12.2 स्मृति और प्रमामें पार्थक्य
स्मृति और प्रमाका यह महान् अन्तर व्यवहारमें भी अनुभूत होता है। लोग कहते हैं कि ‘हम पुत्रका स्मरण कर रहे हैं, उसका प्रत्यक्ष अनुभव नहीं कर रहे हैं, प्रत्यक्ष अनुभव करना चाहते हैं।’ इस तरह अनुभवसिद्ध भेदके रहते यह नहीं कहा जा सकता कि स्वप्न-प्रत्ययके तुल्य जाग्रत्प्रत्यय निरालम्बन है।
स्वानुभवका अपलाप नहीं किया जा सकता। बौद्ध भी स्वानुभवविरोध-प्रसंग उपस्थित होनेके कारण ही जागरित-प्रत्ययको निरालम्बन कहनेमें असमर्थ होकर ही उसे स्वप्न-प्रत्ययके दृष्टान्तसे निरालम्बन कहनेका प्रयत्न करता है, परंतु जो जिसका स्वत: धर्म नहीं होता, वह अन्यके दृष्टान्तसे नहीं सिद्ध होता। जब अग्नि उष्णरूपसे अनुभूयमान रहता है तो जलके दृष्टान्तसे उसे शीत नहीं कहा जा सकता है। जल एवं अग्निके वैधर्म्यके समान ही स्वप्न एवं जागरितका बाध-अबाध आदि वैधर्म्य कहा ही जा चुका है।
वस्तुतस्तु स्वप्नादि प्रत्यय भी निरालम्बन नहीं है, अनिर्वचनीय प्रातीतिक पदार्थ स्वप्नादि प्रत्ययोंका भी आलम्बन है ही। उसी तरह व्यावहारिक सत्य पदार्थ जाग्रत् प्रत्ययके आलम्बन होते हैं। वेदान्ती जैसे पारमार्थिक ब्रह्मके अज्ञानसे व्यावहारिक सत्य प्रपंचकी सृष्टि मानते हैं, वैसे ही व्यावहारिक रज्ज्वादिके अज्ञानसे प्रातिभासिक सत्य सर्पादिकी उत्पत्ति मानते हैं। अतएव जब व्यवहारमें बाधित होनेवाले स्वप्नादि प्रत्यय भी निरालम्बन नहीं हैं, तब व्यवहारमें कभी बाधित न होनेवाले जाग्रत् प्रपंच प्रत्ययको निरालम्बन कैसे कहा जा सकता है? परंतु बौद्ध संसारको न तो अज्ञानका कार्य ही मानता है और न अधिष्ठान ज्ञानसे उसका बाध ही मानता है।
बौद्धके यहाँ सम्यग्दृष्टि या प्रज्ञापारमितासे अविद्याकी निवृत्ति होती है, परंतु वह अविद्या विश्वका उपादान आदि नहीं है। किंतु असत्, क्षणिक आदिमें सत्, क्षणिक बुद्धि आदि ही अविद्या उन्हें मान्य है। अतएव वासना-वैचित्र्यसे वे विज्ञान-वैचित्र्यका उपपादन करते हैं। जैसे उनके यहाँ ज्ञान सत्य है, वैसे ही वासना भी सत्य ही है। वासनाका अधिष्ठान ज्ञानसे बाध नहीं होता है। किंतु सम्यग्दृष्टि, सम्यक् प्रयत्नसे वासना निरोधसाध्य होता है, जब कि वेदान्त मतसे ब्रह्मके सम्यक् ज्ञानमात्रसे निवर्त्य अज्ञान होता है। इस तरह वेदान्त-सिद्धान्तसे बौद्धमतका अत्यन्त भेद है।
जो बौद्धोंने कहा है कि अर्थके बिना ही वासना-वैचित्र्यसे ज्ञान-वैचित्र्य उपपन्न हो जायगा, वह भी ठीक नहीं; क्योंकि जब विज्ञानवादी बौद्धके मतमें बाह्यार्थकी उपलब्धि ही नहीं होती, तब वासना भी कैसे बनेगी? विविध अर्थोपलब्धिके अनुसार ही तो नाना प्रकारकी वासनाएँ होती हैं? जब बाह्यार्थका ज्ञान होता ही नहीं, तब किस आधारपर वासनाएँ बनेंगी? विज्ञानों और वासनाओंको अनादि माननेपर भी अन्ध परम्परा-न्यायसे वासनाओं और विज्ञानोंकी परम्परा अप्रतिष्ठित और अनवस्थित ही रहेगी।
यहाँ विज्ञानवादीका कहना है कि अर्थोपलब्धिके अभावसे वासनाओंका अभाव नहीं कहा जा सकता है; क्योंकि विज्ञानवादमें अर्थ नहीं मान्य है। अत: बाह्यार्थ एवं अर्थोपलब्धिकी व्याप्ति निश्चित नहीं हो सकती, किंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि विज्ञानवादीको भी लोकसिद्ध अन्वय-व्यतिरेकके आधारपर ही स्वप्नकी अर्थोपलब्धिको वासनाजन्य मानना पड़ेगा। उसीके दृष्टान्तसे जाग्रत्के घटादि ज्ञानोंके भी वासनाजन्य होनेका अनुमान किया जाता है। तथा च बाह्यार्थरूप कारणके रहनेपर ही अर्थोपलब्धिरूप कार्य होता है, बाह्यार्थ न होनेपर अर्थोपलब्धि भी नहीं होती। इस अन्वय-व्यतिरेकके अनुसार अर्थोपलब्धि और बाह्यार्थका ही कार्यकारणभाव मालूम पड़ता है। अर्थानपेक्ष वासना और अर्थोपलब्धिका लोकसिद्ध अन्वय-व्यतिरेक नहीं है। स्वप्न प्रत्ययकी हेतुभूत वासना भी जाग्रत्कालकी अर्थोपलब्धिके ही पराधीन होती है। इस तरह कारणका कारण होनेसे स्वप्न प्रत्ययमें भी अर्थोपलब्धि मूल है। अतएव अर्थका उपलब्धिके साथ लोकदर्शनानुसारी अन्वय-व्यतिरेक गृहीत होता है। अर्थानपेक्ष वासनाके साथ उपलब्धिका अन्वय-व्यतिरेक गृहीत नहीं होता। स्वप्नोपलब्धिकी कारणभूत वासनाका भी कारण जागरित अर्थोपलब्धि ही है। अत: अर्थ स्वप्नोपलब्धिका भी मूल है ही।
बाह्यार्थापलापी विज्ञानवादी अन्वय-व्यतिरेकसे ज्ञानको वासनानिमित्तक मानता है, अर्थनिमित्त ज्ञान नहीं मानता है, परंतु पूर्वोक्त युक्तिसे उसका खण्डन हो जाता है। अर्थोपलब्धि बिना वासनाकी उत्पत्ति होती ही नहीं, कई ऐसी नवीन वस्तुओंकी भी उपलब्धि हो सकती है, जिनकी वासना है ही नहीं। इस तरह वासना बिना भी अर्थोपलब्धि होती है, किंतु बिना अर्थोपलब्धिके वासना कभी नहीं होती देखी जाती है। इस तरह अन्वय-व्यतिरेकके द्वारा अर्थका सद्भाव ही सिद्ध होता है, बाह्यार्थका अपलाप नहीं सिद्ध होता है।
वासना एक संस्कार ही है, वह संस्कार आश्रयके बिना नहीं रह सकता है। वासनाका आश्रय बौद्ध विज्ञानवादीके मतमें प्रमाणसिद्ध नहीं है। क्षणिक आलयविज्ञान भी वासनाका आश्रय नहीं बन सकता; क्योंकि विज्ञान और वासना यदि दोनों साथ ही उत्पन्न होते हैं तो जैसे साथ उत्पन्न दायें-बायें शृंगका आधाराधेय भाव नहीं बन सकता है, वैसे विज्ञान और वासनाका भी आधाराधेय भाव नहीं बन सकेगा। यदि ज्ञान पहले उत्पन्न हो और वासना पीछे उत्पन्न हो तो भी आधाराधेय भाव नहीं बन सकता; क्योंकि आधेयकी उत्पत्तिके समयतक तो क्षणिक विज्ञान नष्ट हो चुका होता है। यदि विज्ञान वासना-उत्पत्तिके समयमें भी रहेगा तो क्षणिकत्वकी हानि होगी। आश्रयके बिना ही एक सन्तति पतित समानाकार विज्ञान ही वासना है, यह विज्ञानवादियोंका स्वगोष्ठीनिष्ठ सिद्धान्त है, प्रामाणिक नहीं। वस्तुत: वासना एक गुण है, उसका स्वसमवायी कारण ही आश्रय होता है।
विज्ञानवादी जिस आलयविज्ञानको वासनाओंका आधार मानते हैं, आखिर वह भी तो क्षणिक ही होगा? अत: जैसे प्रवृत्ति विज्ञान वासनाओंका अधिकरण नहीं हो सकता, वैसे आलयविज्ञान भी वासनाओंका अधिकरण नहीं हो सकता। अतीत, अनागत, वर्तमानमें अन्वयी एक कूटस्थ सर्वार्थदर्शी साक्षी आत्माको स्वीकार किये बिना देश-काल-निमित्तापेक्ष वासना एवं तदधीन स्मृति, प्रत्यभिज्ञा आदि कुछ भी नहीं बन सकते। यदि आलयविज्ञानको स्थिर माना जायगा तो विज्ञानवादीके सिद्धान्तकी हानि होगी। बाह्यार्थवादीकी तरह विज्ञानवादी भी क्षणिकवादी है, अत: बाह्यार्थवादके सम्बन्धमें कहे गये दूषण भी उसमें लागू होंगे ही।
शून्यवादीका कहना है ‘यदि साकारज्ञान सम्भव नहीं है और बाह्यार्थ भी न सूक्ष्म हो सकता है, न स्थूल, तब तो क्या अर्थ, क्या ज्ञान सभी वस्तु विचारासह ठहरते हैं। ज्ञान और अर्थ दोनों ही बाधित हो जाते हैं। अत: वे सत् नहीं कहे जा सकते। असत् भी नहीं हो सकते; क्योंकि असत् होनेपर उनका भान नहीं होना चाहिये। सत्-असत् उभयरूप भी नहीं कहे जा सकते; क्योंकि उनका परस्पर विरोध होता है। अनुभवरूप भी नहीं कहे जा सकते; क्योंकि सत्-असत् इस प्रकारके होते हैं कि एकका निषेध करेंगे तो दूसरेका विधान अनिवार्य हो जायगा। अत: विचारासहत्व ही वस्तुओंका रूप है। अत: शून्यवादियोंने कहा है—
इदं वस्तुबलायातं यद्वदन्ति विपश्चित:।
यथा यथार्थाश्चिन्त्यन्ते विविच्यन्ते तथा तथा॥
अर्थात् ‘वस्तुओंके स्वभावसे ही यह बात आ जाती है कि पदार्थोंका जैसे-जैसे विचार किया जाता है, वैसे-वैसे वे पृथक्-पृथक् विशीर्ण होते जाते हैं, सत्-असत् आदि किसी पक्षमें व्यवस्थित नहीं हो पाते। अत: शून्यता ही तत्त्व है।’
शून्यवादियोंका यह पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि यह सर्वप्रमाण विरुद्ध है। प्रमाणप्रसिद्ध लोक-व्यवहार अधिष्ठानभूत ब्रह्मतत्त्व साक्षात्कार बिना बाधित नहीं हो सकता। अपवादके बिना उत्सर्गकी स्थिति स्वाभाविक होती है। लौकिक-प्रमाण अपने-अपने विषय-सत्-असत्का बोधन करते हैं। उन्हीं प्रमाणोंके आधारपर सत्रूपसे यथाभूत अविपरीततत्त्वकी व्यवस्थापना होती है। इसी तरह असत्-असत् इस रूपसे यथाभूत अविपरीत तत्त्वकी व्यवस्थापना होती है। सत्-असत्को विचारासह कहनेवाले शून्यवादीका पक्ष सर्वप्रमाण विरुद्ध है।
कहा जाता है कि ‘इस विचारसे प्रमाणोंके तात्त्विक प्रामाण्यका ही खण्डन किया जाता है, सांव्यावहारिक प्रामाण्यका खण्डन नहीं किया जाता। तथा च भिन्नविषयक होनेसे प्रमाण विप्रतिषेध नहीं होगा, किंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि प्रमाण स्वविषयमें प्रवर्तमान होते हुए ‘यह तत्त्व है’ इस रूपसे ही प्रवृत्त होते हैं। बाधकज्ञानसे ही उनके विषयकी विपरीतता दिखाकर अतात्त्विकता सिद्ध की जाती है। जैसे यह शुक्ति है रजत नहीं, सूर्यकिरण है जल नहीं, एक चन्द्र है, दो नहीं, इत्यादि स्थलोंमें बाधका अधिष्ठान ज्ञानोंसे यह रजत है, यह जल है इत्यादि ज्ञानोंके विषयोंकी विपरीतता दिखलाकर अतात्त्विकता सिद्ध की जाती है। वैसे बाधकज्ञानके द्वारा समस्त प्रमाण-गोचर पदार्थोंके विपरीत तत्त्वान्तरकी व्यवस्थापना करके ही प्रमाणोंकी अतात्त्विकता सिद्ध की जा सकती है।’
निष्कर्ष यह है कि प्रपंचको अतात्त्विक सिद्ध करनेके लिये अधिष्ठानभूत वस्तुतत्त्व आवश्यक है, परंतु शून्यवादी तो भ्रमको निरधिष्ठान ही कहता है; क्योंकि उसके अनुसार तो प्रमाणोंके द्वारा तत्त्वकी उपलब्धि होती ही नहीं। इसी अभिप्रायसे भगवान् व्यासने कहा है—‘नाभावोऽनुपलब्धे:’ अर्थात् अधिष्ठानभूततत्त्व शून्यवादमें सम्भव नहीं है; क्योंकि उसके अनुसार किसी प्रमाणसे तत्त्वका उपलम्भ होता ही नहीं। जो अप्रामाणिक होगा, उसे तत्त्व कैसे कहा जा सकता है?
आजकलके बौद्ध बुद्धके मौनके आधारपर कहते हैं कि ‘बुद्धको मनोवचनातीत एक अधिष्ठानतत्त्व अभिमत था। जैसे वैदिकोंके यहाँ कहा जाता है ‘अवचनेनैव प्रोवाच ह’ अर्थात् आचार्यने अवचनसे ही तत्त्वका उपदेश कर दिया।’
चित्रं वटतरोर्मूले वृद्धा: शिष्या: गुरुर्युवा।
गुरोस्तु मौनं व्याख्यानं शिष्यास्तु छिन्नसंशया:॥
अर्थात् ‘वटवृक्षके नीचे एक आश्चर्य देखा गया है, वहाँ एक युवा गुरु तथा बहुत-से वृद्ध शिष्य बैठे हैं। गुरुके मौन व्याख्यानसे ही शिष्योंके सब संशय दूर हो गये।’
वस्तुत: वैदिकोंके इस मौनव्याख्यानको ही बुद्धके मौनके साथ जोड़नेका यत्न किया गया है। किंतु वैदिकोंने स्थल-स्थलपर असद्वाद, शून्यवादका निषेध किया है। विश्वकारणरूपसे एवं सर्वाधिष्ठानरूपसे तत्त्वका प्रतिपादन किया है। उसके सविषयत्व एवं मनोवचनगोचरत्वकी शंका दूर करनेके लिये ही कहीं भागत्यागलक्षणा, कहीं नेति-नेति, अस्थूल, अनणु आदि अतद्वॺावृत्ति तथा कहीं मौनका अवलम्बन किया गया है। शून्यवादियों एवं बुद्धके उपदेशोंमें तो सबके मूल अधिष्ठान या किसी स्थायी वस्तुका सर्वथा खण्डन ही है। सर्वसाक्षी कोई स्थायी आत्मा भी शून्यवादियोंको मान्य नहीं है। फिर भी अगर बुद्धके मौनसे निर्विशेष ब्रह्मका बोध हो तो किसी प्रतिवचन दानासमर्थ पराजितवादीके भी मौनसे अथवा अज्ञमूकके भी मौनसे अधिष्ठानब्रह्मका बोध समझा जा सकेगा।
लोकमें भी प्रसंगानुसार मौनसे तत्त्वबोध कराया जाता है। जैसे किसी नवोढासे उसके सभामें स्थित पतिको उसकी सखियाँ पूछती हैं। तो विभिन्न व्यक्तियोंपर अंगुलीसे निर्देशकर पूछती हैं कि इनमेंसे तेरे पति कौन हैं? सखियोंके विभिन्न अंगुलिनिर्देशपर नवोढा ‘नेति-नेति’ बोलती जाती है। जब ठीक उसके पतिपर ही अंगुलिनिर्देश होता है, तब वह लज्जित होकर मौन हो जाती है। बस, इस मौनसे ही सखियाँ समझ लेती हैं कि इसका पति यही है। इसी तरह विश्वकारण विश्वके अधिष्ठानका प्रत्यगभिन्न परमात्माका अनेक श्रुति, युक्ति आदि प्रमाणोंसे प्रतिबोधित कर देनेके बाद भागत्याग इतर निषेधके अनन्तर मौनद्वारा सर्वनिषेधावधि, सर्वनिषेधाधिष्ठान तथा सर्वनिषेधसाक्षीका बोध कराया जाता है।
ये सब बातें शून्यवादमें सम्भव नहीं; बुद्धने किसी मूलकारण या मूलतत्त्वका प्रतिपादन नहीं किया, प्रत्युत उन्होंने सभी स्थायी पदार्थोंका सर्वथा निषेध किया है। आत्मातकका निषेध किया है, कारणभूत ईश्वरका ही खण्डन किया है। उन्होंने सभी सत्को क्षणिक माना है। उन्होंने तो अपने मौनका स्पष्ट अर्थ बतलाया भी है कि ‘ऐसे विषयोंपर विचार करना व्यर्थ है। इनका विचार लाभदायक न होकर हानिकारक ही है। पुनर्जन्म होता है या नहीं, लोक शाश्वत है या नहीं, आत्मा देहसे भिन्न है या नहीं इत्यादि विचार व्यर्थ हैं।’ फिर भी बुद्धके मौनसे उनके स्पष्ट कथनके विरुद्ध कूटस्थ अधिष्ठान आत्माको स्वीकार करना शुद्धरूपसे बुद्धके नामपर उनके साथ बेईमानी करनी है।
इसके अतिरिक्त प्रमाण बिना भी यदि कोई पदार्थ स्वीकार्य हो तो फिर प्रमा-प्रमेय-व्यवस्था ही व्यर्थ होगी। तब तो स्वानुभवके नामपर, समाधिके नामपर कोई कुछ भी मनमानी पदार्थ सिद्ध करता फिरेगा!
यों तो कपिल, वसिष्ठ, व्यास, गौतम, कणाद सभी समाधिसम्पन्न थे। सभी स्वानुभवकी बात कर सकते थे, परंतु प्रमाणविरुद्ध अर्थ कोई माननेको तैयार नहीं हो सकता है। वेदान्ती तो अनादि, अपौरुषेय पुरुषाश्रित भ्रमादि दोषशून्य वेद तथा वेदमूर्धन्य उपनिषद्रूप परम प्रमाणके आधारपर अधिष्ठान ब्रह्म सिद्ध करते हैं। विधिमुख भागत्याग एवं अतन्निषेधके द्वारा वेदान्तोंका ही नहीं; अपितु सभी वेदोंका पर्यवसान ब्रह्ममें ही कहा गया है। ‘सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति’ ‘वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्य:।’ अर्थात् सभी वेदोंका महातात्पर्य ब्रह्ममें ही है। प्रत्यक्ष-अनुमान आदिके द्वारा भी वेदान्ती अधिष्ठानभूत ब्रह्मकी सिद्धि करते हैं। निषेध आदिके द्वारा तो केवल अधिष्ठानकी निर्विशेषता आदि ही सिद्ध की जाती है। अस्तु!
शून्यवादीसे यदि प्रश्न हो कि ‘प्रपंचकी अतात्त्विकता धर्मिभूत प्रपंचग्राहक प्रमाणोंसे ही सिद्ध होती है अथवा प्रमाणान्तरसे? पहला पक्ष संगत नहीं है; क्योंकि धर्मिग्राहक प्रमाण तो अपने विषयकी तात्त्विकताका ही प्रतिपादन करते हैं। दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है; क्योंकि बाधक प्रमाणज्ञान अधिष्ठानका ही ज्ञान हो सकता है, परंतु तात्त्विक अधिष्ठानगोचर कोई प्रमाण शून्यवादीको मान्य नहीं। उसके मतमें तो जो भी पदार्थ हैं, सभी निस्तत्त्व नि:स्वभाव हैं।’
शून्यवादी कहता, भले ही अधिष्ठानतत्त्वका बोध न हो, परंतु प्रत्यक्षादिप्रमित वस्तुगत विचारासहत्व ही बाधक प्रमाण है। इसीके द्वारा प्रपंचकी निस्तत्त्वता बोधित हो जायगी, किंतु यह भी ठीक नहीं; क्योंकि विचारासहत्व क्या है, यह भी विचार आवश्यक है। क्या विचारासहत्वका यह अभिप्राय है कि ‘यद्यपि सत्-असत् आदि पक्षोंमें अन्यतमस्वरूप वस्तु धर्म है, तथापि वह विचारसह अथवा विचारासहत्वरूपसे निस्तत्त्व शून्यरूप है? पहला पक्ष ठीक नहीं है; क्योंकि सत्-असत् आदिरूप तत्त्व शून्यवादीको मान्य ही नहीं है। फिर जो वस्तु परमार्थत: सत्-असत् आदि पक्षोंमें ही किसी पक्षकी है तो वह सत्-असत् आदि किसी पक्षमें ही निर्दिष्ट होगी, तब वह विचारासह कैसे? जो सत् या असत् है, वह प्रमाण-गोचर होने विचारासह तो है ही? यदि वह विचार सहन नहीं कर सकती तो सत्-असत् आदि पक्षोंमें किसी पक्षकी नहीं हो सकती। यदि किसी पक्षकी है तो विचारासह कैसे? यदि यह कहा जाय कि निस्तत्त्व ही विचारासहत्व है तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि बिना किसी तत्त्वका व्यवस्थापन किये किसी वस्तुको निस्तत्त्व नहीं कहा जा सकता है। जैसे शुक्तितत्त्वके व्यवस्थापनसे ही रजतकी निस्तत्त्वता कही जाती है, वैसे किसी ब्रह्म आदि तत्त्वकी व्यवस्थापनाद्वारा ही प्रपंचकी निस्तत्त्वता कही जा सकती है, अन्यथा नहीं।’
यदि कहा जाय कि निस्तत्त्वता ही भावोंका तत्त्व है तो यह भी ठीक नहीं। तब तो तत्त्वाभाव ही निस्तत्त्वता हुई और शून्यवादीके अनुसार तत्त्वाभाव भी तो विचारासह ही होगा? साथ ही आरोपित पदार्थका ही निषेध होता है और आरोपका अधिष्ठान ही तत्त्व हुआ करता है, यह शुक्ति रजतादिमें दृष्ट है। जब कोई तत्त्व है ही नहीं, तब किसमें किसका आरोप होगा? इस तरह निष्प्रपंच-परमार्थ सद्ब्रह्म ही अनिवार्य प्रपंचरूपमें आरोपित होता है, यही मानना उचित है। बाधक प्रमाणद्वारा तत्त्व-व्यवस्थापन करके प्रमाणोंका अतात्त्विकत्वरूप व्यावहारिक प्रामाण्य व्यवस्थापित हो सकता है।
अतएव भगवान् भाष्यकारका कहना है कि वैनाशिकमत उपपत्तिकी दृष्टिसे जितना देखा जाता है, उतना ही बालूके कूपकी तरह ढहता चला जाता है। बाह्यार्थवाद, विज्ञानवाद, शून्यवाद आदि परस्पर विरुद्ध वादोंका उपदेश करते हुए बुद्धने असम्बद्ध प्रलापिता ही ख्यापित की है अथवा प्रजामें व्यामोह फैलानेकी दृष्टिसे ही बुद्धने इस प्रकारका तत्त्वोपदेश किया है, ऐसा ही पुराणोंमें प्रसिद्ध है।
इसी तरह नैरात्मवाद स्वीकार करना साथ ही समस्त वासनाओंके आधारभूत आलयविज्ञानको अक्षर आत्मा मानना भी परस्पर विरुद्ध है।
जैनियोंके मतानुसार संसारी और मुक्त—ये दो प्रकारके जीव हैं। संसारी भी समनस्क और अमनस्क-भेदसे दो प्रकारके हैं। कोई लोग जीव, अजीव, आसव, बन्ध, संवर, निर्जर और मोक्षरूप तत्त्व मानते हैं। इस तरह पंचास्तिकाय भी इन्हींका विस्तार है। उनमें और भी बहुत प्रकारके भेद हैं। वे लोग प्रत्यक्ष और अनुमान—यही दो प्रमाण मानते हैं। ‘सर्वत्र स्यादस्ति, स्यान्नास्ति, स्यादस्ति च नास्ति च, स्यादवक्तव्य:, स्यादस्ति चावक्तव्य:, स्यान्नास्ति चावक्तव्य:, स्यादस्ति च नास्ति चावक्तव्य:’ (सर्वदर्शनसं० आर्हत-दर्शन ४७) इस सप्तभंगि-न्यायको मानते हैं। इसी प्रकार नित्यत्वादिमें भी इसी न्यायको प्रयुक्त करते हैं। वे शरीरपरिमाण ही आत्मा मानते हैं। कर्माष्टक जीवको बद्ध करता है। समस्त क्लेश और तद्विषयिणी वासनाएँ जिसकी विगलित हो चुकी हैं, जिसका ज्ञान आवरणरहित हो गया है और जिसे एकतान सुख प्राप्त हो गया है, ऐसे आत्माके ऊपरके देशमें अवस्थानको कोई मोक्ष कहते हैं। किन्हींके मतानुसार जीव गमनशील है और धर्माधर्मास्तिकायसे वह बद्ध है। उससे छूटनेपर उसका ऊपर जाना ही मोक्ष है।
‘क्षित्यंकुरादिकर्तृत्वेन एक ईश्वर सिद्ध नहीं होता’ ऐसा किन्हींका कथन है; क्योंकि प्रपंचमें कार्यत्व सिद्ध नहीं है। यदि सावयवत्वेन कार्यत्वकी सिद्धि कही जाय, तो विकल्पासह होनेसे वैसा नहीं कहा जा सकता। जैसे कि वह सावयवत्व क्या है, अवयव-संयोगित्व, अवयव-समवायित्व, अवयवजन्यत्व, समवेतद्रव्यत्व या सावयवबुद्धिविषयत्व? आकाशमें अनैकान्तिक होनेके कारण अवयवसंयोगित्व नहीं कहा जा सकता। सामान्य (जाति) आदिमें अनैकान्तिक होनेसे अवयव-समवायित्व भी नहीं कहा जा सकता। साध्यसम होनेसे अवयवजन्यत्व भी सावयवत्व नहीं हो सकता। विकल्पासह होनेसे समवेतद्रव्यत्वरूप चतुर्थ पक्ष भी ठीक नहीं। जैसे कि समवायसम्बन्धमात्रवत् द्रव्यत्व समवेतद्रव्यत्व है अथवा अन्यत्र समवेत द्रव्यत्व? आकाशादिमें व्यभिचार होनेसे प्रथम पक्ष नहीं कहा जा सकता; क्योंकि आकाशमें गुणादिसमवायत्व और द्रव्यत्व दोनों सम्भव हैं। साध्यसे अविशिष्ट होनेके कारण दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है। संघीभूत तन्तु ही पट है, अत: तन्तुओंमें पटसे अन्यत्व सिद्ध नहीं है, साथ ही समवाय भी असिद्ध है। आत्मा आदिमें अनैकान्तिक होनेके कारण सावयवबुद्धिविषयत्वरूप पाँचवाँ पक्ष भी ग्राह्य नहीं हो सकता; क्योंकि सावयवत्वबुद्धिके विषय होनेपर भी आत्मामें कार्यत्व नहीं है।
फिर, एक कर्ताकी सिद्धि की जा रही है या अनेक कर्ताओंकी? यदि एककी, तो प्रासादादिमें व्यभिचार आता है; क्योंकि प्रासादादिका निर्माण एक कर्ताद्वारा निष्पन्न नहीं होता। अनेक कर्ता भी नहीं कहे जा सकते; क्योंकि बहुतोंमें कर्तृत्व माननेपर परस्पर मतभेदकी सम्भावना अनिवार्य होनेसे सामंजस्य नहीं बन सकता। सभीका सामर्थ्य यदि समान मानें, तो एकसे ही कार्यसिद्धि भी हो जायगी, फिर अन्योंका वैयर्थ्य सुतरां सिद्ध है, अत: अनेक कर्ता माननेसे भी लाभ क्या? तथा च आगम-सर्वज्ञपरम्परा अनादि होनेके कारण सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्रसे आवरणक्षय होनेसे सर्वज्ञता होती है।
यह सब कथन आपातरमणीय है। सत्त्व और असत्त्वके परस्परविरुद्ध होनेसे उनका समुच्चय न हो सकनेके कारण विकल्प होता है, किंतु वस्तुमें विकल्प सम्भव नहीं है। समस्त वस्तुओंमें निरंकुश अनेकान्तत्वकी प्रतिज्ञा करनेवालेके मतमें निर्द्धारण भी एक वस्तु ही तो मानना पड़ेगा। स्यादस्ति और स्यान्नास्ति—इन विकल्पोंका उपनिपात होनेसे अनिर्धारणात्मकता ही होगी। जीवको शरीर-परिणाम माननेपर उसे परिच्छिन्न मानना पड़ेगा, अत: आत्माकी अनित्यता भी स्वीकृत करनी पड़ेगी। शरीरोंका परिमाण भी अनवस्थित होनेसे एक मनुष्यजीव मनुष्यपरिमाणका होकर फिर कर्मवशात् जब उसे हाथीका जन्म प्राप्त होगा, तब वह समूचे हाथीके शरीरमें व्याप्त न हो सकेगा। यदि उसे चींटीका शरीर प्राप्त हुआ, तो वह उस चींटीके शरीरमें सम्पूर्णतया समाविष्ट न हो सकेगा। एक जन्ममें भी कौमार, यौवन, वृद्धावस्थामें भी उक्त दोष अनिवार्य होंगे। जीवको वे अनन्त अवयवयुक्त भी मानते हैं। ऐसी दशामें छोटा शरीर प्राप्त होनेपर उन अवयवोंका संकुचित होना और बड़ा देह मिलनेपर विकसित होना भी मानना पड़ेगा। यह भी विचार करनेपर संगत प्रतीत नहीं होता। अनन्त अवयवोंकी समानदेशता प्रतिहत होगी या नहीं? यदि प्रतिहत होगी, तो वे अनन्त अवयव परिच्छिन्नमें समाविष्ट न हो सकेंगे। यदि न होगी तो सबको एक देशमें ही अवस्थित मानना पड़ेगा। ऐसी दशामें उनमें स्थूलताका अभाव होनेसे जीव अणुपरिमाणपरिमित हो जायगा। शरीरमात्रमें परिच्छिन्नकी अनन्तता भी नहीं बन सकती। अवयवोंके आगम-अपगमसे उनकी छोटे-बड़े शरीरकी परिमाणताकी कल्पना भी असंगत है; क्योंकि अवयवके उपचय-अपचयवाला होनेपर उसे विकारवान् मानना पड़ेगा। अवयवोंमें भी प्रत्येक चेतयिता है या उनका समुदाय? इसपर लोकायतिकमतके निराकरणप्रसंगमें कही हुई आपत्तियाँ अनिवार्य हैं। बन्ध-मोक्षव्यवस्था भी उनसे सम्मत प्रत्यक्ष-अनुमानसे अवगत नहीं हो सकती।
वैशेषिक तथा नैयायिक परमेश्वरकी भी सिद्धि करते ही हैं। प्रपंचके सावयव होनेसे उसकी कार्यता सिद्ध करके उस प्रपंचके कर्ता ईश्वरको सिद्ध करते हैं। ‘पूर्वोक्त विकल्पासह होनेके कारण सावयवत्व असिद्ध है’ यह नहीं कहा जा सकता; क्योंकि ‘समवेतद्रव्यत्व सावयवत्व है’ ऐसा लक्षण करनेपर उक्त दोष प्रसक्त नहीं होते। आकाशके निरवयव होनेसे उसमें व्यभिचार सम्भव नहीं है। अवान्तर महत्त्वरूप हेतुसे भी कार्यत्वका अनुमान सुकर है। शरीरसे जन्य न होनेसे आकाशकी तरह क्षित्यंकुरादि अकर्तृक हैं—ऐसा सत्प्रतिपक्ष अनुमान नहीं हो सकता; क्योंकि शरीर विशेषण व्यर्थ है। केवल अजन्यत्वकी भी हेतुता नहीं कही जा सकती; क्योंकि वह असिद्ध है। यदि कहा जाय कि शरीराजन्यत्व रहनेपर भी कर्त्रजन्यता न रहे, तो क्या हानि है, तो इसका कोई उत्तर नहीं हो सकता। सोपाधिकत्वकी शंका भी नहीं की जा सकती; क्योंकि यदि अकर्तृक होगा, तो कार्य भी न होगा, ऐसा अनुकूल तर्क हो सकता है। यदि इतरकारकोंसे अप्रयोज्य होते हुए सकल कारकोंका जो प्रयोक्ता है, वह कर्ता होता है अथवा ज्ञानचिकीर्षा प्रयत्नोंका जो आधार है, वह कर्ता है—ऐसा कर्तृलक्षण कहा जाय, तो कर्ताकी व्यावृत्ति होनेपर तदुपहित समस्त कारकोंकी व्यावृत्ति होनेसे कारणके बिना कार्योत्पत्तिका प्रसंग उपस्थित होगा।
यदि ईश्वर कर्ता हो, तो वह शरीरी होगा, ऐसा प्रतिकूल तर्क भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि सिद्धि-असिद्धि दोनों अवस्थाओंमें व्याघात होगा। यदि ईश्वर असिद्ध होगा, तो आश्रयासिद्धि होगी और यदि आगमसिद्ध होगा, तो उसीसे उसकी कर्तृत्वसिद्धि भी हो जायगी। अवाप्तसमस्तकाम उस परमेश्वरकी करुणावशात् विश्वसृष्टिमें प्रवृत्ति माननेमें कोई आपत्ति नहीं हो सकती। वैसी दशामें ‘सुखमय हो सृष्टिकी प्रसक्ति होगी’ यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि सृज्यप्राणिकृत सुकृत-दुष्कृतके परिपाकविशेषसे सृष्टिवैषम्य उपपन्न है। कार्य होते हुए विलक्षण होनेके कारण शय्या, प्रासाद आदिके समान भूत, भौतिक पदार्थ स्वोपादानगोचर अपरोक्षज्ञानवान्से जन्य हैं, इस अनुमानसे तथा प्रपंचके निमित्तोपादान होनेके कारण प्रपंचाधारत्व, शासकत्व, प्रकाशकत्व आदिसे परमेश्वर सिद्ध होता है।
वैशेषिक लोग द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय और अभाव—ये सात पदार्थ मानते हैं। नैयायिक लोग प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान—ये सोलह पदार्थ मानते हैं। वे आत्माको ज्ञानादिगुणवान्, नित्य और व्यापक मानते हैं। जीवात्मा और परमात्मा भेदसे आत्मा दो प्रकारका मानते हैं। जीवात्माओंको अनन्त और परमात्माको एक मानते हैं। नित्यज्ञानादिगुणवान् परमेश्वर सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् है, यह तर्क तथा आगमसे सिद्ध होता है, यह बतलाया जा चुका है। इनके मतानुसार अन्धकार तेजोऽभावरूप है। दु:ख, जन्म, प्रवृत्ति, दोष और मिथ्याज्ञानमें उत्तर-उत्तरका तत्त्वज्ञानसे नाश होनेपर पूर्व-पूर्वका नाश होनेसे अपवर्ग होता है।
प्रमाणके विषयमें—चार्वाक लोग जैसे इन्द्रियजन्य ही ज्ञानको प्रमाण मानते हैं, वैसे ही उनके मतसे श्रोत्रेन्द्रिय शब्दका ही बोधन करता है, शब्दार्थको भी नहीं। शब्दार्थ सत्य है या असत्य—इसका निर्णय नहीं किया जा सकता। अनुमान व्याप्तिज्ञानसापेक्ष होता है और व्याप्ति ‘जहाँ-जहाँ धूम है, वहाँ-वहाँ अग्नि होता है’ इस प्रकार समस्त जगत्में अतीत, अनागत धूम-अग्नियोंको उपस्थापित करती है। कादाचित्क द्रष्टाको प्रत्यक्षद्वारा समस्त धूम एवं अग्नियोंका ज्ञान सम्भव नहीं है। अनुमानसे भी इनका ज्ञान सम्भव नहीं; क्योंकि अनुमान व्याप्ति-ज्ञानसापेक्ष हुआ करता है। बारम्बार सहचारदर्शनसे भी व्याप्तिज्ञान नहीं हो सकता; क्योंकि ‘अग्निके अभावमें भी कदाचित् धूम हो सकता है’ ऐसी व्यभिचार-शंकाका समस्त धूम तथा अग्नियोंका ज्ञान हुए बिना निराकरण नहीं हो सकता। बौद्ध, जैन, वैशेषिक अनुमानको भी मानते हैं। उनका आशय यह है कि अन्वय-व्यतिरेकद्वारा धूम तथा अग्निके कार्य-कारणभावका निश्चय होनेपर व्यभिचार-शंकाकी निवृत्ति हो जानेसे व्याप्तिज्ञान हो जायगा।
उनके मतमें यद्यपि शब्द समादरणीय है, तथापि प्रत्यक्ष, अनुमानसे सिद्ध पदार्थका बोधक होनेसे उसका प्रामाण्य माना जाता है, उसका स्वतन्त्र प्रामाण्य नहीं माना जाता। वैशेषिकके मतानुसार भी शब्द सर्वत्र प्रमाण नहीं है; क्योंकि उन्मत्तप्रलपितादिमें उसका अप्रामाण्य स्पष्ट है। वैशेषिक प्रमाणभूत ईश्वर या अन्य आप्तपुरुषद्वारा उच्चरित शब्दको ही प्रमाण मानते हैं। तथा च वक्ताके प्रामाण्यसे शब्दके प्रामाण्यका अनुमान होता है, अत: शब्दप्रामाण्य अनुमानप्रमाण्यके अधीन होनेसे अनुमानसे पृथक् उसका प्रामाण्य नहीं है। अनुमान और शब्द—दोनों परोक्षसामान्यविषयक हैं, अत: उनकी प्रवृत्ति सम्बन्धग्रहाधीन है। साथ ही विशेष अनन्त होनेके कारण उसका सम्बन्ध दुरवगम है। अत: धूमको देखकर जैसे अग्निका अनुमान किया जाता है, वैसे ही शब्द सुनकर उसका अर्थ अवगत होता है। यहाँ भी लिंगकी ही तरह अन्वयव्यतिरेक होते हैं। जो शब्द जिस अर्थमें प्रयुक्त देखा जाता है, वह उस अर्थका वाचक होता है। धूमके वह्निमत्त्वके समान शब्दका अर्थवत्त्व है, अत: शब्दको अनुमानके अन्तर्गत ही मानना चाहिये। यथेष्ट विनियोज्यता हस्तादि, संज्ञादि लिंगमें भी दिखायी पड़ती है। दृष्टान्त-निरपेक्षता भी समभ्यस्त अनुमानमें स्पष्ट है। अनभ्यस्त होनेपर तो अनुमान और शब्द दोनोंमें सम्बन्धस्मृतिकी सापेक्षता होती है।
कोई प्रत्यक्ष और शब्द—इन्हीं दोको प्रमाण मानते हैं। उनके मतमें अनुमान यद्यपि प्रमाण माना जाता है, तथापि वह यदि प्रमाणभूत शब्दसे प्रतिपादित अर्थका अवबोधक हो, तभी प्रमाण होता है, अन्यथा नहीं। अन्य लोग प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द—ये तीन प्रमाण मानते हैं। उनके मतमें न तो शब्द अनुमानकी अपेक्षा करता है और न अनुमान शब्दकी। वाक्यात्मक शब्द अनवगत सम्बन्धका ही बोधक होता है। नवीन विरचित श्लोकादिका श्रवण होनेपर अधिगत पद तथा उनके अर्थोंका वाक्यार्थ अवगत होता देखा जाता है। तथा च सम्बन्धाधिगममूलक प्रवृत्तिवाले अनुमानसे शब्दका साम्य नहीं है। पदात्मक शब्द यद्यपि सम्बन्धाधिगमसापेक्ष होता है, तथापि सामग्रीभेद और विषय-भेदसे उसकी अनुमानसे भिन्नता है। पद और लिंगका विषय भी भिन्न है। पदार्थमात्र पदका अर्थ होता है और अनुमान ‘अग्निमान् पर्वत:’ इत्यादि रीतिसे वाक्यार्थविषयक होता है। धर्मविशिष्ट धर्मी साध्य होता है, अत: पर्वतादिविशेष्यक प्रतिपत्तिपूर्विका पावकादिविशेषणावगति लिंगसे उत्पन्न होती है, जबकि पदसे विशेषणावगतिपूर्वक विशेष्यावगति होती है, इस तरह दोनोंका विषय-भेद स्पष्ट है। कहा गया था कि ‘अनुमानमें जैसे धर्मविशिष्ट धर्मी साध्य है, वैसे ही अर्थविशिष्ट शब्द साध्य हो’ तो यह ठीक नहीं; क्योंकि हेतु होनेके कारण शब्दकी हेतुता अनुपपन्न है। साथ ही अर्थधर्म होनेसे यदि शब्दकी पक्षधर्मता हो, तो अनवगत धूमाग्निसम्बन्ध भी जैसे अर्थधर्मताको ग्रहण करता ही है, वैसे ही अनवगत शब्दार्थ सम्बन्धको भी शब्दकी अर्थधर्मताको ग्रहण करना चाहिये, परंतु ग्रहण नहीं करता, अत: शब्दकी पक्षधर्मता नहीं कही जा सकती। शब्द और अर्थका देश तथा कालसे सामानाधिकरण्यका व्यभिचार भी है, अत: अन्वय-व्यतिरेकका उपपादन दुष्कर है।
नैयायिक लोग शब्दको स्वतन्त्र प्रमाण मानते हुए ईश्वररचितत्वेन वेदका प्रामाण्य अंगीकार करते हैं। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षको पुरुषार्थ मानते हैं। शब्दप्रमाणके बिना मूक व्यक्तिसे वाग्मी पुरुषकी विशेषता निर्णीत नहीं की जा सकती। शब्दके बिना माता-पिताका ज्ञान भी होना कठिन है। प्रत्यक्ष या अनुमानसे न तो माता-पिताका निर्णय हो सकता है और न उनके धनका पुत्रको अधिकार ही प्राप्त हो सकता है एवं च शब्दप्रमाण माने बिना लोकव्यवहार समुच्छिन्न हो जायगा। इसीलिये कहा गया है—
मतयो यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति वानरा:।
शास्त्राणि यत्र गच्छन्ति तत्र गच्छन्ति ते नरा:॥
सांख्य, योगी और कुछ नैयायिक प्रत्यक्ष, अनुमान तथा शब्द—ये तीन प्रमाण मानते हैं। नैयायिक इनके अतिरिक्त उपमान प्रमाण भी मानते हैं। अर्थापत्तिको मिलाकर पाँच प्रमाण प्राभाकर मानते हैं। अनुपलब्धिसहित छ: प्रमाण भाट्टों एवं अद्वैतियोंको सम्मत हैं। सम्भव और ऐतिह्य मिलाकर आठ प्रमाण पौराणिक मानते हैं। इनमें वैशेषिक लोग शब्दप्रमाणसे साधित अर्थको तो सत्य ही मानते हैं, पर उसे शब्दमूलक नहीं, अपितु अनुमानमूलक ही बतलाते हैं। मीमांसक लोग जैसे अर्थापत्तिसे साधित अर्थको अनुमानसे साधित करके उसमें अन्तर्भूत करते हैं, वैसे ही नैयायिक लोग भी मानते हैं, उनका कथन है कि परमेश्वरनिर्मित होनेके कारण वेद अपौरुषेय हैं और आप्तोक्त होनेसे उनका प्रामाण्य है। पौरुषेयत्ववादियोंका कहना है कि ‘तस्य ह वा एतस्य महतो भूतस्य नि:श्वसितमेतद्यदृग्वेदो यजुर्वेद:’ इस श्रुतिसे ही वेदकी उत्पत्ति परमेश्वरसे नि:श्वासवत् बतलायी गयी है। जिस प्रकार बिना आयासके नि:श्वास उत्पन्न होता है, वैसे ही आयास एवं बुद्धिसे निरपेक्ष ही वेदोंकी उत्पत्ति उक्त श्रुतिमें बतलायी गयी है। वेद यद्यपि स्थूल-सूक्ष्म, सन्निकृष्ट-विप्रकृष्ट, मूर्त-अमूर्त, चेतन-अचेतन—सर्वविध अर्थोंका अवभासक है, तथापि अचिन्त्यशक्तिसम्पन्न होनेसे परमेश्वरका अनायास वेदकर्तृत्व तो सम्भव है, किंतु बुद्धिनिरपेक्षता उपपन्न नहीं हो सकती। कुछ लोग बुद्धिनिरपेक्षताकी उपपत्तिके लिये कहते हैं कि वेद परमेश्वरसे केवल प्रकाशित हुए हैं। कोई नि:श्वसितन्यायका अनायासमात्रसे तात्पर्य मानते हैं। ‘बुद्धिसापेक्ष वाक्य-रचनामें लेशमात्र भी आयास नहीं है,’ यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि नि:श्वासमें भी प्रयत्नलेशकी आवश्यकता तो रहती ही है।
अपौरुषेयत्ववादियोंका इसपर यह कथन है कि सुप्त, प्रमत्त, अनवहित एवं अन्यमनस्क व्यक्तियोंका भी नि:श्वास देखा जाता है, अत: नि:श्वासको अवश्य ही बुद्धिप्रयत्नसे निरपेक्ष मानना चाहिये एवं च सहज होनेसे नि:श्वास जैसे अकृत्रिम होता है, वैसे ही नि:श्वासवत् आविर्भूत वेदोंकी भी सहज होनेके कारण अकृत्रिमता माननी चाहिये और उस दशामें अपौरुषेय होनेके कारण पुरुषाश्रित भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटवादि दूषणोंसे असंस्पृष्ट होनेके कारण समस्त-पुंदोषशंकाकलंकके अपास्त होनेसे वेदका स्वत:प्रामाण्य है। यहाँ अनुमानका स्वरूप इस प्रकार समझना चाहिये—सम्प्रदायाविच्छेद होते हुए कर्ता अस्मर्यमाण होनेसे आत्माके समान वेद अपौरुषेय हैं। व्यतिरेकमें—जो सम्प्रदायाविच्छेदे सति अस्मर्यमाणकर्तृक नहीं होता, वह अपौरुषेय भी नहीं होता, जैसे ‘महाभारत’ यह अनुमान है।
पौरुषेयवादियोंका कथन है कि प्रलयमें सम्प्रदायका विच्छेद हो जाता है, अत: लक्षणमें विशेषण असिद्ध है। साथ ही अस्मर्यमाणकर्तृकत्वका अर्थ क्या अप्रमीयमाणकर्तृकत्व समझा जाय या स्मरणागोचरकर्तृत्व? अप्रमीयमाणकर्तृकत्व नहीं कहा जा सकता; क्योंकि परमेश्वररूप कर्ता प्रमीयमाण है ‘तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋच: सामानि जज्ञिरे। छन्दाॸसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत॥’ (शु० यजु० ३१।७) यह श्रुति परमेश्वरसे वेदोंकी उत्पत्ति स्पष्ट बतला रही है। विकल्पासह होनेसे स्मरणागोचरकर्तृकत्व भी नहीं कहा जा सकता। जैसा कि प्रश्न उठता है कि क्या एकसे स्मरण अथवा सबसे? निश्चितपुरुषकर्तृकमें भी कर्ताका स्मरण न होनेमात्रसे किसी वस्तुकी अपौरुषेयत्वप्रसक्ति होगी, अत: प्रथम पक्ष संगत नहीं। सबसे अस्मरणको बिना सर्वज्ञके अन्य कोई जान नहीं सकता, अत: दूसरा पक्ष भी उपपन्न नहीं है। साथ ही—वाक्य होनेके कारण ‘रघुवंश’ वाक्यकी तरह वेदवाक्य पौरुष हैं और प्रमाणभूत होते हुए वाक्यस्वरूप होनेके कारण मन्वादिवाक्यके समान वेदवाक्य आप्तप्रणीत हैं, इत्यादि अनुमानोंसे वेदोंके कर्ताका निश्चय भी प्रमाणित हो रहा है।
यह नहीं कहा जा सकता कि ‘वेदस्याध्ययनं सर्वं गुर्वध्ययनपूर्वकम्। वेदाध्ययनसामान्यादधुनाध्ययनं यथा॥’ (सर्वदर्शनसंग्रह, जैमिनीय दर्शन १९) इससे उक्त अनुमान सत्प्रतिपक्षित है; क्योंकि ‘भारताध्ययनं सर्वं गुर्वध्ययनपूर्वकम्। भारताध्ययनत्वेन साम्प्रताध्ययनं यथा॥’ (सर्वदर्शन सं० १२।१९) इस प्रकार दोनों ओर समान योग-क्षेम है। ‘को ह्यन्य: पुण्डरीकाक्षान्महाभारतकृद् भवेत्’ (सर्व० जैमि० २०) इस वचनसे भारतका तो व्यासकर्तृकत्व समर्थित हो रहा है, यह भी नहीं कहा जा सकता; क्योंकि ‘ऋच: सामानि जज्ञिरे’ (शु० य० ३१।७) इत्यादिसे वेदकी भी परमेश्वरकर्तृकता श्रुत है। सामान्यवत्त्वे सति बाह्येन्द्रियग्राह्य होनेसे घटादिकी तरह शब्द भी अनित्य है। ‘वही यह गकार है’ इस प्रत्यभिज्ञाबलसे शब्दकी नित्यता नहीं कही जा सकती; क्योंकि ‘वही ये केश हैं’ इत्यादिके समान वह प्रत्यभिज्ञा नित्यतानिबन्धन नहीं, किंतु सादृश्यनिबन्धन है। अशरीरी होते हुए भी परमेश्वरकी भक्तानुग्रहार्थ लीलाविग्रह-धारणकी उपपत्तिसे कण्ठताल्वादिसापेक्ष वर्णोच्चारण भी सम्भव है, अत: वेदोंको पौरुषेय माननेमें कोई भी अनुपपत्ति नहीं है। किंतु तात्पर्य न समझ सकनेके कारण उक्त सब बातें कही जाती हैं, अत: वे सब अविचारित-रमणीय हैं।
उक्त पौरुषेयत्व क्या है? क्या पुरुषोच्चरितत्वमात्र अथवा प्रमाणान्तरसे अर्थको जानकर विरचितत्व? पुरुषोच्चरितत्वमात्र ही यदि पौरुषेयत्व है, तो हमें इष्टापत्ति है। नित्य एवं व्यापक वर्णोंकी देश-काल-पौर्वापर्यरूप आनुपूर्वी असम्भव होनेसे वर्णव्यक्तियोंकी ही कालपौर्वापर्यलक्षण आनुपूर्वी कहनी चाहिये। वर्णव्यक्तियाँ कण्ठ-ताल्वादि अभिघातजन्य ध्वन्यभिव्यक्ति-वाली हैं। तथा च नियत वर्णोंकी नियत आनुपूर्वीरूप वेदका पुरुषोच्चरितत्व सुतरां इष्ट ही है। प्रतिदिन अध्येताओंद्वारा उच्चार्यमाण वेदका पुरुषोच्चरितत्वमात्ररूप पौरुषेयत्व तो सिद्ध ही है, अत: उसकी सिद्धिका आयास व्यर्थ है। यदि प्रमाणान्तरेण अर्थज्ञानपूर्वक रचितत्वरूप पौरुषेयत्व कहें, तो विकल्पासह होनेसे वह ठीक नहीं; क्योंकि उसकी सिद्धि अनुमानसे की जायगी या आगमसे? आगमबलसे नहीं कहा जा सकता; क्योंकि प्रमाणान्तरसे जिसका अर्थ अनुपलब्ध है, ऐसे कविकल्पित वाक्यमें वाक्यत्वरूप हेतु व्यभिचरित हो जायगा। यदि ‘प्रमाणत्वे सति’ इस पदका निवेश करके अप्रमाण कविकल्पित वाक्यमें हेतुव्यभिचारका वरण किया जाय, तो भी प्रमाणान्तरके अविषयीभूत अर्थवाले वेदवाक्यमें प्रमाणान्तरेण अर्थका उपलम्भ करके विरचितत्वकी सिद्धि करना ‘मेरे मुँहमें जिह्वा नहीं है’ इस कथनके समान व्याहत है। प्रमाणान्तरसे उपलब्ध अर्थवाला होनेपर तो अनुवादक हो जायगा, जिससे अनधिगतका बोधक न होनेसे वेदका अप्रामाण्य ही सिद्ध होगा। चक्षुरादि इन्द्रियोंसे अनुपलब्ध शब्दकी अवगतिके लिये ही श्रोत्रप्रमाणकी जैसे सार्थकता है, वैसे ही प्रत्यक्ष, अनुमानसे अनधिगत धर्म आदिके अधिगमक होनेसे ही आगमप्रमाणकी सार्थकता है, अन्यथा व्यर्थ ही है—‘प्रत्यक्षेणानुमित्या वा यस्तूपायो न बुद्धॺते। एनं विदन्ति वेदेन तस्माद्वेदस्य वेदता॥’ से यह स्पष्ट है।
लीलाविग्रहधारी परमेश्वरकी भी चक्षुरादि इन्द्रियाँ अतीन्द्रिय देश, काल, स्वभाव, विप्रकृष्ट-अर्थका ग्रहण नहीं कर सकतीं; क्योंकि दृष्टानुसार ही कल्पनाका आश्रयण किया जा सकता है, जैसा कि कहा गया है—‘यत्राप्यतिशयो दृष्ट: स स्वार्थानतिलङ्घनात्। दूरसूक्ष्मादिदृष्टौ स्यान्न रूपे श्रोत्रवृत्तिता॥’ (सर्वदर्शनसं० १२।२३) सर्वज्ञको भी घ्राणशक्तिसे ही गन्धग्रहणका जैसे नियम है, वैसे ही वेदशक्तिसे ही वेदार्थग्रहणका नियम होनेपर सर्वज्ञत्वकी हानि नहीं होती। इसलिये दूसरा पक्ष भी संगत नहीं है। काठक, कालाप, तैत्तिरीय इत्यादि समाख्याएँ अध्ययनसम्प्रदायप्रवर्तकविषयक हैं। ‘तेन प्रोक्तम्’ में ‘प्रोक्तम्’ का ‘कृतम्’ यह अर्थ नहीं होता; क्योंकि वह तो ‘कृते ग्रन्थे’ से ही गतार्थ है, किंतु स्वयं या अन्यद्वारा कृत अध्यापन या अर्थान्वाख्यानसे प्रकाशित करना ही ‘प्रोक्त’ का अर्थ है। नि:श्वासवत् वेदाविर्भावका श्रवण परमेशितृकारणकत्वका ही बोधन करता है, प्रमाणान्तरसे अर्थोपलम्भनका भी बोधन नहीं करता।
जिनका यह कहना है कि प्रत्यक्षद्वारा अर्थको उपलब्ध करके अखिल वेदका ईश्वरने निर्माण किया है, उन्हें भी कहना पड़ेगा कि ईश्वरको सभी पदार्थ प्रत्यक्ष हैं, प्रत्यक्षगम्य ही नहीं, अपितु अनुमानगम्य भी। तथा च लाघवात् यही सिद्ध होगा कि अनुमानसिद्ध अर्थमूलक वेदरचना है। अपि च ईश्वरनिर्मित होनेसे वेदके प्रामाण्यकी सिद्धि और उसके सिद्ध हो जानेपर वेदप्रतिपाद्यत्वेन ईश्वरसिद्धि माननेपर अन्योन्याश्रयदोष अनिवार्य है।
‘क्षित्यङ्कुरादिकं सकर्तृकं कार्यत्वाद् घटादिवत्’ इस अनुमानसे यदि ईश्वरसिद्धि इष्ट हो, तो भी धूमसे जिस प्रकार वह्निसामान्यका अनुमान होता है, वैसे कार्यत्वहेतुसे ईश्वरसामान्यकी ही सिद्धि होगी, ईश्वरविशेषकी नहीं। वेदकर्ता तो ईश्वरविशेष है, अत: अनुमानसे उसकी सिद्धि किस तरह होगी? जिन-जिन युक्तियोंसे नैयायिक लोग वेदरचयिताका ईश्वरत्व सिद्ध करना चाहेंगे, उन्हीं-उन्हीं युक्तियोंसे बाइबिल, कुरान आदि ग्रन्थोंके निर्माताका भी परमेश्वरत्व—उन-उन ग्रन्थोंके अनुयायी—सिद्ध कर सकते हैं। तथा च इतरग्रन्थ साधारण होनेसे वेदमें पुरुषाश्रित पुंदोषसंस्पर्शकी शंका प्राप्त होनेसे उसका प्रामाण्य सिद्ध न हो सकेगा, अत: पूर्वोक्त रीतिसे वेदका अपौरुषेयत्व ही मानना चाहिये।
यदि कहा जाय कि वेदमें इन्द्र आदि व्यक्तियोंका श्रवण है, अत: उनकी उत्पत्तिके अनन्तर वेदका निर्माण होना युक्त है, तो यह ठीक नहीं; क्योंकि सृष्टि शब्दपूर्वक ही होती है, जैसा कि ‘वेदशब्देभ्य एवादौ निर्मिमिते स ईश्वर:’ (महा० शां० २३२।२६) इत्यादि स्मृतियोंमें बतलाया गया है। ‘शब्द इत चेन्नात: प्रभवात् प्रत्यक्षानुमानाभ्याम्’ (वेदान्तदर्शन १।३।२८) इत्यादि न्यायमें भी यह सिद्ध किया गया है।
वाक्यत्व हेतुसे महाभारतादिवत् वेदके पौरुषेयत्वका जो अनुमान किया गया था, वह भी ठीक नहीं; क्योंकि स्मर्यमाणकर्तृकत्वरूप उपाधि विद्यमान है। वेदमें वाक्यत्वरूप हेतुके रहनेपर भी स्मर्यमाणकर्तृकत्व नहीं है, अत: साधनाव्यापकता है। ‘वाचा विरूपनित्यया’, (तैत्ति० सं० २।६।११) अनादिनिधिना नित्या वागुत्सृष्टा स्वयम्भुवा (महा०शां० २३२।२५) ‘अत एव च नित्यत्वम्’ (वेदान्तदर्शन० १।३।२९) इत्यादि श्रुतिस्मृति-वचनोंसे वेदका नित्यत्व अवगत हो रहा है, अत: वेदकी स्मर्यमाणकर्तृकता या प्रमीयमाणकर्तृकता नहीं कही जा सकती। इसीलिये ‘न कदाचिदनीदृशं जगत्’ इत्यादि जरन्मीमांसकमतानुसार ‘सम्प्रदायाविच्छेदे सति’ इस विशेषणकी असिद्धि भी नहीं कही जा सकती। ब्रह्ममीमांसकमतानुसार भी नित्यसिद्ध वेदका सम्प्रदायप्रवर्तकत्वेन नि:श्वासवत् परमेश्वरसे प्रादुर्भाव होनेपर भी ‘प्रमाणान्तरेण अर्थमुपलभ्य विरचितत्व’ न होनेसे पूर्वकल्पीय ही वेदका आविर्भाव हुआ करता है। एतावता अद्वैतकी व्याहृति नहीं कही जा सकती; क्योंकि जीवोंकी तरह वेदका नित्यत्व आपेक्षिक अभिमत होनेसे अद्वैतका बाध नहीं होता।
ब्रह्मातिरिक्त समस्त पदार्थोंका अद्वैतसिद्धान्तानुसार मिथ्यात्व मान्य है, अत: वेदमें भी मिथ्यात्व प्रसक्त हो गया, यह नहीं कहा जा सकता; क्योंकि ‘अत्र वेदा अवेदा भवन्ति’ (बृहदा० उप०) इत्यादि प्रमाणोंसे कारणभावकी अवगति होनेपर पृथक् नामरूपका बाध इष्ट ही है। अतएव वेदप्रामाण्य मानना ही आस्तिकता कहा गया है, वेदकी सत्यता स्वीकार करना आस्तिकता नहीं बतलाया गया। इसीलिये वर्णात्मक वेदकी सत्यता माननेवाले भी चार्वाक आदिको नास्तिक कहा गया है। पूर्वोक्त नित्यत्वबोधक वचनोंका विरोध होनेके कारण ‘ऋग्वेदोऽग्निरजायत’ इत्यादिसे भी वेदकी उत्पत्ति बोधित नहीं होती, अपितु अधीत पूर्वकल्पीय एवं सुप्तप्रतिबुद्धन्यायसे संस्मृत वेदका सम्प्रदायप्रवर्तकत्व ही माना जाता है और उसीके अनुसार मन्त्रद्रष्टृत्वात् ऋषित्व भी मान्य है।
प्रत्यक्ष तथा अनुमानसे उपपन्नार्थत्वात् जो लोग वेदका प्रामाण्य अंगीकार करते हैं, उनके मतमें प्रमाणान्तरसे गतार्थ हो जाने और अनुवादक हो जानेके कारण वेदकी अनावश्यकता और अप्रमाणता स्पष्ट है। जिन प्रमाणोंसे वेदार्थकी उपपन्नार्थता विज्ञात होती है, उन्हींसे वेदार्थका भी ज्ञान हो सकता है, अत: आगमरूप प्रमाणान्तर मानना व्यर्थ ही है। अभिप्राय यह कि प्रथमोच्चरितत्व या पूर्वानुपूर्वीनिरपेक्ष उच्चरितत्व पौरुषेयत्व है। पुरुषोच्चरित होनेपर भी वेद प्रथमोच्चरित या पूर्वानुपूर्वीनिरपेक्ष उच्चरित न होनेसे पौरुषेय नहीं है। गुरूच्चारणानूच्चारण वेदका होता है, अत: पूर्वानुपूर्वीनिरपेक्ष उच्चरित नहीं होते एवं च प्रथमोच्चरितत्व भी वेदोंमें न होनेसे प्रमाणान्तरेण अर्थमुपलभ्य विरचितत्व भी उनमें नहीं है, अत: उनका अपौरुषेयत्व सिद्ध है। ‘वाचा विरूपनित्यया’ इत्यादि पूर्वोद्धृत श्रुति-स्मृतिवचनोंसे विरोध होनेके कारण ‘तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋच: सामानि जज्ञिरे’ (शु० यजु० ३१।७) इत्यादि श्रुतियोंसे वेदोंकी पौरुषेयताका साधन नहीं किया जा सकता। ‘अस्य महतो भूतस्य नि:श्वसितम्’ (छां० उप०) इस तरह नि:श्वासवत् वेदोंका आविर्भाव श्रुत होनेसे उनकी बुद्धि प्रयत्ननिरपेक्षतया अकृत्रिमता भी कही जाती है। ‘यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्वं यो वै वेदांश्च प्रहिणोति तस्मै’ (श्वेता० उप० ६।१८) इस श्रुतिमें ब्रह्माका निर्माण बतलाया गया है, पर वेदोंका तो प्रेषणमात्र ही बतलाया गया है, निर्माण नहीं; क्योंकि ‘विदधाति’ और ‘प्रहिणोति’ का अर्थ वैसा ही है। ब्रह्माका विधाता भी वेदका विधाता नहीं है, अपितु ब्रह्माके हृदयमें वह केवल नित्यसिद्ध वेदोंकी प्रेरणा करता है। अत: वेदकी अपौरुषेयता सिद्ध है।
‘मैंने कुछ नहीं जाना’ ऐसा जागनेपर लोगोंको स्मरण होता है, अत: आत्माकी चिदात्मता और अनुभूतिके बिना स्मृति बन नहीं सकती, अत: आत्माकी चिदात्मता भी ज्ञात होती है। इसलिये प्रकाशाप्रकाशात्मक खद्योत (जुगनू) के समान आत्मा चिज्जडरूप है। नित्य, निरतिशय सुखकी अभिव्यक्ति मुक्ति है। और भी अन्य नैयायिकादिसम्मत तथा स्वमतसे अविरुद्ध पदार्थ भाट्टलोगोंको स्वीकृत ही हैं। प्राभाकार और नैयायिक द्रव्यरूप होनेके कारण आकाशवत् आत्माको भी अचित् एवं चैतन्यगुणवाला मानते हैं। चैतन्यकी ही तरह इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, धर्म, अधर्म, सुख, दु:ख और संस्कारको भी आत्माके गुण ही मानते हैं। अदृष्टवशात् आत्मा और मनका संयोग होनेपर उक्त गुण आत्मामें उत्पन्न होते और उनका वियोग होनेपर नष्ट हो जाते हैं। चैतन्ययुक्त होनेसे ही आत्माको चेतन भी कह दिया जाता है। वही कर्ता-भोक्ता है। कर्मवशात् ही इस लोकके देहके समान लोकान्तरमें भी सुख-दु:खादि होते हैं। इसी प्रकार सर्वगत होनेपर भी आत्माके गमनागमनादिकी व्यवस्था भी बन जाती है। सांख्योंका कहना है कि निरंशकी उभयरूपता नहीं बन सकती, अत: आत्मा चिद्रूप ही है। जाडॺांश प्रकृतिका है। चित्के भोग तथा अपवर्गके लिये प्रकृतिकी प्रवृत्ति होती है। मूल प्रकृति, सात प्रकृतिके विकार (महत्, अहंकार और पंचतन्मात्राएँ) और सोलह विकार मानते हैं। आत्माको कूटस्थ, असंग, चेतनस्वरूप, व्यापक और अनन्त मानते हैं। सत्त्व और पुरुषकी अन्यताख्यातिसे द्रष्टा आत्माका स्वरूपमें अवस्थान मुक्ति है। बछड़ेकी विवृद्धिके लिये पय:प्रवृत्तिके समान अचेतन भी प्रकृतिकी भोगापवर्गरूप पुरुषार्थके सम्पादनार्थ प्रवृत्ति होती है। ‘क्लेश, कर्म, विपाक और आशयसे अपरामृष्ट पुरुषरूप ईश्वरसे प्रेरित हुई प्रकृति प्रवृत्त होती है’, ऐसा पातंजलों (योगियों)-का मत है।
‘अनादिनिधन, शब्दरूप अक्षर ब्रह्म ही प्रपंचरूपसे विवर्तित होता है’, ऐसा वैयाकरणोंका सिद्धान्त है। किन्हींके मतानुसार द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, विशिष्ट, अंशी, शक्ति, सादृश्य और अभाव—ये दस पदार्थ हैं। इनमें परमात्मा, लक्ष्मी, जीव, अव्याकृताकाश, प्रकृति, गुणत्रय, महत्तत्त्व, अहंतत्त्व, बुद्धि, मन, इन्द्रिय, मात्रा, भूत, ब्रह्माण्ड, अविद्या, अर्णव, अन्धकार, वासना, काल और प्रतिबिम्बभेदसे बीस द्रव्य, रूप-रसादि अनेक गुण, विहित-निषिद्ध-उदासीनभेदसे तीन प्रकारके कर्म आदि हैं। इस मतमें जीव-ईश्वरका अत्यन्त भेद मान्य है। अभेदवादिनी श्रुतियोंको वे सर्वथा औपचारिक मानते हैं।
कुछ लोग प्रमाण और प्रमेयरूप दो ही तत्त्व मानते हैं। प्रत्यक्ष, अनुमान और आगमभेदसे वे तीन प्रमाण तथा द्रव्य, गुण और सामान्यभेदसे तीन प्रमेय मानते हैं। ईश्वर, जीव, नित्यविभूति, ज्ञान, प्रकृति और काल—ये छ: द्रव्य हैं। सत्त्व, रज, तम, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, संयोग और शक्ति—ये दस गुण हैं। द्रव्य और गुण उभयरूप सामान्य है। प्रकृतिका परिणाम प्रपंच है। पर, व्यूह, विभव, अन्तर्यामी और अर्चावतारभेदसे परमेश्वरके पाँच प्रकार हैं। उसके परतन्त्र, बद्ध, मुक्त और नित्यभेदसे तीन प्रकारका जीव है। संसारी बद्ध है। श्रीमन्नारायणकी उपासनासे वैकुण्ठलोकको प्राप्त जीव मुक्त हैं। कभी भी जिन्हें संसारका स्पर्श नहीं हुआ, ऐसे अनन्त, गरुड आदि नित्यसंज्ञक हैं। शुद्ध और मिश्रभेदसे सत्त्व दो प्रकारका है। नित्यविभूतिमें शुद्ध और प्रकृतिमें मिश्र सत्त्व है। ‘अन्तर्यामिब्राह्मण’ द्वारा चिदचिच्छरीरक परब्रह्म ही चिदचिद्विशिष्ट है, जो दूसरा है। आत्मा ज्ञानगुणक होते हुए ज्ञानस्वरूप है। परमेश्वर विभु है, परंतु चित् कणरूप जीव अणुपरिमाणपरिमित हैं। प्राकृत और अप्राकृतभेदसे दो प्रकारका अचेतन काल है। चित्-अचिद्रूपसे परमेश्वरका भेदव्यपदेश होनेके कारण भेद है और अभेदव्यपदेशके कारण अभेद भी है। इस तरह भेदाभेदवादी सभी प्रकारके श्रुतिवचन स्वार्थमें अनुपचरितार्थक ही समझते हैं। इन्हींमें कोई सोपाधिक भेदाभेदवादी हैं। कोई अचिन्त्यभेदाभेदवादी हैं। कोई शुद्धाद्वैत ही तत्त्व बतलाते हैं। यहाँ ‘शुद्धाद्वैत’ का समास इस प्रकार है—‘शुद्धं च तद् अद्वैतं शुद्धाद्वैतम्’ और ‘शुद्धयो: मायासम्बन्धरहितयो: अद्वैतं शुद्धाद्वैतम्।’ इयत्तासे अनवच्छिन्न ब्रह्म ही अनवगाह्य महामहिमशाली होने और सकल विरुद्ध धर्मोंका आश्रय होनेके कारण कामधेनु, कल्पवृक्ष एवं चिन्तामणि आदिके समान स्वयं अविकृत रहकर ही अघटितघटनापटीयान्, स्वाभाविक स्वात्मयोगसे क्रीडार्थ पूर्णानन्दको तिरोभूत करके जीवरूपको ग्रहण करता है, चिदानन्दांशोंको तिरोहित करके सर्वभवनसमर्थ सदंशाश्रित मायाशक्तिसे जगद्रूप धारण करता है, आनन्दांशको किंचित्तिरोहित करके अक्षरब्रह्मरूप ग्रहण करता है और पूर्णानन्दांशका तिरोधान बिना किये ही पुरुषोत्तमरूपसे प्रादुर्भूत होता है। इसी प्रकार कोई कार्य, कारण, योग, विधि और दु:ख—ये पाँच पदार्थ मानते हैं। कोई पति, पशु और पाश—ये तीन पदार्थ ही मानते हैं। इनके मतानुसार शिव पति, जीव पशु और मल, कर्म, माया तथा रोधशक्ति पाश हैं। प्रत्यभिज्ञावादीके अनुसार जीव तथा परमात्माका ऐक्य है। जड पूर्ववत् है, किंतु आत्मासे वह भिन्न भी है और अभिन्न भी और सब पूर्ववत् है।
श्रोत: मार्क्सवाद और रामराज्य, लेखक: श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट
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