4.5 गर्भ-शास्त्र
कहा जाता है कि ‘गर्भ-शास्त्र’ के आधारपर विकास सिद्ध होता है। पानीमें पड़े हुए पत्तों या लकड़ियोंपर जो लसदार काले चिकने कण दिखायी पड़ते हैं, वे मेढकोंके अण्डे हैं। तीन-चार दिनमें ये कण या पिण्ड पूँछदार और चपटे सिरवाले जन्तुका आकार धारण कर लेते हैं। फिर इनके गलेके पास मछलियोंकी तरह श्वास लेनेके गलफड़े बन जाते हैं। ये सब बातें अण्डेमें ही हो जाती हैं। इसके बाद बच्चे अण्डोंको छोड़कर पानीपर तैरने लगते हैं। वे उस समय गलफड़ोंसे श्वास लेते हैं। उन्हें पूँछ भी होती है। वे एक प्रकारकी मछली ही-जैसे लगते हैं। शीत ऋतु आते ही वे किसी बन्द जगहमें छिप जाते हैं। वर्षाका आरम्भ होते ही वे फिर बढ़ने लगते हैं। धीरे-धीरे पूँछ लुप्त हो जाती है और पैर निकल आते हैं। फेफड़े बनने लगते हैं और वे गलफड़से श्वास लेना बन्द कर देते हैं। तब ये पूरे मेढक बन जाते हैं। इस इतिहाससे मालूम पड़ता है कि प्राणीको अपनी उन्नतिके लिये विकासके पूरे चक्रमें घूमना पड़ता है। जिस-जिस जातिसे घूमता हुआ प्राणी जिस अन्तिम योनिमें पहुँचा है, गर्भसे लेकर वृद्धितकके समयमें ही उसे उन सभी चक्रोंमें घूमना पड़ता है। मुर्गीका अण्डा भी एक कोष्ठवाले अमीबासे ही प्रारम्भ होता है। इसमें भी मछलियोंकी तरह गलफड़े होते हैं। अण्डेसे बाहर आनेपर भी गलेके पास इसके चिह्न रहते हैं। इससे यही अनुमान होता है कि पक्षी भी मछली और मेढकके रूपोंमें होता हुआ ही पक्षी बना है। यद्यपि गर्भके परिवर्तन बहुत संक्षिप्त होते है तथापि वे अपनी पूर्व-पीढ़ियोंका सब इतिहास दिखला देते हैं। सूअर, गौ, खरगोश और मनुष्यादि स्तनधारियोंके गर्भ सब एक ही प्रणालीसे विकसित होते हैं। मानवगर्भ क्रमश: मछली, मेढक, सर्प और पक्षीके आकारका होकर तब स्तनधारियोंकी अवस्थामें आता है। इससे ज्ञात होता है कि मनुष्यका इन योनियोंसे सम्बन्ध है। चाहे लाखों वर्ष लगे हों, पर मनुष्यकी उत्पत्ति अमीबासे ही हुई है। यह प्रत्यक्ष प्रमाण है। प्रकृति इससे अधिक क्या प्रमाण दे सकती है? कीड़ोंके प्रथम पिण्ड सब समान ही होते हैं। उस दशामें नहीं पहचाना जा सकता कि यह तितली, भौंरा, ततैया अथवा कनखजूरा क्या है? तितली और रेशमके कीड़े भी, जो अपनी वृद्धिमें अनेक रूप दिखलाते हैं, प्राथमिक दशामें एक ही समान रहते हैं। इससे यही मालूम होता है कि ये सब एक ही पूर्वजोंकी संतति हैं, जो अपनी पीढ़ियोंका पूरा चक्कर लगा रहे हैं। गर्भके बढ़नेका क्रम इस प्रकार है—पहले एक कोष्ठ, फिर दो कोष्ठ, फिर दोके चार, इस तरह चारके आठ और आठके सोलह कोष्ठ हो जाते हैं। कोष्ठ सदैव दूने क्रमसे बढ़ते हैं। इसी प्रकार अण्डा भी दूने क्रमसे बढ़ता है। अमीबा एक कोष्ठधारी और हाइड्रा दो कोष्ठधारी होता है। इस तरह गर्भ-शास्त्रसे मालूम पड़ता है कि ‘पहले प्राणी सरल-रचनाके और फिर क्लिष्ट रचनावाले होते हैं।’
उपर्युक्त बातोंपर विचार करनेसे भी विकास सिद्ध नहीं होता। गर्भमें जो सादी रचनाके बाद क्लिष्ट रचना दिखलायी पड़ती है, उसका कारण विकासकी उत्पत्तिका पुनर्दर्शन नहीं, प्रत्युत यन्त्र बनानेका एक साधारण-सा नियम है। किसी भी यन्त्रके बनानेके लिये उसके सूक्ष्म एवं क्लिष्ट पुर्जोंको अटकानेके लिये एक सीधा-सादा आधार आवश्यक होता है। चर्खेके निर्माणमें गराड़ीमें तख्तियोंको डालकर रखा जाता है। साधारण रूल-जैसा डण्डा उसका आधार है। इसके बाद दो खूँटे एक सीधी-साधी पटियामें गाड़कर रखे जाते हैं। यह पटिया ही चर्खेका मूल है अर्थात् एक सीधे मूल आधारपर ही सूक्ष्म, क्लिष्ट पुर्जे जमाये जाते हैं। मोटरमें भी धुरी, कमानी आदि मुख्य आधार है, वह सादा ही है। मनुष्यके शरीररूपी यन्त्रमें भी एक पीठको आधार माना जाता है। उसीको विकासवादी मछली कहने लगते हैं। उसीमें सिर, हाथ, पैर जुड़ जानेपर उसे ही मेढक कहने लगते हैं। पीठकी हड्डीके आधार बिना सिर, हाथ, पैर, हृदय, फुफ्फुस आदि शारीरयन्त्र किस प्रकार एकमें जोड़े जा सकते थे? क्या विकासवादी कोई ऐसा यन्त्र बतला सकते हैं, जिसके क्लिष्ट पुर्जे किसी आधारपर रखे बिना यन्त्ररूप होकर काम दे रहे हों? क्या पीठकी हड्डी (रीढ़)-के बिना शरीरके अवयवोंसे शरीर-पंजर काम लायक बन सकता है? छोटे-छोटे कीड़ोंमें भी जोड़का आधार आवश्यक होता है। वही आधार रीढ़की हड्डी है। अतएव गर्भकी रचना पीढ़ियोंका चक्कर नहीं, प्रत्युत यन्त्र-रचनाके नियमोंका अत्यावश्यक अनुवर्तनमात्र है। यह बतलाया जा चुका है कि अमीबा भी सादा नहीं, अपितु बड़ी क्लिष्ट रचनावाला है। जैसे वटबीजके भीतर सूक्ष्मरूपसे सांगोपांग समूचा वृक्ष विद्यमान रहता है, वैसे ही अमीबाके छोटे स्वरूपमें ही बारीकीके साथ सभी अवयव संनिविष्ट रहते हैं। बालोंमें रहनेवाले लीख, जूँ, खटमल या चींटीके शरीरमें भी बड़ी ही सूक्ष्म कारीगरी होती है। उन्हें भी सादी-रचनावाले नहीं कहा जा सकता। अतएव ‘मैन्युअल ऑफ जियालॉजी’ में मि० निकल्सनका कहना है कि ‘अमीबा नामक क्षुद्र जन्तु अकल्प्य, सूक्ष्म कण ही है, परंतु उसकी पाचन-शक्ति क्लिष्ट-से-क्लिष्ट रचनावाले प्राणियोंकी पाचन-क्रियाके यन्त्रोंसे कम नहीं। वह अपने अन्दर भोजन लेता है और बिना किसी पृथक् अवयवके उसे पचा जाता है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि वह भोजनमेंसे पोषकभाग रख लेता है और अनुपयोगी भाग निकाल डालता है।’
हक्सलेका भी ‘प्राणियोंके वर्गीकरण’ की भूमिकामें कहना है कि ‘ग्रेगारिनीडा’ वर्गके जन्तुओंसे नीचे दर्जेके अन्य जन्तु नहीं हैं, परंतु ‘रीजोपोड़ा’ वर्गके सूक्ष्म जन्तु उनसे भी अधिक सादी रचनाके हैं। सूक्ष्म-वीक्षण-यन्त्रसे देखा गया है कि इनमें शरीर-जैसी कोई गठन नहीं होती। ये तो पतले किये हुए सरेसके एक परमाणु-जैसे ही हैं, परंतु इनमें भी जीवन-शक्तिके समस्त गुण रहते हैं। ये अपने ही-जैसे प्राणीसे उत्पन्न होते हैं, भोजन पचा सकते हैं और हलचल करते हैं। इतना ही नहीं, ये अपने घुसनेकी छींट, जो बिलकुल क्लिष्ट-रचनायुक्त होती है, बना लेते हैं। जेलीका यह एक कण प्राकृतिक शक्तियोंको इस प्रकार काबूमें करके ऐसी गणितयुक्त रचना (छींट) बना सकता है, यद्यपि स्वयं रचनारहित और अवयवविहीन है। मेरे लिये यह एक असाधारण सारयुक्त वस्तु है।
इन बातोंसे कौन कह सकता है कि अमीबामें क्लिष्ट-रचना नहीं है? अत: भोग्य और भोक्ता ही क्रमश: सादी और क्लिष्ट रचनावाले हैं। कर्म-ज्ञानहीन वृक्ष भोग्य और ज्ञानहीन कर्मयुक्त पशु भोक्ता है एवं च ज्ञान-हीन पशु भोग्य और ज्ञान-कर्म-युक्त मनुष्य भोक्ता है। विकासवादी वनस्पति और पशुओंकी उत्पत्ति साथ-साथ मानते हैं। यदि प्राणियोंकी उत्पत्तिका चक्कर गर्भमें लगता है तो मनुष्य प्राणी गर्भमें सिरके बल उलटा क्यों लटकता है? विकासवादी नहीं जानते; पर कहा जा सकता है कि वह वृक्षोंका नमूना है। ज्ञान-कर्म-रहित वृक्ष नीचे सिरवाले होते हैं। पैदा होनेके बाद शिशु हाथ-पैरके बलसे तिरछा चलता है, यह कर्म-युक्त ज्ञान-रहित पशु-दशा है। ज्ञानका उदय होनेपर वह खड़ा होकर मनुष्य हो जाता है। गर्भका सिर नीचे रहनेका यही कारण है। यही वृक्षोंकी पहले उत्पत्तिका प्रमाण भी है। वस्तुत: गर्भमें पिछली योनियोंके चक्करकी बात गलत है। मुर्गीका इतिहास दिया गया है। मुर्गी पक्षी-जातिका प्राणी है। इसके पूर्व मछली, मेढक और सर्प जातिके प्राणी हो चुके हैं। मुर्गीके गलफड़ोंने मछलीका रूप दिखलाया और पैर, सिर निकलनेपर मान लिया जाय कि मेढकका रूप दिखलाया, परंतु तीसरे सर्पणशीलोंका रूप क्या है? पक्षी सर्पोंसे बहुत नजदीक हैं, पक्षीका विकास सर्पजातिके प्राणीसे हुआ है, अत: उचित था कि उन सर्पणशील प्राणियोंके गुण पक्षियोंमें हों, परंतु पक्षियोंमें क्या सर्पणशील प्राणियों-सरीखे दाँत होते हैं? एक चमगादड़को छोड़कर किसी अन्य पक्षीके दाँत नहीं हैं, परंतु चमगादड़ सर्पणशीलोंसे पक्षी नहीं हो रहा है, उसके लिये तो पशुओंसे पक्षी होनेकी बात कहना अधिक संगत है; क्योंकि उसके स्तन और कान होते हैं। जब मुर्गीमें सर्पणशीलोंके गुण नहीं, तब पिछली योनियोंमें उसके चक्कर काटनेकी बात कैसे सिद्ध होगी? केवल एक-दो बातें देखकर कल्पनाका इतना बड़ा महल खड़ा करना दुस्साहस ही है।
इसी तरह मण्डूक यदि मछलीसे हुआ होता तो उसको पैर न होने चाहिये थे। वह बढ़नेके समय ही गलफड़ोंसे श्वास लेता है। उसकी यह अवस्था गर्भावस्था ही है। गर्भावस्थामें तो मनुष्यका बच्चा भी नालके द्वारा प्राण और पोषण पाता है। इतनेसे ही क्या उसे मछली कहा जा सकता है? यदि ऐसा होता तो सभी बच्चे पहले गलफड़ेसे श्वास लेते; क्योंकि विकासवादीके अनुसार सभीका विकास मछलीसे हुआ है, परंतु मनुष्य एवं पशुओंके बच्चे मातासे लगे हुए नालसे ही प्राण पाते हैं। इनमें भी यान्त्रिक सिद्धान्तसे निर्माण होता है, अत: रीढ़की हड्डीका पहले निर्माण होता है। उसीको विकासवादी मछलीका आकार समझते हैं। पैर दिखायी पड़नेपर उसे मण्डूक कहने लगते हैं, परंतु सर्पणशीलोंके दाँत और उड़नेवालोंके पर मनुष्यों और पशुओंके गर्भमें नहीं देखे गये। इस चक्कर में इन दोनों विभागोंके लक्षण क्यों नहीं देखे जाते, इसका भी विकासवादमें कोई उत्तर नहीं है।
उसी तरह गर्भ-वृद्धिसे भी न क्रम-क्रमसे प्राणियोंकी उत्पत्ति प्रतीत होती है और न पिछली जातियोंका चक्कर ही होता है। यों तो; जैसे किसी भी मृण्मय पात्रकी उत्पत्तिके पहले मृत्तिका पिण्डावस्थामें रहती है, वैसे ही किसी भी यन्त्र या शरीरके निर्माणके पूर्व उनके उपादान-कारणोंकी एक-दो समान अवस्थाएँ हो ही सकती हैं, परंतु इतनेसे ही ‘ऊँट पहले साँप और छिपकली बनकर फिर ऊँट बना है’ इत्यादि सब अनर्गल बातें नहीं सिद्ध हो सकतीं। स्तनधारियोंमें घोड़ी बारह महीनेमें, गाय नौ, भैंस दस, बन्दर चार और मनुष्य नौ महीनेमें बच्चा पैदा करते हैं। यह नियम न शरीरकी मजबूतीपर निर्भर है और न आयुपर ही। घोड़ा मनुष्यसे बलमें अधिक, पर आयुमें कम और गर्भवासमें अधिक है। कछुआ मनुष्यसे आयुमें अधिक, बलमें कम और गर्भवासमें बहुत ही कम है। क्या कोई विकासवादी इसका कारण बतला सकता है? गर्भके अन्दर बँधी हुई गठरीकी तरह रहनेपर भी शरीरका न कोई अंग किसी दूसरे अंगसे चिपकता है और न विकृत ही होता है। बाहर ऐसा होनेपर सब अंग विकृत हो जाते हैं, इस भेदका क्या कारण है? गर्भकी विचित्रता, महत्ता भी ईश्वरी कारीगरीका एक नमूना है। एक नगण्य शुक्र-शोणित-बिन्दु क्रमेण वृद्धिंगत होकर हस्त, पाद, नेत्र, श्रोत्र, बुद्धियुक्त होकर ज्ञानवान् हो जाय, यह ईश्वरकी अघटित-घटना-पटीयसी मायाशक्तिका वैचित्र्य है। गर्भके विकासवादी इतिहासपर विज्ञानवेत्ताओंको भी पूरा विश्वास नहीं है। हक्सले और हेकलका कहना है कि ‘गर्भका इतिहास अति संक्षिप्त एवं अधूरा है।’ प्रश्न हो सकता है कि ऐसा क्यों? यदि गर्भ-इतिहास प्राणियोंके विकास-क्रमकी पाठमाला है तो इसमें गड़बड़ी कैसे? बीचमें गर्भ बेसिलसिले क्यों भासित होने लगे? मण्डूकसे सर्पणशील होकर पक्षी होना, पर सर्पोंकी हालतका पता नहीं। बीचमें पुच्छल ताराकी शकलें क्यों आ गयीं? विकासवादी कहते हैं कि ‘इस गर्भावस्थाके इतिहासमें जहाँ समानताएँ समाप्त होकर भिन्न-भिन्न मार्गोंका अवलम्बन करती हुई प्रतीत होती हैं, वहाँ वे स्थान बतलाते हैं कि प्राणियोंने परिस्थितिके अनुसार भिन्न-भिन्न मार्गोंसे चलना आरम्भ किया।’ शायद इसका मतलब यह है कि जहाँसे घास खानेवाले स्तनधारियोंके बाद स्तनधारियोंमें मांस खानेकी प्रवृत्ति हुई, वहीं प्रक्षेप है, परंतु यह बहुत भद्दा समाधान है। क्या घास खानेवालेसे एकदम मांस खानेवाले हो गये? क्या गायके बछड़ोंमेंसे एक भेड़िया हो गया; क्योंकि मछलीसे मेढक होना जितना कठिन है, बछड़ेसे भेड़िया होना उतना कठिन नहीं। वस्तुत: प्रत्येक जातिके स्वतन्त्र गर्भ होते हैं। इसमें पुरानी पीढ़ियोंके चक्करकी बात सर्वथा व्यर्थ है। इसीलिये ‘विकासवाद’ पुस्तकमें हारकर लिखा गया है कि ‘किसी भी प्राणीकी गर्भावस्थाका इतिहास पूर्णतया हम नहीं जानते और न किसीकी गर्भावस्थाके परिवर्तन देखे ही गये हैं अथवा न उनका सार्थक कारण पूर्णतया बतलाया जा सकता है।’
विकासवादी कहते हैं कि ‘तुलनात्मक दृष्टि, मनुष्यकी शरीर-रचना, गर्भ-परिवर्तन, चट्टानोंमें प्राप्त मनुष्यके अवयव आदिसे प्रतीत होता है कि यन्त्रकी भाँति मनुष्य भी उन्हीं प्राकृतिक नियमोंके अधीन रहता है, जिनके अधीन अन्य प्राणी हैं। मनुष्य-देहका भी उन्हीं तत्त्वोंसे निर्माण हुआ है, जिनसे औरोंका। स्तनधारी श्रेणीकी बन्दर कक्षावाली वनमानुष उपजातिमें ही मनुष्यका स्थान है। वानर कक्षाकी विशेषताएँ ये हैं—(१) गर्भनाल झिल्लीसे सम्बन्ध रखता है, (२) हाथों, पैरोंके अँगूठे चारों ओर फिर सकते हैं, अतएव वे पैरसे भी पकड़ सकते हैं, (३) वृक्षोंपर रहते हैं, (४) इनके दूधके दाँत और स्थिर अन्य दाँत होते हैं, (५) वानर-कक्षाके भिन्न वंशोंमें दाँतोंकी संख्या नियत होती है, (६) हाथमें पाँच अँगुलियाँ, नाखून और पंजे होते हैं, (७) हँसुलीकी अस्थियाँ दृढ़ एवं उन्नत होती हैं और (८) प्रत्येकके दो स्तन होते हैं। पूर्णतया सीधे खड़े होकर चलना, मस्तिष्कका बहुत विकास, वाणी-द्वारा स्पष्ट बोलनेकी शक्ति और विचार करनेकी शक्ति यह चार मनुष्यकी विशेषताएँ हैं। पहली दोनों विशेषताएँ तात्त्विक नहीं प्रत्युत परिणामकी हैं अर्थात् छोटाई-बड़ाईका ही अन्तर है। खड़े होकर चलना भी मस्तिष्ककी उन्नतिका परिणाम है।’
‘वानरोंकी जातियाँ, उपजातियाँ तथा वंश अनेक हैं। लीमर अर्धबन्दर है, जो हाथ-पैरसे ही बन्दर प्रतीत होता है। मार्मोसेट भी आकारमें लीमर-सदृश होता है, पर वह वानरोंसे अधिक मिलता है। इसके नाखून पंजेदार होते हैं। सामान्य बन्दर प्रसिद्ध ही है। वनमानुष भी इसी कक्षाका वंश है। इसके पाँच प्रकार हैं—गिवन, ओरांग, औटांग, चिंपांजी और गोरिल्ला। इनके दाँत मनुष्यों-जैसे होते हैं। नाक पीछेकी ओर झुकी होती है; पर अन्दरकी ओर दो छिद्र नहीं होते। इनके हाथ पैरोंसे अधिक लम्बे होते हैं। गालकी थैली और पूँछ बिलकुल नहीं होती। गिवन-जातिकी मादा अपने बच्चेका मुँह धोती है। चिंपांजी शरीरसे बहते हुए खूनको बन्द करनेकी चेष्टा करता है। वैज्ञानिकोंका कहना है कि चिंपांजीकी बुद्धि नौ महीनेके बालकके समान होती है। मनुष्यकी खास विशेषताएँ दो ही हैं—मस्तिष्कका विकास और खड़े होकर चलना। खड़े होकर चलनेका कारण भी मस्तिष्कका विकास ही है। वनमानुष खड़ा होता है, पर झुका रहता है। मनुष्यके खड़े होनेसे ही उसे आँत उतरनेकी बीमारी होती है। मनुष्य और चिंपांजीके मस्तिष्ककी तुलना करनेपर मालूम होता है कि दोनोंमें परिमाणका ही अन्तर है। मनुष्यका मस्तिष्क स्पष्ट होता है और चिंपांजीका अस्पष्ट। यही हाल हाथ-पैरोंका भी है। बन्दर पैरसे वस्तु उठा लेता है। इसी तरह एक जंगली स्त्री भी पैरसे वस्तु उठा लेती है। डाढ़ मनुष्यको देरसे आती है और छोटी होती है, पर गोरिल्लाकी डाढ़ बड़ी बलवान् और शीघ्र निकलनेवाली होती है। असभ्य जातियोंमें भी डाढ़ शीघ्र निकलती है। मनुष्यके शरीरपर प्राय: बाल नहीं होते, किसी-किसीके कानों और कन्धोंपर होते हैं। जापानके ऐन्यू लोगोंकी देहपर बहुत बाल होते हैं। मिस जुलिया पास्ट्राना बहुत बालवाली प्रसिद्ध है। सारांश यही कि मनुष्यका इन जातियोंसे कोई तात्त्विक भेद नहीं, परिमाणका ही भेद है। मनुष्य-शरीरके अवशिष्टांग अर्थात् पुरानी योनियोंके कई अंग अबतक मनुष्यमें पाये गये हैं। मनुष्य अपनी इच्छासे शरीरकी खाल हिला नहीं सकता, यद्यपि हिलानेवाली नसें मौजूद हैं। सिरके चाँदकी चमड़ी भी सब मनुष्य हिला नहीं सकते, पर कोई-कोई हिला सकते हैं। कान भी सब फड़फड़ा नहीं सकते, पर कोई ऐसा कर सकते हैं। नाकसे सूँघकर सब मनुष्य नहीं पहचान सकते, पर कोई पहचान भी सकते हैं। मनुष्य स्वेच्छया रोएँ नहीं खड़ा कर सकते, यद्यपि रोएँ खड़े करनेवाली नसें हैं। इस प्रकारके अंग पशुओंमें पूरे काम कर रहे हैं, जो कि मनुष्योंसे लुप्त हो रहे हैं, पर किसी-किसीमें मौजूद हैं।’
‘भौंहें चढ़ाना; माथा सिकोड़ना; होंठ, गाल और नाकको मनमाना नचाना मनुष्यमें अबतक बना हुआ है। अन्न-नलिकाके अन्तमें एक थैली होती है, जो जानवरोंको तो काम देती है, पर मनुष्यके लिये निष्प्रयोजन है। कभी-कभी तो गुठली (बीजा) आदि कठोर पदार्थ उसमें चले जानेसे वह घातक भी सिद्ध होती है। छठे महीने गर्भके बालकका शरीर बालोंसे छा जाता है, जो वानरका पूर्वरूप है। बन्दरके बच्चे माँके पेटसे चिपके हुए रहते हैं, अत: जन्म होते ही बालकके हाथकी मुट्ठी इतनी मजबूतीसे बँधी होती है कि वह रस्सी पकड़कर लटका रह सकता है। मनुष्यकी रीढ़की अन्तिम गाँठको ही पूँछका चिह्न कहा जाता है। पूँछवाले मनुष्योंमें यह गाँठ आठ-दस इंचतक बढ़ी हुई पायी जाती है। यह केवल मांस-स्नायुयुक्त होती है, इसमें हड्डी नहीं होती। मनुष्यकी अस्थियाँ पृथ्वीकी तीसरी तहमें मिलती हैं। पहले मनुष्यकी ऐसी-ऐसी जातियाँ हो गयी हैं, जिनका अब संसारमें निशान नहीं है। जावा द्वीपमें एक खोपड़ी मिली है, जो जंगली मनुष्यकी खोपड़ीसे अवनत और वनमनुष्यकी खोपड़ीसे उन्नत है। वह वनमनुष्य और मनुष्यके मध्यकी कड़ी अनुमान की जाती है। जो लीख आदि जन्तु मनुष्यके शरीरपर होते हैं, वे ही पशुओंकी देहपर भी पाये जाते हैं। चूहोंके रोग मनुष्योंको भी होते हैं, ऐसा कोई रोग नहीं, जो मनुष्योंको होता हो और पशुओंको न होता हो। इलाज भी दोनोंके समान ही हैं। नशा भी दोनोंको होता है। किसीका रुधिरकण गोल, किसीका दीर्घ-वर्त्तुल और किसीका चपटा भी होता है। स्याहीके दस स्तन होते हैं, चुहियाको आठ, कुतिया और गिलहरीको आठ-आठ, बिल्ली और रीछको छ:-छ: और अन्य सब तृणाहारी पशुओंको चार-चार स्तन होते हैं, परंतु जर्मनीकी एक स्त्रीके चार, जापानकी एक स्त्रीके छ: और पौलैण्डकी एक स्त्रीके दस स्तन हैं।’
इस तरह अनुमानके आधारपर ही विकासकी इमारत खड़ी है। प्रत्यक्ष परीक्षणका उसमें नामतक नहीं है। विचार करनेपर विकासवादियोंका उपर्युक्त मत भी ठीक नहीं जँचता। मनुष्यकी विशेषता तो विकासवादियोंको भी माननी ही पड़ती है। गोरिल्ला यद्यपि हाथ, पैर और छाती आदिमें मनुष्यको हरा सकता है, किंतु बुद्धिबलमें वह मनुष्यसे बहुत कम है, इसलिये उसे भी मनुष्यके अधीन होना पड़ता है। पूर्वोक्त युक्तियोंसे विकासवादके साधक प्रमाण खण्डित हैं। आस्तिक भी मानते हैं कि प्रकृति-पुरुषके संसर्गसे ही पशु-मनुष्यादि सभी प्राणी बनते हैं। इस तरह सबका समान तत्त्वोंसे बनना और सबमें आठ संस्थानोंका होना विकास सिद्ध नहीं करता। अमीबा एक कोष्ठधारी है, उसके एक ही कोष्ठमें आठों काम होते हैं, पर जब वह एकसे दो होता है, तब उसीके अन्दर एक दूसरा कोष्ठ तैयार होता है और अलग होनेके पहलेतक दोनों ही कोष्ठ एकमें ही रहते हैं। ऐसी स्थितिमें उसे एक कोष्ठधारी क्यों कहा जाता है। इसी तरह कई कोष्ठवाले प्राणीके प्रत्येक कोष्ठ अमीबाकी तरह आठों काम अलग-अलग नहीं करते, भिन्न-भिन्न कोष्ठोंके काम भिन्न-भिन्न हो जाते हैं। ऐसी स्थितिमें यह कैसे कहा जाता है कि ये कोष्ठ भी अमीबाके कोष्ठ-जैसे ही कोष्ठ हैं? अनेक कोष्ठवाले प्राणियोंमें सम्हाल पाया जाता है और सबको सम्हालनेवाला एक ही कोष्ठ विदित होता है; क्योंकि यदि सभी कोष्ठ प्रबन्ध करने लग जायँ तो शरीरमें अव्यवस्था हो जायगी। अत: किसी एक कोष्ठको ही चेतन मानना ठीक है।
वेदान्तमतमें तो भौतिक तत्त्वोंसे भिन्न व्यापक आत्मा स्वतन्त्र मान्य है। अन्त:करणकी उपाधिसे सब व्यवस्था उत्पन्न होती है। विकासवादमें तो कोष्ठोंके अन्दरका रस ही चैतन्य कहा जाता है, जो सर्वथा असंगत है। अनेक संयुक्त चैतन्योंसे देहकी व्यवस्था उत्पन्न नहीं हो सकती। मनुष्य स्तनधारियोंकी श्रेणीमें भले हों, परंतु न उनके परस्पर संयोगसे वंश चलता है, न सबकी समान आयु है, न तो समान भोग और न समान गर्भवास ही, यह कहा जा चुका है। ऐसी दशामें मनुष्यका बन्दरादिके साथ मेल मिलाना उनमें पशुताके संस्कार लानेके प्रयत्नके सिवा कुछ नहीं। बालोंसे युक्त पैदा होनेवाले मनुष्य-भिन्न प्राणियोंके बालोंमें मृत्युतक कोई परिवर्तन नहीं होता। जो गाय जिस रंगकी होती है, आजीवन उसी रंगकी रहती है। यही दशा घोड़ा, गधा, बकरी, भैंस आदिकी है। बन्दर और वनमनुष्य भी जिस रंगके पैदा होते हैं, मृत्युपर्यन्त उसी रंगके रहते हैं, परंतु मनुष्यके बालोंके रंग जीवनमें चार बार बदलते हैं—पैदा होनेपर सुनहरे रंगके, यौवनमें काले, वृद्धावस्थामें सफेद और अतिवृद्धितामें वे पिंगल हो जाते हैं। पशुओं और मनुष्योंमें यह भी अन्तर है कि सभी पशु पानीमें पड़ते ही तैरने लगते हैं, बन्दरकी भी यही हालत है, परंतु मनुष्यको तैरना सीखना पड़ता है। बिना सीखे पानीमें पड़नेपर वह डूबकर मर जाता है। दो पैरपर खड़े होना, स्पष्ट बोलना, विचार करना, हँसना-रोना, गाना आदि मनुष्योंमें ही लक्षित होते हैं, पशुओंमें नहीं। बिना शिक्षाके सब काम कर लेना पशुओंमें ही है, मनुष्योंमें नहीं। इससे स्पष्ट है कि वह पशुश्रेणीका प्राणी नहीं है। इसी तरह पशुओं और वनस्पतियोंमें भी अन्तर है। पशु आड़े शरीरके हैं और वृक्ष उलटे शरीरवाले अर्थात् उनका सिर नीचेको रहता है। दूसरा अन्तर यह है कि पशुओंके देखने-सुनने आदिके लिये आँख-कान आदि इन्द्रियाँ होती हैं, वृक्षोंके नहीं। सबसे विरोधी अन्तर खुराकका है। वृक्ष जिस दूषित वायुको खाकर जीते हैं, अन्य प्राणी उसे खाकर मर जाते हैं। वृक्ष प्राणप्रद वायु देते हैं और प्राणनाशक वायुका भक्षण करते हैं, अन्य प्राणियोंका क्रम इसके विपरीत है। इसी तरह वनस्पति एवं पशुओंका कोई भी शरीरसम्बन्धी उत्पादक सम्बन्ध कुछ भी प्रतीत नहीं होता। अत: मनुष्य न तो पशुश्रेणीका है और न वनस्पतिश्रेणीका ही, अत: तीनोंका ही कार्य-कारणभाव सर्वथा असंगत है।
वानर-कक्षाकी जो आठ विशेषताएँ दिखलायी गयी हैं, वे केवल वानरोंकी ही नहीं, उनमें आधीसे अधिक सब प्राणियोंमें पायी जाती हैं। जो दो-चार विशेषताएँ हैं, वे मनुष्यको पृथक् ही सिद्ध करती हैं। गर्भनाल भैंसका भी लगा रहता है। अँगूठेके घूमनेसे भी बन्दर मनुष्यसे भिन्न जातिका सिद्ध होता है। वृक्षोंपर तो चिड़ियाँ और कीड़े भी रहते हैं। दूधके और स्थायी दाँत गाय, भैंस आदिके भी होते हैं। दाँतोंकी संख्या अन्य पशुओंमें अलग-अलग होती है। इसी तरह पाँच अँगुलियाँ गिलहरीके भी होती हैं। दो स्तन बकरीके भी होते हैं। इसी तरह मस्तिष्ककी बड़ाई भी मनुष्यता नहीं है। आधुनिक वैज्ञानिक भी चींटीको बहुत बुद्धिमान् मानते हैं, उसकी-जैसी प्रबन्ध-शक्ति अन्यत्र नहीं देखी जाती। इसमें ‘बड़े या स्पष्ट मस्तिष्कसे ही बुद्धि और विचारोंकी उत्पत्ति होती है’ यह नहीं कहा जा सकता। वस्तुत: लीमर, मार्मोसेट आदि प्राणी स्वतन्त्र योनियाँ ही हैं। विकासक्रम दिखलानेके लिये ही उन्हें वानरकोटिमें मान लिया जाता है। इनका परस्पर वंश नहीं चलता; अत: ये वानरजातिके नहीं हैं। वनमानुषोंका भी बन्दरके साथ नाममात्रका ही मेल है, वस्तुत: इनका एक-दूसरेके साथ कुछ भी वास्ता नहीं है। यदि गिवनकी माता अपने बच्चेका मुँह धोती है तो गाय-भैंस चाट-चाटकर ही अपने बच्चेको साफ-सुथरा रखती है। चिड़िया दाना लाकर अपने बच्चोंको खिलाती है। यदि चिम्पेंजी घाव दबाकर खून बन्द करनेकी चेष्टा करता है, तो कुत्ता भी घास खाकर जुलाब लेता और चाटकर घावोंको ठीक कर लेता है। हाथी भी अपना इलाज आप कर लेता है। चिम्पेंजी नौ महीनेके बालककी बुद्धि रखता है, परंतु चींटी सब संसारका प्रबन्ध करनेकी बुद्धि रखती है। अत: मनुष्य वनमनुष्यकी श्रेणीका भी नहीं। मस्तिष्कका सिद्धान्त चींटीके दृष्टान्तसे कट जाता है, चींटीको मस्तिष्क होता ही नहीं। यदि चींटीको मस्तिष्क हो तो भी चिम्पेंजी आदिकी अपेक्षा तो नगण्य ही होगा। जब चींटी मस्तिष्कके बिना ही सब काम करती है, तब ‘मनुष्य चौड़े मस्तिष्कसे ही सब काम करता है’ यह नहीं कहा जा सकता।
इसी तरह दो पैरपर सीधे खड़े होनेसे आँतकी बीमारी होनेकी कहानी भी व्यर्थ है। यदि खड़े होनेसे यह बिमारी होती, तो करोड़ों वर्ष पहले भी यह बीमारी होती और फिर इसके डरसे मनुष्य सीधा खड़ा क्यों होता? वस्तुत: यह रोग अधिक भोजनकी लोलुपताके कारण ही होता है। पशु बिना भूखके नहीं खाता। डॉ० लूई कूनेका ‘चिकित्साका नूतन विज्ञान’ (न्यू साइंस ऑफ हीलिंग) पुस्तकमें कहना है—‘आँत उतरनेकी बीमारी पेडूके भीतर विकृत द्रव्यके बोझकी खिंचावट है। आमाशयकी झिल्ली उन स्थानोंमें जहाँ जरा भी रुकावट मिल जाती है, अँतड़ियाँ आन्तरिक दबावके कारण छेद कर देती हैं और बाहर निकल आती हैं, भिन्न-भिन्न पुरुषोंकी झिल्ली फटनेके स्थान भिन्न-भिन्न होते हैं, परंतु कारण सदैव एक ही रहता है। अत: इस रोगका कारण चोट खाना, गिर पड़ना अथवा अन्य कोई बतलाना भूल है। झिल्ली अन्य कारणोंसे भी फट सकती है, परंतु आँत उतरनेका कारण चोट आदि नहीं है। युक्त चिकित्सा रीतिसे विकृत द्रव्यको शरीरसे निकाल देनेपर इस प्रकारके छिद्रोंमें आराम हो जाता है। फिर ‘चौपायेसे द्विपाद होनेके कारण आँत उतरनेका रोग होने’ की कल्पना सिर्फ बालकपन ही है। वनमनुष्य भी जबतक दो पैरसे खड़ा नहीं हो जाता, तबतक वह द्विपाद नहीं चतुष्पाद ही कहा जायगा। बन्दरके हाथ कहनेको ही हाथ हैं, वस्तुत: वे पैर ही हैं। बन्दर पैरसे भी वस्तु पकड़ता है। जंगली स्त्री भी पैरसे वस्तु उठा लेती है। इससे यह सिद्ध नहीं होता है कि वनमानुष बन्दरजातिका है। अभ्यास करनेसे तो बाजीगर आँखसे पैसा उठा लेता है और भानुमती पानीके अन्दर मुँह डालकर जीभसे नथमें मोती पिरो देती है। क्या यह सब बन्दरोंमें सम्भव है? अच्छे पहलवान पैरसे दाँव चलाते हैं, सरकसवाले पैरसे कितने ही अद्भुत काम कर लेते हैं। क्या यह सब बन्दरोंके चिह्न हैं? इसी तरह अकल-डाढ़की बात है। जंगली लोगोंमें यह जल्दी निकलती है, इससे भी मनुष्यके बन्दरसे विकसित होनेकी बात सिद्ध नहीं होती। अंगोंका शीघ्र स्फुटित होना खाद्य, पेय, आचार, व्यवहार एवं जलवायुपर निर्भर होता है। जंगली मनुष्योंमें अकलडाढ़ कच्चे अन्न, कच्चे मांस खानेके कारण शीघ्र निकलती है, इसीलिये वह बड़ी भी होती है।’
किसी-किसीके शरीरपर बालोंकी अधिकता गर्भमें पुरुष-शक्तिकी अधिकताकी द्योतक है। पुरुष-शक्ति अधिक होनेसे कभी-कभी स्त्रियोंके भी दाढ़ी-मूँछ निकल आते हैं। पुरुष-शक्ति कम होनेसे पुरुषोंमें भी दाढ़ी-मूँछ कम होते हैं। रोम, बाल, हड्डी, स्नायु आदि कठिन पदार्थ पितृ-शक्तिका परिणाम है। अत: किसीमें बाल अधिक देखकर बन्दरोंकी संतान होनेकी कल्पना भी गलत है। बाल होना यदि वानरोंका चिह्न है, तब तो जिन पुरुषोंके दाढ़ी-मूँछ नहीं होती या जिन स्त्रियोंको होती है, वे किसके विकास माने जायँगे? क्या ऐसे भी बन्दर दिखायी देते हैं, जिनकी दाढ़ीपर बाल स्त्रियोंकी भाँति बिलकुल न हों? रहा वंश-परम्परागत बालोंका होना, सो वह तो सहज ही सिद्ध है। जब एक बार संतानके बाल निकल आये, तो वे धीरे-धीरे दस-पाँच पीढ़ियोंके बाद ही जाते हैं। ऐन्यू लोगोंकी संतानोंमें अब बाल कम हो रहे हैं। इसलिये बालोंसे मनुष्य वानर-कक्षाका प्राणी सिद्ध नहीं होता।
अंगोंको न हिला सकना इस बातका सबूत नहीं है कि अब वे अंग निकम्मे हो गये। क्या पीठपरसे मक्खी, मच्छर आदि उड़ानेकी अब आवश्यकता नहीं रही? यदि यह कहा जाय कि इनको उड़ानेके अब दूसरे साधन हो गये हैं तो आँख, भौंह आदि हिलानेकी शक्ति क्यों बनी हुई है? इनकी ताकत तो सबसे पहले ही चली जानी चाहिये; क्योंकि हाथका साधन समीपमें है ही। वस्तुत: कर्मोंके अनुसार जिस प्रकारका भोग उपस्थित होता है, ईश्वर उसी प्रकारका शरीर और शक्ति देता है। गाल, भौंह, मस्तक, होंठका फड़काना-नचाना यदि बन्द हो जाता तो नाटक-नर्तकोंकी भाव-व्यंजना कैसे होती तथा दो अपरिचित भाषावालोंका परस्पर परिचय और संवाद कैसे सम्पन्न होता? सूँघकर पहचाननेकी शक्ति तो सभी मनुष्योंमें होती है। फूल-फल, इत्र, घी-तेल आदिके भेद सूँघकर सभी मनुष्य समझ सकते हैं। अभ्यासके कारण विशेषज्ञ इत्र आदिके भेद जितनी जल्दी बतला देते हैं, उतनी जल्दी व्योरेवार हर आदमी नहीं बतला सकता। संगीतज्ञ लोग रागोंके भेद अभ्याससे समझ लेते हैं, अन्य नहीं। जंगली और अपढ़ लोग स्मृतिसे अधिक काम लेते हैं, इसलिये उनकी स्मरणशक्ति प्रबल होती है; परंतु इसका यह अर्थ नहीं कि यह उनके पूर्वजोंका चिह्न है। राजस्थानमें पदचिह्न पहचाननेवाले लोग होते हैं। वे उससे चोरोंका पता लगा लेते हैं, उनका यह अभ्यास किस पूर्व जातिकी देन है? रोएँ खड़े करना मनुष्यके आवश्यक नहीं; क्योंकि वह रोमवाला प्राणी नहीं। हर्ष, भय आदिके समय रोमांच होनेपर रोएँ खड़े होते ही हैं, अत: रोमांच करनेवाली नसोंको कमजोर नहीं कहा जा सकता। टूटा हुआ हाथ यदि कभी भी काम देता है तो उसे टूटा नहीं कहा जा सकता। रोमांचवाली नसें न कमजोर हैं, न रोज काम ही देती हैं। हाँ, उनपर पुरुषकी स्वाधीनता नहीं है कि जब चाहें तब रोएँ खड़े कर दिये जायँ, परंतु हृदय आदि यन्त्र भी तो स्वेच्छानुसार नहीं चलाये जाते, फिर भी वे सब अपना-अपना काम करते ही रहते हैं। फिर क्या हृदयको कमजोर कहा जायगा? इसी तरह रोमांचवाली नसें भी कमजोर नहीं कही जा सकतीं। रोमांच मनुष्यका ही गुण है, अन्य पशुओंका नहीं, इसलिये इसकी औरोंसे तुलना नहीं की जा सकती। गलेकी थैली गुठली न खानेकी चेतावनीके लिये है। मनुष्य फल खाता है, उसे गुठली नहीं खानी चाहिये अन्यथा पाचन-शक्ति कमजोर हो जाती है। गर्भमें शरीरपर बाल छा जानेका यह अर्थ नहीं कि मनुष्य पहले बन्दर था। यदि गर्भमें पुराने रूपोंका दिखलाना आवश्यक हो, तो फिर यह भी बतलाना पड़ेगा कि सबसे प्रथम प्राणी अमीबा अपनी उत्पत्तिसे किसका रूप दिखला रहा है। गर्भमें छ: महीने बाद बच्चेकी खाल बाहर आने योग्य होती है। कई बच्चे सात महीनेमें भी उत्पन्न होते हैं और पूर्ण आयुतक जीते हैं। इसलिये उस खालकी जरायुमें भरे गन्दे पानीसे रक्षा करनेके लिये ही गर्भसे बालोंका आयोजन है; क्योंकि बालोंके कारण बच्चेपर पानीका असर नहीं पड़ता। मनुष्यके बालोंके साथ वानरके बालोंकी तुलना भी नहीं हो सकती; क्योंकि किसी भी बन्दरके सिरपर चार फीट लम्बे बाल नहीं होते। किस बन्दरकी दाढ़ी लम्बी होती है? परंतु अनेकों मनुष्योंके सिर एवं दाढ़ीके बाल पर्याप्त लम्बे होते हैं। संसारमें मनुष्यके अतिरिक्त किसी प्राणीके ऐसे बाल नहीं होते। ‘मनुष्यका बच्चा रस्सी पकड़कर लटक सकता है’, इसका भी यह तात्पर्य नहीं कि ‘बन्दरके बच्चेसे उसने पेटमें चिपके रहना सीखा है, इसलिये मनुष्यके बच्चेमें यह शक्ति है’, किंतु पेटमें मुट्ठी बँधे रहनेके अभ्यासके कारण यह शक्ति होती है। पेटमें मुट्ठी इसलिये बँधी होती है कि यदि वह खुली रहे तो यह भय रहता है कि वह पेटकी किसी वस्तुको पकड़ सकती है और पैदा होते समय इससे कठिनाई पड़ सकती है, अत: ईश्वरके प्रबन्धकी यह दक्षता ही है।
मनुष्यकी पूँछ पूँछ नहीं, वह तो बढ़ा हुआ मांस ही है, इसीलिये उसमें मांस और नसें ही होती हैं, हड्डी नहीं होती। जिस प्रकार अमेरिकाकी अमेजन नदीके किनारे रहनेवाले मनुष्योंके ओष्ठ एक फुट लम्बे होते हैं (सरस्वती वर्ष १०, अंक ४)। इसी प्रकार मनुष्योंके उस स्थानकी खाल भी बढ़ी होती है। फिर भी जैसे उक्त अमेरिकन, हाथीका विकास नहीं माना जाता, वैसे ही मनुष्योंको भी बन्दरका विकास नहीं कहा जा सकता। इसके अतिरिक्त मनुष्यको वनमानुषका विकास कहा जाता है। पर जब वनमानुषको पूँछ नहीं, तब वह मनुष्यको कैसे हो सकती थी। फिर यहाँ तो मनुष्य और वनमानुषके बीचमें एक और नरवानर भी माना जाता है। कई जगह फीलपाँव होता है, कहीं अण्डकोष-वृद्धि, कहीं गले और कहीं पेटकी वृद्धि होती है। इसी तरह अफ्रीकामें ओष्ठ मोटा होता है। पर ‘यह सब नये अंग फूट रहे हैं’, यह नहीं कहा जा सकता। इसी तरह स्थानविशेषकी किंचिन्मांसवृद्धिको पूँछ नहीं कहा जा सकता। जावामें मिली पुरानी खोपड़ी या तो बालककी हो सकती है अथवा फ्रीनालोजीके अनुसार किसी मूर्खकी। इसी तरह मनुष्य, बन्दर आदि सभी पंचतत्त्वरचित हैं। अत: सबमें जूँ-लीख, नींद-नशा आदि समान हों, इसमें आश्चर्यकी क्या बात है? शास्त्र भी कहते हैं कि ‘आहार-निद्रा, भय-मैथुनादि मनुष्य-पशु सभीमें समान ही होते हैं। मनुष्यमें धर्मकी ही विशेषता होती है’—
आहारनिद्राभयमैथुनं च
सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम्।
धर्मो हि तेषामधिको विशेषो
धर्मेण हीना: पशुभि: समाना:॥
(चा० नीति)
मनुष्योंके बालोंके रंग बदलने और पशुओंके तैरने आदिकी विशेषताओंके भेद भी पहले बतलाये ही जा चुके हैं। स्त्रियोंके अनेक स्तनोंके आधारपर भी विकासवादी कहते हैं कि ‘मनुष्य पहले स्याही, चूही (चुहिया), कुत्ती, गिलहरी, बिल्ली एवं भल्लुकी होकर मनुष्य बना है।’ परंतु अमेरिकाके मनुष्य लम्बे ओष्ठवाले होनेसे भी हाथीका विकास सिद्ध नहीं होता। अफ्रीकाके ‘बुशमैन’ अँधेरेमें देखते हैं, शिकार पकड़ते हैं, फिर भी वे गीध, उल्लू, सर्पसे उत्पन्न सिद्ध नहीं होते। यों तो कुछ-न-कुछ लक्षण मनुष्यमें सभी प्राणियोंके पाये जा सकते हैं, इससे क्या यह भी कहा जाय कि ‘मनुष्य सभी जातियोंमें होकर आया है?’ ऐसा माननेपर हेकल, हक्सले आदिकी इक्कीस श्रेणीवाली बात भी असत्य ठहरेगी। हिन्दू-शास्त्र तो यह मानते हैं कि ‘प्राणी चौरासी लाख योनियोंमें भटकनेके बाद ही मनुष्य बना है। इसीलिये वह पैदा होते ही दूध पीनेमें प्रवृत्त होता है। हर्ष, शोक, भयका संचार भी पिछली अनेक योनियोंमें उसके जन्म होनेकी सूचना है। उत्पन्न होते ही बालकमें पूर्वजन्मके संस्कार उपलब्ध होते हैं, तब गर्भमें भी अनेक संस्कारोंका होना उचित ही है। उन संस्कारोंके अनुसार शरीरकी बनावटमें भी कुछ अन्तर पड़ता है। सगर्भा माताके भावविशेषसे प्रभावित होनेपर भी गर्भपर उसका असर पड़ता है। इस तरह गर्भस्थके संस्कार, माताके विचार, व्यवहार, देश, काल परिस्थितिकी विशेषतासे गर्भस्थ बालकमें भी विचित्रता आ जाती है।’
विकासवादके विरुद्ध सृष्टिमें कितनी ही बातें हैं, जिनसे विकासका सिद्धान्त खण्डित होता है। नरोंके स्तन, बकरीके गलेके स्तन, घोड़ेमें स्तनोंका अभाव, भेड़ेकी सींग, मनुष्यकी छठी अँगुली आदि विकासवादके विशिष्टाविशिष्ट अंगोंकी कल्पनाको मिथ्या सिद्ध करते हैं। भैंसा, बैल, बकरा, हाथी, ऊँट, सिंह, कुत्ता, वानर और पुरुषोंके स्तन कब, क्यों और कैसे होते हैं; इनका उत्तर विकासवादमें नहीं है। अमीबामें नर-मादाका भेद नहीं था, आगे चलकर वह कैसे हो गया? पहलेके प्राणियोंमें स्तन नहीं थे, चमगादड़से स्तन भी उत्पन्न होने लगे। जब पहले बिना स्तनके सभी प्राणियोंका पोषण होता ही था, तब फिर स्तनकी क्या आवश्यकता आ पड़ी? फिर नरोंके स्तनोंका क्या प्रयोजन और घोड़ेमें स्तन क्यों नहीं? मेढ़ोंमें सींग परम्परासे नहीं होते। किसीको हो जाते हैं, किसीको नहीं। विकासवादी इनका क्या कारण कहेंगे? वस्तुतस्तु गर्भस्थके संस्कारों, माता-पिताके विचारों एवं व्यवहारोंसे ही ये सब विकृत अंग होते हैं। जिस तरह मनुष्योंमें आठ-दस स्तन और पूँछ आदिके चिह्न देखे जाते हैं, उसी तरह पशुओंमें किसी अन्य पशुके चिह्न नहीं दिखायी पड़ते। वानरोंमें न कभी आठ-दस स्तन होते हैं और न एक साथ एकसे अधिक बच्चे ही होते हैं, परंतु मनुष्यके अनेक स्तन एवं एक साथ अनेक बच्चे भी पैदा होते हैं, अत: न वानर ही अन्य पशुओंका विकास है और न मनुष्य वानरका ही विकास है।
पशुओंको पुराने जन्मकी स्मृति नहीं होती, मनुष्योंको पिछली स्मृतियाँ होती हैं, इसीलिये मनुष्योंमें ८४ लाख योनियोंमेंसे किसीके संस्कार गर्भमें उद्भूत होनेसे वैसी रचना हो जाती है, पशुओंमें नहीं। यह भी मत है कि पुरुषका वीर्य अनेक कणोंका बना होता है, प्रत्येक कणमें एक-एक बालक उत्पन्न करनेकी शक्ति होती है। प्राय: एक कणसे ही बालक उत्पन्न होता है, अन्य घिसकर नष्ट हो जाते हैं। कभी-कभी कई कण रह जानेपर कई बालक उत्पन्न होते हैं। कभी कोई कण दूसरे कणसे जुड़ जानेपर वही कहीं छठी अँगुली, कभी पूँछके समान अंग और कभी अनेक स्तन उत्पन्न कर देते हैं। एक ही भेड़में बकरा और भेड़ा दोनोंका संयोग होनेसे सींगवाला भेड़ा पैदा होता है। दैवात् सगर्भा गायसे साँड़का संयोग होनेपर पाँच पैर दो पूँछवाला बच्चा पैदा हो जाता है। कभी पाँच पैरोंकी गाय दिखायी देती हैं, उनमें दूसरी गायका पैर काटकर जोड़ दिया जाता है। विदेशोंमें ऐसे जोड़-तोड़की पद्धति चलती है।
श्रोत: मार्क्सवाद और रामराज्य, लेखक: श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज, गीता सेवा ट्रस्ट
निवेदन : मूल पुस्तक क्रय कर स्वयं की तथा प्रकाशक की सहायता करें
