7.12 सर्वहारा और क्रान्ति ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज

7.12 सर्वहारा और क्रान्ति

मार्क्सवादियोंके अनुसार ‘साधनहीन श्रेणी अपनी परिस्थितियोंके कारण मुख्यत: तीन भागोंमें बँटी हुई है, जिनमें किसान, मजदूर और निम्न, मध्यम श्रेणीके नौकरी पेशाके लोग हैं। साधनहीन श्रेणीके इन तीनों भागोंमें औद्योगिक देशोंमें मजदूर लोग संख्यामें सबसे अधिक हैं। संख्यामें सबसे अधिक होनेके अलावा उनका घरबार आदि कुछ भी शेष न रहनेसे समाजकी मौजूदा व्यवस्थासे उन्हें कुछ मोह नहीं। इनकी अवस्थामें परिवर्तन आनेसे इन्हें किसी प्रकारकी हानिका डर नहीं। औद्योगिक केन्द्रोंमें मजदूरोंके बहुत बड़ी संख्यामें एकत्र हो जानेसे उनमें संगठितरूपसे एक साथ काम करनेका भाव भी पैदा हो जाता है और नगरोंमें रहनेके कारण राजनैतिक परिस्थितियोंको भी वे बहुत शीघ्र अनुभव करने लगते हैं। पूँजीवादके विरुद्ध आनेवाली साधनहीन श्रेणीकी क्रान्तिमें ये मजदूर लोग ही अगुआ होंगे। किसान भी यद्यपि मजदूरकी तरह ही साधनहीन हैं, परंतु उनकी परिस्थिति उनके सच्चे संगठित होनेके मार्गमें रुकावट डालती है। किसान प्राय: भूमिके एक छोटेसे टुकड़ेसे बँधा रहता है, जिसपर मेहनत करके वह जो पैदा करता है, उसका केवल वही भाग उसके पास रह जाता है, जिसके बिना किसानमें परिश्रमकी शक्ति कायम नहीं रह सकती। शेष चला जाता है भूमिकी मालिक कहलानेवाली श्रेणीके लिये। किसानका शोषण भी मजदूरकी भाँति होता है और वह भी वास्तवमें मजदूर ही है, जो मिलोंमें काम न कर भूमिके टुकड़ेपर मेहनत करता है और अपने आपको साधनहीन न समझकर एक प्रकारसे भूमिके छोटेसे टुकड़ेका मालिक समझता है। भूमिके इस टुकड़ेके मोहके कारण उसे क्रान्तिसे भय लगता है। किसानोंका काम करनेका तरीका ऐसा है कि अलग-अलग काम करनेसे उनमें संगठनका भाव भी जल्दी पैदा नहीं हो पाता। नगरोंसे दूर रहनेके कारण वे बदलती हुई परिस्थितियोंको बहुत देरमें समझ पाते हैं। सामाजिक क्रान्तिद्वारा भूमिको समाजकी सम्पत्ति बनाये बिना उनका निर्वाह नहीं। उसे लाभ ही होगा, परंतु वह इस क्रान्तिमें आगे न आकर क्रान्तिकारी मजदूरोंका सहायक ही बन सकता है। बहुत सम्भव है अपने अज्ञानके कारण वह क्रान्तिका विरोध भी करने लगे, परंतु उसके हितको ध्यानमें रखकर सामाजिक क्रान्तिके मार्गपर उसे चलाना मजदूरश्रेणीका काम है।’
निम्नश्रेणीके साधनहीन, नौकरी-पेशावाले लोगोंका इस आन्दोलनमें विशेष महत्त्व है। ये लोग यद्यपि शिक्षाकी दृष्टिसे साधनहीन श्रेणीके नेता होने लायक हैं, परंतु अपने संस्कारोंके कारण यह अपने-आपको मजदूरश्रेणीसे ऊँचा तथा पृथक् समझते हैं। ये लोग अपनी शक्तिको श्रेणीके रूपमें संगठित करनेमें न लगाकर अपनी वैयक्तिक उन्नतिद्वारा अपने-आपको ऊँचा उठानेका यत्न करते हैं। ये लोग पूँजीपतियोंद्वारा साधनहीन श्रेणी किसान, मजदूरोंके शोषणमें पूँजीपतियोंका शासन कायम रखनेमें ही अपना हित समझते हैं। क्रान्ति-विरोधी और प्रतिक्रियावादी होनेका कारण इस श्रेणीका विश्वास है कि साधनहीन श्रेणीका शासन हो जानेपर इन्हें भी मजदूर बन जाना पड़ेगा। इनके जीवन-निर्वाहका दर्जा गिर जायगा। ये लोग समझते हैं कि समाजवादमें सभी लोग गरीब हो जायँगे; परंतु मार्क्सवादका विचार इससे ठीक उलटा है। उनका कहना है कि पूँजीवादमें पूँजीपतियोंके मुनाफा कमा सकने और समाजको उपयोगके पदार्थ मिल सकनेके उद्देश्योंमें अन्तर्विरोध होनेके कारण समाजमें पैदावारके साधनोंपर रुकावट न रहेगी। समाजमें इतनी पैदावार हो सकेगी कि साधारण परिश्रमसे ही सब लोगोंको अपनी आवश्यकताएँ पूर्ण करनेका अवसर रहेगा और ९९ प्रतिशत जनताकी अवस्था समाजवादमें पूँजीवादकी अपेक्षा बहुत बेहतर हो जायगी। निम्न, मध्यम श्रेणीके वे भाग जो सचेत होकर इस बातको समझ जाते हैं कि पूँजीवादी व्यवस्थामें अपने परिश्रमका फल उचितरूपसे न पा सकनेके कारण वे मजदूरश्रेणीमें मिलते जा रहे हैं और साधनहीन होनेके नाते उनके हित मजदूरों तथा दूसरे साधनहीनोंके ही समान हैं, वे साधनहीन श्रेणीके आन्दोलनमें आगे बढ़कर अगुआका काम करते हैं।
साधनहीन श्रेणियोंके आन्दोलनोंकी गतिके बारेमें मार्क्सने लिखा है, ‘साधनहीन मजदूरश्रेणीको मजदूरी और वेतनकी गुलामीमें फँसाकर उसका भयंकर शोषण हो रहा है और वह जीवनके कुछ अधिकार पा सकनेके लिये छटपटा रही है, परंतु इस श्रेणीको इन छोटे-मोटे सुधारोंके मोहमें नहीं फँसना चाहिये। उन्हें याद रखना चाहिये कि इस आन्दोलनद्वारा वे केवल पूँजीवादके परिणामोंको ही दूर करनेका यत्न कर रहे हैं। वे पूँजीवादको जो उनकी मुसीबतोंका कारण है, दूर करनेका यत्न नहीं कर रहे हैं। वे अपनी गिरती हुई अवस्थामें केवल रोक लगानेका यत्न कर रहे हैं। वे समाजकी इमारतको नये सिरेसे बनानेका यत्न न कर गिरती हुई इमारतमें टेक देनेका यत्न कर रहे हैं…….मुनासिब कामके लिये मुनासिब मजदूरीकी जगह अब उन्हें अपना यह नारा बुलन्द करना चाहिये……..‘मजदूरी और पूँजीवादी व्यवस्थाका खात्मा हो।’
मार्क्सवाद इतिहासके जिस क्रम और विचारधारामें विश्वास करता है, उसके अनुसार पूँजीवादी प्रणालीमें सुधार और लीपापोतीकी गुंजाइश बाकी नहीं। वह अपना उद्देश्य समझता है एक नवीन समाजका निर्माण। असलमें चीनके अनुभवोंसे ही मार्क्सवादियोंको मजदूरोंसे भिन्न किसान और निम्न मध्यमश्रेणीको भी साधनहीन श्रेणीमें मिलाना पड़ा। चीनकी क्रान्तिसे पहले मार्क्सवादी कहते थे—‘सर्वहाराके अधिनायकत्वमें क्रान्ति होगी। उसीसे समाजवादकी स्थापना होगी। भले ही किसानोंकी संख्या बड़ी है, तथापि वह उदीयमान नहीं है। मजदूरदल ही उदीयमान है।’ पर चीनमें कृषकोंद्वारा ही क्रान्ति हुई। सम्भवत: आगे चलकर परस्थितियोंके थपेड़ेसे मार्क्सवादियोंको अन्य आस्तिकोंके भी सिद्धान्त मानने पड़ जायँ। क्रुश्चेव तथा बुल्गानिनने भारत आकर बहुत-से भारतीय परम्पराओंका अनुगमन किया ही। यह कहा जा चुका है कि विशेषत: भारत-जैसे सांस्कृतिक देशोंमें उच्च खानदानके लोग ही परिस्थितिवश मजदूर बनकर मजदूरी करते हैं। उनमें धर्म, सभ्यता, संस्कृति तथा अपनी मर्यादाकी रक्षाका भाव रहता है। वे मजदूरी करके कुछ पैसा पाकर अपने धर्म, संस्कृति तथा माता, पिता, पुत्र, पत्नी आदि कुटुम्ब एवं कुलपरम्पराका रक्षण चाहते हैं। क्रमागत (बपौती) सभ्यता, संस्कृति, अपनी सम्पत्ति एवं मिल्कियतमें अपना जन्म-सिद्ध अधिकार मानते हैं। भारतमें मिताक्षराके अनुसार पूर्वजोंकी सम्पत्तिमें पुत्र-पौत्रोंका स्वत्व मान्य है। गर्भस्थ बालककी ओरसे भी न्यायालयमें उठायी जानेवाली स्वत्वरक्षणकी माँग मान्य होती है। तभी लोकमान्य कह सके थे कि स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। मजदूर भी चाहता है कि मेरी कमाई मेरे पुत्र-पौत्रोंको प्राप्त हो। मैं अपनी कमाईसे दान-पुण्य कर अपना लोक-परलोक बना सकूँ। केवल फाँकेमस्तीकी बात करना, होटलमें खाना तथा अस्पतालमें मरना उसे पसन्द नहीं है। किसान तथा मध्यम श्रेणीके लोग भी अपनी भूमि, सम्पत्ति, संस्कृति छोड़कर कम्युनिज्मका परतन्त्रतापूर्ण जीवन व्यतीत करना नहीं चाहते। यह उनकी समझदारी है, बेसमझी नहीं। वे कहते हैं कि यह घरफूँककी समझदारी कम्युनिष्टोंको ही मुबारक हो। व्यक्तिगत भूमि-सम्पत्ति आदिका राष्ट्रीकरण हो जानेसे सभीको सदाके लिये परतन्त्रताके बन्धनमें जकड़ जाना पड़ेगा। अपनी संस्कृति, सभ्यता एवं धर्मके विकास तथा रक्षणके लिये कोई कुछ भी न कर सकेगा। मुट्ठीभर तानाशाह कम्युनिष्टोंका निर्णय ही उनकी धर्म, सभ्यताका निर्णय समझा जायगा। मध्यम श्रेणीको यह समझानेकी आवश्यकता नहीं है कि मजदूर लोग गरीब नहीं रहेंगे। यह तो कोई भी समझ सकता है कि जिसका शासन रहता है, वह गरीब नहीं रहता।
‘मजदूरों, गरीबोंका राज्य होगा’, यह नारा तो बहुसंख्यक गरीबोंके आकर्षणके लिये ही है और इसीके द्वारा मनुष्यकी स्वाभाविक दुर्बलताओंका लाभ उठाकर ईर्ष्या-द्वेषकी वृत्ति उभाड़कर विध्वंस तथा अपहरणमें गरीबोंको प्रवृत्त करनेके लिये चेष्टा की जाती है। फिर भी समझदार गरीब मजदूर सब समझते हैं कि छीना-झपटी तथा अपहरणादिके द्वारा किसीका स्थायी उपकार एवं कल्याण नहीं हो सकता। दूसरोंको बिना सताये, धर्मका बिना उल्लंघन किये थोड़ा भी धन बरक्‍कत और शान्तिका कारण होता है। बेईमान, विधर्मी लोगोंके बड़े ऊँचे-ऊँचे मनसूबे सुख-स्वप्नके मनोराज्य होते हैं। उनकी पूर्ति कभी नहीं होेती। यदि धर्मनियन्त्रित रामराज्यकी नीतिके अनुसार ईमानदारीसे धार्मिक सामाजिक संगठन हो तो सभी उत्पादनकी असुविधाएँ दूर हो सकती हैं। बेकारी, बेरोजगारी, भुखमरीकी चर्चा स्वप्नमें भी न दीखेगी। रामराज्यमें ऐसा ही था।
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना।
नहिं कोउ अबुध न लच्छनहीना॥
समुचित प्रयत्न बिना कम्यूनिज्मरूपी जादूकी छड़ीसे समस्त समस्याओंका समाधान नहीं हो सकता। जीवनमें रोटी ही सब कुछ नहीं है, धर्म तथा ईमानका भी मानव-जीवनमें महत्त्वपूर्ण स्थान है। ईमानदार व्यक्तिको मुनासिब कामके लिये मुनासिब मजदूरीकी बात तो समझमें आ सकती है, लेकिन मजदूरी भी खत्म हो, मजदूरी देनेवाला भी खत्म हो, मजदूरी ही नहीं, मजदूरी देनेवालेकी सारी सम्पत्तिके ही हम मालिक बन जायँ, यह भावना दगाबाज डाकूकी दानवी मनोवृत्ति है, सद्विचार नहीं। एक खूँखार भेड़िया या कुत्ता भी यह नहीं सोचता कि मुझे टुकड़ा देनेवाला खत्म हो जाय, उसकी सारी रोटी मुझे मिल जाय। सब जगह इमारत तोड़कर नयी इमारत ही नहीं बनायी जाती, किंतु बिना तोड़े हुए सुधारका प्रयत्न भी कर्तव्य है। कम्युनिष्टको अपने शरीर, दिल-दिमागमें फितूर है तो इसीलिये सबको खत्म नहीं किया जा सकता, किंतु विविध चिकित्साप्रणालियोंके सहारे उनके सुधारका प्रयत्न ही उचित है। इसी तरह जो व्यवस्था अच्छी है, किंतु उसमें कुछ आगन्तुक दोषोंका संसर्ग लग गया हो, वहाँ उस दोषको ही मिटानेका प्रयत्न किया जाता है। उस व्यवस्थाको ही मिटानेका प्रयत्न तो उस ढंगका है, जैसे सिरमें दर्द होनेपर दर्द दूर करनेका प्रयत्न न कर सिर काट डालनेका प्रयत्न करना। ऐसे तो सभी श्रेणियाँ राज्याधिकार पानेको छटपटा सकती हैं, छटपटाती रहेंगी; पर इसमें सिवा संघर्ष तथा अशान्तिके कुछ लाभ नहीं हो सकता। वस्तुतस्तु अधिकार तथा मोहमें न फँसकर कर्तव्यमार्गपर प्रवृत्त होनेसे अधिकार बिना बुलाये ही पीछे-पीछे दौड़ता है।
यहाँ यह स्पष्ट समझना चाहिये कि धर्महीन वस्तुत: शोषक अन्यायी चाहे पूँजीवाद हो, चाहे सर्वहाराके नामसे कुछ कम्युनिष्टोंका अधिनायकत्व हो, रामराज्यवादी दोनोंके ही विरोधी हैं, परंतु इसीलिये किसी व्यक्ति या समूहको मिटा देना कथमपि उचित नहीं है और कोयलेमें कालिमाके तुल्य बुराई या शोषण व्यक्ति या समूहका अनिवार्य स्वाभाविक धर्म नहीं है, तो कोई कारण नहीं कि बुराई या शोषण व्यक्ति या समूहके बिना मिटाये न मिट सकती हो। कोयलेसे तो मनों साबुन खर्च करनेपर भी कालिमा नहीं मिटती, परंतु जिस स्वच्छ वस्त्रमें कोयलेकी कालिमा लगी होती है, वह तो साबुन आदिसे धो लिया जा सकता है। प्राचीन वस्तु सब बुरी, नवीन अच्छी; पुराना समाज निकम्मा, नया अच्छा होगा; यह कोई नियम नहीं। कई बार नयी वस्तु पुरानीसे भी बुरी होती है। रामराज्यके विपरीत नयी व्यवस्था वैसे ही भीषण होगी, जैसे स्वस्थताके विपरीत प्लेग और कालरा। यदि रामराज्यकी कल्पना अन्धविश्वास है, तो सम्पूर्ण संसारमें सर्वहाराके नामपर कम्युनिष्टोंका अधिनायकत्व भी उनका दिमागी फितूर ही है। विश्वभरमें वर्गराज्य या शासनहीन समाजकी कल्पना तथा इच्छानुसार काम करना, इच्छानुसार वस्तु लेना इत्यादि कल्पना तो अन्धविश्वाससे भी अधिक अन्धतम विश्वास है। जैसे रूसोकी सामान्येच्छा, फिक्टेकी आदर्श विश्व सरकार, हीगेलका आदर्श राज्य केवल दिमागी चीज ठहरती है, वैसे ही मार्क्सकी वर्गहीन स्वच्छन्द राज्यकी कल्पना भी दिमागी फितूर ही है। रामराज्यकी दृष्टिमें तो कर्मानुसार फलके सिद्धान्तमें राजमार्ग निर्विवाद है। जब व्यष्टि, समष्टि जगत्, दीनदार, ईमानदार विद्वान् सत्प्रयत्नशील होगा, तब कभी भी सुखसमृद्धिका रामराज्य हो ही सकेगा।


श्रोत: मार्क्सवाद और रामराज्य, लेखक: श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट
निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें

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