीवोंको भी व्यष्टि-भोगसाधन कर्मोंके अनुरूप ही मिलते हैं। कोई वस्तु ईश्वर या प्रकृतिद्वारा निर्मित है, एतावता वह सबकी है—ऐसा नहीं कहा जा सकता। एक स्त्री भी प्रकृतिद्वारा निर्मित होती है, तो भी उसपर माता-पिताका ही स्वत्व होता है। पश्चात् उनके द्वारा दिया हुआ स्वत्व पति आदिको मिलता है या स्वयं वह जिसे स्वत्व समर्पण करती है, उसे मिलता है। जिस रूपमें भूमि, आकाशादिपर कभी सामूहिक स्वामित्व था, उस रूपमें आज भी है ही। भूमिपर सभी प्राणियोंको जीवित रहने, चलने-बैठने, श्वास लेने, अवकाश ग्रहण करनेका अधिकार सदा मिला, आज भी है, परंतु विशिष्टरूपसे भूमिका स्वामित्व भूमिपतिका ही है। भूमिपतिद्वारा दिया हुआ सीमित भूमिपतित्व अन्यलोगोंको भी प्राप्त हुआ। इसीलिये भूमिकर देनेकी प्रथा है। यह कोई भी व्यवस्था सर्वथा आगन्तुक एवं नवीन नहीं है। व्यक्तिगत सम्पत्तिसे ही कृषिका जैसे ऊँचे स्तरपर विकास हुआ, इसी प्रकार आगे भी व्यक्तिगत भूमिका अपहरण किये बिना उसका उच्चतम विकास हो सकता है। अमेरिका आदिमें भी वैसा ही विकास हो रहा है। बड़े कामोंके लिये सहकारिताके आधारपर सम्भूयोत्थान (सम्मिलित कृषि, व्यापारादि) पहले भी होता था, यह अन्यत्र दिखाया गया है, वैसे ही अब भी हो रहा है, आगे भी हो सकेगा। अत: भूमि, सम्पत्ति आदिका अपहरण प्रतिषेधके प्रतिषेधका उदाहरण नहीं हो सकता है। उन्नत साधनोंसे फलमें उन्नति होती है। इस दृष्टिसे जब भी पहले या पीछे उन्नत साधन होते हैं, तब कृषि उन्नत होती है। आज भी जहाँ उन्नत साधन नहीं मिलते, वहाँ खेतीका वह निम्नरूप है। अनेक स्थानोंमें आज भी सामूहिक खेतियोंसे व्यक्तिगत खेतियाँ उच्चकोटिकी होती हैं। दूसरी दृष्टिसे अन्न, फल आदिकी उत्पत्ति और अच्छाई तथा मात्रा पहले बहुत अच्छी थी, अब कम अच्छी है। जिन खेतोंमें पहले बीस मन अन्न पैदा होता था, उनमें आज पाँच मन भी उत्पन्न नहीं होता। पशुओं, मनुष्योंकी भी जैसी बुद्धि, शक्ति, आकार, बल-पराक्रम हजारों वर्ष पहले था, उससे आज ह्रास ही है। मनुष्योंके पुराने अस्थिपंजर तथा प्राचीन तलवारों और भालोंके बृहत् आकार इसके साक्षी हैं। समाजवादी कहते हैं कि ‘यह बात इतिहाससे सिद्ध है कि पारिवारिक और वैयक्तिक सम्पत्ति एकत्रित करनेके नियम चलनेसे पहले मनुष्य हजारों वर्षतक श्रेणी-भेदके बिना आदिम समष्टिवादकी अवस्थामें रहा है’, पर यह ऐतिहासिक तत्त्व आधुनिक लोगोंका स्वगोष्ठीनिष्ठ सिद्धान्तमात्र है। संसारके सबसे प्राचीन इतिहास महाभारत और रामायण हैं, जिनकी बहुत कुछ सत्यता मोहन-जो-दड़ो तथा हड़प्पाके भूगर्भसे मिली हुई वस्तुओंसे सिद्ध होती है। उन आर्ष इतिहासों एवं अपौरुषेय &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;ादि शास्त्रोंसे सिद्ध है कि न केवल मनुष्योंमें ही, किंतु देवताओं, पशुओं, वृक्षोंमें भी ब्राह्मण आदि भेद सृष्टिकालसे ही है। अवश्य यह श्रेणी-भेद शोषक तथा शोषितके आधारपर नहीं हुआ, किंतु धर्मके आधारपर ब्राह्मण, क्षत्रिय आदि श्रेणी-भेद और उसके अनुसार ही श्रौत-स्मार्त धर्म एवं जीविकाओंके विधान हुए, ‘न वै राज्यं न राजासीन्न च दण्डो न दाण्डिक:’ (महा० शा० ५९।१४) आदि पूर्वोक्त सर्वोत्कृष्ट धर्म-नियन्त्रणके युगमें भी धर्म तथा ब्राह्म आदि श्रेणियोंकी सत्ता थी ही। ‘पुराकालमें सब ब्राह्मण ही थे, क्षत्रिय आदि न थे। स्त्रियाँ भी विवाहित न होती थीं, सम्पत्ति सामूहिक होती थी।’ आदि बातें भी अत्यन्त असंगत हैं। अनादि सृष्टि-संहारकी परम्परामें मूलभूत धर्मपरम्परा भी अनादि है। तन्मूलक वर्णाश्रम-धर्म पातिव्रत्यादि-धर्म भी अनादि ही हैं। कभी भी उत्पत्ति-क्रममें कार्योत्पत्तिके पहले कारण ही रहता है, वायुकी उत्पत्तिके पहले आकाश था ही। क्रम-वर्णनमें क्षत्रिय आदि उत्पत्तिके पहले ब्राह्मण ही थे, विवाह होनेके पहले स्त्रियाँ आज भी अविवाहित होती हैं। आज भी घट बननेके पहले मृत्तिका ही रहती है, परंतु इससे ब्राह्मणादि वर्णों तथा विवाहादि धर्मोंकी अनादितामें कोई बाधा नहीं आती। अतएव इन सबोंका उत्पत्ति-क्रम-वर्णनमें ही तात्पर्य है। आकाशसे वायु, वायुसे तेज एवं तेजसे जल तथा जलसे पृथ्वीकी उत्पत्ति होती है। यह कहा जा सकता है कि पृथ्वी, जलके उत्पत्तिके पहले तेज ही था, तेजसे भी पहले वायु ही था, वायुसे भी पहले आकाश था और कुछ नहीं था। उसी तरह भगवान‍्की मुखशक्तिसे ब्राह्मणकी उत्पत्तिके पश्चात् बाहुकी शक्तिसे क्षत्रियकी उत्पत्ति हुई। तत्पश्चात् उदर या ऊरुसे वैश्य, पादसे शूद्रकी उत्पत्ति हुई। उत्पत्तिक्रममें पौर्वापर्य होता ही है, उसीमें अभावका व्यवहार होता है। जबकि अनादि वेदोंद्वारा ही प्रतिकल्पकी सृष्टि होती है और अनादि वर्णाश्रम-धर्मका प्रतिपादन होता है। अनादि ही पातिव्रत-धर्मका प्रतिपादन है, तब अमुक वर्ण या अमुक धर्म पहले नहीं था—इत्यादि कल्पनाएँ निराधार एवं अप्रमाणित हैं। जीव ईश्वरके समान ही धर्माधर्म भी अनादि हैं। तदनुसार ही तद‍्बोधक शास्त्र एवं तदनुयायी वर्णाश्रम-धर्म भी अनादि हैं। ब्राह्म आदि विवाहोंसे सवर्णामें उत्पन्न ही ब्राह्मणादि वर्ण हैं, अत: विवाह आदि सभी अनादि हैं। श्वेतकेतु आदिकी कथाएँ गुणवादसे लक्ष्यार्थमें पर्यवसित हैं, वाच्यार्थमें नहीं। अर्थात् कुन्तीको देवताओंसे संतानोत्पादनमें प्रवृत्त करनेके लिये यह अर्थवाद है और अर्थवाद भी जहाँ प्रमाणान्तरसे विरुद्ध अर्थका प्रतिपादक होता है, वहाँ भूतार्थवाद न होकर गुणवाद ही होता है अर्थात् उसका वाच्यार्थमें कुछ भी तात्पर्य न होकर प्रशंसा या निन्दाद्वारा प्रवृत्ति या निवृत्तिमें ही तात्पर्य होता है। सिद्धान्तत: ह्रास-विकासका चक्र ही सिद्ध है। तदनुसार कभी ब्राह्मणोंकी बहुलता, कभी शूद्रोंकी बहुलता होती है, अर्थात् कभी ज्ञान-विज्ञानप्रधान मनुष्योंकी बहुलता होती है, कभी शिल्पादि कर्म-प्रधान मनुष्योंकी— यथा कृतयुगे पूर्वमेकवर्णमभूत् किल। तथा कलियुगस्यान्ते शूद्रीभूता: प्रजास्तथा॥ (मत्स्यपुराण १४३।७८) &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt;ी कहते हैं कि ‘&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-paashcaaty-drshn-1-1-drshnkii/&quot;&gt;दर्शन&lt;/a&gt;के क्षेत्रमें स्वयं द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद ही एक ऐसा उदाहरण है। पहलेके भौतिकवादका प्रतिषेध हुआ आदर्शवाद और इस आदर्शवादका प्रतिषेध हुआ फिर भौतिकवाद। लेकिन यह भौतिकवाद यान्त्रिक भौतिकवाद नहीं, बल्कि द्वन्द्वात्मक भौतिकवाद है। दार्शनिक क्षेत्रमें एक और उदाहरण है, रूसोके समतावादका तथ्य। रूसोके अनुसार प्राकृतिक बर्बर युगमें सब मनुष्य समान थे। रूसो भाषाको भी इस प्राकृतिक अवस्थाका विकार मानता है, उसके अनुसार एक ही जातिके पशुओंके बीचकी समताको उन पशु-मनुष्योंके लिये भी लागू करना चाहिये, जिनको हैकलने एक आनुमानिक श्रेणीयुक्त किया है, आलालीमूक। लेकिन इन पशु-मनुष्योंको अन्य पशुओंकी अपेक्षा एक सुविधा थी, उन्नतिकी शक्ति और यही असमताका कारण थी। इसलिये असमतामें भी रूसो उन्नतिका कारण देखता है। लेकिन यह उन्नति विरोधपूर्ण थी। यह साथ-ही-साथ अवनति भी थी। उन्नतिका मार्ग यही था कि मनुष्य व्यक्तिगतरूपसे पूर्णताकी ओर कदम बढ़ाता, लेकिन यही कदम मनुष्य-जातिके लिये अवनतिका भी कदम था। सभ्यताका हर एक कदम असमताकी ओर अग्रसर होता था। यह निर्विरोध सत्य है और वैधानिक नियमका मूल सत्य भी है कि लोग सरदारोंको चुनते हैं अपनी स्वतन्त्रताकी रक्षाके लिये, न कि उसका अन्त करनेके लिये। फिर भी ये सरदार अवश्य ही लोगोंको सतानेवाले बन जाते हैं और यहाँतक सताते हैं कि यह असमता चरम सीमापर पहुँचकर अपने विपरीत बन जाती है और समताका कारण बन जाती है; क्योंकि निरंकुश शासकके सामने सब समान हैं, सब शून्य हैं। लेकिन यह शासक तभीतक प्रभु है, जबतक वह जबरदस्त है और जब वह निकाला जाता है, तब जबरदस्तीकी शिकायत नहीं कर सकता। शक्ति ही उसकी प्रभुता बनाये रखती है। अन्तमें शक्तिसे ही उसका पतन होता है। सब प्राकृतिक और सही रास्तेपर ही चलते हैं। इस प्रकार असमता फिर एक बार समतामें रूपान्तरित हो जाती है। लेकिन यह मूक प्राथमिक मनुष्यकी प्राकृतिक समता नहीं है, यह समाजकी उन्नत समता है। सतानेवाले सताये-जानेवाले हो जाते हैं, प्रतिषेधका प्रतिषेध हो जाता है।’ उपर्युक्त कथन भी असंगत ही है; क्योंकि किसी भी शास्त्रार्थमें जब एक पक्षका खण्डन होता है, तब वह दूसरे प्रकारसे अपने खण्डित पक्षका समर्थन करता है। जैसे द्वैत-अद्वैत पक्षके ही शास्त्रार्थकी बात लीजिये। श्रीमध्वके द्वैतका खण्डन मधुसूदनने ‘सिद्धान्तबिन्दु’ ग्रन्थके द्वारा किया। उसका खण्डन करके ‘न्यायामृत’ द्वारा पुन: द्वैतका प्रतिष्ठापन हुआ। उसका खण्डन पुन: ‘अद्वैतसिद्धि’ द्वारा हुआ। पुनश्च ‘न्यायामृत-तरङ्गिणी’ द्वारा उसका प्रतिष्ठापन हुआ, पुनश्च ‘गौड़ब्रह्मानन्दी’ द्वारा उसका खण्डन हुआ, ‘न्यायभास्कर’ द्वारा पुन: प्रतिष्ठापन हुआ। ‘न्यायेन्दुशेखर’ द्वारा पुन: खण्डन होनेपर पुन: प्रतिष्ठापनार्थ प्रयत्न हुआ, परंतु एतावता उनके पहलेके द्वैत और अद्वैतसे पिछले द्वैत-अद्वैतमें कोई भेद नहीं हुआ। इसी तरह जडवाद एवं भौतिकवादका भले ही सहस्रों बार खण्डन तथा मण्डन हो, तथापि वस्तुत्वमें कोई अन्तर नहीं पड़ता। ऐसे प्रतिषेधके प्रतिषेधको प्रतिप्रसव कहा जाता है। दर्शनशास्त्रोंमें सिद्धान्तत: भी इसके उदाहरण मिलते हैं। जैसे संन्यासका विधान, पुनश्च कलियुगके लिये निषेध, पुनश्च कलिमें भी वर्णविभाग वैदिकधर्म-प्रवृत्ति-पर्यन्त विधानद्वारा प्रतिषेधके प्रतिषेध होनेसे विधानका प्रतिप्रसव होता है। यह निर्दोष उदाहरण है। इसी प्रकार व्याकरणकी दृष्टिसे राम शब्दके प्रथमा या द्वितीयाके द्विवचनमें ‘राम औ’ इस स्थितिमें ‘वृद्धिरेचि’ से वृद्धि प्राप्त होती है। उसका बाधकर ‘प्रथमयो: पूर्वसवर्ण:’ से पूर्वसवर्ण दीर्घ प्राप्त होता है। पुनश्च ‘नादिचि’ से उसका बाध होकर ‘वृद्धिरेचि’ से वृद्धि हो जाती है। तब ‘रामौ’ शब्द बनता है। भौतिकवाद एवं आदर्शवादके तत्त्वोंमें कोई भी अन्तर नहीं है। यह नहीं कहा जा सकता कि वस्तुत: पहले भौतिकवादका खण्डन हो गया था और अब वह पुन: सिद्ध ही हो गया है। रूसो, हैकेल आदिकोंके मन:कल्पित इतिहासकी अपेक्षा ऋषियोंके आर्ष इतिहासका महत्त्व कहीं अधिक है। तदनुसार सृष्टिकालके वसिष्ठ, अत्रि आदि उच्चकोटिके महामानव थे। उनके धर्म, योग, वेदान्त आदिके सिद्धान्त आजके सभ्य कहे जानेवाले नरपशुओंको दुर्विज्ञेय ही हैं। उनमें जो आध्यात्मिक समता थी, वह आज भी है। विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि। शुनि चैव श्वपाके च पण्डिता: समदर्शिन:॥ (गीता ५।१८) सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु। साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते॥ (गीता ६।९) विद्वान् सदा ही सर्वत्र समब्रह्मका दर्शन करता है, यही समता है। शरीर-बुद्धि या कर्म अथवा उसके फलकी दृष्टिसे न कभी समता थी, न होनेवाली है। पशुतुल्य मनुष्य असंस्कृत मूक तभी होता है, जब उसका सद‍्गुरु-सम्बन्ध नहीं होता। आज भी यह बात स्पष्ट है। जहाँ शिक्षण है, वहाँ ज्ञान-विद्या विकसित होती है; जहाँ शिक्षण नहीं है, वहाँ विकास नहीं होता। ईश्वरने ब्रह्माको नियुक्त करके उसे नित्य वेदोंका उपदेश दिया— ‘यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै।’ (श्वेता० उप० ६।१८) ब्रह्माने सनकादिको एवं मरीचि आदिकोंको उत्पन्न करके उन्हें वेदादि शास्त्रोंका उपदेश किया है। जिन मनुष्योंका प्रमादवश उक्त सम्पर्क टूट गया, वे ही पशुतुल्य हो गये हैं। हॉब्स, लाक, रूसो आदिकी कल्पनाएँ परस्पर भी टकराती हैं। हॉब्सके मतानुसार ‘आदिम प्राणी समताकी स्थितिमें नहीं था, किंतु खूँखार था।’ लाकका ‘आदिम मनुष्य बहुत नेक था’, रूसोका भी ऐसा ही था। सुकरातके अनुसार ‘मनुष्य स्वभावसे ही सामाजिक प्राणी है’ इनके अनुबन्धीय राज्यको भी अन्य दार्शनिक अनैतिहासिक कहते हैं। हैकलका अनुमान केवल उसका दिमागी फितूर ही है। मनुष्यों एवं पशुओंके वैषम्यका कारण उनके जन्मान्तरीय कर्म मानने पड़ेंगे। निर्हेतुक शक्तिवैषम्यकी उपपत्ति हैकलके पास कुछ नहीं है। मनुष्योंमें भी कर्मतारतम्यसे ही उन्नतिकी शक्तिमें तारतम्य होता है और इसका भी अन्तिम उद्देश्य है, उस आध्यात्मिक स्तरपर समता स्थापित करना, जिससे अधिक उन्नति हो ही नहीं सकती। व्यक्तिगत उन्नतिकी ओर कदम बढ़ाना कभी भी अवनतिका कारण नहीं होता। व्यक्तिका समुदाय ही समाज है, व्यक्तिगत उन्नतिसे समाजकी उन्नति सुतरां सम्भव होती है। उन्नति एवं सभ्यताका कोई भी कदम अवनतिका कदम नहीं है। क्या कोई विद्वान् बलवान् बनता है, एतावता किसीका नुकसान होता है? इतनी सहज-सी चीजको आधुनिक सभ्योंने कितने उल्टे रूपमें ग्रहण किया है? यदि किसी ऊँचे स्थानपर १०० मनुष्य चढ़नेके लिये अग्रसर होते हैं और यदि कुछ आलसियों, दीर्घसूत्रियोंको पीछे छोड़कर कुछ लोग आगे बढ़ते हैं तो स्पर्धासे दूसरे भी आगे बढ़नेके लिये दीर्घसूत्रता और आलस्य छोड़ेंगे ही। अत: आगे कदम बढ़ानेसे यदि विषमता होती है, तो यह भी उन्नत स्तरपर समताकी ओर ले जानेका ही प्रयत्न है। मुखिया, सरदार या राजाको सदा ही धर्मनियन्त्रित होना आवश्यक है। उच्छृंखल होना धर्महीनताका परिणाम है, सरदार या राजा होनेके कारण नहीं। धर्महीन राज्योंमें ही उच्छृंखल या निरंकुश शासक होते हैं; वेन, रावणादि इसके उदाहरण हैं। मनु, इक्ष्वाकु, नृग, नल, मान्धाता, राम, युधिष्ठिर आदि धर्मनियन्त्रित राजाओंमें निरंकुशताका लेश भी नहीं हो सकता था। समाजवादी ढंगकी समता उच्चकोटिकी होगी, यह उनके अपने घरकी ही कल्पना है। मुर्गों, कबूतरोंकी तरह साम्यवादी बन्धनमें मनुष्योंको सर्वथा परतन्त्र कर देना ही अगर समानता है, तो इससे कोई भी समझदार दूर ही रहना चाहेगा। यदि प्रकृति ही सबको सही रास्तेपर चलाती है, तब तो संसारमें प्रचलित शिक्षण-व्यवस्था एवं दण्डविधान पागलपन ही ठहरेगा और समाजवादियोंका भी प्रचार और उपदेश सब व्यर्थ ही सिद्ध होगा। अत: इसे प्रतिषेधके प्रतिषेधका उदाहरण समझना व्यर्थ है। प्रतिषेध कभी भी कारण नहीं हो सकता है। यदि प्रतिषेध ही कारण है, तब तो अवश्य ही मसलकर, जलाकर भी जौके दानेका प्रतिषेध होता ही है, फिर उससे अंकुरकी उत्पत्ति क्यों नहीं होती? यदि विशिष्ट प्रतिषेधसे अंकुरकी उत्पत्ति है, तो कहना पड़ेगा कि वह प्रतिषेध नहीं है, किंतु परिणामोपयोगी विकारमात्र है, प्रतिषेध या विनाश अभावात्मक ही है, विशेषता प्रतियोगीमें ही हो सकती है, अभावमें नहीं; क्योंकि कार्यके लिये विशिष्ट कारणका अन्वेषण होता है, प्रतिषेध या अभावका अन्वेषण नहीं होता। अत: प्रतिषेधसे या प्रतिषेधके प्रतिषेधसे किसी भी विशिष्टकार्यसिद्धिकी कल्पना व्यर्थ है। इसके अतिरिक्त प्रतिषेधका प्रतिषेध भावात्मक ही होता है। जैसे किसीको भ्रमवशात् रजतमें अरजत-बुद्धि होती है। तब वह कहता है कि ‘नेदं रजतम्’, पुनश्च जब उसका बोध होता है, तब उस प्रतिषेधका प्रतिषेध होता है—‘इदं नारजतम्’। यह अरजत नहीं है, इसका फल होता है, रजतका व्यवस्थापन। प्रकृतिमें जिस बीजका प्रतिषेध होकर अंकुरकी उत्पत्ति होती है, उस अंकुरके प्रतिषेधसे भी उस बीजका पुन: व्यवस्थापन नहीं होता। अत: वस्तुत: यहाँपर प्रतिषेधका प्रतिषेध हुआ ही नहीं। अंकुरको प्रतिषेधका फल किसी तरहसे कहा भी जाय, परंतु वह प्रतिषेधरूप नहीं हो सकता और बीजको भी अंकुर प्रतिषेधका फल भले ही कहा जाय, परंतु अंकुरको प्रतिषेध अंकुर फल नहीं कहा जा सकता, अंकुरका कारणभूत बीज अन्य है, बीजसे अंकुरादि क्रमसे उत्पन्न फलरूप बीज उससे भिन्न होता है। पिता-पुत्रमें जैसे भेद होता है, वैसे ही प्रथम बीज एवं बीजजन्य फलभूत बीजोंमें भेद है। एक पिताके अनेक पुत्र होते हैं, वैसे ही एक बीजसे सैकड़ों फल उत्पन्न होते हैं। अत: यहाँ भी अन्तिम बीज प्रतिषेधका प्रतिषेध स्वरूप नहीं हो सकता। वस्तुत: प्रतिषेधके प्रतिषेधका व्यवहार वहीं होता है, जहाँ प्रतिषेधके प्रतिषेधसे प्रथम प्रतिषेधके प्रतियोगीका सत्त्व-व्यवस्थापन किया जाता है। जैसे रजतनिषेधका निषेध करके रजतके सत्त्वका व्यवस्थापन किया जाता है। कहा जाता है कि ‘विचारजगत् और द्वन्द्वन्याय तर्कशास्त्रका साधारण नियम है, ‘हाँ’ ‘हाँ’ है और ‘नहीं’ ‘नहीं’। इसके विपरीत द्वन्द्वमान कहता है कि ‘हाँ’ नहीं है और ‘नहीं’ हाँ है। ऊपरी दृष्टिसे द्वन्द्वमानकी भाषा बहुत ही विरोधपूर्ण है। लेकिन कुछ विचार करनेपर इसकी सत्यता प्रमाणित हो जायगी। तर्कशास्त्रके तीन बुनियादी नियम हैं। १. एकताका नियम, २. विरोधका नियम और ३. मध्यपरिहारका नियम। पहले नियमके अनुसार ‘क’ है, या ‘क’ = ‘क’ दूसरा नियम पहले नियमका नकारात्मकरूप है। इसका रूप है ‘क’ नहीं है = न ‘क’। तीसरे नियमके अनुसार किसीके लिये दो विरोधी गुण एक साथ नहीं हो सकते, वास्तवमें या तो ‘क’, ‘ख’ है या ‘क’, ‘ख’ नहीं हैं। यदि इनमेंसे एक बात सत्य है तो दूसरी असत्य है और दूसरी सत्य है तो पहली असत्य है। इनके मध्यमें कोई बात नहीं हो सकती।’ ‘युबेरवेगके निर्देशानुसार दूसरे और तीसरे नियमोंको इस प्रकार मिलाया जा सकता है। किसी विशिष्ट प्रश्नका, किसी वस्तुविशेषका अमुक गुण है या नहीं? उत्तर हो सकता है ‘हाँ’ या ‘नहीं’। ‘हाँ’ और ‘ना’ दोनोंमें उसका उत्तर नहीं दिया जा सकता। इन नियमोंमें कोई भूल नहीं मालूम पड़ती। फिर द्वन्द्वमानका नियम क्योंकर सही है? प्रकृतिमें ही इसका उत्तर मिल जाता है, जिसका विवरण पहले दिया जा चुका है और अभी आगे चलकर फिर दिया जायगा। अतिभौतिक विचारप्रणालीकी जो कि तर्कशास्त्रमें मिलती है, गड़बड़ी यह है कि व्यष्टि और समष्टि, इकाई और समूह—सबको एक साथ मिला दिया जाता है। इसी प्रकार निश्चित परिमाणोंमें हाइड्रोजन (उद्रजन) और ऑक्सीजनके मिश्रणसे पानी बनता है। आधिभौतिकवादके लिये पानीमें अम्लजन और उद्रजनका पृथक् अस्तित्व बना रहता है। केवल तर्कन्यायमें पानी तथा अम्लजन और उद्रजनका एकीकरण होता है। यह रहस्यमय कल्पना है। इससे यह परिणाम निकलता है कि अम्लजन और उद्रजन तथा पानी—सभी एक साथ आसपास रहते हैं और अनन्त कालतक रहेंगे।’ वस्तुत: पाश्चात्य अतिभौतिकवाद भी भौतिकवादके समान ही निस्तत्त्व है। वास्तविक अध्यात्मवाद एवं तर्क वेदान्तके सिद्धान्त बिना समझे हुए मार्क्सवादी उसके खण्डनकी निरर्थक चेष्टा करते हैं। अध्यात्मवादी जब कहता है, सत् सत् ही है असत् नहीं, असत् असत् ही है सत् नहीं, तब उसका तात्पर्य है कि कोई वस्तु उसी रूपसे उसी दृष्टिसे सत् एवं असत् दोनों नहीं हो सकती। इसी आधारपर अनेकान्तवादका खण्डन किया जाता है। सभी देशकालमें व्यभिचरित वस्तु ही है; किसी देशकालमें व्यभिचरित वस्तु असत् है। मृत्तिकाविकार घटादिमें मृत्तिका अव्यभिचरितरूपसे विद्यमान होती है। अत: वह घटादिकी अपेक्षा सत् है, परंतु मृत्तिकाका कारण जल है, जलकी अपेक्षा मृत्तिका असत् है। उसकी अपेक्षा जल सत्, परंतु सर्वकारण, स्वप्रकाश, अखण्डबोधस्वरूप सत् सर्वदेश, काल तथा वस्तुओंमें अव्यभिचरित होनेसे निरपेक्ष सत् है। तद्भिन्न सब वस्तु असत् ही है। यदि सत्-असत‍्की अव्यवस्था हो तो किन्हीं भी सिद्धान्तों, मन्तव्यों अर्थात् अनेकान्तवाद या मार्क्सवाद एवं द्वन्द्ववादके सम्बन्धमें भी वही बातें लागू होंगी। मार्क्सवाद भी एकान्तत: सत्य नहीं है। किसी रूपमें सत् है, अन्य रूपोंमें असत् भी है। फिर अनिश्चित सिद्धान्तमें किसीकी प्रवृत्ति कैसे होगी? अपेक्षा-बुद्धिसे भाव-अभावकी एकत्र स्थिति तो भारतीय दर्शनोंमें अधिक प्राचीनकालसे मान्य है— ‘भावान्तरमभावो हि कयाचित्तु व्यपेक्षया।’ अर्थात् किसी अपेक्षासे दूसरा भाव ही अभाव है। जैसे घटका घट-रूपसे भाव होनेपर पटरूपसे अभाव भी है। इसीलिये स्वरूप-पररूपसे हरेक वस्तु सत्, असत्, उभयात्मक है— ‘स्वरूपपररूपाभ्यां नित्यं सदसदात्मकम्।’ परंतु इतने मात्रसे सत्-असत‍्का अविरोध नहीं कहा जा सकता। स्वरूपसे सत् असत् नहीं हो सकता। अन्यरूपसे सत‍्का असत् होना यह अपेक्षाबुद्धिकृत है। नियम तभी निर्दोष होता है, जब वह अव्याप्ति, अतिव्याप्ति तथा असम्भव दोषोंसे मुक्त हो। विचित्र संसारमें गुणधर्मकी विचित्रता स्वाभाविक है। केवल कतिपय स्थलोंमें सहचार-दर्शनमात्रसे व्याप्ति नहीं होती। पार्थिवत्व एवं लोह लेख्यत्वका सर्वत्र सहचार होनेपर भी केवल हीरकमें अव्याप्ति होनेमात्रसे यह व्याप्ति अशुद्ध समझी जाती है। फिर द्वन्द्वमानके तो लगभग सभी नियम अव्याप्ति-अतिव्याप्ति दोषोंसे ग्रस्त होते हैं। कहा जाता है कि ‘द्वन्द्वमान इस स्थावर आधिभौतिकताका भेदन कर जाता है। ‘मनुष्य’ शब्दमें सब सम्भव मनुष्य सम्मिलित हैं। लेकिन मनुष्यजाति और मनुष्यगण यद्यपि भिन्न और पृथक् तर्कसिद्ध श्रेणियाँ हैं, लेकिन केवल तार्किक दृष्टिसे ही वे ऐसे हैं। एक ही घटनावलीके देखनेके लिये ये विभिन्न दृष्टिकोण हैं। व्यापकताके दृष्टिकोणसे अर्थात् उस दृष्टिकोणसे, जिसमें एक ही मनुष्य जातिका सदस्य होनेके नाते सब एक समान हैं। ‘मनुष्यजाति’ सब मनुष्योंकी समष्टि है। मनुष्यगण सब मनुष्योंकी समष्टिकी ही एक और कल्पना है, लेकिन इस अर्थमें कि कोई भी मनुष्य किसी दूसरे मनुष्यके समान नहीं है। द्वन्द्वमानके लिये विशेष और व्यापक याने ‘साधारण एक और सब’ विरोध रहते हुए भी ये दोनों एक-दूसरेमें और एक-दूसरेके द्वारा अवस्थित हैं। ‘श्याम’ का ‘श्यामत्व’ और उसके मनुष्यत्वसे पृथक् रूपमें न रह सकता है, न उसके रहनेकी कल्पना ही की जा सकती है। मनुष्यको मनुष्यरूपमें हम उस साधारण गुणसे जानते हैं—जो सब विशिष्ट मनुष्योंमें विद्यमान है और हर विशिष्ट मनुष्यकी पहचान तभी हो सकती है, जब व्यापक मनुष्यरूपसे उसकी भिन्नताको दिखलाया जाय।’ हीगेलके तर्कशास्त्रका यही गुण है कि वह विरोधियोंके एकत्वको मानता है और उनको श्रेणीबद्ध करता है। ‘तर्कसिद्धके रूपमें’; एक ओर पूर्णरूपसे व्यापक और दूसरी ओर पूर्णरूपसे एक। हीगेलीय भाषामें दो विरोधियों—उद्रजन, अम्लजनका एकत्व ही पानी है। ये तर्ककी दृष्टिसे विरोधी हैं। इन दो विरोधियोंके मेलसे जो पानीरूप वस्तु बनती है, वह न उद्रजन है और न अम्लजन। गुणात्मकरूपसे दोनोंका अन्तर्धान हो जाता है और बिलकुल नये गुणोंके संयोगकी सृष्टि हो जाती है। परिणाम तो उतना ही रहता है, लेकिन रूप परिवर्तित हो जाता है। उपर्युक्त कथन भी नि:सार है। यह तो अध्यात्मवादमें ही स्वीकृत है कि वस्तुओंमें सामान्य-विशेषभाव एवं साधर्म्य-वैधर्म्य विभिन्नरूपसे मान्य होते हैं। जाति एवं गुणकी दृष्टिसे समष्टि-व्यष्टिका उपर्युक्त विवेचन भ्रान्तिपूर्ण है। नित्य एक एवं अनेकोंमें समवेत जाति है। जैसे अनेक गोव्यक्तियोंमें एक गोत्वजाति रहती है, उसीके आधारपर सभी गोव्यक्तियोंको जाना जाता है, परंतु गण या समूह तो विशेषों (नैयायिकस्वीकृत पदार्थ)-का भी कहा जा सकता है, जिनमें जाति नहीं है। अनेक जातिके मनुष्योंके समूहको भी गण कहा जा सकता है, परंतु उन्हें एक जातिका नहीं कहा जा सकता, यह प्रसंग ब्राह्मणत्व, क्षत्रियत्व आदि अवान्तर जातिका है। मनुष्यत्व जाति तो सभी मनुष्योंमें होती ही है। व्यष्टि और समष्टि अध्यात्मवादमें वृक्ष और वनके तुल्य है। व्यष्टित्व और समष्टित्वका तो भेद होता ही है। ऐसे अनेक गुणधर्म समष्टिमें मान्य होते हैं, जो व्यष्टिमें नहीं होते। जैसे एक-एक तन्तुओंसे शीतापनयन नहीं होता, परंतु वही तन्तु-समुदाय पटरूपमें परिवर्तित होकर अंगप्रावरण, शीतापनयन आदि कार्य करते हैं। व्यक्ति-समुदायसे भिन्न होकर समष्टि कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं है। जिन तत्त्वोंसे जिस वस्तुका निर्माण होता है, उन तत्त्वोंका किसी-न-किसी रूपमें उस वस्तुमें बना रहना स्वाभाविक है। कर्ता, निमित्त आदिके बिना भी कार्य रह सकता है, परंतु उपादान या समवायी कारण बिना तो कार्यकी स्थिति सम्भव ही नहीं होती। कोई नियम तभी निर्दोष माना जाता है, जब वह अव्याप्ति-अतिव्याप्ति आदि दोषोंसे रहित हो। श्यामत्व मनुष्यत्वका व्याप्त धर्म है, सुतरां व्यापक धर्मके बिना व्याप्त धर्मकी अवस्थिति नहीं हो सकती। जैसे क्षितित्व, जलत्व आदि द्रव्यत्व-व्याप्त धर्म है। अत: क्षितित्व, जलत्व आदि द्रव्यत्वके बिना नहीं रह सकते। विभिन्न विशेषोंमें ही सामान्यका पर्यवसान होता है। वस्तुत: जिस रूपमें ऑक्सीजन और हाइड्रोजन जलके जनक होते हैं; उस रूपमें वे विरोधी नहीं हैं। यद्यपि अग्नि और तैल किसी रूपमें विरोधी हैं, परंतु वे ही युक्तिसे समन्वित होकर दीपक-प्रज्वलनका भी काम करते हैं। जल-अग्नि परस्पर विरोधी हैं, परंतु युक्तिसे समन्वित होकर बाष्पद्वारा यन्त्र-संचालन करते हैं। वे विरोधी अन्यरूपसे हैं, कार्यवाहक अन्यरूपसे हैं। इसीलिये स्वरूपसे भाव, अभाव, सत्, असत‍्की एकता नहीं हो सकती। अन्यथा सरोवरकमल और गगन-कमलकी तथा मित्रातनय एवं वन्ध्यातनयकी एकता भी कही जानी चाहिये। अत: इस प्रकारके काल्पनिक विरोधके दृष्टान्तसे सत्, असत्, भाव, अभावकी तरह उसी सम्बन्धसे उसी देशमें उसी वस्तुका भाव-अभाव नहीं रह सकता। जैसे भूतलके उसी प्रदेशमें संयोग सम्बन्धसे उसी प्रकारके उसी घटका भाव-अभाव—दोनों नहीं हो सकते। यदि यह हो सके, तब तो संसारसे विरोधमात्र ही दत्तजलांजलि हो जायगा। उद्रजन, अम्लजन दो विरोधियोंके मिलनेसे पानी बना। उद्रजन, अम्लजन केवल इतनेमात्रसे विरोधी नहीं होते; क्योंकि एक वह है, जो दूसरा नहीं है। इतना दूर क्यों जाया जाय और सरल लौकिक दृष्टान्त लें। अनेक तन्तुओंसे पट बनता है, तन्तुओंमें भी एक वह नहीं है, जो दूसरे हैं। एक दृष्टिसे सब परस्पर भाव एवं अभावस्वरूप हैं और उनके मिलनेसे ही पट बनता है। पटमें तन्तुओंका अन्तर्भाव हो जाता है, एक नयी वस्तु पट बन जाती है, परंतु यह कलाबाजी अविचारित रमणीय ही है। तन्तुओंको परस्पर विरोधी कहनेकी अपेक्षा परस्पर सहयोगी कहना प्रत्यक्ष-प्रमाणके अधिक अनुकूल है। विरोधी तो उन्हें एक-दूसरेका अभावात्मक होनेसे केवल अपेक्षा-बुद्धिसे कहा जाता है। इसी तरह पट बननेपर तन्तुका लुप्त हो जाना, पटरूपी नयी वस्तुका बन जाना भी अविचारित रमणीय है। विचारनेपर अब भी तन्तुओंसे भिन्न होकर पट कोई वस्तु नहीं है। शीतापनयनादि-अर्थक्रियाकारिता विशेषरूपसे अवस्थित समुदायका गुण है। समुदाय समुदायीसे भिन्न नहीं एवं विशेष अवस्थिति अवस्थावालोंसे भिन्न नहीं हो सकती है। व्यष्टिवृक्षोंसे भिन्न होकर समष्टि वन नहीं है। पटसे भिन्न होकर उसकी संकुचित-प्रसारित अवस्था भी भिन्न नहीं है। यही स्थिति उद्रजन, अम्लजनकी है, उन्हें परस्पर विरोधी न कहकर सहयोगी कहना अधिक उपयुक्त है। पंचभूत भी परस्पर विरुद्ध कहे जा सकते हैं। जलसे अग्निका निर्वाण हो जाता है, किसी ढंगसे अग्निसे जलका शोषण हो जाता है; पर साथ ही उनका कार्य-कारणभाव भी है। तेजसे ही जलकी उत्पत्ति होती है और तेजमें ही जलका संहार होता है। ब्रह्मसे ही विश्वकी उत्पत्ति होती है, उसीमें उसका संहार भी होता है। इस दृष्टिसे ब्रह्म ही विश्वका उत्पादक भी है, संहारक भी है, परंतु यह विरोध अपेक्षा-बुद्धिकृत है। सत्, असत‍्का-सा विरोध नहीं है। इसी तरह सत्त्व, रज, तमका भी परस्पर विरोध कहा जा सकता है। सत्त्व प्रकाशात्मक है, रज चल है, तम आवरणात्मक एवं अवष्टम्भात्मक है। व्यवहारमें भी सत्त्वके बढ़नेपर रज-तमका घटना अनिवार्य है। रजके बढ़नेपर अन्यका घटना अनिवार्य है, तो भी महदादि कार्यकी उत्पत्तिमें दोनों सहयोगी बनते हैं। अवश्य ही जबतक उनका सम परिणाम चलता रहता है, तबतक वे कोई कार्य नहीं आरम्भ कर सकते, परंतु विषमता होनेपर प्रधानके अप्रधान सहयोगी हो जाते हैं, फिर कार्यका उत्पादन करते हैं और हर एक कार्यमें वे उपलब्ध भी होते हैं। यही चीज हर एक उपादानकारणके सम्बन्धमें कही जा सकती है। अगर ऑक्सीजन, हाइड्रोजन जलके कारण हैं, तो अवश्य ही उनमें संयोग अपेक्षित है। इसी तरह कार्यावस्थामें भी उनका अस्तित्व रहना ही चाहिये और कार्य भी कारणसे भिन्न होकर सर्वथा नयी वस्तु नहीं है। जैसे पटकी ही अवस्थाविशेष, उनका संकोच और प्रसार है, वैसे ही कारणकी अवस्थाविशेष ही कार्य है। इसीलिये जलसे पुनरपि हाइड्रोजन, ऑक्सीजन निकल आनेपर जल कुछ भी नहीं रह जाता है। भाव-अभावके समान उद्रजन, अम्लजनका विरोध नहीं होता। अतएव उनका सम्बन्ध होता है, सम्बन्धसे जल बनता है, किंतु भाव-अभावके सम्बन्धसे सत्-असत‍्के सम्बन्धसे किसी कार्यकी उत्पत्ति नहीं होती। इसी तरह कहा जाता है कि ‘तर्कशास्त्रके अनुसार आरम्भ क्या है? यह कुछ (अस्तित्व) नहीं है; क्योंकि आरम्भमात्र है। लेकिन इसी कारणसे वह कुछ नहीं भी नहीं हो सकता। इस प्रकार आरम्भ न अस्तित्व है, न नास्तित्व है। साथ ही वह अस्तित्व, नास्तित्व—दोनों ही है। यही अस्तित्व-नास्तित्वकी एकता है। एकका दूसरेसे रूपान्तर है। संक्षेपमें यह होनेकी एक क्रिया है, जिसमें अस्तित्व और नास्तित्वकी साधारण बुनियाद है। इस तर्कको वास्तविकताके रूपमें देखा जाय तो श्याम एक मनुष्य है। जो एक मनुष्य-श्रेणीका है, जिसमें सब मनुष्य सम्मिलित हैं। श्यामका और अन्य मनुष्योंमें व्यावर्तक धर्मोंसे भेद होता है; जो कि एकमें होते हैं, दूसरेमें नहीं, इस तरह वे विशिष्ट अंशोंमें भिन्न होते हुए भी मनुष्यत्वेन समान हैं। उन चीजोंको देकर जो उनमें नहीं हैं, किंतु दूसरोंमें हैं। लेकिन इस प्रभेदका अर्थ यही है कि अपने विशिष्ट गुणोंके अलावा वह और मनुष्योंके समान है। इस प्रकार तार्किक दृष्टिसे श्यामका पूरा ज्ञान हो जाता है। जब उसकी कल्पना विशिष्ट ‘श्याम’ तथा सर्वसाधारण मनुष्योंके एकत्वके रूपमें की जाय।’ मार्क्सवादी इसे एक सहज और महान् सत्य कहते हैं। विशुद्ध सत् विशुद्ध असत‍्से अभिन्न है। विशेष गुणोंके द्वारा ही एक वस्तुको दूसरीसे अलग किया जा सकता है और इस अलग करनेका अर्थ ही है दो बातोंका एक साथ कहना। भावात्मकरूपसे वही वस्तु एक है और अभावात्मकरूपसे अन्य। इस प्रकार विचारमें एक वस्तुको दूसरेसे पृथक् करना हाँ और ना दोनों करना है और इसमें विरोध और पुनर्मिलन दोनों हैं। समरूपता और पार्थक्य-दोनोंका रहना आवश्यक है, नहीं तो एकको दूसरेसे पृथक् नहीं किया जा सकता। ‘यही तत्त्व है सत् और असत‍्के एकत्वका। हेगेलकी इस तार्किक प्रथाका रूप है वाद (थिसिस), प्रतिवाद (एन्टीथिसिस) और समन्वितवाद (सिन्थिसिस)। दूसरे शब्दोंमें भाव-अभाव, अभावका अभाव या प्रतिषेधका प्रतिषेध। इस त्रिगुट सम्बन्धकी विशेषता यह है कि ये एक साथ विराजमान रहते हैं। एकके बाद दूसरेका आविर्भाव नहीं होता। जब कहा जाता है कि ‘राम मनुष्य है’ तो राम और अरामका विरोध तथा उसका साथ-साथ इन सबकी कल्पना एक साथ हो जाती है। मनमें तर्ककी जो क्रिया होती है, उसमें इन दोनोंके पृथक्‍करणका पहले एक सिरा, फिर दूसरा सिरा और फिर दोनोंका सम्बन्धित अस्तित्व दीखता है। लेकिन वास्तवमें इस त्रिगुट सम्बन्धका अस्तित्व आरम्भसे ही है और तर्कक्रिया इस अस्तित्वको मान लेती है। हेगेलने लिखा है कि इस त्रिगुट क्रियाको हम चतुष्क्रियाके रूपमें भी देख सकते हैं। पहला है अविभाजित एक, दूसरा विभाजन, तीसरा भावात्मक तथा अभावात्मक, फिर विभाजितरूपमें उस एककी पुन: स्थापना। जीवन संघर्षमें अवयवद्वारा परिवर्तनीयता और वंशानुक्रमिकताके विरोधी ऐक्यका प्रदर्शन अवयवके विकासका मुख्य स्तम्भ है।’ विरोधियोंके एकत्वके नियमको हीगेलने इस भाषामें लिखा है—‘यह समझा जाता है कि भाव और अभावका अन्तर अमिट है। लेकिन तहमें ये दोनों चीजें एक हैं। कोई एक नाम दूसरेमें परिवर्तित हो सकता है। इस प्रकार जमा और उधार सम्पत्तिके दो विशेष प्रकार नहीं हैं। कर्ज लेनेवालेके लिये जो अभाव है, देनेवालेके लिये वह भाव है। पूरबका रास्ता पश्चिमका भी रास्ता है। भाव और अभाव एक-दूसरेके ऊपर निर्भर है और परस्पर सम्बन्धमें ही इनका रूप प्रकाशित है। चुम्बक पत्थरका उत्तरी ध्रुव बिना दक्षिणी ध्रुवके नहीं रह सकता। किसी चुम्बकको दो भागोंमें काटनेपर एक हिस्सेमें उत्तरी और दूसरेमें दक्षिणी ध्रुव नहीं रहता। इसी प्रकार बिजलीकी दो धाराएँ धनात्मक और ऋणात्मक, एक-दूसरेसे स्वतन्त्र नहीं होतीं।’ वस्तुत: उपर्युक्त बातें भी वागाडम्बरके अतिरिक्त कुछ नहीं हैं—यह पीछे कहा जा चुका है। किसी अपेक्षासे भावान्तर ही अभाव होता है। स्वरूपसे कोई भी वस्तु सत् है, किंतु वही अन्य रूपसे असत् है, परंतु स्वरूपसे ही कोई वस्तु सत्-असत् नहीं हो सकती। परमाणुवादियोंकी दृष्टिसे समवायी कारण तन्तुओंसे पटका आरम्भ होता है, जो पहले असत् ही रहता है। इसका असत्-कार्यवादकी दृष्टिसे खण्डन हो जाता है। असत् खपुष्प सहस्रों प्रयत्नोंसे निर्मित नहीं होता। अत: सत् ही कार्यकी अभिव्यक्ति मात्र कारकव्यापारोंसे होती है। इस स्थितिमें आरम्भके पहले, आरम्भकालमें तथा कार्य सम्पन्न होनेपर—इन तीनों अवस्थाओंमें भी कारणरूपसे कार्य सत् ही रहता है। अत: स्वेन रूपेण आरम्भ या आरब्ध वस्तु सत् ही है, ‘हाँ’ हाँ ही है, उसे ‘नहीं’ नहीं कहा जा सकता। इसलिये आरम्भको अस्तित्व-नास्तित्वकी एकता नहीं कहा जा सकता। राम-श्याम नामका कोई मनुष्य भी हो सकता है। कोई भी मनुष्य अपनेमें असाधारणता भी रखता है और इतर साधारणता भी है। विशिष्ट रूपसे इतर भिन्नता और तदितर व्यापक सामान्य रूपसे अभिन्नता कहनेकी अपेक्षा यह कहना अधिक संगत है कि अमुक मनुष्यमें कुछ अपने असाधारण गुण हैं और कुछ मनुष्य-सामान्य-गुण। एक मनुष्य कुछ गुणोंकी अविशेषतासे ही इतर मनुष्योंसे भिन्न नहीं है। मनुष्यत्व सामान्य रहनेपर भी व्यक्तियोंमें परस्पर भिन्नता रहती है; अत: यह अस्तित्व-नास्तित्वकी एकताका उदाहरण नहीं कहा जा सकता। इस उदाहरणसे अस्तित्व-नास्तित्वकी एकाधिकरणता और विरोधपरिहार नहीं कहा जा सकता। विरोधका स्वरूप यही होता है कि— यस्य यद्देशावच्छिन्नयत्कालावच्छिन्नयत्सम्बन्धावच्छिन्नयद्धर्मावच्छिन्नयदधिकरणता यत्र, तत्र तस्य तद्देशावच्छिन्नतत्कालावच्छिन्नतत्सम्बन्धावच्छिन्नतद्धर्मावच्छिन्नतदत्यन्ताभावो न सम्भवति। जिस वस्तुका जिस देशमें, जिस कालमें, जिस सम्बन्धसे, जिस धर्मसे, जिस रूपसे जहाँ भाव रहता है, उस वस्तुका उसी देशमें, उसी कालमें, उसी सम्बन्धसे, उसी रूपसे अभाव नहीं कहा जा सकता। पर्वतमें धूमत्वेन धूम रहनेपर भी वह्नित्वेन धूम नहीं है, तो भी यह अभाव अग्निके अनुमानमें बाधक नहीं हो सकता। विशेष गुणोंके कारण विशिष्टकी सामान्यसे भिन्नताका अर्थ विलक्षणतामात्र है। इससे एक वस्तुमें सालक्षण्य-वैलक्षण्यका सह अस्तित्व सिद्ध होता है। नैयायिकोंके मतानुसार साधर्म्य-वैधर्म्य अनेक पदार्थोंमें सहावस्थित होते हैं; परंतु एतावता मूल वस्तुमें भेद नहीं सिद्ध होता। जैसे प्रसारित पट और संकुचित पटमें वैलक्षण्य प्रतीत होनेपर भी वस्तुमें भेद नहीं सिद्ध होता। व्यावर्तक भेदक धर्मसे वस्तुकी भिन्नता या व्यावृत्ति होती है। इसका अभिप्राय यही है कि—‘नीलमुत्पलम्’ नीलता कमलकी विशेषता है, इससे वह अनील श्वेत, अरुण आदि कमलोंसे भिन्न सिद्ध होता है। नीलताको छोड़कर वह अन्य कमलोंसे अभिन्न ही रहता है। यहाँके भेद-अभेद दोनों असमानता तथा समानताके ही बोधक हैं, भिन्नता अर्थात् भिन्नजातीयता अभिन्नता अर्थात् अभिन्नजातीयता। परंतु इस समानजातीयता, असमानजातीयताका भेदाभेदके समान परस्पर विरोेध नहीं होता, क्योंकि कमल व्यापक है। नील कमल उसका ही अवान्तर भेद है, जैसे मनुष्यजातिके भीतर ब्राह्मणत्व आदि जातियाँ हैं। एक ब्राह्मणमें ब्राह्मणत्व भी है, मनुष्यत्व भी। इनका आपसमें कोई विरोध नहीं होता। यह भावात्मक-अभावात्मक वस्तुओंका एकीकरण नहीं कहा जा सकता। इतनेमात्रके लिये इतनी दूर भटकनेकी आवश्यकता नहीं। यों तो सहयोगी वस्तुओंमें भी भावात्मकता, अभावात्मकताका सह अस्तित्व किसी अपेक्षा-भेदसे मिलता ही है। यह विरोध परिहार स्वमन:परिकल्पित ही है। जैसे कोई अपने मनसे ही प्रेतकी कल्पना करके उससे संग्राम करता हो और कहता हो कि हमने अपने प्रतिद्वन्द्वीको हरा दिया, ठीक यह भी वैसा ही है। भाव, अभाव एवं अभावका अभाव या वाद, प्रतिवाद, समन्वितवाद अथवा अविभक्त एक तथा उसका भावात्मक, अभावात्मक विभाजन, फिर विभक्त स्वरूपोंसे एक वस्तुकी स्थापना आदि कल्पना मनोरंजक अवश्य है, पर है सारशून्य ही। यह केवल बौद्धोंके विनाश (अभाव) कारणवादके आधारपर गढ़ी गयी है। बौद्धोंने देखा कि बीजसे अंकुर उत्पन्न होनेमें बीजका स्वरूप नष्ट हो जाता है; अत: अंकुरोत्पत्तिके अव्यवहितपूर्व क्षणवर्ती विनाश ही है; अत: विनाशहीको कारण मानना ठीक है, परंतु सांख्यों और वेदान्तियोंने उसका खण्डन किया है। यदि विनाश ही कारण है तो बीजदाहसे भी अंकुर उत्पन्न होना चाहिये। यदि अभाव ही कारण है तो वह तो सर्वत्र सुलभ है तो फिर कार्योत्पत्तिके लिये कारण-सामग्री ढूँढ़नेकी प्रवृत्ति क्यों होती है? फिर कार्यमें कारणांश सत‍्की अनुवृत्ति देखी जाती है। विनाश, अभाव या असत‍्की अनुवृत्ति नहीं देखी जाती। अत: भाव ही कार्यका कारण है, अभाव नहीं। इस मण्डन एवं खण्डनसे प्रभावित होकर मार्क्सवादियोंने मूलबीजको अविभाजित एक वस्तु मान पुन: उसका विभाजन मानकर भाव, अभावकी कल्पना की और उनके समन्वयसे अंकुरकी उत्पत्ति मान ली, परंतु वस्तुत: यहाँ भाव-अभाव-जैसा विभाजन और उसके समन्वयका कोई प्रश्न ही नहीं उठता! विनाश, अभाव या असत‍्से न कोई कार्य उत्पन्न हो सकता है, न सत्-असत‍्का कोई सम्बन्ध हो सकता है। न ख-पुष्प, वन्ध्यापुत्रसे किसीकी उत्पत्ति हो सकती है, न किसीसे उनका कोई सम्बन्ध ही हो सकता है। बीजावयव ही अंकुरके कारण हैं और उन्हींका कार्यमें अनुवेध भी रहता है, परंतु एक उपादानमें कार्यान्तरकी उत्पत्तिके लिये पूर्वकायका तिरोधान आवश्यक होता है। इसीलिये बीजावस्थाका तिरोभाव नान्तरीयकरूपसे होता है। अवयवद्वारा परिवर्तनीयता और वंशानुक्रमिकताके विरोधी ऐक्यका उदाहरण भी ऐसा ही है। जैसे आम्रादि बीजसे आम्रादि वृक्षकी उत्पत्ति होती है, वैसे ही मनुष्य, पशु आदि बीजोंसे ही मनुष्य, पशु आदि देहोंकी उत्पत्ति होती है। अवयवपरिवर्तनादिद्वारा गोलांगूल, मनुष्य आदिके विकासकी कल्पना सर्वथा अप्रमाणित है। उसमें मुख्य आपत्ति यह है कि उन-उन प्राणियोंकी परम्परा स्वतन्त्ररूपसे आज भी प्रचलित है, आज वैसा कोई परिवर्तन परिलक्षित नहीं होता। न तो पूँछ घिसनेसे आज कोई मनुष्य बनता है और न मनुष्यसे आगे कोई विकसित वर्ण दिखायी देता है। न कोई मनुष्यका अंग बढ़ रहा है और न कोई घट रहा है। यों परिणामवादमें कार्योंके रूपमें भिन्नता और कारणात्मना अभिन्नताका सिद्धान्त मान्य है ही। इसका तत्त्व भेदाभेद विवेचनमें आ चुका है। हीगेलके दृष्टान्तोंसे भाव-अभाव, सत्-असत‍्का विरोध मिट नहीं सकता। जमा-उधार, लेना-देना; ऋण-धन, पूर्व-पश्चिम आदिमें भाव, अभावकी अपेक्षा बुद्धिजन्य कल्पनामात्र है। उनकी सम्पत्ति या रास्तेके एक स्थानमें ऋण-धन और पूर्व-पश्चिमकी एकता हो सकती है; परंतु क्या इसी तरह उसी देशमें, उसी कालमें, उसी सम्बन्धसे, उसी रूपमें, उसी घटका भाव और उसीका अभाव साथ-साथ रह सकता है? क्या इसी तरह मित्रापुत्र और वन्ध्यातनयका सह अस्तित्व हो सकता है? वस्तुस्थिति यह है—‘क्वचिदप्युपाधौ सत्त्वेन प्रतीयमानत्वानधिकरणत्व’ ही असत् है, अर्थात् जो किसी भी उपाधि या अधिकरणमें सत्त्वेन प्रतीत न हो, वही असत् है। जो प्रातिभासिक रजतादि कहीं शुक्तिकादिमें सत्त्वेन प्रतीत होता है, वह शुक्ति रजतादि प्रातिभासिक सत् है। कारण ब्रह्ममें सत्त्वेन प्रतीत आकाशादि व्यावहारिक सत् है और अत्यन्ताबाध्य स्वप्रकाशरूपसे भासमान सत् पारमार्थिक सत् है। ऐसे सत्-असत‍्की भी यदि एकता हो सकती है, तब संसारमें विरोध क्या है। फिर शोषक-शोषित वर्गोंका ही अमिट विरोध क्यों? उनमें तो एकता स्पष्ट ही है। दूसरोंके भक्षक जंगली जानवर या पानीकी मछली आदि स्वयं ही दूसरोंद्वारा भक्षित होते हैं, फिर यहाँ तो एक स्थानमें ही शोषकत्व, शोषितत्व स्पष्ट है। वस्तुत: सत्-असत‍्का भेद अपेक्षाबुद्धिजन्य कल्पनामात्र नहीं है। हाँ, जहाँ भावान्त ही अभाव है, वहाँ विरोधकी चर्चा व्यर्थ है। पटाभाव घट स्वरूप है, अत: घटका, पटाभावका कोई विरोध नहीं है; एतावता घटाभावका भी घटके साथ विरोध नहीं है, यह कहना उपहासास्पद ही है। साथ ही भाव, अभाव एक-दूसरेके ऊपर निर्भर है—इसका दो अर्थ हो सकता है। एक तो यह कि अभाव किसी वस्तुका और किसी अधिकरणमें होता है, अर्थात् प्रतियोगिनिरूपक (जिसका अभाव हो) और दूसरा अनुयोगी, (जैसे ‘भूतले घटो नास्ति’ ‘भूतलमें घट नहीं है’)। भूतलका तथा घटका ज्ञान हुए बिना घटाभावका ज्ञान नहीं हो सकता। अभाव अधिकरणस्वरूप है, इस दृष्टिसे अनुयोगिस्वरूप तो अभाव कहा जा सकता है; परंतु अभाव और प्रतियोगी भी कभी एक हो जाते हों, ऐसी बात नहीं है। इसके अतिरिक्त अभाव तो अवश्य ही अनुयोगी-प्रतियोगीकी अपेक्षा रखता है; परंतु भाव इस प्रकार अभावकी अपेक्षा नहीं रखता। निरुपाख्य असत्त्व इससे भी अधिक अव्यवहार्य है। चुम्बकके उत्तरी ध्रुव, दक्षिणी ध्रुव एवं बिजलीकी धनात्मक-ऋणात्मक दो धाराएँ परस्पर विरोधी होनेपर भी भावरूप हैं। उनका जुट सकना सम्भव है, परंतु इसी तरह भाव-अभाव, सत्-असत‍्का जुटना असम्भव है। उपर्युक्त विरोध सत्त्व, रज, तमके विरोध-जैसा है, जो कि विरोध होनेपर भी समन्वित होकर कार्यारम्भक होते हैं। इस प्रकार भाव-अभाव, सत्-असत‍्का समन्वय होकर कार्यारम्भकता सम्भव नहीं है। कहा जाता है कि ‘प्रकृतिके दृश्यगत घटनाओंके मूलमें भूतकी गति है। इसका विरोध स्पष्ट है। यदि कोई पूछे कि कोई गतिशील पदार्थ किसी विशेष समयपर किसी स्थानपर है या नहीं, तो युवेरवेगके नियमके अनुसार इसका उत्तर नहीं दिया जा सकता कि ‘हाँ’ ‘हाँ’ है और ‘नहीं’ ‘नहीं’ है। गतिशील पदार्थ एक बिन्दुपर है भी और नहीं भी है। इसका विचार इसी संकेतसे किया जा सकता है कि ‘हाँ’ ‘नहीं’ है और ‘नहीं’ ‘हाँ’। गतिशील पदार्थ ‘विरोधके तर्क’ की अकाटॺ दलील है और जो इस तर्कको नहीं मानता, उसको जैनोंके साथ कहना पड़ेगा कि गति इन्द्रियोंका भ्रममात्र है। जो ऐसा नहीं मानते, उन्हें या तो युवेरवेगके तर्कशास्त्रके बुनियादी नियमको मानकर गतिका त्याग करना पड़ेगा अथवा गतिको मानकर इस बुनियादी नियमका परिहार करना होगा।’ पहले ही कहा जा चुका है कि प्रकृतिकी दृश्यगत घटनाओंकी बुनियादी बात है भूतकी गति। लेकिन गति एक विरोध है। इसका विचार द्वन्द्वमानके नियमसे किया जाना चाहिये। अर्थात् इस संकेतसे कि ‘हाँ’ नहीं है और ‘नहीं’ ‘हाँ’ है। इसलिये यह मानना पड़ेगा कि दृश्यगत घटनाओंके सम्बन्धमें हम विरोधी तर्कके राज्यमें हैं। लेकिन गतिशील भूतके अणुओंके संयोगसे वस्तुओंकी सृष्टि होती है। यह संयोग कम या अधिक क्षणस्थायी होकर तिरोहित हो जाता है और दूसरे संयोग इसका स्थान ले लेते हैं। जो अनन्त है, वह है भूतकी गति। जब बाहरी गतिके कारण भूतके एक विशिष्ट संयोगका आविर्भाव होता है और गतिहीके कारण जबतक उसका अन्तर्धान नहीं होता, तबतक इसके अस्तित्वके प्रश्नको भावात्मकरूपसे ही हल किया जा सकता है। यही कारण है कि यदि कोई बुधग्रहको दिखाकर हमसे पूछे कि उसका अस्तित्व है या नहीं? तो हम नि:संकोच यह उत्तर देंगे कि ‘हाँ’ है। इसका अर्थ यह है कि स्पष्ट वस्तुओंके सम्बन्धमें हम युवेरवेगके ही नियमका अनुसरण करेंगे। इस राज्यमें ‘हाँ’ ‘हाँ’ है और ‘नहीं’ ‘नहीं’ का ही संकेत लागू होता है। लेकिन इस नियमका राज्य अबाध नहीं है। जब कोई वस्तु उत्पत्तिकी अवस्थामें है तो उसका उत्तर देनेमें कुछ संकोच नहीं होता। जब किसी मनुष्यके सरके बाल काफी उड़े देखे जाते हैं, तो कहा जाता है कि वह गंजा है। लेकिन वह कब पूरा गंजा हो जायगा, ठीक उस मुहूर्तका निश्चय नहीं किया जा सकता। ‘किसी विशिष्ट प्रश्नका कि अमुक वस्तुका अमुक गुण है या नहीं, ‘हाँ’ या ‘ना’ में ही उत्तर दिया जा सकता है। लेकिन जब कोई वस्तु परिवर्तनकी स्थितिमें है, किसी विशेष गुणका उसमें संयोग या वियोग हो रहा हो, तब इसका उत्तर दिया जा सकता है—‘हाँ’ ‘नहीं’ है तथा ‘नहीं’ है ‘हाँ’। युवेरवेगके नियमके अनुसार इसका उत्तर नहीं दिया जा सकता। यह एतराज किया जा सकता है कि जिस गुणका वियोग हो रहा है, उसका अभी अन्तर्धान नहीं हुआ और जिस गुणका संयोग हो रहा है, अभी वह पहलेसे ही वर्तमान है। इसलिये ‘हाँ’ या ‘ना’ में इसका उत्तर असम्भव नहीं, किंतु बाधितामूलक है, चाहे वह वस्तु परिवर्तनहीकी क्रियामें क्यों न हो। लेकिन यह एतराज गलत है। जिस युवककी ठोढ़ीपर दाढ़ीकी रेखा उग रही हो, उसको दाढ़ीवाला नहीं कहा जायगा; यद्यपि यह रेखा धीरे-धीरे दाढ़ीमें परिणत हो रही है। गुणात्मक परिवर्तनके लिये परिमाणकी एक सीमातक पहुँचना आवश्यक है। जो इसको भूलता है, वह वस्तुओंके गुणोंके सम्बन्धमें स्पष्ट राय नहीं दे सकता।’ सिद्धान्तत: भूत स्वयं प्रकृतिका कार्य है, प्रकृतिके गुण भूतमें भी रहते हैं। सभी घटनाओंका मूल ईश्वर चेतनाधिष्ठित प्रकृति है। ‘चञ्चलगुणवृत्तम्’ के अनुसार प्रकृति क्षण-परिणामशील या गतिशील है। सुतरां तत्तत्परिणामभूत सभी कार्य भी गतिशील हैं, परंतु परिच्छिन्न कोई पदार्थ समकालमें अनेक स्थानमें नहीं हो सकता। अवश्य ही वह जिस समय किसी स्थलमें है, उसी समय तदन्यस्थलमें नहीं कहा जा सकता। कितनी भी तीव्रगति किसीकी क्यों न हो, फिर भी एक ही देशकालमें उसका भाव-अभाव नहीं कहा जा सकता। काल बड़ा सूक्ष्म होता है, अत: किसी स्थलपर समकालमें गतिशील पदार्थका अस्तित्व, नास्तित्व नहीं कहा जा सकता। उसी वस्तुको रूपान्तरसे भाव एवं रूपान्तरसे अभाव कहना सम्भव है, परंतु उसी रूपसे भाव-अभाव—दोनों कोटि-कोटि प्रयत्नोंसे भी सम्भव नहीं हैं, तीव्रगामी बाण या तलवारसे समवेत सहस्र कमलपत्रका छेदन समकालमें ही प्रतीत होता है। पापड़ खाते समय समकालमें ही शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धकी प्रतीति समकालमें मालूम पड़ती है, फिर भी सर्वत्र क्रमिकता ही है। हाँ, क्रम इतना सूक्ष्म है कि परिलक्षित नहीं होता, फिर भी उसका अनुमान तो होता ही है। इस तरह अति तीव्रगतिमें, अतिसूक्ष्मकालमें अस्तित्व-नास्तित्वका क्रम भी बदल जाता है। इसीलिये अस्तित्व-नास्तित्व एकत्र स्थलमें क्रमिक ही रहता है; समकालिक नहीं। सामान्य गतिमान् पदार्थका जब विभिन्न स्थानीय अस्तित्व, नास्तित्व, भिन्नकालिक है, तो इसी तरह तीव्र गतिमान् पदार्थोंका भी एकत्र अस्तित्व, नास्तित्व भिन्नकालिक ही मानना उचित है। इस तरह उसे अकाटॺ तर्क समझना भ्रम ही है। युवेरवेग हो या कोई और हो, यौक्तिक विचारमें जिसका पक्ष उचित हो ग्रहण करना चाहिये। अयुक्तियुक्त किसीका भी मत त्याज्य होना चाहिये। किसी भी नियमसे सत् असत्, असत् सत् नहीं हो सकता। द्वन्द्वमानकी बाजीगरी भी इस सम्बन्धमें व्यर्थ ही है। सिर्फ घटका स्वेन रूपेण अस्तित्व है, अन्यरूपेण नास्तित्व है। इसके सिवा अस्ति, नास्तिकी एकत्र अवस्थिति सर्वथा असम्भव है। गतिशील परमाणुओंके संयोगसे दृश्य वस्तुओंका निर्माण हो अथवा प्रतिक्षण परिणामी प्रकृति-तत्त्वका परिणामस्वरूप दृश्य वस्तु हो, उसकी अस्थिरता निश्चित है। फिर भी वस्तुके भाव-अभावमें सन्देह नहीं होना चाहिये। सन्देह होता है स्थिरता एवं अस्थिरतामें। नदीप्रवाह एवं दीपशिखामें स्थूलदृष्टिसे स्थिरता एवं एकता प्रतीत होती है, किंतु वस्तुत: उनमें स्थिरता-एकता सादृश्यमूलक भ्रम ही है। गगन, पर्वत, समुद्र, नक्षत्रादि—सभीमें स्थिरता, एकता, प्रत्यभिज्ञा इसी प्रकार सादृश्यमूलक भ्रम ही है। फिर भी अविचारित रमणीय एकता आदिका व्यवहार चलता ही है। सदृश परिणाम जबतक चलता है, तबतक एकता विसदृश परिणाम होनेसे ही भिन्नता, अनेकताकी प्रतीति होने लगती है। सदृश-विसदृश किसी भी परिणाममें अस्तित्व तो रहता ही है, आविर्भाव, तिरोभावके आधारपर होनेवाले भाव-अभावके व्यवहारमें भी क्रम अनिवार्य है। समकालमें, समदेशमें, समसम्बन्धसे, समरूपसे एक ही वस्तुका भाव या अभाव नहीं रह सकता। यह पर्वतवत् अकम्प्य विरोध है, यह कहा जा चुका है। प्रमाणकी दृष्टिसे सब स्पष्ट ही होता है, अस्पष्ट नहीं। सिरके अधिकांश बालोंके उड़ जानेपर भी हम यही कह सकते हैं कि ‘वह खल्वाट हो रहा है।’ जिसे पूरे मुहूर्तका पता लगाना अभीष्ट है, उसे घड़ी लेकर त्राटक लगाकर बैठना ही पड़ेगा। जिसे गर्दभके बालोंकी जिज्ञासा है, उसे गिननेका श्रम करना ही पड़ेगा। जैसे अमुक वस्तुका अमुक गुण है या नहीं, इस प्रश्नका उत्तर हाँ या नहीं में देना उचित है; वैसे ही परिवर्तनकी हालतमें भी निश्चित उत्तर दिया ही जा सकता है। सांख्यीय सत‍्कार्यवादके अनुसार छोटे-से वटबीजके अन्दर वटवृक्षकी सत्ता है, तभी उसका प्रादुर्भाव होता है। फिर भी जबतक उसका आविर्भाव नहीं है, तबतक अभावका व्यवहार चलता है और जिस कालमें अंकुर, नाल, स्कन्ध, शाखा, उपशाखा, पत्र, पल्लवादिकी अवस्था है, उस कालमें स्पष्टतया उसी रूपमें उसका भाव, अन्य रूपमें अभाव कहनेमें कोई अड़चन नहीं हो सकती। युवककी ठोढ़ीमें बालोंकी जो अवस्था है, उसी रूपमें उसका भाव अन्यरूपमें अभाव कहनेमें भी कोई अड़चन नहीं। उसी भूतलपर देश-कालभेदसे, सम्बन्ध तथा रूपभेदसे, घटके भाव-अभावका व्यवहार होता ही है। वस्तुओं तथा उसके गुणके सम्बन्धमें यही स्पष्ट मत है। ‘हाँ’ नहीं है, ‘नहीं’ हाँ है, यह मत कभी भी स्पष्ट मत नहीं कहा जा सकता। कारणमें कार्यका अस्तित्व रहता है, इसलिये बीजमें भी अंकुर है। युवक क्या, शिशुकी भी ठोढ़ीमें बालोंका अस्तित्व है। जबतक आविर्भाव नहीं है, तबतक अंकुरके तुल्य बालोंका भी अभाव है। जितना प्रादुर्भाव है, उतनेका भाव, जितनेका नहीं, उतनेका अभाव है, इससे अधिक स्पष्टता क्या हो सकती है। एफीसियसका प्राचीन दार्शनिक कहता है कि ‘सभी चीजें परिवर्तनशील हैं, सभी परिवर्तित हो रही हैं। जिन संयोगोंको हम वस्तु नाम देते हैं, वे सदा ही परिवर्तनकी स्थितिमें हैं।’ जबतक ऐसे संयोगोंका अनुपात कायम रहता है, उनका विचार हम हाँ-हाँ और नहीं-नहींके संकेतसे कर सकते हैं। लेकिन जिस समय उनमें ऐसा परिवर्तन होता है कि वह पहला अनुपात नहीं रहता, तब उनका विचार विरोधके तर्कसे ही हो सकता है। हमें हाँ और ना दोनोंमें उत्तर देना पड़ेगा। वह है भी और नहीं भी है। ‘जैसे स्थिरता गतिका एक विशिष्ट प्रकार है, उसी तरह साधारण तर्कशास्त्र द्वन्द्वमान तर्कका एक विशेष प्रकार है।’ प्लेटोके शिष्य क्रैटिलसके विषयमें कहा जाता है कि जब हेराक्लिट्सने कहा कि एक ही नदीमें हम दो बार प्रवेश नहीं कर सकते, तब उसने कहा कि एक बार भी हम उसमें प्रवेश नहीं कर सकते; क्योंकि प्रवेश करते-करते उसमें परिवर्तन होता रहता है। वह एक दूसरी नदी हो जाती है। ऐसी रायमें होनेकी क्रियाको उसके अस्तित्वसे अधिक महत्त्व दिया जाता है। यह द्वन्द्वमानका अपव्यवहार है। हीगेलका कहना है कि ‘कुछ’ सर्वप्रथम ‘प्रतिषेधका प्रतिषेध’ है। द्वन्द्वमान और भौतिकवादका आपसमें कोई विरोध नहीं है। वास्तवमें द्वन्द्वमानकी बुनियाद ही भौतिकवाद है। यदि प्रकृतिकी भौतिकवादी धारणाका अन्त हो जाय तो साथ ही द्वन्द्वमानका भी अन्त हो जायगा। हीगेलकी प्रथामें ‘द्वन्द्वमान और अतिभौतिकवाद दोनों समानार्थसूचक हैं। मार्क्सीय दर्शनमें द्वन्द्वमान प्राकृतिक सिद्धान्तके सहारे खड़ा है। हीगेलके अनुसार धारणाओंमें जो विरोध है, उनके आविष्कार और हलसे ही विचारधारा आगे बढ़ती है। भौतिकवादी सिद्धान्तके अनुसार धारणाओंमें अवस्थित विरोध उन विरोधोंके प्रतिबिम्बमात्र हैं, जो दृश्यगत जगत् वर्तमान हैं और जिनका मूल कारण प्रकृतिका अन्तर्विरोध यानी उसकी गति है।’ एफीसियसके प्राचीन दार्शनिककी दृष्टि भी इस सम्बन्धमें भ्रमात्मक ही है। सूक्ष्मकालभेदके अनुसार सूक्ष्मपरिवर्तित अवस्थाओंका भी सुस्पष्ट अस्ति या नास्तिरूपसे निरूपण किया जा सकता है। अनिश्चित अवस्था सदा ही अज्ञानकी अवस्था है, प्राकृतिक एवं यान्त्रिक प्रत्यक्ष साधनों, अनुमानों या आर्षविज्ञानों अथवा अपौरुषेय आगमोंके आधारपर उस अज्ञानको मिटाना ही उचित है। उभयत: आकर्षणकी स्थिरता एक गतिका प्रकार भले मान्य हो, परंतु सब गतियों एवं गतिमानोंकी अधिष्ठानभूत आत्मसत्ता गतिका प्रकारविशेष नहीं है। एकत्व-भ्रमके मूल कारण सादृश-ज्ञानके लिये ‘तेनेदं सदृशम्’ ‘के ते नेदं सदृशम्’ जाननेके लिये अनेककालावस्थायी द्रष्टाको स्वत: स्थिर मानना पड़ता है। इसीलिये सांख्योंने सब पदार्थोंको क्षणपरिणामी मानते हुए भी चित्-शक्तिको कूटस्थ माना है— ‘क्षणपरिणामिनो हि भावा ऋते चितिशक्ते:।’ व्यवहारमें गतिमान, पशुपक्ष्यादि जंगम तथा स्थावर भूमि-पर्वतादि स्वतन्त्ररूपसे मान्य है। अत: गतिविशेष ही स्थिरता है, यह दृष्टान्त ही असंगत है। इस तरह सत‍्को असत्, असत‍्को सत् कहनेवाला द्वन्द्वमान कोई तर्क ही नहीं है। नदीके प्रथम प्रवेशकालमें ही नहीं, किंतु प्रतिक्षण भिन्नता क्रैटिलससे बहुत पहले भारतीय दर्शनोंने बता रखा है— नित्यदा ह्यङ्ग भूतानि भवन्ति न भवन्ति च। कालेनालक्ष्यवेगेन सूक्ष्मत्वात्तन्न दृश्यते॥ यथार्चिषां स्रोतसां च फलानां वा वनस्पते:। तथैव सर्वभूतानां वयोऽवस्थादय: कृता:॥ सोऽयं दीपोऽर्चिषां यद्वत् स्रोतसां तदिदं जलम्। सोऽयं पुमानिति नृणां मृषा गीर्धीर्मृषायुषाम्॥ (श्रीमद्भा० ११।२२।४२—४४) नित्य ही भूतोंकी उत्पत्ति और प्रलय अलक्ष्य वेगवाले कालद्वारा होता रहता है। सूक्ष्म होनेके कारण वह प्रतीत नहीं होता। दीपादि अग्नि-ज्वालाओं, सरिताओं, फलों तथा वनस्पतियों एवं सभी भूतोंका वय एवं अवस्थाओंके अनुसार क्षण-क्षणपर उत्पत्ति और प्रलय होता रहता है। क्षण-परिवर्तनशील होनेपर भी ‘यह वही दीप है, यह वही जल है, यह वही पुत्रादि है,’ इस प्रकारकी प्रत्यभिज्ञा—पहचान तथा एकत्व-बुद्धि भ्रान्तिसे ही है। पदार्थ तो सभी प्रतिषेधके प्रतिषेध हैं, परंतु यदि पहला प्रतिषेध भ्रमात्मक हो तभी जो प्रमात्मक घटके निषेधका निषेध है अथवा घटध्वंसका ध्वंस है, वह ध्वंस घटरूप नहीं हो सकता। अत: द्वन्द्वमानके तर्काभाससे व्यापक नियमोंका बाध नहीं हो सकता। इसीलिये भूत, भौतिक प्रपंच या भौतिकवाद या किसी वादके साथ द्वन्द्वमानका अनिवार्य सम्बन्ध नहीं है। तर्क, प्रतितर्क, निष्कर्ष, वाद, प्रतिवाद, समन्वय या सिद्धान्त सर्वत्र आदरणीय हैं, परंतु इससे द्वन्द्वमान नामकी कोई स्वतन्त्र प्रमाण वस्तु सिद्ध नहीं होती। मार्क्सवादीके कथनानुसार भौतिकवादी धारणाका अन्त हो जाय, तो द्वन्द्वमानका ही अन्त हो जायगा, परंतु मार्क्सके गुरु हीगेलने, जो द्वन्द्ववादका आविष्कारक माना जाता है, अतिभौतिकवाद और द्वन्द्वमानको समानार्थक माना है। इस तरह मार्क्सका भौतिक द्वन्द्वमान आविष्कारकके मतसे ही विरुद्ध है। हीगेलके मतानुसार यह ठीक है कि तर्क-प्रतितर्क वादसे पक्ष-विपक्षका साधन, बाधन, विरोधोद्भावन तथा विरोध-परिहारसे विचारधारा आगे बढ़ती है, परंतु फिर भी उसकी सीमा है। तर्क या विचारधारा तत्त्वनिर्णयावसान ही होता है। तत्त्व-निर्णयके बाद वह व्यर्थ ही नहीं, अनिष्टकर भी है, परंतु विचारगत विरोध बाह्य वस्तुओंमें भी होना ही चाहिये, यह अनिवार्य नहीं है। अनेक प्रकारके दोषोंसे विचारोंमें भिन्नता होते हुए भी वस्तुओंमें भिन्नता नहीं होती। एक ही रज्जुमें सर्प, धारा, माला, भूछिद्रादि अनेक विचार उत्पन्न होते हैं; परंतु वस्तु एक ही है, उसमें कोई भेद नहीं। ‘प्रपंचका मूल क्या है, आत्मा क्या है’, इस सम्बन्धमें वस्तुस्थिति एक रहनेपर भी तर्कों, प्रतितर्कों तथा विचारोंमें पर्याप्त भिन्नता होती है। तर्कोंमें बाह्य वस्तुओं एवं उनकी विचित्रताओंका असर होता है, यह अवश्य है। महाकारण ईश्वर या प्रकृति या भूत व्यापक होते हैं। उनसे विविध, विचित्र कार्य उत्पन्न होते हैं, तदनुकूल विचित्र अवस्थाएँ उद‍्भूत होती हैं। इनसे भिन्न अन्तर्विरोध नामकी कोई वस्तु नहीं है। कहा जाता है ‘हीगेलके अनुसार घटनाओंका विस्तार, विचार-विस्तारसे विदित होता है’, परंतु भौतिकवादमें विचारका विस्तार वस्तुओंके विकासपर निर्भर है।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>ऐतिहासिक</category><category>द्वन्द्वमान</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>9.3 प्रतिषेधका प्रतिषेध ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/9-3-prtissedhkaa-prtissedh-maar/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/9-3-prtissedhkaa-prtissedh-maar/</guid><description>9.3 प्रतिषेधका प्रतिषेध इसी तरह प्रतिषेधके प्रतिषेधका उदाहरण मार्क्सवादी उपस्थित करते हैं कि ‘यदि यवका एक दाना जमीनमें डाला जाय तो गर्मी और नमीके प्रभावसे इसमें एक विशेष परिवर्तन होता है। इसमेंसे …</description><pubDate>Sat, 07 Jun 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;9.3 प्रतिषेधका प्रतिषेध&lt;/h3&gt;
&lt;blockquote&gt;
&lt;p&gt;इसी तरह प्रतिषेधके प्रतिषेधका उदाहरण &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt;ी उपस्थित करते हैं कि ‘यदि यवका एक दाना जमीनमें डाला जाय तो गर्मी और नमीके प्रभावसे इसमें एक विशेष परिवर्तन होता है। इसमेंसे पौधा उगने लगता है। उस दानेके अस्तित्वका अन्त हो जाता है। उसका प्रतिषेध हो जाता है। उसके स्थानपर जो पौधा उगता है, वह उस दानेका प्रतिषेध है। वह पौधा बढ़ता है, उसमें फल आते हैं और फिर उसमें यवके दाने उत्पन्न होते हैं, लेकिन इन दानोंके पकनेके साथ ही उस पौधेका भी अन्त हो जाता है। अब प्रतिषेधका प्रतिषेध होकर नये यवके दाने हो गये। एक ही दाना नहीं, बल्कि मूल दानेका दस, बीस या तीस गुना।’ इसी तरह पतिंगोंके सम्बन्धमें उनका कहना है कि ‘ये अण्डेसे निकलते हैं। उसके प्रतिषेधके बाद ये पतिंगे बढ़कर पूर्ण यौन विकासको प्राप्त होते हैं और यौन सम्बन्धसे अण्डे पैदा होकर मर जाते हैं। प्रतिषेधका प्रतिषेध करके फिर अण्डे पैदा हो गये, एक नहीं अनेक।’ इस सम्बन्धमें पीछे कहा जा चुका है कि बीज-विनाश या बीज-प्रतिषेध अंकुरादि कार्यका कारण नहीं है, किंतु बीजके अवयव ही अंकुरके कारण हैं; क्योंकि उनका ही अनुवेध कार्यमें होता है। बीजके विनाशका कारण यह है कि एक उपादान कारणमें एक कार्यकी अभिव्यक्ति होनेपर कार्यान्तरोंकी निवृत्ति होती है। बीज भी एक अवयवोंकी ही कार्यावस्था है। अंकुररूप कार्यकी अभिव्यक्तिसे उसकी निवृत्ति आवश्यक है। जहाँ पूर्व कार्यकी निवृत्ति आवश्यक नहीं है, वहाँ प्रतिषेधके प्रतिषेधका कोई अर्थ नहीं है। आकाशसे वायुकी उत्पत्ति होती है, फिर भी आकाश नहीं निवृत्त होता। वायुसे तेजकी उत्पत्ति होती है, परंतु वायुकी निवृत्ति नहीं होती। मृत्तिकासे घट उत्पन्न होता है, किंतु मृत्तिकाकी निवृत्ति नहीं होती। आम्रादि वृक्षोंसे फलोंकी उत्पत्ति होती है, परंतु वृक्षोंका नाश या प्रतिषेध नहीं होता। मनुष्य-पशु आदिसे ही दूसरे मनुष्य-पशु आदि उत्पन्न होते हैं, परंतु उत्पादकोंका विनाश नहीं होता। भूतोंकी उत्पत्तिका सिद्धान्त यह है कि कारण व्यापक, सूक्ष्म तथा स्वच्छ एवं निर्गुण, निर्विशेष है। कार्य व्याप्य, स्थूल, अस्वच्छ, सगुण एवं सविशेष है, परंतु सांख्यमतानुसार कार्यकी विशेषताओंकी भी अभिव्यक्ति ही होती है, उत्पत्ति नहीं। अत्यन्त असत‍्की उत्पत्ति नहीं होती—यह बात सत‍्कार्यवादके प्रसंगमें कही जा चुकी है। &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;ान्तमतानुसार जो आदिमें तथा अन्तमें नहीं होती, मध्यमें प्रतीत होती है, वह वस्तु रज्जु-सर्प आदिके तुल्य सदसद्विलक्षण अतएव अनिर्वचनीय ही होती है। वह शुक्ति-रजतादि मिथ्या पदार्थोंके समान होनेपर भी सत्य-सी प्रतीत होती है। ‘आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा। वितथै: सदृशा: सन्तोऽवितथा इव लक्षिता:॥’ (माण्डू० कारि० २।६) परिणामवादमें कारणको कार्याकारतया परिणत होनेके लिये कारणमें आवश्यक विचार होना ही चाहिये। एतावता अन्तर्विरोध या प्रतिषेध कार्यका कारण नहीं हो जाता। यदि प्रतिषेध कारण होता तो सर्वत्र वह सुलभ ही है, फिर कार्योत्पत्तिके लिये कारणोपादान ही व्यर्थ होगा। यदि प्रतिषेध ही कार्योत्पत्तिका कारण होता तो दग्ध बीजसे भी कार्योत्पत्ति होनी चाहिये थी; क्योंकि दाहसे भी बीजका प्रतिषेध हुआ ही। हम स्पष्ट देखते हैं कि कार्यके लिये कार्यार्थी तत्कारणोंका अन्वेषण करते हैं। वेदान्तानुसार कारण ब्रह्म ही अनिर्वचनीय माया एवं तदंश विभिन्न उपाधियोंद्वारा कार्याकारेण विवर्जित होता है। अण्डे भी पतंगोंके फल हैं, प्रतिषेधरूप नहीं। कहा जाता है कि मूल वस्तुके अन्तर्विरोध (विध्वंस)-से समन्वयद्वारा वस्त्वन्तरकी उत्पत्ति होती है—‘नानुपसृद्य प्रादुर्भावात्’ विनष्ट बीजसे ही अंकुर उत्पन्न होता है। मृत्पिण्डके उपमर्दनसे ही घटका निर्माण होता है। विनष्ट क्षीरसे ही दधिका निर्माण होता है। यदि कूटस्थ कारणसे ही कार्य उत्पन्न हो, तब तो अविशेषेण सभीसे सब कार्यकी उत्पत्ति होने लगे। अर्थात् कूटस्थ कारणका यदि कार्य-जनन स्वभाव है, तब तो तत्काल ही उससे कार्य उत्पन्न होना चाहिये, कालक्षेप न होना चाहिये। यदि कूटस्थ कारणमें कार्यजनक स्वभाव नहीं है, तब उससे कभी भी कार्य न उत्पन्न होना चाहिये। यदि कहा जाय कि समर्थ होते हुए भी क्रमेण सहकारियोंकी अपेक्षासे ही कार्य उत्पन्न होता है, परंतु सहकारी कुछ उपकार करते हैं या नहीं? यदि नहीं तो वे सहकारी ही क्यों होंगे? यदि उपकारका आधान करते हैं तो भी भिन्न या अभिन्न उपकारका आधान करेंगे। यदि उपकार अभिन्न है, तब तो वह कूटस्थ कारणका ही स्वरूप ठहरा। फिर कार्यमें विलम्ब क्यों होना चाहिये? यदि उपकार भिन्न है, तब तो उस उपकारके होनेपर ही कार्य होता है, उसके अभावमें कार्य नहीं होता। फिर तो अन्वयव्यतिरेकसे उपकार ही कार्यका कारण हुआ। कूटस्थ कारणके रहनेपर भी कार्य नहीं होता, अत: कूटस्थ उत्पादक नहीं हुआ— वर्षातपाभ्यां किं व्योम्नश्चर्मण्यस्ति तयो: फलम्। चर्मोपमश्चेत् सोऽनित्य: खतुल्यश्चेदसत्फल:॥ (नैष्कर्म्यसिद्धि एवं सर्व&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-paashcaaty-drshn-1-1-drshnkii/&quot;&gt;दर्शन&lt;/a&gt;संग्रह) अत: अभावग्रस्तबीज आदिसे ही कार्यकी उत्पत्ति होती है। ब्रह्मात्मवादी इसका भी खण्डन करते हैं। उनका कहना है कि अभावसे भावकी उत्पत्ति नहीं हो सकती, यदि अभावसे भाव उत्पन्न हो, तब तो अभाव सर्वत्र सुलभ ही है, फिर कारण-विशेषकी कल्पना व्यर्थ ही होगी। उपमर्दित बीजोंका अभाव एवं शशविषाण दोनों ही समानरूपसे नि:स्वभाव हैं। अत: उनके अभावत्वमें भी कोई भेद नहीं है। फिर बीजसे अंकुर, क्षीरसे दधिके उत्पन्न होनेका नियम व्यर्थ ही है। यदि निर्विशेष अभाव कारण है, तब तो शशविषाण, खपुष्पादिसे भी अंकुरादिकी उत्पत्ति होनी चाहिये, परंतु ऐसा होता नहीं। यदि उत्पलमें नीलत्वके तुल्य अभावमें कुछ विशेषता स्वीकृत है तब तो विशेषवान् होनेसे अभाव भाव ही हो जायगा। विशेष्यवान् होनेसे उत्पल जैसे भाव है, वैसे ही विशेष्यवान् होनेसे अभाव भी भाव ही हो जायगा और फिर तो अभाव कार्य उत्पत्तिका हेतु भी नहीं हुआ, जैसे शशविषाणादि किसीका हेतु नहीं होता। इसके अतिरिक्त यदि अभावसे भावकी उत्पत्ति हो तब तो हर एक कार्यमें अभावका ही अन्वय दिखायी देना चाहिये, परंतु देखा जाता है कि इसके विपरीत सभी कार्य भावरूपसे ही उपलब्ध होते हैं। जैसे मृत्तिकासे अन्वित घटादिको तन्तु आदिका विकार नहीं कहा जाता, किंतु मृत्तिकाका ही विकार कहा जाता है, वैसे ही भावान्वित कार्य भावके ही विकार हैं, अभावके नहीं। जो कहा जाता है ‘स्वरूप-उपमर्दके बिना किसी भी कूटस्थ कारणसे कार्यकी उत्पत्ति नहीं होती, अत: अभावसे भावकी उत्पत्तिका सिद्धान्त ही ठीक है’—यह कहना भी ठीक नहीं। स्थिर स्वभाववाले सुवर्ण, मृत्तिका आदि स्पष्टरूपसे कार्यमें प्रत्यभिज्ञात होते हैं, अत: स्थिरभावमें ही कार्य-कारणभाव मानना युक्त है। बीज आदिका उपमर्द देखा जाता है, इससे उपमृद्यमाना पूर्वावस्था उत्तरावस्थाका कारण नहीं है, किंतु अनुपमृद्यमान बीजावयव ही अंकुरादिमें अनुगत होकर कारण होते हैं। असत् खपुष्पादिसे कार्योत्पत्ति नहीं होती, सत् सुवर्णादिसे कार्योत्पत्ति देखी जाती है, अत: भावसे भावकी उत्पत्तिका पक्ष ही ठीक है। कूटस्थ स्थिर कारण ही क्रमवत् सहकारी कारणोंकी अपेक्षासे कार्यकारी होते हैं। ये सहकारी अनुपकारक नहीं कहे जा सकते, किंतु इनके द्वारा आहित उपकार कारणसे न भिन्न है न अभिन्न, किंतु अनिर्वचनीय है। इसलिये कार्य भी अनिर्वाच्य ही होता है। फिर स्थिरकी अकारणता नहीं कही जा सकती; क्योंकि कार्यका वही उपादान है—जैसे कल्पित अनिर्वाच्य सर्पका उपादान रज्जु होती है। यदि अभावसे ही भावकी उत्पत्ति होती है, तब तो उदासीन, अनीहमान लोगोंकी भी समीहित सिद्धि होनी चाहिये; क्योंकि अभाव तो सभीको सुलभ है। खेतीके कार्यमें बिना संलग्न हुए भी किसीको सस्यादि प्राप्त होने चाहिये। कुलाल मृत्तिकादिमें बिना प्रवृत्त हुए भी घटोत्पादन कर सकेगा। तन्तुवाय तन्तुओंमें बिना प्रवृत्त हुए भी वस्त्रलाभ कर लेगा, परंतु यह सब होता नहीं; अत: भावसे ही भावकी उत्पत्ति होती है, अभावसे नहीं। बीज एवं मृत्तिका-पिण्ड उपमर्द हुए बिना अंकुर, बीज आदि उत्पन्न नहीं होते, अत: अभाव या विनाश ही कार्योंके कारण होते हैं। इस कल्पनाकी इस पक्षमें अपेक्षा लाघव है। बीज एवं मृत्तिकाको ही कार्योंका कारण माननेमें बीज या मृत्पिण्डका आकारविशेष कार्यका कारण नहीं है, अतएव अन्वयी द्रव्य ही कारण होता है। पिण्ड या बीजके आकारविशेषका कार्यमें अन्वय भी नहीं है। अन्वय बीजावयव एवं मृत्तिकामात्र ही अनुभूत होता है। मृत्तिका कारण है; क्योंकि उसके अभावमें घटका अभाव होता है, परंतु पिण्डादि आकारके न रहनेपर भी घटकी उपलब्धि होती है। सभी कारण कार्यका उत्पादन करते हुए अपने पूर्व कार्यका तिरोधान करते हैं; क्योंकि एक कारणमें एक कालमें ही दो कार्य नहीं हो सकते। पूर्वकार्यके उपमर्दसे कारणका स्वरूप नहीं उपमर्दित होता। मृत्तिकादिका पूर्व कार्य पिण्डादि हैं, घटादिकी उत्पत्तिके लिये उनका तिरोधान आवश्यक ही है। कार्यान्तरकी उत्पत्तिके लिये पूर्वकार्यका तिरोधान आवश्यक होता है, इसलिये पिण्डादिका तिरोधान होता है, इसलिये नहीं कि कारण-नाश कार्यका हेतु है। असत‍्कारणवादी कहता है कि पिण्डादिसे भिन्न मृत्तिकादि कुछ भी नहीं है। यद्यपि कहा जा सकता है कि पिण्डादि पूर्वकार्यके उपमर्दित होनेपर भी मृदादिकारण नहीं नष्ट हुआ; क्योंकि वह घटादि कार्यान्तरमें अन्वित है, परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि पिण्ड घटादिसे भिन्न मृदादि कारणका उपलम्भ ही नहीं होता। इस पर वेदान्तीका कहना है कि मृदादि कारणोंसे घटादिकी उत्पत्ति होनेपर पिण्डादिकी निवृत्ति हो जानेपर भी मिट्टी आदि कारणकी घटादिमें अनुवृत्ति रहती है। अत: पिण्डादिके विनष्ट होनेपर भी मृदादि कारणका विनाश नहीं हुआ। असद्वादी कहते हैं कि ‘यद्यपि मृत्तिकादि कारण पिण्डादिके नष्ट होनेपर नष्ट हो गया, घटादिमें मृत्तिकादि कारणका अन्वयदर्शन कारणकी अनुवृत्तिसे नहीं, अपितु सादृश्यके कारण है। पिण्डगत मृत्तिकासे घटगत मृत्तिका भिन्न है, फिर भी सादृश्यके कारण अभेद प्रतीतिसे अन्वयदर्शन-सा होता है।’ परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि पिण्डादिगत मिट्टी आदिकोंके अवयवोंका ही घटादिमें प्रत्यक्ष अनुभव होता है। अत: पिण्डगत मृत्तिकासे घटगत मृत्तिका भिन्न है—यह प्रत्यक्ष नहीं है, किंतु ‘यत् सत् तत् क्षणिकं यथा दीपं सन्तश्चेमे भावा:’ जो सत् है वह क्षणिक होता है, जैसे दीप और सभी पदार्थ सत् हैं; अत: वे क्षणिक होने चाहिये। इस अनुमानसे मृदादिकारणोंकी भी क्षणिकताका अनुमान करके ही भेद सिद्ध किया जा सकता है, परंतु ‘सैवेयं मृत्तिका’ वही यह मिट्टी है—इस प्रकारकी प्रत्यभिज्ञा प्रत्यक्ष पहचानसे विरुद्ध होनेके कारण यह अनुमान अग्निके अनुष्णत्वानुमानके समान अनुमानाभास है। कहा जा सकता है कि ‘प्रत्यक्ष-प्रमाणसे कारणकी एकता प्रतीत होती है और अनुमान-भेद प्रतीत होता है, अत: जैसे प्रत्यक्षसे विरुद्ध होनेके कारण अनुमानको अनुमानाभास कहकर अप्रमाण घोषित किया जाता है, वैसे ही अनुमानविरुद्ध प्रत्यक्षको ही प्रत्यक्षाभास कहकर अप्रमाण क्यों न घोषित किया जाय?’ परंतु यह नहीं कहा जा सकता; क्योंकि अनुमान प्रत्यक्षपूर्वक ही हुआ करता है, अत: अनुमानद्वारा प्रत्यक्ष न होनेसे प्रत्यभिज्ञासिद्ध प्रत्यक्षका विरोध उपजीव्यविरोध ठहरता है। इसलिये अनुमान दुर्बल है। अन्यथा यदि अनुमानसे प्रत्यक्ष बाधित होगा, तब तो सर्वत्र ही अनाश्वास होगा। कहा जा सकता है कि प्रत्यभिज्ञा स्वार्थमें स्वत:प्रमाण नहीं हो सकती, किंतु दूसरी बुद्धियोंके संवादसे ही उसका प्रामाण्य हो सकता है; परंतु स्थायित्व-साधक दूसरी कोई बुद्धि नहीं है, अत: ‘प्रत्यभिज्ञासिद्ध: प्रत्यभिज्ञायमान:’ अर्थ भी क्षणिक ही है, परंतु यह भी कहना ठीक नहीं; क्योंकि इस तरह तो अनुमान-सिद्ध क्षणिकत्वबुद्धि भी स्वार्थमें स्वत: प्रमाण न होनेसे उसे भी तादृग् दूसरी बुद्धिकी अपेक्षा होगी। उस दूसरी बुद्धिको भी अपने प्रामाण्यके लिये तादृक् तीसरी बुद्धिकी आवश्यकता होगी—इस तरह अनवस्था प्रसंग होगा। अत: प्रत्यभिज्ञाके प्रमाण-बुद्धिका स्वत: प्रामाण्य ही अंगीकार करना ठीक है। इस दृष्टिसे प्रत्यभिज्ञान भी स्वत: प्रमाण है। जो कहते हैं कि प्रत्यभिज्ञा भी सादृश्यके कारण भ्रमरूप है। ‘त एवेमे केशा:’—ये वही बाल हैं, इत्यादि स्थलोंमें बालोंकी भिन्नता रहनेपर भी सादृश्यके कारण अभिन्नता प्रतीत होती है, उसी तरह ‘सैवेयं मृत्तिका’ वही यह मिट्टी है, इत्यादि स्थलोंमें भी सादृश्यके कारण ही अभेदकी प्रत्यभिज्ञा होती है, उनका कथन भी ठीक नहीं; क्योंकि एक स्थायी अनुभविता न होनेसे पूर्वोत्तर कालवर्ती तत्पदार्थ एवं इदं पदार्थका ग्रहण ही नहीं होगा। उनके ग्रहण हुए बिना ‘तेनेदं सदृशम्’ यह सादृश्य-बुद्धि ही नहीं होगी। फिर सादृश्य-बुद्धिमूलक भी प्रत्यभिज्ञाको कैसे कहा जा सकता है? कोई भी क्षणिक बुद्धि या क्षणिक द्रष्टा भिन्न कालवर्ती पदार्थोंको नहीं ग्रहण कर सकता। इस सम्बन्धमें विज्ञानवादी बौद्धोंका कहना है कि बाह्यार्थके बिना ही बुद्धियाँ उत्पन्न होती हैं, अत: सादृश्य बिना ही अर्थात् असत् सादृश्यमें ही सादृश्य-बुद्धि होती है, परंतु इस तरह तो तत् पदार्थ और इदं पदार्थकी बुद्धि भी सादृश्य-बुद्धिकी तरह ही असद्विषयक ही समझी जायगी। यदि कहा जाय कि ऐसा भी अभीष्ट ही है अर्थात् विज्ञानवादी बाह्य अर्थका अस्तित्व ही नहीं अंगीकार करता। अत: सभी बुद्धियाँ बाह्य विषयके बिना ही उत्पन्न होती हैं तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि फिर तो बुद्धि, बुद्धि भी असद्विषयक ही होगी। अत: बाह्य अर्थके समान ही आन्तर अर्थ (बुद्धि)-का भी असत्त्व सिद्ध हो जायगा। यद्यपि शून्यवादी इसे भी अभीष्ट ही मानता है, तथापि यदि सर्वबुद्धि मिथ्या ही हों तो असद‍्बुद्धि भी मिथ्या हो जायगी। फिर तो असत् या शून्यकी सिद्धि भी असम्भव ही होगी। इसलिये सादृश्य-बुद्धिसे प्रत्यभिज्ञा होती है—यह कहना गलत है तथा च कार्योत्पत्तिके पहले कारणका सद्भाव सिद्ध होता है। संसारमें तम आदिद्वारा प्रावृत घटादि वस्तु आलोकादिके द्वारा प्रावरण तिरस्कारसे अभिव्यक्त होती है। अत: अभिव्यक्तिके पहले भी उसका अस्तित्व होता है। उसी तरह घटादि कार्य भी कारण-व्यापारद्वारा आवरण तिरस्कारसे अभिव्यक्त होता है। अत: अभिव्यक्तिके पहले भी उसका अस्तित्व मान्य होना चाहिये। जैसे अविद्यमान वस्तु सूर्योदय होनेपर भी उपलब्ध नहीं होती, उसी तरह कार्य यदि उत्पत्तिके पहले अविद्यमान होता तो कारक-व्यापारसे भी उसकी अभिव्यक्ति सर्वथा असम्भव ही होती। कहा जा सकता है कि सत‍्कार्यवादीके मतानुसार यदि घटादि कार्य कभी भी अविद्यमान नहीं है, तब तो सूर्योदय होनेपर उसका सदा ही उपलम्भ होना चाहिये, किंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि आवरण दो प्रकारके होते हैं—जैसे अभिव्यक्त घटका तम आदि आवरण है, उसी प्रकारसे अभिव्यक्तिके पहले अनभिव्यक्त घटका आवरण है मृदादि अवयवोंका पिण्डादि कार्यान्तररूपसे संस्थान। इसलिये जबतक मृदादिका अवयवोंकी पिण्डादि कार्यान्तररूपसे स्थिति रहती है, तबतक अर्थात् उत्पत्तिके पहले घटादि कार्य उसी आवरणसे आवृत होनेके कारण उपलब्ध नहीं होते। उसी आवरणके भंग होनेसे घटादि कार्योंकी उत्पत्तिका व्यवहार होता है। जैसे तम हटनेसे घटादिके व्यवहारका भाव होता है, वैसे ही पिण्डादिसे तिरोभूत रहनेपर अभावका व्यवहार होता है। कपालादिसे तिरोभूत होनेपर घटादिके नष्ट होनेका व्यवहार हुआ करता है। कहा जा सकता है कि पिण्ड-कपालादि घटादिके समान देशवाले होनेके कारण आवरण नहीं हो सकते; क्योंकि तम और कुडॺादि (दीवार) आवरण घटादिसे भिन्न देशवाले होते हैं अर्थात् आवृतके देशसे भिन्न देशवाला ही आवरण होता है, परंतु पिण्ड-कपाल आदि तो सर्वथा आवृतके ही देशवाले होते हैं। यह कहना भी ठीक नहीं; क्योंकि क्षीर जलके समान देशमें रहकर भी जलका आवरक रहता है। समानदेशत्व आवरणका बाधक है—इसका क्या अभिप्राय है? एकाश्रयाश्रितत्व या एककारणत्व? अर्थात् जो दो वस्तु एक आश्रयमें आश्रित होते हैं, उनमें एक-दूसरेका आवरक नहीं होता अथवा जिन दो वस्तुओंका एक ही कारण होता है, उनमें एक दूसरा आवरक नहीं होता। इनमें पहला पक्ष ठीक नहीं; क्योंकि एकाश्रयाश्रित होनेपर भी क्षीरके द्वारा क्षीर-मिश्रित जलका आवरण होता ही है तथा दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं; क्योंकि कार्यभेदसे कारणका भेद होता है। अत: घटादिके कारण मृदादि अवयवोंसे कपालादिके कारण मृदादिके अवयवोंका भेद होता है। अत: एककारणत्व असिद्ध है अर्थात् यदि घट अवस्थावाली मृत्तिकामात्रमें रहनेवाले कपाल आदिको घटका अनावरण कहें तो यह अभीष्ट ही है, परंतु यदि अव्यक्त घटावस्थावाली मृत्तिकामें रहनेवाले कपालादिको अनावरणत्व कहना चाहते हैं तो यह नहीं कहा जा सकता; क्योंकि यहाँ घट और कपालादिके कारण मृदादि अवयवोंका भेद ही है। कहा जा सकता है कि फिर तो आवरणाभावके लिये ही प्रयत्न करना चाहिये, घटोत्पत्तिके लिये प्रयत्न करना व्यर्थ है—यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि यह नहीं कहा जा सकता कि आवरण-विनाशमात्रके प्रयत्नसे ही घटकी अभिव्यक्ति होती है; क्योंकि तम आदि आवृत घटादिके प्रकाशके लिये दीपादिकी उत्पत्तिका भी प्रयत्न देखा ही जाता है, भले ही वह प्रयत्न भी तमके निराकरणार्थ ही हो। तमके हटनेपर स्वयं ही घट उपलब्ध होता है, तथापि प्रकाशवान् ही घटका उपलम्भ होता है। इस तरह तमके निराकरणसे अतिरिक्त भी प्रदीपोत्पत्तिका प्रकाशविशिष्ट घटका उपलम्भ हो, यह विशिष्ट प्रयोजन सिद्ध होता है। इस तरह घट-प्रागभावका यह मतलब नहीं कि उत्पत्तिके पहले घटस्वरूप ही नहीं। अत्यन्ताभाव, प्रागभावादि यदि अपने प्रतियोगी घटादिसे अत्यन्त भिन्न हों तो घटादिकी अनाद्यनन्तता और अद्वितीयता सिद्ध होगी। यदि सद्‍रूप हों तो फिर अभाव ही नहीं रह जायँगे; क्योंकि भाव और अभावकी परस्पर संगति नहीं होती। कहा जाता है कि अभाव प्रसिद्ध वस्तु है। जैसे भावका अपलाप नहीं किया जा सकता, वैसे ही अभावका भी, परंतु विचारणीय विषय यह है कि वह अभाव क्या है? घटका स्वरूप ही है या अर्थान्तर? यदि प्रथम पक्ष कहें तो ठीक नहीं; क्योंकि यदि घटस्वरूप ही हो तो घटके द्वारा उसका व्यपदेश कैसे हो? अर्थात् अभेदमें घटका प्रागभाव इस रूपसे भेदमूलक सम्बन्ध व्यवहार कैसे होगा? यदि कहा जाय कि कल्पित सम्बन्धको ही लेकर व्यवहार बनता है तो भी यही कहना पड़ेगा कि कल्पित अभावका ही ‘घटस्य प्रागभाव:’ इस रूपसे व्यवहार होता है। घटस्वरूपका घटसे व्यपदेश नहीं बन सकता। यदि कहा जाय कि घटाभाव घटसे अर्थान्तर है तो वह घटसे अर्थान्तर कारणरूप ही हुआ तथा च घटप्रागभाव घटकारणरूप ही ठहरा। अभिव्यंजकके व्यापार होनेसे नियमेन घटकी अभिव्यक्ति होती है, अभिव्यंजक व्यापार न होनेसे नहीं। इस तरह अन्वयव्यतिरेकसे घटादि कार्योंके लिये कुलालादि-व्यापार सार्थक होते हैं। उस व्यापारसे आवरण-भंग आर्थिक रूपसे हो जाता है। कारणमें वर्तमान एक कार्य इतर कार्योंका आवरक होता है। यदि घटादिके पूर्वाभिव्यक्त पिण्डादि कार्य या घटध्वंसके पश्चात् अभिव्यक्त कपालादि कार्यके विनाशका ही प्रयत्न किया जाय तो चूर्णादि भी कार्य उत्पन्न होंगे, उन कार्योंसे भी घट आवृत ही रहेगा। अतएव घटाभिव्यक्तिके लिये नियत कारण व्यापार अपेक्षित होता है। ‘अतीतो घट:, अनागतो घट:’ ये दोनों बुद्धियाँ भी वर्तमान घटबुद्धिके समान ही विद्यमान वस्तुका ही आलम्बन करती हैं। इसीलिये अनागत वस्तुके लिये अर्थियोंकी प्रवृत्ति होती है। यदि खपुष्पवत् अनागतादि वस्तु अत्यन्त असत् हों तो उनमें अर्थियोंकी प्रवृत्ति नहीं हो सकती। ‘इह कपालेषु घटो भविष्यति’ इन कपालोंमें घट होगा। यह प्रतीति प्रागभावकी प्रतीति कही जाती है। इस मिट्टीसे घट होगा, इस विश्वाससे ही कुलालादि प्रवृत्त होते हैं। घटनिर्माणार्थ प्रवृत्त कुलालादिके व्यापार-कालमें ‘घट: असत्’ इस वाक्यका यदि इतना ही अर्थ है कि जैसे कुलालादि वर्तमान है, उस प्रकारसे घट वर्तमान नहीं है। तब तो ऐसे असत‍्का कोई विरोध नहीं; क्योंकि घट तो भविष्यद्‍रूपसे ही वर्तमान है। पिण्ड या कुलालादिकी जैसी वर्तमानता है, वैसी वर्तमानता घटकी नहीं है; क्योंकि पिण्डकी वर्तमानता और घटकी वर्तमान दशामें घटोत्पत्तिके पहले घट असत् अर्थात् कुलालादिकी तरह वर्तमान नहीं है, इस कथनका कोई विरोध नहीं, परंतु घटकी जो भविष्यत्ता विशिष्ट कार्यरूप घट असत् इस व्यवहारसे उसका प्रतिषेध नहीं हो सकता। चतुर्विध अभावोंमें जैसे घटान्योन्याभाव घटसे भिन्न पटादिरूप ही है, घटस्वरूप ही नहीं; पट घटाभाव स्वरूप होनेपर भी अभावात्मक नहीं होता, किंतु भावरूप ही रहता है। इसीलिये कहा गया है कि ‘स्वरूपपररूपाभ्यां सर्वं सदसदात्मकम्।’ इसी प्रकार घटके प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अत्यन्ताभावकी भी घटसे भिन्नता और भावरूपता ही कहनी चाहिये। इस तरह विकसित बीजमें अन्तर्विरोध, वर्गभेद, वर्गसंघर्ष एवं वर्ग-विध्वंसरूपी वाद-प्रतिवादके अंकुरका फलपर्यन्त विकास होना और उससे पुन: उसी प्रकार अंकुरान्तररूपी विकासान्तरकी उत्पत्ति यद्यपि किसी अंशमें इष्ट है, तथापि भूतोंकी उत्पत्तिमें यह नियम व्यभिचरित है। आकाशमें वायुकी उत्पत्ति होती है, फिर भी आकाश बना रहता है। वायुसे तेजकी उत्पत्ति होनेपर भी वायु नष्ट नहीं हो जाता, इसी प्रकार तेजसे जल एवं जलसे भूमि उत्पन्न होनेपर भी कारण बने ही रहते हैं। कार्यके विकासान्तर होनेपर प्रथम विकास समाप्त हो जानेका नियम सर्वथा अदृष्ट है। वृक्षसे फलोंके विकसित होनेपर भी वृक्षोंके नष्ट होनेका नियम नहीं है। मनुष्य, पशु आदिसे मनुष्य, पशु आदिकी उत्पत्ति होनेपर भी कारणका विनाश नहीं होता। भूत भी सावयव होनेसे कार्य है। जो-जो भी सावयव होता है, घटादिके समान कार्य ही होता है। साथ ही जो भी कार्य है, उसे सकर्तृक एवं सोपादान भी होना चाहिये। कर्ता चेतन होता है, इस दृष्टिसे ईश्वरसिद्धि होती है एवं कार्यकी अपेक्षा उपादान व्यापक, शुद्ध एवं नित्य होता है, इस दृष्टिसे कार्यकी अपेक्षा कारणकी अनश्वरता, स्वच्छता एवं व्यापकताका ही निर्णय होता है। इस तरह पृथ्वी जलसे, जल तेजसे, तेज वायुसे एवं वायु आकाशसे उत्पन्न होता है, यह श्रुतियों एवं युक्तियोंसे सिद्ध है। यहाँ वाद-प्रतिवाद, समन्वय आदिका सिद्धान्त व्यभिचरित एवं अत्यल्पदेशीय ही सिद्ध होता है। पाश्चात्य वैज्ञानिक कहते हैं ‘कि गणितशास्त्रके किसी अंक चिह्नको लीजिये ‘+क’। इसका प्रतिषेध है ‘-क’। यदि ‘-क’ से गुणाकर हम इसका प्रतिषेध करते तो इसका फल होता है ‘क२’। प्रतिषेधके प्रतिषेधसे मूल अंक फिर लौट आया, लेकिन और ऊँचे स्तरपर अपने वर्गफलके रूपमें। इसमें कोई हानिकी बात नहीं है। यही नतीजा क और क के गुणासे भी प्राप्त होता है; क्योंकि ‘क२’ के वर्गमूलमें सदा दोनों अंक रहते हैं ‘क’ और ‘क’। संख्याणुगणितके द्वारा किसी गणितकी समस्याका हल तो इसका और भी अच्छा उदाहरण है। दो अंक चिह्न ‘क’ और ‘ख’ ले लीजिये। जिनके परिवर्तनका आपसी सम्बन्ध निर्धारित है। यानी किसी एकमें परिवर्तन हो तो दूसरेमें परिवर्तनका स्थिरीकरण उस उक्त सम्बन्धसे हम कर सकते हैं। यदि हम दोनोंका प्रतिषेध करें तो घटते-घटते ये दोनों अंक नहींके बराबर हो जाते हैं। लेकिन उनका पूर्व सम्बन्ध ज्यों-का-त्यों बना रहता है। इसको अंकमें हम यों रख सकते हैं। लेकिन यह सम्बन्ध बराबर है के, अब इस प्रतिषेधके द्वारा जब हम उस समस्याको हल कर लेते हैं, तो हम फिर मूल अंकपर उपनीत होते हैं। पूर्व प्रतिषेधका प्रतिषेध और समस्याका हल हो गया।’ उपर्युक्त उदाहरण भी वस्तुत: प्रतिषेधके प्रतिषेधका नहीं। धन-ऋणका बढ़ाव-घटावके रूपमें विरोध होनेसे यद्यपि धनका प्रतिषेध ऋणको कहा जा सकता है, ऋणके गुणनसे निकलनेवाले फलभूत वर्गफल संख्याको भी प्रतिषेधका प्रतिषेध कहा जा सकता है, परंतु केवल वह धनके रूपमें ही मूल संख्याके रूपमें है, वस्तुत: उसका रूप पृथक्-पृथक् है। जैसे अंकुर-कारणभूत यवका दाना और अंकुरका फलभूत यवके दाने पृथक्-पृथक् हैं। संख्याणुगणितका भी उदाहरण, इस सम्बन्धमें अनुकूल नहीं है। मूलका प्रतिषेध शून्यवत् ‘क’ अवश्य प्रतिषेधका प्रतिषेध है। उनके निर्धारित परस्पर सम्बन्धके आधारपर उसके प्रतिषेधसे मूलपर पहुँचते हैं, परंतु यह अपेक्षा-बुद्धिकी ही कलाबाजी है। इसके प्रतिषेधके प्रतिषेधसे प्रतियोगी सत्त्व-व्यवस्थापन-जैसी कोई चीज नहीं निकलती। एक अपेक्षा-बुद्धिसे वही वस्तु पहली या दूसरी, छोटी या बड़ी हो सकती है, परंतु वस्तुत: वह विरोधात्मक नहीं हो सकती।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>एकसत्तावाद</category><category>धर्मसम्राट</category><category>प्रतिषेध</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>9.2 पूँजीका स्वरूप ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/9-2-puunjiikaa-svruup-maarksv/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/9-2-puunjiikaa-svruup-maarksv/</guid><description>9.2 पूँजीका स्वरूप कहा जाता है कि ‘अर्थशास्त्रके क्षेत्रमें पूँजी स्वयं उदाहरण है। वह धनका एक निम्नतम परिमाण है, जिसके रहनेपर ही उसका स्वामी पूँजीपति कहला सकता है। मार्क्सने उद्योगकी किसी शाखाके ए…</description><pubDate>Fri, 06 Jun 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h3&gt;9.2 पूँजीका स्वरूप&lt;/h3&gt;
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&lt;p&gt;कहा जाता है कि ‘अर्थशास्त्रके क्षेत्रमें पूँजी स्वयं उदाहरण है। वह धनका एक निम्नतम परिमाण है, जिसके रहनेपर ही उसका स्वामी पूँजीपति कहला सकता है। मार्क्सने उद्योगकी किसी शाखाके एक श्रमिकका उदाहरण लिया है, जो आठ घण्टेतक अपने लिये अर्थात् अपनी मजदूरीका अर्थ उत्पन्न करनेके लिये श्रम करता है और चार घण्टे अतिरिक्त अर्थ पैदा करनेके लिये जो उसके मालिककी जेबमें जाता है। इस विशेष दृष्टान्तमें यदि पूँजीपति अपने अतिरिक्त अर्थके द्वारा मजदूर-श्रेणीका जीवन भी बिताना चाहता है तो उसके पास इतना धन होना चाहिये कि वह दो मजदूरोंके लिये मजदूरी, कच्चा माल तथा उत्पादनके साधनोंका बंदोबस्त कर सके। लेकिन पूँजीपतिका उद्देश्य केवल जीना नहीं है, बल्कि अपनी सम्पत्तिकी वृद्धि करना है। इसलिये इस धनका मालिक अभी पूँजीपति नहीं है। अब यदि पूँजीपतिको मजदूरसे दुगुना अच्छा जीवन व्यतीत करना है और अतिरिक्त अर्थका आधा कारोबारमें फिर डालना है तो उसे आठ मजदूरोंको काममें लगाना चाहिये और पहले अर्थ-संग्रहका चौगुना कारोबारमें लगाना चाहिये। अब यह अर्थसंग्रह पूँजीका आकार ले लेता है। इस प्रकार अर्थ-संग्रहका परिणाम बढ़ते-बढ़ते एक सीमापर वह पूँजीके रूपमें परिणत हो जाता है।’ परंतु यह कहना ठीक नहीं; कारण, मार्क्सका अतिरिक्त श्रम और अतिरिक्त मूल्यकी कल्पना ही निराधार है, इसका विवेचन पीछे हो चुका है। यह भी कहा जा चुका है कि व्यापार या उद्योगद्वारा धनार्जनका तरीका ही इस प्रकारका होता है, जिसमें बुद्धिमानीसे एक मृतमूषिकाद्वारा भी कोटिपति बना जा सकता है। मार्क्सके मतानुसार उत्पादन-साधन ही पूँजी है, उसकी मात्रा अल्प हो या बड़ी। इसीलिये किसानोंके खेत भी उत्पादन-साधन हैं। इस दृष्टिसे किसान भी पूँजीपति रहते हैं। समाज-विज्ञानके क्षेत्रमें इस गुणात्मक परिवर्तनकी गवाहीके लिये एंजिल्सने नेपोलियनको साक्षी माना है। वह कहता है कि ‘फ्रांसीसी घुड़सवार, जो नियन्त्रित सिपाही थे, लेकिन कोई अच्छे घुड़सवार नहीं थे और मामेलुक जो बहुत अच्छे घुड़सवार थे, लेकिन जिनमें नियन्त्रण नहीं था। उनकी लड़ाईके सिलसिलेमें दो मामेलुक आसानीसे तीन फ्रांसीसियोंका मुकाबला कर सकते थे। सौ मामेलुक सौ फ्रांसीसियोंके बराबर थे। लेकिन ३०० फ्रांसीसी साधारणतया ३०० मामेलुकोंको हरा देते थे और १ हजार फ्रांसीसी १५ सौ मामेलुकोंको हरा देते थे। पहलेके उदाहरणकी तरह इससे यह स्पष्ट है कि नियन्त्रित सिपाहियोंके जत्थेके परिमाणके बढ़नेपर उसका किस प्रकार गुणात्मक परिवर्तन होता है और वह अपनेसे अधिक संख्याकी फौजको हरा देता है।’ परंतु इससे भी यही सिद्ध होता है कि अनियन्त्रण, अनुशासनहीनता अल्पसंख्यकोंमें इतनी हानिकर नहीं होती, जितनी कि बहुसंख्यकोंमें। इसी प्रकार नियन्त्रणका गुण अल्पसंख्यकोंमें भले कुछ प्रकट हो, किंतु बहुसंख्यकोंमें अधिकरूपसे फलदायी होता है। नियन्त्रित संघटित समुदाय शक्तिशाली होता है। तृणादिनिर्मित रज्जु ही इसका दृष्टान्त है। परिणामवादानुसारी सत‍्कार्यवादमें कोई भी विद्यमान ही गुण किसी अवस्थाविशेषमें प्रकट होता है। सिकतामें तेल नहीं होता, अत: कभी नहीं व्यक्त होता। तिलमें तेल होता है, अत: वह कभी प्रकट होता है। &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;ान्त-मतानुसार कारणकी अपेक्षा कार्यमें भिन्नता न होनेपर भी कुछ अनिर्वचनीय गुण भी सिद्ध होते हैं। जैसे मृत्तिकाद्वारा जलानयन नहीं होता, फिर भी मृत्तिकानिर्मित घटादिद्वारा जलानयन आदि कार्य होते हैं। तन्तुद्वारा अंगप्रावरण, शीतापनयन नहीं होता, फिर भी तन्तुनिर्मित पटद्वारा वह कार्य होता है। आकाशमें स्पर्श नहीं होता, फिर भी तन्निर्मित वायुमें स्पर्शगुण है, वायुमें रूप नहीं, तथापि वायुपरिणामभूत तेजमें रूपगुण उपलब्ध होता है। इसी तरह एक-एक व्यक्ति या अल्प व्यक्तिमें जो गुण नहीं व्यक्त होते, अधिक-संख्यक उन्हीं व्यक्तियोंमें वे गुण प्रकट होते हैं। इसी तरह एक या अन्य व्यक्तियोंमें अनियन्त्रणका जो दुष्परिणाम नहीं व्यक्त होता, बहुसंख्यकोंमें वह दुष्परिणाम स्पष्ट हो जाता है।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt; और &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>अर्थशास्त्रआदर्शराज्य</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>धर्मसम्राट</category><category>पूँजीपति</category><category>बोधस्वरूप</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item><item><title>9. मार्क्स-दर्शन - 9.1 वैज्ञानिक द्वन्द्ववाद ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</title><link>https://batukuvacha.com/posts/9-maarks-drshn-9-1-vaijnyaanik/</link><guid isPermaLink="true">https://batukuvacha.com/posts/9-maarks-drshn-9-1-vaijnyaanik/</guid><description>9. मार्क्स-दर्शन मार्क्स प्रयोग तथा अनुभवद्वारा प्राप्त ज्ञानको ही वास्तविक ज्ञान मानता है। ‘डाइलेक्टिस’ (द्वन्द्वमान)-की चर्चा हम पहले कर आये हैं। यह एक यूनानी शब्द है, जिसका अर्थ है दो मनुष्योंक…</description><pubDate>Thu, 05 Jun 2025 00:00:00 GMT</pubDate><content:encoded>&lt;h2&gt;9. मार्क्स-&lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-paashcaaty-drshn-1-1-drshnkii/&quot;&gt;दर्शन&lt;/a&gt;&lt;/h2&gt;
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&lt;p&gt;मार्क्स प्रयोग तथा अनुभवद्वारा प्राप्त ज्ञानको ही वास्तविक ज्ञान मानता है। ‘डाइलेक्टिस’ (द्वन्द्वमान)-की चर्चा हम पहले कर आये हैं। यह एक यूनानी शब्द है, जिसका अर्थ है दो मनुष्योंका वार्तालाप। इसमें एक तर्ककी स्थापना की जाती है, फिर उसका खण्डन होता है, जिससे नये तर्ककी उत्थापना होती है। इस प्रकार एक नीचे दर्जेके सत्यसे ऊँचे दर्जेके सत्यपर पहुँचते हैं। यह एक क्रमोन्नतिकी प्रक्रिया है, इसमें स्थिरता नहीं है, वेग है। यही प्रक्रिया सारी प्रकृतिमें वर्तमान है। मानव-समाज और प्रकृतिके इतिहाससे ही द्वन्द्वमानके नियम निकाले गये हैं। ये नियम व्यापकरूपसे सब प्रकारकी गतिके नियम हैं। इनमें तीन मुख्य हैं, १-परिमाणका गुणमें तथा गुणका परिमाणमें परिवर्तन करनेका नियम, २-विरोधियोंके अन्त:प्रवेशका नियम तथा स्वयं विपरीतानुवर्तनका नियम और ३-प्रतिषेधके प्रतिषेधका नियम। इन तीनों नियमका विस्तार हीगेलने विचारके नियमोंके रूपमें किया है। पहला नियम उसके तर्कशास्त्रके पहले खण्डमें है, जिसका नाम है अस्तित्वका सिद्धान्त (डाक्ट्रिन ऑफ बीइंग्स)। दूसरा नियम दूसरे खण्डमें है, जिसका नाम है सत्ताका सिद्धान्त (डाक्ट्रिन ऑफ एसेन्स)। तीसरा नियम है, उसकी सारी प्रथाका बुनियादी नियम। मार्क्स इन नियमोंको प्राकृतिक नियमोंके रूपमें देखता है। ‘पहला नियम जिसे हम यों कह सकते हैं कि प्रकृतिमें गुणात्मक परिवर्तन भूत या गतिके परिमाणमें कमी या बेशीके कारण होता है। प्रकृतिमें गुणोंका प्रभेद निर्भर है रासायनिक संघटनके प्रभेद नियमपर या गति या शक्तिके परिमाण या रूपपर। इसलिये भूत या गति घटाये-बढ़ाये बिना किसी वस्तुके गुणोंमें परिवर्तन करना सम्भव नहीं। दूसरे नियमकी पूर्ति हम यों भी कर सकते हैं कि हर एक वस्तु दो विरोधी भावोंका संयोग है; अर्थात् हर वस्तुमें और वस्तु-चिन्तन क्रियाके लिये भी यही लागू है। दोनों पहलू हैं, भावात्मक और अभावात्मक; धनात्मक और ऋणात्मक। दूसरे शब्दोंमें सत्य विरोधात्मक है। अतिभौतिकवादी इस सहज सत्यकी उपलब्धि नहीं कर सकता, इसलिये कि वह हर वस्तुको स्थिररूपमें देखता है। लेकिन यह जगत् और इसके पदार्थ सदा चंचल हैं।’ ‘पीछे हमने देखा है कि गतिमात्र इस प्रकारके विरोधात्मक सत्यका उदाहरण है। किसी वस्तुके स्थानपरिवर्तनको हम यों ही समझ सकते हैं कि वह वस्तु एक ही समयपर एकाधिक स्थानपर है तथा एक ही स्थानपर है भी और नहीं भी है। इस विरोधाभासका हल है गति।’ अध्यात्मवादीका इस सम्बन्धमें कहना है कि द्वन्द्वमान कोई व्यापक या स्थिर सिद्धान्त नहीं है; क्योंकि विचार करनेपर वह वाद-विवाद, तर्क-प्रतितर्कमें भी सही नहीं उतरता। तर्कके सम्बन्धमें यही कहा जा सकता है कि वह प्रमाणान्तरोंके समान प्रतिष्ठित नहीं होता। कोई तार्किक अपने तर्कसे एक वस्तुको प्रतिष्ठित करता है, दूसरा कोई उससे भी बड़ा तार्किक और उत्कृष्ट तर्कसे पहले तर्कको तर्काभास सिद्ध करके प्रथमतर्कसिद्ध व्यवस्थाका खण्डनकर अन्य उत्कृष्ट व्यवस्थाको प्रतिष्ठित करता है। इसी प्रकार उत्तरोत्तर खण्डन-मण्डन चलता रहता है—‘यत्नेनानुमितोऽप्यर्थ: कुशलैरनुमातृभि:। अभियुक्ततरैरन्यैरन्यथैवोपपाद्यते॥’ परंतु इस तरह तो तर्क ही अप्रतिष्ठित ठहरते हैं, फिर उनके द्वारा किसी भी अर्थकी सिद्धि नहीं हो सकती। फिर तो तर्कद्वारा किसी भी सत्यपर पहुँचना सम्भव नहीं है, परम सत्यतक पहुँचनेकी बात तो दूर रही। अनवस्थित तर्कके आधारपर ही द्वन्द्वमान सिद्धान्त बनानेका प्रयत्न किया जाता है, किंतु अनवस्थित तर्क किसी भी सत्यका बोधक नहीं हो सकता। अत: ऐसे आधारपर आधारित द्वन्द्वमानके आधारपर किसी सिद्धान्तपर पहुँचना कैसे सम्भव है? यद्यपि &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/2-raamraajykaa-svruup-maark/&quot;&gt;रामराज्य&lt;/a&gt;वादी तर्कको सर्वथा अप्रतिष्ठित नहीं मानते। वे कहते हैं कि कतिपय तर्कोंका अप्रतिष्ठितत्व देखकर ही तर्कजातीय होनेसे विमत तर्कका भी अप्रतिष्ठितत्व अनुमित किया जाता है, परंतु यदि सभी तर्क अप्रतिष्ठित हैं तो तर्कोंका अप्रतिष्ठितत्व सिद्ध करनेवाला तर्क भी अप्रतिष्ठित ही होगा। फिर स्वत: अप्रतिष्ठित तर्कके बलपर तर्कोंका अप्रतिष्ठितत्व कैसे सिद्ध होगा? इस तरह कहना होगा कि सत्यबोधक तर्क या प्रमाणान्तरसंवादी तर्क अप्रतिष्ठित नहीं होता। जो तर्क प्रतिष्ठित होता है, वह तो निश्चितरूपसे वस्तु-तत्त्वका बोधक होता है। फिर उसका तर्कान्तरसे खण्डन भी नहीं हो सकता और न उसके द्वारा सिद्ध विषयका ही खण्डन हो सकता है। न उससे उत्कृष्ट तर्कका उत्थान होता है और न उसके द्वारा उत्कृष्ट सत्यके सिद्धकी ही आशा रहती है। सुतरां प्रत्यक्ष एवं आगममें इस न्यायका संचार नहीं हो सकता; क्योंकि किसी भी तर्कान्तर या प्रमाणान्तरसे निर्दोष प्रत्यक्षागमका बोध नहीं होता। इस तरह जब विचार या तर्कके स्वजातीय, विजातीय प्रमाणोंमें ही खण्डन-मण्डन, साधन-बाधनकी परम्परा नहीं चलती, तब भौतिक विषयोंमें द्वन्द्वमान सिद्धान्तरूपसे कैसे लागू होगा? परिमाणका गुणमें परिवर्तन तथा गुणका परिमाणमें परिवर्तनका नियम अवश्य कहीं उपलब्ध हो सकता है, परंतु यह नियम अव्यभिचरित नहीं है। मृत्तिकासे घट, तन्तुसे पट बनता है; प्रकृतिमें जलानयन, अंगप्रावरण, शीतापनयनका सामर्थ्य नहीं होता, परंतु कार्योंमें यह सब होता है। यहाँ मूलकारणसे भिन्न किसी भी वस्तु-अन्तरका प्रवेश नहीं है, फिर भी कारणसे कार्यकी भिन्नता नहीं होती। जैसे &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/shivbhujngm/&quot;&gt;शिव&lt;/a&gt;िकावाहक प्रत्येक रूपसे मार्गदर्शनादि कार्य करते हैं, किंतु मिलकर शिविकावहन कार्य करते हैं। इसी तरह तन्तु आदि जो कार्य नहीं कर पाते, वह कार्य तन्तुनिर्मित पटादि कर सकते हैं। इसी तरह &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/ythemaan-vaacn-klyaanniim/&quot;&gt;वेद&lt;/a&gt;ान्तरीतिसे शब्दगुणवाले आकाशसे उत्पन्न वायुमें शब्द, स्पर्श दो गुण हो जाते हैं। फिर वायुसे उत्पन्न तेजमें शब्द, स्पर्श, रूप तीन गुण हो जाते हैं। तेजसे उत्पन्न जलमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस चार गुण हो जाते हैं। जलसे उत्पन्न पृथ्वीमें शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध पाँच गुण होते हैं। पृथ्वी जलमें, जल तेजमें जब लीन हो जाता है, तब गुणोंकी कमी होती जाती है। परमकारण स्वप्रकाश ब्रह्म चेतन सर्वथा निर्गुण एवं निर्विशेष माना जाता है। कार्यकी ओर चलनेसे गुणों और विशेषणोंमें वृद्धि होती है। कारणकी ओर जानेसे निर्गुणता, निर्विशेषताकी वृद्धि होती जाती है; फिर भी कारणसे भिन्न कार्य स्वतन्त्र सत्तावाला नहीं होता। संकुचित एवं प्रसारित पटमें एवं संकुचितांग, विकसितांग, कूर्ममें भेद प्रतीत होने, कारण-कार्यमें विलक्षणता प्रतीत होनेपर भी वास्तवमें भेद नहीं है। कार्यान्तरका भेद भी शिविकावाहकोंके मार्गदर्शन एवं शिविकावाहनके दृष्टान्तसे दिखाया जा चुका है। शब्द-स्पर्शादि गुण तथा समवाय-सामान्यविशेष आदि भी मूल द्रव्यकी अवस्थाविशेष ही हैं, वस्तुत: उनसे भिन्न नहीं हैं। तापगुणकी वृद्धि होते-होते जलका द्रवत्व समाप्त हो जाता है और तापका ह्रास होते-होते जल बर्फ बन जाता है। तापवृद्धिसे जलके परिमाणमें कमी आती है। वेदान्त-रीतिसे तेजसे ही जलकी उत्पत्ति होती है; अत: तेजमें उसका विलय होना कोई अनहोनी बात नहीं है। &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/7-maarksiiy-arth-vyvsthaa-7-1/&quot;&gt;मार्क्सवाद&lt;/a&gt;ी कहते हैं कि ‘संख्यानुगुणित डिफरेन्शियल कैल्कुलस यह मानकर चलता है कि एक ही रेखा ऋजु और वक्र दोनों है और इस बुनियादपर जो नतीजे निकलते हैं, उनका हम व्यावहारिक उपयोग करते हैं। एक असीम व्यासके वृत्तके परिधिका एक छोटा अंश ऋजु रेखा है, लेकिन एक वृत्तके अंशके नाते यह रेखा वक्र भी है। इसी प्रकारका एक दूसरा उदाहरण भी है—दो ऋजु रेखाएँ यदि किसी बिन्दुपर मिलती हैं, तो यह सिद्ध किया जा सकता है कि उस बिन्दुसे थोड़ी ही दूरपर ये दोनों रेखाएँ असमानान्तर हैं। गणितहीमें और यह एक विरोधाभास है कि किसी संख्याके वर्गमूलको उसके वर्गफलके रूपमें प्रकाशित किया जाय, जैसे—क १/२= २ इससे भी अधिककी कोई ऋणात्मक संख्या किसी संख्याका वर्ग हो सकती है; क्योंकि वर्गीकरणका यह साधारण नियम है कि ऋणात्मक संख्याका वर्ग धनात्मक होता है। लेकिन -१ गणितका एक आवश्यक अंग है; खण्डीकरण; (फैक्टराइजेशन)-का उदाहरण—क२-ख२=(क+ख) (क-ख) सूत्रसे (९-१)=(३२-१२)=(३+१) (३-१)।’ ‘भौतिक विज्ञानमें विरोधियोंके ऐक्यका उदाहरण है अणु, स्वयं तड़ितकी अणुमें क्रिया-प्रतिक्रिया नहीं है। लेकिन यह जिन अंशोंसे बनता है, उसमें एक धनतड़ितात्मक है, ‘प्रोटान’ और दूसरा ऋणतड़ितात्मक है, ‘इलेक्ट्रान’, जीवन तो सर्वथा विरोधमय है। वह हर समय कुछ है और कुछ अन्य भी है। ज्यों ही इस विरोधका अन्त होता है, जीवनका भी अन्त हो जाता है। विचारक्षेत्रमें यह विरोध विद्यमान है। मनुष्यकी ज्ञानशक्ति अपरिसीम है, लेकिन उसका वास्तविक ज्ञान सीमाबद्ध है।’ अब परिमाणके गुणात्मक परिवर्तनके कुछ उदाहरण ले लीजिये। भौतिक विज्ञानके क्षेत्रमें सबको विदित है कि आलोक-तरंग एक प्रकारके ‘इलेक्ट्रो मैगनेटिक’ तरंग हैं। इन तरंगोंकी लम्बाइयोंके घटने-बढ़नेके कारण विभिन्न प्रकारकी रश्मियोंकी उत्पत्ति होती है। जो आलोक मनुष्यकी आँखोंमें दिखायी पड़ता है, वह इन तरंगोंका एक छोटा हिस्सा है। जिन रश्मियोंको हम देखते हैं, वे मुख्य सात रंगकी हैं, जो आरम्भ होती हैं लालसे और जिनका अन्त होता है बैगनीसे। लालके उधर इन तरंगोंकी लम्बाई बढ़ती जाती है और बैगनीके उधर यह लम्बाई घटती जाती है। एक साधारण उदाहरण है—‘वस्तुकण’ ‘मोलेकुल’ के अन्तिम विभाजनपर परमाणु ‘ऐटम’ की उत्पत्ति; परमाणु और वस्तुकणके गुणोंमें बहुत प्रभेद है। वस्तुत: जिन उदाहरणोंको विरोधियोंकी सह-अवस्थितिके सम्बन्धमें उपस्थापित किया गया है, वे विरोधी कहे ही नहीं जा सकते, अपेक्षाबुद्धिसे ही ये विरोध भासित होते हैं, परंतु वस्तुविरोध पुरुषबुद्धिपरतन्त्र नहीं होता। वास्तविक विरोध है भाव-अभावका, तेज-तिमिरका, सत्-असत‍्का; इनमें परस्पर तादात्म्य या संयोगादि सम्बन्ध नहीं हो सकता। यों तो जैसे एक ही पुरुष विभिन्न अपेक्षाबुद्धियोंसे पिता, पति, पुत्र आदि रूपमें व्यवहृत होता है, फिर भी उसमें वस्तुत: भेद नहीं है, वैसे ही रेखामें ऋजुत्व, वक्रत्व आदि अपेक्षाबुद्धिकृत भेद है। वस्तुत: वह एक साधारण रेखा है, यह स्थिति है। मार्क्सके विरोधियोंका सहअस्तित्व एक प्रकारसे अनेकान्तवादसे मिलता-जुलता है। इसे भी एक प्रकारसे अनेकान्तवाद ही कहा जा सकता है। इसका विचार हमारे यहाँके दर्शनोंमें विस्तारसे है। ‘स्यादस्ति स्यान्नास्ति स्यादस्ति च नास्ति च, स्यादवक्तव्य: स्यादस्ति चावक्तव्यश्च स्यान्नास्ति चावक्तव्यश्च स्यादस्ति च नास्ति चावक्तव्यश्च।’ अर्थात् हर वस्तुमें यह सप्तभंग न्याय जोड़ा जाता है। यह वस्तु किसी तरह है, किसी तरह नहीं है। किसी तरह है भी, नहीं भी है। किसी तरह अवक्तव्य है, किसी तरह है भी और अवक्तव्य भी है, किसी तरह नहीं भी है और अवक्तव्य भी है, किसी तरह है भी नहीं भी है, अवक्तव्य भी है, किसी पदार्थकी नित्यताका एकता आदिके सम्बन्धमें भी ये सप्तभंग जोड़े जाते हैं। इसपर विचारणीय बात यह है कि एक वस्तुमें युगपत् सत्त्व तथा असत्त्व-विरुद्ध धर्मका होना असम्भव है। जैसे एक ही वस्तु समानरूपसे शीत और उष्ण नहीं कही जा सकती। वस्तुत: जो वस्तु सत्य है, वह सर्वथा, सर्वदा, सर्वरूपसे है ही-जैसे परमात्मा। जो कहीं, कभी, किसी रूपसे है, किसी रूपसे नहीं है, वह वस्तुत: असत् ही है। ‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:।’ (गीता २।१६) असत‍्का सत्त्व एवं सत्त्वका कभी अभाव नहीं हो सकता। प्रत्यय (बोध) मात्र वस्तुतत्त्वका व्यवस्थापक नहीं होता। शुक्ति, रजत, मरीचिमें जल आदिका प्रत्यय भी प्रत्यय ही है, परंतु मिथ्या वस्तुका ही व्यवस्थापन करता है। यदि कहा जाय कि जिस प्रत्ययमें लौकिक दृष्टिसे बाध न हो उसे सत्य मानें, तो यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि लौकिक दृष्टिसे देह ही आत्मा है, इस प्रत्ययका बाध नहीं होता। फिर भी देहभिन्न आत्मा प्रमाणसिद्ध है ही। वस्तुमें विकल्प नहीं हो सकता, अत: एक वस्तुमें ही सत्त्व, असत्त्व दोनों धर्म नहीं हो सकते। यदि यह अनेकान्तवाद सब वस्तुमें मान लिया जाय तो प्रमाता, प्रमाण, प्रमेय एवं अनेकान्तवाद आदिके सम्बन्धमें भी यही अनेकान्तवाद जोड़ा जा सकता है। अर्थात्, ‘यह अनेकान्तवादका पक्ष ‘कथंचित् सत्य है, कथंचित् असत्य है,’ इत्यादि। तब तो अनिर्धारित ज्ञान संशय-ज्ञानके तुल्य अप्रमाण ही माना जायगा। यदि कहा जाय कि नहीं, अनेकान्तवाद सिद्धान्त निर्धारित स्वरूप ही है, तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि जब सभी वस्तु अनेकान्तिक है, तब तो वस्तु होनेसे अनेकान्तवादमें भी अनेकान्तिकता अनिवार्य ही है। अत: अनिर्धारित प्रमाता, अनिर्धारित प्रमाण, अनिर्धारित प्रमेय, अनिर्धारित साधन, अनिर्धारित साध्यके आधारपर व्यवहार भी कैसे सम्पन्न होगा?’ विकासवाद परिणामवादमें आ जाता है। मूल वस्तुमें भेद, अन्तर्विरोध एवं कार्यमें वस्तुत: भेद होता है या नहीं, इसपर विचारणीय यह है कि वस्तु सर्वरूपसे परिणत होती है या एक देशसे? सर्वरूपसे परिणत होती है, तब तो पूर्णरूपका सर्वथा त्याग होनेसे उसे तत्त्वान्तर ही कहना चाहिये, परंतु ऐसा व्यवहार नहीं होता। यदि वस्तुके एकदेशका परिणाम होता है, तो प्रश्न होगा कि वह एकदेश वस्तुसे भिन्न है या अभिन्न? भिन्न है तो उस वस्तुका परिणाम कैसे हुआ? अभिन्न है तब तो एक देश भी वस्तुसे अभिन्न होनेसे उसका परिणाम वस्तुका ही सर्वरूपसे परिणाम हुआ। फिर भी पूर्वोक्त दोष ही होगा। कुछ लोगोंके मतानुसार एक देशको वस्तुसे भिन्नाभिन्न कहा जाता है, अर्थात् कारणरूपसे अभिन्न एवं कार्यरूपसे भिन्न। जैसे सुवर्णरूप कटक-कुण्डलादि अभिन्न हैं, परंतु कटक-कुण्डलादिरूपसे भिन्न ही हैं। भेदाभेदका एकत्र होना विरुद्ध है, यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि प्रमाण-विपरीत प्रतीति ही विरोध है। जो वस्तु प्रमाणसे जैसी प्रतीत होती है, उसे तो वैसे उसी रूपमें मानना चाहिये। ‘कुण्डलमिदं सुवर्णम्’ यह कुण्डल सुवर्ण है, इस प्रकारके समानाधिकरणके प्रत्ययमें भेद, अभेद-दोनों ही प्रतीत होते हैं। यदि यहाँ सुवर्ण-कुण्डलका अत्यन्त अभेद हो, तब तो दोनोंमेंसे किसी एककी ही दो बार प्रतीति होनी चाहिये। यदि दोनोंका अत्यन्त भेद हो, तब तो समानाधिकरण-प्रत्यय नहीं होना चाहिये। अश्व-गोका अत्यन्त भेद है। उनका समानाधिकरण प्रत्यय नहीं होता। आधाराधेयभावमें ‘कुण्डे बदरम्’ ‘कुण्डमें बेर है’, ऐसा प्रत्यय होता है। ‘कुण्ड बेर है’, ऐसा प्रत्यय नहीं होता। एकाश्रयाश्रितोंमें भी समानाधिकरण प्रत्यय नहीं होता अर्थात् एक आसनपर स्थित चैत्र-मैत्रमें चैत्र और मैत्र ऐसा प्रत्यय होता है। चैत्र मैत्र है, ऐसा प्रत्यय नहीं होता। अत: कार्यका कारणरूपसे अभेद होता है। इस तरहके असंदिग्ध अबाधित सार्वजनिक अनुभवसे सद्‍रूपकारण सर्वत्र अनुगत है। इसलिये सद्‍रूपसे सबका अभेद है। गो, घट आदिमें कार्यरूपसे भेद है। ‘कार्यरूपेण नानात्वमभेद: कारणात्मना। हैमात्मना यथाभेद: कुण्डलाद्यात्मना भिदा।’ परंतु विचार करनेसे यह पक्ष अनुचित प्रतीत होता है। भेद क्या वस्तु है, जो अभेदके साथ रहता है? यदि अन्योन्याभावको ही भेद कहा जाय, तो भी यह देखना है कि क्या कार्य-कारण कुण्डल और सुवर्णमें यह अन्योन्याभावरूप भेद है? यदि नहीं है, तब तो कार्य-कारणका अभेद ही हुआ, भेद नहीं हुआ। यदि है, तब तो कार्य-कारणका भेद ही रहेगा, अभेद नहीं हो सकेगा। यदि कहा जाय कि भाव एवं अभावका विरोध ही नहीं, तो यह कथन भी ठीक नहीं; क्योंकि भाव-अभावका एकत्र अवस्थान नहीं होता। यदि दोनोंकी सहावस्थिति मानी जाय, तब तो कटक-कुण्डलका भी तात्त्विक ही अभेद होना चाहिये; क्योंकि आप भेद-अभेदकी एक साथ अवस्थिति मानते ही हैं, किं च यदि कटक हाटकसे अभिन्न है तो जैसे हाटकरूपसे कटक-मुकुटादि अभिन्न हैं, वैसे ही कटकरूपसे भी कटकमुकुटादिको अभिन्न होना चाहिये; क्योंकि कटक हाटकसे भिन्न है, इस तरह हाटक ही वस्तु ठहरती है, कटकादि नहीं। यदि कहा जाय कि हाटकरूपसे अभेद है, कटक आदिरूपसे तो भेद है ही। परंतु जब कटक हाटकसे अभिन्न है, तब कुण्डलादिमें हाटकके समान ही कटककी अनुवृत्ति क्यों नहीं है। यदि अनुवृत्त नहीं होता तो कटक सुवर्णसे अभिन्न कैसे समझा जाता है? जिसके अनुवर्तमान होनेपर जो व्यावृत होते हैं, वह उससे भिन्न होते हैं, जैसे मालामें सूत्र अनुवृत्त होता है, पुष्प व्यावृत्त होते हैं, अत: सूत्रसे पुष्प भिन्न हैं। हाटकके अनुवर्तमान होनेपर भी कुण्डलादिमें कटकादि अनुवृत्त नहीं हैं, अत: हाटकसे कटकादि भिन्न ही ठहरते हैं। सत्तामात्रकी अनुवृत्तिसे कटककी अनुवृत्ति मानें, तब तो सभी वस्तु सर्वत्र अनुगत हो सकती है। फिर तो ‘इदमिदं नेदम्, इदमस्मान्नेदम्, इदमिदानीं नेदम्’—यहाँ यह है, यहाँ यह नहीं है; इससे यह उत्पन्न होता है, यह नहीं होता है; इत्यादि विभाग ही नहीं बन सकेगा। फिर तो किसीका किसीसे विवेकका कोई हेतु ही न रहेगा। किं च दूरसे सुवर्णमात्रका ज्ञान हो जानेपर भी कुण्डल मुकुटादि विशेषकी जिज्ञासा होती है, परंतु यदि कुण्डलादि सुवर्णसे अभिन्न ही हैं, तो सुवर्णका ज्ञान हो गया, फिर जिज्ञासा क्यों होनी चाहिये? हाँ, यदि कनकसे कुण्डलादिका भेद है, तब तो कनकके विज्ञात होनेपर भी वे अज्ञात तथा जिज्ञास्य हो सकते हैं। अगर भेद-अभेद दोनों ही हैं तो जैसे भेदके कारण कुण्डलादि अज्ञात हैं, वैसे ही अभेदके कारण ज्ञात क्यों न होने चाहिये? कारणके अभावमें कार्यका अभाव स्वाभाविक है। जब ज्ञानका कारण अभेद है तो सुवर्णके ज्ञानसे सुवर्णाभिन्न कुण्डलादिका ज्ञान होना ही चाहिये। फिर तो कुण्डलादिकी जिज्ञासा और ज्ञान आदि होना व्यर्थ ही है। जिसके गृहीत होनेपर जो नहीं गृहीत होते, वे उससे भिन्न ही होते हैं। जैसे हाथीके गृहीत होनेपर गर्दभ नहीं गृहीत होता; अत: हाथी गर्दभसे भिन्न है। उसी तरह हेमके ग्रहण होनेपर भी कटक, मुकुट, कुण्डलादि नहीं गृहीत होते; अत: सुवर्णसे कटकादि भिन्न हैं, तथापि ‘सुवर्ण कुण्डल, कुण्डल सुवर्ण है’, इस प्रकारका समानाधिकरण-व्यवहार भी होता है। यह अत्यन्त भिन्न अश्व-महिषमें नहीं होता। आधाराधेय या समानाश्रयमें भी समानाधिकरण नहीं होता। यह ऊपर कहा जा चुका है कि अनुवृत्ति, व्यावृत्ति एवं सुवर्णज्ञान होनेपर भी कुण्डलादिकी जिज्ञासा कैसे बन सकेगी? वास्तविक भेद एवं अभेद दोनोंकी एकत्र उपपत्ति हो नहीं सकती। अत: भेद या अभेद किसीका त्याग करना ही होगा। अत: अभेदको तत्त्वभूत अधिष्ठान मानकर उसीमें कल्पित भेद मानकर सब व्यवस्था हो सकती है। भेदोपादानाभेद कल्पना कहनेके लिये भेदको स्वतन्त्र सिद्ध होना चाहिये, परंतु भेद भिन्न वस्तुओंके परतन्त्र होता है। वस्तुएँ प्रत्येक रूपसे एक ही हैं। अत: एक नहीं होगा, तो तदाश्रितभेद सिद्ध ही नहीं होगा, परंतु एक भिन्नके अधीन नहीं होता। ‘नायमयम्’ अमुक नहीं है। इसी तरह भेदज्ञान प्रतियोगिज्ञान-सापेक्ष होता है, किंतु एकत्वग्रहणमें किसी अन्यकी अपेक्षा नहीं होती। मार्क्सवादी चैतन्यको भूतोंका गुणात्मक परिणाम मानते हैं। यहाँ भी यह प्रश्न होगा कि ‘चैतन्य भूतोंमें प्रथमसे विद्यमान था, केवल उसकी अभिव्यक्ति हुई है अथवा भूतोंमें अविद्यमान था, अत: अविद्यमानकी उत्पत्ति हुई है?’ अविद्यमानकी उत्पत्ति असत‍्कार्यवादी वैशेषिकोंकी ही दृष्टिसे मान्य होती है, परंतु वह सर्वथा असंगत ही है। इस सम्बन्धमें सांख्यवादियोंका यह कहना है कि उस शक्त कारणकी शक्ति शक्य कार्यमें ही रहती है या सर्वत्र रहती है? यदि सर्वत्र रहती है तो वही अवस्था सर्वत्र बनी रहेगी। यदि शक्यमें ही रहती है तो यदि शक्य घटादिकार्य असत् है, तो उसमें शक्ति कैसे कही जा सकती है; क्योंकि असत‍्का कोई सम्बन्ध ही नहीं बनता। यह भी नहीं कहा जा सकता कि शक्तिभेद ही इस प्रकारका होता है, जो किसी कार्यको उत्पन्न करता है, सब कार्यको नहीं; क्योंकि यहाँ भी वही प्रश्न होगा कि शक्तिविशेष कार्यसे सम्बद्ध रहता है या असम्बद्ध? यदि सम्बद्ध कहा जायगा तो असत‍्के साथ सम्बन्ध हो नहीं सकता; अत: कार्यको सत् ही कहना पड़ेगा, असम्बद्ध कहेंगे तो वही अव्यवस्था आयेगी। जैसे मिट्टी, तन्तु आदिके रहनेपर ही घट-पट आदिकी उपलब्धि होती है, तद्वत् कारणके भावमें ही कार्यकी उपलब्धि होती है, अतएव कार्य कारणसे अनन्य अभिन्न है। जहाँ अश्व, गो आदिका भेद होता है, वहाँ दूसरेके भानमें ही दूसरेकी उपलब्धिका नियम नहीं होता। अत: यदि कार्य कारणसे भिन्न होता तो कारणकी उपलब्धिमें कार्योपलब्धिका नियम न होता, किंतु यहाँ ऐसा नियम है, अत: कारणसे भिन्न कार्य नहीं होता। अत: जब कारण सत् तब कार्य सत् होना चाहिये। कुलालादिका घटसे भेद है; अत: वहाँ कुलालादि होनेमें घट होनेका नियम नहीं है; क्योंकि निमित्त-नैमित्तिक भाव रहनेपर भी भिन्नता निश्चित है। कहा जा सकता है कि ‘अग्निके भावमें ही धूमकी उपलब्धि होती है, तब भी वह्नि-धूमका भेद होता है। वैसे ही मृत्तिकादि कारणके रहनेपर घटादि कार्यकी उपलब्धि होनेपर भी उनका परस्पर भेद नहीं रहेगा’ परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि अग्नि बुझ जानेपर भी वातायनशून्य गोपाल-कुटीर आदिमें धूमका उपालम्भ होता है। यदि अविच्छिन्नमूल दीर्घरेखावस्थ धूमके साथ वह्निके साहचर्यका नियम बनायें तो दोष नहीं है; क्योंकि ‘तद्भावे तद्भावात् तदुपलब्धौ तदुपलब्धेस्तदनन्यता’ उपादान कारणके भावमें कार्यका भाव तथा उसकी उपलब्धिमें उपलब्धि होनेसे उसकी अनन्यता होनेका नियम है, अत: अभेद है। इसके अतिरिक्त प्रत्यक्षसे ही तन्तु आदि कारण ही पट आदि कार्य निश्चित होते हैं। तन्तुसे भिन्न पट नामकी वस्तु कुछ नहीं है, अर्थात् ‘तद्भावनीयतद्भावत्वे सति तद‍्बुद्धॺानुरक्तबुद्धविषयता’ ही अभेदका कारण है। अर्थात् तद्भावमें तद्भाववाला होकर तदनुरक्त बुद्धिका विषय होना ही अभेदका कारण है, जैसे मृत्तिकादिक कारणके रहनेपर ही घटादि कार्य रहता है और मृत्तिकाबुद्धिके साथ ही घटबुद्धि होती है। अत: मृत्तिका और घटका अभेद ही समझना चाहिये। वह्नि-धूममें ‘तद्भावे तद्भाव:’ होनेपर भी ‘उपलब्धावुपलब्धे:’ का नियम नहीं है। प्रभा और रूपमें सहोपलब्धिका निमय होनेपर भी सहभावका नियम नहीं है। कारण और कार्यमें ‘तद्भावे तद्भाव:’ ‘उपलब्धावुपलब्धे:’ दोनों ही नियम रहते हैं; अत: कार्यकारणका अभेद रहता है। पट तन्तुका धर्म है, अत: तन्तुसे पट भिन्न नहीं है। जो जिससे भिन्न होता है, वह उसका धर्म नहीं होता—जैसे गो अश्वका धर्म नहीं होता। पट तन्तुका धर्म है, अत: तन्तुसे अर्थान्तर नहीं है। उपादानोपादेयभाव होनेसे भी तन्तुसे पटका अभेद ही सिद्ध होता है। जिनमें भिन्नता होती है, उसमें उपादानोपादेयभाव नहीं होता। जैसे घट-पट—दोनों भिन्न हैं, उनमें उपादानोपादेयभाव नहीं होता। तन्तु-पटका उपादानोपादेयभाव है, अत: दोनोंमें अभिन्नता ही है। दोनोंकी जिनमें भिन्नता होती है, उनमें या तो कुण्ड-बेरके तुल्य संयोग होता है, या हिम-विन्ध्यके तुल्य अप्राप्ति रहती है। तन्तु-पटमें संयोग, अप्राप्ति—दोनों ही नहीं रहते, अत: अभिन्नता ही माननी चाहिये। तन्तुके गुरुत्व कार्यसे भिन्न तन्तुनिर्मित पटका दूसरा गुरुत्व कार्य नहीं होता, इसलिये भी तन्तु-पटका अभेद ही मानना युक्त है। इन हेतुओंसे सिद्ध होता है कि आतान-वितानात्मक तन्तु ही पट है। फिर भी ‘पट उत्पद्यते, पटो विनश्यति’ इस प्रकार पटकी उत्पत्ति तथा विनाशकी बुद्धि तथा तन्तु एवं पटका व्यवहार और अर्थक्रिया शीतापनयन, अंगप्रावरणादि कार्यक्षमता-भेदसे भी तन्तु-पटका भेद नहीं सिद्ध होता है; क्योंकि ये सभी बातें अभेदमें भी उपपन्न हो सकती है। जैसे कूर्मके विद्यमान अंगोंका ही आविर्भाव-तिरोभाव होता है, वैसे ही विद्यमान घटादि कार्योंका ही मृत्तिकादि कारणोंसे ही आविर्भाव एवं कारणमें ही तिरोभाव होता है। इसी आविर्भाव-तिरोभावमें उत्पत्ति-विनाशकी बुद्धि होती है। अत्यन्त असत‍्की उत्पत्ति तथा सत‍्का विनाश नहीं होता। ‘नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत:।’ जैसे कूर्ममें संकोच-विकासशाली अपने अवयवोंकी भिन्नता नहीं, वैसे ही कारणसे कार्य भी भिन्न नहीं है। ‘तन्तुषु पट:’ तन्तुओंमें पट है—यह व्यवहार भी उसी ढंगका है, जैसे वनमें वृक्ष हैं। वस्तुत: वृक्षोंसे भिन्न वन नहीं है, वैसे ही तन्तुओंसे भिन्न पट नहीं है। जैसे एक अग्निमें दाहकत्व, प्रकाशकत्व, पाचकत्व आदि कार्यभेद होनेसे भी अग्निमें भेद नहीं होता, उसी तरह कारण मृत्तिका एवं तत्कार्य घटादिसे अनेक कार्योंमें भेद होनेपर भी उनमें भेद नहीं सिद्ध होता। अंगप्रावरण पटसे होता है, तन्तु-पटसे नहीं; पट तन्तुसे ही बनता है, पटसे नहीं; इत्यादि कार्यक्षमताकी व्यवस्था अभेदमें भी समस्त-व्यस्त भेदसे बन जाती है। जैसे व्यस्त पृथक्-पृथक् शिविकावाहक भृत्य मार्ग-दर्शन किया करते हैं और समस्त मिलकर शिविकावहन करते हैं, वैसे ही प्रत्येक तन्तु अंगप्रावरण कार्य नहीं कर सकते, मिलकर वह कार्य कर देते हैं। इस सम्बन्धमें यह भी शंका होती है कि कारण-व्यापारके पहले पटका आविर्भाव सत् था या असत्? असत् था, तब तो उसका उत्पादन कहना पड़ेगा, अगर आविर्भाव भी सत् ही है, तो कारण-व्यापार व्यर्थ होगा; क्योंकि यदि कार्य विद्यमान है तो कारण-व्यापारको कौन आवश्यक समझेगा। आविर्भावका भी आविर्भाव माना जायगा, तब तो अनवस्था-प्रसंग होगा, परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि असत्-कार्यवादमें भी तो इसी ढंगके दोष आते हैं। असत‍्की उत्पत्ति माननेपर भी यही प्रश्न होगा कि असत‍्की उत्पत्ति सती है या असती? सती है तो फिर कारण-व्यापार व्यर्थ है। असती है तो फिर असती उत्पत्तिकी उत्पत्ति माननी पड़ेगी और अनवस्था-दोष होगा। यदि उत्पत्ति पटसे भिन्न नहीं है, पटस्वरूप ही है, तब तो पट एवं उत्पत्ति दोनोंका एक ही अर्थ होगा। फिर तो पट उत्पन्न हुआ, यह कहनेसे पुनरुक्ति समझी जानी चाहिये और फिर पट नष्ट होता है, यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि उत्पत्ति और विनाश दोनों ही एक कालमें एकत्रित नहीं रह सकते। इसलिये पटोत्पत्तिको स्वकारणसमवायरूप माना जाय या स्वसत्तासमवायरूप माना जाय? यदि पट असत् है तो दोनों ही नहीं हो सकते; क्योंकि असत‍्के साथ कारण-सम्बन्ध या सत्ता-सम्बन्ध नहीं बन सकता। सत‍्का ही कार्य-कारणके व्यापारसे प्रादुर्भाव होता है—यही पक्ष ठीक है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि पटरूपके साथ ही कारण-सम्बन्ध है; क्योंकि पटरूप कोई क्रिया नहीं है। कारकोंका सम्बन्ध क्रियाके ही साथ होता है, क्रिया-सम्बन्ध बिना कारणता ही नहीं हो सकती। अव्यापी सक्रिय अनेक एवं आश्रितपरतन्त्र होता है। जो भी सावयव होता है, वह कार्य होता है, कार्य होनेसे ही सकारण भी होना अनिवार्य है। इस सम्बन्धमें अनेक पक्ष हैं। अनेकवादी असत‍्से ही सत‍्की उत्पत्ति कहते हैं, परंतु निरुपाख्य असत‍्से शब्दाद्यात्मक प्रपंचोंकी उत्पत्ति कैसे बन सकती है? क्योंकि सत् तथा असत‍्का कोई भी तादात्म्यादि सम्बन्ध नहीं बन सकता। सांख्य आदि उत्पत्तिसे पहले भी कार्यको सत् ही कहते हैं। अवश्य ही बीज तथा मृत्तिका-पिण्डादि कारणोंके प्रध्वंसके पश्चात् ही अंकुर, घटादिकी उत्पत्ति होती है, तथापि प्रध्वंस कार्यके प्रति कारण नहीं है, किंतु बीज आदिके अवयव ही कारण हैं, अतएव उनकी ही कार्योंमें अनुवृत्ति देखी जाती है। यदि अभावसे भाव उत्पन्न हो, तब तो अभाव सभीको सर्वत्र सुलभ ही है। फिर कार्योत्पत्तिमें बाधा न होनेसे सदा ही कार्योत्पत्ति होती रहनी चाहिये। यदि कारण-व्यापारसे पूर्व कार्य असत् हो तो वह किसी तरहसे सत् नहीं बनाया जा सकता। सैकड़ों शिल्पियोंके प्रयत्नसे भी नीलरूप पीत नहीं बनाया जा सकता। यह भी नहीं कहा जा सकता कि सत्त्व-असत्त्व—दोनों ही घटके धर्म हैं; क्योंकि यदि घटधर्मी सत् हो तभी उसके धर्म हो सकते हैं, असत् धर्मीके धर्म कैसे हो सकेंगे? सत्त्व असत्त्व धर्मका आधार माननेपर भी घटादि कार्यको सत् ही कहना पड़ेगा। यदि असत्त्व धर्मका घटकी आत्मा या घटसे सम्बन्ध नहीं है, तो घटको असत् कैसे कहा जा सकता है? तत्सम्बन्धितया तत्स्वरूप होनेसे ही किसी वस्तुमें तद्‍रूपताकी प्रतीति होती है। अत: कारण-व्यापारके ऊर्ध्व और पहले भी कार्य सत् ही होता है। उसी सत् कार्यकी कारणसे अभिव्यक्ति होती है, जैसे निपीडनद्वारा तिलसे तैल व्यक्त होता है, अवघातद्वारा धान्यसे तण्डुलकी व्यक्ति होती है, दोहनसे गोदुग्ध, उसके मन्थनसे नवनीत अभिव्यक्त होता है, उसी तरह अंकुरादि कार्य भी सत् ही रहते हैं। कारण-व्यापारसे उनकी अभिव्यक्ति सम्भव है, परंतु असत‍्की उत्पत्तिका कोई भी दृष्टान्त नहीं है। अभिव्यक्त होती वस्तु कहीं भी असत् नहीं देखी जाती। कार्यके लिये प्रतिनियत उपादान कारणोंका ग्रहण किया जाता है। पटार्थी तन्तु, घटार्थी मृत्तिका, कुण्डलार्थी सुवर्ण ढूँढ़ता है। इससे मालूम पड़ता है कि वे कार्य उन-उन कारणोंसे विशेषरूपसे सम्बद्ध रहते हैं। तभी प्रतिनियत कारण ढूँढ़ना संगत हो सकता है। असत् कार्य होगा तो वह किसीसे कैसे सम्बद्ध होगा? यदि कारणसे असम्बद्ध ही कार्य हो तो असम्बद्धता समान होनेसे सब कार्य सभी कारणोंसे उत्पन्न होने चाहिये। फिर अमुक कार्य अमुक कारणसे उत्पन्न होनेका नियम न होना चाहिये। साथ ही कार्य-कारणकी स्पष्ट ही अव्यवस्था होगी। कुछ लोग कहते हैं, ‘असम्बद्ध होनेपर भी जो कारण जिस कार्यके उत्पादनमें शक्त होता है, उस कारणसे वही कार्य उत्पन्न होता है। शक्ति फल-बलसे कल्प्य होती है। अर्थात् जिस कारणसे जिस कार्यकी उत्पत्ति होती दिखती है, उस कार्यकी उत्पत्तिकी शक्ति उसी कारणमें है; यह मालूम पड़ता है। अत: अव्यवस्था नहीं होगी।’ सांख्यवादी सत‍्कार्यवादी होते हुए भी अचेतन प्रकृतिको ही कारण कहते हैं, परंतु वेदान्ती चेतन ब्रह्मको कारण कहते हैं। जो उत्पत्तिके पहले जिस रूपमें होता है, वह उसीसे उत्पन्न होता है। घट मृत्तिका-रूपमें उत्पत्तिसे पहले रहता है; अत: मृत्तिकासे उत्पन्न होता है। तैल उत्पत्तिसे पहले तिल-रूपसे रहता है; अत: तिलसे उत्पन्न होता है। वह सिकता-रूपसे नहीं रहता, अत: सिकतासे नहीं उत्पन्न होता। अत: उत्पत्तिके पहलेका कार्य कारणरूप ही रहता है। उत्पत्तिके पश्चात् भी कार्य कारणसे अभिन्न ही रहता है। इसीलिये श्रुतिने भी इदं पदार्थ कार्य प्रपंचको उत्पत्तिके प्रथम सद्‍रूप ही बतलाया है—‘सदेव सोम्य इदमग्र आसीत्। असद् वा इदमग्र आसीत्॥’ यहाँ अव्याकृत या अव्यक्त ही असत्-पदसे कहा गया है, कारण असत् किसी कालसे सम्बद्ध नहीं हो सकता। असत‍्का आसीत‍्के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता है; क्योंकि आसीत‍्से सत्ता बोधित होती है तथा च सत्ता एवं असत‍्का परस्पर विरोध होनेसे असत‍्का आसीत‍्के साथ सम्बन्ध नहीं हो सकता। संसारमें घट, कुण्डल और दधि चाहनेवाले क्रमेण मृत्तिका, सुवर्ण तथा क्षीर ग्रहण करते हैं। दधि चाहनेवाला मिट्टी या घट चाहनेवाला क्षीर नहीं ढूँढ़ता। यह बात सत‍्कार्यवादमें ही बनती है। यदि उत्पत्तिके पहले कार्य अत्यन्त असत् हो तो असत् तो सर्वत्र ही अविशिष्ट-रूपसे है, फिर क्षीरसे दधि क्यों उत्पन्न होता है, मृत्तिकासे क्यों उत्पन्न नहीं होता? यदि यह माना जाय कि क्षीरमें ही दधिकी कुछ विशेषता है, मृत्तिकामें ही कुछ घटकी विशेषता है, अन्यत्र नहीं है; अत: क्षीरसे दधि तथा मृत्तिकासे घट उत्पन्न होता है, तब तो उत्पत्तिसे पहले कार्यकी कोई विशेषता मान्य हो ही गयी, फिर असत् कार्यवाद कहाँ रहा? कारणमें कार्यानुकूल शक्ति माननेपर भी यह विकल्प होगा कि वह शक्ति कारण एवं कार्यसे भिन्न है या अभिन्न? भिन्न है तो भी सती ही है या असती? दोनों ही पक्ष ठीक नहीं हैं; क्योंकि अन्य एवं असत् शश-शृंगादि अन्यके नियामक नहीं होते। कार्य-कारण दोनोंसे जैसे असम्बद्ध अन्य है, वैसे ही शक्ति भी, तथापि शशशृंगवत् असत् हो, तब ऐसी शक्तिके आधारपर क्षीरसे ही दधि उत्पन्न हो, मृत्तिकादिसे घट उत्पन्न हो, यह नियम कैसे बनेगा? अत: शक्तिको कारणकी आत्मभूता एवं कार्यको शक्तिका आत्मभूत मानना चाहिये। इस तरह सत‍्कार्यवाद तथा कारण-कार्यका अभेद भी सिद्ध हो जाता है। कार्य-कारण एवं द्रव्य-गुणादिमें अश्व-महिषवत् भेदबुद्धि नहीं होती; अत: उनका अभेद मानना चाहिये। इसी प्रकार कार्य-कारणका समवाय सम्बन्ध माना जाय, तब भी प्रश्न होगा कि समवाय एवं समवादियोंका सम्बन्ध है या नहीं? यदि सम्बन्ध मान्य है, तब तो अनवस्था-प्रसंग होगा। सम्बन्ध नहीं है, तो असम्बद्ध समवाय कार्य-कारणका नियामक ही कैसे होगा? यदि समवाय स्वयं सम्बन्धरूप होनेसे सम्बन्धान्तरकी अपेक्षा न करे, वह स्वत: सम्बद्ध होकर नियामक होता है, तो संयोगके सम्बन्धमें भी ऐसा ही क्यों न हो? परंतु नैयायिक आदि संयोगको संयोगियोंसे सम्बद्ध करनेके लिये समवाय-सम्बन्ध मानते हैं। यदि संयोग कार्य है और कार्य समवायिकारणजन्य होता है, अत: वहाँ समवाय आवश्यक है तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि तब तो आत्मा, कालादि नित्य संयोगमें समवाय नहीं अपेक्षित होना चाहिये। किं च सम्बन्धियोंके अधीन ही समवायका निरूपण होता है। फिर भी वह सम्बन्धियोंके भेदसे भिन्न नहीं होता। उनकी उत्पत्ति-विनाशमें उत्पन्न तथा नष्ट नहीं होता, किंतु नित्य एवं एक ही समवाय रहता है, वैसे ही संयोग भी क्यों न हो? किं च कार्य द्रव्य अवयवी है, कारणरूप द्रव्यमें रहता है। यहाँ यह प्रश्न होता है कि सम्पूर्ण अवयवोंमें अवयवी रहता है अथवा व्यस्त पृथक्-पृथक् अवयवोंमें? यदि कहें सम्पूर्णमें, तो अवयवी द्रव्यका प्रत्यक्ष ही नहीं हो सकेगा; क्योंकि समस्त अवयवोंके साथ संनिकर्ष ही अशक्य है। समस्त आश्रयोंमें वर्तमान बहुत्व व्यस्त आश्रयोंके ग्रहणमें नहीं गृहीत होता। यह भी नहीं कहा जा सकता कि अवयवश: समस्त अवयवोंमें कार्य (अवयवी) रहता है; क्योंकि इस तरह तो आरम्भक अवयवोंसे भिन्न अवयवीके अवयव मानने पड़ेंगे, जिनके द्वारा आरम्भक अवयवोंमें अवयवी रहता है। जैसे म्यानके अवयवोंसे भिन्न अपने अवयवोंद्वारा तलवार म्यानमें व्याप्त होती है। किंतु इस तरह अनवस्था-दोष होगा; क्योंकि उन अवयवोंमें भी रहनेके लिये कार्यके अन्य अवयव मानने पड़ेंगे। यदि प्रत्येक अवयवमें अवयवीको मानें, तब तो एक अवयवमें जब अवयवी रहेगा, उस समय अन्य अवयवोंमें नहीं रहेगा; क्योंकि देखते ही हैं, जब देवदत्त काश्मीरमें रहता है, उसी समय काशीमें नहीं रहता। यदि एक कालमें अनेकों स्थलोंमें अस्तित्व कहा जायगा तो अवश्य ही अवयवीका नानात्व हो जायगा। जैसे काशी, काश्मीरमें रहनेवाले चैत्र, मैत्र अनेक ही होते हैं। फिर भी कहा जाता है कि जैसे गोत्व जाति प्रत्येक व्यक्तिमें होनेपर भी प्रत्येकमें गृहीत होती है, फिर भी एक ही है। उसी तरह अवयवी प्रत्येक अवयवमें रहते हुए उपलब्ध होगा और एक ही रहेगा, परंतु यह सब कथन भी ठीक नहीं; क्योंकि यदि प्रत्येक अवयवमें अवयवी पूर्णरूपसे उपलब्ध होगा, तब तो गोके शृंगसे भी स्तनका कार्य एवं पुच्छसे पृष्ठका कार्य होना चाहिये, किंतु ऐसा होता नहीं, अत: कारणसे अभिन्न ही कार्य है। यदि कार्य उत्पत्तिके पहले असत् है, तब तो वह उत्पत्ति क्रियाका कर्ता भी नहीं बनेगा। उत्पत्ति भी एक क्रिया है। क्रिया कभी अकर्तृका नहीं होती। घटकी उत्पत्तिका कर्ता घट ही होता है। ‘घट उत्पद्यते’ घट उत्पन्न होता है, ऐसा ही व्यवहार सर्वसम्मत है। यदि घटोत्पत्तिके कर्ता कुलालादि हों, तब तो ‘कुलालादय उत्पद्यन्ते’ कुलालादि उत्पन्न हो रहे हैं, ऐसा व्यवहार होना चाहिये। स्पष्टरूपसे कुलालादिकी उत्पद्यमानता नहीं प्रतीत होती। घटकी उत्पद्यमानता प्रतीत होती है। कुछ लोग कहते हैं स्वकारण एवं सत्ताके साथ सम्बन्ध ही कार्यकी उत्पत्ति है, परंतु यदि कार्य स्वयं असत् है, निरात्मक है, तब उसका किसीके साथ सम्बन्ध भी क्या होगा? क्योंकि दो सत‍्का ही सम्बन्ध होता है, सत् तथा असत‍्का एवं दो असत‍्का भी सम्बन्ध नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त अभाव या असत् निरुपाख्य असत् ही होता है, तब उत्पत्तिके प्रथम कार्य असत् था—यह मर्यादाकरण भी नहीं बन सकता। यह व्यवहार नहीं होता कि अमुक राजाके पहले वन्ध्यापुत्र राजा था। यदि कारकव्यापारसे वन्ध्यापुत्र, खपुष्प भी उत्पन्न हो सके तभी यह कहा जा सकता है कि उत्पत्तिके पहले असत् कार्य कारकव्यापारसे उत्पन्न हुआ है। कहा जा सकता है कि जैसे प्रथमसे ही सिद्ध होनेसे कारणकी स्वरूपसिद्धिके लिये कोई व्यापृत नहीं होता तो उसी तरह यदि कारकव्यापारके पहले भी कार्य स्वरूपसिद्ध ही हो तो उसके लिये कौन व्यापृत होगा? कारणसे यदि कार्य अनन्य ही है, तब कारणके समान ही कार्यके लिये भी कारकव्यापार नहीं होना चाहिये, परंतु व्यापार देखा जाता है, अत: कारकव्यापारकी सार्थकताके लिये उत्पत्तिके पहले कार्यका अभाव मानना उचित ही है। किंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि कारणको कार्याकारसे व्यवस्थापन करनेके लिये ही कारकव्यापार अपेक्षित होता है। वह कार्याकार कारणका आत्मभूत ही है; विशेष दर्शनमात्रसे वस्तुभेद नहीं होता। देवदत्त हाथ-पाँव फैलाने या संकुचित करनेसे भिन्न नहीं हो जाता है; क्योंकि ‘स एवायम्’ वही यह है, ऐसी प्रत्यभिज्ञा (पहचान) होती है। प्रतिदिन ही पिता, माता, भ्राता आदिमें ह्रास-विकास आदि होते रहते हैं। फिर भी वस्तुभेद नहीं प्रतीत होता; क्योंकि पिता-माता, भ्राताकी एक रूपसे प्रत्यभिज्ञा होती रहती है। यदि कहा जाय कि वहाँ जन्मका व्यवधान न होनेसे ही अभेद प्रतीत होना ठीक है, परंतु कार्य-कारणमें ऐसा नहीं कहा जा सकता है; क्योंकि यहाँ तो कारण बीज, मृत्पिण्डादिका नाश एवं अंकुर, घटादिकी उत्पत्ति होती है, अत: प्रत्यभिज्ञा नहीं होती। किंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि यहाँ भी कारण नाश आदि नहीं अनुभूत होता। क्षीरादिका दधि आदि रूपसे संस्थान प्रत्यक्ष दिखायी देता है। वट-बीजादिसे समान जातीय अवयवोंके उपचयद्वारा अंकुर वृक्षादिकी उत्पत्ति एवं अवयवोंके अपचयसे विनाशका व्यवहार होता है। वस्तुत: कारणका विनाश और कार्यकी उत्पत्ति यहाँ भी नहीं है। जैसे मृत्पिण्डके अवयव घटमें अन्वित हैं, वैसे ही वटबीजके अवयव वटबीज भी अन्वित हैं। इस तरहके अवयवोपचय तथा अवयवापचयसे यदि वस्तुमें भिन्नता हो और इसीसे सत‍्की उत्पत्ति तथा सत‍्का विनाश हो तो गर्भस्थ तथा पर्यंकस्थ शिशुमें भी भेद कहना पड़ेगा और बाल्ययौवनादि शरीरमें भी भेद कहना पड़ेगा; क्योंकि अवयवोंका उपचय-अपचय वहाँ भी देखा ही जाता है। फिर तो पित्रादि व्यवहार भी बाधित होगा। इस तरह सत‍्कार्यवादमें तो कारणको कार्याकाररूपसे व्यवस्थापन करनेमें कारकव्यापार सार्थक है, परंतु असत्-कार्यवादमें तो कारकव्यापार सर्वथा निर्विषय हो जायँगे। जैसे आकाशके हननके लिये खड्ग आदिका प्रयोग व्यर्थ है, वैसे ही कार्याभाव या असत‍्में भी कारकव्यापार व्यर्थ होंगे। कहा जाता है कि समवायी कारणमें अर्थात् तन्तु-मृत्तिका आदिमें कारकव्यापार होगा, परंतु यह भी ठीक नहीं, क्योंकि अन्यविषयक व्यापारसे अन्यकी निष्पत्ति असम्भव है। अन्यता यदि समान ही है तो फिर सिकता-विषयक व्यापारसे भी पट क्यों नहीं उत्पन्न होता? जो कहते हैं कि समवायी कारणका ही आत्मातिशय कार्य है, उन्हें तो सत‍्कार्यवाद मानना ही पड़ेगा। अत: क्षीर आदि द्रव्य ही दध्याद्याकारसे अवस्थित होकर कार्य—द्रव्यके रूपमें व्यवहृत होते हैं, वेदान्तमतानुसार तो मूल कारण परब्रह्म ही घटादि अन्तिम कार्यपर्यन्त उस-उस कार्यके आकारसे नटवत् सर्वव्यवहारका आस्पद होकर प्रतीत होता है। जैसे लपेटा हुआ वस्त्र स्पष्ट नहीं दीखता, फैला हुआ स्पष्ट दीखता है, उसी तरह कारणावस्थित कार्य स्पष्ट नहीं उपलब्ध होता, कार्यावस्थित होकर स्पष्ट दीखता है। यह भी शंका होती है कि लोकमें कुलाल घट आदि कार्योंके लिये मृत्तिका, दण्ड-चक्रादिका संग्रह करते हैं, परंतु ब्रह्म बिना सामग्री-संग्रहके किस तरह विश्वनिर्माण कर सकेगा? परंतु जैसे क्षीर स्वभावसे दधिनिर्माणक्षम होता है, जल हिमरूपसे परिणत हो जाता है, वैसे ही ब्रह्म भी प्रपंचात्मक व्यक्त हो जाता है। यद्यपि औष्ण्य, शैत्य आदिकी अपेक्षा करके ही क्षीर, नीर आदि दधि, हिम आदि रूपमें परिणत होते हैं, तथापि इन साधनोंसे केवल शीघ्रता-सम्पादन की जाती है। यदि स्वयं दधि आदि बननेकी शक्ति न होती तो बाह्य साधनोंसे भी क्षीर आदि दधि आदि नहीं बन सकते। इसीलिये वायु, आकाश आदिसे दधि नहीं बनता; क्योंकि उनमें दधि बननेका स्वभाव नहीं है। जैसे ऋषि, मुनि, देवादि बाह्य साधनोंके बिना ही विविध शरीरों एवं प्रासाद आदिका निर्माण कर सकते हैं, तन्तुनाभ (मकड़ी) बिना बाह्य साधनके तन्तु-निर्माण करती है, बलाका (बगुली) बिना शुक्रके ही घन-गर्जन-श्रवणसे गर्भ धारण करती है, कमलिनी बिना किसी गमन-साधनके ही दूसरे सरोवरमें पहुँच जाती है, उसी तरह बाह्य साधन बिना चेतनब्रह्म भी विश्वकी रचना करता है। यद्यपि कहा जा सकता है कि देवादिका अचेतन शरीर ही अन्य शरीरका कारण है। यहाँ अचेतन ही कारण है, मकड़ीका मुखलालादि ही कठोर होकर तन्तु बन जाता है, बलाका भी गर्जन-श्रवणसे गर्भ धारण करती है, यहाँ भी बाह्य निमित्त है ही। इसी तरह पद्मिनी चेतनप्रयुक्त अचेतन शरीरसे ही दूसरे सरोवरमें जाती है, जैसे लता वृक्षपर आरूढ़ होती है, तथापि कुलालादिसे विलक्षणता तो इन कारणोंमें स्पष्ट ही है। वस्तुत: लक्षण एवं प्रमाणसे ही वस्तुकी सिद्धि होती है। जो-जो पदार्थ प्रमाण-सिद्ध होते हैं, उन्हींका अस्तित्व माना जाता है। विज्ञान आदिके प्रयोगद्वारा भी ज्ञान ही सम्पादन किया जाता है। विश्व, राष्ट्र या देहादि प्रपंच तथा भूतप्रकृति आदि भी प्रतीत होते हैं, प्रमाण-सिद्ध हैं, तभी उनका अस्तित्व माना जाता है। तथा च जैसे नील, पीत, हरितरूपका प्रकाशक प्रकाशरूपसे प्राक् सिद्ध है, वैसे ही भूतादि प्रपंच, प्रमेय, प्रमाण तथा प्रमाता—इन सबका भी भासक अखण्ड बोधरूप साक्षी उन सबसे प्रथम सिद्ध है। जड़भूतकी सिद्धि तो चेतन साक्षीके परतन्त्र है, परंतु प्रमाण, प्रमाता या साक्षीको उनकी सिद्धिके लिये किसी जड़की अपेक्षा नहीं होती। जैसे घटादिके प्रकाशके लिये भले ही सूर्यकी अपेक्षा हो, परंतु सूर्यके प्रकाशके लिये घटादिकी अपेक्षा नहीं, उसी तरह भूत आदि सिद्धिके लिये प्रमाण, साक्षी आदिकी अपेक्षा है; परंतु प्रमाण आदिकी सिद्धिके लिये जडभूतादिकी अपेक्षा नहीं। संसारमें प्रकाशके सम्पर्कसे या प्रकाशरूप होनेसे ‘प्रकाशित होता है,’ ऐसा व्यवहार होता है। ‘प्रकाश: प्रकाशते, घट: प्रकाशते’—ये ही दोनोंके उदाहरण हैं, इसी तरह स्वप्रकाश चेतनमें सूर्यादिके समान प्रकाश स्वरूप होनेसे ‘प्रकाशते’ का व्यवहार होता है। ‘प्रपञ्च: प्रकाशते’ में ‘घट: प्रकाशते’ के समान चेतन सम्पर्कसे ‘प्रकाशते’ का व्यवहार होता है। इस तरह परतन्त्र एवं अस्वत:सिद्ध जडभूतसे चेतनकी उत्पत्ति माननेकी अपेक्षा स्वतन्त्र स्वत:सिद्ध चेतनसे जडभूतकी सिद्धि कहीं श्रेष्ठ तथा बुद्धिगम्य है। भौतिकवादी तथा प्रकृतिवादियोंका कहना है कि ‘अचेतन प्रपंचका अचेतन प्रकृति या भूतादि ही कारण हैं, चेतन ब्रह्म या ईश्वर कारण नहीं हो सकता। जैसे घट आदि कार्योंमें मृत्तिका अन्वित होती है, वैसे ही प्रपंचमें जड़ता या सुख, दु:ख, मोहकी अन्विति प्रतीति होती है।’ परंतु यह कथन ठीक नहीं; क्योंकि यदि दृष्टान्तबलसे ही यह सिद्ध करना है, तब तो यह भी कहा जा सकता है कि संसारमें कहीं भी चेतनसे अधिष्ठित हुए बिना स्वतन्त्ररूपसे अचेतन कोई पुरुषार्थ सम्पादन नहीं कर सकता। प्रज्ञावान् शिल्पीलोग ही गृह, प्रासाद, वायुयान आदिका निर्माण करते हुए देखे जाते हैं। उसी तरह कहा जा सकता है कि नानाकर्म-फलोपभोग योग्य बाह्य आध्यात्मिक विविध वैचित्र्ययुक्त संसार बड़े-बड़े शिल्पी जिसे मनसे भी कल्पना नहीं कर सकते, उसे अचेतन प्रकृति या भूत किस तरह रच सकते हैं? जड लोष्ट-पाषाण जैसे स्वतन्त्ररूपसे कुछ नहीं कर सकते, वैसे ही प्रकृति भूतादि भी स्वतन्त्ररूपसे विश्व-निर्माणमें असमर्थ हैं। कुम्भकारादिसे अधिष्ठित ही मृत्तिकादिसे घटादि बनते हैं, उसी तरह भूत या प्रकृति भी चेतनसे अधिष्ठित होकर ही कोई कार्य कर सकते हैं। फिर यह भी तो नहीं कहा जा सकता कि जड घटका कारण जड मृत्तिका है। अत: जड विश्वका भी जड ही कारण होना चाहिये; क्योंकि उसके विपरीत यह भी कहा जा सकता है कि ‘चेतन कुलाल जैसे मृत्तिकासे घट बनाता है, वैसे ही चेतन ब्रह्म ही जड प्रकृति, परमाणु आदिसे जगत् बनाता है।’ सुख, दु:ख आदि आन्तर हैं, बाह्य शब्दादि उनके निमित्त हो सकते हैं, परंतु सुखादिरूप नहीं हो सकते। विशिष्टकार्य किसी प्रेक्षावान‍्द्वारा ही निर्मित देखा जाता है, अत: अवश्य ही प्रपंच भी वैसे ही होना चाहिये। प्रकृतिकी साम्यावस्थासे प्रच्युति भी बिना चेतनके होना असम्भव है। यह भी कहा जा सकता है कि ‘केवल चेतनकी भी प्रवृत्ति नहीं दृष्ट है, परंतु चेतनयुक्त रथादि अचेतनकी प्रवृत्ति तो देखी ही गयी है। अचेतनयुक्त चेतनकी प्रवृत्ति नहीं देखी जाती। अत: विचारणीय विषय यह है कि जिसमें प्रवृत्ति दृष्ट है, उसकी प्रवृत्ति मानी जाय या जिसके सम्बन्धसे प्रवृत्ति हो रही है, उसकी प्रवृत्ति मानी जाय? यदि कहा जाय कि जिसमें प्रवृत्ति दृष्ट है, उसीकी मानी जाय; क्योंकि दोनों ही प्रत्यक्ष हैं, जैसे रथादि प्रवृत्तिके आश्रयरूपसे प्रत्यक्ष हैं, वैसे ही केवल चेतन प्रवृत्तिके आश्रयरूपसे प्रत्यक्ष नहीं है। किंतु प्रवृत्तिके आश्रयभूत देहादि संयुक्त ही चेतनके सद्भावकी सिद्धि होती है; क्योंकि केवल अचेतन रथादिकी अपेक्षा जीवित देहमें विलक्षणता दृष्ट है, परंतु सद्भावमात्रसे प्रवृत्तिके प्रति चेतनकी हेतुता नहीं सिद्ध होती, जैसे सद्भावमात्रसे घटादिके प्रति आकाशकी निमित्तता नहीं सिद्ध होती। अत: प्रवृत्तिमें चेतन हेतु नहीं है। इसीलिये प्रत्यक्ष देहके रहनेपर ही प्रवृत्ति एवं चैतन्यका उपलम्भ होता है। देह न रहनेपर चैतन्यका भी उपलम्भ नहीं होता। अत: देहका ही धर्म प्रवृत्ति एवं चैतन्य है, यह चार्वाक कहते हैं। इस दृष्टिसे अचेतनकी ही प्रवृत्ति सिद्ध होती है।’ इसपर अध्यात्मवादीका कहना है कि भले ही जिस देहमें प्रवृत्ति दिखायी देती है, उसीकी प्रवृत्ति मानी जाय; परंतु वह चेतनसे ही होती है; क्योंकि चेतनके रहनेपर ही प्रवृत्ति होती है, चेतनके न रहनेसे प्रवृत्ति नहीं होती। यद्यपि काष्ठादिके आश्रय ही दहन, प्रकाशन आदिरूप क्रियाएँ देखी जाती हैं, केवल अग्निमें दहन, प्रकाशनादि नहीं उपलब्ध होते। चन्द्र, सूर्य, विद्युत्—सभी प्रकाश जलीय एवं पार्थिव-काष्ठ, लोहादिके ही आश्रित हैं, तथापि अग्निसे दाह-प्रकाश आदि होते हैं; क्योंकि अग्निसंयोग होनेसे ही काष्ठादिमें दाहकत्वादि होते हैं, अग्निवियोग होनेपर काष्ठादिमें दाह-प्रकाशादि उपलब्ध नहीं होते। चार्वाक भी चेतन देहके सम्पर्कसे ही अचेतन रथ आदिकी प्रवृत्ति मानते हैं। अत: चेतनकी प्रवर्तकतामें विवाद नहीं है। कहा जा सकता है कि कर-चरणादियुक्त प्राणी अपने व्यापारसे ही अचेतनका प्रवर्तक होता है। इधर ब्रह्मरूप चेतन तो प्रवृत्तिशून्य, कूटस्थ, नित्य है, वह कैसे प्रवर्तक होगा? परंतु इसका समाधान यह है कि जैसे अयस्कान्त मणि एवं सुन्दररूप आदि स्वत: प्रवृत्तिरहित होनेपर ही लोह तथा चक्षु आदि इन्द्रियोंके प्रवर्तक होते हैं। वैसे ही प्रवृत्तिरहित ब्रह्म भी अचेतनका प्रवर्तक होगा। कुछ लोग कहते हैं कि ‘जैसे अचेतन क्षीरकी वत्सवृद्धिके लिये स्वत: प्रवृत्ति होती है, उसी प्रकार अचेतन जलवायु आदिमें भी स्वत: लोकोपकारके लिये प्रवृत्ति होती है।’ परंतु यह भी ठीक नहीं। यदि उभयवादिसम्मत रथ आदिमें चेतनाधिष्ठित प्रवृत्ति दृष्ट है, तब तो उसी दृष्टान्तसे क्षीर-जल आदिकी प्रवृत्तिमें भी चेतनाधिष्ठित होनेका अनुमान किया जा सकता है—‘जलादीनां प्रवृत्तिश्चेतनाधीना अचेतनप्रवृत्तित्वाद् रथादिप्रवृत्तिवत्।’ रथादिके समान अचेतनकी प्रवृत्ति होनेसे जलादिकी प्रवृत्ति चेतनाधीन है। क्षीरका प्रवर्तक तो चेतन धेनु ही है। ‘योऽप्सु तिष्ठन्नद‍्भ्योऽन्तर:, योऽपोऽन्तर: यमयति’ (बृहदा० उप० ३।७।४) ‘एतस्य…वा अक्षरस्य प्रशासने गार्गि प्राच्योऽन्या नद्य: स्यन्दन्ते’ (बृ० उ० ३।८।९) यह श्रुति कहती है कि अन्तर्यामी चेतन जलके भीतर रहकर उसका नियमन करता है, उसीके शासनसे नदियाँ बहती हैं। वत्सके चोषणसे भी दुग्धकी प्रवृत्ति होती है, जलके प्रवाहणके लिये निम्नभूमि प्रदेश आवश्यक होता है, चेतनापेक्षा तो सर्वत्र है ही। आधुनिक महायन्त्रोंमें भी मूल-प्रवर्तक चेतन रहता ही है। कुछ लोग कहते हैं, तृण-पल्लवादि दूसरे निमित्तोंकी अपेक्षा बिना ही स्वभावसे ही क्षीरादिके रूपमें परिणत होते हैं, उसी तरह प्रकृति या भूत भी स्वभावसे ही विविध प्रपंचाकारसे परिणत होता है; क्योंकि क्षीर आदि बननेमें दूसरा कोई निमित्त उपलब्ध नहीं होता। यदि कोई निमित्त होता, तब तो उन-उन निमित्तोंको लेकर यथेष्ट क्षीर बनाया जा सकता था। परंतु यह भी कथन ठीक नहीं है, तृणादिका क्षीर आदि परिणाम निष्कारण नहीं है। धेनुसे खाये हुए तृणादिसे ही क्षीर बनता है। यदि धेनु दुग्ध बननेका असाधारण निमित्त न होती तो धेनुसे अनुपभुक्त या वृषभ आदिसे उपभुक्त तृणसे भी क्षीर बनना चाहिये था। अतएव धेनु आदि निमित्तोंको लेकर दुग्ध यथेष्ट बनाया ही जा सकता है। धेनु एवं उसकी उदर-वह्नि आदि ही तृणादिको क्षीर बनाती हैं। अधिक दुग्ध चाहनेवाले धेनुको पर्याप्त दाना-घास देकर उसे प्राप्त करते हैं। संसारमें कई वस्तुएँ मानुष-सम्पाद्य वस्तुएँ होती हैं और कई देवसम्पाद्य होती हैं। जो लोग प्रकृति-भूतों या परमाणुओंमें भी चेतन-शक्तिकी कल्पना करते हैं, वे तो फिर जडवादी नहीं रह जाते। साथ ही अनेक चेतन परमाणुभूत या परमाणु विद्युत‍्को कारण माननेकी अपेक्षा लाघवार्थ एक व्यापक सर्वशक्ति चेतन ईश्वरको ही कारण मानना कहीं श्रेष्ठ है। जड परमाणुओंसे संयुक्त होकर कार्यारम्भके लिये कर्म अपेक्षित होगा। देखा जाता है कि तन्तुओंमें कर्म (हलचल) होता है। तभी संयोग आदिद्वारा पटादिकी उत्पत्ति होती है। कर्म भी कार्य है, अत: उसका भी कोई निमित्त चाहिये। यदि कोई निमित्त न होगा, तो परमाणुमें आद्यकर्म ही नहीं होगा। यदि लोकानुसार प्रयत्न या अभिघातादि परमाणु कर्मका निमित्त मान्य है, तब तो तदर्थ चेतन ईश्वर मानना ही युक्त है। कहा जाता है कि ‘ज्ञानस्वरूप ब्रह्मसे प्रपंचकी उत्पत्ति इसीलिये नहीं हो सकती कि प्रपंच ब्रह्मसे विलक्षण है। सुवर्णसे उत्पन्न मुकुट-कुण्डलादिमें, मृत्तिकासे उत्पन्न घटादिमें समानता होती है। मृत्तिकासे मुकुट-कुण्डलादि नहीं बनते। जगत् अचेतन है, अत: इसका कारण भी अचेतन होना ठीक है। इसी तरह ज्ञानसे विलक्षण होनेसे प्रपंच ज्ञानका कार्य नहीं। प्रीति, परिताप, विषादका हेतुभूत प्रपंच चेतनका कार्य नहीं हो सकता, किंतु प्रकृतिका ही कार्य होना चाहिये। विपरीत दृष्टान्त भी मिलते ही हैं। लोकमें चेतनत्वेन प्रसिद्ध पुरुष, पशु आदिसे विलक्षण केश, नख आदिकी उत्पत्ति होती है तथा अचेतनत्वेन प्रसिद्ध गोमय, केश, काष्ठ आदिसे वृश्चिक, यूका, दीमकादिकी उत्पत्ति होती है।’ इसपर भी कहा जा सकता है कि वस्तुत: अचेतन शरीरोंसे ही अचेतन केश आदिकी उत्पत्ति होती है। इसी तरह गोमयादिसे वृश्चिकादिके अचेतन शरीरकी उत्पत्ति होती है। तो भी उक्त दृष्टान्तोंसे कारण-कार्योंकी विलक्षणता तो सिद्ध ही हो जाती है। गोमयकी अपेक्षा वृश्चिक शरीरमें शरीरकी अपेक्षा केश आदिकी विलक्षणता भोगायतन और भोगानायतनरूपसे स्पष्ट ही है। कारण-कार्यमें अति समानता होनेसे तो कार्य-कारणभाव ही नहीं होता। कुछ समानता तो इधर भी है ही। ब्रह्मगत सत्ता स्फूर्ति जगत‍्में भी अनुगत है ही। मार्क्सवादी तो स्वयं ही अचेतनभूतसे चेतनाकी उत्पत्ति मानते हैं। वे भी गोमयादिसे वृश्चिकादिकी उत्पत्तिका दृष्टान्त उपस्थापित करते हैं। इस दृष्टिसे भी चेतन ब्रह्मसे तद्विलक्षण अचेतन प्रपंचकी उत्पत्तिमें कोई आपत्ति नहीं हो सकती। किं च जैसे पृथ्वीत्व जातियुक्त पाषाणोंमें ही हीरक, पद्मराग आदि बहुमूल्य रत्न होते हैं, कोई मध्य वीर्यके सूर्यकान्त आदि मणि होते हैं, कोई कुत्ता, बगुला, कौवाके हटानेके लायक सामान्य पाषाण होते हैं, बीजोंसे ही बहुविध पत्ते, पुष्प, फल, गन्ध, रसादि विचित्र वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं, वैसे सभी बीज पार्थिव ही हैं। फिर पृथक् बीजोंसे पृथक् ढंगके पत्र, पुष्प, फल, रसादि उत्पन्न होते हैं। एक ही अन्नरसके लोहितादि, रस, केश, नख आदि विचित्र कार्य होते हैं। उसी तरह एक ही ब्रह्मसे विविधवैचित्र्योपेत प्रपंचका निर्माण होता है। बौद्धलोग सम्पूर्ण प्रपंचको उत्पत्तिके पहले असत् कहते हैं, अर्थात् सत‍्के अभावको ही विश्वका मूल कारण कहते हैं। इस कथनमें यह असंगति है कि असत् है या असत् था। इस प्रकार असत् या अभावके साथ अस्तित्वका सम्बन्ध कैसे होगा? क्योंकि सत‍्के साथ ही सत‍्का सम्बन्ध हो सकता है। खपुष्पके तुल्य असत् या अभावके साथ सत्ताका सम्बन्ध सम्भव नहीं। इसी तरह प्रमाण या प्रमाता होनेपर ही भाव या अभावका बोध हो सकता है। यदि प्रमाता एवं प्रमाणका अस्तित्व था, तब तो असत् या अभाव कैसे कहा जा सकेगा? क्योंकि प्रमाता और प्रमाणका ही अस्तित्व था। यदि प्रमाता-प्रमाण नहीं थे, तब तो फिर अभाव या असत‍्का प्रबोध भी कैसे हो सकता था? बीजके उपमर्दन होनेसे अंकुरकी उत्पत्ति होती है, यह देखकर बौद्धलोग अभावसे ही अंकुरादि कार्योंकी उत्पत्ति कहते हैं, परंतु यदि ऐसी बात होती, तब तो बीजके दाहसे भी अंकुरकी उत्पत्ति होनी चाहिये; क्योंकि बीज-दाहमें भी तो बीजका उपमर्दन या अभाव हुआ ही। अत: बीजके अवयव ही अंकुरके कारण हैं। बीज अंकुरोत्पत्तिके पूर्वकी अवस्था है। जैसे घटोत्पत्तिके पहले मृत्तिकाकी पिण्डावस्था होती है। पिण्डमें घटमें, कपालमें जो व्यापक है, वह मृत्तिका ही सबका कारण है। पिण्डादि सब मृत्तिकाके कार्य ही हैं। उसी तरह बीजावयव ही बीज एवं अंकुरादिमें व्यापक होनेसे वही कारण है। पिण्ड या बीज, घट-अंकुरादिमें व्यापक नहीं हैं, अत: वे कारण नहीं हैं। एक कारणमें युगपत् विरुद्ध अनेक कार्य नहीं हो सकते, अत: एक कारणसे होनेवाले कार्योंमें क्रमभाविता है। पिण्ड, घट, कपाल, बीज, अंकुर, नाल, स्कन्ध, शाखोपशाखादि कार्य क्रमसे ही होते हैं। जो कहते हैं कि पिण्ड, कपालादि कार्योंसे भिन्न होकर कारण मृत्तिका कुछ भी नहीं है, उन्हें अन्वय-व्यतिरेकादि प्रमाणोंपर अवश्य ध्यान देना चाहिये। जैसे पुष्पोंके परस्पर व्यावृत्त होनेपर भी उनमें अनुवृत्त सूत्र उनसे भिन्न होता है, वैसे ही पिण्ड, घट, कपालादिके परस्पर व्यावृत्त होनेपर भी सबमें अनुवृत्त मृत्तिका स्पष्ट ही उन कार्योंसे पृथक् है। अत: इस कारणको असत् नहीं कहा जा सकता। इसी तरह उत्पत्तिके पहले कार्य भी सत् ही रहता है। जैसे अविज्ञात ही घट विज्ञात होता है, वही ज्ञायमान होता है और वही विस्मृत होता है और फिर उसीका स्मरण भी होता है। इसी तरह सामग्रीके अभावसे या कुडॺादि दीवाल आदि आवरणसे वर्तमान रहता हुआ भी घट प्रतीत नहीं होता है। पिण्डमें घट रहता हुआ भी आवृत्त होनेसे उपलब्ध नहीं होता। जैसे एक ही आकाशमें चान्द्र प्रकाश सौर्य प्रकाशसे आवृत्त होता है, एक ही घटमें नीर क्षीरसे आवृत्त होता है, वैसे ही एकदेशस्थ ही घट पिण्डसे आवृत्त रहता है। एक ही मिट्टीमें पिण्ड आदि सहस्रों कार्य हैं, जिसकी अभिव्यक्तिकी सामग्री उपस्थित होती है, वही अभिव्यक्त होता है, अन्य आवृत्त रहते हैं। इस तरह पिण्डसे घट, घटसे कपाल, कपालसे घट आदि आवृत्त होते हैं। लोकमें अनेक ढंगसे अभिव्यक्ति होती है, दीपसे रूपकी अभिव्यक्ति होती है। दण्ड, चक्र, कुलालादिसे घट अभिव्यक्त होता है। जैसे दीपसे आवरण-नाशके अतिरिक्त घट सप्रकाश बनाया जाता है, वैसे ही कुलालादिद्वारा आवरणभंगके साथ घटाभिव्यक्ति हो जाती है। इसीलिये शिलाघातसे पिण्ड-भंग होनेपर भी कुलालादि बिना घटकी अभिव्यक्ति नहीं होती। जैसे अज्ञातताकी निवृत्तिके लिये प्रमातालोग प्रमाणका उपादान करते हैं, प्रमाणके सम्बन्धसे प्रमेयकी अज्ञातता नष्ट होती है, प्रमातासे प्रमाणकी अभिव्यक्ति होती है। निष्पन्न प्रमाण प्रमेयसे संगत होकर उसी तरह प्रमेयाकार हो जाता है, जैसे कुल्या (नहर)-का जल नालियोंद्वारा क्षेत्रमें जाकर क्षेत्राकार हो जाता है, प्रमाणके प्रमेयाकार होनेसे अज्ञातताके नष्ट होनेसे प्रमेयकी अभिव्यक्ति होती है। इसी तरह दीपप्रकाशसे घट सप्रकाश होता है। वही घटनिष्ठ प्रकाश घटनिष्ठ तमका अपनोदन करता है। इसी तरह मृत्तिकामें स्थित घटाकार दण्ड-चक्रादिसे स्फुट होता है। शिलादिसे पिण्डभंग होनेपर दूसरे चूर्णादि कार्य सम्पन्न हो जाते हैं, वे भी घटके आवरण ही हैं, अत: घटकी अभिव्यक्ति नहीं होती। इसीलिये भिन्न-भिन्न घटादि कार्योंकी अभिव्यक्तिके साधन नियत हैं। प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव आदि भी अन्योन्याभावके तुल्य ही भावरूप हैं। जैसे घटान्योन्याभाव घटरूप ही है, वैसे ही प्रागभाव पिण्डरूप है। प्रध्वंसाभाव कपालादिरूप है। भावान्तर ही किसी दृष्टिसे अभाव कहा जाता है—‘भावान्तरमभावो हि कयाचित्तु व्यपेक्षया।’ जो प्रागभाव, प्रध्वंसाभावको शून्य ही कहता है, उससे यह भी प्रश्न होगा कि उन दोनोंमें भेद है या नहीं? यदि कहा जाय कि भेद नहीं है, तो भेद-व्यवहार क्यों है? अगर भेद है तो उन दोनोंका भेदक क्या है? अगर विलक्षण स्वरूपको ही भेदक कहें तो भी ठीक नहीं; क्योंकि शून्यमात्रमें विलक्षणस्वरूपता क्या हो सकती है? विलक्षणस्वरूपता हो तो शून्यता भी कैसी होगी? शून्यके साथ उपाधि सम्बन्ध भी नहीं बन सकता, अत: औपाधिक भेद भी नहीं कहा जा सकता। ‘घट-प्रभावकी पिण्ड ही उपाधि है’ ऐसा कहें तो उसमें प्रमाण बतलाना पड़ेगा। यदि प्रत्यक्ष-प्रमाण कहें, तो भी ठीक नहीं, कारणरूप तथा स्पर्शहीन प्रागभावके साथ चक्षु आदिका सम्बन्ध सम्भव नहीं है। अत: प्रत्यक्ष नहीं कहा जा सकता। यदि पिण्डके दर्शनसे ही प्रागभावका दर्शन मानें, तब तो प्रागभावके भाव रूप माननेसे ही सब काम चल ही सकता है। ‘स्वरूपपररूपाभ्यां नित्यं सदसदात्मकम्’ इस दृष्टिसे अभाव या असत‍्से जगत् या कार्यकी उत्पत्ति असंगत है, किंतु स्वप्रकाश चेतन ब्रह्मसे ही पूर्वोक्त युक्तियोंसे जगत‍्की उत्पत्ति संगत है। इसी तरह अचेतन अदृष्ट आदि भी चेतनके बिना कर्मके कारण नहीं हो सकते। परमाणु यदि सावयव हैं, तब तो वे भी कार्य एवं अनित्य ही होंगे। उनकी उत्पत्तिमें कारणान्तर ढूँढ़ना पड़ेगा। यदि निरवयव हैं, तब तो उनका दूसरे परमाणुओंसे संयोग होनेपर परिमाणवृद्धि न होगी; क्योंकि एक देशसे संयोग होनेपर तो संयोगसे अव्याप्त देशोंद्वारा प्रथिमा (विस्तार) हो सकता है, परंतु इस दशामें सावयवत्व, अनित्यत्वादि दोष होते हैं। निरवयवका तो सम्पूर्णरूपसे ही अव्यवधानेन संयोग मानना होगा तथा च एक-दूसरेहीमें समा जायँगे, वृद्धिकी कोई आशा नहीं होती। इसके अतिरिक्त संसारमें प्रदेशवाले पदार्थोंका ही संयोग होता है, फिर निष्प्रदेश निरवयव परमाणुओंका संयोग भी कैसे होगा? इसी तरह परमाणुओंको प्रवृत्तिस्वभाव, निवृत्तिस्वभाव, उभयस्वभाव या अनुभय-स्वभाव मानना पड़ेगा, परंतु इनमें कोई पक्ष ठीक नहीं है। प्रवृत्तिस्वभाव है, तब तो नित्य ही प्रवृत्ति होनेसे वस्तुनाशरूप प्रलय नहीं होगा। निवृत्तिस्वभाव होनेसे कभी सृष्टि न होगी। विरोधात् उभयस्वभाव भी नहीं कहा जा सकता। अनुभयस्वभाव कहेंगे, तब तो दूसरे किसी निमित्तसे उनकी प्रवृत्ति माननी पड़ेगी, फिर वही सर्वज्ञ चेतन अपेक्षित होगा। इसके अतिरिक्त लोकमें रूपादिमान् वस्तु अपने कारणकी अपेक्षा स्थूल एवं अनित्य होती है। जैसे पट तन्तुओंकी अपेक्षा स्थूल एवं अनित्य होते हैं। अंशुओंकी अपेक्षा तन्तु स्थूल तथा अनित्य होते हैं। परमाणु भी यदि रूपादिमान् हैं, तो उनका भी कारण होना चाहिये और उसकी अपेक्षा उनमें स्थूलता एवं अनित्यता भी होनी चाहिये। इसके अतिरिक्त यह भी देखा जाता है कि गन्ध, रस, रूप, स्पर्श गुणसंयुक्त पृथ्वी स्थूल है। तदपेक्षया रूप, रस, स्पर्श गुणसंयुक्त जल सूक्ष्म है। इसी प्रकार रूप, स्पर्श गुणवाला तेज एवं स्पर्श गुणवाला वायु और भी सूक्ष्म है। तद्वत् पृथिव्यादि परमाणुओंमें सूक्ष्मता, स्थूलताका तारतम्य होना चाहिये। यदि गुणोंकी अधिकतासे पृथ्वी, जल परमाणुमें मूर्तिवृद्धि होगी, तब फिर वे परमाणु ही क्या रहेंगे? जब कार्योंमें गुणोंके उपचयसे मूर्तिवृद्धि होती है तो परमाणुमें भी गुणोपचयसे मूर्तिवृद्धि क्यों न होगी? यदि परमाणुओंमें गन्धादिगुण न मानें तो उनके कार्योंमें ही गन्धादि कहाँसे आयेंगे? क्योंकि कारण गुण ही कार्यगुणोंके आरम्भक माने जाते हैं। यदि सबमें एक ही गुण माने जायँ, तब तो पृथ्वीमें रस, जलमें रूप, तेजमें स्पर्श नहीं उपलब्ध होने चाहिये। यदि समताके लिये सभीको गन्धादि चारों गुणोंसे युक्त मानेंगे, तब तो जलमें भी गन्ध एवं तेजमें भी गन्ध, रस उपलब्ध होने चाहिये। वायुमें भी रस-गन्धका उपलम्भ होना चाहिये, परंतु ऐसा होता नहीं। द्रव्य एवं गुण यदि अत्यन्त भिन्न हों, तो जैसे पुष्प-पलाशादि भिन्न हैं, स्वतन्त्र हैं, वैसे ही गुण भी द्रव्यसे पृथक् स्वतन्त्र होने चाहिये, परंतु यहाँ तो गुण द्रव्य-परतन्त्र ही होता है। द्रव्यके साथ-साथ सहभाव होनेसे द्रव्यमात्र ही गुण है, यह मानना ठीक है। धूम, अग्निके समान-द्रव्य-गुणमें भेद नहीं प्रतीत होता—इसी प्रकार कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय भी द्रव्य ही है। जैसे एक ही देवदत्त विभिन्न सम्बन्धिरूपोंकी अपेक्षासे मनुष्य, ब्राह्मण, क्षत्रिय, बाल, युवा, वृद्ध, पिता, पुत्र, पौत्र, भ्राता या जामाता आदि रूपसे कहा जाता है, जैसे एक ही अंक स्थानविशेषके योगसे दस, शत, सहस्र आदि शब्दोंसे व्यवहृत होता है। विचार करनेपर कारणसे भिन्न होकर कुछ नहीं होता। मिट्टीसे भिन्न होकर घटादि पदार्थ उपलब्ध नहीं होते। जन्मके पहले प्रध्वंसके पश्चात् कार्यकी उपलब्धि नहीं होती, अन्त:करणसे भिन्न उनकी सत्ता नहीं होती। सद‍्बुद्धि तथा असद‍्बुद्धि—दोनों ही सर्वत्र उपलब्ध होती हैं। जिस विषयकी बुद्धि कभी भी व्यभिचरित नहीं होती, वही सद‍्बुद्धि और जिस विषयकी बुद्धि व्यभिचरित होती है, वह असद‍्बुद्धि होती है। ‘नीलम् उत्पलम्’ के तुल्य ‘सन् घट:, सन् पट:, सन् हस्ती’, इसी तरह सन्-सन् सर्वत्र घटादिमें सद‍्बुद्धि बनी रहती है। घटादि बुद्धि व्यभिचरित होती है, अतएव घटादि बुद्धिके विषय घटादि असत् हैं; क्योंकि उसका व्यभिचार होता है। सद‍्बुद्धिका विषय सत् है; क्योंकि उसका व्यभिचार नहीं होता। कहा जा सकता है कि घट नष्ट होनेपर तो घटबुद्धि व्यभिचरित (बाधित) हो ही जाती है, परंतु यह कहना ठीक नहीं, कारण पटादिमें सद‍्बुद्धि रहती ही है। ‘सन् घट:’, ‘सन् पट:’ इस रूपसे घट, पट विशेष्यरूपसे, सन् विशेषण रूपसे प्रतीत होता है। घटके नष्ट हो जानेपर विशेष्य न रहनेपर विशेषणबुद्धि नहीं होती। जैसे गो व्यक्ति न रहनेपर अभिव्यंजक न रहनेसे गोत्वकी प्रतीति नहीं होती, यह नहीं कि गोत्व नहीं रह गया। वैसे ही गोत्वके समान सत‍्के विद्यमान होते हुए भी अभिव्यंजकविशेष्य घटादि न रहनेपर सत् प्रतीत नहीं होता। इसीलिये यह भी नहीं कहा जा सकता कि जैसे घट नष्ट होनेपर पट आदिमें सद‍्बुद्धि बनी रहती है, वैसे ही घटबुद्धि भी घटान्तरमें बनी रहती है; क्योंकि भले घटान्तरमें घटबुद्धि बनी रहे, परंतु फिर भी पटादिमें तो घटबुद्धिका व्यभिचार है ही, परंतु सद‍्बुद्धिका तो कहीं भी व्यभिचार नहीं होता। कहा जा सकता है कि घट नष्ट हो जानेपर उसमें सद‍्बुद्धि भी नहीं रहती, परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि विशेष्य न रहनेसे सद‍्बुद्धि नहीं होती। सद‍्बुद्धि विशेषणविषया होती है, विशेष्य नहीं होनेसे विशेषणता नहीं बनती। फिर भी सद‍्बुद्धि कैसे हो सकती है? यह नहीं कहा जा सकता कि सद‍्बुद्धिका विषय सत् रहा ही नहीं, इसलिये सद‍्बुद्धि नहीं रहती। यहाँ यह शंका होती है कि घटादि विशेष्य असत् हैं, तो उसके साथ सत‍्का सामानाधिकरण्य नहीं होना चाहिये? परंतु इसका समाधान यह है कि जैसे रज्जु-सर्पके सम्बन्धमें सर्पके बाधित होनेपर भी इदमंशके साथ ‘अयं सर्प:’ सामानाधिकरण्य-व्यवहार होता है। इसी तरह घटादिके असत् होनेपर भी ‘घट: सन्, पट: सन्’ इस रूपसे अबाधित सत‍्के साथ असद् घटादिका सामानाधिकरण्य-व्यवहार बन जाता है।&lt;/p&gt;
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&lt;p&gt;श्रोत: मार्क्सवाद और रामराज्य, लेखक: श्रीस्वामी &lt;a href=&quot;https://batukuvacha.com/posts/1-bhgvaan-shriiraamke-dvaaraa/&quot;&gt;करपात्रीजी&lt;/a&gt; महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें&lt;/p&gt;</content:encoded><dc:creator>श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज</dc:creator><dc:language>hi</dc:language><category>दर्शन</category><category>अन्तर्राष्ट्रीयनियम</category><category>आदर्शनागरिक</category><category>एकसत्तावाद</category><category>धर्मसम्राट</category><category>मार्क्सदर्शन</category><category>मार्क्सवाद</category><category>रामराज्य</category><category>वैज्ञानिक</category><category>श्रीस्वामी-करपात्रीजी</category><category>हरिहरानन्द-सरस्वती</category></item></channel></rss>