11.8 स्वतन्त्रताका अवबोध ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज

11.8 स्वतन्त्रताका अवबोध

मार्क्सवादी कहते हैं कि ‘जनता जन्मत: ही स्वतन्त्र नहीं उत्पन्न होती, परंतु शनै:-शनै: स्वतन्त्रता उपार्जित कर लेती है। स्वतन्त्रता प्रकृतिपर प्रभुत्व प्राप्त करनेके लिये किये जानेवाले संघर्ष एवं वर्गसंघर्षद्वारा उपार्जित एवं विकसित की जाती है। समाजमें विभिन्न वर्गोंद्वारा वस्तुत: उपार्जित एवं अधिकृत स्वतन्त्रता एवं उस स्वतन्त्रताके बन्धन तत्तद्वर्गोंकी स्थिति एवं उद्देश्योंके अनुसार स्थूलत: एवं स्पष्टत: विभिन्न होते हैं। साररूपमें, स्वतन्त्रताका संघर्ष जनताका अपनी निजी आवश्यकताओंकी पूर्ति या सन्तुष्टि करनेमें समर्थ हो जानेका संघर्ष है। मनुष्यजाति पशुस्थितिसे उठकर स्वतन्त्रताके अवबोधके उस राजमार्गपर अनवरत गतिसे प्रगति कर रही है, जो कि वर्गवादी समाजकी ओर ले जाता है। स्वतन्त्रताके विकासकी सीढ़ियाँ नैतिकता (चरित्र या सदाचार) के विकासकी भी सीढ़ियाँ हैं।’
पर स्वतन्त्रताका अवबोध भौतिकवादमें सम्भव ही नहीं। मनुष्य स्वतन्त्रताका उपार्जन करता है, फिर भी प्रभुत्व प्राप्त करना चाहता है, शासनशक्ति प्राप्त करना चाहता है। पराधीनताराहित्य ही स्वतन्त्रता है। यह देहधारी पराधीन जीवके लिये सापेक्ष ही होती है। यों तो बकरीके गलेसे रस्सी खुल जानेपर बकरी भी स्वतन्त्र कही जा सकती है, परंतु यह स्वतन्त्रता कितनी है? बहुत छोटी-सी मंजिल है। वस्तुत: देह-इन्द्रिय-मन-बुद्धि आदि कार्यकारण-संघटन-सम्पर्कजनित आत्मनिष्ठ पारतन्त्र्यकी निवृत्ति ही स्वतन्त्रता है। तदर्थ ही विविध क्रियाओं एवं ज्ञानोंकी आवश्यकता होती है। आत्मा नित्य अखण्ड बोधरूप है। उसमें ही अनात्माका अध्यास एवं तन्मूलक ही भ्रमात्मक बन्धन होता है। क्रियाओं, ज्ञानों एवं अन्तिम परम तत्त्व-विज्ञानसे इस बन्धनकी पूर्णतया निवृत्ति होती है, उसे ही मोक्ष कहा जाता है। उसके पहले भी जिसमें जितना अधिकाधिक ज्ञान-क्रिया-शक्ति व्यक्त होती है, उतनी ही उसमें स्वतन्त्रता एवं शासनशक्ति व्यक्त होती है। संघर्ष जब विजयका जनक होता है, तब स्वतन्त्रता एवं शासन-शक्तिका कारण बनता है। जब पराजयका कारण होता है, तब परतन्त्रताका भी कारण होता है। मार्क्सवादका ‘वर्गसंघर्ष’ तो काकतालीयन्यायसे कहीं ही स्वतन्त्रताका कारण हो सकता है, अन्यथा तो अनर्थका ही कारण होता है, वस्तुत: वर्गसंघर्ष मिटाकर वर्गप्रेम फैलाकर एक वर्गको दूसरे वर्गका पोषक बनानेसे ही अधिकांशमें अनर्थ-निवृत्ति एवं स्वतन्त्रता-प्राप्ति होती है। समन्वय-सामंजस्यकी स्थापनासे ही निराकुल समाज स्वधर्मनिष्ठा तथा उपासनाके द्वारा मनकी एकाग्रताका सम्पादन करके श्रवण-मनन-निदिध्यासन-क्रमसे परम तत्त्वका साक्षात्कार करके सर्वबन्धनविमुक्त होकर पूर्ण स्वतन्त्रता भी प्राप्त कर सकता है। आवश्यकताओंकी पूर्ति एवं सन्तुष्टि भी विचार एवं संयमसे ही हो सकती है, केवल संघर्षसे नहीं। जैसे घृतकी आहुतिसे अग्निका प्रज्वलन बढ़ता ही जाता है, उसी तरह वस्तुओंकी प्राप्ति एवं संघर्षसे भी उत्तरोत्तर असन्तुष्टि बढ़ती जाती है। तृष्णा—कामनाका कभी अन्त नहीं होता। ‘जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई’ के अनुसार जैसे-जैसे लाभ बढ़ता है, वैसे-वैसे तृष्णा भी बढ़ती है—
न जातु काम: कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते॥
(मनु० २।९४; विष्णुपु० ४।१०।२३; लिङ्गपु० ६७।१७; महा० १।७५।५७)
अभीष्ट पदार्थोंके उपभोगसे काम कभी भी प्रशान्त नहीं होता; अपितु घृताहुतिसे अग्नि-ज्वालाके समान वह उत्तरोत्तर बढ़ता ही जाता है। रामराज्यके अनुसार संघर्षके स्थानपर समन्वय अपनानेसे ही सर्वत्र सुख-शान्ति सम्भव होती है—
सब नर करहिं परस्पर प्रीती।
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती॥


श्रोत: मार्क्सवाद और रामराज्य, लेखक: श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट
निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें

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