7.11 अतिरिक्त आय और अन्तर्विरोध
मार्क्सवादियोंका कहना है कि ‘समाजकी कोई भी व्यवस्था जब पूर्ण विकासको प्राप्त हो चुकती है और उस व्यवस्थामें समाजके लिये आगे विकास करनेका अवसर नहीं रहता तो उस व्यवस्थाको तोड़नेके लिये स्वयं ही विरोधी शक्ति पैदा हो जाती है, जो उसे तोड़कर नयी व्यवस्थाका मार्ग तैयार कर देती है।’
मार्क्सवादके विचारसे ‘पूँजीवाद ऐसी अवस्थामें पहुँच चुका है कि उसकी व्यवस्थाको बदले बिना समाजका विकास आगे नहीं हो सकता, समाजकी पैदावारकी शक्तियाँ आगे उन्नति नहीं कर सकतीं। ऐतिहासिक नियमके अनुसार पूँजीवादी समाजने अपनी व्यवस्थाका अन्त कर देनेके लिये शक्तिको जन्म दे दिया है। यह शक्ति है, पूँजीवादके शोषणद्वारा उत्पन्न साधनहीन श्रेणी।’
मार्क्सवादी कहते हैं कि ‘साधनहीन श्रेणीकी संख्या समाजमें प्रति हजार ९९८ से भी अधिक है। पैदावारका केन्द्रीकरणकर पूँजीवादने इस साधनहीन श्रेणीको औद्योगिक नगरोंमें जमाकर संगठित होनेका अवसर दिया है। पूँजीवादने मशीनोंके विकासमें सहायता देकर और मशीनोंका उपयोग बढ़ाकर समाजद्वारा की जानेवाली पैदावारमें मेहनत करनेवाली श्रेणीका भाग घटाकर उसे भूखा और नंगा छोड़कर उन्हें अपने जीवनकी रक्षाके लिये लड़नेको विवश कर दिया है। इसकी जीवन-रक्षा तब हो सकेगी, जब यह श्रेणी जीवन-रक्षाके साधनोंको प्राप्त करनेकी राहपर चलेगी। इस श्रेणीका पहला संगठित प्रयत्न इस बातके लिये है कि समाजमें यह जितनी पैदावार करती है, उसमेंसे कम-से-कम निर्वाहयोग्य पदार्थ तो उसे मजदूरीके रूपमें मिल जाय।’
मार्क्सका यह सिद्धान्त काकतालीय न्यायसे भले ही घट जाय, किंतु सत्य नहीं है। अन्तर्विरोध, पिछली व्यवस्थाका विनाश, दूसरी व्यवस्थाका जन्म होनेका सिद्धान्त व्यापक नहीं है; क्योंकि मार्क्सके अभिमत ‘वर्गहीन समाज-व्यवस्थामें’ ही यह नियम व्यभिचरित है। वह भी एक व्यवस्था है ही, परंतु उन्हें उसका ‘विनाश और उसमें अन्तर्विरोध नहीं मान्य’ है। इस तरह रामराज्यवादी रामराज्यको ही अन्तिम व्यवस्था मान सकता है। मार्क्सके गुरु हीगेलका आदर्श राज्य भी ऐसा ही है, जिसमें अन्तर्विरोध नहीं होता। चीनी गणतन्त्रमें भी पूँजीवादका विनाश आवश्यक नहीं समझा गया। रामराज्यप्रणालीसे बेकारी, भुखमरी नहीं व्यापेगी। आर्थिक संकट भी नहीं आयेगा। इसीलिये मालके खपतकी कमी नहीं होगी। जैसे पूँजीपति सरकार नये-नये कामोंके लिये नयी-नयी मशीनोंका आविष्कार तथा प्रयोग कर सकती है, उसी तरह पूँजीपति व्यक्ति भी। जब एक वस्तुका उत्पादन माँगसे अधिक होने लगेगा तो दूसरी वस्तुके उत्पादनमें लग जायगा। जब दूसरे बाजार हैं नहीं, मालका उत्पादन आवश्यकतासे अधिक होता है, तब काम ठप रखनेकी अपेक्षा दूसरे कामका आरम्भ लाभदायक भी होगा। समय-समयपर व्यापारों एवं उद्योगोंमें उद्योगपति रद्दोबदल करते ही हैं, यह कोई नयी बात नहीं है।
श्रोत: मार्क्सवाद और रामराज्य, लेखक: श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट
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