12.3 अहमर्थ और आत्मा ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज

12.3 अहमर्थ और आत्मा

देह, इन्द्रिय, मन, बुद्धि आदिसे आत्मा पृथक् है, प्रायेण यह बात अधिक दार्शनिकोंको मान्य है, परंतु अहमर्थ (मैं) आत्मा है या नहीं, इस विषयमें प्राय: विप्रतिपत्ति है। अधिकाधिक दार्शनिकोंका कहना है कि ‘अहमर्थ (मैं) ही आत्मा है, उसमें ही मैं कर्ता, मैं भोक्ता, मैं दुखी, मैं सुखी, मैं शोक-मोहसे व्याकुल, मैं शान्त, मैं धीर, मैं मूढ़ इत्यादि रूपसे जिसका अनुभव होता है, वही आत्मा है। अहमर्थ ही अनन्त उपद्रवोंसे उपद्रुत बद्ध अज्ञानी होता है। वह कर्म, धर्म, उपासना, ज्ञान आदिद्वारा ज्ञानी होकर मुक्त होता है। जागर, स्वप्न, सुषुप्ति—तीनों अवस्थाओंसे बन्ध और मोक्षकालमें एकरस अन्वयी अहमर्थ ही आत्मा है। यदि अहं-अहं इत्याकारेण अनुभूयमान अहमर्थका मोक्षमें उच्छेद हो जाय, तब तो कोई भी मोक्षके लिये प्रयत्नशील न होगा, प्रत्युत मोक्षकी कथासे ही भागेगा।’ परंतु अद्वैतवादी वेदान्तीका इसके विपरीत यह कहना है कि अहमर्थ मुख्य आत्मा नहीं है, किंतु चिज्जडकी ग्रन्थि ही ‘मैं’ या अहंरूपसे भासमान होती है। दूसरे शब्दोंमें कहा जाय तो अधिष्ठान, बुद्धि और चिदाभास—ये ही तीनों मिलकर औपाधिक जीव या ‘मैं’ आदि पदोंसे व्यपदिष्ट होते हैं। बुद्धि-आत्मा, जड-चेतन, अनात्मा-आत्माका अन्योन्याध्यास ही ‘मैं’ पदार्थ है। जैसे किसी साधारण पुरुषको शरीर, इन्द्रिय, बुद्धि आदिमें ही आत्मबुद्धि हो जाती है और वह देहादिके नाशमें ही आत्मनाश मानने लगता है, वैसे ही अनात्मरूप अहमर्थमें भी भ्रान्तिसे ही आत्मबुद्धि होती है। मैं जो कभी कर्ता, कभी भोक्ता, कभी सुखी, कभी दुखी, कभी शान्त, कभी धीर एवं कभी मूढ़ है, कभी हृष्ट-पुष्ट, प्रसन्न, कभी शोक-मोह-परिप्लुत होकर प्रतीत होता है, उसे एकरस शुद्ध स्वप्रकाश आत्मा कैसे कहा जाय? वस्तुत: इस अनेकरूप अहमर्थका जो एकरसभासक अखण्ड भानरूप नित्य बोध है, वही आत्मा है। जैसे स्वर्गादि सुख-प्राप्तिके लिये देहद्वारा प्रयत्नशील ही अग्निकुण्डमें देहकी आहुति कर सकता है, वैसे ही अहमर्थद्वारा प्रयत्नशील सोपाधिक आत्मा निरुपाधिक पदप्राप्तिके लिये सोपाधिक स्वरूपके उच्छेदमें प्रयत्नशील होता है।
इसके सिवा यदि अहमर्थ ही आत्मा होता, तो उसका तीनों ही अवस्थाओंमें प्रकाश होना उचित था; क्योंकि आत्मा स्वप्रकाश है। अहंकार, अहंबुद्धिका विषय है। आत्मा अहंबुद्धिका भी भासक साक्षीरूप है। कुछ लोगोंका कहना है कि ‘सुखमहमस्वाप्सम्, न किञ्चिदहमवेदिषम्’—‘सुखपूर्वक मैं सो रहा था, मैं कुछ भी नहीं जानता था’ इस तरह सुषुप्तिसे (सोकर) जागनेपर सौषुप्त सुखके अज्ञानकी स्मृति होती है, उसीके साथ अहमर्थ ‘मैं’ की भी स्मृति होती है। स्मृति बिना अनुभवके नहीं हो सकती, अत: ‘मैं’ का भी सुषुप्तिमें अनुभव होता ही है, परंतु उनका यह कहना उचित नहीं जान पड़ता; क्योंकि अहमर्थ सदा ही इच्छादि गुणोंसे विशिष्ट ही उपलब्ध होता है, परंतु जब कि सुषुप्तिमें इच्छादिका उपलम्भ होता ही नहीं, तब केवल अहमर्थका उपलम्भ कैसे माना जाय? गुणरहित केवल गुणीका उपलम्भ असम्भव है। जैसे रूपादिरहित घटका ज्ञान नहीं हो सकता, वैसे ही इच्छा-द्वेषादि गुणरहित अहमर्थका ज्ञान नहीं हो सकता। गुणीका ग्रहण गुण-ग्रहण बिना नहीं हो सकता। यदि कहा जाय कि एकत्व संख्यारूप गुणसे युक्त ही अहमर्थका सुषुप्तिमें अनुभव होता है तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि सुषुप्तिमें विशिष्ट बुद्धि अंगीकार करनेपर उसके सुषुप्तित्वका ही भंग हो जायगा। इसके सिवा गुणि-ग्रहणमें विशेषगुणग्रहण हेतु होता है। अत: रूपादि विशेष गुणग्रहण बिना घटादिका ग्रहण नहीं होता। यदि कहा जाय कि रूपादिरहित घटादि होते ही नहीं, इसलिये रूपादिके बिना घटादिका ग्रहण नहीं होता, तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि जिस समय पाकद्वारा पूर्वरूपका नाश हो चुका और अग्रिम रूपकी उत्पत्ति नहीं हुई, उस क्षणमें और घटाद्युत्पत्तिके अनन्तर क्षणमें रूपादिके बिना भी घटादि रहते ही हैं। ऐसी स्थितिमें गुणग्रहण बिना गुणीका ग्रहण कहाँतक हो सकता है? अत: सुषुप्तिमें निर्गुण सर्वसाक्षिरूप आत्माका ही उपलम्भ होता है, अहमर्थका नहीं। अतएव जाग्रदवस्थामें अहमर्थकी स्मृति भी अमान्य ही है। सुषुप्तिमें अज्ञानका आश्रय और प्रकाशरूपमें अनुभूयमान आत्मासे अहंकार सर्वथा भिन्न ही है। आत्मासे अहंकारकी भिन्नता होते ही उसकी जडता सिद्ध हो जाती है। जो यह कहा जाता है कि ‘अहमस्वाप्सम्’ अर्थात् मैं सोया, इस रूपसे अहमर्थका सोकर जागनेपर स्मरण होता है, वह भी ठीक नहीं; क्योंकि अहमर्थांशमें स्मरण अमान्य है। किंतु वहीं उसी एक चेतनमें अज्ञान और अहंकारके कल्पित होनेके कारण अहंकारमें अज्ञानाश्रयताकी प्रतीति होती है। अतएव ‘अहमस्वाप्सम्’ यहीं जब सुषुप्तिमें अहंकारका अनुभव बनता नहीं, तब अर्थात् अज्ञानके आश्रयरूपसे अनुभूत आत्मामें ‘अहमस्वाप्सम्’ इस परामर्शका पर्यवसान होता है। अतएव जब यह कहा जाता है कि यदि अहमर्थ स्वापका आश्रय न हो, तो केवल चित् ही हो, तब ‘चिदस्वपत् स्वयमस्वपत्’ (चित् सोया, स्वयं सोया) इस तरह सुषुप्तिका परामर्श होना चाहिये। यद्यपि अहमर्थाधिष्ठानरूप अविद्योपहित चैतन्य ही सुषुप्तिका आधार है, तथापि परामर्शकालमें अनुभूत अन्त:करण-संसर्गसे अहमाकार परामर्श बन सकता है।
जो यह कहा जाता है कि ‘सोऽहम्’ इत्याकारक प्रत्यभिज्ञान नहीं बन सकेगा; क्योंकि आत्मा स्वप्रकाश चिद्‍रूप है, अत: उसका ज्ञान कभी नष्ट न होगा। उसके बिना संस्कार न होगा और संस्कारोंके बिना प्रत्यभिज्ञा न बनेगी। अतएव विवरणाचार्यने कहा है कि अन्त:करणविशिष्ट आत्मामें ही प्रत्यभिज्ञा होती है, निष्कलंक चैतन्यमें प्रत्यभिज्ञा नहीं होती; क्योंकि मोक्षावस्थायी निष्कलंक चैतन्य तो केवल शास्त्रगम्य है। यह सब कथन पूर्वोक्त पक्षके विरुद्ध नहीं है; क्योंकि मोक्षावस्थायी आत्मा केवल शास्त्रसे ही अवगत होता है। इसलिये वचनसे ही यह कहा गया कि उपाधिमात्रविरही निष्कलंक चेतनमें प्रत्यभिज्ञाका निषेध किया गया है। अन्त:करण पद उपाधिमात्रमें तात्पर्य रखता है। तथा च सुषुप्तिमें अज्ञानोपहित आत्मा भी प्रत्यभिज्ञानार्ह (पहचाननेयोग्य) है। इसके सिवा अन्त:करणराहित्य दशामें विवरणवाक्यद्वारा प्रत्यभिज्ञाका ही निषेध है, अभिज्ञाका नहीं। देखी हुई वस्तुके फिर देखनेपर ‘यह वही है’ ऐसा पहचाननेको ‘प्रत्यभिज्ञा’ कहा जाता है और केवल ज्ञानको ‘अभिज्ञा’ कहा जाता है। सुषुप्ति दशामें अन्त:करण न होनेसे प्रत्यभिज्ञाके न होनेपर भी यहीं अविद्योपहित चेतनकी ज्ञानरूप अभिज्ञामें कोई बाधा नहीं है। अत: सुषुप्तिमें अहंकाररहित आत्माके अनुभवमें कोई भी आपत्ति नहीं उठायी जा सकती। जो यह कहा जाता है कि यदि सुषुप्तिमें अहमर्थका ग्रहण न होता, तब तो इतने समयतक मैं सोता था या अन्य कोई—‘एतावन्तं कालं सुप्तोऽहमन्यो वा’ ऐसा संशय होना चाहिये, ‘मैं ही सोया था’ ऐसा निश्चय न होना चाहिये। पर वह भी ठीक नहीं; क्योंकि सुषुप्तिकालमें अनुभूत आत्मामें ही अहंकारका ऐक्याध्यास होनेसे ‘मैं ही सोता था’ ऐसा निश्चित प्रत्यय होता है। वास्तवमें ‘अहमज्ञ:’ इत्यादि स्थलोंमें भी अज्ञान अहमर्थके आश्रित नहीं, किंतु अहंकारके अधिष्ठानभूत चैतन्यमें ही रहता है। इस तरह अज्ञान और अहंकार एक अधिकरणमें रहते हैं, अत: सामानाधिकरण्य या एकाश्रयाश्रितत्व होनेके कारण अज्ञानमें अहमर्थाश्रयत्वकी प्रतीति होती है, जैसे सामान्य, समवाय आदि और सत्ता—दोनोंका ही समान द्रव्यादि आश्रय होनेके कारण ही ‘सामान्यं सत्, समवाय: सन्’ इत्यादि व्यवहार होता है, वैसे ही ‘अहमज्ञ:’ इत्यादि व्यवहार होते हैं। ऐसी स्थितिमें जैसे कोई पहले दिन चैत्रभिन्न देवदत्तको भ्रान्तिसे चैत्र मानकर, दूसरे दिन ‘सोऽयं चैत्र:’ ऐसा प्रत्यभिज्ञान (पहचान) करता है, वैसे ही भ्रान्तिसे अज्ञानाश्रय चित‍्को भ्रान्तिसे अहमर्थ मानकर दूसरे दिन अज्ञानाश्रयत्वेन अहमर्थका प्रत्यभिज्ञान करता है।
इसके सिवा निश्चय होनेपर संशय न होनेका नियम तो है, किंतु निश्चय न होनेपर संशय होनेका नियम नहीं है। अतएव कहा गया है कि ‘सत्यारोपे निमित्तानुसरणं न तु निमित्तमस्तीत्यारोप:’ अर्थात् आरोप होनेपर उसके निमित्तका अन्वेषण होता है, यह नहीं कि निमित्तवशात् आरोप हो। जैसे कहीं जल-दर्पणादि प्रतिबिम्ब-निमित्तके रहनेपर भी प्रतिबिम्ब नहीं होता, वैसे ही निश्चयाभाव रहनेपर भी संशय नहीं होता। इसीलिये ‘अहमन्यो वा’ ऐसा सन्देह नहीं होता। फिर भी यह सन्देह होता है कि ‘जब इतने समयतक मैं स्वप्न देखता था, इतने समयतक मैं जागता था—‘एतावन्तं कालमहं स्वप्नं पश्यन्नासमहं जाग्रदासम्’ इत्यादि प्रतीतियोंके समान ही ‘अहमस्वाप्सम्’ मैं सोता था, ऐसी प्रतीति भी होती है, तब फिर क्या कारण है कि पहली दो प्रतीतियोंमें अहमर्थकी स्मृति मानी जाय और ‘अहमस्वाप्सम्’ इस प्रतीतिमें उसकी स्मृति न मानी जाय?’ पर यह भी ठीक नहीं; क्योंकि सर्वत्र स्मर्यमाण आत्माके साथ अभेदारोप होनेके कारण ही अहमर्थांशमें स्मृतित्वका अभिज्ञान होता है। अत: सुषुप्तिमें अहमर्थका अनुभव माननेका कोई भी स्थिर आधार नहीं।
यदि कहा जाय कि अपरामर्श—परामर्शभिन्नमें परामर्शत्वका आरोप कहीं नहीं देखा जाता अर्थात् स्मृतिसे भिन्नमें स्मृतित्वका आरोप नहीं देखा जाता तो वह भी ठीक नहीं; क्योंकि स्मर्यमाणरूपसे अनुभूयमान स्मर्यमाणभिन्नमें परामर्शत्वका आरोप होता ही है। अतएव इस कथनका भी कोई महत्त्व नहीं रह जाता कि यदि अहमर्थ आत्मासे भिन्न हो, तब तो ‘जो पहले दुखी था, वही अब सुखी हुआ’ इस प्रतीतिके समान ‘जो पहले मेरेसे भिन्न सोता था, वही अब मैं उत्पन्न हुआ हूँ’ ऐसा अनुभव होना चाहिये; क्योंकि जैसे दुखीरूपसे आत्माका पहले ज्ञान होता है, वैसे ‘मुझसे अन्य पहले सोया था’, ऐसा प्रथम विज्ञान ही नहीं होता। सुषुप्तिमें जैसे अहमर्थका प्रकाश नहीं होता, वैसे ही मदन्यता (मेरेसे भिन्नता)-का भी प्रकाश नहीं होता। सुषुप्तिमें अहमर्थके असत्त्वका ज्ञान नहीं होता। जागनेपर अनुभूयमान अहंकारमें सोनेके पहले कालमें गृहीत अहंकारसे अभिन्नता ही गृह्यमाण होती है। अत: अहंकारकी उत्पत्तिका बोध नहीं होता। यदि विवेकियोंको ऐसी बुद्धि होती हो, तो इष्ट ही है। उन्हें तो यह ज्ञान होना ही चाहिये कि सुषुप्तिमें अहमर्थ नहीं था। प्रबोध होनेपर सुषुप्तिके अधिष्ठान चैतन्यमें ही अहमर्थका अध्यास होता है। उसीमें सोनेसे पहलेके अहमर्थका अभेद प्रतीत होता है। इसपर कुछ लोगोंका कहना है कि ‘जब अहमर्थ आत्मासे भिन्न सिद्ध हो जाय, तभी स्मर्यमाण आत्मामें अहमर्थके ऐक्यका आरोप होगा और जब वैसा आरोप सिद्ध हो जायगा, तब सुषुप्ति अहमर्थके अप्रकाश होनेसे उसकी आत्मासे भिन्नता सिद्ध होगी। इस तरह अन्योन्याश्रय-दोष अनिवार्य होगा।’ पर यह ठीक नहीं; क्योंकि आत्मासे भिन्नता-सिद्धिके पहले ही सुषुप्तिमें अहमर्थका अप्रकाश सिद्ध हो जाता है। ‘अहमस्वाप्सम्’ इसीको आत्मपरामर्श मान लेनेसे दृष्टहान और अदृष्टकी कल्पना भी नहीं करनी पड़ेगी। अहं शब्दका गौणार्थ देहादि है। मुख्यार्थ अन्त:करण और आत्माका अन्योन्याध्यासरूप चिज्जडग्रन्थि है और लक्ष्यार्थ आत्मा है। यदि सुषुप्तिमें अहमर्थका ग्रहण होता, तब तो उसका भी उसी तरह स्मरण होता, जैसे गतदिनके अहमर्थका स्मरण होता है। इसे इष्टापत्ति नहीं कहा जा सकता; क्योंकि पूर्व दिनमें जैसे इच्छादिविशिष्ट आत्मा गृहीत हुआ है, वैसे ही सौषुप्त आत्माका भी परामर्श होना चाहिये था। यदि सुषुप्तिमें अहमर्थका प्रकाश होता तो ‘इतने समयतक मैं अभिमन्यमान था’ इस तरह परामर्श अवश्य होता।
कहा जाता है कि अहमर्थके प्रकाशमें अभिमानका आपादन तो कर्णस्पर्शमें कटि-चालनके समान है; परंतु वह ठीक नहीं; क्योंकि अहमर्थकी अपेक्षासे ही प्रकाश और अभिमान—दोनों ही होते हैं, अत: एक के प्रकाशसे दूसरेका आपादन युक्त ही है। यदि कहा जाय कि सुषुप्तिमें आत्माके प्रकाशमान होनेपर भी ‘आत्मेत्यभिमन्यमान आसम्’ इतने कालतक आत्मा ऐसा अभिमन्यमान था—ऐसा अभिमान होना चाहिये, वह भी अनुचित है; क्योंकि अभिमानमें अहमर्थ ही कारण है, आत्मा नहीं। मनकी स्थूलावस्थासे उपहित चिद्‍रूप अहमर्थकी अपेक्षासे ही अहमाकारवृत्तिरूप अभिमान व्यक्त हो जाता है। वृत्तिरूप होनेपर भी उसके लिये प्रमाण-व्यापारकी आवश्यकता नहीं होती। अहमर्थका प्रकाश भी अहमर्थावच्छिन्न साक्षीरूप ही है, अत: उसे भी अहमर्थसे भिन्न किसीकी अपेक्षा नहीं है। यदि अभिमान साक्षिमात्रसे ही प्रकाशित होता है। यदि सुषुप्तिमें अहमर्थ हो, तब तो अवश्य ही उसका प्रकाश और अभिमान होना चाहिये। कुछ लोग कहते हैं कि ‘सुषुप्तिमें अहमर्थका प्रकाश होता ही है। ‘न किञ्चिदहमवेदिषम्’—‘मैंने कुछ भी नहीं जाना’ इस अज्ञानपरामर्शका विषय अहमर्थके अज्ञानसे भिन्न ही विषय है। जैसे वेदान्तीके मतमें चिद्‍रूपांशमें अज्ञान अमान्य है; क्योंकि वह भासमान है, अत: पूर्णानन्दांशमें ही अज्ञान मान्य है, वैसे ही अहमर्थांशमें भी अज्ञान अमान्य है, अन्यथा अहमर्थके भानका विरोध स्पष्ट ही होगा।’ परंतु यह कथन असंगत ही है; क्योंकि साक्षिरूप ज्ञान-अज्ञानका विरोधी नहीं हुआ करता। अतएव अज्ञानका भी साक्षीसे प्रकाश होता है। जैसे मेघसे आच्छादित सूर्यद्वारा ही मेघका प्रकाश होता है, वैसे ही अज्ञानोपहित चैतन्यरूप साक्षीसे ही अज्ञानका प्रकाश होता है। विरोध होनेपर प्रकाश्यप्रकाशकभाव कथमपि उपपन्न नहीं हो सकता था। इसके सिवा यह कहा ही जा चुका कि सुषुप्तिमें अहमर्थ (मैं)-का प्रकाश नहीं होता। अतएव सुषुप्तिका वर्णन करनेवाली श्रुति भी सुषुप्तिमें अहमर्थके अज्ञानको सिद्ध करती है। ‘न विजानात्ययमहमस्मि’ अर्थात् सुषुप्तिमें ‘मैं यह हूँ’ इस तरह जीवको ज्ञान नहीं होता। कुछ लोग कहते हैं कि ‘नात्मानं न परांश्चैव न सत्यं नापि चानृतम्। प्राज्ञ: किञ्चन संवेत्ति तुरीयं सर्वदृक् सदा॥’ सुषुप्ति-अवस्थाभिमानी प्राज्ञ न अपनेको, न दूसरेको, न सत्यको, न अनृतको—किसी भी तत्त्वको नहीं जानता; इत्यादि श्रुतिवचनके समान आत्मादिके विशेषज्ञान-प्रतिपादनमें ही उक्त श्रुति भी तात्पर्य रखती है, परंतु यह कथन ठीक नहीं है। ‘अहरहर्ब्रह्म गच्छन्ति सम्पद्य न विदुरमृतेन प्रत्यूढा:’, इस आत्मबोधक श्रुतिविरोधके कारण उपर्युक्त श्रुतिका विशेषाज्ञान-प्रतिपादनमें तात्पर्य माना जाता है, परंतु ‘न विजानात्ययमहमस्मि’ इस श्रुतिके साथ किसी श्रुतिका विरोध नहीं है, अत: यह श्रुति तो अहमर्थके अज्ञानमें भी पर्यवसित होती है। जो कहा जाता है कि ‘अहमर्थ स्मर्ता (स्मरण करनेवाला) है, यह तो अवश्य ही मान्य है’, इसपर अब विचारना यह है कि वह अविद्यावच्छिन्न चैतन्य है अथवा अन्त:करणावच्छिन्न चैतन्य। यदि प्रथम पक्ष मान्य हो, तब तो ‘योऽहमकार्षं सोऽहं सौषुप्तिकाज्ञानादि स्मरामि’ अर्थात् जो मैं कर्मोंका कर्ता था, वही मैं सुषुप्तिके अज्ञानका स्मरण करता हूँ, इस अनुभवसे विरोध होगा; क्योंकि कर्तृत्व अविद्यावच्छिन्न चैतन्यमें कथमपि नहीं बन सकता। यदि अन्त:करणावच्छिन्न चैतन्यको ही स्मर्ता माना जाय, तब तो अहमर्थको ही अनुभव करनेवाला भी मानना होगा; क्योंकि एकाश्रयमें रहनेसे ही स्मृति, संस्कार एवं अनुभवमें कार्यकारणभाव बनता है। इसीसे जो मैं अनुभव करनेवाला था, वही मैं स्मरण कर रहा हूँ, इस तरह प्रत्यभिज्ञा (पहचान) होती है। परंतु यह सब कथन निरर्थक हैं; क्योंकि यह कहा जा चुका कि अविद्यावच्छिन्न चैतन्य अज्ञानका अनुभव करनेवाला है और वही जाग्रत्-कालमें अन्त:करणावच्छिन्न होकर स्मर्ता होता है। इसलिये चैतन्यके अभेदसे अनुभव और स्मरणकी एकाश्रयतामें कोई भी अनुपपत्ति नहीं है। कहा जाता है कि अन्त:करणरूप उपाधिके भेदसे अविद्यावच्छिन्न चैतन्यके साथ ऐक्य नहीं हो सकता, यह भी ठीक नहीं है। अविद्यावच्छिन्न चैतन्य ही अन्त:करणावच्छिन्न होता है, अत: भेदकल्पना असंगत है। फिर भी कहा जाता है कि अविद्या और अन्त:करणरूप उपाधिका भेद होनेसे मठाकाश और मठाकाशान्तर्गत घटाकाशके समान दोनों उपहितोंका अर्थात् अविद्योपहित और अन्त:करणोपहितका भेद अवश्य होना चाहिये, परंतु यह कहना ठीक नहीं; क्योंकि यहाँ दृष्टान्त ही असम्प्रतिपन्न है। वही उपाधियाँ परस्पर उपहितकी भेदक होती हैं, जो एक दूसरीसे अनुपहितकी उपधायक होती हैं, अन्यथा कम्बु-अवच्छिन्न आकाश, ग्रीवावच्छिन्न आकाशसे पृथक् ही समझा जाना चाहिये। इस दृष्टिसे यद्यपि मठबहिर्भूत घटसे अवच्छिन्न आकाश मठावच्छिन्न आकाशसे भिन्न कहा जा सकता है; क्योंकि वे दोनों उपाधियाँ एक-दूसरेसे अनुपहित आकाशको ही उपहित बनाती हैं, तथापि मठान्तर्गत घट तो मठोपहित मठाकाशको ही घटोपहित घटाकाश बनाता है, अत: इन दोनोंका परस्पर भेद नहीं कहा जा सकता। इस तरह अविद्यान्तर्गत अन्त:करण, अन्त:करणावच्छिन्न चैतन्य अविद्यावच्छिन्न चैतन्यसे भिन्न नहीं बन सकता।
कहा जाता है कि यदि सुषुप्तिमें अहमर्थ न होता तो ‘मैं निर्दु:ख होऊँ’ इस इच्छासे प्राणियोंकी सुषुप्तिके लिये प्रवृत्ति न होनी चाहिये, परंतु यह भी ठीक नहीं। जैसे ‘मैं दुबला हूँ, मोटा हो जाऊँ’ इस बुद्धिसे इच्छासे स्थौल्यसम्पादनमें प्रवृत्ति होती है, यहाँ स्थौल्य दशामें कार्श्यके न रहनेपर भी कृशकी स्थौल्य-सम्पादनार्थ प्रवृत्ति होती है। वैसे ही निर्दु:ख सुषुप्ति-दशामें अहमर्थके न होनेपर भी अहमर्थकी निर्दु:ख होनेको इच्छासे सुषुप्तिमें प्रवृत्ति हो सकती है। यदि कहा जाय कि कार्श्यादिसे विविक्त (पृथक्) शरीरमें ही स्थूलताकी इच्छा होती है, तब प्रकृतमें भी यही कहा जा सकता है कि अन्त:करणसे निष्कृष्ट केवल साक्षीमात्रकी निर्दु:खताके लिये ही सुषुप्तिमें प्रवृत्ति होती है। ‘मैं निर्दु:ख होऊँ’ इस अनुभवमें अहमंश तो अवर्जनीयतया उपस्थित होता है, जैसे ‘दूसरेका ग्राम मेरा हो जाय’ यहाँपर सम्बन्धांशको इच्छाविषयता होती है। यदि कहा जाय कि चिन्मात्र निर्दु:ख हो ऐसी इच्छा होनी चाहिये, तो यह भी ठीक नहीं; क्योंकि चिन्मात्ररूपसे विज्ञान न होनेसे ही ऐसा अनुभव नहीं होता। निर्दु:खका अनुभव है, ऐसी इच्छा होती ही है। कहा जाता है कि जो ‘मैं’ सोया था, वही ‘मैं’ जागता हूँ, जो ‘मैं’ पूर्व दिवसमें करता था, वही ‘मैं’ आज कर रहा हूँ, इस तरहके प्रत्यभिज्ञान अहमर्थके भेदमें नहीं हो सकते। इसके सिवा कृतहानि (किये हुए कर्मोंका बिना फल दिये ही नाश) और अकृताभ्यागम (बिना कर्म किये ही फलका आगम) मानना पड़ेगा। जब प्रतिदिन सुषुप्तिमें अहमर्थका नाश और जागरमें फिर उसकी उत्पत्ति मानी जायगी, तब पूर्वोक्त दूषण अनिवार्य हो जायँगे। कर्ता अहमर्थ और भोक्ता अहमर्थमें भेद होनेसे कर्म और फलभोगमें भी वैयधिकरण्यापत्ति होगी। चैतन्य यद्यपि एक है तथापि उसमें कर्तृत्व-भोक्तृत्व नहीं है। जिस अहमर्थमें कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदि होते हैं, वह एक नहीं है। ‘अहं करोमि’ ऐसी प्रतीतिके अनुसार अहंकारमें ही कर्तृत्वका आरोप मान्य है। अतएव चैतन्यमें कर्तृत्वादिका आरोप भी निरवकाश है। यदि आरोपसे ही कर्तृत्व मान्य हो, तब तो देहादिमें ही कर्तृत्व, भोक्तृत्व मान लिया जाय, परंतु विचार करनेसे विदित होता है कि उपर्युक्त शंकाएँ निराधार हैं; क्योंकि सुषुप्तिमें नष्ट होकर भी अहंकार कारणरूपसे स्थित ही रहता है। उसीकी जाग्रदवस्थामें फिर उत्पत्ति होती है। इस तरह अहमर्थ एक ही रहता है। अत: अकृताभ्यागम, कृतविप्रणाश आदि कोई दोष न होंगे।
यहाँ कुछ लोग यह शंका करते हैं कि ‘अथैतत्पुरुष: स्वपिति’ यहाँसे लेकर ‘गृहीतं चक्षुर्गृहीतं श्रोत्रं गृहीतं मन:’ इत्यादि श्रुतिमें मन आदिका ही उपराम—लय कहा गया है, अहंकारका लय नहीं बतलाया गया। परंतु इसका समाधान यह है कि मनके उपरममें ही अहंकारका भी उपरम समझ लेना चाहिये; क्योंकि मनमें ही बुद्धि, चित्त, अहंकारका भी अन्तर्भाव होता है। यद्यपि अहमर्थ—चित्, चैतन्यसे अघटित—अयुक्त ही है। फिर भी जैसे ‘घट: स्फुरति’ इस व्यवहारमें जड घटमें भी स्फुरणकी आश्रयता भासित होती है। वैसे ही जड अहमर्थमें भी अनुभवकी आश्रयता भासित होती है, तथापि ‘अहम्’ इत्याकारक प्रत्ययमें अवच्छिन्न अनुभवरूपसे अहमर्थका भान होता है। जैसे घटावच्छिन्न आकाश अनवच्छिन्न आकाशमें अन्तर्भूत होता है, वैसे ही अवच्छिन्न अनुभव अनवच्छिन्न आत्मामें ही अनुगत है। इस तरह आत्मासे अभिन्न अनुभवका अवच्छेदक मन अनुभवका आश्रय कहा जाता है। सारांश यह है कि चित् (चैतन्य), अचित् (जड)-का सम्मिश्रणरूप अहंकार अध्यस्त होता है। जड-चेतनकी अन्योन्याध्यासरूप ग्रन्थि ही अहंकार है। वही ‘अनुभवामि’ (मैं अनुभव करता हूँ) इस तरह आत्माभिन्न आत्मस्वरूप अनुभवका आश्रय होनेसे चिदात्मक कहलाता है। ‘अहं कर्ता’ (मैं करता हूँ) इस तरह जडरूप कर्तृत्वका आश्रय होनेसे अचिदात्मक है। ऐसी स्थितिमें अचित् अन्त:करणके उपरम होनेपर चिदचित्संवलित (चिज्जडग्रन्थिरूप) अन्त:करणका भी उपरम हो जाता है। अन्त:करण, उसका अधिष्ठान और अन्त:करणगत चिदाभास—यह तीनों मिलकर अहमर्थ कहलाते हैं। अन्त:करणका आत्मामें स्वरूपसे ही अध्यास होता है, परंतु अन्त:करणमें आत्माका स्वरूप नहीं अध्यस्त होता; किंतु उसका संसर्ग ही अध्यस्त होता है। इसीलिये अन्योन्याध्यास होनेपर भी उभयके साक्षात्कारसे उभयकी निवृत्ति नहीं होती। अतएव शून्यवादापत्ति नहीं होती; क्योंकि आत्मस्वरूप अधिष्ठानके साक्षात्कार होनेपर स्वरूपसे अध्यस्त अन्त:करणकी निवृत्ति होती है, परंतु आत्माका तो संसर्ग ही अन्त:करणमें अध्यस्त है, अत: उसीकी निवृत्ति होती है। स्वरूप अध्यस्त नहीं है, अत: उसकी निवृत्ति नहीं होती। इस अन्योन्याध्यास—चिज्जडग्रन्थिको ही अहमर्थ कहा जाता है, फिर अन्त:करणकी उपरतिसे उसकी उपरति होना युक्त ही है।
यह उपरति या निवृत्ति भी निरन्वय नाश नहीं है, किंतु कारणरूपसे अवस्थान ही है। अतएव पूर्वापरके अहमर्थमें भेद नहीं है। जैसे एक ही घृतमें कोई भेद नहीं होता, ठीक वैसे ही वही अन्त:करण सुषुप्तिकालमें अविद्यात्मना परिणत होता है और जाग्रत‍्में फिर वही अन्त:करणरूपमें व्यक्त होता है। इस तरह प्रत्यभिज्ञा और अनुभव-स्मरणका सामानाधिकरण्य, कर्मफलभोग-वैयधिकरण्याभाव, अकृताभ्यागम, कृतिविप्रणाशादि दोष भी नहीं होंगे, ‘अथातोऽहङ्कारादेश:, अथात आत्मादेश:’ यह श्रुति भी अहंकारसे पृथक् आत्माके होनेसे प्रमाण है। पूर्वपक्षीकी ओरसे कहा जाता है कि वेदान्तोंके मतसे तो जैसे ‘स एवाधस्तात् स एवोपरिष्टात्’ इत्यादि वचनोंसे भूमा ब्रह्मके साथ आत्माका अभेद बतलाया गया है, वैसे ही आत्माका अहमर्थके साथ भी अभेद बतलाया जा सकता है। अत: जैसे आत्मस्वरूप होनेपर भी भूमाका पृथक् उपदेश है, वैसे ही ‘अहमेवाधस्तादहमेवोपरिष्टात्’ इत्यादि वचनोंसे अहमर्थका पृथक् उपदेश होना सम्भव हो सकता है। तब फिर भेदबोधन कैसा? यदि कहा जाय कि ‘भूमा और आत्मा तो भिन्नत्वेन प्रत्यक्षसे प्रसिद्ध हैं, अत: उनका पृथक् उपदेश एकता-प्रतिपादनके लिये ही उपयुक्त है। जब कि दो सर्वात्मा नहीं हो सकते और भूमा तथा आत्मा—दोनोंकी सर्वात्मता कही गयी है, तब दोनोंकी एकता अर्थात् अभिन्नता सिद्ध हो जाती है। अहंकारकी तो आत्माके साथ एकता प्रत्यक्ष सिद्ध है। अत: आत्मासे पृथक् अहंकारका उपदेश आत्मासे भेद ही सिद्ध करनेके लिये है।’ पर यह असंगत है; क्योंकि यदि अहमर्थसे अन्य आत्माकी भूमा ब्रह्मसे भिन्नता प्रत्यक्षद्वारा असिद्ध है तो भेदार्थ ही दोनोंका उपदेश क्यों न माना जाय? इसके सिवा, जब अहमर्थ तो ब्रह्मभिन्नत्वेन रूपेण सिद्ध है, तब उसका उपदेश अभेद-सिद्धिके लिये ही क्यों न मान लिया जाय? इसी तरह ‘अज्ञातज्ञापकत्वेन श्रुतिका प्रामाण्य सिद्ध होगा।’ आदि पूर्वपक्ष भी असंगत है; क्योंकि अहंकारसे भिन्न आत्माकी भूमारूप ब्रह्मसे भिन्नता प्रत्यक्षद्वारा असिद्ध होनेपर भी अभिन्नता भी उसी तरह असिद्ध ही है, परंतु फिर भी दोकी सर्वात्मता बन नहीं सकती, अत: सार्वात्म्योपदेशान्यथानुपपत्तिकी सहायतासे अभेदमें ही श्रुतिका तात्पर्य मानना युक्त है। परंतु अहमर्थ और आत्माका अभेद असम्भव है; क्योंकि जड, चेतनकी एकता नहीं हो सकती, अत: अहमर्थका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिका आत्मासे अभेद-प्रतिपादनमें तात्पर्य नहीं हो सकता। सारांश यह है कि भूमा ब्रह्म ही ऊपर-नीचे, पूर्व-पश्चिम—सर्वत्र है, वही सब कुछ है, यह कथन अधिष्ठान बुद्धिसे ही सम्भव है। सर्वाधिष्ठान जो है, वही सब कुछ है। अत: यदि भूमा ब्रह्म ही सर्वदेश, काल, वस्तुका अधिष्ठान है, तब तो वही सब कुछ है, ऐसा कहना सम्भव है, अन्यथा असम्भव है; परंतु, जब कि उसी तरह आत्माके लिये भी कहा जा रहा है कि आत्मा ही नीचे-ऊपर, पूर्व-पश्चिम, वही सर्वत्र और वही सब कुछ है, तभी अधिष्ठान होनेसे ही आत्माकी भी सर्वात्मकता बन सकती है। परंतु सर्वप्रपंचका दो अधिष्ठान होना असंगत है, अत: जबतक आत्मा और भूमा ब्रह्मका अत्यन्त अभेद न ज्ञात हो, तबतक दोनोंकी ही सर्वात्मकता उपदेश नहीं संगत हो सकता। इसलिये आत्मा और भूमा ब्रह्मकी एकता स्वीकार्य है।
यद्यपि इसी तरह ‘अहमेव अधस्तात्’ मैं ही सब कुछ हूँ। इस तरह अहंकारकी भी सर्वरूपता सुनकर पूर्वन्यायसे आत्मा और भूमाके समान ही अहंकार और आत्माका भी अत्यन्त अभेद मानना चाहिये, तथापि अहंकारकी जडता, दृश्यता, प्रत्यक्षता स्पष्ट ही सिद्ध है। अत: चेतन आत्माका उसके साथ अभेद नहीं हो सकता। इसीलिये अहंकारादेशके पश्चात् आत्मादेशका प्रसंग आता है, जिसका आशय यह होता है कि चिदात्मसंवलित (व्यापक अधिष्ठान चैतन्यमिश्रित) होनेसे ही अहंकारकी सर्वात्मता कही गयी है। वास्तवमें परिच्छिन्न अहंकार सर्वस्वरूप नहीं है, किंतु आत्मा ही सर्वस्वरूप है। कहा जाता है कि ऐसी ही स्थिति है तो अहंकारकी सर्वात्मता न कहकर आत्माकी ही सर्वात्मता कहनी थी, इतनेसे भी आत्मा और ब्रह्मकी एकता सिद्ध हो ही सकती थी, परंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि लोकमें आत्मशब्दका प्रयोग अहमर्थमें ही होता है, अत: ‘आत्मा’ पदसे शुद्ध आत्माकी सर्वात्मता नहीं बतलायी जा सकती थी। परंतु यदि अहंकारकी सर्वात्मताके अनन्तर आत्माकी सर्वात्मता कही जायगी, तब तो इसपर अवश्य ही ध्यान जायगा कि अहंकार और आत्मा इन समानार्थक दो शब्दोंका प्रयोग क्यों किया गया? इस तरह ध्यानसे विवेचन करनेपर निश्चय होगा कि आत्मशब्दसे शुद्ध आत्मा विवक्षित है। अत: उसीकी मुख्य सर्वात्मता है। अहंकारकी तो आत्मयुक्त होनेसे ही सर्वात्मता है। इस तरह आत्मशब्दका अहंकारसे अतिरिक्त शुद्ध आत्मामें पार्थक्य निर्णय करानेके लिये ही अहंकारका पृथक् उपदेश आवश्यक है। अर्थात् अहंकारका पृथक् उपदेश आत्मासे भेद ही सिद्ध करनेके लिये है।
कुछ महानुभावोंका तो ऐसा कहना है कि यहाँ संचारिभावका वर्णन है। प्रेमके उद्रेकमें भावुक सभी विश्वको भूमा ब्रह्मरूपसे देखता है, उसीमें स्व-पर-विस्मृतिसे वह अपने-आपको ही भगवान् समझने लगता है। ‘असावहं त्वित्यबलास्तदात्मिका न्यवेदिषु: कृष्णविहारविभ्रमा:।’ (श्रीमद्भा० १०।३०।३) अर्थात् जैसे गोपांगनाएँ कृष्ण-प्रेमोन्मादमें विह्वल होकर अपने-आपको कृष्ण समझने लगी थीं, वैसे ही साधक अपने-आपको ही भूमा मानकर ‘मैं ही सब कुछ हूँ’ ऐसा कहता है, परंतु यह वस्तुस्थिति नहीं, संचारिभाव है; स्थायी नहीं है। अतएव फिर इस भावके मिटनेपर भूमारूप आत्माकी ही सर्वात्मताका अनुभव होता है। इस मतमें भी अहमर्थसे आत्मशब्दार्थ भिन्न ही माना जाता है। यह दूसरी बात है कि इस मतमें आत्मा और भूमा—इन दोनों शब्दोंको परमेश्वर ही अर्थ है और अहंका अर्थ जीवात्मा है, परंतु यहाँ वस्तुके याथात्म्यका प्रतिपादन करनेवाली श्रुति संचारिभावका वर्णन कर रही है या तत्त्वके भेद-अभेद आदिका, यह चिन्त्य है। कुछ लोगोंका यह भी कहना है कि ‘वेदान्तीके मतमें भूमा, अहंकार और आत्मा—यह तीनों बिम्ब, प्रतिबिम्ब और मुखके समान हैं, अत: औपाधिक ब्रह्म भूमा है, जीव अहमर्थ है और निरुपाधिक चिन्मात्र ब्रह्म आत्मा है। इस दृष्टिसे तो जब वेदान्तीके मतमें भी जीवात्मासे अहंकारकी भिन्नता नहीं सिद्ध होती, तब अहमर्थकी अनात्मता कैसे सिद्ध हो सकती है?’ परंतु यह भी ठीक नहीं है; क्योंकि उसका तात्पर्य यह है कि पहले भूमाका स्वरूप इस तरह बतलाया गया कि ‘यत्र नान्यत्पश्यति, नान्यच्छृणोति, नान्यद्विजानाति’ (छां० उ०) जहाँ न दूसरेको देखता है, न सुनता है, न जानता है, वही भूमा है। ‘स एवाधस्तात्’ वही ऊपर-नीचे, वही सब कुछ है। इस उक्तिमें ‘यत्र’ शब्दसे आधार-आधेयभावकी प्रतीति और ‘स:’ इस शब्दसे उसकी परोक्षता, अप्रत्यक्षता प्रतीत होती थी और इसीसे भूमामें आत्मासे भिन्नता भी प्रसक्त थी। ऐसी स्थितिमें सर्वभेदशून्य, अपरोक्ष, स्वप्रकाश, ब्रह्मके ज्ञानमें बाधा उपस्थित हो जाती, इसीलिये ‘अहमेवाधस्तात्’ ‘मैं ही ऊपर-नीचे सब कुछ हूँ’ इस उक्तिकी आवश्यकता हुई। इससे सिद्ध किया गया कि पूर्वोक्त भूमा, जिसकी सर्वात्मता बतलायी गयी, वह अहमर्थरूप है, जीवसे अभिन्न ही है। एतावता ‘स:’ शब्दसे प्रतीत भूमाकी परोक्षताका वारण हुआ और जीवात्मा-परमात्माका भेद एवं आधाराधेयभाव आदि भी वारित हुआ। जैसे भूमा सर्वात्मा है, वैसे ही अहमर्थ या जीवात्मा भी सर्वात्मा है। जब दो सर्वात्मा नहीं हो सकते, अर्थात् तब ही दोनोंकी एकता समझी जाती है, जिससे अपरोक्ष जीवात्मासे अभिन्न भूमाकी अपरोक्षता एवं आधाराधेय भावादिसे विवर्जितता सिद्ध हो जाती है। परंतु इतनेपर भी यह गड़बड़ी पड़ती थी कि अविवेकी लोग ‘मैं’ या ‘अहं’ का प्रयोग व्यापक शुद्ध चिदात्मामें न करके चिज्जडग्रन्थि या कार्यकारण-संघातमें ही करते हैं। इससे कहीं यह न समझ लिया जाय कि परिच्छिन्न, जड कार्यकरणसंघात ही भूमा ब्रह्म है, अत: अहंकाररहित शुद्ध आत्माकी सर्वात्मता बतलाकर सर्वोपद्रव-सर्वभेदशून्य, स्वप्रकाश भूमा ब्रह्मकी सर्वात्मताका समर्थन किया गया और अहंशब्द-वाच्यार्थ जड अहमर्थसे भिन्न अहंशब्दके लक्ष्यभूत अहमर्थ-साक्षीको मुख्य आत्मा कहा गया है। इसी अर्थको सिद्ध करनेमें भूमादेश, अहंकारादेश, आत्मादेश करनेवाली श्रुतियोंका तात्पर्य है। अत: यहाँ बिम्ब-प्रतिबिम्ब आदि कल्पनाका अवकाश नहीं था। यदि अविद्यामें प्रतिबिम्बित जीवको अहंकारशब्दसे कहनेपर भी प्रसक्त-भेदका वारण और आत्मादेशद्वारा शुद्ध-आत्मासे अहंकारका भेद कहना संगत हो, तो भी अविद्योपाधिक जीवको अहंकार-शब्दसे ‘स्थूलारुन्धतीन्याय’ से कहा जाता। जैसे अरुन्धतीके निकट रहनेवाले स्थूल ताराको ही पहले दिखलाकर बादमें तन्निकटस्थ अरुन्धतीको दिखलाकर पूर्ववाक्यका भी तात्पर्य अरुन्धतीके प्रदर्शनमें ही माना जाता है, साथ ही स्थूल, सूक्ष्म, दोनों ही ताराओंमें भेद स्वत: सिद्ध हो जाता है, वैसे ही ‘अहंकार’ शब्दसे पहले अविद्याप्रतिबिम्ब अहंकाराश्रय चैतन्य कहा जा सकता है। लोकमें अपरोक्ष चैतन्यका ‘मैं’ या ‘अहं’ शब्दसे ही व्यवहार होता है, ‘अविद्याप्रतिबिम्ब’ आदि शब्द अलौकिक है, अत: उनसे व्यवहार नहीं होता। पश्चात् ‘आत्मादेशवाक्य’ से ‘अहंकारादेशवाक्य’ का भी शुद्ध आत्माके ही सार्वात्म्य-निश्चयमें तात्पर्य विदित होता है। फिर अहं शब्दवाच्यका और शुद्ध-आत्माका भेद सुतरां सिद्ध हो जाता है।
अहमर्थको आत्मा माननेवाले बहुत-से महानुभाव आत्माको अणु मानते हैं, फिर अणु आत्माकी ‘सर्वात्मता’ कैसे हो सकती है? जब अणु आत्मा ही अनन्त है और जगत्, ईश्वर आदि सब सत्य ही है, तब एक अणुरूप जीव ही सब कुछ है, यह कथन संगत ही कैसे हो सकता है? कुछ लोगोंका कहना है कि ‘स एवाधस्तादहमेवाधस्तादात्मैवाधस्तात्’ इत्यादि उपक्रम वाक्यों और ‘सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्व:’ इत्यादि स्मृतियोंसे ‘स एवेदं सर्वम्, अहमेवेदं सर्वम्, आत्मैवेदं सर्वम्’ इत्यादि उपसंहार वाक्योंका तात्पर्य सर्वात्मता (सर्वस्वरूपता)-के प्रतिपादनमें नहीं, किंतु सर्वगतत्व या व्यापकत्वके प्रतिपादनमें ही है। अतएव ‘सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्व:’ यह स्मृति स्पष्ट कहती है कि आप सर्वव्यापक हैं, अत: सर्वस्वरूप हैं। इसी तरह भूमा, अहमर्थ और आत्मा सभी सर्वगत, सर्वव्यापक हैं, अत: उनकी सर्वस्वरूपताका उपचार कहा जाता है। यदि अधिष्ठान या उपादान होनेसे वास्तविक सर्वस्वरूपता होती, तब तो कथंचित् अहंकाररहित केवल चैतन्यमें अहंशब्दका भी तात्पर्य समझा जाता। वाच्यत्व, ज्ञेयत्व आदिके समान सर्वगतत्व भी अनेकोंमें हो सकता है। यदि जीव और ब्रह्मकी एकता ही श्रुतियोंका तात्पर्य हो, तब तो भूमा और आत्माके उपदेशसे ही अभीष्ट सिद्ध हो जाता, फिर अहंकारादेशकी व्यर्थता स्पष्ट ही है। परंतु, यह सब कथन अयुक्त है; क्योंकि उपर्युक्त युक्तियोंके अनुसार ‘स एवाधस्तात्’ इत्यादि वाक्योंका तात्पर्य ब्रह्मात्मैक्यमें ही है, सर्वगतत्व-प्रतिपादनमें नहीं। वस्तुत: जो उपादान या अधिष्ठान होता है, उसीकी सर्वगतता भी सम्पन्न होती है। पृथिव्यादि सर्वप्रपंचका कारण होनेसे ही आकाश आदिकी भी व्यापकता है। अतएव ‘सर्वकारणरूपसे आप सर्वत्र व्यापक हैं, इसलिये आप सर्वरूप हैं,’ इस तरह ‘सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्व:’ इस स्मृतिका भी तात्पर्य सर्वात्मतामें ही है। परिभू:, स्वयम्भू:—इस दो पदोंसे व्यापकता और सर्वरूपता सिद्ध की जाती है। ‘परि-उपरि-सर्वतो वा भवतीति परिभू:’ ऊपर या चारों ओर होनेवालेको ‘परिभू:’ कहा जाता है। ‘यस्योपरि भवति यश्चोपरि भवति स सर्व: स्वयमेव भवतीति स्वयम्भू:’ जिसके ऊपर और जो ऊपर होता है, उस सब कुछ अपने-आप होनेवालेको ‘स्वयम्भू:’ कहा जाता है। ठीक उसी तरह ‘स एवाधस्तात्’ इत्यादि वचनोंसे सर्वव्यापकता कहकर ‘स एवेदं सर्वं’ इत्यादि वचनोंसे उसीकी सर्वरूपता प्रतिपादित की गयी है। अत: उपक्रम-उपसंहारमें ऐक्यरूप्य ही है।
इसके सिवा यह भी विचार करना चाहिये कि ‘स भगव: कस्मिन् प्रतिष्ठित:’—भगवन्! वह भूमा किसमें प्रतिष्ठित है? इस प्रश्नमें क्या भूमाका कहीं अवस्थानमात्र पूछा गया है अथवा भूमा परमार्थत: किसमें प्रतिष्ठित है, यह पूछा गया है? यदि पहला पक्ष है, तब तो उसका यह उत्तर है कि ‘स्वे महिम्नि’ अर्थात् अपने प्रपंचरूप महिमामें ही स्थित है। यद्यपि कहा जा सकता है कि ‘यदि भूमा अपनी महिमामें स्थित है, तब तो जैसे राजा अपनी महिमासे गज, अश्व आदिमें स्थित होता है, यहाँ ‘भोग-साधन’ में ‘महिम’ शब्दका प्रयोग हुआ है और वह भी राजाकी समान सत्तावाला है, अर्थात् जैसे राजा सत्य है, वैसे ही उसके भोग-साधन गजादि भी सत्य हैं, वैसे ही प्रपंचको भी ब्रह्मके समान ही सत्य होना चाहिये। ऐसी स्थितिमें वस्तुपरिच्छेद होनेसे भूमामें परिच्छिन्नता अनिवार्य होगी, तथापि यहाँ महिमा-शब्दका अर्थ अपनी समान सत्तावाला भोगसाधन नहीं विवक्षित है, किंतु ‘स्व’ शब्द अपनेमें अध्यस्तरूप ‘स्वीय’ या ‘आत्मीय’ का बोधक है। कोई संकोचक प्रमाण न होनेसे सभी अध्यस्त दृश्य-प्रपंच ‘स्वे महिम्नि’ के ‘स्व’ शब्दका अर्थ और महिमा शब्द उत्कर्षका बोधक है। राजसम्बन्धी होनेसे राजकीय गो, गजादिमें जैसे उत्कर्ष है, वैसे ही प्रकाशक ब्रह्म-सम्बन्धसे अध्यस्त दृश्यमात्रमें उत्कर्ष है। अत: उसके परमार्थ सत्य होनेकी कोई अपेक्षा नहीं है। अतएव ब्रह्ममें परिच्छिन्नता आदि न आ सकेगी।’
यदि दूसरे अभिप्रायसे प्रश्न हो कि भूमा परमार्थत: किसमें प्रतिष्ठित है, तब तो ‘यदि वा नो महिम्नि’—वह महिमा प्रतिष्ठित नहीं है, यही उत्तर है; क्योंकि ‘अन्यो ह्यन्यस्मिन् प्रतिष्ठित:’—दूसरा ही दूसरेमें प्रतिष्ठित होता है। जब भूमासे भिन्न परमार्थ सत्य कोई पदार्थ ही नहीं है, तब भूमाकी किसमें प्रतिष्ठा कही जाय? ‘यत्र नान्यत्पश्यति’ इत्यादि वाक्यसे अद्वैत ब्रह्म ही भूमा कहा गया है। इस तरह जब पूर्व वाक्यसे ही अद्वितीय ब्रह्मका निश्चय हो गया, तब तो फिर उसके अनुसार ही ‘स एवाधस्तात्’ इत्यादि वाक्योंका भी सर्वात्मता-प्रतिपादनमें ही तात्पर्य होगा। दो वाक्योंका पृथक् अर्थ कल्पना करना निरर्थक है। अत: ‘स एवाधस्तात्’ इत्यादि वाक्योंका यही तात्पर्य है कि अध:-ऊर्ध्व, देशकाल आदि सब कुछ भूमा ही है। ‘जाति सर्वगता होती है’ इस सिद्धान्तके अनुसार व्यापक जातिके समान भूमा अन्यमें अधिष्ठित भी हो सकता है। जैसे घटत्वादि जाति घटादिमें तादात्म्यसम्बन्धसे एवं अन्यत्र स्वरूप-सम्बन्धसे रहती है, वैसे ही भूमा अपने कार्योंमें तादात्म्यसम्बन्धसे और अनादि पदार्थोंमें स्वज्ञान-विषयत्वादिसम्बन्धसे प्रतिष्ठित होता है। ‘अहमेवाधस्तात्’ इत्यादिके मध्यमें अहंकारोपदेश भी व्यर्थ नहीं कहा जा सकता; क्योंकि ब्रह्ममें अपरोक्षता, प्रत्यक्चैतन्याभिन्नता आदिके प्रतिपादनके लिये उसकी सार्थकता पहले ही कह चुके हैं।
कहा जाता है कि ‘वेदान्त-मतानुसार प्रत्यक्चैतन्य आत्मा ही मुख्यरूपसे अपरोक्ष है। उसके साथ ब्रह्मकी एकता कहनेसे भूमा ब्रह्मकी अपरोक्षता (प्रत्यक्षता) सिद्ध हो ही जाती, फिर अहंकारकी, जो वस्तुत: सर्वरूप नहीं है, सर्वात्मता क्यों कही गयी?’ परंतु इसका उत्तर यही है कि यद्यपि आत्माके सम्बन्धसे ही अहंकारकी भी अपरोक्षता है, अत: आत्माकी एकतासे ही भूमाकी अपरोक्षता सिद्ध हो सकती थी तथापि अहंकार (मैं)-में अपरोक्षता लोकमें बहुत प्रसिद्ध है, इसलिये उसकी उक्ति सार्थक है। इसके सिवा यदि ‘अहं’ का अर्थ अणुपरिमाण आत्मा ही मान लिया जाय, तब तो उसमें व्यापकता, सर्वरूपता आदि कुछ भी नहीं बन सकती। कुछ लोग कहते हैं कि ‘भूमा नारायणाख्य: स्यात् स एवाहङ्कृति: स्मृत:। जीवस्थस्त्वनिरुद्धो य: सोऽहङ्कार इतीरित:। अणुरूपोऽपि भगवान् वासुदेव: परो विभु:। आत्मेत्युक्त: स च व्यापी’ इस स्मृतिमें भूमारूप नारायणको ही अहंकृति कहा गया है एवं जीवमें रहनेवाले अनिरुद्धको ही अहंकार कहा गया है और ‘अनिरुद्धो हि लोकेषु महानात्मा परात्पर:। योऽसौ व्यक्तत्वमापन्नो निर्ममे च पितामहम्॥ सोऽहङ्कार इति प्रोक्त: सर्वतेजोमयो हि स:’ इत्यादि स्मृतियोंसे व्यक्त-भावको प्राप्त होकर पितामहको रचनेवाला ही अहंकार कहा गया है। अत: इन स्मृतियोंके अनुसार ही श्रुतिका अर्थ होना चाहिये। परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि सर्वात्मता-प्रतिपादक श्रुति-वचनोंके अनुसार ही स्मृतियोंका अर्थ करना युक्त है। इस दृष्टिसे इन स्मृतियोंका यही अर्थ होता है कि ‘नारायण ही भूमा है और वही अहंकृति है’ अर्थात् अहंकारोपलक्षित चित्तसे अभिन्न होनेके कारण वही अहंकृति भी कहलाता है। अविद्याप्रतिबिम्बरूप जीवके आश्रित अविद्या, काम, कर्मके अनुसार इहलोक-परलोकमें—कहींपर रुकनेवाला अहंकार ही ‘अनिरुद्ध’ है। इसमें और शुद्ध आत्मामें अवश्य ही भेद है। मोक्षधर्मके विवेचनसे यह स्पष्ट हो जाता है ‘परमात्मेति यं प्राहु: सांख्ययोगविशारदा:। तस्मात्प्रसूतमव्यक्तं प्रधानं तद्विदुर्जना:॥’ अर्थात् सांख्ययोगविशारद जिसे परमात्मा कहते हैं, उसीसे प्रधान या अव्यक्त उत्पन्न होता है।
अव्यक्ताद् व्यक्तमुत्पन्नं लोकसृष्टॺर्थमीश्वरात्।
अनिरुद्धो हि लोकेषु महानात्मा परात्पर:॥
योऽसौ व्यक्तत्वमापन्नो निर्ममे च पितामहम्।
सोऽहङ्कार इति प्रोक्त: सर्वतेजोमयो हि स:॥
पृथिवी वायुराकाशमापो ज्योतिश्च पञ्चमम्।
अहङ्कारप्रसूतानि महाभूतानि पञ्च च॥
(सर्वदर्शन सं०)
लोकसृष्टॺर्थ अव्यक्त (अव्यक्तभावापन्न ईश्वर)-से अनिरुद्ध या महान् आत्मा (महत्तत्त्व, समष्टिबुद्धि, सूत्रात्मा या हिरण्यगर्भ)-का प्रादुर्भाव हुआ। जिस महान‍्ने व्यक्तभावापन्न होकर पितामह (विराट्)-को रचा है, वही महान् आत्मा (हिरण्यगर्भ) आगे चलकर अहंकार कहलाता है। वह बुद्धिस्वरूप या तेज—(सत्त्व) प्रधान सूक्ष्म शरीरका अभिमानी होनेसे ही तेजोमय है। उसी अहंकारसे फिर पंचभूतोंकी रचना हुई। मोक्षधर्मके इन वाक्योंमें सांख्यमतानुसार महत्तत्त्व और अहंकारमें ही ‘महान्’ और ‘अहंकार’ शब्दका प्रयोग हुआ है। वेदान्तमतानुसार वीक्षण और विचिकीर्षा (प्रपंचरूपसे आविर्भावकी इच्छा) ही उनके अर्थ हैं। ‘तदैक्षत’ इस श्रुतिसे जो ईक्षण कहा गया है, उसे ही महान् कहा जा सकता है। ‘एकोऽहं बहु स्याम्’ इत्यादि श्रुतिके अनुसार अनेक होनेकी इच्छा ही अहंकार है, अतएव ईक्षणके पश्चात् ही ‘अहं’ पदका उल्लेख हुआ है। ‘अहङ्कारश्चाहं कर्तव्यश्च’ ‘महाभूतान्यहङ्कार:’ इत्यादि श्रुति-स्मृतिमें अहंकारकी उत्पत्ति और लय बतलाया गया है। अत: उसमें व्यापकता कभी नहीं बन सकती। जहाँ भी कहीं अहमर्थकी व्यापकता कही गयी है, सर्वत्र ही अहंकारसे रहित, अहंकारके अधिष्ठानभूत व्यापक चैतन्यमें ही लक्षणासे अहंपदका प्रयोग हुआ है। जैसे ‘अहं मनुरभवं सूर्यश्च’ इस वामदेवकी उक्तिमें यद्यपि आपातत: प्रतीत होता है कि परिच्छिन्न जीवकी ही सर्वरूपता कही जा रही है, तथापि सिद्धान्तत: वहाँ लक्षणासे अहंकाररहित व्यापक शुद्ध चैतन्यमें ‘अहं’ का प्रयोग निर्णय किया गया है। वैसे ही जहाँ भी अहमर्थकी व्यापकता सुनायी दे, वहाँ व्यापक चैतन्य ही ‘अहं’ का अर्थ समझना चाहिये।
कुछ लोग कहते हैं कि ‘अहङ्कारश्चाहं कर्तव्यश्च’ इत्यादि स्थलोंमें महत्तत्त्वका कार्य और मन आदिका कारण अहंत्तत्त्व लिया गया है। ‘महत्तत्त्वाद्विकुर्वाणाद्भगवद्वीर्यसम्भवात्। क्रियाशक्तिरहङ्कारस्त्रिविध: समपद्यत’ (श्रीमद्भा० ३।२६।२३) इत्यादि वचनोंके अनुसार यह सात्त्विक, राजस, तामस—त्रिविध अहंकार आत्मस्वरूप अहमर्थसे सर्वथा भिन्न है। यदि अहमर्थ और अहंकारमें भेद न माना जायगा, तब तो इसी तरह ‘बुद्धिरव्यक्तमेव च’ (गीता १३।५) इस वचनमें भी विवाद खड़ा हो सकेगा। यहाँ ‘बुद्धि’ पद क्षेत्रान्तर्गत दृश्यविशेषके लिये आया है। परंतु यदि ‘बुद्धि’ शब्दसे संवित् (स्वप्रकाश ज्ञानरूप आत्मा)-का बोध हो, तब तो संवित‍्का भी क्षेत्रकोटिमें ही परिगणन होगा। अत: कहना होगा कि भले ही कहीं ‘बुद्धि’ और ‘ज्ञान’ पदसे संवित् या आत्मा कहा जाय, पर ‘बुद्धिरव्यक्तमेव च’ इस क्षेत्रस्वरूपके निरूपण-प्रसंगका ‘बुद्धि’ शब्द संवित‍्का बोधक नहीं है। ठीक इसी तरह क्षेत्रमें प्रयुक्त अहंकार शब्दका अर्थ आत्मा नहीं है; किंतु ‘अहमात्मा गुडाकेश’ (गीता १०।२०) इत्यादि स्थलोंका ही ‘अहं’ पद आत्माका बोधक है। ‘दम्भाहङ्कारसंयुक्ता:’ (गीता १७।५) इत्यादि स्थलोंमें ‘अहं’ पदका प्रयोग देहमें, अहंबुद्धि और गर्वमें होता है। ‘गर्वोऽभिमानोऽहङ्कार:’ (अमर० १।७।२१) इस कोषसे भी मालूम होता है कि अहंकार शब्द केवल अहमर्थ (आत्मा)-का ही वाचक नहीं है। आत्माका बोधक ‘अहं’ शब्द ‘अस्मद्’ शब्दसे बना है और अहंकार शब्द अनात्माका बोधक है। उसका पर्यायभूत ‘अहं’ शब्द मान्त (मकारान्त) अव्यय है। परंतु यह सब कथन असंगत है। मान्त एवं दान्तभेदसे अर्थभेद कल्पनामें कोई भी प्रमाण नहीं है। अहंरूपसे प्रतीयमान अहंकारके ही बोधक सभी ‘अहं’ शब्द हैं। ‘अहं ब्रह्मास्मि’ इत्यादि स्थलोंमें लक्षणाद्वारा ही अहंकारसे अतिरिक्त आत्माका बोध होता है। कौन ‘मान्त’ है, कौन ‘दान्त’ इस तरह जिसका निर्धारण नहीं है, ऐसे ‘अहं’ शब्दका अधिक प्रयोग अहंकारमें ही होता है। जब अहंकार शब्दको आप भी अनात्माका वाची मानते हैं; तब ‘सोऽहङ्कार इति प्रोक्त:’ (सर्वद० सं०) इत्यादि पूर्व वचनोंमें, आत्मामें अहंकार पदका प्रयोग लाक्षणिक ही होगा। बस, फिर तो ‘मान्त’ ‘दान्त’ साधारण अहंशब्द भी मुख्य वृत्तिसे अहंकारका वाची होकर लक्षणासे आत्माका वाचक होगा। जैसे ‘अनिरुद्धो हि लोकेषु महानात्मा परात्पर:॥ योऽसौ व्यक्तत्वमापन्नो निर्ममे च पितामहम्। सोऽहङ्कार इति प्रोक्त:०’ (सर्वदर्शनसं० ४) यहाँ लक्षणासे ही आत्मामें प्रयोग मानना उचित है।
कुछ लोग अहमर्थमें आत्मा-अनात्मा—दोनोंका मिश्रण नहीं मानते और कर्तृत्व आदिको मुख्य आत्माका ही धर्म मानते हैं, परंतु यह असंगत है; क्योंकि असंग, अनन्त आत्मामें कर्तृत्व माननेमें मुक्तिका होना अत्यन्त असम्भव हो जायगा। कहा जाता है कि ‘यदि अहंकार या अहंशब्द चिज्जड-ग्रन्थिका वाचक हो, तब तो दूसरोंकी ग्रन्थिमें भी ‘अहं’ का प्रयोग होना चाहिये।’ परंतु उन्हें यह भी देखना चाहिये कि उनके ही मतमें अहंकार और मान्त अहम‍्का प्रयोग दूसरोंके अन्त:करण या क्षेत्रमें क्यों नहीं होता? यदि उन्हें ऐसा इष्ट हो तो हमें भी इष्ट ही है। भेद यही है कि हमारे यहाँ इन पदोंकी अपने उच्चारयितामें शक्ति है। शुद्ध आत्मा उच्चारयिता है नहीं, अत: जैसे वहाँ लक्षणासे प्रयोग होता है, वैसे ही दूसरी ग्रन्थिमें भी होगा। कहा जाता है कि कर्तृत्व आदिके अनात्म-धर्म होनेपर भी उसे अपने आश्रय-प्रतीतिके बिना भी आत्मामें वैसे ही प्रतीति होनी चाहिये, जैसे ‘गौरोऽहम्’ यहाँ गौरत्वके आश्रय देहकी प्रतीति न होनेपर भी गौरत्वकी आत्मामें प्रतीति होती है, परंतु ध्यान देनेपर स्पष्ट प्रतीत होता है कि दृष्टान्तमें भी देहत्वरूपसे देहका भान होनेपर भी गौरत्व मनुष्यत्वरूपसे देहका भान अवश्य रहता है। फिर दार्ष्टान्तिक कर्तृत्व आदि आश्रयभूत अहमर्थकी प्रतीतिके बिना कैसे प्रतीत होंगे? सार यह है कि जहाँ आरोप अनुभूयमान होता है, वहाँ या तो प्रतिबिम्बरूपता होती है अथवा धर्मीका अध्यास अवश्य होता है। जब कर्तृत्वादि प्रतिबिम्बरूप नहीं है, तब अवश्य ही धर्मीका अध्यास मानना चाहिये।
अहं प्रत्ययका विषय होनेसे शरीरके समान अहमर्थ अनात्मा है इत्यादि अनुमानसे भी अहमर्थकी अनात्मता सिद्ध होती है। कहा जाता है कि इस तरह तो अहमर्थके भीतर अधिष्ठानभूत चैतन्य भी अहं प्रत्ययका विषय है, फिर उसे भी अनात्मा कहना पड़ेगा। परंतु इसका उत्तर स्पष्ट है। जिस रूपसे उसे अहंप्रत्यय-विषयता है, उस रूपसे उसकी अनात्मता इष्ट ही है और स्वरूपसे वह सर्वथा अविषय है, अत: उससे अनात्मताकी प्रसक्ति नहीं है। अहमर्थ आत्मासे अन्य है। ‘अहं’ शब्दका अभिधेय (वाच्य) होनेसे अहंकारशब्द-वाच्यके समान पर्यायता दिखलायी जा चुकी, अत: असिद्धिकी कल्पना नहीं की जा सकती। कहा जाता है कि वेदान्ती भी तो ‘गौरोऽहम्’ इस तरह आत्माको गौरत्वकी कल्पनाका अधिष्ठान मानता है और ‘मा न भूवम्, भूयासम्’ इत्यादि रूपसे आत्माको ही परप्रेमास्पद मानता है। साथ ही अहमर्थ अपनी सत्तामें प्रकाश (बोध)-से रहित नहीं होता, अत: आत्माकी स्वप्रकाशता भी कही जाती है। यदि अहमर्थ अनात्मा ही हो, तब तो यह सब उपर्युक्त कथन कथमपि संगत न हो सकेगा; क्योंकि ‘गौरोऽहम्’, ‘मा न भूवम्’ अहमर्थकी प्रकाशाव्यभिचारिता यह सभी अहमर्थसे ही सम्बन्धित है। अत: यदि वह अनात्मा है, तब तो यह अहमर्थसे सम्बन्धित स्वप्रकाशत्वादि अनात्मामें ही पर्यवसित होंगे, परंतु यह कथन ठीक नहीं है। गौरत्वादि अनात्माके आरोपका अधिष्ठान अहमर्थ नहीं है, अपितु आत्मा ही है। किंतु जैसे ‘इदम्’ (पुरोवर्ती शुक्तिकादि) अधिष्ठानका अवच्छेदक होनेसे अधिष्ठान कहलाता है, वैसे ही अहमर्थ भी अधिष्ठानका अवच्छेदक होनेसे अधिष्ठान कहलाता है। वास्तवमें अहमर्थ अनात्माके आरोपका अधिष्ठान नहीं है। आत्मामें अहंकारका ऐक्यारोप (भ्रम) होनेसे ही अहमर्थमें प्रेमास्पदत्वकी प्रतीति होती है। जो कहा जाता है कि ‘ऐसा माननेसे अन्योन्याश्रय-दोष होगा’, वह भी ठीक नहीं। सुषुप्तिकालमें आत्माका प्रकाश होता है, अहमर्थका प्रकाश नहीं होता। इसीसे उन दोनोंका भेद सिद्ध हो जाता है।
कहा जाता है कि ‘अहमर्थके प्रेमसे भिन्न अन्य प्रेमका अनुभव ही नहीं होता, अत: अहमर्थको ही प्रेमास्पद मानना चाहिये, परंतु यह ठीक नहीं। परामर्शसे सिद्ध सुषुप्तिमें अहमर्थशून्य आत्माके प्रेमका अनुभव स्पष्ट है, अत: अहमर्थ-प्रेमसे भिन्न भी आत्मप्रेम है ही। यहाँ सन्देह होता है कि यद्यपि अहितमें हितबुद्धिसे प्रेम उत्पन्न होता है तथापि जो प्रेमका आस्पद नहीं है, उसमें प्रेमास्पदताका आरोप कहीं भी नहीं देखा गया। अत: यदि अहमर्थ-प्रेमास्पद आत्मा नहीं है, तब इसमें प्रेमास्पदताका आरोप कैसे हो सकता है?’ परंतु इसका समाधान यह है कि अहमर्थमें प्रेमास्पदत्वका आरोप होता है, ऐसा नहीं; किंतु यह कहा जा रहा है कि अहमर्थमें आत्माके ऐक्यका आरोप होनेसे प्रेमास्पदता है; स्वाभाविक नहीं। स्वाभाविक प्रेमका आस्पद आत्मा ही है। इच्छा और प्रेममें भेद है, अतएव सिद्ध वस्तुमें भी स्नेहात्मक-वृत्तिरूप प्रेम होता है। रहा यह कि ‘अहमर्थका प्रकाशके साथ व्यभिचार न होनेसे उसे ही आत्मा माना जाय’ यह भी ठीक नहीं; क्योंकि वह तो अहमर्थ और आत्माके भेदमें भी बन सकता है, परंतु स्वप्रकाश आत्मसम्बन्धके बिना जड अहमर्थका प्रकाशाव्यभिचार नहीं हो सकता। अतएव वह भी अहमर्थ भिन्न आत्मामें प्रमाण है; अर्थात् अहमर्थके प्रकाशाव्यभिचारसे उसकी स्वप्रकाशता नहीं मानी जा सकती, अपितु इससे स्वप्रकाश आत्माका सम्बन्ध ही निश्चित होता है। कहा जाता है कि ‘समारोप्यस्य रूपेण विषयो रूपवान् भवेत्। विषयस्य तु रूपेण समारोप्यं न रूपवत्॥’ अर्थात् आरोपितके रूपसे विषय रूपवान् होता है, विषय (अधिष्ठान)-के रूपसे समारोपित पदार्थ रूपवान् नहीं होता। इस युक्तिसे आरोपित अहमर्थके अप्रेमास्पदत्वसे ही आत्मामें अप्रेमास्पदत्वकी प्रतीति होनी चाहिये, परंतु यहाँ विचार करना चाहिये कि क्या अधिष्ठानका धर्म आरोपितमें प्रतीत होना चाहिये अथवा आरोप्यगत धर्मका अधिष्ठानमें भान होना चाहिये? पहला पक्ष तो इसलिये ठीक नहीं है कि अधिष्ठानके जिस धर्मसे विशिष्ट स्वरूपज्ञानसे आरोपितकी निवृत्ति हो जाती है, वह धर्म आरोप्यमें कदापि नहीं प्रतीत होता—ऐसा नियम है। जैसे शुक्तिरजतमें शुक्तिगत इदन्ताकी प्रतीति होनेपर भी शुक्तिगत नीलपृष्ठत्व, त्रिकोणत्व, शुक्तित्वादि धर्मका भान नहीं होता; क्योंकि शुक्तित्वादिविशिष्ट शुक्तिकाके ज्ञान होनेसे आरोपित रजतकी निवृत्ति हो ही जाती है। अत: अधिष्ठानके उसी रूपसे समारोप्य रूपवान् नहीं होता, जिसके ज्ञानसे आरोपित मिट जाय। प्रेमास्पदत्व वैसा धर्म नहीं है। अत: जैसे शुक्तिरजतमें शुक्तिकी इदन्ता भासित होती है, वैसे ही आत्मगत प्रेमास्पदताके अहमर्थमें अभानका नियम नहीं कहा जा सकता।
दूसरा पक्ष भी संगत नहीं है; क्योंकि आरोप्यगत वे ही धर्म अधिष्ठानमें प्रतीत हो सकते हैं, जो अधिष्ठानगत धर्म-प्रतीतिके विरोधी न हों। अतएव सर्पगत भीषणता, अधिष्ठानगत इदन्ता-प्रतीतिके अविरुद्ध होनेके कारण अधिष्ठानमें भासित होती है, परंतु अधिष्ठानगत धर्म इदन्ताकी प्रतीतिके विरुद्ध देशान्तरस्थत्वादि अन्य धर्मकी प्रतीति नहीं होती। ठीक उसी तरह आत्मामें भी आरोप्य अहमर्थके वे ही धर्म प्रतीत हो सकेंगे, जो आत्मधर्म-प्रतीतिके बाधक न हों। परंतु यहाँ तो अप्रेमास्पदत्वरूप आरोप्यधर्म प्रेमास्पदत्वरूप अधिष्ठानभूत आत्मधर्म-प्रतीतिसे विरुद्ध है, अत: आत्मामें उसका आरोप नहीं हो सकेगा। जिस समय ही अहमर्थसे आत्मैक्यका अभ्यास होगा, उसी समय आरोप्यमें भी प्रेमास्पदत्व प्रतीत होगा। फिर तो आरोप्यमें अप्रेमास्पदत्व नहीं प्रतीत होगा। ऐसी स्थितिमें अधिष्ठानभूत आत्मामें उसके अप्रेमास्पदत्वकी प्रतीति कैसे हो सकती है? कुछ लोग परिहार करते हैं कि आत्मा सुख एवं अनुभवरूप है, इसीलिये ‘अहं सुखमनुभवामि’—मैं सुखका अनुभव करता हूँ, इस तरह अहमर्थसे भिन्न सुख और अनुभवकी प्रतीति होती है। परंतु यह ठीक नहीं है; क्योंकि वैषयिक सुख और अनुभव आत्मासे पृथक् वस्तु है और वही विषयोपप्लवविवर्जित स्वप्रकाश अनन्त आनन्दरूप ही है।
कहा जाता है कि मोक्षमें यदि अहमर्थ न रहेगा, तब तो ‘आत्मनाश ही मोक्ष है’ यह बाह्य (शून्यवादी) मत आ जायगा; क्योंकि उस मतके समान ही तुम्हारे मतमें भी प्रेमास्पद अहमर्थका नाश स्वीकार्य है। अहमर्थसे भिन्न अन्य किसीकी तरह तो शून्यवादीके यहाँ भी शून्य बना ही रहता है, परंतु यह सब निरर्थक है। औपाधिक प्रेमास्पद अहमर्थके नाशसे यदि आत्मनाशापत्ति हो तो औपाधिक प्रेमास्पद देहनाशमें भी आत्मनाशकी प्रसक्ति होगी। अतएव जो यह कहा जाता है कि ‘मामृतं कृधि ज्योतिरहं विरजा विपाप्मा भूयासम्’ इत्यादि श्रुतियोंसे अहमर्थके ही अमृतत्व, विरजस्त्व विपाप्मत्वादिकी आकांक्षा होती है, अत: मुक्तिमें अहमर्थका होना अनिवार्य है। यह भी ठीक नहीं क्योंकि वहाँ सर्वत्र ‘अहम्’ के लक्ष्यार्थ चैतन्यके ही अमृतत्वादिकी आकांक्षा है। जैसे ‘अहं पुष्ट: स्याम्’—मैं पुष्ट होऊँ, यहाँ स्वसमयविद्यमान शरीरकी ही पुष्टता अभीष्ट है, वैसे ही उपर्युक्त विषयमें भी समझना चाहिये। यद्यपि ‘शरीरं पुष्टं स्यात्’—शरीर पुष्ट हो, इस इच्छाके समान ‘आत्ममात्रं मुक्तं स्यात्’—आत्ममात्र मुक्त हो ऐसी इच्छा नहीं दिखायी देती, अत: मुक्तिकी अनिष्टतापत्ति कही जा सकती है तथापि विचार करनेसे विदित होगा कि इच्छाके समय अन्त:करणका अध्यास होता है। अतएव यद्यपि आत्ममात्रकी मुक्तिकी इच्छा नहीं अनुभूत होती तथापि विशिष्टगत मुक्तिकी इच्छाका ही शुद्धात्मगतत्वेन पर्यवसान होता है। आशय यह है कि इच्छाके भासक साक्षीसे ही अहमर्थका भान होता है, अत: इच्छाके उल्लेखकालमें अहमर्थका उल्लेख होनेपर भी विवेकियोंको अहमर्थके विविक्त आत्मगतरूपसे ही मुक्तिकी इच्छा होती है। अविवेकीको भी, जो दु:खमूलवाला हो, उसमें दु:खमूलका उच्छेद हो, ऐसी इच्छा होती है। इस तरह शुद्धात्मामें दु:खमूलोच्छेदरूप मुक्तिकी इच्छा पर्यवसित होती है; क्योंकि दु:खमूल अज्ञानवाला नहीं है।
कहा जाता है कि यदि अहमर्थ अन्त:करण ग्रन्थिरूप ही है, तब तो ‘मम मन:’—मेरा मन, मेरा अन्त:करण—ऐसी बुद्धि नहीं होनी चाहिये; क्योंकि अन्त:करण और मन दोनों एक ही वस्तु हैं, परंतु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि अन्त:करण जडमात्र है। परंतु चेतन आत्मा और अन्त:करण—इन दोनोंकी ग्रन्थि अहमर्थ है। इस भेदसे ‘मेरा मन’ इस रूपमें षष्ठी अर्थात् सम्बन्ध बन सकता है। फिर भी कहा जाता है कि ‘मन: स्फुरति, मनोऽस्ति’ इस ज्ञानमें भी मनकी सत्ता और स्फूर्तिरूप आत्मासे सम्बन्ध है, अत: इसे भी चिदचिद् ग्रन्थि कहा जा सकता है। फिर अहं इस ज्ञान और ‘मन: स्फुरति’ इस ज्ञानमें समता क्यों नहीं प्रतीत होती? यह ठीक नहीं है; क्योंकि सम्बन्धमात्र ही ग्रन्थि या संवलन नहीं कहा जाता, किंतु तादात्म्येन प्रतिभास (अभेदरूपसे प्रतीति) ही संवलन या ग्रन्थि है। ‘मन: स्फुरति, मनोऽस्ति’ इत्यादि स्थलोंमें आख्यातसे मनमें स्फुरण एवं सत्ताकी आश्रयता ही प्रतीत होती है, मनमें स्फुरणादिका तादात्म्य नहीं प्रतीत होता। अहं इस स्थानमें तो अन्त:करणका चेतनमें तादात्म्याध्यास है।
कहा जाता है कि सभी भ्रान्तियोंमें अधिष्ठानांश और आरोप्य—इन दो अंगोंकी अवश्य प्रतीति होती है। यदि ‘इदं रजतम्’ इत्यादि भ्रान्तियोंमें अधिष्ठानांश इदन्ताकी प्रतीति न अपेक्षित हो, तब तो बिना अधिष्ठानका भ्रम मानना पड़ेगा, जिससे शून्यवादकी प्रसक्ति अवश्य होगी। परंतु ‘अहं’ इस भ्रान्तिमें तो दो अंशकी प्रतीति ही नहीं होती। यदि कहा जाय कि वहाँ भी दो अंशकी कल्पना कर लेनी चाहिये, तब तो फिर ‘आत्मा’ इस बुद्धिमें भी दो अंशकी कल्पनासे भ्रान्तिता-सिद्धि माननी होगी। यदि दो अंशकी प्रतीति न होनेसे ‘आत्मा’ इस प्रतीतिकी भ्रान्ति न मानें, तब तो ‘अहं’ इस प्रतीतिको भी भ्रान्ति मानना व्यर्थ है। इन सन्देहोंका समाधान यह है कि यदि भ्रान्तिमें अधिष्ठान और आरोप्य—इन दो अंशकी प्रतीतिका आपादन करना है तो वह तो मान्य ही है। अहमर्थका मिथ्यात्व ही उसके द्वितीय अंशके होनेमें प्रमाण है। परंतु ‘आत्मा’ इस बुद्धिके विषयमें भी दो अंश है, इसमें तो कुछ भी प्रमाण नहीं है। अत: ‘आत्मा’ इस बुद्धिमें भी दो अंशकी कल्पनाका अवकाश नहीं है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि भिन्न-भिन्न दो प्रकारोंसे अवच्छिन्न, अधिष्ठान और आरोप्यका विषय करना ही भ्रान्तिके दो अंश हैं; क्योंकि जहाँ रजतत्वसंसर्गके आरोपसे ही ‘इदं रजतम्’ ऐसी प्रतीति होती है, वहाँ दो प्रकारका भान नहीं होता है। रजतत्वमें कोई भी दूसरा प्रकार (विशेषण) नहीं है। रजतादिको रजतत्वका प्रकार माननेमें भी कोई प्रमाण नहीं है।
कुछ महानुभाव यह भी कहते हैं कि अहमर्थाध्यासमें भी ‘अज्ञोऽहं स्फुराम्यहम्’ इस तरह स्फुरण और अहं—इन दो अंशोंकी प्रतीति होती ही है। जैसे कभी ‘रजतम्’ इतनेका ही उल्लेख होता है, वैसे ही ‘अहं’ इतनेका भी उल्लेख बन सकता है। अत: ‘रूप्यं स्फुरति’ की तरह ‘अहमस्मि, अहं स्फुरामि’ यहाँपर स्पष्ट दोनों ही अंशोंकी प्रतीति होती है। इतना भेद अवश्य है कि जहाँ इदन्त्वावच्छिन्न स्फुरण अधिष्ठान है, वहाँ ‘इदं रूप्यम्’ इत्यादि प्रकारसे बुद्धि होती है, जहाँ केवल स्फुरणभाव ही अधिष्ठान है, वहाँ ‘स्फुरामि’ ऐसी ही बुद्धि होती है। फिर भी ‘मन: स्फुरति, अहं स्फुरामि’ इन दोनों प्रतीतियोंमें विलक्षणता इसलिये है कि ‘मन’ शब्दसे मनस्त्वमात्र विवक्षित है और ‘अहं’ शब्दसे मन और देहसे अवच्छिन्न चित्स्वरूप उच्चारयितृत्वका उल्लेख होता है। यहाँ सन्देह होता है कि ‘अहं स्फुरामि’ यह भ्रम तो अध्यस्त है, अत: वह अधिष्ठान कैसे होगा? परंतु यह ठीक नहीं; क्योंकि वहाँ स्फुरणरूप चैतन्यको ही अधिष्ठान कहा जाता है, अविद्यावृत्तिको नहीं। इस तरह ‘अहमर्थ आत्मा है’ इसमें प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं है। मोक्षसाधन कृतिका आश्रय होनेसे अहमर्थ मोक्षमें अन्वयी है, यह अनुमान भी प्रमाण नहीं है; क्योंकि कृत्याश्रयमें मोक्षान्वयित्वकी व्याप्तिका कहीं दृष्टान्त ही नहीं है। सामान्य व्याप्तिमें भी व्यभिचार है। ऋत्विज लोग स्वर्गसाधन कृतिके आश्रय तो होते हैं, परंतु स्वर्गान्वयी नहीं होते। अहमर्थ अनर्थका आश्रय होनेसे सम्प्रतिपन्नकी तरह अनर्थ-निवृत्तिका आश्रय है, इस अनुमानसे भी अहमर्थकी आत्मता नहीं सिद्ध होती; क्योंकि यह अनुमान शरीरमें व्यभिचारी है। ‘अहमज्ञ:’ इस प्रतीतिसे जैसे अहमर्थमें अनर्थाश्रयताकी प्रतीति होती है, वैसे ही ‘स्थूलोऽहमज्ञ:’ इस प्रतीतिसे शरीरमें भी अनर्थाश्रयता सिद्ध होती है।
कहा जाता है कि ‘कस्मिन् न्वहमुत्क्रान्ते उत्क्रान्तो भविष्यामि, कस्मिन् वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामि’, ‘स प्राणमसृजत’, ‘हन्ताहमिमास्तिस्रो देवता:’ इत्यादि श्रुतियोंमें प्राण और मनके पहले ही अहंका श्रवण है। ‘तदात्मानमेवावेदहं ब्रह्मास्मि’ इस श्रुतिमें भी शुद्धात्मामें ‘अहं’ पदका प्रयोग है। ‘अहमित्येव यो वेद्य: स जीव इति कीर्तित:। स दु:खी स सुखी चैव स पात्रं बन्धमोक्षयो:’ इत्यादि श्रुतियोंमें भी अहमर्थसे ही बन्ध-मोक्षका होना सिद्ध होता है। ‘तद्योऽहं सोऽसौ’, ‘मामेव ये प्रपद्यन्ते’ (गीता ७।१४) इनसे भी मालूम होता है कि अहमर्थ ही आत्मा है, परंतु यह सब विचार असंगत है। उपर्युक्त सभी स्थानोंमें लक्षणासे ही विशिष्ट वाचक अहं शब्दका शुद्ध आत्मामें प्रयोग मानना चाहिये, यह बात पहले ही कही जा चुकी है। जैसे ‘युष्मद्’ शब्द सम्बोध्य चेतनका बोधक होता हुआ भी लक्षणया अचेतनमात्रका बोधक होता है; वैसे ही ‘अस्मद्’ शब्द अहंकारविशिष्ट चेतनका बोधक होता हुआ भी लक्षणासे केवल शुद्ध चेतनमें ही प्रयुक्त होता है।
आन्तर-बाह्य सभी प्रपंचका अधिष्ठान (आधार) सत् ही है, इसलिये घट, पट, मठ, पृथ्वी, जल, तेज, आकाश सबके साथ ‘सत्’ (है) लगता है; जैसे आकाश सत् (है), वायु सत् (है), घट सत् (है) आदि। जैसे मिट्टीके घट-उदंचन आदि हर एक कार्यमें मिट्टी है, जलके तरंग, बुलबुले आदि हर एक कार्यमें जल है, वैसे ही एक कार्यमें सत्, सत्ता या हस्ती है, अत: वही सत् कारण है। आकाशका कारण ‘अहं तत्त्व’ है और उसका कारण ‘महत्तत्त्व’ और उसका भी ‘अव्यक्त तत्त्व’ है। जैसे सुषुप्तिमें अज्ञान या निद्रासे आवृत स्वप्रकाश सत‍्द्वारा ही मेघसे ढँके हुए सूर्यमें बादलकी तरह अज्ञान या निद्राका प्रकाश होता है, वैसे ही समष्टि अज्ञान या निद्रासे आवृत व्यापक स्वप्रकाश सत् ही उसका प्रकाशक होता है। आवृत सत‍्से भासित समष्टि अज्ञानको ही ‘अव्यक्त’ कहा जाता है। उस अव्यक्तसे उत्पन्न होनेवाली समष्टि बुद्धि या ज्ञानको ही ‘महत्तत्त्व’ कहा जाता है। जैसे घोर नींदसे अकस्मात् जगाये जानेपर पहले अहंकार-ममकारसे शून्य केवल कुछ ज्ञान होता है, वैसे ही समष्टि सुषुप्तिके पश्चात् अज्ञानावृत सत‍्को अहंकार-ममकार-शून्य समष्टि ज्ञान उत्पन्न होता है। यह ज्ञान अज्ञानरूप अव्यक्तका परिणाम है। जैसे अप्रकाशरूप पर्वतकी खानसे प्रकाशमय मणिका प्रादुर्भाव होता है, किंवा जैसे सूर्यके प्रकाशको न व्यक्त करनेवाली मिट्टीसे ही उत्पन्न होकर काँच सूर्यप्रतिबिम्बका ग्राहक होता है, वैसे ही निखिल शक्तियोंके आश्रय केन्द्र अज्ञान (अचित्तत्त्वसे) चैतन्य-प्रतिबिम्बग्राहकज्ञान उत्पन्न होता है (यहाँ चित्स्वरूप परमात्मासे विलक्षण अचित् या जड-शक्ति ही अज्ञान पदसे विवक्षित है, इसीका परिणाम वृतिरूप ज्ञान है)। यह स्वप्रकाश परमात्मरूप नित्यबोध या ज्ञानसे भिन्न है, अत: उसीके प्रतिबिम्ब या आभाससे युक्त होनेके कारण अचित्परिणाममें औपचारिक ‘ज्ञान’ पदका प्रयोग होता है। जाग्रत् एवं स्वप्नके ज्ञानोंका सुषुप्ति में लय हो जाता है और सुषुप्तिके पश्चात् ही इनका पुन: प्रादुर्भाव होता है। अत: जैसे मिट्टीसे उत्पन्न और उसमें लीन होनेवाले विकारोंका मिट्टी कारण समझी जाती है, वैसे ही जाग्रदादि ज्ञानोंका सौषुप्त अज्ञान कारण समझा जाता है। सोकर जागनेवालेके अहंकार-ममकारसे शून्य प्राथमिक ईक्षण (ज्ञान)-के समान ही अज्ञानोपहित सत‍्का अहंकार-शून्य केवल ईक्षण (ज्ञान) ही महत्तत्त्व है।
पुनश्च जैसे सामान्य ईक्षणके अनन्तर ‘मैं अमुक हूँ’ इत्यादि रूपसे अहंकारका उल्लेख होता है। वैसे ही सत‍्के ईक्षणके बाद उसमें ‘एकोऽहं बहु स्याम्’—मैं एक हूँ, अनेक होऊँ, इस रूपसे अहंकारका उल्लेख होता है, वही ‘अहंतत्त्व’ है। सुषुप्तिकी ओर जाते हुए भी ‘मैं कहाँ और कौन हूँ’ इत्यादि अहंकारका पहले लय होता है। केवल कुछ चेत (ज्ञानसामान्य) रह जाता है। अन्तमें वह भी अज्ञान या सुषुप्तिमें लीन हो जाता है, परंतु आत्मा या परमात्मस्वयंरूप नित्यबोध या ज्ञान तो इन तीनोंका भासक है, स्वप्रकाश सत‍्रूप है। जैसे बादलकी टुकड़ी देखकर आकाशव्यापी मेघमण्डल बुद्धिमें आरूढ हो सकता है, वैसे ही व्यष्टि (जीवगत) अहंकार, बुद्धि (ज्ञान), अज्ञान (सुषुप्ति)-से ईश्वरगत समष्टि अहंतत्त्व, महत्तत्त्व और अव्यक्ततत्त्वका बोध हो जाता है। जैसे अहंकारपूर्वक ही जीवका कार्य होता है, वैसे ही अहंकारपूर्वक ही परमात्मासे आकाशादि समस्त प्रपंच उत्पन्न होते हैं। तभी अहंतत्त्वसे शब्दतन्मात्रा या अपंचीकृत सूक्ष्म आकाशकी उत्पत्ति मानी गयी है। सर्वप्रथम अज्ञान या अचित् भी स्वप्रकाश सत‍्की ही शक्ति है। अत: वह भी सत‍्से स्वतन्त्र होकर स्वत: सत् नहीं है। जैसे सिता (शर्करा)-के सम्बन्धसे अमधुर वस्तु भी मधुर प्रतीत होती है, वैसे ही स्वप्रकाश सत‍्के सम्बन्धसे ही अव्यक्तादि सभी प्रपंचमें सत्ता और स्फूर्ति प्रतीत होती है। अतएव जैसे लहरोंमें भीतर-बाहर जल ही रहता है, वैसे ही अव्यक्तसे लेकर सभी प्रपंचके भीतर-बाहर सत् ही है, स्फूर्ति ही है। जैसे जलके बिना लहर कोई वस्तु ही नहीं, वैसे ही सत‍्के बिना—स्फूर्तिके बिना अव्यक्त, अचित्, महत्तत्त्व, अहंतत्त्व, आकाशादि सब असत् हो जाते हैं। जबतक उनमें सत‍्का योग है, तबतक उनका होना, उनकी सत्ता या स्फूर्ति है। सत‍्के बिना सब-के-सब असत् हो जाते हैं। इसीलिये कहा है—‘जासु सत्यता तें जड़ माया। भास सत्य इव मोह सहाया॥’ अत: अचित् आदि सभी मिथ्या हैं। अधिष्ठानका साक्षात् बोध होते ही सब मिट जाते हैं।
आकाशसे वायु, तेज, जल, पृथ्वी, घटादि सब उत्पन्न होते हैं और क्रमेण सब उसीमें लीन हो जाते हैं तथापि घटाकाश, शरावाकाश, महाकाश आदि अनेक कल्पनाएँ हो जाती हैं। आकाशसे ही सूर्य, उससे ही घट और जल, उसका ही आकाश और सूर्यरूपसे बिम्ब-प्रतिबिम्ब होना संगत है और पार्थिव प्रपंच पृथ्वीमें, पृथ्वी जलमें, जल तेजमें, तेज वायुमें और वायुके आकाशमें मिलते ही सब कुछ केवल आकाश ही रह जाता है। उसी तरह स्वप्रकाश सत‍्से ही उत्पन्न अनेक उपाधियोंसे बिम्ब-प्रतिबिम्ब जीव, जगत् आदि अनेक भेद बनते हैं, परंतु उत्पत्तिके विपरीत क्रमसे जब सब कुछ परमात्मामें लीन हो जाता है, तब एक ही परमात्मा रह जाता है। जैसे आकाशसे ही क्रमेण घट, उसीसे जल, उसीसे प्रतिबिम्ब और वही बिम्ब होता है, अन्तमें आकाश कार्य होनेसे सबका उसीमें लय हो जाता है, वैसे ही सर्व प्रपंच अनन्त, अखण्ड, स्वप्रकाश चित‍्से ही उत्पन्न होता है, उसीमें लीन हो जाता है। ‘अहमेवासमेवाग्रे नान्यद्यत्सदसत्परम्। पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम्॥’ (श्रीमद्भा० २।१०।३२) भगवान‍्की उक्ति है कि सृष्टिके पहले एक मैं ही था, मुझसे भिन्न कार्यकारण कुछ भी नहीं था, सृष्टि होनेपर भी जो प्रपंच उपलब्ध होता है, वह भी मैं ही हूँ और अन्तमें जो अवशिष्ट रहता है, वह भी मैं हूँ। ‘आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा। वितथै: सदृशा: सन्तोऽवितथा इव लक्षिता:।’ (माण्डूक्यकारिका ४।३१) अर्थात् जो आदिमें नहीं, अन्तमें नहीं, वह मध्यमें भी नहीं ही है। यद्यपि मध्यमें सत्-सा प्रतीत होता है तथापि है असत् ही। घटादि कार्य अपनी उत्पत्तिके पहले नहीं थे, अन्तमें नष्ट होनेके बाद भी नहीं रहते हैं। अत: मध्यमें सत्-से प्रतीत होनेवालोंको भी असत् ही समझना चाहिये। जलकी लहरें, पानीके बुलबुले और स्वप्नके पदार्थ, उत्पत्ति या प्रतीतिके पहले भी नहीं रहते, अन्तमें भी नहीं रहते, केवल मध्यमें प्रतीत होते हैं, तो भी उन्हें असत् ही समझना उचित है। ‘अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत। अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना॥’ (गीता २।२८) सभी प्रपंच उत्पत्तिके पहले अव्यक्त ही था, अन्तमें भी सब अव्यक्त हो जाता है, केवल मध्यमें व्यक्त है, फिर उसके लिये क्या रोना? कोई अत्यन्त प्रिय वस्तु या व्यक्ति अदर्शन—अज्ञानसे ही आया, अन्तमें पुन: अदर्शनमें ही चला गया। फिर जो न अपना है, न जिसके हम हैं, उसके लिये क्या रोना? ‘अदर्शनादापतिता: पुनश्चादर्शनं गता:। नैते तव न तेषां त्वं तत्र का परिदेवना॥’ (महा० स्त्रीपर्व २।१३)
जैसे मिट्टी या जलके भीतर ही तरह-तरहके पात्र और तरंग आ जाते हैं, वैसे ही मनके भीतर ही सब दृश्य आ जाते हैं। मनकी हलचलमें ही दृश्य दिखलायी पड़ता है और उसके मिटनेमें मिट जाता है, अत: सब कुछ मन ही है। वह मन स्वप्रकाश सत् या भानके भीतर आ जाता है, अत: स्वप्रकाश सत् या अबाध्य अनन्त भान ही सब कुछ है। जैसे दर्पणके भीतर भूधर-सागर, गगनमेघमाला, सूर्य-चन्द्र-नक्षत्र, वन-उपवन, नगर आदि प्रतिबिम्बरूपमें दिखायी देते हैं, वैसे ही अव्यक्तादि स्थावरान्त सदसत् सकल प्रपंच कूटस्थ स्वप्रकाश सत् या भानमें दिखायी देता है। जाग्रत्-स्वप्नके द्रष्टा, दर्शन, दृश्य, सुषुप्तिकी निद्रा या अज्ञान जिससे प्रकाशित होते हैं, वही शुद्ध भानरूप आत्मा है। ज्ञाता-ज्ञान-ज्ञेय, जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति, प्रकाश-प्रवृत्ति-मोह (रज-तम-सत्त्व) इन सबका प्रकाशक, सबका अधिष्ठान, सबका कारण, सबसे अतीत सत् ही आत्मा है। वह प्रतिबिम्बके समान है, प्रतिबिम्ब नहीं। अत: उससे पृथक् बिम्बकी सत्ता नहीं अपेक्षित है।
जैसे शुद्ध दर्पण देखनेसे प्रतिबिम्ब दृष्टि मिट जाती है, वैसे शुद्ध सत् देखनेसे प्रपंच-बुद्धि मिटती है। बोध होनेके उपरान्त यद्यपि प्रपंचका मूल अज्ञान मिट जाता है तथापि प्रारब्धदोषसे प्रारब्ध-स्थितितक प्रपंचकी प्रतीति होती है। भोगसे प्रारब्ध मिटनेपर अवश्य ही प्रपंचप्रतीति भी मिट जाती है—‘तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोक्ष्ये अथ सम्पत्स्ये’, (छां० उ० ६।१४।२) ‘भोगेन त्वितरे क्षपयित्वाथ सम्पद्यते।’
फिर भी मनको निर्गुण, निराकार, निर्विकार परब्रह्ममें प्रतिष्ठित करनेके लिये प्रथम वाक्, चक्षु आदि कर्मेन्द्रियों और ज्ञानेन्द्रियोंको रोक लेना चाहिये अर्थात् भाषण, दर्शन आदि इन्द्रियोंके व्यापारोंको रोककर केवल मनसे जप या ध्यान करते रहना चाहिये। जब कुछ कालके अभ्याससे दर्शनादि व्यापाररहित होकर मानस ध्यान, जपादि स्थिर हो जाय, तब मनको बुद्धिमें लय कर देना चाहिये। अर्थात् संकल्प-विकल्पात्मक मनके व्यापारको निश्चयात्मिका बुद्धिमें लीन कर देना चाहिये। केवल ध्येय लक्ष्यके दृढ़ निश्चयमें संकल्प समाप्त कर देना चाहिये। पश्चात् व्यष्टि-बुद्धिको समष्टि-बुद्धि अर्थात् महत्तत्त्वमें लीन करना चाहिये और उसे फिर समष्टिबुद्धिके भी भासक शान्त आत्मामें लय करना चाहिये अथवा वागादिव्यापारोंका मनमें लय करके मनको निश्चयात्मिका बुद्धिमें, फिर उसे समष्टिबुद्धिमें और उसे शान्त आत्मामें नियन्त्रित या लीन करना चाहिये। बुद्धिके भासक शुद्ध भानका ही चिन्तन करना तदभिन्न वस्तुका चिन्तन न करना ही उसका लय है। ‘यच्छेद्वाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान आत्मनि। ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेत्तद्यच्छेच्छान्त आत्मनि॥’ (कठोप० १।३।१३)
कुछ महानुभावोंने और तरहसे भी इस मन्त्रका आशय कहा है। वागादि व्यापारोंका चिन्तन न करके केवल मनोव्यापारको देखना चाहिये। पश्चात् मनका चिन्तन करके ज्ञान आत्मा अर्थात् अहमर्थ (मैं)-का ध्यान करना चाहिये। अर्थात् पहले वागादि व्यापारोंकी उपेक्षा करके मनोव्यापारको देखे, फिर मनोव्यापारका उसके प्रेरक ‘मैं’ में लय करना चाहिये।
यहाँ ‘जानातीति ज्ञानम्’ इस व्युत्पत्तिसे ज्ञानका जाननेवाला ‘अहं’ (मैं) अर्थ होता है और फिर उस अहंका भी सूक्ष्म अहं (अस्मिता)-में लय करना चाहिये। अर्थात् स्थूल अहं (मैं)-को छोड़कर अस्मिताका ध्यान करना चाहिये। ‘अहं’ का मैं कर्ता-भोक्ता, सुखी-दुखी यह स्थूल रूप है। अस्मि (केवल हूँ) यह उसका सूक्ष्मरूप है। यही महान् आत्मा है, उसे भी उसके भासक शुद्ध भानरूप आत्मामें लय करना चाहिये। अर्थात् ‘अस्मि’ (हूँ) ऐसा भी चिन्तन छोड़कर, उसके भासक अनन्त सत् और भानरूप आत्माका ध्यान करना चाहिये।
महाविक्षेपकालमें भी सब कुछ भगवान् ही है, इस बुद्धिसे शान्ति मिलती है। ‘सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत।’ (छां० उ० ३।१४।१) अर्थात् जैसे तरंग, लहर, बुद‍्बुद आदि जलराशिसे उत्पन्न, उसीमें स्थित और उसीमें लीन होते हैं, अत: जलस्वरूप ही है, वैसे ही सर्व दृश्यादृश्य जगत् तज्ज, तल्ल, तदन है अर्थात् स्वप्रकाश सत्स्वरूप ब्रह्म भगवान‍्से ही उत्पन्न, उन्हींमें स्थित और उन्हींमें लीन होता है, अत: सब कुछ भगवान् ही है—ऐसी भावना आते ही राग-द्वेष, वैर-वैमनस्य, उद्वेग मिटकर ध्रुव शान्ति मिलती है।


श्रोत: मार्क्सवाद और रामराज्य, लेखक: श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट
निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें

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