11.14 आत्मा एवं भूत ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज

11.14 आत्मा एवं भूत मार्क्सवादी ‘आत्माकी अपेक्षा प्रकृति या भूतको ही मूल मानते हैं। भौतिक चिन्त्य वस्तुसे भिन्न चिन्तन या विचार पृथक् नहीं किया जा सकता है। चेतना या विचार चाहे कितने ही सूक्ष्म क्यों न प्रतीत हों, परंतु हैं वे मस्तिष्ककी उपज ही। मस्तिष्क एक भौतिक दैहिक इन्द्रिय ही है। यह भौतिक जगत‍्का सर्वश्रेष्ठ… Continue reading 11.14 आत्मा एवं भूत ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज

11.13 मूल, वस्तु या चेतना? ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज

11.13 मूल, वस्तु या चेतना? ‘मूल, भूत है या चेतना?’ इस प्रश्नके उत्तरमें आधुनिक वैज्ञानिक एडिंगटन भी कहते हैं—‘खोजते हुए अन्तमें जहाँ पहुँचा, वहाँ देखता हूँ, मनकी छायामात्र है।’ वैज्ञानिक जोन्स गणितशास्त्रके पण्डित हैं। उनका कथन है—‘अन्तमें देखता हूँ, विज्ञानकी ही विजय है। विश्वका मूलाधार, ईश्वर एक अंकशास्त्रवित् है और यह विश्व उसीके मस्तिष्कका एक… Continue reading 11.13 मूल, वस्तु या चेतना? ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज

11.12 ज्ञान और आनन्द ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज

11.12 ज्ञान और आनन्द ज्ञानके सम्बन्धमें अनेक प्रकारोंकी विप्रतिपत्तियोंके रहते हुए भी ‘अर्थप्रकाश’ को ही ‘ज्ञान’ कहा जा सकता है। मुक्तिमें यद्यपि अर्थ नहीं होता, तथापि जब अर्थ-संसर्ग सम्भव हो, तभी अर्थका प्रकाशक अर्थ ही ज्ञान है। अतएव ‘ज्ञानत्व जाति-विशेष है, साक्षात् व्यवहारजनकत्व ही ज्ञानत्व है, जड-विरोधित्व ही ज्ञानत्व है, जडसे भिन्नत्व ही ज्ञानत्व है,… Continue reading 11.12 ज्ञान और आनन्द ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज

11.11 अनुभव-विमर्श ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज

11.11 अनुभव-विमर्श अनुभव यदि दूसरे अनुभवसे अनुभाव्य होगा तो अनवस्थादोष होगा; क्योंकि वह जिस अनुभवसे अनुभाव्य होगा, उसे भी किसी अन्य अनुभवसे अनुभाव्य होना पड़ेगा। यदि प्रथमानुभवसे द्वितीयका एवं द्वितीयसे प्रथमका अनुभव माना जाय तो अन्योन्याश्रयदोष होगा। प्रथमका द्वितीयसे, द्वितीयका तृतीयसे अनुभव मानें तो अनवस्था और यदि प्रथमानुभवका अपनेसे ही अनुभव माना जाय तो आत्माश्रय-दोष… Continue reading 11.11 अनुभव-विमर्श ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज

11.10 अनुभव और आत्मा ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज

11.10 अनुभव और आत्मा ‘वार्तिकसार’ में संवित‍्के सम्बन्धमें महत्त्वपूर्ण बातें कही गयी हैं। संवित‍्का भेद स्वत: नहीं कहा जा सकता। घटसंवित्, पटसंवित् इस रूपसे वेद्यपूर्वक ही संवित‍्का भेद भासित होता है, अत: संवित‍्का यह भेद स्वाभाविक नहीं; किंतु घटादि उपाधिके कारण ही प्रतीत होता है। वह सुतरां भ्रम है। इसी प्रकार सम्यक् ज्ञान, संशय एवं… Continue reading 11.10 अनुभव और आत्मा ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज

11.9 भारतीय दर्शनमें ज्ञान-सिद्धान्त ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज

11.9 भारतीय दर्शनमें ज्ञान-सिद्धान्त ‘काण्टके भी अनुभव और ज्ञान—दोनोंका भेद सिद्ध नहीं हो सकता। भारतीय दर्शनोंके अनुसार अनुभवके ही भ्रम और प्रमा—ये दो भेद होते हैं। उसे ही ज्ञान भी कहते हैं। ‘सर्वव्यवहारहेतुर्गुणो बुद्धिर्ज्ञानम्’ अर्थात् आहार-विहार, शब्द-प्रयोगादि सभी व्यवहारोंका असाधारण कारण गुण ही बुद्धि है, वही ज्ञान भी है। ज्ञानके बिना कोई भी व्यवहार नहीं… Continue reading 11.9 भारतीय दर्शनमें ज्ञान-सिद्धान्त ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज

11.8 स्वतन्त्रताका अवबोध ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज

11.8 स्वतन्त्रताका अवबोध मार्क्सवादी कहते हैं कि ‘जनता जन्मत: ही स्वतन्त्र नहीं उत्पन्न होती, परंतु शनै:-शनै: स्वतन्त्रता उपार्जित कर लेती है। स्वतन्त्रता प्रकृतिपर प्रभुत्व प्राप्त करनेके लिये किये जानेवाले संघर्ष एवं वर्गसंघर्षद्वारा उपार्जित एवं विकसित की जाती है। समाजमें विभिन्न वर्गोंद्वारा वस्तुत: उपार्जित एवं अधिकृत स्वतन्त्रता एवं उस स्वतन्त्रताके बन्धन तत्तद्वर्गोंकी स्थिति एवं उद्देश्योंके अनुसार… Continue reading 11.8 स्वतन्त्रताका अवबोध ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज

11.7 आवश्यकता एवं स्वतन्त्रता ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज

11.7 आवश्यकता एवं स्वतन्त्रता ‘युक्तिपूर्ण या उपपत्त्यात्मक ज्ञान वस्तुओंकी ‘आवश्यकताओं’ का उद्घाटन करता है और यह भी बतलाया है कि आवश्यकका महत्त्व सर्वदा काकतालीय (ऐक्सिडेण्टल)-से ही विदित होता है। ज्ञानकी प्राप्ति (acquisition) से हमें स्वतन्त्रता मिलती है, जो आवश्यकताके ज्ञानपर आधारित आत्मनियन्त्रण एवं बाह्यप्रकृति-नियन्त्रणके ही रूपमें हैं। हम उस समय स्वतन्त्र हैं, जब ज्ञानके आधारपर… Continue reading 11.7 आवश्यकता एवं स्वतन्त्रता ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज

11.6 विकास ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज

11.6 विकास ‘ज्ञान, जब हम वस्तुओंके साथ सक्रिय सम्बन्धोंमें आते हैं, तब प्राप्त होता है और प्रतीतिसे निर्णयकी ओर विकसित होता है। ज्ञानका विकास प्रत्ययात्मकसे उपपत्त्यात्मक (युक्तिपूर्ण सिद्धि) तक, वस्तुओंके रूप-रंग आदिके केवल बहिरंग (ऊपरी-ऊपरी) निर्णयोंसे उनके आवश्यक गुण-धर्मों, पारस्परिक संयोगों तथा नियमोंके विषयमें तर्कपूर्ण निष्कर्षोंतकके मार्गपर होता है। इस प्रकार हम बाह्य (वस्तुमय) संसारका… Continue reading 11.6 विकास ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज

11.5 ज्ञानका मूल ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज

11.5 ज्ञानका मूल ‘ज्ञान वस्तुगत सत्यताकी यथासम्भव निर्दुष्ट प्रतिच्छायाओंके रूपमें प्रतिष्ठापित एवं परीक्षित मान्यताओं, दृष्टियों एवं प्रस्तावनाओंका योग है। यह निश्चितरूपसे एक सामाजिक उपज है, जिसकी जड़ें सामाजिक व्यवहारोंमें हैं; जिन्हें व्यावहारिक आशाओं एवं अपेक्षाओंकी पूर्तिद्वारा परीक्षित एवं संशोधित कर लिया जाता है। सभी ज्ञानोंका प्रारम्भ उन इन्द्रियानुभूतियोंमें निहित है, जिनकी विश्वसनीयता मनुष्यके व्यवहारोंमें सिद्ध… Continue reading 11.5 ज्ञानका मूल ~ मार्क्सवाद और रामराज्य ~ श्रीस्वामी करपात्रीजी महाराज

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