4.3 जातिविधान
इसी तरह विकासवादी जातिविभाग-शास्त्रके अनुसार साधर्म्य-वैधर्म्यके अनुसार प्राणिवर्गका वर्गीकरण पृष्ठवंशधारी और पृष्ठवंशविहीनोंके भेदसे करते हैं। जबसे रक्तकी परीक्षाका सिलसिला जारी हुआ, तबसे विकासवादियोंका वर्ग-विन्यास गलत सिद्ध हो गया। अबतक लोग ‘गिनी फाउल’ को मुर्गीकी किस्मका समझते थे। पर अब रक्तकी परीक्षासे वह शुतुरमुर्गकी जातिका मालूम होता है। इसी तरह ‘विकासवाद’ के लेखकने भालूको श्वान-जातिमें लिखा है। परंतु उसके रुधिरकी परीक्षासे वह सील आदिकी भाँति जलजन्तु सिद्ध हो रहा है। इसके अतिरिक्त जब विकासवादी एक ही प्रकारके मूल प्राणीसे समस्त भूमण्डलके प्राणियोंकी उत्पत्ति मानता है, जब सबके संस्थान एक समान गिनता है और एक ही तरीकेसे विकास मानता है, तब इन सबके रुधिरकण एक ही बनावटके क्यों नहीं होते? किसी जातिके प्राणीका रुधिरकण गोल, किसीका चपटा क्यों होता है? यह रुधिरका पृथक्त्व सिद्ध करता है कि प्रत्येक जातिका शरीर भिन्न प्रकारके रुधिरकणोंसे बना होता है। इससे यह सिद्ध होता है कि समस्त जातियाँ एक ही प्रकारके प्राणीसे विकसित नहीं हुईं; प्रत्युत सबकी उत्पत्ति मूलत: अलग-अलग हुई।
तुलनात्मक शरीर-रचना-शास्त्रसे विकासवादकी बहुत ही सामग्री मिलती है। बाह्यरूपमें अत्यन्त भिन्नता होनेपर भी कई प्राणियोंका जातिविभाग इस शास्त्रने एक ही वर्गमें किया है। आन्तरिक रचना-साम्यपर इसका निर्णय होता है। तदनुसार ‘चमगादड़, ह्वेल और गौ अनुक्रमसे नभचर, जलचर और भूमिचर होनेपर भी तीनोंका एक ही वर्गमें अन्तर्भाव किया गया है; क्योंकि तीनों ही स्तनधारी हैं। इसके अनुसार अनेक जातिके कुत्तोंमें साधर्म्य-वैधर्म्य दोनों ही मौजूद हैं। साधर्म्यसे सब कुत्ते एक ही वर्गके हैं। वैधर्म्यसे बुलडॉग, ताजी और लैंडी आदि अलग-अलग हैं; किंतु हैं सब एक ही पूर्व जन्तुकी संतति। इसी तरह लोमड़ी, सियार और भेड़िया वैषम्यसे अलग हैं। पर मांसभक्षण आदि साम्यसे एक ही पूर्वजन्तुकी संतति प्रतीत होते हैं। बिल्ली और बनबिलाव अलग होते हुए भी एक ही हैं। चीता, व्याघ्र, सिंह अलग-अलग होते हुए भी एक हैं। इन सबका मांसाहारी, स्तनधारी कक्षामें समावेश होता है। इनमें व्याघ्र तथा सिंहके मेलसे और भेड़िये तथा कुत्तेके मेलसे संतति भी होती है। भालू भी मांस-भक्षक प्राणी है। इसकी आन्तर-रचना कुत्ते, बिल्लीकी रचनासे कुछ पृथक् है। पर इसका मेल इन्हींके साथ मिलता है। मांस-भक्षकोंमें बिज्जु, नेवला, ऊदबिलाव अलग-अलग होते हुए भी एक ही प्रकारके हैं। ह्वेल मछली भी मांसभक्षक है। यह जन्तु पहले स्थलचारी था, पर अब इसका पानी ही घर हो गया। इसके पैर कमजोर और नावके चप्पूकी भाँति हो गये। शरीरमें इसके बल भी कम होता है। यह स्तनधारी, मांसभक्षी प्राणी है। स्तनधारियोंमें तीक्ष्ण दाँतवालोंका एक दल चूहा, छछूँदर, घूस, गिलहरी, शशक और स्याहीका है। ये वस्तुओंको कुतरते हैं। अत: तीक्ष्णदंती कहलाते हैं। इनमें ही उड़न गिलहरी भी है। चमगादड़ भी इसी जातिका है; किंतु यह उड़नेवाला है। इनके पैरोंकी रचना भूमिचर जानवरोंके अगले पैरोंके तुल्य होती है। विकासवादका यह सबसे उत्तम प्रमाण समझा जाता है। स्तनधारियोंमें गाय, घोड़ा, हाथी, ऊँट, हरिण, गैंड़ा, सूअर, दरियाई घोड़ा आदि हैं। इनके सूँड़ या खुर होते हैं। इनमें खुरका साधर्म्य है। हाथीकी पाँचों अँगुलियाँ, टापीरकी चार, गैंड़ेकी तीन, ऊँटकी दो और घोड़ेकी एक ही होती है। यहाँ अँगुलियोंके क्रमश: ह्राससे विकासका अच्छा प्रमाण मिलता है। आस्ट्रेलियाका कंगारू भी विकासका अच्छा प्रमाण है। इसकी मादाके पेटमें एक थैली होती है। माता बच्चोंको पैदा करके इसी थैलेमें रख लेती है। इस थैलेमें स्तन होते हैं। बच्चे बड़े होनेपर थैलेसे बाहर निकलते हैं। इसी तरह अमेरिकाका ‘ओपोसम’ होता है। उसकी भी मादाके पेटमें थैली होती है। इनके सिवा डकविल एवं ईकड्ना दो स्तनधारी जन्तु और भी होते हैं। ये अण्डे देते हैं, परंतु अण्डोंको पेटमें रखनेके लिये इनके भी पेटमें थैली होती है। इस तरह स्तनधारियोंमें देखा गया है कि कई पूर्ण जरायुज, कई कंगारूकी भाँति अर्ध-जरायुज और कई डकविलकी भाँति अण्डज हैं। ये स्तनधारियों एवं अण्डजोंके मध्यवर्ती प्राणी हैं।’
‘इसी तरह पृष्ठवंशधारियोंकी दूसरी श्रेणीके पक्षी भी कई प्रकारके होते हैं। कोई दाना चुगते हैं, कोई मांस खाते हैं और कोई पानीमें तैरते हैं। परिस्थितिके अनुसार उनके चोंच, पैर और झिल्लीदार पंजोंकी बनावट होती है। आस्ट्रेलिया, अफ्रीका, न्यूजीलैण्ड और अमेरिकाका पेंग्विन पक्षी भी विकासका एक श्रेष्ठ प्रमाण है। यह जहाँ रहता है, वहाँ दूसरा पक्षी नहीं रहता, इसीलिये इसकी उड़नेकी शक्ति नष्ट हो गयी। यह पानीमें तैरता है। इसके पैर नावके चप्पुओंकी तरह पानी काटनेवाले हो गये। शुतुरमुर्ग और मोरकी भी उड़नेकी शक्ति कम हो गयी; क्योंकि इन्हें किसी पक्षीका डर नहीं। यह परिस्थितिसे प्राप्त विकासके उदाहरण हैं।’
‘पीठकी हड्डीवालोंमें तीसरी जाति सर्पणशीलोंकी है। इसमें गोह, साँप, अजगर, नाकू, मगरमच्छ एवं कछुआ आदि हैं। गोहकी अनेक जातियाँ हैं, एक जातिकी गोहमें आगेके पैर नहीं होते, दूसरी जातिमें आगे-पीछे चारों पैर नहीं होते। सर्प बिना पैरका होता ही है। ये भी विकासके प्रमाण हैं। पृष्ठवंशवालोंकी चौथी जाति है मण्डूकोंकी, यह पैदाइशसे लेकर युवावस्थातक अपनी जीवनीसे सिद्ध कर देता है कि मछलियोंसे उसकी उत्पत्ति हुई है। मछलियोंकी तरह पहले वह गलफड़ोंसे श्वास लेता है, फिर मुखसे। पहले उसके (मछलीकी तरह) पूँछ होती है, फिर वह लुप्त हो जाती है। पाँचवीं श्रेणी मछलियोंकी है। वे हजारों प्रकारकी होती हैं, जिससे विकासके अनुमानकी अधिक सम्भावना रहती है। इसी तरह अस्थिरहित प्राणियोंके भी शरीरोंसे विकासका अनुमान होता है। ये जोड़ोंसे बने होते हैं। कनखजूरा, बिच्छू, मकड़ी, भौंरा, ततैया आदि इसी विभागके हैं। इनमें भिन्नता होते हुए भी सबके शरीर छोटे-छोटे जोड़ोंसे बने होते हैं। इनसे भी मालूम होता है कि सब एक ही मूल प्राणीसे बने हैं। इनके आगे अत्यन्त सूक्ष्म हाइड्रा, अमीबा आदि प्राणी हैं। इनके भी पोषण, श्वासोच्छ्वास आदि आठों संस्थान हैं। इस तरह सब प्राणियोंमें वैधर्म्य होते हुए भी वे साधर्म्यसे रहित नहीं हैं। क्रमसे रखनेपर पहले अमीबा, हाइड्रा, कनखजूरे आदि जोड़वाले कीड़े, फिर हड्डीवाली मछलियाँ, फिर मण्डूक, फिर सर्प, फिर पक्षी और अन्तमें स्तनधारियोंका स्थान ठहरता है। विकाससे इनकी आकृतिमें भिन्नता है। जैसे नये यन्त्रके बन जानेपर पुराने यन्त्र अलग हो जाते हैं, वैसे ही योग्य प्राणियोंके उत्पन्न हो जानेपर अयोग्य जातियाँ पीछे रह जाती हैं। पिछली जातियोंके अवशिष्ट अवयव इस बातकी साक्षी दे रहे हैं। मनुष्य भी स्तनधारी जन्तुओंकी श्रेणीमें है। वनमानुष, बन्दर, लीमर आदि जातियाँ इसी श्रेणीकी हैं, अत: इनकी उत्पत्ति विकासवादके अनुसार ही है।’
यद्यपि आन्तर-रचनाका मिलान ठीक है, फिर भी इनकी श्रेणियाँ बाह्य रूपसे ही निर्धारित की गयी हैं। स्तनोंको देखकर स्तनधारियोंकी श्रेणीका निर्णय किया है। मांस खाना, जीभसे पानी पीना, मैथुनके समय बँध जाना, पसीना न आना, अँधेरेमें भी देखना आदि सब बाहरी लक्षण हैं। इसी तरह दाँत देखकर तीक्ष्ण दन्तवालोंकी श्रेणी बनी। इस तरह सभी विभाग प्राय: बाह्य भेदपर ही निर्भर हैं, अत: आन्तरिक रचनापर वर्ग-विभागका अहंकार व्यर्थ है। ह्वेल, चमगादड़ और गायके स्तनोंको देखकर ही सबको एक श्रेणीमें रखा गया है। जहाँ इनकी बाह्य आकृतिसे काम नहीं लिया, वहीं भूल हुई। भालू और गिनी फाउलको एक मानना भूल है। उस भूलको अब रुधिर-शास्त्र सुधार रहा है, अत: केवल आन्तर रचनापर उपर्युक्त विभागकी बात असंगत है। शरीरके अन्दर हड्डियाँ, नस-नाड़ियाँ, यकृत्-प्लीहा, गर्भाशय आदि अनेक यन्त्र हैं। पर ये क्या अस्थिहीन कीड़ोंमें भी हैं? कुत्ते और गायके पानी पीनेके ढंगमें भेद है। कुत्ता जीभसे और गाय घूँटसे पानी पीती है, फिर भी दोनों स्तनधारी हैं। अत: आन्तर-रचना जटिल है, उसके आधारपर वर्गभेद नहीं बन सकता। अमीबासे स्तनधारियोंतककी रचनामें साम्यका पक्ष भी गलत है। यत्किंचित् साम्य तो पांचभौतिक होनेसे सबमें ही है। अस्थियुक्त और अस्थिहीन प्राणियोंकी कुछ भी समानता नहीं है। यकृत्, प्लीहा, गर्भाशयादि एकमें हैं, दूसरेमें नहीं। अस्थिहीनोंमें अस्थियाँ कैसे हुईं, इसपर भी विकासवादी चकरा जाते हैं।
इसपर उनकी चार कल्पनाएँ हैं—(१) प्राणियोंकी मानसिक प्रेरणासे अस्थियाँ बनीं, (२) कठोर काम करते-करते जैसे मनुष्योंके शरीरमें घट्ठे पड़ जाते हैं, वैसे ही श्रम करनेसे प्राणियोंके देहमें अस्थियाँ बन गयीं, (३) जब चूनेके अधिकांश भागवाले पदार्थ खाये गये, तब हड्डियाँ पैदा हुईं और (४) शरीरके अन्दर नस, नाड़ी आदि अवयव ही हड्डियाँ बन गये, परंतु ये चारों पक्ष असंगत हैं। मनका असर उसीपर पड़ता है, जिसका मनसे सम्बन्ध हो। अस्थिका मनसे कोई सम्बन्ध नहीं। दाँतपर सुई चुभानेसे मनपर कुछ भी असर नहीं पड़ता। अत: ‘मानसिक प्रेरणासे अस्थियाँ बनीं’, यह नहीं कहा जा सकता। यों तो सम्पूर्ण संसार ही मनकी कल्पना है, फिर अस्थि ही क्यों? घट्ठोंका दृष्टान्त भी ठीक नहीं; क्योंकि बाहरी वस्तुके संघर्षसे बाहरी ही कठोरता आती है। बाह्य संघर्षसे शरीरके अन्दर हड्डियाँ कैसे बनेंगी? चूनेवाले भोजनसे भी हड्डियाँ नहीं बन सकतीं। सभी जानते हैं कि ‘खूनसे हड्डियाँ पैदा होती हैं,’ परंतु लाखों जूँ, चपड़े, कीलनें, खटमल मनुष्यों, पशुओंके खून पीते हैं; जोंकें खून पीती हैं; परंतु उनमें हड्डी नहीं बनी। चीटियाँ हड्डियोंको चुनकर खाती हैं, उनमें भी हड्डी पैदा नहीं हुई। ‘नस-नाड़ियाँ हड्डी बन जाती हैं’ यह भी बात युक्तिहीन है। बच्चोंके मुखमें पहले दाँत नहीं होते, कुछ दिन बाद दाँत निकल जाते हैं। यदि नस-नाड़ियोंका दाँत बन जाना मानें तो उधर थोड़े ही दिनोंमें वे दाँत गिर जाते हैं। गिरते समय नस-नाड़ियोंसे उनका कोई लगाव प्रतीत नहीं होता। कुछ दिनों बाद फिर नये दाँत निकलते हैं, यदि पहली नस-नाड़ियाँ चली गयीं तो यह दूसरी कहाँसे आयीं? वृद्ध होनेपर वे दाँत भी चले जाते हैं, तब भी किसी नस-नाड़ीका लगाव मालूम नहीं होता। डॉक्टर भी दाँत निकाल देते हैं, पर उनके साथ नस आदि कोई चीज नहीं निकलती। दाँत तो कीलोंकी तरह गड़े होते हैं, शरीर या किसी दूसरे अंगसे उनका वास्ता नहीं प्रतीत होता।
इसी तरह भीतरका सारा अस्थिपंजर अलग ही प्रतीत होता है, उसका वास्ता नस-नाड़ी, मांस, त्वचा किसीसे नहीं। फिर ऐसी निराली वस्तुको अस्थिहीन प्राणियोंने कैसे प्राप्त किया? विकासवादी कहते हैं कि ‘परिस्थितियोंसे ही हड्डियाँ उत्पन्न हुईं;’ परंतु परिस्थिति भी हड्डी बनानेमें असमर्थ है। भाई-बहन दोनों एक ही परिस्थितिमें उत्पन्न होते और बढ़ते हैं। पर बहनके मुखपर दाढ़ी-मूँछका नाम भी नहीं होता। हाथी-हथिनी दोनों एक स्थितिमें उत्पन्न होते हैं, परंतु हथिनीके मुँहमें बड़े दाँत नहीं होते। मयूर-मयूरी, मुर्गा-मुर्गी समान परिस्थितिमें पैदा होते हैं; पर मादाके वे सुन्दर पंख और कलँगी नहीं होतीं, जो नरमें होती हैं। क्या यहाँ परिस्थितिमें कोई अन्तर सिद्ध हो सकता है? फिर कैसे किसीमें हड्डी हो और अन्यमें न हो? ‘सुश्रुत’ आदि आयुर्वेद ग्रन्थोंसे मालूम होता है कि ‘दो स्त्रियोंके परस्पर मैथुन करनेसे यदि किसीके गर्भमें बीज चला गया, तो उस गर्भसे अस्थिविहीन शिशु उत्पन्न होता है।’ इसी तरह ‘कोई ऋतुस्नाता स्त्री यदि स्वप्नमें मैथुन करे तो वायुद्वारा आर्त्तव खिंचकर गर्भमें धारित होता है। वही अस्थिहीन मांस-पिण्डके रूपमें उत्पन्न होता है। केश-श्मश्रु, लोम, नख-दन्त, शिर-धमनी, स्नायु, शुक्र—ये सब पितृज गुण होते हैं। इसी कारण स्त्रीको दाढ़ी-मूँछ, मयूरीको पूँछ, मुर्गीको कलँगी और हथिनीके दाँत नहीं होते। पुरुषमें क्यों ये कठिन पदार्थ होते हैं और स्त्रीमें क्यों नहीं होते? अमीबामें कौन स्त्री है एवं कौन पुरुष, किस प्रकार उसका वंश चला, फिर नर-मादा-भेद कैसे हुआ, अस्थिहीन और अस्थियुक्त यह भेद कैसे हुआ? इनका विकासवादमें कोई भी यथार्थ उत्तर नहीं। अत: शरीर-तुलनाकी दृष्टिसे अस्थिहीनोंका अस्थिवालोंसे कुछ भी सम्बन्ध नहीं। कहा जाता है कि ‘एक कोष्ठवाला अमीबा दो कोष्ठवाला हाइड्रा बन गया; क्योंकि विकाससिद्धान्तानुसार कोष्ठ हमेशा दुगुने परिमाणमें बढ़ता है अर्थात् एकके दो, दोके चार, चारके आठ और आठके सोलह हो जाते हैं।’ इसके अनुसार प्रत्येक उत्तरोत्तर योनियाँ आकार और वजनमें पूर्वकी अपेक्षा दूनी, चौगुनी, अठगुनी होनी चाहिये। पर ऐसा देखनेमें नहीं आता। स्थिति तो यह है कि अमीबा हर जगहसे अपने अन्दर छेद कर लेता है। इससे वह एक कोष्ठका भी नहीं प्रतीत होता। यदि एक कोष्ठ हर जगहसे फटता है तो उसका चेतन-रस—प्रोटोप्लॉज्म—बह जाना चाहिये, किंतु ऐसा नहीं होता। इस तरह अमीबासे लेकर जोड़वालोंतक और जोड़वालोंसे लेकर अस्थिवालोंतक कोई भी तुलना नहीं। स्तनोंका विज्ञान क्या है, यह भी विचारणीय है। ये स्तन नरोंमें क्यों नहीं होते, इसका कोई उत्तर नहीं। अमीबाके भी आकार-प्रकारका ज्ञान वैज्ञानिकोंको नहीं। वह एक कोष्ठवाला है या अनेक कोष्ठवाला और कोष्ठका क्या विज्ञान है, उसमें नर-मादेका क्या विज्ञान है, इन कोष्ठोंसे उत्तर योनियोंका किस प्रकार विकास होता है, यह भी विकासवादी सिद्ध नहीं कर पाते। जोड़वालों और अस्थिवालोंके बीचमें भी कोई प्राणी है या नहीं; इसे भी वे नहीं जानते। अस्थिकी उत्पत्ति विकासद्वारा असम्भव है, यह बतलाया जा चुका है। घोड़ेमें स्तनोंका अभाव क्यों, यह भी विचारणीय ही है। इस तरह शरीर-तुलना-शास्त्रसे विकास सिद्ध नहीं होता।’
परिस्थितिवश प्राणियोंके अंगोंका ह्रास-विकास कहा जाता है। ‘ओपोसम, डकबिल, पेंग्विन, मोर, ह्वेल, शुतुरमुर्गके शरीरमें ऐसे चिह्न पाये जाते हैं, जिनसे परिस्थितिवश शरीरोंमें ह्रास-विकास सिद्ध होता है।’ परंतु ‘उक्त प्राणियोंके अंगोंमें ह्रास-विकास हुआ’ यह विकासवादी किस प्रमाणसे कहते हैं? यह कहना कहीं अधिक प्रामाणिक है कि उन-उन प्राणियोंके कर्मानुसार सुख-दु:ख-भोगार्थ परमेश्वरने ही उन्हें वैसे-वैसे अंग दिये। ‘ह्वेलके पैर कमजोर हो गये; मोर, शुतुरमुर्गके पंख कमजोर हो गये; परंतु यदि इससे पहले कभी वे जोरदार पैरवाले और पंखवाले देखे गये होते तो कुछ कल्पना भी हो सकती थी। जब पानीमें तैरनेका काम देते हैं, तब इस कल्पनामें क्या प्रमाण है कि ‘पहले वह स्थलचारी था, अब पानीमें रहनेसे पैर कमजोर हो गये?’ इसी तरह मोर, शुतुरमुर्ग हैं। वे डील-डौलमें बड़े हैं, इनको पक्षियोंसे डर नहीं। फिर भी स्थलचारियोंसे बचनेके लिये उनके पंख हैं; अत: ‘परिस्थितिके कारण पैर कमजोर हैं’—यह भी कहना व्यर्थ है। आज भी कुत्ता मोरको नोच डालता है, फिर यह कैसे समझ लिया कि ‘उसका कोई शत्रु नहीं है, उड़नेका काम न पड़नेसे पंख कमजोर हो गये?’ ‘पक्षियोंसे स्तनधारी बने’ यह कल्पना भी व्यर्थ है। जब उड़नेकी अधूरी विमान-विद्यासे भी मनुष्य प्रसन्न है, तब पंख पाकर भी पक्षी उड़न-विद्याको क्यों छोड़ेंगे? ‘पक्षियोंका कोई शत्रु नहीं’ क्या ऐसा कोई समझदार व्यक्ति कह सकता है? यदि आज भी पक्षियोंके शत्रु हैं ही, तो वे अपने पंखोंको बर्बाद कर पशु क्यों बन गये? परिस्थितिसे न अंग लुप्त होते हैं और न तो नये उत्पन्न होते हैं। यदि परिस्थिति ही सब कुछ थी तो हथिनीको दाँत क्यों नहीं हुए? हथिनी और हाथी दोनों समान स्थितिमें थे ही। वस्तुत: प्राणियोंके जाति, आयु और भोग उनके कर्मानुसार ईश्वरद्वारा ही प्राप्त होते हैं।’
‘भिन्न जातियोंके मिश्रणसे वंश चलता है’ यह पक्ष भी गलत है। अनेकों जातियोंका परस्पर मैथुन व्यर्थ होता है। कुछसे संतानें उत्पन्न होती हैं, पर वंश नहीं चलता। जिनमें वंश चलता है, वे अत्यन्त भिन्न जातिके नहीं; अपितु समान जातिके ही होते हैं। सिंह-व्याघ्र एवं कुत्ते-भेड़ियेके मेलसे संतानोत्पत्ति यद्यपि होती है तो भी उनका आगे वंश नहीं चलता। देखते हैं कि घोड़े-गदहेसे खच्चर उत्पन्न होते हैं; परंतु उनसे वंश नहीं चलता। यही स्थिति कलमी आम, पेबन्दी बेरकी भी है। यदि कलमी आमसे वृक्ष पैदा हुए या सिंह-व्याघ्रके मेलसे वंश चला तो भी आगे चलकर वे मूलजातिके रूपमें ही हो जाते हैं, धीरे-धीरे या तो व्याघ्र या सिंहकी ही शकलमें हो जाते हैं। कलमी आम भी छोटा होते-होते तुख्मी आमके ही आकारका हो जाता है। विकाससे अलग जाति उत्पन्न हो सकती है, परंतु वंश नहीं चलता। बच्चा तो दो स्त्रियोंके अन्योन्य मैथुनसे भी उत्पन्न होता है; परंतु उसमें हड्डी नहीं होती, वंश नहीं चलता। अमेरिकामें विद्वान् लूथर बैंकने बहुत-से वृक्षोंकी कलमोंसे अनेक प्रकारके फल-फूल उत्पन्न किये हैं। यहाँ भी सजातीय मिश्रणसे ही संततिका सिद्धान्त स्थिर है। समान जाति और समान भोगवालोंके ही सम्बन्धसे संतान उत्पन्न होती है और वंश चलता है। अतएव मांस खानेवालों और घास खानेवालोंके सम्बन्धसे भी वंश नहीं चलता।
प्राय: जाति, आयु, भोगके साथ ही प्रसवका सम्बन्ध रहता है। भोगोंके सम्बन्धमें परिस्थितिवादी कह सकता है कि ‘अमुक जातिको जब जीनेके लिये खुराक न मिली, तब वह मांस खाने लगी।’ परंतु प्रत्येक जातिकी नियत आयुका क्या कारण है, यह विकासवादी नहीं बतला सकता। मनुष्य, बन्दर, गाय, बकरी, ऊँट, गधा और छोटे कीड़ोंकी आयुका महान् अन्तर है। मनुष्यके समान ही उससे भी बलवान् पशुओंकी सौ वर्षकी आयु क्यों नहीं, इसका उत्तर भी विकासवादसे बाहर है। विकासवादके अनुसार पृष्ठवंशधारी प्राणियोंमें कच्छप एवं सर्प भी सर्पणशीलोंकी श्रेणीमें हैं। आयुष् शास्त्रियोंके मतानुसार कछुवा १५० वर्ष जीता है और सर्प १२० वर्ष जीता है। विकासवादके अनुसार सर्पणशील प्राणी ही पक्षी बने हैं; परंतु पक्षियोंमें कबूतर ८ ही वर्ष जीता है। पक्षियोंका विकास स्तनधारी प्राणी है, उनमें शशक ८ वर्ष, कुत्ता, १४ वर्ष, घोड़ा ३२ वर्ष, बन्दर २१ और मनुष्य १०० वर्ष जीता है। यहाँ स्पष्ट ही विकासमें आयुका ह्रास हो रहा है। दीर्घायु कच्छप एवं सर्पको पराजित करनेवाला कबूतर ८ वर्ष ही जीता है। इससे भी योग्य प्राणी शशक, कुत्ता, घोड़ा भी क्रमश: ८, १४ और ३२ वर्ष ही जीते हैं। मनुष्योंका जिसे पूर्वज कहा जाता है, उस बन्दरकी आयु २१ वर्ष ही है। मनुष्य भी तो कच्छप एवं सर्पसे कम ही जीता है। विकासवादका कहना है कि ‘जीवन-संग्राममें योग्य ही रह जाता है, उसीसे नवीन जातियोंका प्रादुर्भाव होता है’, परंतु जीनेके लिये संग्राम करके विकसित होकर और योग्यता प्राप्त करके भी प्राणी उलटे मृत्युके अधिक निकट पहुँच गये। जो पहलेके और सरल रचनाके हैं, वे अधिक जीते हैं तथा जो क्लिष्ट रचनाके हैं और बादके हैं, वे कम जीते हैं। यह क्या मशीनोंका सुधार है कि जो पहली १२० या १५० वर्षकी थी, वही सुधरी हुई मशीन ८ ही वर्ष टिकने लगी। यह अच्छा यान्त्रिक विकास है।
शतमायुर्मनुष्याणां गजानां परमं स्मृतम्।
चतुस्त्रिंशत्तु वर्षाणामश्वस्यायु: परं स्मृतम्॥
पञ्चविंशति वर्षाणि परमायुर्वृषोष्ट्रयो:।
यह भी स्पष्ट है कि एक मिनटमें शशक ३८, कबूतर ३६, वानर ३२, कुत्ता २९, बकरी २४, बिल्ली २५, घोड़ा १९, मनुष्य १३, हाथी १२, सर्प ८ और कछुवा ५ बार श्वास लेता है। यह भी विचारणीय है कि ‘अभिनवतम मशीन बन जानेपर पुरानी मशीनोंका बनना बन्द हो जाता है।’ परंतु यहाँ तो मनुुष्यके विकसित हो जानेपर भी पुराने कीड़े-मकोड़ोंके बननेमें किंचिन्मात्र भी कमी नहीं हुई। मनुष्योंसे करोड़ों गुने अधिक गिजाई, मच्छर, मकोड़े तथा जलजन्तु हैं। सर्पणशील जन्तु तो पक्षी हो गये; परंतु जोड़वाले कीड़ों, भौंरों, ततैया, मक्खी आदिके पंख किस तरह हो गये? उड़नेवाली मछलियोंको पंख किस तरह पैदा हो गये? इनसे पक्षियोंके शरीरकी तुलना कैसे होगी? कृमियों, मछलियोंके साथ पक्षियोंका सम्बन्ध कैसे हुआ? क्या कोई पक्षी इन पंखधारी कीड़ों एवं मछलियोंसे वंश चलायेगा? क्या बन्दर और मनुष्यसे वंश स्थापित होगा?
यह तो हो सकता है कि पहले सादी रचनावाले प्राणी बने हों और बादमें क्लिष्ट रचनावाले प्राणी; किंतु सादी रचनावाले ही क्लिष्ट रचनावाले हो जाते हैं, यह कहना निष्प्रमाण है। वैसे तो कीटावस्थामें भी उड़नेवाले कीड़ों और मछलियोंकी पक्षियों-जैसी क्लिष्ट रचना देखी जाती है। कनखजूरे-सरीखी क्लिष्ट रचना साँपकी नहीं होती, तितलियोंकी-सी कारीगरी कौओंमें नहीं पायी जाती; परंतु विकासवादके अनुसार तितली और कनखजूरा कौवे तथा साँपसे पहले ही उत्पन्न हो गये। ऐसी स्थितिमें सादी और क्लिष्ट रचनाका कुछ भी मूल्य नहीं रहता। यदि विकासवाद तितलीकी रचनाको क्लिष्ट रचना न माने, केवल अस्थिवाले प्राणियोंकी ही रचनाको क्लिष्ट रचना कहे तो यह भी निराधार है। देखनेमें तो अस्थिवाले प्राणियोंसे वृक्षोंकी ही रचना अधिक क्लिष्ट है। विचित्र पत्रों, पुष्पों, स्तबकों, फलोंकी सुन्दरता, सरसता, मधुरता अस्थिवाले उष्ट्रमें कहाँ है? मनुष्यका शरीर भी वृक्षोंकी शाखाओं, उपशाखाओं, पल्लवों, पुष्पों, फलोंकी विचित्रताके सामने नगण्य है। एक फूलके रंग, बनावट और सुगन्धके सामने मनुष्य-रचनाका कोई महत्त्व नहीं; परंतु पशुओं, पक्षियों-जैसी स्वतन्त्रता और मनुष्य-जैसा ज्ञान वृक्षोंमें नहीं है। इसीलिये वे सादी रचनावाले समझे जा सकते हैं। कर्मानुसार प्राणी ही भोग्य और भोक्ता होता है। सादी रचनावाले भोग्य और क्लिष्ट रचनावाले भोक्ता होते हैं। वनस्पति यदि भागनेमें स्वतन्त्र हो तो पशु कैसे जी सकते हैं? घोड़ा यदि मनुष्यसे अधिक बुद्धिमान् हो तो वह सवारीके काम कैसे आ सकता है? इस व्यवस्थाके अनुसार पहले वनस्पति फिर पशु उत्पन्न होते हैं। पशुओंमें ही हाथीसे लेकर कृमिपर्यन्त आ जाते हैं, अन्तमें मनुष्यकी उत्पत्ति हुई। यह सिद्धान्त अति प्राचीन है और वेदों, उपनिषदों आदिद्वारा स्वीकृत है—भगवान्ने अपनी अजा-मायाशक्तिके द्वारा विविध प्रकारके वृक्ष, सरीसृप, पशु, खग, दंश, मत्स्य आदि शरीररूपी पुरोंको बनाया तो भी उनसे सन्तुष्ट न हुए। फिर ब्रह्मज्ञान-सम्पादनयोग्य मनुष्यको बनाकर सन्तुष्ट हुए।
सृष्ट्वा पुराणि विविधान्यजयात्मशक्त्या
वृक्षान् सरीसृपपशून् खगदंशमत्स्यान्।
तैस्तैरतुष्टहृदय: पुरुषं विधाय
ब्रह्मावलोकधिषणं मुदमाप देव:॥
(भागवत ११।९।२८)
कहा जाता है कि संसारमें जितने प्राणी मिलते हैं, सब अनादि नहीं हैं। पहले सीधी-सादी रचना हुई, पश्चात् क्लिष्ट रचनावाले प्राणी बने। भारतमें व्याघ्र, सिंह होते हैं, इंग्लैण्डमें नहीं होते। साँप, बिच्छू आदि उष्ण-प्रदेशोंमें होते हैं, यूरोपके शीत-प्रदेशमें नहीं होते। जिराफ़ अफ्रीकामें और मोर भारतमें ही होते हैं। जैसी भिन्नता पशु-पक्षियों, वनस्पतियोंमें होती है, वैसी ही मनुष्योंमें भी होती है। आस्ट्रेलियामें यूरोपियनोंके जानेके पहले खरगोश नहीं थे, बादमें जहाजसे पहुँचाये जानेपर वहाँ खरगोशोंकी बहुतायत होती गयी। गेलापेगस द्वीप विचित्र प्राणियोंके लिये प्रसिद्ध है। वहाँ गोह, गिरगिट, छिपकली, सर्प तथा पक्षी-श्रेणीके जन्तु बहुत हैं। इस प्रकारके जन्तु अफ्रीका, भारत, अमेरिकामें भी विद्यमान हैं; परंतु सबकी अपेक्षा अमेरिकाके प्राणियोंके साथ गेलापेगसवाले प्राणियोंका अधिक मेल है। ये अमेरिका-निवासियोंके वंशज हैं। अमेरिका इस द्वीपके समीप है, इससे मालूम होता है कि कभी पूर्वमें जब अमेरिका और इस द्वीपकी भूमि मिली रही होगी, तब अमेरिकासे प्राणी जाकर वहाँ रहने लगे होंगे। एक द्वीपसे दूसरे द्वीपमें, दूसरेसे तीसरेमें बसे। परिस्थितियोंके कारण कुछ भिन्नता हो जाती है। वस्तुत: वे सब एक ही पूर्वजोंकी संतति हैं। अफ्रीकाके समीप स्थित नर्स द्वीपके प्राणियोंकी अफ्रीकाके प्राणियोंके साथ बहुत कुछ तुल्यता है। प्रशान्त महासागर (पैसेफिक)-के द्वीपोंमें घोंघोंकी अनेक जातियाँ हैं। भूगर्भशास्त्री यह बतलाते हैं कि ‘पूर्वकालमें इन द्वीप-समूहोंकी भूमि एकमें जुड़ी थी। अर्थात् यह पहले महाद्वीप था, इसीसे सब घोंघोंका मेल है। सब एक ही पिताकी संतति हैं।’
किन्हीं दो देशोंके प्राणियोंकी भिन्नता और समानता दोनों प्रदेशोंकी दूरता और निकटतापर अवलम्बित है। दूर होनेसे भिन्नता होगी, समीपसे समता होगी; किंतु कभी-कभी दूरस्थ प्राणियोंमें बहुत अधिक समानता होती है। जैसे ब्रिटेन और जापानमें बहुत अन्तर होनेपर भी इन देशोंके प्राणियोंमें बहुत समानता है। आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड बहुत पास-पास हैं; परंतु वहाँके प्राणियोंमें बहुत बड़ा वैषम्य है। अत: इनकी भेदक प्रकृति ही है। यदि दो नजदीकके स्थानोंको कोई पहाड़ जुदा करे तो एक जगहके नदी-नालेवाली मछलियाँ जैसी होंगी, उसी तरहकी दूसरी जगहवाली नहीं होंगी; क्योंकि मछलियाँ पहाड़ लाँघकर नहीं जा सकतीं। इसीलिये समीप होते हुए भी उन जीवोंमें एकरूपता नहीं होती। दूर-देश होनेपर भी यदि गमनागमन रहे तो समता अधिक रहती है। ऐसे प्रमाणोंको देखकर विकासवादी कहते हैं कि ‘सब प्रकारके जीवित प्राणी एक ही जातिके आद्यवंशजोंसे उत्पन्न हुए हैं। इनके भिन्न-भिन्न रूप परिस्थितियोंके अनुरूप बनते हैं।’
परंतु उपर्युक्त बातें विकासवादके लिये भयंकर हैं। जब प्रकृति हर जगह मौजूद है, हर जगहके लिये जलवायु अनुकूल है, तब वहाँ अमीबा पैदा होकर कोई नयी जाति क्यों नहीं बना डालता? क्यों पुरानी ही सृष्टिके प्राणियोंमें विकासवादकी स्वच्छन्द प्रकृति मत्था मार रही है? भिन्न देशोंके प्राणियोंकी समता सबके एक ही वंशके होनेकी सूचना देती है, परंतु यदि भिन्न देशोंके प्राणियोंकी समता इस तरह की जाय कि बिल्ली और कुत्ता स्तनधारी एवं मांसभक्षी हैं, अत: एक देशकी बिल्ली और दूसरे देशके कुत्तेको देखकर कह दिया जाय कि दोनों ही प्राणी एक ही पिताकी संतान हैं, तो क्या ठीक होगा? किंतु यदि बुल्डॉग, ताजी आदि कुत्तोंको देखकर कहा जाय कि ‘एक ही पिताके पुत्र हैं’, तो सत्य होगा। अत: केवल रचना देखकर ही एक होनेका अनुमान नहीं किया जाना चाहिये। प्रत्युत समान प्रसव, समान भोग एवं समान आयुका मेल मिलनेसे ही दोनोंके एक पिताके संतान होनेका निर्णय किया जा सकता है।
कहा जाता है कि डार्विनको टेरोडेल्फिगोमें जब खर्वाकार मनुष्य दिखलायी पड़े, तब वह विश्वास ही न कर सका कि ये भी मनुष्य ही हैं। जब उसने गोरिल्ला और शिंपेंजी आदि वनमानुषोंको देखा, तब चिल्ला उठा कि ‘ये भी एक प्रकारके मनुष्य ही हैं।’ डार्विनके इस भ्रमका कारण यही था कि उसने केवल आकृतिसाम्यपर ही विश्वास किया; किंतु उस सृष्टि-नियममें समान-प्रसवका नियम आवश्यक है। तदनुसार खर्वाकार-दीर्घाकार मनुष्योंके संयोगसे संतति होती है; परंतु मनुष्यों और वनमानुषोंके योगसे संतति नहीं होती। अत: पहले दोनों एक जातिके हैं और दूसरे भिन्न जातिके। इसीलिये यद्यपि घोड़े और गधेमें मनुष्यों और वनमानुषोंकी अपेक्षा अधिक समानता है, फिर भी खच्चरकी वंश-परम्परा नहीं चलती। अत: घोड़े-गधे एक जातिके नहीं हैं। यह तो एक आस्तिकको स्वीकृत हो सकता है कि एक ही जगह सृष्टि हुई और वहाँसे सब जगह जा-जाकर प्राणी आबाद हुए; परंतु ‘सब अमीबाका ही विकास है’ यह सिद्धान्त सर्वथा असंगत है। जैसे विभिन्न वनस्पतियोंके बीज पृथक्-पृथक् होते हैं, वैसे ही सब प्राणियोंके बीज भी पृथक् ही थे। समानताका कारण दूरता एवं निकटता नहीं; किंतु वंश और परिस्थिति ही कारण है।
परिस्थितिके कारण ही बुल्डॉग, ताजी आदि कुत्तोंमें भेद होता है, परंतु परिस्थितिवश साँप ऊँट नहीं हो जाता। यदि एक ही प्राणीका यन्त्रोंकी तरह अनेक योनियोंमें विभाग माना जाय तो अनेक आपत्तियाँ होंगी।
१. एक कोष्ठके अमीबामें स्त्री और पुरुष यह भेद कैसे हुआ?
२. यदि अमीबाके बाद दो कोष्ठका हाइड्रा हुआ, तो क्रमसे उत्तरोत्तर सभी योनियाँ दुगुने परिमाणसे बढ़नी चाहिये अर्थात् वजन और आकार आदि उत्तरोत्तर दुगुने होने चाहिये। फिर तो मनुष्यको हाथी, ऊँट आदिसे कई गुना बड़ा होना चाहिये। पंखधारी प्राणी सर्पणशील प्राणियोंके बाद होता है, फिर तितली आदि कृमि पंखधारी कैसे हो गये? अस्थियोंकी उत्पत्ति कैसे हुई? अस्थिहीनोंसे अस्थिवालोंकी उत्पत्ति कैसे हुई? जब पक्षी, जल-जन्तु एवं कीड़ेतक मांसाहारी होते हैं, तब मांसाहारियोंका समावेश स्तनधारियोंमें ही क्यों किया गया? एक ही परिस्थितिमें उत्पन्न होनेपर भी स्त्रियोंको दाढ़ी-मूँछ क्यों नहीं? मयूरीको लम्बी पूँछ क्यों नहीं? मुर्गीके सिरपर कलँगी क्यों नहीं और हथिनीको बड़े दाँत क्यों नहीं? प्राणियोंके दाँतोंकी संख्यामें न्यूनाधिकता क्यों? घास खानेवाले स्तनधारियोंमें गाय, भैंसके ऊपरी दाँत क्यों नहीं? घोड़ेके ऊपरी दाँत भी क्यों होते हैं? कुत्तोंके दूधके दाँत क्यों नहीं गिरते? घोड़ेके स्तन क्यों नहीं होते? बैलके स्तन अंडकोषोंके पास क्यों होते हैं? पुरुषोंमें स्तनोंका क्या प्रयोजन है? घोड़ेके पैरमें परोंके चिह्न क्यों हैं? बच्चा पैदा होते समय घोड़ीकी जीभ क्यों गिर जाती है और दूसरे जानवरोंकी जीभ क्यों नहीं गिरती? स्त्री जाति अस्थियाँ क्यों नहीं उत्पन्न कर सकती? यदि यन्त्रके सिद्धान्तपर प्राणियोंका विकास हुआ है तो कछुए और साँपकी अपेक्षा पक्षी और स्तनधारी क्यों कम जीते हैं? अधिक जीनेवालोंका कम जीनेवालोंसे गर्भवास कम क्यों है? अत: परिस्थितिसे ही प्राणी एक जातिसे अन्य जातिका नहीं हो जाता। कोई प्राणी अपनी मूल-जातिसे इतनी दूर नहीं हो सकता, जहाँ समान-प्रसव, समान-भोग, समान-आयुका सिलसिला भी बन्द हो जाय। स्त्री-पुरुषकी बनावट भी परिस्थितिके सिद्धान्तका खण्डन करती है। आयुके सिद्धान्तसे ही यान्त्रिक सिद्धान्त खण्डित होता है।
श्रोत: मार्क्सवाद और रामराज्य, लेखक: श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट
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